If others’ way of functioning disturbs our service, what can we do – Hindi?
Answer Podcast
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Lecture Summary
- सेवा में बाधा और व्यवस्था: सेवा के दौरान आने वाली समस्याओं और बाधाओं का समाधान देश-काल-पात्र के अनुसार व्यवस्था बनाकर करना चाहिए। कई बार शेड्यूल और टाइम-टेबल बनाने पर भी कुछ भक्तों का स्वभाव वैसा नहीं होता, लेकिन उन्हें धीरे-धीरे ऑर्गेनाइज्ड और नियमबद्ध तरीके से ढालने का प्रयास किया जाना चाहिए।
- अपेक्षा और हताशा (Frustration): हताशा हमेशा हमारी अपेक्षाओं पर निर्भर करती है। यदि कोई बात सेवा के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, तो हमें वरिष्ठों के पास जाकर अपनी समस्या रखनी चाहिए। वे हमें व्यावहारिक समाधान और एडजस्टमेंट का सुझाव दे सकते हैं।
- एडजस्टमेंट की सीमाएं: दूसरों से तालमेल बिठाना ज़रूरी है, लेकिन सारा एडजस्टमेंट अकेले हमें ही करना पड़े, यह आवश्यक नहीं है। यदि कोई व्यक्ति किसी सेवा के लिए उपयुक्त (suited) नहीं है, तो बिना किसी द्वेष या शिकायत के, केवल सेवा की सुगमता को ध्यान में रखते हुए वरिष्ठों को अवगत कराया जा सकता है।
- निर्णय और मार्गदर्शन: किसी भी परिस्थिति में सुधार के लिए पहले परिवर्तन का प्रयास किया जाता है। इसके पश्चात वरिष्ठों से मार्गदर्शन लेकर, समझदारी से और उचित चर्चा के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाना चाहिए।
Full Transcription
सेवा में आने वाली बाधाएं और उनके समाधान
तो अगर कोई व्यक्ति अपनी सेवा कर रहे हैं और उससे हमको सेवा में व्यत्यय होता है, हमें सेवा में समस्या आती है, तो हमें क्या करना चाहिए? इसमें कैसे है कि देश-काल-पात्र के लिए हमें व्यवस्था देखनी है। कभी-कभी क्या होता है, हम टाइम-टेबल बनाते हैं, हम शेड्यूल बनाते हैं, और कुछ भक्त, उनका वैसा स्वभाव ही नहीं है। तो अभी अच्छा है कि वो वैसा स्वभाव ला सकें और सब कुछ अच्छी तरह से एक ऑर्गेनाइज्ड (organized) वे में, नियमबद्ध आयोजित पद्धति से कर सकें।
अपेक्षाएं और हताशा (Expectation and Frustration)
मतलब क्या है कि frustration is a function of expectation. जितनी मेरी अपेक्षा होती है, उतना मैं हमेशा हताश होता हूँ। तो कभी-कभी क्या करना चाहिए हमको? जब हमारी सेवा के लिए यह महत्त्वपूर्ण है, तो फिर हम हमारे वरिष्ठों के पास जाके बोल सकते हैं कि, “ऐसा करना है, और उससे मुझे समस्या हो रही है।”
तो शायद वो आपको बोल रहे हैं कि, “आप ये adjustment कर सकते हैं, आप उनको ये दे सकते हैं, आप ये दे सकते हैं।” तो क्या है कि प्रैक्टिकल (practical) व्यवहारिकता से कभी-कभी कोई चीज़ हमारे लिए बहुत आसान हो सकती है और दूसरे किसी व्यक्ति के लिए बहुत मुश्किल हो।
दूसरों से तालमेल (Adjustment) और हमारी सीमाएं
तो इसलिए हम दूसरों से क्या अपेक्षा रख सकते हैं? यहाँ कभी-कभी हमको adjust करना पड़ेगा। ये एक विषय है, हमारा adjustment है। पर सब कुछ adjustment हमें ही करना है, ऐसा नहीं है। कुछ-कुछ चीज़ें होती हैं, जो हमारे लिए ज़रूरी हैं। और अगर कोई व्यक्ति वो नहीं कर पा रहा है, तो ऐसा हो सकता है कि व्यक्ति उस सेवा के लिए सूटेड (suited) नहीं है।
सही भावना और वरिष्ठों का मार्गदर्शन
तो फिर हम हमारे वरिष्ठों या सेवा प्रमुख को बोल सकते हैं। हमें यहाँ पे… हम उस व्यक्ति की शिकायत नहीं कर रहे हैं, और हमारा भाव उस व्यक्ति का तिरस्कार करना या नीचा दिखाना नहीं है। हमें हमारी सेवा करनी है, और सेवा में हमें बाधा (व्यत्यय) आ रही है, तो कैसे निकालना है, उसके लिए कुछ योजना कर सकते हैं।
तो यह एक मतलब… यहाँ पर एक तत्त्व है और एक व्यवहार है। तत्त्व के रूप में हमें समझना है कि सबसे मैं उसी प्रकार की अपेक्षा नहीं कर सकता हूँ। व्यवहार के रूप में मुझे देखना है कि मुझे क्या ज़रूरी है, क्या अनिवार्य है।
परिवर्तन और सही निर्णय
और अगर वो नहीं हो रहा है, मैंने पिछले रविवार के प्रवचन में कहा था कि ३ चीज़ें होती हैं। सबसे पहले हम उसको परिवर्तित करते हैं। हताश होकर, वो हर स्तर पर परिवर्तन की बात आती है, then मुझे कौन सी बात कष्ट न दे, यह सोचना है।
वो हमारे वरिष्ठों से मार्गदर्शन लेकर, हमारी बुद्धि से, कुछ भक्तों से बात करके, उस भक्त से भी डिस्कशन (discussion) करके, बातचीत करके, तो हम फैसला कर सकते हैं। वरिष्ठों से मार्गदर्शन लें। धन्यवाद!