When children of same parents such as Ravana and Vibhishana have the same DNA why are their characters so different (Hindi)?
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Lecture Summary
इस व्याख्यान में इस बात पर चर्चा की गई है कि एक ही परिवार और एक ही माता-पिता या समान डी.एन.ए. (DNA) होने के बावजूद भाई-बहनों या जुड़वां बच्चों (यहाँ तक कि मोनोजायगोटिक ट्विंस) का स्वभाव और व्यक्तित्व एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न क्यों होता है। इसके मुख्य पाँच कारण बताए गए हैं:
- पूर्वजन्म के कर्म और मानसिक वृत्तियाँ: पूर्वजन्म के संस्कारों और कर्मों के कारण बनी वृत्तियाँ इस जीवन के कार्यों को प्रभावित करती हैं।
- जींस (Genes): आनुवंशिक संरचना जो पूर्वजन्म के आधार पर मिलती है।
- अभिवृत्ति और परवरिश: पालन-पोषण और वातावरण का प्रभाव।
- स्वेच्छा (Free Will): मनुष्य के पास इन सभी प्रभावों और प्रवृत्तियों को रोकने, समझने और उनके विरुद्ध कार्य करने की स्वतंत्र शक्ति (स्वेच्छा) होती है, वह उनसे पूरी तरह बंधा नहीं होता।
- भगवत कृपा: भगवान की कृपा से इन सभी भौतिक और प्राकृत प्रभावों के प्रभाव से परे जाया जा सकता है।
निष्कर्ष: यही कारण है कि समान परिवार और समान डी.एन.ए. होने पर भी (जैसे रावण और विभीषण) व्यक्तियों के स्वभाव, आचरण और व्यक्तित्व में जमीन-आसमान का अंतर हो सकता है।
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परिवार और संतानों में स्वभाव की भिन्नता: कारण और रहस्य
अगर एक परिवार में सबके डी.एन.ए. (DNA) तो एक ही होते हैं, तो फिर उनका स्वभाव इतना अलग क्यों होता है? अगर हम देखते हैं, तो रावण और विभीषण में न केवल फर्क है, उसमें तो पूरा विपर्यय है—एक आसुरी है, एक दैवी है। हां, एक इसका कारण यह है कि हमारा वास्तविक स्वभाव केवल हमारे जन्म से नहीं आता है। अभी हमारा जो बर्ताव है, जिस तरह से हम कार्य करते हैं, उसके लिए पांच फैक्टर्स (factors) होते हैं।
तो पहला है कि हमारा पूर्वाविपरीत्यों का कारण है और उससे अर्जित मानसिक वृत्तियां हैं। तो उसके कारण हम भले ही एक ही परिवार में जन्म लेते हैं, तो फिर भी कभी-कभी अलग-अलग होता है। यहां तक कि दो भाई और दो जुड़वां भी होते हैं, तो जुड़वांओं का स्वभाव काफी अलग होता है। यहां तक कि वैज्ञानिक प्रतिष्ठित करते हैं, तो उसमें एक प्रकार के जुड़वां होते हैं, वो कहते हैं—मोनोजायगोटिक ट्विंस (monozygotic twins)।
मोनोजायगोटिक ट्विंस मतलब जब जुड़वां होते हैं, वो दो प्रकार से होते हैं। कभी-कभी क्या होता है कि दो वीर्य होते हैं, उसमें दो शिष्य उत्पन्न होते हैं और कभी-कभी ऐसा होता है कि पहले एक ही शिष्य होता है, एक ही जायगोट (zygote) होता है और वो दो में स्प्लिट (split) होता है और फिर उससे दो उत्पन्न होते हैं। तो पहले इसमें उनके जो जींस होते हैं—अब जींस के लिए और शब्द है कि नहीं, बताने की जरूरत नहीं—तो पहले इसमें थोड़ा जींस में उनके थोड़ा फर्क होता है, पर दूसरे इसमें उनके जींस सिमिलर नहीं, आइडेंटिकल (identical) होते हैं, बिल्कुल एक ही होते हैं।
तो मतलब यहां पर उनके जो डी.एन.ए. (DNA) हैं, पूरा 100% सेम, जींस सेम, फिर भी मोनोजायगोटिक ट्विंस का भी स्वभाव अलग होता है। मैं अभी एक चीज—जब मैं लंदन में था, तो मैं यह पॉइंट बता रहा था—इससे वास्तव में हम देख सकते हैं कि व्यक्ति जो हैं, केवल अपने शरीर में, व्यक्ति में कुछ और है, जिसके कारण व्यक्ति की पर्सनालिटी (personality) आई है, व्यक्ति का व्यक्तित्व आया है, व्यक्ति का स्वभाव आया है।
तो यह एक निष्कर्ष रूपी की तरह है, जिससे आप समझ सकते हैं कि हम, हमारे शरीर के परे भी कुछ और हैं। तो मैं यह बता रहा था, तभी क्लास में एक इंग्लिश व्यक्ति खड़ा हो गया था कि वास्तव में मैं और मेरा भाई, हम दोनों वास्तव में मोनोजायगोटिक ट्विंस हैं और हम दोनों के शरीर में इतना बड़ा स्वभाव का फर्क हो गया है। मैंने बहुत देखा है, हमारे स्वभाव में परीक्षा है, हमें भी आज से पता नहीं था, तो अभी-अभी समझ में आया है कि हम दोनों वास्तव में अलग आत्मा हैं, क्योंकि भौतिकवादी विश्व से देखें तो कुछ फर्क होना नहीं चाहिए फर्क, पर फर्क है और तो इसमें क्या होता है।
स्वभाव और व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले पांच कारक
कि सबसे पहले हमारे पूर्वजन्म के कर्म के लिए हमारी एक प्रकार की वृत्ति बन गई, तो वो भी हमारे इस जीवन में कार्य को एक प्रकार से प्रेरित करती है, पुष्ट करती है, इस तरह से कार्य करने के लिए प्रवृत्त करती है।
दूसरा है कि हमारे जींस, जो हमारे पूर्वजन्म के मिले हैं, उसके अनुसार भी हमारा स्वभाव होता है।
तीसरा है कि हमारी अभिवृत्ति, संवर्धन, परवरिश करती है, इस प्रकार से हमारी परवरिश भी है, उसके अनुसार हमारा स्वभाव होता है।
और चौथा है हमारा संवर्धन। ये तीनों हमें पुष्ट करते हैं, पर फोर्स (force) नहीं करते हैं। हमें यह एक प्रकार से परवरिश करते हैं, पर उसी प्रकार से कार्य करना जरूरी नहीं है, हमारी स्वेच्छा है। जैसे मैं इस कुर्सी पर बैठा हूं, कुछ पीछे धक्का मारता हूं, तो क्या होगा, मैं आगे जाऊंगा। पर मैं कहीं पकड़ के उसको पीछे भी धक्का मारता हूं, मैं उसको रेसिस्ट (resist) कर सकता हूं, उसको रोक सकता हूं।
तो इन तीनों से हम प्रयुक्त होते हैं एक प्रकार से कार्य करने के लिए, पर हमें उसको प्रतिकार करने की शक्ति है, उसको रोकने की शक्ति है—वो है स्वेच्छा। तो हमारी स्वेच्छा इन सबसे प्रयुक्त होती है, पर इन सबसे लिमिटेड (limited) नहीं होती है, इन सबसे संकुचित नहीं होती है।
और पांचवां है भगवत कृपा। जब भगवत कृपा से इन सबके प्रभाव को हम काफी हद तक परे जा सकते हैं। तो इसीलिए कि भले ही दो प्रभुत्व, या एक ही परिवार में जन्म गए हो, क्योंकि उनके पूर्वजन्म के स्वभाव अलग हैं, वृत्तियां अलग हैं, इसके लिए उनका जो इस जन्म के कार्य होता है, काफी अलग हो सकता है। प्रभुत्व स्वभाव नहीं है।