How the Lord tests his devotees – Hindi
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Lecture Summary
यह प्रवचन श्रीमद् भागवतम के सातवें अध्याय पर आधारित है, जिसका मुख्य विषय यह है कि भगवान और गुरु अपने भक्तों की परीक्षा कैसे लेते हैं, और जटिल परिस्थितियों में धर्मानुकूल सही निर्णय (Right Action) कैसे लेना चाहिए।
मुख्य बिंदु (Key Highlights)
- शास्त्रों का उद्देश्य: संसार में सभी जीव आहार, निद्रा, और भय जैसी मूल प्रवृत्तियों में लगे रहते हैं। लेकिन मनुष्य के पास विवेक है। भागवतम का उद्देश्य हमें यह सिखाना है कि इस जटिल दुनिया में आध्यात्मिक और नैतिक चेतना के साथ कैसे कार्य करना चाहिए।
- शास्त्रों का क्रम: यह एक प्रगतिशील ज्ञान है—
- भगवद् गीता: भगवान कौन हैं और भक्ति कैसे करें।
- श्रीमद् भागवतम: भगवान क्या करते हैं (विशेषकर दशम स्कन्ध में)।
- चैतन्य चरितामृत: भगवान कैसे सोचते हैं।
- अर्जुन की परीक्षा (अश्वत्थामा का दंड): अश्वत्थामा (द्रोण पुत्र) को दंड देना एक बड़ी दुविधा थी। एक तरफ द्रौपदी थीं, जिन्होंने गुरु-पुत्र और ब्राह्मण होने के नाते उसे क्षमा करने को कहा। दूसरी तरफ भीम थे, जो उसका वध करना चाहते थे। अर्जुन ने अपनी परीक्षा में सफल होते हुए मध्य मार्ग निकाला—उन्होंने अश्वत्थामा की मणि निकाल ली और बाल काट दिए। यह वध के समान ही दंड था, पर इससे शरीर की हत्या नहीं हुई।
- परीक्षा के अन्य पौराणिक उदाहरण:
- पृथु महाराज: 100वें यज्ञ में विघ्न आने पर भगवान ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। यह एक परीक्षा थी। पृथु महाराज ने भौतिक फल की बजाय केवल भक्तों का संग मांगा।
- प्रह्लाद महाराज: भगवान नृसिंह देव द्वारा वरदान दिए जाने पर उन्होंने केवल यही मांगा कि उनके हृदय में कभी कुछ मांगने की इच्छा ही उत्पन्न न हो।
- गोपियां: भगवान ने उद्धव के माध्यम से उन्हें ज्ञान दिया कि परमात्मा सर्वव्यापी है। पर गोपियां इस ज्ञान से संतुष्ट नहीं हुईं; उन्हें भगवान श्री कृष्ण का व्यक्तिगत संग ही चाहिए था। यह उनके प्रेम की सर्वोच्च परीक्षा थी।
- परीक्षित महाराज: शुकदेव गोस्वामी ने कर्मकांड (प्रायश्चित) और ब्रह्म-ज्ञान का मार्ग बताकर उनकी परीक्षा ली, पर परीक्षित महाराज केवल शुद्ध भक्ति के मार्ग पर अडिग रहे।
- देश, काल और पात्र के अनुसार निर्णय: जीवन में कोई एक बंधा-बंधाया फॉर्मूला नहीं होता। महान आचार्यों (जैसे श्रील प्रभुपाद और भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर) ने समय और परिस्थिति के अनुसार अलग-अलग निर्णय लिए, ताकि अज्ञानी लोगों के मन में भ्रम (बुद्धिभेद) पैदा न हो और वे भक्ति से न भटकें।
- प्रलोभन (Temptation) का असली कारण: जीवन में आने वाले काम, क्रोध और लोभ भगवान द्वारा दी गई परीक्षा की तरह हैं। जैसे एक शिक्षक परीक्षा में ‘Multiple Choice’ प्रश्न देता है और सही उत्तर चुनने की उम्मीद करता है, वैसे ही भगवान हमें पहले ‘ज्ञान’ देते हैं और फिर प्रलोभन के माध्यम से हमारी परीक्षा लेते हैं। अपनी विफलताओं के लिए ‘नियति’ को दोष देना धृतराष्ट्र जैसी मूर्खता है।
Full Transcription
श्रीमद् भागवतम का उद्देश्य और जीवन में कार्य करने की कला
हरे कृष्णा! तो आज श्रीमद् भागवतम के इस सातवें अध्याय से एक महत्वपूर्ण श्लोक पर चर्चा कर रहे हैं। तो ये जो सातवां अध्याय है, इसमें भगवान श्री कृष्ण का प्रवेश श्रीमद् भागवतम में पहली बार हो रहा है। और शास्त्रों का प्रधान उद्देश्य ये है कि हमें इस दुनिया में कार्य कैसे करना है, ये सिखाना। जैसे हम किसी डॉक्टर के पास जाते हैं, तो डॉक्टर हमें बताता है कि आपको ऐसे खाना चाहिए, दवाई लेनी चाहिए। तो डॉक्टर का प्रधान ज्ञान हमें दिया जाता है कि कैसे हमें कार्य करना चाहिए, ताकि हम ठीक हो जाएं।
उसी तरह से जब हम दुनिया में जीते हैं, तो किस तरह से कार्य करना है, यहां भगवान परम डॉक्टर हैं, वो हमें शास्त्र के माध्यम से बताते हैं। और इस जगत में कार्य कैसे करना है, यह बहुत जटिल है। क्योंकि, क्यों जटिल है? क्योंकि एक स्तर पे तो सारे जीव जो हैं, आहार, निद्रा, भय, मैथुन, इन कार्यों में लगे रहते हैं। जो मानव है, मानव को यह बुद्धि होती है कि जिससे कि वो इन शारीरिक कार्यों से ऊंचा और कुछ भी कर सकता है। तो जो नैतिक बुद्धि है, वो केवल मानव को दी जाती है।
क्योंकि जो जानवर हैं, वो अपने शरीर की इच्छाएं जो होती हैं, शरीर की जो प्रक्रियाएं होती हैं, उनके अनुसार ही कार्य करते हैं। तो मानवों को क्योंकि विवेक बुद्धि है, नैतिक चेतना है, इसलिए यह उचित है, यह अनुचित है, यह समझ सकते हैं, और फिर उसके अनुसार कार्य कर सकते हैं। तो इस अध्याय में बताया जा रहा है कैसे एक आदर्श भक्त जो हैं, जो अर्जुन, वो कैसे सारे जो पर्याय हैं, उनका अच्छी तरह से निचोड़ करके फिर एक उचित कार्य चुनते हैं।
श्रीमद् भागवतम का क्रम और दशम स्कन्ध की पृष्ठभूमि
तो अभी तक जो श्रीमद् भागवतम में पृष्ठभूमि चल रही है, तो पहले अध्याय में जो है प्रार्थनाएं आती हैं, भागवतम की महिमा बतायी गई है, और फिर उसके बाद में कैसे जो ऋषिगण होते हैं, वो शौनकादि ऋषिगण जो हैं, सूत गोस्वामी को सवाल पूछते हैं, ये बताया गया है। उसके बाद में दूसरे अध्याय में प्रधान प्रश्नों का जवाब है। दूसरे अध्याय में जो भगवान श्री कृष्ण सर्व अवतारों के श्रेष्ठ हैं, जो उनके बारे में दशम स्कन्ध में आगे बताया जाएगा, वो सब अवतारों की एक झलक दी गई है, और भगवान कृष्ण को सब का स्रोत बताया गया है।
और फिर जो शौनकादि ऋषिगण हैं, उनके मन में सवाल होता है कि अगर ये महान ज्ञान है भागवतम का, तो उसका उद्गम कैसे हुआ? तो उसका ये ज्ञान तो सनातन है, और भगवान ने ब्रह्माजी को दिया, पर जो भागवतम ग्रंथ का संकलन जो है, वो चौथे से सातवें अध्याय में उसका इतिहास बताया गया है। “मायां च तदपाश्रयाम्” तो इसमें बताया गया है, वो जब ध्यान में जाते हैं, ये इसी अध्याय के चौथे, पांचवें, छठे, सातवें श्लोक में आता है उनका ध्यान, और उस ध्यान में जो दृष्टि मिलती है, उसके बारे में बताया गया है।
तो फिर जब वे ध्यान में जाते हैं और देखते हैं, कैसे जीवात्मा माया के वश में है, और भगवान माया के परे हैं। तो जीवात्मा माया के परे कैसे आ सकता है? भगवान की शरण में जाके। तो भगवान यहां पे हैं, माया यहां पे है, जीवात्मा यहां पे है। जीव, द्रोण के जो पुत्र हैं अश्वत्थामा, वह कैसे दौड़ रहा है, और उसको पकड़ने के लिए अर्जुन और कृष्ण उसके पीछे जा रहे हैं। तो ऐसे लगता है कि यह शुरुआत एकाएक हो रही है, उसकी पृष्ठभूमि क्या है?
प्रगतिशील ग्रंथ: भगवद् गीता से चैतन्य चरितामृत तक
पर हमारे आचार्यगण समझाते हैं कि जो भागवतम है, वह एक स्तर ऊपर है श्रीमद् भगवद् गीता के। तो भगवद् गीता, श्रीमद् भागवतम, और फिर चैतन्य चरितामृत, यह प्रगतिशील ग्रंथ हैं। तो जो भगवद् गीता में बताया गया है, कैसे अर्जुन को भक्ति करनी चाहिए। तो ऐसे बताया गया है कि भगवद् गीता में भगवान कौन हैं, यह बताया गया है। श्रीमद् भागवतम में भगवान क्या करते हैं, यह बताया गया है। और चैतन्य चरितामृत में भगवान कैसे सोचते हैं, यह बताया गया है। तो यह एक प्रगतिशील वर्णन है।
तो जो भगवद् गीता का ज्ञान अनुशीलन करके, अर्जुन अभी कैसे कार्य करते हैं, यह झलक यहाँ पर दी जा रही है। तो आचार्यगण बताते हैं, क्योंकि दशम स्कन्ध बहुत दूर है। 335 अध्याय हैं श्रीमद् भागवतम में, और इन 335 अध्यायों में से 90 अध्याय दशम स्कन्ध में से हैं। पर वो 90 अध्याय तक पहुँचने के लिए उसके पहले लगभग 150 अध्याय हैं, 175 अध्याय लगभग हैं। तो इसलिए 175 अध्याय बहुत दूर हैं, इसलिए जो व्यासदेव पहले जो दशम स्कन्ध की एक छोटी सी झलक दे देते हैं यहाँ पर।
सातवें अध्याय से पंद्रहवें अध्याय तक, भागवतम के जो सातवें अध्याय से पंद्रहवें अध्याय हैं, इसमें भगवान कृष्ण और उनके भक्तों के बारे में वर्णन है। और इतना वर्णन भागवतम में और कहीं भी भगवान कृष्ण के बारे में नहीं है दशम स्कन्ध के पहले। अब इसके बाद में जो कृष्ण के बारे में वर्णन जो आएगा, वह तीसरे स्कन्ध के दूसरे और तीसरे अध्याय में एक बार आएगा, जहां पे विदुर और उद्धव के संवाद में भगवान कृष्ण का स्मरण हो रहा है।
तो यहां पे जैसे कभी कोई मूवी होती है तो उसका पहले ट्रेलर देते हैं, तो वैसे यहां पे पहले झलक दे रहे हैं इन अध्यायों में। तो अभी क्या हो रहा है? यहां पे भगवान उसी मुद्रा में हैं, उसी कार्य में हैं जो भगवद् गीता में थे। वे अपने भक्त के सारथी बने हुए हैं। और सारथी बन कर वे अपने भक्त को सहयोग कर रहे हैं, मदद कर रहे हैं।
द्रोण पुत्र अश्वत्थामा को दंड देने की दुविधा
और इस अध्याय का शीर्षक बहुत ही विचार करने योग्य है। प्रभुपाद जी इस अध्याय को शीर्षक देते थे, कि द्रोण के पुत्र को सजा देना, “द्रोण पुत्र का दंड”। तो अभी द्रोण पुत्र का एक नाम भी है, तो द्रोण पुत्र का नाम क्यों इस्तेमाल नहीं किया गया है? अश्वत्थामा का दंड क्यों नहीं बताया गया है? क्योंकि अगर वो अश्वत्थामा एक व्यक्ति होता, तो उसको दंड देना इतना बड़ा मुश्किल नहीं होता। कोई साधारण व्यक्ति होता वो तो। उसने सोते हुए व्यक्तियों को मार डाला है, तो उसको मार डालना चाहिए।
पर क्योंकि वो द्रोण पुत्र है, इसलिए उसको क्या सजा देनी है, इसके बारे में बड़ा विचार विमर्श करना पड़ रहा है। तो जब कोई व्यक्ति, व्यक्ति कोई जो भी होता है, उसके जो संबंध होते हैं, वो महत्वपूर्ण हैं। और जब व्यक्ति कोई गलत कार्य करता है, ना केवल उसकी बदनामी होती है, वो जिस स्कूल में आ रहा है, जिस परिवार में आ रहा है, और अगर हम भक्त हैं, तो अगर हम कुछ गलत कार्य करते हैं, तो हम जिस परंपरा में आ रहे हैं, उसकी भी बदनामी होती है।
तो इसलिए जो अश्वत्थामा का नाम न लेते हुए, यहाँ पर द्रोण पुत्र का दंड यह बताया गया है, क्योंकि वो द्रोण पुत्र था, इसलिए उसे कैसे दंड देना है, यह बड़ा मुश्किल था फैसला करना, और इसलिए ये सारा अध्याय है। और अभी इसके, इन श्लोकों के तात्पर्य में विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर बताते हैं कि भगवान की ये आदत है, कि वे अपने भक्तों की परीक्षा लेते हैं। और परीक्षा कैसे लेते हैं? भगवान सदुपदेश देते हैं, सही ज्ञान देते हैं, कि कैसे कार्य करना है, और फिर वो भक्त को चुनना पड़ता है कि मैं वैसे कार्य करना चाहूंगा, करूँगा या नहीं।
भगवान द्वारा अपने भक्तों की परीक्षा: पृथु महाराज और प्रह्लाद महाराज
तो वे बताते हैं, उदाहरण, वो विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर सारे भागवतम से उदाहरण लेते हैं। वो कहते हैं, चौथे स्कन्ध में, पृथु के सामने जब भगवान आते हैं, तो ये पृथु महाराज की कहानी बहुत रोचक है। कैसे होता है कि वो एक सौ यज्ञ करना चाहते हैं, और 99 यज्ञ होने के बाद, उनको इन्द्र विघ्न कर देते हैं, इन्द्र रोक देते हैं। और फिर ब्रह्माजी के निवेदन पर पृथु महाराज छोड़ देते हैं, हम यज्ञ नहीं करेंगे। और उससे प्रसन्न हो जाते हैं वे। और जब प्रसन्न होते हैं, न केवल ब्रह्मा जी प्रसन्न हो जाते हैं, भगवान स्वयं प्रसन्न होते हैं।
भगवान वहां पे आते हैं, और जब भगवान वहां पे आते हैं तो भगवान पूछते हैं, “आप कुछ वर मांगो”। तो वास्तव में अभी हमें 99 यज्ञ का कुछ ज़्यादा महत्व लगता नहीं है क्योंकि हम एक भी यज्ञ नहीं करते हैं। तो अगर हमें आजकल की विचारधारा से समझना है, तो कोई क्रिकेटर है, वो 99 पे नॉट आउट है, और तभी कैप्टन बोलते हैं “मैं इनिंग्स को डिक्लेयर करता हूँ”, वो कितना गुस्सा हो जायेगा! भारत के इतिहास में एक बहुत विख्यात क्रिकेटर था, वो कुछ 194 के स्कोर पे था और कैप्टन तभी डिक्लेयर कर दिया। और फिर वो क्रिकेटर इतना क्रोधित हो गया और फिर वो क्रिकेटर और वो कैप्टन उसके बाद में 4 साल तक वो साथ में टीम में थे, उनका कभी जमा नहीं।
तो क्यों? क्योंकि एक ओर से किसी को कोई रिकॉर्ड कर सकता है, और वो रिकॉर्ड जब हमें कोई विशेष करने का मौका मिलता है, और तभी नहीं करने को दिया जाता है तो बहुत क्रोध आता है। तो यहां पे जब पृथु महाराज को ब्रह्मा जी ने बोला कि आप यह सौवां यज्ञ मत करो, पर भगवान आ गए हैं, अब भगवान बोले वर मांगो, तभी पृथु महाराज तुरंत वर मांग सकते हैं, “मुझे सौवां यज्ञ करने दो”। पर वो ऐसा वर नहीं मांगते हैं।
और चक्रवर्ती पाद क्या बताते हैं? कि यह जो वर मांग रहे हैं, यह भगवान उनकी परीक्षा ले रहे हैं। और वो बता रहे हैं कि मेरे भक्त जो हैं, कभी कुछ भौतिक चीज मांगते नहीं हैं। अभी वो समझ गए थे कि ब्रह्माजी जो बोल रहे हैं, ब्रह्माजी भगवान के प्रतिनिधि हैं, तो यह ब्रह्मांड के मैनेजमेंट में, ब्रह्मांड के संस्थापन में, जो अगर शांति बनाये रखनी है तो इन्द्र को विचलित नहीं करना है। इसलिए वो क्या वर मांगते हैं भगवान से? वो कहते हैं कि “मुझे सदैव आपके भक्तों के संग में रह कर आपका स्मरण हो, ये वर दे दो।”
ठीक उसी तरह से जो सातवें स्कन्ध में प्रह्लाद महाराज से प्रसन्न होके नरसिंह देव आते हैं, तो सातवें स्कन्ध के नौवें अध्याय में प्रह्लाद महाराज प्रार्थना कर रहे हैं और सुन्दर प्रार्थना है। हम जानते हैं कि और कोई व्यक्ति कितना भी महान हो, उनकी प्रार्थनाओं से भगवान संतुष्ट नहीं होते हैं, पर प्रह्लाद महाराज की प्रार्थनाओं से संतुष्ट हो जाते हैं। और फिर दसवें अध्याय में, सातवें स्कन्ध के, “नहीं कुछ मांगो”, “प्रार्थना तो मेरी एक ही इच्छा है भगवान, क्या? कि मेरे हृदय में आपसे कुछ भी मांगने की इच्छा न रहे।”
गोपियों की परीक्षा और प्रेम की पराकाष्ठा
तो वे बोलते हैं कि इस तरह से भगवान भी अलग-अलग भक्तों की परीक्षा लेते हैं। यहां तक कि वे कहते हैं कि गोपियों की भी परीक्षा लेते हैं। तो गोपियों की परीक्षा कई जगह पर होती है, तो वो कहते हैं कि जो दशम स्कन्ध का 46वां, 47वां अध्याय है, तो उसमें क्या होता है? उसमें 46वें अध्याय में उद्धव भगवान का संदेश देके वृंदावन आते हैं कि “वास्तव में मैं जानता हूँ कि तुम मुझसे विरह महसूस कर रही हो, पर तुम्हारा मुझसे विरह असंभव है क्योंकि मैं सर्वव्यापी हूँ। और मैं सर्वव्यापी हूँ इसलिए मैं सदैव तुम्हारे साथ में हूँ। तुम्हारा और मेरा विरह कभी संभव नहीं है।”
और यह सुनके गोपियां क्या कहती हैं? गोपियां कहती हैं, “वो सब ठीक है, पर कृष्ण कब आने वाले हैं? वो कृष्ण कब आने वाले हैं?” तो यहाँ पर विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर बताते हैं कि भगवान देखना चाहते थे कि गोपियां तत्वज्ञान से संतुष्ट हो जाती हैं या नहीं। तो जब वो देखते हैं कि वो सब ठीक है, भगवान सर्वव्यापी हैं, पर भगवान कब आने वाले हैं, तो यह जब सुनते हैं वो तो भगवान बहुत प्रसन्न हो जाते हैं।
क्योंकि यह एक तत्वज्ञान के स्तर पे समझना, भगवान सर्वव्यापी हैं, अच्छा उच्च साक्षात्कार है। पर उससे उच्च भगवान का व्यक्तिगत रूप में संग प्राप्त करना है। और जो गोपियां वह संग की उत्कंठा व्यक्त करती हैं, तो उससे भगवान बहुत प्रसन्न हो जाते हैं। तो इस तरह से भगवान अपने भक्तों की परीक्षा लेते हैं, देखने के लिए कि भक्तों की भक्ति कितनी शुद्ध है। तो कितनी शुद्ध है? तो गोपियों की भक्ति शुद्ध ही थी, भगवान के अलावा कुछ नहीं चाहती थीं, पर वे यहां तक कि भगवान का परमात्मा के रूप में या भगवान का सर्वव्यापी ब्रह्म के रूप में नहीं, भगवान का व्यक्तिगत भगवान श्री कृष्ण के रूप में ही हमें संग चाहिए।
गुरु द्वारा शिष्य की परीक्षा: परीक्षित महाराज और शुकदेव गोस्वामी
फिर चक्रवर्ती पाद बताते हैं इसी तरह से भगवान के भक्त भी दूसरे भक्तों की परीक्षा लेते हैं, जो गुरु होते हैं वो शिष्य की परीक्षा लेते हैं। वह कहते हैं इसका उदाहरण है कि परीक्षित महाराज की परीक्षा शुकदेव गोस्वामी लेते हैं। तो दो जगह पे है, छठे स्कन्ध में एक बार है और बारहवें स्कन्ध में है। छठे स्कन्ध में, पांचवें स्कन्ध के अंत में नरक लोकों का वर्णन है और उसके बाद में छठे स्कन्ध की शुरुआत में परीक्षित महाराज पूछते हैं, “ये नरक लोकों से लोग कैसे बचके निकल सकते हैं?”
तो तभी परीक्षित महाराज के सवाल के जवाब में शुकदेव गोस्वामी कहते हैं कि अगर व्यक्ति प्रायश्चित कर लेगा तो फिर उससे वो पापों की प्रतिक्रिया से मुक्त हो सकता है। तो यह एक केवल प्राथमिक उत्तर है, और यह महत्वपूर्ण उत्तर है पर यह प्राथमिक उत्तर है। तो परीक्षित महाराज सवाल करते हैं, “यह सब ठीक है, पर प्रायश्चित भी करता है व्यक्ति, तो भी क्या होता है, वो पाप के फल से छूट जाएगा पर वो पाप करने की प्रवृत्ति पुनः रहेगी। तो इसलिए यह कोई उचित नहीं है, यह हाथी के नहाने के समान है। और पूछिए, आप और ऊंचा क्या है यह बताओ, असली जवाब क्या है बताओ।”
और फिर यहां देखिए जो होता है, तो उसके बाद में बताया जाता है कैसे:
“केचित्केवलया भक्त्या वासुदेवपरायणाः। अघं धुन्वन्ति कार्त्स्न्येन नीहारमिव भास्करः॥”
तभी शुकदेव गोस्वामी उसमें बताते हैं कि केवल भक्ति के माध्यम से सारे पापों का नाश हो जाता है। और कैसे उदाहरण लेते हैं? जैसे कोहरा होता है, ठंडी के समय कोहरा होता है, तो हम उसको हाथों से पीट के, चीख के, चिल्ला के नहीं निकाल सकते हैं। पर जब सूर्य उग जाता है तो तुरंत निकल जाता है। सारे पाप और पाप करने की प्रवृत्ति सब, जब भक्ति का उगम हो जाता है, भक्ति एक सूर्य के समान है। सूर्य उग जाता है कोहरा चला जाता है, उसी तरह से भक्ति आ जाती है हृदय में तो सारे पाप चले जाते हैं।
और यहां पे वो क्या परीक्षा ले रहे हैं? शास्त्रों में वास्तव में तीन प्रकार के मार्ग बताए हैं: कर्म का मार्ग है, ज्ञान का मार्ग है, और भक्ति का मार्ग है। तो यहां पे पहले कर्म का मार्ग बता के, परीक्षित महाराज की कितनी भक्ति है, इसकी जांच शुकदेव गोस्वामी कर रहे हैं।
और बारहवें स्कन्ध में, जब सारा भागवतम खत्म हो जाता है, तभी परीक्षित महाराज की भक्ति में कितनी श्रद्धा है, यह जांचने के लिए अंत में जो चौथा और पांचवां अध्याय है बारहवें स्कन्ध का, उसमें आत्मा का ज्ञान देते हैं। “परीक्षित, तुम समझ लो यह तक्षक आके तुम्हें काटेगा भी, तो वास्तव में तुम शरीर नहीं हो, तुम आत्मा हो। और आत्मा ब्रह्म, वास्तव में आत्मा ब्रह्म का ही… आत्मा ब्रह्म एक तरह से समान हैं। तो तुम इस ब्रह्म पर चिंतन करके यह शरीर की आत्माओं के परे चले जाओ।” और जो हम ज्ञान श्रीमद् भगवद् गीता के दूसरे अध्याय में देखते हैं कि आप शरीर नहीं हो आत्मा हो, वो वहाँ पर बता रहे हैं परीक्षित महाराज को शुकदेव गोस्वामी।
तो हम सोचें कि अभी दशम स्कन्ध में भगवान की लीलाएं हो गईं, रास लीला हो गई, उसके बाद में “देहिनोऽस्मिन्यथा देहे” क्यों बोलने की जरूरत है? उसके बाद में आत्मा ज्ञान या ब्रह्म ज्ञान देने की जरूरत क्या है? पर जरूरत क्या है, वो देख रहे हैं कि परीक्षित महाराज की भक्ति के बारे में समझ और श्रद्धा कितनी उचित हो गई है। और उसके बाद में जो पांचवें अध्याय में बारहवें स्कन्ध के, परीक्षित महाराज की जो प्रतिक्रिया है वो बड़ी आदर्श है। वो परीक्षित महाराज… वास्तव में शिष्य कभी अपने गुरु को डांट नहीं सकते हैं, पर शिष्य यहां पे क्या हैं, परीक्षित महाराज शुकदेव गोस्वामी से आत्म ज्ञान सुनके खेद व्यक्त करते हैं। बोलते हैं, “यह आत्म ज्ञान, आपने जो ज्ञान दिया है, इसके पहले जो ज्ञान दिया है, उससे मैं पूर्णतया कृतकृत्य हो गया हूँ। उससे मैं अभी मैं भगवान के स्मरण में लग जाऊंगा, भक्ति का आश्रय ले लूंगा। और यह आत्म ज्ञान की मुझे कोई ज़रूरत नहीं है।”
वो समझ गए हैं। तो इस तरह से भक्तों की जब भगवान परीक्षा ले रहे हैं, तो उनकी भक्ति कितनी शुद्ध है यह परीक्षा है। जब परीक्षित महाराज की परीक्षा ले रहे हैं, तो उनकी भक्ति की समझ कितनी उचित है, कि भक्ति की सर्वश्रेष्ठता जो है वो समझ गए हैं कि नहीं, वो कर्म और ज्ञान की तुलना के द्वारा बताया जा रहा है।
अर्जुन की परीक्षा और द्रोपदी का दृष्टिकोण
तो उसी तरह से चक्रवर्ती पाद बता रहे हैं कि इस अध्याय में जो भागवतम की शुरुआत है, उसी में भगवान अपने भक्त अर्जुन हैं, उनके भक्ति की समझ की, उनके धर्म के सूक्ष्म सिद्धांत की समझ की परीक्षा ले रहे हैं। और परीक्षा कैसे ले रहे हैं? ये परीक्षा ले रहे हैं ये द्रोपदी के हृदय में ये अश्वत्थामा के प्रति न केवल सहानुभूति पर आदर उत्पन्न करके, भाव परिवर्तित करके।
तो वही द्रोपदी बड़ी जो इसी अध्याय की शुरुआत में आता है कि बड़ी क्रोधित हो गई थी और वो कह रही थी “उसने बाल लीला कर दिया”, वो कहने लगी कि “जब तक मेरे पुत्रों के हत्यारे को तुम यहां पे नहीं लेके आओगे, तब तक मैं शांति से नहीं बैठूंगी।” वही द्रोपदी जब अश्वत्थामा को देखती है, तो फिर उसका जो भाव है पूर्ण परिवर्तित हो जाता है। और कई कारण बताती है। कि सबसे पहले वह बताती है कि वास्तव में यह ब्राह्मण है, और ब्राह्मण सदा हमारे आदर के पात्र हैं। और वह कहती है न केवल ये कोई साधारण ब्राह्मण है, यह जो ब्राह्मण है वह तुम्हारे गुरु का पुत्र है।
और चक्रवर्ती पाद तात्पर्य में बताते हैं कि तुम्हारे गुरु का पुत्र है यह बताने का मर्म क्या है? कि अभी तुम बड़ी शक्ति और गौरव के साथ तुमने अश्वत्थामा को बांध के यहां पे ले आये हो, पर यह अश्वत्थामा को बांध कर ले आने की शक्ति तुम्हें इसी के पिता से मिली है। तो यह भाव है कि “तुम, यह तुम्हारे गुरु हैं” बोलने का, कि तुम अपनी शक्ति से अश्वत्थामा को नहीं ले आये हो, तुम्हें जो शक्ति थी, जो सामर्थ्य थे धनुर्विद्या का, वो तुम्हारे गुरु से मिला है। तो तुम्हारे गुरु से जो सामर्थ्य मिला है, वो तुम क्या उसी गुरु के पुत्र के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करोगे?
और फिर तो सबसे पहले बताते हैं कि तो जो द्रोपदी के जो ऑब्जेक्शन्स (objections) हैं, वो जो कहता है क्यों हमें ऐसे नहीं करना चाहिए, अलग-अलग कारण हैं। तो पहले बताते हैं कि ब्राह्मण सदा हमारे आदर के पात्र हैं। फिर बताते हैं कि यह साधारण ब्राह्मण नहीं, वास्तव में हमारे गुरु के पुत्र हैं। और फिर बताते हैं कैसे यह जो ब्राह्मण है, यह अभी इसकी मां, मां विधवा हो गई है और अगर पुत्र भी नहीं रहेगा तो वह असहाय हो जाएगी पुत्र शोक से। और फिर अभी इसी श्लोक, आज के श्लोक में बता रहे हैं कि जो महान कुल है, उसके प्रति हमें सदैव आदर रखना चाहिए। अगले श्लोक में बता रहे हैं कि वास्तव में अगर हम ऐसा आदर नहीं रखेंगे, तो उसकी प्रतिक्रिया बड़ी भीषण होगी और उस प्रतिक्रिया से हम सबका नाश हो जाएगा।
तो इस तरह से अलग-अलग कारण बता के द्रोपदी कह रही है कि हमें इसका वध नहीं करना चाहिए। और फिर इसके बाद में आप द्रोपदी के वचन सुनके बाकी सब मान जाते हैं, पर भीम नहीं मानते हैं। भीम कहते हैं “इसने तो… ये केवल नाम का ब्राह्मण है। ब्राह्मण जैसे कार्य इसने कदापि नहीं किये हैं।” तो भीम जो हैं थोड़े क्रोधी प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं। तो वास्तव में भीम यहां तक कहते हैं कि वास्तव में द्रोण भी ब्राह्मण नहीं हैं। वो कहते हैं जो ब्राह्मण होता है… तो भीम क्रोधित हो जाते हैं यहां पर, कहते हैं कि नहीं।
तो कहते हैं कि हमें इसका वध नहीं करना चाहिए। और फिर भगवान अर्जुन की ओर देखते हैं, कहते हैं कि “आप अभी दोनों को संतुष्ट करो।” कि एक तरह से द्रोपदी है, और द्रोपदी के वचनों से युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, सात्यकि सब मान जाते हैं कि हाँ इसका वध नहीं करना चाहिए। भीम कहता है वध करना चाहिए। और फिर जब अर्जुन के सामने वो समस्या आती है तो अर्जुन क्या करते हैं? उचित उसका हल निकालते हैं। वो कहते हैं कि हमें इसके शरीर का वध नहीं करना चाहिए। इसके शरीर का वध नहीं करना चाहिए इसलिए क्या करना चाहिए? पर इसको जो गलत कार्य किया है उसका दंड तो ज़रूर देना चाहिए। इसलिए वो क्या करते हैं? हम जानते हैं उसकी जो मणि है, जिससे शक्ति मिल रही है, वो मणि निकाल देते हैं। और फिर उसके जो बाल हैं काट देते हैं और फिर उसको चले जाने को बोल देते हैं। और फिर भगवान भी उसको बोल देते हैं कि तुम अभी, तुम्हारे पास कोई शक्ति नहीं रहेगी, और फिर वो चला जाता है।
जीवन में शास्त्र का मार्गदर्शन और आचार्यों का उदाहरण
तो यहाँ पे जो महत्वपूर्ण भाव, यह बात यह है कि जो उचित कार्य कैसे करना है, उसके लिए बहुत सोच विचार करना पड़ता है। और सोच विचार करके उचित कार्य करना, यह रजोगुण या तमोगुण में संभव नहीं है। सत्वगुण में आता है तब ही संभव होता है। रजोगुण में जैसे वासनाएं आ जाएंगी वैसे ही व्यक्ति कार्य करने लगता है। हमारे जीवन में कई बार ऐसी समस्याएं आती हैं, कोई व्यक्ति कुछ कर बोल देता है, तो “तब मुझे क्या करना चाहिए?”
हमारे जीवन में कैसे कार्य करना है, इसके लिए शास्त्र हमें मार्गदर्शन देते हैं। पर मार्गदर्शन कैसे है? वो मार्गदर्शन एक आदर्श दिखाते हैं। और आदर्श के अनुसार हमें हमारे जीवन में विचार करके फिर वो हमारे जीवन में उतारना है। तो ऐसा कोई फॉर्मूला नहीं है, ऐसा कोई सूत्र नहीं है कि हमें ऐसा ही कार्य करना चाहिए, ऐसा ही कार्य करना चाहिए, ऐसा ही कार्य करना चाहिए। अलग-अलग समय पे जो परिस्थिति होती है, उसके अनुसार हमें देखना होता है कि भगवान की सेवा सबसे उचित पद्धति से कैसे की जा सकती है, और उसके अनुसार हमें कार्य करना होता है।
हम प्रभुपाद जी के जीवन में देखते हैं कि प्रभुपाद जी ने अलग-अलग जगह पे अलग-अलग तरह से कार्य किया। जैसे भारत में जो वैदिक संस्कृति अभी काफी हद तक है, कुछ हद तक तो है, और खास करके जहां पे भी धार्मिक कार्य होते हैं, वहाँ पे ब्राह्मण अपनी बात, अपना जोर बहुत लगाते हैं कि “आप ये उचित नहीं कर रहे हैं, ये उचित नहीं कर रहे हैं, ये ऐसे नहीं।” तो इसलिए हम देखते हैं कि प्रभुपाद जी जब पाश्चात्य देशों में उन्होंने जब विग्रहों की स्थापना की, तो वहाँ पे उन्होंने देखा कि जो सब पुरुष हों, स्त्री हों, सब उत्साही हैं कि भगवान की भक्ति करने के लिए। तो उन्होंने कहा कि जो माताएं हैं वो…
पर जब भारत में सांस्कृतिक रूप से कैसे है कि जो पुजारी होते हैं, साधारण विग्रहों की पूजा करते हैं, वो केवल पुरुष करते हैं। तो जब प्रभुपाद जी भारत में आयें तो उन्होंने कहा कि हमें यहां के लोगों को ज़्यादा विचलित नहीं करना है। और भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने भी वही किया। भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर बड़े जोर से कहते थे कि जो वैष्णव होता है वास्तव में जन्म से नहीं होता है, गुण से होता है। पर जो स्मार्त ब्राह्मण थे मायापुर में, तो वो कहते थे कि नहीं, जो वैष्णव है वो केवल जन्म से ही होता है, और बाकी अगर कोई वो हरिनाम जप कर सकते हैं पर वो वास्तव में वैष्णव नहीं हैं और वो कभी ब्राह्मण नहीं बन सकते, ब्राह्मण केवल जन्म से होता है, ब्राह्मण दीक्षा से नहीं होता है।
तो भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने ब्राह्मण दीक्षा भी बहुत लोगों को दी। पर फिर भी जब वे मायापुर में विग्रहों की पूजा हो रही थी, तो उन्होंने कहा कि यहां पे हमें… मायापुर के भक्त हैं वो भी एक प्रकार से भक्त हैं, उनकी कुछ धारणा थोड़ी अनुचित होगी, तो उनके मन को विचलित करने की ज़रूरत नहीं है। इसलिए उन्होंने कहा कि वहां पे मायापुर में जो हमारे मंदिर में पूजा होगी, वह जो ऐसे ब्राह्मण हैं, जो ब्राह्मण वैष्णव, जो ब्राह्मण कुल में जन्मे हैं, वो ही उनकी पूजा करेंगे। बाकी सब भारत के मंदिरों में उन्होंने कहा कि आप सब भक्त पूजा कर सकते हैं विग्रहों की।
तो क्या है?
“न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्। जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्॥”
राधा गोकुलानंद भगवान की जय! तो “न बुद्धिभेदं जनयेद”, लोगों के मन को विचलित नहीं करना चाहिए। तो मैं यहाँ पे उदाहरण दे रहा था कि प्रभुपाद जी भी, वो एक ही सिद्धांत थे कि सबको भगवान की भक्ति का मौका देना है। तो यहाँ पे कहेंगे कि “नहीं वो मायापुर में जो ब्राह्मण जन्म नहीं किया है उनको भक्ति का मौका क्यों न दिया जाए? उनको भगवान के विग्रहों की पूजा का मौका क्यों न दिया चाहिए?” नहीं, उनको मौका देना चाहिए, पर उससे क्या होगा? अगर ऐसा करेंगे तो बाकी जो लोग हैं तथाकथित जो ब्राह्मण मानते हैं, वो इतने विचलित हो जाएंगे कि वो भगवान और भगवान के भक्तों के प्रति अपराध करेंगे, और उससे उनके भक्ति का मौका चला जाएगा।
तो फिर किसको भक्ति का मौका देना है? यह आचार्यगण अपने देश, काल, पात्र के अनुसार फैसला करते हैं। तो हमें इतने बड़े फैसले करने नहीं होते हैं, पर हमारे जीवन में हमें भी कई बार फैसला करना होता है कि “अभी ऐसी परिस्थिति आ गई, इसमें कैसे कार्य करूँ मैं? यह व्यक्ति ऐसा बर्ताव कर रहा है।” तो इसका कोई फॉर्मूला नहीं है, पर शास्त्रों में आदर्श है, और आदर्श से प्रेरणा लेके फिर हम भगवान से प्रार्थना करके, भगवान का और भगवान के भक्तों का मार्गदर्शन लेके फिर हम फैसला कर सकते हैं।
निष्कर्ष: जीवन में परीक्षा और प्रलोभन का उद्देश्य
तो एक अंतिम उदाहरण के साथ मैं अंत करूंगा कि वास्तव में भगवान परीक्षा क्यों लेते हैं? कभी-कभी परीक्षा अलग-अलग प्रकार से होती है। कभी-कभी हमारे मन में अलग-अलग प्रकार से प्रलोभन आते हैं। ये जो परीक्षा मैं उदाहरण दे रहा हूँ, इसमें कोई भी कार्य अनैतिक नहीं था, सब अभी कर्मकांड में उचित कार्य हैं। और यहां पे अश्वत्थामा को अगर सजा भी दी जाती है तो वो अनुचित नहीं है। पर परीक्षा क्या थी कि अलग-अलग प्रकार के धार्मिक कार्य हैं, उनमें से सर्वोच्च धार्मिक कार्य कौन सा है? सबसे उचित, सबसे उत्कृष्ट धार्मिक कार्य कौन सा है?
तो हमारे जीवन में कभी कैसे प्रलोभन आता है? कोई एक कार्य उचित है, दूसरा कार्य अनुचित है। काम, क्रोध, लोभ, ये सब हमें मोहित कर लेते हैं। तो उस समय भी है, जैसे मोह होता है हमको, जब प्रलोभित हो जाते हैं, तो वो भी एक प्रकार की परीक्षा है। और उस परीक्षा से निकलने के लिए हमें भगवान का आश्रय ग्रहण करना पड़ता है। पर वो परीक्षा क्यों आती है?
वास्तव में, एक तरह से देखा जाए तो हमारे मन में काम, वासना आती है, क्रोध आता है, लोभ आता है, वो भी एक तरह से भगवान की योजना से ही आ रहा है। जो हम कुछ चित्र देख लेते हैं, कोई व्यक्ति कुछ बोलता है, उससे कुछ देख लेते हैं, वो भी भगवान की इच्छा से ही हो रहा है एक तरह से। तो क्या भगवान हमें प्रलोभित करके हमारा पतन करना चाहते हैं? नहीं! पर जो परीक्षा है, उससे हम उच्च स्तर पर पहुँचते हैं।
जिससे कि अगर कोई विद्यार्थी है, वो परीक्षा दे रहा है, तो परीक्षा कभी-कभी अलग-अलग प्रकार की परीक्षा होती है। तो कभी-कभी एक लंबा उत्तर लिखना होता है, और कभी-कभी कई पर्याय होते हैं, उनमें से एक उचित पर्याय चुनना होता है (multiple choice)। तो अभी पांच पर्याय हैं, उनमें से चार पर्याय गलत हैं, एक पर्याय सही है। तो अभी अगर विद्यार्थी कोई पर्याय अपने आप चुन लेता है बिना पढ़ाई किये, बिना विचार किये, तो क्या होगा? अधिकांश रूप से उसके उत्तर गलत आ जाएंगे। और जब गलत उत्तर आएंगे, तो फिर क्या होगा? वो कहेगा कि जब वो फेल हो गया, तो टीचर कहेगा “तुम फेल हो गए?” और “तुमने ही वहाँ पर गलत पर्याय रखे थे, तो तुमने जो पर्याय रखे थे, वही चुने मैंने।”
तो क्या ये तर्क उचित होगा? टीचर कहेगा, “हाँ, मैंने ही पर्याय रखे थे, पर वो पर्याय रखने के पहले, मैंने तुमको सिखाया भी था, तुमने ध्यान क्यों नहीं दिया जब मैंने पढ़ाई दी थी?” तो धृतराष्ट्र यही बोलता है। धृतराष्ट्र क्या बोलता है? जब युद्ध आता है, और उसको बताते हैं विदुर, कि “अगर तुम युद्ध को नहीं रोकोगे, तो सारे कुरुवंश का विनाश हो जाएगा।” तो धृतराष्ट्र क्या कहते हैं? “अगर ये नियति की इच्छा है कि कुरुवंश का विनाश हो जाए, तो मैं तो एक छोटा सा जीव हूँ, मैं कौन हूँ नियति को रोकने वाला।”
तो तभी विदुर क्या कहते हैं? “हे धृतराष्ट्र, नियति हमारे कर्म के फल को चुनती है, हमारे कर्म को नहीं चुनती है। नियति हमारे कर्म के फल को चुनती है, कर्म को नहीं चुनती है।” मतलब विद्यार्थी पढ़ाई करने के बाद भी कभी-कभी मार्क्स नहीं मिलते हैं। कभी-कभी जो एग्जामिनर होता है, वो एग्जामिनर उसकी पत्नी से झगड़ा करके फिर पेपर चेक करने को बैठ जाता है, तो कम मार्क दे देता है। तो यह कर्म का फल है। पर अगर वो विद्यार्थी पढ़ाई नहीं करता है और बोलता है क्या है, “नियति थी मेरा फेल होना”, वो नियति नहीं थी, तुम्हारी मूर्खता थी।
तो उसी तरह से जो टीचर अलग-अलग पर्याय देते हैं, वो क्यों देते हैं? वो पर्याय इसलिए देते हैं कि वो विद्यार्थी अच्छी तरह से पढ़ाई करें। कभी-कभी हमारे मन में काम आ जाता है, क्रोध आ जाता है, लोभ आ जाता है, तो हमें यह नहीं सोचना है कि भगवान की इच्छा है कि मैं पतित हो जाऊं। भगवान ने प्रलोभन भेजे हैं? नहीं, भगवान ने प्रलोभन भेजे हैं, पर उसके पहले हमें ज्ञान भेजा है भगवान ने। और ज्ञान के द्वारा भगवान हमारी परीक्षा कर रहे हैं कि हम क्या चुनेंगे? और अगर हम सही पर्याय चुनते हैं, तो उसके द्वारा हम प्रगति करके भक्ति में अग्रशील होते हैं।
तो सारांश में हमने आज चर्चा की कैसे, कि ये ग्रंथराज श्रीमद् भागवतम में, ये अध्याय में दशम स्कन्ध की एक झलक दी जा रही है। और फिर खास करके इस अध्याय का भाव क्या है कि कैसे भगवान परीक्षा लेते हैं, गुरु शिष्य की परीक्षा लेते हैं। तो इसके लिए हमने पृथु महाराज, प्रह्लाद महाराज, गोपियों का उदाहरण देखा। और फिर शुकदेव गोस्वामी, परीक्षित महाराज का कर्म और ज्ञान के संबंध में उदाहरण देखा। और फिर यहां पर अर्जुन कैसे इस समस्या का निवारण करते हैं।