Explanation of Sacisuta Ashtakam – Gaur Purnima 2013 Hindi
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Lecture Summary
- गौड़ीय वैष्णव ग्रंथों का अवलोकन: श्री चैतन्य महाप्रभु के जीवन पर अनेक जीवनी-ग्रंथ (जैसे श्री चैतन्य भागवत, श्री चैतन्य मंगल, श्री चैतन्य चरितामृत) लिखे गए। इनमें से श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी रचित) लीला और तत्त्वज्ञान का अद्भुत संगम है।
- चैतन्य चंद्रोदय नाटक: परमानंद सेन (कवि कर्णपूर) द्वारा रचित यह नाटक जगन्नाथ पुरी के राजा प्रतापारुद्र के विरह-भाव से प्रारंभ होता है। महाप्रभु के अंतर्धान के पश्चात् राजा उनके विरह में गोपी-गीत गाते हैं और महाप्रभु की लीलाओं का आस्वादन करने हेतु इस नाटक की रचना का निवेदन करते हैं।
- गोपी-गीत का संदेश (तव कथामृतं…): भौतिक संसार की चिंताओं और वासनाओं से व्यथित मन को शांति केवल भगवान की लीला-कथा के श्रवण से मिलती है। यह कथा हृदय के कल्मषों का नाश करती है और परम आध्यात्मिक मंगल प्रदान करती है।
- कलियुग और छन्न-अवतार (प्रच्छन्न अवतार): नाटक के प्रथम अंक में कलिराज और अधर्म के बीच संवाद होता है, जहाँ कलिराज महाप्रभु के आविर्भाव से भयभीत हैं। यद्यपि भगवान को ‘त्रियुग’ कहा जाता है क्योंकि वे कलियुग में प्रकट रूप से राजा बनने नहीं आते, तथापि वे ‘छन्न अवतार’ (प्रच्छन्न रूप) में जीवों को अज्ञान के अंधकार से उबारने और हरिनाम/भक्ति का दान करने के लिए स्वयं आते हैं।
Full Transcription
यह श्री चैतन्य भागवत में आता है और कई बार गौड़ीय वैष्णव ग्रंथों में आता है। श्री चैतन्य महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु को प्रणाम करते हुए यह श्लोक बोला जाता है, इसलिए यह बड़ा अद्भुत है:
वन्दे श्रीकृष्णचैतन्य-नित्यानन्दौ सहोदितौ ।
गौडोदये पुष्पवन्तौ चित्रौ शन्दौ तमोनुदौ ॥
तो जिस इलाके में चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव हुआ—मायापुर का इलाका—उसको ‘गौड़’ कहते हैं (गौडोदये पुष्पवन्तौ)। तमोनुदौ—तमोनुदौ मतलब सारा अंधकार, अज्ञान, तमोगुण का प्रभाव है, उसका नाश होता है। चित्रौ शन्दौ—चित्रौ मतलब बड़ा सुंदर और बड़ी शांति, संतुष्टि प्रदान करता है वह। यह ऐसा सूरज है जो उगता है गौरंग महाप्रभु का, वह अज्ञान का अंधकार दूर करता है और जो सर्वोच्च शांति और संतुष्टि है, उसकी छाया प्रदान करता है।
गौर पूर्णिमा महोत्सव एवं महाप्रभु के जीवन-चरित्र
हरे कृष्णा! इस गौर पूर्णिमा महोत्सव में आपका स्वागत है। यहाँ श्रीकृष्ण संपूर्ण बता रहे थे कि तीन साल बाद कई बार आने की योजना थी, पर भगवान की कृपा चाहिए आप सब का संग प्राप्त करने के लिए। तो गौर पूर्णिमा के कार्यक्रम के लिए आना था, पर किसी न किसी कारण से आ नहीं पाया। तो आनंद है कि आज मैं आया हूँ।
राधा मदन गोपाल जी के विग्रह बहुत सुंदर हैं और आप सब कृपा करने के लिए आए हैं। तो इसलिए प्रभुपाद जी ने जब वृंदावन का मंदिर बनाया था, तो सब भक्त उनसे कह रहे थे कि “वृंदावन में आप राधा-कृष्ण का मंदिर बनाओ।” प्रभुपाद जी बोले थे कि “बहुत से राधा-कृष्ण के मंदिर हैं, हम कुछ विशेष बनाएँगे।” तो फिर उन्होंने कृष्ण-बलराम मंदिर बनाया। जो नासिक है, उसमें श्री रामचंद्र जी के बहुत मंदिर हैं। यहाँ पर भक्ति का भाव वही है, पर यहाँ पर राधा मदन गोपाल का सुंदर मंदिर है। यह नासिक के लिए भी एक आभूषण है।
तो आज मैं गौर पूर्णिमा के अवसर पर श्री चैतन्य महाप्रभु के बारे में जो अनेक ग्रंथ लिखे गए हैं, उनका थोड़ा संक्षेप में परिचय देकर, फिर ‘चैतन्य चंद्रोदय नाटक’ नाम का जो ग्रंथ परमानंद कवि कर्णपूर ने लिखा है, उससे कुछ लीलाओं पर चर्चा करूँगा।
श्री चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव सन् 1486 (1407 शक) में हुआ, आज ही के दिन। और वे 48 साल तक हमारे बीच में थे। और 48 साल के बाद उनके बारे में अनेक जीवन-चरित्र (Biographies) लिखे गए। पर दुर्भाग्यवश उनमें से अनेक जीवन-चरित्र अभी लुप्त हो गए हैं। मेरे कई मित्र हैं जो अभी गौड़ीय वैष्णव साहित्य में रिसर्च कर रहे हैं। तो बंगाल की परंपरा में पीढ़ियों से गौड़ीय वैष्णव साहित्य के इतिहास में इकलौता ऐसा ग्रंथ है जो मूल ग्रंथ बंगाली में है और उस पर भाष्य संस्कृत में लिखा गया है! साधारणतया ऐसा होता है कि संस्कृत में मूल ग्रंथ होता है और क्षेत्रीय भाषा में भाष्य लिखा जाता है। पर यह ‘श्री चैतन्य चरितामृत’ इतना महत्वपूर्ण ग्रंथ था, जिसे कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने लिखा था, तो उस पर विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने एक संपूर्ण भाष्य लिखा और वह भाष्य उन्होंने संस्कृत में लिखा।
जब श्री चैतन्य महाप्रभु अपने धाम लौट गए, तो उन्होंने गौड़ीय वैष्णव सिद्धांत और भक्ति-प्रणाली का सब जगह प्रचार किया था। पर प्रधान रूप से चार जगहें थीं—कवि कर्णपूर बताते हैं कि कर्नाटक के जो मल्लारपुर के राजमंत्री थे, वे राजा प्रतापरुद्र से मिलने आते हैं, और वे चार प्रमुख जगहें बताते हैं:
- वृंदावन: जहाँ छह गोस्वामीगण थे।
- बंगाल: जहाँ अद्वैत आचार्य, नित्यानंद प्रभु और उनके शिष्य/वंशज थे।
- ओडिशा (जगन्नाथ पुरी): जहाँ राजा प्रतापरुद्र, सार्वभौम भट्टाचार्य आदि भक्त थे।
- दक्षिण भारत: जहाँ महाप्रभु प्रचार करने गए थे और अनेक भक्त बने थे।
खेतुरी ग्राम में जब पहला गौर पूर्णिमा का महोत्सव हुआ, तो वहाँ लाखों की मात्रा में भक्त आए थे। पर मुख्य रूप से इन चार जगहों से भक्त आए थे—दक्षिण भारत, ओडिशा, बंगाल और वृंदावन।
हर एक जगह भगवान की भक्ति का भाव एक होता है, पर उसका प्रकटीकरण अलग-अलग होता है। जो वृंदावन था, वह पारंपरिक रूप से पांडित्य की जगह थी, इसलिए वृंदावन में जो ग्रंथ लिखे गए गौड़ीय सिद्धांत के बारे में, वे सब संस्कृत में लिखे गए। और जो बंगाली में ग्रंथ लिखे गए—बंगाल और ओडिशा में—वे बंगाली भाषा में लिखे गए।
कृष्णदास कविराज गोस्वामी उस पीढ़ी के ऐसे इकलौते व्यक्ति थे जिन्होंने गोस्वामियों से प्रशिक्षण लिया। इसलिए बाकी सब ग्रंथ—जैसे ‘चैतन्य भागवत’ (वृंदावन दास ठाकुर द्वारा रचित), ‘चैतन्य मंगल’ (लोचन दास ठाकुर द्वारा रचित) आदि—उनमें मुख्य रूप से लीला का वर्णन था। बंगाल में लीला लिखी गई, वृंदावन में तत्त्वज्ञान लिखा गया। कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने बंगाल से वृंदावन जाकर जो ग्रंथ लिखा (‘चैतन्य चरितामृत’), उसमें लीला और तत्त्वज्ञान का अद्भुत संगम किया।
इसलिए यह ग्रंथ केवल एक जीवन-चरित्र नहीं है, यह वास्तव में तत्त्वज्ञान का ग्रंथ है जो जीवन-चरित्र के रूप में लिखा गया है। चैतन्य चरितामृत के आदिलिला के पहले 12 अध्याय वास्तव में पूरा तत्त्वज्ञान ही प्रस्थापित कर रहे हैं। फिर 13वें अध्याय से महाप्रभु का आविर्भाव काल चालू होता है। जैसे कैमरे से ज़ूम-इन करते हैं, वैसे ही कृष्णदास कविराज गोस्वामी 13वें अध्याय से उनके जीवन का प्रारंभ वर्णन करते हैं। आदिलिला में 17 अध्याय हैं, मध्यलीला में 25 अध्याय हैं और अंतलीला में 20 अध्याय हैं। जब भी कोई गंभीर तत्त्वज्ञान का विषय आता है, तो वे ज़ूम-इन करके उसका विस्तार से वर्णन करते हैं।
जो महत्वपूर्ण वार्तालाप हुए थे—जैसे मध्यलीला के 19वें तथा 20वें से 24वें अध्याय में रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी के साथ महाप्रभु की शिक्षाएँ, मध्यलीला के 8वें अध्याय में रामानन्द राय के साथ संवाद, सार्वभौम भट्टाचार्य के साथ संवाद और प्रकाशानंद सरस्वती के साथ संवाद—इन पाँच प्रमुख संवादों को श्रील प्रभुपाद जी ने ‘टीचिंग्स ऑफ लॉर्ड चैतन्य’ (Teachings of Lord Chaitanya) नाम से एक पुस्तक के रूप में संकलित किया।
वृंदावन दास ठाकुर का ‘चैतन्य भागवत’ अत्यंत भक्तिभाव से भरा हुआ ग्रंथ है। भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहते थे कि अगर किसी को चैतन्य महाप्रभु के प्रति आकर्षण जाग्रत करना है, तो उसे वृंदावन दास ठाकुर का ‘चैतन्य भागवत’ पढ़ना चाहिए।
चैतन्य चंद्रोदय नाटक एवं राजा प्रतापरुद्र का विरह-भाव
अब मैं जिस ग्रंथ से चर्चा करूँगा, वह है—चैतन्य चंद्रोदय नाटक। कवि कर्णपूर (परमानंद सेन) एक महान भक्त और पंडित थे। उन्होंने अनेक ग्रंथ लिखे—जैसे कृष्ण-लीला पर ‘आनंद वृंदावन चंपू’। चैतन्य महाप्रभु के जीवन पर उन्होंने जो ग्रंथ लिखे, उनमें ‘चैतन्य चंद्रोदय नाटक’ मुख्य है।
वैष्णव साहित्य में नाटक लिखना एक महत्वपूर्ण अंग रहा है। रूप गोस्वामी ने ‘ललित माधव’ और ‘विदग्ध माधव’ नाटक लिखे थे, जिन्हें सुनकर महाप्रभु अत्यंत प्रसन्न हुए थे।
‘चैतन्य चंद्रोदय नाटक’ की शुरुआत ऐसे होती है कि चैतन्य महाप्रभु अपनी प्रकट लीला समाप्त करके भगवद्धाम लौट चुके हैं। जगन्नाथ पुरी में राजा प्रतापरुद्र (जो महाप्रभु के महान भक्त थे) रथयात्रा का उत्सव शुरू होने पर विलाप कर रहे हैं:
“देखिए, यही श्री जगन्नाथ जी हैं, यही रथयात्रा है, यही जगन्नाथ जी का मंदिर है, वही सब भीड़ है, वही गुंडिचा मंदिर का मार्ग है… पर वह रस नहीं है! क्योंकि अभी श्री चैतन्य महाप्रभु प्रकट रूप में नहीं हैं। तो मैं इस विरह को कैसे सहन कर सकता हूँ? जगन्नाथ जी यहाँ प्रकट हैं, इससे दिव्य आनंद होना चाहिए, पर जगन्नाथ जी का दर्शन करके मुझे चैतन्य महाप्रभु का स्मरण हो रहा है और उनसे विरह असहनीय हो गया है!”
तब राजा प्रतापरुद्र महाप्रभु के पार्षदों को याद करते हैं कि किससे वे महाप्रभु की लीलाओं का श्रवण कर सकते हैं। वे याद करते हैं कि कैसे रथयात्रा के समय नृत्य करके महाप्रभु जगन्नाथ वल्लभ वाटिका में विश्राम कर रहे थे, और प्रतापरुद्र महाराज ने उनके चरण कमलों को पकड़कर श्रीमद्भागवतम् के दशम स्कंध (31वें अध्याय) का गोपी-गीत गाना शुरू किया था।
गोपी-गीत का वह प्रसिद्ध 9वाँ श्लोक है:
तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम् ।
श्रवणमंगलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ये भूरिदा जनाः ॥
यह श्लोक विशाखा देवी (तुंगविद्या/चित्रा/गोपियों के भाव) का है। इसमें गोपियाँ कहती हैं:
“हे प्रभो! आपकी कथा अमृत के समान है (तव कथामृतम्)। यह इस भौतिक जगत की वासनाओं और चिंताओं से तप्त जीवों का जीवन है (तप्तजीवनम्)। हमारे जीवन में जितनी वासनाएँ और इच्छाएँ हैं, उनकी पूर्ति न होने से चिंताएँ आ जाती हैं। उससे राहत पाने का मार्ग क्या है?
जो महान कवि/मुनिगण हैं, वे आपकी लीलाओं का वर्णन करते हैं, जिससे हृदय का सारा कल्मष (पाप/मल) नष्ट हो जाता है (कल्मषापहम्)। आपकी कथा श्रवण करने मात्र से परम मंगल होता है (श्रवणमंगलम्)। जो आपकी कथा का गान और प्रचार करते हैं, वे ही संसार में सबसे बड़े दाता (भूरिदा जनाः) हैं!”
यहाँ राजा प्रतापरुद्र स्मरण करते हैं कि जब महाप्रभु विरह में थे, तब मैंने गोपी-गीत सुनाया तो उन्हें शांति मिली। गोपियाँ जब विरह में थीं, तो उन्होंने गोपी-गीत गाकर राहत पाई। तो अभी महाप्रभु के पार्षदों में जो सबसे उत्कृष्ट कवि-पंडित हैं—परमानंद कवि कर्णपूर—उन्हें राजा बुलाते हैं और निवेदन करते हैं: “कृपया आप श्री गौरंग महाप्रभु की लीलाओं का नाट्यात्मक रूप से वर्णन कीजिए, ताकि एक नाटक रचा जा सके।”
कवि कर्णपूर उनकी तीव्र उत्कंठा देखकर ‘चैतन्य चंद्रोदय नाटक’ की रचना करते हैं।
चैतन्य चंद्रोदय मंदिर एवं छन्न-अवतार का सिद्धांत
मायापुर में हमारे इस्कॉन मंदिर का नाम श्रील प्रभुपाद जी ने क्या रखा है? श्री चैतन्य चंद्रोदय मंदिर।
साधारणतया जब सूरज उगता है, तो धूप और गर्मी बढ़ जाती है। पर जब भगवान के कृपामय भाव का वर्णन होता है, तो भगवान की तुलना चंद्रमा से की जाती है। शास्त्रों में भगवान के केवल दो रूपों की तुलना सूर्य से की गई है—एक नृसिंहदेव और दूसरा विराट रूप (जहाँ अर्जुन कहते हैं कि हजारों सूर्यों का तेज भी कम पड़ जाए)। इसके विपरीत, जब भगवान का स्वरूप सौम्य और कृपालु होता है, तो उनकी तुलना पूर्ण चंद्रमा से की जाती है। इसलिए नाम रखा गया—’चैतन्य चंद्रोदय’।
इस नाटक के प्रारंभ में ‘सूत्रधार’ (निदेशक/Director) और उनका सहयोगी (‘पारिपार्श्विक’) मंच पर आते हैं।
- सूत्रधार: “अहो भाग्य! आज मैं जन-समाज के कल्याण के लिए श्री चैतन्य महाप्रभु के जीवन पर एक नाटक प्रस्तुत कर रहा हूँ।”
- सहयोगी: “ये चैतन्य महाप्रभु कौन हैं?”
- सूत्रधार: “यदि तुम चैतन्य महाप्रभु को नहीं जानते, तो लगता है तुम अभी तक अपनी माँ के गर्भ में ही जी रहे हो! चैतन्य महाप्रभु ने प्रकट होकर कलियुग के अंधकार में अपनी कृपा की रोशनी से चारों दिशाओं को उजागर कर दिया है। इस कलियुग में उनके अलावा उद्धार का कोई आसान मार्ग नहीं है।”
- सहयोगी: “कलियुग तो अज्ञान, अन्याय और मोह का युग है। इसमें धर्म की रोशनी का प्रचार कैसे हो सकता है? कलियुग तो अत्यंत क्रूर और निष्ठूर है, पूरे विश्व पर उसका राज है। उसके साम्राज्य को कौन चुनौती दे सकता है?”
तभी नेपथ्य से एक कड़कती हुई आवाज़ आती है:
“किसने मुझे क्रूर और निष्ठूर कहा? किसकी इतनी औकात हुई कि मुझ राजा को क्रूर कहे?”
सूत्रधार और उनका सहयोगी देखते हैं कि स्वयं कलिराज अपने सेनापति अधर्म के साथ आ रहा है! सूत्रधार और सहयोगी अदृश्य हो जाते हैं और उनकी बातें सुनने लगते हैं।
कलिराज अपने चेले अधर्म से कहता है: “मैंने तो चारों दिशाओं से धर्म का नाश कर दिया है और अपना राज स्थापित कर दिया है। फिर वह कौन व्यक्ति है जो मेरी निंदा कर रहा था?”
अधर्म कहता है: “महाराज! वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं, वह चैतन्य महाप्रभु का भक्त है!”
कलिराज पूछता है: “यह चैतन्य कौन है?”
अधर्म उत्तर देता है: “वह वास्तव में एक ‘कौमारक’ (बालक) है।”
कलिराज सोचता है: “बालक? एक बालक मेरे साम्राज्य को कैसे नष्ट कर सकता है? ‘कौमारक’ का एक अर्थ यह भी होता है जो बुरी तरह मारता है। तो क्या वह मुझसे भी ज्यादा क्रूर है?”
अधर्म कहता है: “नहीं महाराज! वे बालक नहीं, वे ‘कुमार’ (नवयुवक) हैं। और वे कोई साधारण कुमार नहीं हैं, वे सारे देवताओं और संपूर्ण ब्रह्मांड के मूल स्रोत—स्वयं परम भगवान हैं!”
कलिराज हँसकर कहता है: “तुम पागल हो गए हो! परम भगवान तो कलियुग में आते ही नहीं हैं! इसीलिए तो शास्त्रों में उन्हें ‘त्रियुग’ (केवल तीन युगों—सतयुग, त्रेता, द्वापर में आने वाले) कहा गया है! कलियुग में उनका अवतार होता ही नहीं है।”
कलियुग में भगवान का छन्न-अवतार
यहाँ आचार्यगण समझाते हैं कि भगवान कलियुग में प्रकट रूप में क्यों नहीं आते।
जैसे किसी शहर में कोई माफिया का अड्डा या भयानक गुंडों का इलाका होता है, जहाँ आम पुलिस भी जाने से डरती है। तो सामान्य नियम से भगवान इस पाप-पूर्ण कलियुग में प्रत्यक्ष अवतार नहीं लेते।
परंतु, यदि उस माफिया के इलाके में किसी नागरिक का छोटा मासूम बच्चा फँस जाए, तो एक कृपालु पिता नियमों की परवाह न करके स्वयं अपने बच्चे को बचाने जाएगा!
ठीक उसी प्रकार, भगवान कलियुग में अपना राजा-रूप या दंडधारी रूप दिखाने नहीं आते, बल्कि अपने बिछड़े हुए बच्चों (जीवों) को उबारने के लिए स्वयं ‘छन्न-अवतार’ (प्रच्छन्न/गुप्त अवतार) के रूप में आते हैं!
श्रीमद्भागवतम् के सातवें स्कंध (9वें अध्याय) में प्रह्लाद महाराज नृसिंहदेव की स्तुति करते हुए कहते हैं:
इत्थं नृतिर्यगृषिदेवझषावतारै-
र्लोकान् विभावयसि हंस जगतः प्रतीपान् ।
धर्मं महापुरुष पासि युगानुवृत्तं
छन्नः कलौ यदभवस्त्रियुगोऽथ स एव ॥
प्रह्लाद महाराज कहते हैं: “हे महापुरुष! आप मनुष्य, पशु, ऋषि, देव, मत्स्य आदि अवतारों द्वारा जगत् का पालन करते हैं और युग-धर्म की रक्षा करते हैं। परंतु कलियुग में आप छन्न (गुप्त) रूप में प्रकट होते हैं, इसीलिए शास्त्रों में आपको ‘त्रियुग’ कहा गया है।”
कलियुग में भगवान राजा या योद्धा के रूप में नहीं, बल्कि अपने ही परम भक्त के रूप में—श्री चैतन्य महाप्रभु बनकर—हरिनाम संकीर्तन का दान करने आते हैं!
इसलिए आपको ‘त्रियुगी’ बताया गया है। पर आप हमेशा आते हैं, आप सबका कल्याण करते हैं। कलियुग में आप कल्याण करते हैं—छन्नः कलौ—एक छन्न (प्रच्छन्न/गुप्त) अवतार में आते हैं।
और वास्तव में, कलियुग में आप सबसे अधिक कृपा प्रदान करते हैं। क्यों? क्योंकि मान लीजिए कोई बड़ा धनवान व्यक्ति है और वह दानशील भी है, तो साधारण परिस्थितियों में तो वह दान देगा ही; पर अगर किसी जगह पर कोई भूकंप आ जाता है और सब कुछ ध्वस्त हो जाता है, तो उसकी जो दानशीलता की प्रवृत्ति है, वह और अधिक संवर्धित हो जाती है और इसलिए वह व्यक्ति और अधिक दान देता है।
ठीक उसी तरह से, कलियुग जो है वह एक आध्यात्मिक आपत्ति (आपदा) के समान है! यहाँ पर जो भी धर्म की संरचना थी, धर्म की प्रणाली थी, वह सब इस अधर्म के भूकंप से ध्वस्त हो गई है। तो उसके कारण भगवान् के भीतर एक पिता होने के नाते करुणा और अधिक जाग्रत होती है। और इसलिए वे प्रकट होते हैं एक अत्यंत करुणामय रूप में—वह रूप है श्री चैतन्य महाप्रभु!
भगवान् की करुणा के बारे में हम और चर्चा करेंगे, पर अभी हम जो ‘चैतन्य चंद्रोदय नाटक’ के बारे में चर्चा कर रहे हैं… तो अधर्म कहता है—”यह कौन ऐसा बालक है जिसके बारे में आप इतने चिंतित हो गए हैं?”
तो कलिराज बोलते हैं—”यह बालक सारे ब्रह्मांडों का स्वामी है, और यह कलियुग में श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट हुआ है!”
तभी दोनों सुनते हैं कि पीछे से हरिनाम संकीर्तन की ध्वनि गूँजने लगती है! सब जगह दिव्य आनंद और एक दिव्य उन्माद छाने लगता है। तो यह सुनकर अधर्म चिंतित हो जाता है। अधर्म पूछता है—”इस संकीर्तन की ध्वनि सुनकर ही मेरी सारी शक्ति चली जा रही है! मैं बिल्कुल शक्तिहीन और धैर्यहीन हो रहा हूँ, क्या करूँ मैं?”
और वह सोचता है—”मेरे स्वामी कलिराज ने तो पहले ही हार मान ली है! अगर मैं भी हार मान लूँगा तो क्या होगा?”
फिर अधर्म सोचता है—”आहा! एक योजना आ गई है! यह बालक कितना भी शक्तिशाली हो, इस भौतिक जगत में जो सबसे शक्तिशाली हैं—काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर… तो हमारा जो सबसे शक्तिशाली सेनापति है ‘काम’, हम काम के द्वारा इस श्री चैतन्य पर आक्रमण कर देंगे! और जब यह परास्त हो जाएगा, तो सारा धर्म अपने आप बंद हो जाएगा।”
तभी कलिराज कहते हैं—”यह तो किताब की सबसे पुरानी ट्रिक (चाल) है! मैं इसे पहले ही ट्राई कर चुका हूँ।”
अधर्म पूछता है—”क्या हो गया?”
कलिराज कहते हैं—”वास्तव में भगवान् जब आते हैं, तो वे इस भौतिक जगत के नश्वर रूपों से आकर्षित नहीं होते। वे अपनी नित्य स्वरूपा शक्ति—लक्ष्मी देवी—को साथ लेकर आते हैं। और वे यहाँ लक्ष्मीप्रिया देवी के रूप में आई थीं। तो मेरे साथियों ने कहा कि ‘यह बालक बाल-लीला कर रहा है, जब नौजवान होगा तो विवाह कर लेगा और सारे धर्म के बारे में भूलकर गृहस्थ लीला में मग्न रहेगा।’ तो मैंने उन पर विश्वास करके इंतज़ार किया।
पर जब लक्ष्मीप्रिया देवी आ गईं, तो महाप्रभु ने उनके साथ लीला की, पर वे जानते थे कि उन्हें संन्यास लेना है। इसलिए उन्होंने अपनी लीला-योजना से लक्ष्मीप्रिया जी को भगवद्धाम भेज दिया! जब वे भगवद्धाम चली गईं, तो मैं बड़ा हताश हो गया।
पर फिर मैंने सोचा कि मैं शचीमाता पर प्रभाव डालकर, बाकी सब नवद्वीपवासियों पर प्रभाव डालकर श्री चैतन्य महाप्रभु का विवाह विष्णुप्रिया देवी से करा दूँगा।”
‘कर्ताहमिति मन्यते’ — कलिराज का भ्रम
वास्तव में एक गाँव में एक बार बड़ा आलसी व्यक्ति था। वह अपने घर से भी नहीं निकलता था, भूखा ही पड़ा रहता था। तो एक बार लोगों ने देखा कि वह अपने घोड़े पर बैठकर बहुत तेज़ी से भागा जा रहा है!
लोगों ने पूछा—”अरे! आज क्या हो गया? आप तो इतने आलसी थे, इतने तेज़ी से कहाँ जा रहे हैं?”
उसने कहा—”मुझे मत पूछो, घोड़े से पूछो!”
भगवद्गीता (3.27) में आता है:
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥
जो जीवात्मा प्रकृति के गुणों से मोहित हो गया है, वह सोचता है कि “मैं कर्ता हूँ।”
उसी तरह से कलिराज सोच रहा था कि “मैं कर्ता हूँ, मैंने यह सब किया! चैतन्य महाप्रभु अचानक अपने घर में थे, विश्वंभर नाम था उनका, तो मुझे कोई चिंता नहीं थी।”
पर वास्तव में भगवान् की अपनी लीला चल रही थी। वे अपने घर में थे और एक दिन उनको विचार आया—वे गया (Gaya) चले गए। उन्होंने घर में कहा कि “मैं अपने पिताजी का श्राद्ध करने, पिंड दान करने जा रहा हूँ।”
पर जब वे गया गए, तो वहाँ वे श्री ईश्वरपुरी जी से मिल गए! और जब ईश्वरपुरी जी से मिले, तो ईश्वरपुरी जी ने क्या जादू किया, मुझे पता नहीं! वे पूरे ऐसे परिवर्तित हो गए कि अपनी पत्नी, अपने घरवाले—सबको भूल गए और सिर्फ भगवान् श्रीकृष्ण का कीर्तन करते रहे!
और तब से उनका जो दिव्य भाव (प्रेम-उन्माद) है, जो भी उनसे मिलने आता है, वे अपना प्रेम-उन्माद सबमें फैला देते हैं! तो कलिराज कहता है—”वास्तव में मैंने सारा प्रयास कर लिया है, जो तुम बोल रहे हो वह मैं पहले ही कर चुका हूँ, इसका कोई फायदा नहीं होता।”
काम और क्रोध का विफल प्रयास
अधर्म कहता है—”कोई बात नहीं! अगर काम कार्य नहीं करता, तो हमारे पास उससे भी बड़ा अस्त्र है—क्रोध! हम जानते हैं कि पहले हमने विश्वामित्र मुनि को काम से गिराया—पहले मेनका आई, फिर रंभा आई, और फिर वे क्रोध के कारण तपस्या से गिर गए! तो काम नहीं चला, तो हम क्रोध लाएँगे।”
कलिराज बोले—”वह भी मैं प्रयास कर चुका हूँ, उससे भी कुछ नहीं हुआ!”
अधर्म—”ऐसा कैसे हो सकता है? बताइए क्या हुआ?”
कलिराज कहते हैं—”वास्तव में जब श्री चैतन्य महाप्रभु अपनी लीलाएँ कर रहे थे, तो उनकी लीलाओं से सब प्रभावित हो गए, सब आकर्षित हो गए! न केवल भक्ति-प्रवृत्ति वाले लोग, बल्कि जो रूढ़िवादी ब्राह्मण थे वे भी आकर्षित हो गए; जो तथाकथित निचली जातियों के लोग थे वे भी आकर्षित हो गए; म्लेच्छ भी आकर्षित हो गए!
तो मैंने सोचा कि जो भक्ति के लिए आकर्षित नहीं हो रहे हैं, वे अभक्ति का कार्य करेंगे, तो उससे यह चैतन्य क्रुद्ध हो जाएगा।
पर जो भी उनके संपर्क में आता था, उस पर भक्ति का प्रभाव हो जाता था! एक बार एक बहुत नशा करने वाला म्लेच्छ व्यक्ति चैतन्य महाप्रभु के मार्ग से गुजर रहा था। उस समय उसको नशा नहीं मिल रहा था। जब कोई नशे का आदी व्यक्ति हो और उसे नशा न मिले, तो वह बहुत क्रुद्ध हो जाता है।
तो मैंने योजना बनाई कि वह चैतन्य महाप्रभु से मिलेगा, विवाद करेगा और चैतन्य महाप्रभु भी क्रुद्ध हो जाएँगे। और जब महाप्रभु क्रुद्ध होंगे, तो वे मेरी पकड़ में आ जाएँगे!
पर जैसे ही उसने चैतन्य महाप्रभु को देखा, तो चैतन्य महाप्रभु ने क्या जादू किया पता नहीं—उसको अपने जीवन का सबसे बड़ा नशा (हरिनाम का नशा) मिल गया! और उस नशे से वह ऐसा उन्मत्त हो गया कि आज तक उन्मत्त है! अब उसे किसी भौतिक नशे की ज़रूरत नहीं है, वह ‘हरे कृष्ण’ की भक्ति में लग गया।
उसके जो बाकी साथी थे, उन्होंने सोचा कि यह पागल हो गया है, तो उसे बचाने के लिए पीटने लगे। पर जो भी उसे स्पर्श करता था, वह भी पागल (भक्त) हो जाता था! तो इसलिए बाकी सब लोगों ने उसे पीटना भी छोड़ दिया, और वह अभी भक्तों के संग में आकर भक्ति कर रहा है!
यह देखकर तो मैं भयभीत हो गया! फिर मैंने विचार किया कि यह चैतन्य महाप्रभु सब पर कृपा कर रहे हैं, पर नवद्वीप में दो ऐसे व्यक्ति हैं जो बहुत अधार्मिक बन गए हैं—जगाई और मदाई! तो मैं उन दोनों को और चैतन्य महाप्रभु को आमने-सामने ला दूँगा।
चैतन्य महाप्रभु साधारणतया पतित लोगों पर क्रोधित नहीं होते, उन पर कृपा करते हैं; पर वे अपने भक्तों से बहुत प्रेम करते हैं। और अगर कोई उनके भक्तों पर आक्रमण करेगा, तो वे सही में क्रुद्ध हो जाएँगे!
तो मैं ऐसी योजना बनाऊँगा कि न केवल जगाई-मदाई से उनका संपर्क होगा, बल्कि ऐसी परिस्थिति बनेगी कि नित्यानंद प्रभु पर प्रहार होगा और चैतन्य महाप्रभु क्रुद्ध हो जाएँगे! और जब क्रुद्ध होंगे, तो वे मेरी पकड़ में आ जाएँगे।”
योगमाया बनाम महामाया का प्रभाव
तभी लीला चल रही होती है। चैतन्य महाप्रभु नित्यानंद प्रभु से कह रहे हैं—”आप घर-घर जाइए और सबका उद्धार कीजिए।”
भगवान् की लीला चल रही होती है, पर बद्ध जीवात्मा सोचता है कि “मैं अपना कार्य कर रहा हूँ।”
एक बार श्रील प्रभुपाद जी जब फिलाडेल्फिया एयरपोर्ट पर आए, तो कई अखबार वाले उनका इंटरव्यू लेने आए। जब इंटरव्यू हो गया, तो प्रभुपाद जी ने बताया कि अज्ञान और मोह का पागलपन क्या है—जहाँ भगवान् सामने खड़े हैं, वहाँ भी भगवान् दिखते नहीं हैं!
- महामाया का मोह: मंदिर में आकर भी व्यक्ति सोचता है—”यह तो पत्थर की मूर्ति है, भगवान् थोड़ी हैं!” जहाँ भगवान् हैं, वहाँ दिखते नहीं।
- योगमाया का प्रभाव: जहाँ बाह्य रूप से भगवान् नहीं दिख रहे, वहाँ भी भक्त को सर्वत्र भगवान् ही दिखाई देते हैं!
चैतन्य चरितामृत में महाप्रभु के बारे में वर्णन आता है:
स्थावर-जङ्गम देखे, ना देखे तार मूर्ति ।
सर्वत्र हय तार इष्टदेव-स्फूर्ति ॥
वे किसी भी स्थावर (अचल) या जंगम (चल) जीव—पेड़, पत्थर, हिरण, पक्षी—को देखते थे, तो बाह्य आकार नहीं देखते थे, सर्वत्र उन्हें अपने इष्टदेव भगवान् श्रीकृष्ण की ही स्फूर्ति (दर्शन) होती थी!
जब श्री चैतन्य महाप्रभु दक्षिण भारत की यात्रा पर प्रवास कर रहे थे, तो जब भी उन्हें कोई छोटा-सा जंगल दिखता था, तो उन्हें वृंदावन का स्मरण हो जाता था! कोई नदी दिखती थी, तो यमुना जी का स्मरण हो जाता था! कोई छोटा-सा पहाड़ दिखता था, तो गोवर्धन का स्मरण हो जाता था!
प्रश्न: अगर चैतन्य महाप्रभु किसी साधारण जंगल को देखकर सोच रहे हैं कि वह वृंदावन है, तो क्या वह जंगल वृंदावन है? क्या महाप्रभु कोई गलती कर रहे हैं?
उत्तर: आध्यात्मिक जीवन में हम केवल ‘हाँ’ या ‘ना’ में उत्तर नहीं दे सकते।
यहाँ तत्त्व और रस के स्तर को समझना होगा:
- तत्त्व के स्तर पर (On the level of Truth): बाह्य रूप से हर जंगल वृंदावन नहीं है।
- रस के स्तर पर (On the level of Rasa/Devotion): जो भी वस्तु या स्थान हमें भगवान् का संबंध दिलाती है, हमारी चेतना को कृष्णभावनाभावित करती है, वह भक्त के लिए वृंदावन ही है! जितना व्यक्ति हर चीज़ का संबंध भगवान् से जोड़ सकता है, उतना ही उसका रस और आध्यात्मिक चेतना उच्च कोटि की है।
जैसे नंद महाराज और यशोदा मैया वात्सल्य भाव में सोचते हैं कि “कृष्ण हमारा छोटा बालक है, हमें इसका रक्षण करना है।” जब असुर आते हैं, तो नंद महाराज सोचते हैं—”मैं भगवान् नारायण की पूजा करूँगा ताकि नारायण मेरे बालक कृष्ण की रक्षा करें!”
अब तत्त्व के स्तर पर कृष्ण ही स्वयं नारायण हैं, पर रस के स्तर पर नंद महाराज का यह भाव उनके गाढ़ वात्सल्य और तीव्र सेवा-भाव का लक्षण है।
दिव्योन्माद का स्वरूप
श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं में दिव्योन्माद (Spiritual Ecstasy/Madness) के तीन स्तर बताए गए हैं:
- प्रथम स्तर (दिव्य दर्शन): भक्त बाह्य जगत में रहते हुए भी ऐसी दिव्य चीज़ें देखता है जो सामान्य लोग नहीं देख सकते।
- उदाहरण: चैतन्य चरितामृत की अंतलीला में आता है कि महाप्रभु भक्तों के साथ जगन्नाथ मंदिर जा रहे थे। अचानक वे दौड़ने लगे! भक्तों ने कहा—”प्रभु! रुकिए!” पर महाप्रभु सीधे झाड़ियों की ओर भागे। उन्हें लगा कि कृष्ण झाड़ियों के बीच खड़े होकर बाँसुरी बजा रहे हैं! वे कृष्ण का आलिंगन करने दौड़े, पर जैसे ही वहाँ पहुँचे, कृष्ण अंतर्धान हो गए। महाप्रभु मूर्छित हो गए। जब होश आया तो बोले—”मुझे कृष्ण दिखे, उन्होंने मुझे बुलाया, पर जैसे ही मैं गले लगाने लगा, वे गायब हो गए!”
- द्वितीय स्तर (आंतरिक प्रवेश): भक्त बाह्य चेतना से पूरी तरह अचेत (बेहोश) हो जाता है और आंतरिक रूप से भगवान् की नित्य गोलोक लीला में प्रवेश कर जाता है।
- तृतीय स्तर (परम भाव): श्री रूप गोस्वामी रचित ‘उज्ज्वल-नीलमणि’ और ‘भक्ति-सामृत-सिंधु’ में इन दिव्य रसों और भावों का विस्तृत वर्णन आता है
मध्य लीला में सारे भारत भर में कैसे जाकर उन्होंने प्रचार किया, उसका वर्णन आता है। और अंत लीला में… अभी जो प्रचार है, उसके दो विभाग होते हैं:
- बाह्य प्रचार: दूसरों को भगवान् और भक्ति की ओर आकर्षित करना।
- आंतरिक प्रचार: हम स्वयं भगवान् की ओर आकर्षित होना।
और हम भगवान् की ओर आकर्षित कैसे होते हैं? प्रधान रूप से जब हम भक्तों से आकर्षित होते हैं, तो भक्तों की ओर जो आकर्षित होता है, उसके द्वारा हम भगवान् की ओर आकर्षित होते हैं।
श्रीमद्भागवतम् के तीसरे स्कंध (3.25.20) में बताया गया है:
प्रसङ्गमजरं पाशमात्मनः कवयो विदुः ।
स एव साधुषु कृतो मोक्षद्वारमपावृतम् ॥
जब हमारी आसक्ति किसी भौतिक चीज़ से होती है, तो वह आत्मा को बंधन में डालती है। पर वही आसक्ति जब हम भगवान् की ओर या महान् भक्तों की ओर लगाते हैं, तो मोक्ष का दरवाजा खुल जाता है!
हमारा शरीर बूढ़ा हो जाता है, पर हमारी भौतिक आसक्तियाँ बूढ़ी नहीं होतीं, वे वैसी की वैसी बनी रहती हैं। विद्वान लोग जानते हैं कि यही आसक्ति आत्मा के बंधन का कारण है, पर वही आसक्ति जब साधु-भक्तों के प्रति और भगवान् के प्रति हो जाती है, तो मुक्ति का द्वार खुल जाता है।
श्री चैतन्य महाप्रभु वास्तव में जो बाह्य प्रचार है, वह केवल ६ वर्ष करते हैं। २४ साल की आयु में वे संन्यास लेते हैं। उसके पहले २-३-४ साल वे मायापुर में प्रचार करते हैं। फिर ६ साल वे पूरे भारत भर में प्रचार करते हैं। और फिर ३० साल की आयु से ४८ साल की आयु तक वे जगन्नाथ पुरी में रहते हैं।
ऐसा लगता है कि क्या वे कोई प्रचार नहीं कर रहे हैं? पर वास्तव में तभी वे क्या कर रहे हैं? वे अपने पास जो भी भक्त मिलने आते हैं, उन सब भक्तों के हृदय में और अधिक प्रवेश कर रहे हैं! तो भक्तों के साथ उनका जो आदान-प्रदान है, उससे हमारा जो भगवान् से अंतरंग संबंध है, वह और बढ़ जाता है।
श्रील प्रभुपाद जी ‘उपदेशामृत’ (श्लोक 4) में लिखते हैं कि छह प्रकार के प्रेम के आदान-प्रदान होते हैं:
ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यमाख्याति पृच्छति ।
भुङ्क्ते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम् ॥
- ददाति — भेंट देना।
- प्रतिगृह्णाति — भेंट स्वीकार करना।
- गुह्यमाख्याति — अपने हृदय की गुप्त/गंभीर बात बताना (भक्ति में क्या चुनौतियाँ आ रही हैं, क्या साक्षात्कार हो रहे हैं)।
- पृच्छति — दूसरों के हृदय की बात सुनना।
- भुङ्क्ते — प्रसाद स्वीकार करना।
- भोजयते — दूसरों को प्रसाद खिलाना।
इन ६ प्रीति-लक्षणों से भक्तों के प्रति और भगवान् के प्रति प्रेम बढ़ता है। इनमें से ५वाँ और ६ठा—प्रसाद खाना और खिलाना—इसके लिए हम सब बहुत उत्साही रहते हैं! प्रसाद भी भगवान् का ही एक रूप है, पर वह भगवान् का इकलौता रूप नहीं है। इसलिए प्रसाद के साथ-साथ कीर्तन, प्रवचन, सेवा—इन सब के प्रति भी आकर्षित होना चाहिए।
महाप्रभु अंत लीला में अपने आचरण से दिखाते हैं कि भक्तों के समूह में रहकर यह षड्विधं प्रीतिलक्षणम् कैसे निभाना है।
हृदय का बंधन बनाम भौतिक संगठन
साधारणतया जब कोई बहुत अमीर ज़मींदार या राजा मरता है, तो उसके पुत्रों और रिश्तेदारों में जायदाद के लिए झगड़े होने लगते हैं। कई बार उनका खड़ा किया गया साम्राज्य नष्ट हो जाता है। इसलिए लोग वसीयत (Will) लिखते हैं, उत्तराधिकारी नियुक्त करते हैं।
पर श्री चैतन्य महाप्रभु केवल ४८ वर्ष रहे, और उन्होंने अचानक अपनी लीला समाप्त कर दी! उन्होंने न तो कोई ग्रंथ लिखा (केवल आठ श्लोक ‘शिक्षाष्टकम्’ लिखे), न ही कोई भौतिक संस्था बनाई, न ही अपना कोई आधिकारिक उत्तराधिकारी (Head) घोषित किया। फिर भी गौड़ीय वैष्णव भक्ति हज़ारों सालों से कैसे अटूट प्रवाहित हो रही है?
क्योंकि ग्रंथ लिखना, वारिस नियुक्त करना, संस्था बनाना—ये सब बाह्य हैं! असली जोड़ जो होता है, वह हृदय का जोड़ होता है! और वह हृदय का जोड़ चैतन्य महाप्रभु ने षड्विधं प्रीतिलक्षणम् के द्वारा अपने भक्तों के हृदय में स्थापित कर दिया था!
श्रील प्रभुपाद जी से जब पूछा जाता था—”आपके बाद आपकी संस्था को कौन चलाएगा?”
प्रभुपाद जी ने जवाब दिया—”जो चलाना चाहेगा, वह चलाएगा!” (Whoever desires will lead!)
प्रभुपाद जी के कुछ गुरुभाइयों ने एक बार आलोचना की कि “प्रभुपाद जी को भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर का उतना संग नहीं मिला था, वे तो गृहस्थ थे।”
प्रभुपाद जी ने बड़ी गंभीरता से कहा—”जो ऐसा कह रहे हैं, उनसे जाकर पूछिए कि मुझसे अधिक ग्रंथ किसने लिखे? मुझसे अधिक मंदिर किसने बनाए? मुझसे अधिक शिष्य किसने बनाए?”
प्रभुपाद जी ने कहा:
I have inherited the legacy of my spiritual master!
प्रभुपाद जी को अपने गुरुदेव से कोई भौतिक संपत्ति, धन या मंदिर नहीं मिला था। वे अकेले अमेरिका गए थे। तो फिर क्या वसीयत (Legacy) मिली थी?
“गुरुदेव की सेवा और प्रचार करने की तीव्र इच्छा!” (The desire to serve is the real legacy of the spiritual master to the disciple.)
यदि हमारे हृदय में सेवा करने की इच्छा है, तो गुरुदेव का आशीर्वाद हमें मिल गया है। हमारे जीवन में सुविधाएँ हों या न हों, यदि सेवा और प्रचार की सच्ची इच्छा है, तो बाकी सब अपने आप प्रकट हो जाएगा।
जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु का राधारानी-भाव
श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ पुरी में राधारानी के परम विरह-भाव में रहते थे।
जब नवद्वीप में थे, तब वे कृष्ण-भाव में थे, संकीर्तन आंदोलन और युगधर्म का प्रचार कर रहे थे। पर जब पुरी में राय रामानंद से मिले (जो साक्षात् विशाखा सखी हैं), तो महाप्रभु के भीतर राधारानी का भाव पूर्णतया जाग्रत हो गया:
श्रीकृष्णचैतन्य राधाकृष्ण नहि अन्य ।
महाप्रभु का बाह्य वर्ण और आंतरिक भाव श्रीमती राधारानी का है, पर वे स्वयं श्री कृष्ण हैं। नवद्वीप में वे कृष्ण-भाव में लीला कर रहे थे, पर जगन्नाथ पुरी में वे राधारानी का वह विरह-भाव आस्वादन कर रहे थे, जब कृष्ण वृंदावन छोड़कर मथुरा चले गए थे।
राधारानी का वह प्रसिद्ध भाव-श्लोक है:
अयि दीनादयार्द्रनाथ हे मथुरानाथ कदावलोक्यसे ।
हृदयं त्वदलोककातरं दयित भ्राम्यति किं करोम्यहम् ॥
राधारानी कहती हैं: “हे दीनों पर दया करने वाले नाथ! हे मथुरानाथ! आप हमें वृंदावन में विरह की अग्नि में छोड़कर मथुरा के नाथ बन गए हैं! आपके दर्शन के बिना मेरा हृदय अत्यंत व्याकुल हो रहा है, मैं क्या करूँ?”
महाप्रभु इस विरह-भाव में इतने मग्न हो जाते थे कि उन्हें बाह्य जगत् का कोई होश नहीं रहता था। तब उनके अंतरंग पार्षद—स्वरूप दामोदर (ललिता सखी) और राय रामानंद (विशाखा सखी)—श्रीमद्भागवतम् और गोपी-गीत के श्लोक गाकर उन्हें सांत्वना देते थे।
दिव्योन्माद और शारीरिक अलौकिक विकार
श्री चैतन्य महाप्रभु में प्रेम के कारण जो ‘दिव्योन्माद’ (Spiritual Ecstasy) प्रकट होता था, उसके तीन मुख्य लक्षण अंत लीला में दिखते हैं:
- अप्राकृत दर्शन: जहाँ सामान्य लोग कुछ नहीं देखते, वहाँ महाप्रभु को कृष्ण की प्रत्यक्ष लीलाएँ दिखाई देती थीं।
- बाह्य चेतना का लोप: वे भौतिक रूप से मूर्छित हो जाते थे और आंतरिक रूप से गोलोक वृंदावन की लीला में प्रवेश कर जाते थे।
- अलौकिक शारीरिक परिवर्तन:
- कूर्म रूप (संकुचित अंग): कभी-कभी महाप्रभु के हाथ, पैर और सिर कछुए (कूर्म) की भाँति शरीर के भीतर संकुचित हो जाते थे।
- संधि-बंध (अंगों का लंबा होना): कभी-कभी उनके शरीर के जोड़ (हड्डियाँ) इतने अलग हो जाते थे कि केवल त्वचा से जुड़े रहते थे।
एक बार महाप्रभु रात में अपने कमरे से गायब हो गए। सब भक्त ढूँढने लगे। अंत में देखा कि समुद्र के तट पर एक मछुआरा काँप रहा है और ‘कृष्ण! कृष्ण!’ चिल्ला रहा है।
मछुआरे ने बताया कि उसने जाल फेंका था, तो जाल में कोई मनुष्य जैसा आया। जैसे ही उसने स्पर्श किया, उसके शरीर में भी कृष्ण-प्रेम का संचार हो गया! भक्तों ने देखा कि महाप्रभु वहाँ बालू पर पड़े हैं और उनके अंग संधि-छिन्न (लंबे) हो गए हैं। तब स्वरूप दामोदर और भक्तों ने उच्च स्वर में ‘हरे कृष्ण’ महामंत्र का कीर्तन किया, तब धीरे-धीरे महाप्रभु की बाह्य चेतना वापस आई।
निष्कर्ष
श्रील प्रभुपाद जी का ‘पागलपन’ (उन्माद) क्या था?
“अपने गुरुदेव के आदेश के प्रति पूर्ण समर्पण!” (Prabhupada’s madness was a total commitment to the instruction of his spiritual master.)
हम भी जब जप, कीर्तन और सेवा करते हैं, तो यदि हम अपना मन लगाने का प्रयास करेंगे, तो धीरे-धीरे श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से कृष्णभावनाभावित हो जाएँगे। और इस जीवन के अंत में हम उसी दिव्य कृष्ण-लीला में प्रवेश कर लेंगे।
‘चैतन्य चंद्रोदय नाटक’ और महाप्रभु के जीवन-चरित्रों का अनुशीलन करके हम कलिराज के सभी अस्त्रों (काम, क्रोध, अज्ञान) को परास्त कर भगवद्भक्ति प्राप्त कर सकते हैं और भगवद्धाम जा सकते हैं।
बहुत-बहुत धन्यवाद!
श्री गौरांग महाप्रभु की जय!
श्री गौर पूर्णिमा महोत्सव की जय!
श्रील प्रभुपाद की जय!
गौर-भक्तवृंद की जय!
निताई-गौर प्रेमानंदे हरि-हरि बोल!