Sensitivity means to balance enlightenment with encouragement – Gita 17.15 – Hindi
[Gitamrita class at ISKCON, Nasik]
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Lecture Summary
मुख्य बिंदु (Key Takeaways):
- वाणी की तपस्या क्या है?: जो हम स्वाभाविक रूप से बिना सोचे-समझे बोल देते हैं, उस पर नियंत्रण रखना ही वाणी की तपस्या है। बोलते समय चार बातों का ध्यान रखना चाहिए:
- अनुद्वेगकरं (Non-agitating): दूसरों के मन को विचलित न करने वाले वचन।
- सत्यं (Truthful): हमेशा सत्य बोलना।
- प्रिय (Pleasing): इस तरह से बोलना जो सुनने में अच्छा लगे।
- हितं (Beneficial): केवल प्रिय ही नहीं, बल्कि जो सामने वाले के लिए फायदेमंद हो, वह भी बोलना (जैसे डॉक्टर मरीज को कड़वी दवाई भी देता है)।
- ज्ञान (Enlightenment) और प्रोत्साहन (Encouragement) का संतुलन: केवल ज्ञान देने से व्यक्ति हताश हो सकता है कि “मैं यह नहीं कर सकता।” इसलिए ज्ञान के साथ-साथ प्रोत्साहन और सांत्वना देना बहुत ज़रूरी है। जैसे डॉक्टर बीमारी का ज्ञान देता है, लेकिन साथ ही ठीक होने का आश्वासन (प्रोत्साहन) भी देता है।
- दोष देखने से बचना (अपैशुनम्): दूसरों में कमियां निकालने (Fault-finding) में रुचि नहीं लेनी चाहिए। यदि किसी को सुधारना भी हो, तो प्रभुपाद जी की तरह बेहद संवेदनशीलता से सुधारना चाहिए, न कि उस भक्त की तरह जिसने मांस खाने वाली महिला के हाथ से माला फेंक कर उसे दुखी कर दिया था। प्रोत्साहन से लोग सुधरते हैं, जबकि सिर्फ कमियां निकालने से वे दूर चले जाते हैं।
- मतभेद में भी आदर (Respect in Disagreement): भगवान श्रीकृष्ण और आचार्यों के उदाहरण बताते हैं कि यदि हमारा किसी से मतभेद है या हम किसी की बात से सहमत नहीं हैं, तब भी उनका अनादर नहीं करना चाहिए।
- महाभारत का उदाहरण (द्रौपदी की बुद्धिमत्ता): जुए के प्रसंग में द्रौपदी का चरित्र बहुत ही संवेदनशील और बुद्धिमानी भरा दिखाया गया है। घोर संकट और अपमान के समय भी उसने अपनी मर्यादा नहीं खोई, बड़ों का आदर किया और दुर्योधन की चालों के बावजूद सबके सामने अपने पति (युधिष्ठिर) के प्रति कोई भेद या कड़वाहट जाहिर नहीं होने दी।
- भौतिक और आध्यात्मिक जीवन में संतुलन: हमारी भौतिक जिम्मेदारियों (जैसे नौकरी, परिवार) और आध्यात्मिक कार्यों को अलग-अलग करके नहीं देखना चाहिए। हर कार्य को भगवान की सेवा समझकर पूरे उत्साह से करना चाहिए। जब जीवन में भौतिक जिम्मेदारियों का “ट्रैफिक” बढ़ जाए, तो आध्यात्मिक गति भले ही धीमी हो जाए, लेकिन दिशा वही रहनी चाहिए।
निष्कर्ष: सही ज्ञान होना ही काफी नहीं है; उस ज्ञान को संवेदनशीलता, प्रेम और प्रोत्साहन के साथ दूसरों तक पहुँचाना ही वास्तविक धर्म और वाणी की तपस्या है।
Full Transcriptions
वाणी की तपस्या: संवेदनशीलता, ज्ञान और प्रोत्साहन का संतुलन
वाणी की तपस्या क्या है?
हरे कृष्णा! आज के भागवतम कथा कार्यक्रम में आप सभी का स्वागत है। पिछले हफ्ते हमने चर्चा की थी कि कैसे संग जो होता है, वो तीन गुणों में होता है। तो आज ऐसे तीन गुणों में से एक विश्लेषण सत्रहवें अध्याय में आता है, खास करके हमारी वाक् शक्ति के बारे में। किस तरह से हम बोलते हैं, तो उसके बारे में आज चर्चा करेंगे। सत्रहवें अध्याय के पंद्रहवें श्लोक के आधार पर:
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥
वाङ्मयं तप:। वाणी को बोलते हैं कि वास्तव में तपस्या क्या होती है, तपस्या कैसे करनी है, उसके बारे में इस श्लोक में शिक्षा है। श्लोक कहते हैं कि हमें किस तरह से बोलना चाहिए। साधारणतया हम तपस्या सोचते हैं कि कोई उपवास करना तपस्या है, कोई व्यायाम कसरत करना तपस्या है, पर तपस्या का मतलब वास्तव में क्या है? कि जो हमारी प्रवृत्ति है, जो हम बड़े स्वाभाविक पद्धति से, बड़े आसानी से अपने आप कर देते हैं, उस पे काबू करना और उसको रोकना, वो वास्तव में तपस्या है।
तो हमारे वाणी की तपस्या क्या है? जो हम स्वाभाविक पद्धति से बोल देते हैं, उस पर नियंत्रण रखकर और एक संयमित पद्धति से बोलना, उसको वाणी की तपस्या कहते हैं। तो भगवान कहते हैं ‘अनुद्वेगकरं वाक्यं’, कैसे वाक्य बोलो? अनुद्वेगकरं, जो दूसरों को उद्वेगित नहीं करते हैं, जो दूसरों को विचलित नहीं करते हैं।
आगे बताते हैं ‘सत्यम्’, जो आपको बोलना है सत्य बोलना है। ‘प्रिय’, जो भी बोलना है इस तरह से बोलो कि उनको पसंद आए। ‘हितम्’, और जो बोलना है, कई बार हम उनको पसंद की चीज़ बोल सकते हैं पर वो उनके हित के लिए नहीं होती। जैसे कोई डॉक्टर है, किसी पेशेंट को डायबिटीज है और अगर पेशेंट को बोलता है, ‘आपको जितना शक्कर खाना है खा लो’, वो उसके लिए प्रिय है पर उसके लिए हितकर नहीं है। तो आपको सिर्फ प्रिय नहीं बोलना है, आपको हित की चीज़ भी बोलनी है, ‘हितम्’ होना चाहिए। और यह सब करने के लिए क्या करना चाहिए? ‘स्वाध्यायाभ्यसनं चैव’, इसका मतलब है कि शास्त्रों के वचनों को दोहराना चाहिए, उनका अभ्यास करना चाहिए। यह करेंगे तो हम हमारे जो वचन हैं, इस तरह से बना सकते हैं। यह सब करना वाङ्मय तप कहलाता है।
तो वास्तव में मेरा एक फोर पार्ट (four-part) सेमिनार है ‘सेंसिटिविटी’ (Sensitivity) यानी संवेदनशीलता पर। संवेदनशीलता जो है, उसमें चार प्रकार से संवेदनशीलता मैं लेता हूँ: जनसाधारण लोगों के प्रति संवेदनशीलता, जो बुद्धिमान लोग हैं (खास करके वैज्ञानिक लोग हैं) उनके साथ संवेदनशीलता, जो अन्य आध्यात्मिक धार्मिक मार्गों में लगे हुए हैं उनके प्रति संवेदनशीलता, और चौथा है भक्तों के प्रति संवेदनशीलता।
तो आज जो होगा वो वास्तव में एक परिचय जैसा होगा सब के लिए। जो समान ‘कॉमन प्रिंसिपल्स’ (common principles) हैं, जो समान मूल्य सब के लिए हैं, उसके बारे में मैं चर्चा करूँगा आज। तो यहां पर भगवान बोलते हैं आप सत्य बोलो, आप हित बोलो, पर सबसे पहली वाणी की तपस्या है, वो बोल रहे हैं कि आप इस तरह से बोलो कि आप दूसरों को विचलित न करो, ‘अनुद्वेगकरं वाक्यं’। तो इसमें पहला भगवान काफी महत्वपूर्ण बता रहे हैं कि वाणी की तपस्या क्या है? कि इस तरह से आप बात करो कि दूसरों का मन विचलित न हो।
दूसरों के मन को विचलित न करना
वास्तव में दुनिया में बहुत सी चीज़ें हैं जो लोगों के मन को विचलित करती हैं। और जब वो मंदिर में आते हैं, जो सत्संग में आते हैं, शास्त्रों का अध्ययन करना चाहते हैं, कुछ सद्वचन सुनना चाहते हैं, तो वास्तव में क्या अपेक्षा करते हैं? कि ‘हजारों जगहों से मेरा मन विचलित हो रहा है, अभी मैं कुछ ऐसा सुनूं जिससे कि मेरा मन शांत हो जाए।’ तो उद्वेगित मन को शांत करना है।
भगवद गीता की शुरुआत में भी अर्जुन का मन बड़ा ही उद्वेगित था। वह इतना उद्वेगित हो गया था, उतना विचलित हो गया था कि वास्तव में जो योद्धा होता है, वह योद्धा का इस तरह से प्रशिक्षण होता है कि बड़ा से बड़ा जख्म भी लग जाए उनको, तो भी वह रोते नहीं हैं। उनकी आँखों से आंसू नहीं आते, वह अपनी मर्दानगी का सबूत बोलते हैं कि ‘कितना भी दर्द आए, मैं रोऊंगा नहीं।’ पर वहां पर वो जो वेदना उनको हो रही थी, वह शारीरिक वेदना नहीं थी, वह मानसिक वेदना थी। वह धर्मसंकट में पड़ गए थे कि ‘अभी मैं क्या करूँ?’
और इसके कारण अर्जुन जैसा योद्धा था, वह भी रोने लग गया था। तो उन्होंने क्या किया, वह इस तरह से बड़े ही दुखित होकर भगवान से बोल रहे हैं: ‘अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्’। मतलब अगर ये पानी का गिलास है, और अगर ये पानी का गिलास पूरा पानी से भर गया है, तो अभी क्या हो रहा है? और पानी डालेंगे तो पानी निकल जाएगा उससे और बाहर बहने लग जाएगा। ‘अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्’, तो उनकी आँखें जो थीं, पूरी आंसू से भर गई थीं और इस तरह से वो बड़े विचलित हो गए थे।
और वही अर्जुन की भगवद गीता का संदेश सुनने के बाद क्या परिस्थिति हुई?
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
तो भगवद गीता का संदेश जो है वास्तव में दो चीज़ें करता है: Enlightenment and Encouragement (ज्ञान और प्रोत्साहन)।
ज्ञान और प्रोत्साहन का संतुलन
Enlightenment मतलब ज्ञान देना और Encouragement मतलब प्रोत्साहन देना। वास्तव में ये दोनों जब हम साथ में करते हैं तो व्यक्ति को मदद होती है। अगर हम केवल ज्ञान देते हैं तो उससे क्या होगा? उनको लगता है, ‘अरे मैं कर सकता हूं कि कर ही नहीं सकता हूं?’ व्यक्ति हताश हो जाता है, सोचता है ‘ये संभव ही नहीं है।’ तो उसके विपरीत, अगर हम उसे प्रोत्साहन देते हैं तो व्यक्ति को शांति मिलती है।
मान लीजिए अगर किसी को कोई बहुत ही खतरनाक बीमारी हो गई है, किसी को डायग्नोस (diagnose) हो गया है कि कैंसर हो गया है। तो फिर अभी डॉक्टर की जिम्मेदारी है कि वो कैंसर के क्या-क्या परिणाम हैं, वो बताएं। कि ‘अभी तो ये छोटा सा फोड़ा जैसा लग रहा है, पर बाद में ये हो सकता है, ये हो सकता है, ये हो सकता है।’ वो सब ज्ञान अगर दे दिया है और फिर बताते हैं, ‘वास्तव में ये सब इस तरह से खराब हो सकता है, पर ये जो दवाई या ट्रीटमेंट ले सकते हैं, ये ट्रीटमेंट ले सकते हैं, ये ट्रीटमेंट ले सकते हैं। और ये ट्रीटमेंट अभी आप कीमोथेरेपी (chemotherapy) लेंगे या दवाई से कोई थेरेपी लेते हैं, तो कीमोथेरेपी काफी दर्दनाक होती है, परेशानी होती है उससे, तो आपको ये करना पड़ेगा, ये करना पड़ेगा।’
अगर ये क्यूरेबल (curable) है, आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है, तो डॉक्टर को पेशेंट को प्रोत्साहन देना भी बहुत ज़रूरी है। खास करके ऐसी बीमारियां जिसका जो ट्रीटमेंट है, जो उपाय है, वो आसान नहीं है, जो थोड़ा मुश्किल है। तो उसको ट्रीटमेंट का ज्ञान भी देना और उसको प्रोत्साहन भी देना ज़रूरी है। मान लीजिए डॉक्टर सिर्फ प्रोत्साहन देता है और ज्ञान भी देता है कि ‘ठीक है, सब ठीक हो जाएगा।’ तो ‘सब ठीक कैसे हो जाएगा? दवाई तो लेनी है, दवाई लिए बिना ठीक नहीं होने वाले।’
सर्जरी अगर करनी है किसी की, तो कई बार ऐसे लोग होते हैं, उनको सर्जरी का नाम सुनते ही कांपने लगते हैं कि ‘सर्जरी? ऑपरेशन? नहीं नहीं, ऑपरेशन नहीं करना चाहिए।’ तो अगर ऑपरेशन ज़रूरी है, तो ऑपरेशन करना है। तो डॉक्टर को बताना पड़ेगा कि ऑपरेशन नहीं करेगा तो क्या होगा, ऑपरेशन करेगा तो क्या होगा, वो ज्ञान देना है। पर उसके साथ डॉक्टर को सांत्वना भी देना है कि ‘वास्तव में बहुत सारे ऑपरेशन किये हुए हैं और यह मुश्किल नहीं है, सब कुछ ठीक हो जाएगा।’ सब प्रोत्साहन भी देना है, आश्वासन भी देना है। तो अगर डॉक्टर इनमें से एक ही करता है, दूसरा नहीं करता है, तो अपना कार्य जो है अपूर्ण है।
उसी तरह से भक्ति का संदेश भगवान देते हैं, तो दोनों देते हैं। वे ज्ञान भी देते हैं और वे प्रोत्साहन भी देते हैं और उसके द्वारा वे अर्जुन का आत्मविश्वास बढ़ाते हैं, कि ‘आप यह कर सकते हैं।’
मन को नियंत्रित करना: अर्जुन का प्रश्न
तो जब अर्जुन कहते हैं कि यह भगवान, मन को काबू करना तो नामुमकिन है:
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥
वो कहते हैं कि ‘यह जो मन है, इसकी रफ्तार ऐसी है कि मानो कोई तूफान हो। तूफान को कोई रोक नहीं सकता है। मन को कैसे कोई रोक सकता है?’ तो जब अर्जुन ऐसे कहते हैं छठे अध्याय के 34वें श्लोक में, तो भगवान क्या कहते हैं? यह नहीं कहते हैं कि ‘क्या तुम excuses (बहाने) दे रहे हो? मन को नियंत्रण करो, तुम क्यों ऐसी बात कर रहे हो?’ ऐसे नहीं बात करते हैं। भगवान कहते हैं:
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
‘सही है कि आप जो कह रहे हैं, यह मुश्किल है। बड़ा मुश्किल है। कोई संदेह नहीं है इसमें कि मन को नियंत्रण करना बड़ा मुश्किल है—असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।’ और फिर वो कहते हैं, तो अर्जुन को ऐसे बताते हैं कि ‘अर्जुन, मैं आपको समझ रहा हूँ।’
हम सोचते हैं कि ‘लोग मेरी बात समझें पहले’, पर उसके पहले लोगों को लगना चाहिए कि ‘हम उनकी बात समझे हैं।’ मान लीजिए अगर हम किसी डॉक्टर के पास जाते हैं, और वो बिना हमारी पूरी बात सुने बोलता है ‘सर्जरी करनी है’, तो हमको लगता है ‘अरे! इस डॉक्टर ने मेरी बात तो सुनी ही नहीं।’
तो भगवान क्या कर रहे हैं? भगवान कह रहे हैं कि ‘एक दिन में यश नहीं मिलेगा, तो एक दिन में यश से आसक्त मत रहो, धीरे धीरे आपको यश प्राप्त हो जाएगा।’ भगवान क्या कर रहे हैं यहां पर? अर्जुन को न केवल ज्ञान दे रहे हैं, वो उनको प्रोत्साहन दे रहे हैं, आश्वासन दे रहे हैं।
सही बात को सही ढंग से कहना
तो जब भी हम भक्ति हमारे जीवन में विकसित करने का प्रयास करते हैं और हमें कुछ यश मिलता है, हमें कुछ परिवर्तन महसूस होता है, हम सोचते हैं, ‘हाँ यह तो अच्छा है, इससे मेरा जीवन अच्छा हो रहा है।’ तो हमें बड़ा उत्साह हो जाता है कि ‘मैं दूसरों को भक्ति करने के बारे में बताऊँ।’ उस समय क्या होता है, कई बार जो हम यह प्रयास करते हैं तो हम सिर्फ सोचते हैं, ‘यह व्यक्ति जो कर रहा है गलत है और जो हमें करना है, यह करना है।’
हम कई बार केवल Enlightenment के बारे में देखते हैं, Encouragement के बारे में नहीं देखते हैं। हम कहते हैं, ‘यह ज्ञान है, तुम जो कर रहे हो गलत है। मैं जो बोल रहा हूँ यह सही है, तुम गलत छोड़ो, सही के पास आ जाओ।’ ऐसे बोलते हैं, तो क्या होता है? लोग वो स्वीकार नहीं कर पाते हैं।
मैं यही फोर-पार्ट (four-part) प्रवचन दे रहा था ब्रिस्बेन (Brisbane) में। तो वहाँ पर एक माताजी और प्रभु जी आये, वो पति-पत्नी थे। वो बड़े वैज्ञानिक थे ऑस्ट्रेलिया में, उनकी पत्नी जो हैं वो भी एक डॉक्टर हैं हॉस्पिटल में। और वो बता रहे थे कि वो बंगाली थे, शाक्त परिवार से थे। शाक्त मतलब जो शक्ति देवी की पूजा करते हैं। तो अभी शाक्त समाज में कई बार लोग बचपन से ही मांस खाते हैं, वो तमोगुणी प्रकार की पूजा होती है।
तो वो बचपन से ही मांस खाते थे, पर वो धार्मिक प्रवृत्ति की माता जी थीं। तो वो मंदिर में आईं, दर्शन लिया और फिर वहाँ पर देखा कुछ माता जी भगवान के लिए मालाएं बना रही थीं। तो वो जाकर बैठ गईं वहाँ पर और मालाएं बनाने लगीं। तभी वहाँ पर कोई भक्त आ गए, और सीधा उनको पूछा, “क्या आप मांस खाते हो?” सब के सामने। और फिर अभी वो क्या बोलतीं? तो कुछ बोल नहीं पाईं, तो उन्होंने अपना सिर हिलाया ‘हाँ’ बोलने के लिए। तो उन्होंने क्या किया? जो मालाएं वो बना रही थीं, उनके हाथ से वो माला उठा ली और जमीन पर फेंक दी! पटक दी और कहा कि “जब तक तुम मांस खाते हो, तुम भगवान की मालाओं को स्पर्श भी नहीं कर सकते हो।”
और जब ऐसे बोला, तो माता जी बता रही थीं कि वो रोते-रोते वहाँ से चली गईं। और फिर अभी ये उनकी प्रामाणिकता है कि वास्तव में वे दूसरे भक्तों से मिलीं, जो और संवेदनशील थे, जिन्होंने उनको समझाया। और अभी वे बहुत अच्छे से भक्ति कर रही हैं, वहाँ पर वो अभी उस कांग्रिगेशन (congregation) में लीडिंग भक्त हैं। और वो बता रही थीं कि ‘संवेदनशीलता कितनी ज़रूरी है।’
तो अभी कोई कह सकता है कि, “हाँ भगवान की विग्रह पूजा के लिए हमको स्टैंडर्ड्स रखने हैं, हमको शुद्ध होना चाहिए।” वो सही है! पर क्या है कि सही और गलत, यह केवल एक तत्व की बात नहीं है। जब गुह से रामचंद्र भगवान मिलते हैं, तो गुह उनको मांस का दान करता है, उनको मांस देता है। तो भगवान रामचंद्र खाते नहीं हैं, पर उनके भक्ति भाव को स्वीकार कर लेते हैं। भगवान कहते हैं “तुमने मुझे दिया है”, तो भगवान भी संवेदनशील हैं।
तो कई बार क्या होता है, भक्ति में आने के बाद, हमको कभी भी ऐसे लगता है कि ‘अभी मुझे ज्ञान मिल गया है, पता है, और बाकी सब लोग जो अज्ञानी हैं तो मैं उनको बताऊंगा सही क्या है, ये सब गलत हैं।’ तो भगवान बोलते हैं वास्तव में कि जो दैवी प्रवृत्ति का व्यक्ति होता है, वह क्या करता है? उसका एक गुण होता है: ‘अपैशुनम्’। अपैशुनम् मतलब, दूसरों में कभी दोष नहीं देखना। दोष नहीं देखना ऐसे नहीं, बल्कि दोष देखने में रुचि न लेना। प्रभुपाद जी इसका भाषांतर करते हैं: ‘Aversion to fault-finding’. मतलब, कभी-कभी दोष देखना ज़रूरी होता है, पर दोष देखने में रुचि नहीं लेते हैं।
प्रभुपाद जी का उदाहरण: दोष देखने से बचना
तो प्रभुपाद जी जब भारत में आये पहली बार (वो 1965 में अमेरिका गए, 1966 में उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ की स्थापना की, और फिर 1967 में वो पहली बार आये वापस)। तो उनके कुछ शिष्य उस समय आये थे, वो दो-तीन शिष्यों को लेके आये थे। तो जो एक शिष्य आया था, तो प्रभुपाद जी ने भी दिखाने के लिए लाये थे कि ‘कैसे ये पाश्चात्य देश के लोग भक्ति कर रहे हैं’, और कहीं पर उनके शिष्यों को देखकर काफी भारतीय लोग प्रभावित हो रहे थे।
तो उसमें जो एक शिष्य जो आया था, वह क्या हो गया? वह पुनः अपनी पुरानी पद्धतियों में लग गया। तो वो पहले हिप्पी (hippie) था, तो हिप्पी जैसे बाल बढ़ाने लग गया, दाढ़ी भी बढ़ाने लग गया, और फिर उसका बर्ताव भी ऐसे हो गया। तो जो बाकी भक्त थे उन्होंने प्रभुपाद जी को बताया कि “ये ऐसे बर्ताव कर रहा है, क्या करें?”
कई बार आप देखते हैं ‘बैक टू गोडहेड’ मैगज़ीन में एक लेख होता है: “How I came to Krishna Consciousness” (मैं कृष्ण भक्ति में कैसे आया)। ऐसा एक लेख था। और उस लेख में चित्र था एक व्यक्ति का, भक्त बनने के पहले और भक्त बनने के बाद।
तो फिर प्रभुपाद जी ने अपने उस शिष्य को बुलाया, उससे कहा, “ये लेख पढ़ा है तुमने?”
“नहीं।”
“देखो आप, अपने चित्र को देखो।”
तो आपको इसमें और उसमें क्या फर्क दिखाई देता है? पहले तो वो हिप्पी जैसा था, बाद में वो व्यक्ति भक्त बन गया।
तो शिष्य बोला, “प्रभुपाद जी, ये भक्त बन गया है।”
“हाँ, भक्त बन गया है, मतलब क्या हो गया है?”
“नहीं, अब उसके हाथ में माला है, गले में कंठी माला है।”
“हाँ, और क्या?”
“पहले उसके बाल ऐसे बिखरे हुए थे, दाढ़ी थी। अभी उसकी दाढ़ी चली गई है।”
तो प्रभुपाद जी बोले, “हाँ, यह पॉइंट है।”
तो वो शिष्य समझ गया और बोला, “प्रभुपाद जी, क्या आपकी इच्छा है कि मैं मेरी दाढ़ी काट दूँ? क्या मैं मेरे बाल कम कर दूँ?”
“हाँ, आप यहां पर भारत में हैं, तो आप सुसंस्कृत प्रतीत होने चाहिए।”
तो प्रभुपाद जी ने एक छोटी सी बात बता दी। उन्होंने इतना लंबा-चौड़ा कुछ नहीं किया। कोई डांटा नहीं। बड़े संवेदनशीलता से बताया।
तो क्या है? संवेदनशीलता जो है, वह अगर नहीं होती है, तो बात सही भले ही हो, पर उसका परिणाम गलत होता है। हमें सिर्फ बात सही बोलनी नहीं है, हमें बात सही इस तरह से बोलनी है, कि उसका सही परिणाम भी हो। सही परिणाम नहीं होता है, तो जो लोग हैं वो भक्ति के पास आने के बजाय भगवान से दूर चले जाते हैं। और जब वे भगवान से दूर चले जाते हैं, तो फिर उसका परिणाम यह होता है, कि उनकी आध्यात्मिक प्रगति नहीं होती है।
हम कहें कि ‘मैंने तो सही बोला!’ हाँ, आपने सही बोला, पर सही बोलना ही महत्वपूर्ण नहीं है, सही बोल के सही प्रभाव भी लाना महत्वपूर्ण है। सही प्रभाव यदि हम नहीं ला रहे हैं, तो फिर हम वो व्यक्ति की आध्यात्मिक प्रगति में मदद नहीं कर रहे हैं।
भगवान कई बार कहते हैं भगवद गीता में:
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥
भगवान कहते हैं कि जो दूसरे लोग हैं, उनके मन को विचलित मत करो। वो भले ही अज्ञानी हैं, वो भले ही आसक्त हैं, और भले ही आप ज्ञान में हो, भले ही आप अनासक्त हो, फिर भी आप उनके मन को विचलित मत करो। आप उनको धीरे-धीरे कैसे आगे बढ़ा सकते हैं, उसके लिए मदद करो।
और यह जो हम बता रहे हैं, यह हर चीज़ में है। हम सब दुनिया में रहते हैं, और एक परिवार में हैं, एक समाज में हैं, और हम जहां भी हों, हम दूसरों में दोष देख सकते हैं। तो जब हम दोष देखते हैं दूसरों में, तो उसका परिणाम क्या होता है? उसका परिणाम यह होता है कि दोष देखने के कारण हम दोष बोलते हैं, जब हम दोष बोलते हैं, तो फिर हम दूसरों को दूर भगा देते हैं, वो दूर चले जाते हैं। तो हमें किसी में भी दोष देखना है, अभी कभी-कभी हो सकता है कि हम एक authority position में हों, और हमको बताना पड़ता है कि ‘जो कर रहा है यह गलत है’। पर वो बताना भी है, हमें संवेदनशीलता से बताना है। संवेदनशीलता से नहीं बताते हैं, तो व्यक्ति को बुरा लगता है। और आखिर में जब बुरा लगता है, व्यक्ति पर बुरा प्रभाव होता है, तो व्यक्ति दूर चला जाता है।
प्रोत्साहन के बिना ज्ञान का प्रभाव
और भक्ति ही नहीं, हर चीज़ में। अमेरिका में एक संशोधन हुआ था कि एक पेन्सिलवेनिया यूनिवर्सिटी (Pennsylvania University) में कुछ विद्यार्थी थे जो लिखना सीख रहे थे, वो प्रोफेशनल राइटर्स (professional writers) बनना चाहते थे। तो उस कॉलेज में कुछ लड़कों का ग्रुप था और एक लड़कियों का ग्रुप था।
तो क्या हुआ, वो लड़कों के ग्रुप ने फैसला किया कि “हम सब अच्छे लेखक बनना चाहते हैं। तो इसलिए हम क्या करेंगे, एक दूसरों के लेखन में दोष देखेंगे। जो भी आप लिखोगे, उसमें क्या गलत है मैं बताऊंगा, क्या गलत है मैं बताऊंगा। उससे क्या होगा, हम सबको अपनी गलतियां पता चलेंगी और हम सुधरेंगे।” तो जब लड़के सब दोष देख रहे हैं।
और लड़कियों के ग्रुप ने तय किया, “हम एक दूसरों का लेखन देखेंगे और उसमें अच्छा क्या है बताएंगे।”
और ऐसे करके दस साल बाद वही लड़कों और लड़कियों के ग्रुप का संशोधन किया गया और देखा कि वो जो लड़कों का ग्रुप था, उनमें से एक भी लड़का अच्छा लेखक नहीं बना था! एक भी लड़का अच्छा लेखक नहीं बना था और उनमें से सत्तर प्रतिशत लड़के ऐसे बन गए थे कि उनको कुछ लंबा लेख लिखना है या लंबा लेटर लिखना है, तो उनको वो विचार से ही टेंशन आ जाता था।
और उसके विपरीत जो लड़कियां थीं, उनमें से कुछ पंद्रह लड़कियों का ग्रुप था, उसमें से पांच लड़कियां पब्लिश्ड लेखक (published authors) बन चुकी थीं और बाकी दस जो थीं वो भी उनके मित्रों के सर्कल में सब अच्छी लेखक मानी जाती थीं।
तो क्या हुआ? जिन्होंने दोष देखा उन्होंने क्या किया? एक तरह से ज्ञान के स्तर पर बताया कि ‘ये सही है ये गलत है’, पर प्रोत्साहन कुछ भी नहीं दिया। और जब प्रोत्साहन नहीं दिया तो वो क्या हो गए? हताश हो गए। प्रोत्साहन के कारण लड़कियां गलतियां सुधारती गईं और अच्छी बनती गईं।
तो कोई भी हमको सकारात्मक कार्य करना है, तो प्रोत्साहन देना बहुत ज़रूरी है। प्रोत्साहन अगर हम नहीं देते हैं, तो भले ही हम सही चीज़ बोलते हैं, लोगों को सही करने के लिए प्रेरणा नहीं मिलती है।
मतभेद में भी आदर बनाए रखना
अभी भगवान जब भगवद गीता में बताते हैं कि किस तरह से अगर हम भक्ति कर रहे हैं, तो फिर तत्व ज्ञान के स्तर पे (अभी यह हो गया व्यावहारिक ज्ञान पे, अब तत्व ज्ञान के स्तर पे)। कोई तत्व ज्ञान का कोई हमें एक चीज़ बताता है, कोई दूसरी चीज़ बताता है, और आप सोचते हैं कि ‘शास्त्रों के लिए जो बता रहे हैं वो गलत है।’
भगवान बोलते हैं कि “अर्जुन कुछ लोग कहते हैं कि वो सब कुछ त्याग करना चाहिए, कुछ लोग कहते हैं कि ये सब कुछ त्याग नहीं करना चाहिए।” और उसके बाद में भगवान बोलते हैं कि मेरा मत क्या है:
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥
“यज्ञ, दान, तप जो हैं, उनको कभी त्याग करना ज़रूरी नहीं है। ये सब को पावन करते हैं, सब को शुद्ध करते हैं।” तो इसमें महत्वपूर्ण क्या है? भगवान दो पक्ष बताते हैं: जो कहते हैं सब कुछ त्याग कर दो, और जो कहते हैं सब कुछ त्याग करने की ज़रुरत नहीं है, आप शुद्धिकरण के लिए कार्य करो। तो इन दोनों पक्षों में से भगवान किसका पक्ष लेते हैं? जो कहते हैं कि आप शुद्धिकरण के लिए कार्य करना ज़रूरी है, आपको त्याग करना ज़रूरी नहीं है।
पर ऐसा होते हुए भी, जो लोग बोल रहे हैं कि ‘आपको त्याग करना चाहिए’, उनको भी भगवान बड़े आदरपूर्वक पद्धति से संबोधित करते हैं। भगवान कहते हैं ‘त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः’। मनीषिणः मतलब जो मन के ईश हैं, मन को नियंत्रण किया हुआ है। अब यह बहुत आदरणीय शब्द है। तो जो लोग कहते हैं कि सब कर्म त्याग करना चाहिए, उनको भी भगवान बता रहे हैं कि ये ‘मनीषिणः’ हैं। मतलब भगवान उनकी बात को सही नहीं मान रहे हैं, पर फिर भी उनको आदर देते हैं। मतभेद हो सकता है, पर मतभेद के कारण हमको दूसरों का अनादर करना ज़रूरी नहीं है। हम लोगों का आदर कर सकते हैं और उनके मत से हम भेद भी कर सकते हैं।
तो भगवान आपको उदाहरण बता रहे हैं कि जिसकी बात को वो सही नहीं बोल रहे हैं, उनको भी क्या कह रहे हैं? ‘मनीषिणः’। तो इस तरह से ‘अनुद्वेगकरं वाक्यं’ भगवान कहते हैं कि आप जो वचन बताते हो, अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। प्रिय मतलब जो व्यक्ति को सम्माननीय है, जो व्यक्ति को प्रिय हो, ऐसे अच्छे वचन बोलने चाहिए। इससे उनका हित होता है।
महाभारत का उदाहरण: द्रौपदी और युधिष्ठिर
महाभारत में वर्णन आता है कई प्रसंगों का जब व्यक्ति कई बार असंवेदनशील हो सकता है, पर वो असंवेदनशील होता नहीं है। एक प्रसंग है, वास्तव प्रसंग है, पर इसमें हम चर्चा करेंगे किस तरह से कोई व्यक्ति आदर रख सकता है। हम सब जो द्रौपदी के वस्त्रहरण की लीला है, हम जानते हैं। तो उसमें उसकी पृष्ठभूमि काफी विस्तार में महाभारत में बताई गई है।
तो उस समय होता क्या है कि जब युधिष्ठिर महाराज राजसूय यज्ञ करते हैं। राजसूय यज्ञ करने के बाद वे आते हैं, अपने राज्य में होते हैं इंद्रप्रस्थ में। और दुर्योधन ईर्ष्या की आग से जल रहा होता है। और तभी शकुनि उसको युक्ति बताता है कि “आप उनको द्यूत (जुआ) खेलने के लिए बुलाओ।” और जुआ खेलने के लिए बुलाते हैं।
तो पहले जब वो सुनते हैं तो धृतराष्ट्र बोलते हैं कि जुआ खेलने के लिए नहीं बुलाना चाहिए। पर जब विदुर जाते हैं युधिष्ठिर के पास, तभी युधिष्ठिर सुनते हैं। तो युधिष्ठिर पहले कहते हैं कि “अगर हम जुआ खेलेंगे तो उसके कारण युद्ध होगा, हमें नहीं खेलना चाहिए।” पर युधिष्ठिर सोचते हैं कि वास्तव में जो धृतराष्ट्र हैं, वो मेरे पिता के समान हैं। क्योंकि अगर उनके पिता नहीं होते तो उनके चाचा ही पिता के समान हैं। तो वास्तव में कई बार आपको सवाल आता होगा कि युधिष्ठिर ने जुआ खेला क्यों? तो वास्तव में उनकी खेलने की इच्छा नहीं थी, वो विवश हो गए थे।
जब इंद्रप्रस्थ में राजसूय यज्ञ हो गया, तो उसके बाद में व्यासदेव ने एक भविष्यवाणी की थी। व्यासदेव ने कहा था कि “तुमने जो ऐश्वर्य प्राप्त किया है, वो ज्यादा समय तक तुम्हारे पास नहीं रहेगा। वो ऐश्वर्य चला जाएगा और उसके बाद में बहुत ही भीषण युद्ध होगा। उस युद्ध के बाद तुम राजा बनोगे और तुमको ऐश्वर्य मिलेगा। और इस युद्ध में बहुत विध्वंस भी होगा।”
जब यह सुनते हैं युधिष्ठिर तो बड़े गंभीर हो जाते हैं: “युद्ध टालने के लिए मैं क्या कर सकता हूँ?” युद्ध तब होता है जब बहस होती है। बहस तब होती है जब मतभेद होता है। “मतभेद को टालने के लिए मैं एक व्रत लेता हूँ कि मैं कभी मेरे वरिष्ठों के आदेश का उल्लंघन नहीं करूँगा।”
तो अभी उन्होंने कभी ये सोचा नहीं होगा कि मेरे वरिष्ठ मुझे जुआ खेलने का आदेश देंगे। तो उन्होंने जो व्रत लिया था युद्ध टालने के लिए, उसका उल्टा प्रभाव हो गया। वो वैसे भी वो अपने वरिष्ठों का आदर करते थे, पर इस बार में वो विवश हो गए।
तो इसलिए वो आ गए हस्तिनापुर और हस्तिनापुर में जब दुर्योधन ने कहा कि “हम जुआ खेलते हैं और शकुनि मेरी तरफ से जुआ खेलेगा।” तो युधिष्ठिर ने कहा कि “ये तो नियम के खिलाफ है।” ये नियम के खिलाफ है क्योंकि सब जानते थे कि शकुनि जो था, वो एक ट्रेंड गैम्बलर (trained gambler) था, वो एक प्रोफेशनल था। अगर कोई गली में क्रिकेट खेलता है और गली में क्रिकेट खेलने में कोई बॉलर और बैट्समैन है, और कहा जाए कि “मैं बॉलिंग करूँ तो तुम बैटिंग करो”, तो वो ठीक है। पर गली के क्रिकेट में अगर कोई नेशनल लेवल के बॉलर को बुला ले, तो फिर वो अनफेयर (unfair) होगा, वो सही नहीं होगा। तो वैसे ही जुए के खेल में युधिष्ठिर का शकुनि के साथ खेलना यह उचित नहीं था।
तो युधिष्ठिर कहते हैं “यह उचित नहीं है, तुम्हें खेलना चाहिए दुर्योधन।” तो तभी दुर्योधन क्या करता है? दुर्योधन युधिष्ठिर को उकसाने के लिए कहता है, “तो क्या तुम डरते हो?” तो अगर वो नहीं खेलेंगे तो अभी युधिष्ठिर धृतराष्ट्र को देखते हैं, और धृतराष्ट्र शांत हैं, कुछ भी नहीं बोलते हैं। तो इसलिए युधिष्ठिर विवश होकर जुआ खेलने लगते हैं।
जब जुआ खेलने लगते हैं तो धीरे-धीरे एक चीज़, दूसरी चीज़, सब चीज़ हार जाते हैं वो। और सब चीज़ जब हार जाते हैं तो बाद में वे सोचते हैं ‘क्या करें, सब कुछ हार गया है।’ शकुनि भी उकसाता है, “तुमने माद्री के पुत्रों को जुए पे लगाया है पर अपनी कुंती के पुत्रों को जुए पे नहीं लगा रहे हो। क्या माद्री के पुत्र इतने प्रिय नहीं हैं, सिर्फ अपनी माँ के पुत्र प्रिय हैं?”
तो युधिष्ठिर कहते हैं, “हम पांचों पांडव एक हाथ की पांच उँगलियों के समान हैं। कोई हम में भेद नहीं डाल सकता। तुम हम में भेद डालकर तुम खुद की मूर्खता दिखा रहे हो।” इस तरह से वो क्रोधित हो जाते हैं।
शकुनि की चाल होती है कि जुआ चलते रहे। तो वे बोलते हैं कि “वास्तव में खेल के जोश में कुछ बोल दिया, मुझे माफ़ कर दो, आप खेल जारी रखो।” इस तरह से बोलकर फिर वो अर्जुन को दांव पर लगवाते हैं। तो जब वास्तव में सब कुछ हार जाते हैं, तो तभी अर्जुन युधिष्ठिर को कहते हैं कि “बहुत हो गया अभी।” पर युधिष्ठिर सोच रहे होते हैं कि “सब कुछ मैं हार गया, लेकिन जिम्मेदारी यह है कि मैं राजा था, सबका देखभाल करना चाहिए। तो मैंने सब कुछ गवां दिया, एक दांव में जीत जाऊँगा तो कुछ तो मिल जाएगा वापस।”
तो वास्तव में क्या होता है, एक तरह से उनको जुआ खेलते समय वो नशा चढ़ जाता है। और सब कुछ हारने के बाद वो अर्जुन को दांव पर लगाते हैं, अर्जुन को हार जाते हैं। फिर वो भीम को हार जाते हैं और फिर खुद को भी हार जाते हैं।
और फिर तभी शकुनि कहता है कि “अभी आप द्रौपदी को दांव पर लगाओ।” तो तभी जब इस तरह विचार भी आता है तो पूरी सभा में हाहाकार मच जाता है, “कैसे द्रौपदी को दांव पर लगा सकते हैं?” तो फिर तभी युधिष्ठिर सोचने लगते हैं कि ‘अभी हम सब तो गुलाम बन गये हैं, अभी द्रौपदी का संरक्षण करने वाला है भी कौन? तो अगर इसको दांव पर लगा कर मैं सब कुछ वापस पा सकता हूँ तो उसके लिए कुछ आशा है, नहीं तो अभी वो करेगी भी क्या?’ तो इस तरह से वो सोचके द्रौपदी को दांव पर लगाते हैं और द्रौपदी को हार जाते हैं।
तो तभी पहले से ज़्यादा हाहाकार मच जाता है। शकुनि वास्तव में नीच प्रवृत्ति का व्यक्ति होता है, पर दुर्योधन के दुस्संग के कारण उसकी प्रवृत्ति बहुत बिगड़ जाती है। और यहां पर दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिए वो क्या सोचता है? “आप द्रौपदी को बुलाओ यहां पर और द्रौपदी का आप वस्त्रहरण करते हैं क्योंकि वो आपकी दासी बन गई है।”
तो फिर दुशासन को भेजते हैं वहां पर। अभी इस पूरी लीला में, वास्तव में हम कई बार उस ओर देखते हैं कि कैसे द्रौपदी को कृष्ण ने बचाया और कृष्ण कैसे चमत्कारिक रूप से आये थे। वह बड़ा चमत्कार है! पर हम यह लीला में देखते हैं तो the character who stands out the most is Draupadi (जो चरित्र सबसे शानदार रूप से उभरता है वो द्रौपदी का है)। द्रौपदी का चरित्र सबसे श्रेष्ठ रूप से दिखता है। न केवल इसलिए कि भगवान ने उनको बचाया, पर उसके पहले भी वो हर पल बड़ी बुद्धि से कार्य करती है।
तो क्या होता है, जब द्रौपदी के महल में जाता है दुशासन, पहले वो एक प्रातिकामी (सेवक) जो होता है महल का, उसको भेजते हैं। तो द्रौपदी जब सुनती है कि उसको जुए में हार गए हैं, वो आश्चर्यचकित होती है। वो कहती है “कैसे? संभव नहीं है। क्या युधिष्ठिर के लिए कुछ और नहीं था जुए में लगाने के लिए कि सब कुछ उसने हार दिया, फिर वो मुझे हारा है?”
तो फिर द्रौपदी बड़ी बुद्धिमान है। वो सोचने लगती है ‘क्या करें?’ वो समझती है तुरंत कि बड़ी विपत्ति आ गई है, कुछ ना कुछ करके तो बचना है। तो इसलिए वो कहती है, तुरंत उसकी बुद्धि चलती है, वो कहती है: “आप जाके सभा से पूछो कि अगर युधिष्ठिर ने खुद को गवां दिया था, तो फिर वो मुझे दांव पर कैसे लगा सकते हैं? वो खुद के मालिक नहीं हैं, वो खुद के स्वामी नहीं हैं, तो मेरे स्वामी कैसे हो सकते हैं?”
तो फिर ये सवाल लेकर वो प्रातिकामी जाता है। तो दुर्योधन कहता है कि “तुम जाओ और द्रौपदी को बताओ कि युधिष्ठिर ने तुमको दांव पर लगा दिया है, तुमको यहां पर आना पड़ेगा।” तो जब जाता है तो द्रौपदी उस सेवक को बोलती है कि “वास्तव में मैं जानती हूँ युधिष्ठिर को कि युधिष्ठिर ने अपनी इच्छा से जुआ नहीं खेला है। विवश होकर जुआ खेलना पड़ा है। इसलिए मैं यह सवाल सभा को पूछ रही हूँ कि युधिष्ठिर अगर अपने स्वामी नहीं थे तो वो मुझे दांव पर कैसे लगा सकते हैं?”
तो पुनः जाता है सेवक। तो इस तरह से द्रौपदी क्या कर रही है? She is buying time (वो समय ले रही है)। वो समय लेगी, कुछ और योजना बनाएगी जिससे विपत्ति को टाल सके। और फिर उस समय क्या होता है, दुर्योधन बोलता है कि “जाओ उसको लेके आ जाओ।” तो सेवक डरता है। तो दुर्योधन दुशासन को बोलता है कि “ये डरपोक है, ये भीम के क्रोध से डर रहा है। दुशासन तुम नहीं डरते हो तो तुम जाओ।”
तो दुशासन को भेजते हैं और दुशासन खींच के द्रौपदी को लेके आता है। तो तभी द्रौपदी रो रही होती है, पर तभी भी अपने को थोड़ा संभाल के वो सभा में सब वरिष्ठों का आदर करती है और फिर वो अपना सवाल पुनः दोहराती है। और जब इस तरह से सवाल दोहराती है, तो अभी दुर्योधन देखता है कि द्रौपदी को इस तरह से अपमानित किया जा रहा है। ईर्ष्या का ये स्वभाव होता है कि दूसरों के दुख में खुद को सुख मिलता है। तो पांडवों को इस तरह से पीड़ित देखकर दुर्योधन को बड़ा सुख मिलता है।
तो दुर्योधन तभी क्या करता है? दुर्योधन तभी कहता है कि “हे द्रौपदी! अगर तुम कह दोगी कि धर्मराज युधिष्ठिर ने अधर्म किया है, धर्मराज युधिष्ठिर ने तुम्हें दांव पर लगा के अधर्म कर दिया है, तो मैं तुम्हें छोड़ दूँगा! मैं पांडवों को भी छोड़ दूँगा!”
तो उस समय वो क्या कर रहा है? वो पत्नी और पति के बीच में एक दरार लाने का प्रयास कर रहा है। पर द्रौपदी जो है, वही जो गेंद उसके पास फेंकी है, वापस उसके पास ही फेंक देती है। वो द्रौपदी क्या बोलती है? “कि ये जो फैसला है धर्म का, ये जुआ खेलने का फैसला, ये इसी सभा के वरिष्ठों ने किया था। उनके आदेश से जुआ खेलना है। उनके आदेश से ही जुआ खेलने यहां पर आये थे। उन्होंने फैसला किया था कि ये जुए का खेल शकुनि के साथ खेलना उचित है। तो उनको ही फैसला करना होगा कि ये सही है या नहीं है!”
बाद में जब वनवास में जाते हैं तभी द्रौपदी युधिष्ठिर को काफी कोसती है कि “तुम इस तरह से कैसे जुआ खेल सकते थे?” और तभी युधिष्ठिर भी बड़े नम्र होकर कहते हैं कि “वास्तव में वो जुए का नशा मुझे लग गया और मैं तभी खेल गया, मैंने बड़ी गलती कर दी।”
पर जो पब्लिक में होते हैं, सब के सामने होते हैं, तो तभी द्रौपदी क्या करती है? द्रौपदी उनके सामने अपने बीच में भेद नहीं होने देती है।
अर्जुन और भीम की प्रतिक्रिया
और फिर उस समय इस तरह से जब द्रौपदी और युधिष्ठिर चल रहे होते हैं, तो तभी वास्तव में भीम बड़ा क्रोधित हो जाता है। और भीम कहता है नकुल से, “नकुल आग लाओ! युधिष्ठिर ने इन हाथों से द्रौपदी को दांव में लगाया है, मैं युधिष्ठिर के हाथों को जला दूँगा!”
और यह सुनकर दुर्योधन बड़ा खुश हो जाता है। अगर भीम को कोई उपदेश देने का प्रयास करेगा, बोलेगा कि ‘बड़े भाई का आदर करना चाहिए’, तो अभी वो मानसिकता नहीं है उसकी। तो अर्जुन जानते हैं कि भीम को क्या बोलना चाहिए जिससे कि भीम शांत हो जाए। तो अर्जुन क्या बोलते हैं भीम को? “हे भीम! तुम ऐसे वचन क्यों बोल रहे हो जिससे कि दुर्योधन प्रसन्न हो रहा है?”
तो भीम दुर्योधन को देखता है कि दुर्योधन इतना खुश हो गया है, तो भीम तुरंत शांत हो जाता है। तो यहां पे क्या है? यह बहुत ही बड़ी विकट परिस्थिति आती है सारे पांडवों पे।
हम सब के जीवन में कभी ऐसे हो सकता है कि हम कोई गलती कर बैठते हैं और बड़ी गलती भी हो सकती है। युधिष्ठिर से जो बड़ी गलती हुई, तो जो हम लीला है महाभारत की उसको दो स्तर पर देख सकते हैं।
एक स्तर पर यह है कि जो भी हुआ वह भगवान की लीला थी और सबने जो कार्य किया उन सबको भगवान ने उस तरह से प्रवृत्त किया। क्यों? यह दर्शाने के लिए कि वास्तव में हमारा इस दुनिया में भगवान के अलावा कोई संरक्षक नहीं है। द्रौपदी के पांच संरक्षक थे पर एक भी उनका संरक्षण नहीं कर पाए। तो इस तरह से यह बड़े ही भयावह, रोमांचक पद्धति से यह दर्शा रहे हैं महाभारत की लीला कि हमारा एक ही संरक्षक है, वो है हमारा भगवान। यह एक दिव्य स्तर पर हम इस लीला को देख सकते हैं।
एक और नैतिक स्तर पर हम यह सीख प्राप्त कर सकते हैं कि क्या सही है क्या गलत है। कुछ लोग कहते हैं कि “अगर युधिष्ठिर ने भी जुआ खेला तो हम क्या हैं? धर्मराज वो भी जुआ खेलते हैं तो हम भी जुआ खेलेंगे!” तो वास्तव में महाभारत की अगर पूरी कथा को हम देखते हैं तो इसका भाव वास्तव में कुछ और है। इसका भाव यह नहीं है कि युधिष्ठिर ने जुआ खेला तो हम भी खेलें।
तो शास्त्रों में अगर कोई चीज़ सिखानी होती है तो कई बार क्या होता है वह बड़े ही उसमें नाटकीय पद्धति से बताता है कि कोई व्यक्ति गलती करता है तो इतनी बड़ी गलती करता है कि हम सोचते हैं ‘कैसे कोई इतनी बड़ी गलती कर सकता है?’ पर वह गलती के द्वारा जो सही क्या है गलत क्या है वह बहुत स्पष्ट पद्धति से दिखाई देते हैं।
जैसे कि भागवतम के पांचवें स्कंध में वर्णन आता है कि भरत महाराज जो बड़े ही महान राजा होते हैं और वे बड़े ही अनासक्त भी होते हैं। वो सब कुछ छोड़ के जंगल में भगवत् प्राप्ति के लिए तपस्या करने आ जाते हैं और वहाँ पर क्या होता है वो एक हिरन से आसक्त हो जाते हैं। कोई बोलेगा कि ‘अरे राज्य को त्याग दिया, अपनी रानी को त्याग दिया, सारे ऐश्वर्य को त्याग दिया, कोई हिरन से कैसे आसक्त हो सकता है?’ पर वहाँ पर दर्शाया क्या जा रहा है कि आसक्ति कहीं से भी आ सकती है। तो यहाँ पर यह कैसे हिरन से आसक्त हो गया है तो उसमें ज्यादा जोर देने की ज़रूरत नहीं है। महत्वपूर्ण क्या है कि कोई भी व्यक्ति अगर सावधान नहीं रहेगा, तो किसी भी चीज़ से आसक्त हो सकता है।
तो उसी तरह से यहाँ पर युधिष्ठिर ने ऐसे कैसे कार्य किया, द्रौपदी के लिए ऐसे कैसे अन्याय किया, तो वास्तव में उस पे जोर नहीं है। जोर क्या है इसमें कि युधिष्ठिर जैसे व्यक्ति भी अगर गलत प्रभाव में आ जाता है, गलत परिस्थिति में फंस जाता है, तो वो भी गलत कर सकता है। तो इसलिए जुआ कितना खतरनाक है!
तो हर लीला को हम अलग-अलग स्तर पर देख सकते हैं। सही निष्कर्ष है वो हमको निकालना है। सही निष्कर्ष आचार्यों के, गुरु के मार्गदर्शन में पता चलता है। तो यहां पे एक तरह से देखेंगे तो भले ही युधिष्ठिर ने व्रत लिया हो कि ‘मैं मेरे बुजुर्गों का हमेशा आदर करूँगा’, उस समय युधिष्ठिर नैतिक चीज़ें भूल गए। सही क्या है वो गलत क्या है, वो हम केवल ऐसे कोई ग्रंथ में लिखा नहीं होता है। ग्रंथ में लिखा होता है और उसको हमारे जीवन में कैसे अमल करना है उसके लिए कई बार हमको हमारी बुद्धि का इस्तेमाल करना होता है। बुद्धि का इस्तेमाल नहीं करेंगे हम, तो हम बोलेंगे जो सही है, वो सही एक तरह बौद्धिक स्तर पर सही हो सकता है पर वो व्यावहारिक स्तर पर गलत हो सकता है।
मान लीजिए कोई दंगल चल रही है और उसमें कोई लोग किसी के पीछे आ गए हैं और व्यक्ति हमारा मित्र है, हमारे घर में आता है और हमारे घर में वो छुप रहा है। और जो दंगल कर रहे हैं वो लोग आकर पूछते हैं “यह तुम्हारे घर में है?” तो अगर हम सत्य बोलेंगे तो वहाँ पर क्या होगा? सत्य बोलना अच्छी बात है पर यहाँ पर सत्य बोलने से मृत्यु हो जाएगी! तो सत्य नहीं बोलना है वहां पर। हम क्या करना पड़ेगा? हमको वहाँ पर असत्य बोलके हित करना है।
तो इसमें यहाँ महाभारत में क्या है? अभिमन्यु का वध होता है। तो अभिमन्यु का वध होता है तो तभी अर्जुन बड़े विलाप करते हैं। तो अर्जुन जो विलाप करते हैं तो भगवान अर्जुन से नहीं कहते हैं “हे अर्जुन, मैंने भगवद गीता बतायी थी कि आप शाश्वत आत्मा हो तो तुम भूल गया क्या? मैं बोला था कि जो व्यक्ति जानता है कि आप शाश्वत आत्मा हैं वो धीरस्तत्र न मुह्यति! क्योंकि शरीर का जो नाश है उससे वो मोहित नहीं होता है। उससे विचलित क्यों हो रहे हो? सारा भगवद गीता सुनना क्या फायदा हुआ उसका?”
ऐसे नहीं बोलते हैं अर्जुन को। क्यों? क्योंकि वहाँ पर अर्जुन को ज्ञान की कमी नहीं है। ज्ञान पता है अर्जुन को पर वहाँ पर अर्जुन को सांत्वना चाहिए। अर्जुन को कहते हैं कि “हे अर्जुन तुम जो हुआ अभी जो हुआ अभी उसको तो आप टाल नहीं सकते हैं। पर आप आपके विलाप से दूसरों का और शोक मत बढ़ाओ, अपने कर्तव्य की शुरुआत करो।”
और पर जब अर्जुन कहते हैं, अर्जुन पहले तो बड़े शैटर्ड (shattered) हैं। अर्जुन इतने दुखी हो जाते हैं कि गिर जाते हैं। पर बाद में जब उनको पुनः विचार करते हैं। सबसे पहले तो क्या होता है उनको इतना ही सुनते हैं कि अभिमन्यु का वध हो गया और उससे पूरा टूट जाते हैं वो। पर बाद में युधिष्ठिर ने सारी कहानी बताई होती है, क्या षड्यंत्र रचाया होता है। तो बाद में वो सारा विचार करने लगते हैं “अच्छा ऐसे हुआ! एक साथ छः योद्धाओं ने साथ में मारा और कोई भी अभिमन्यु को बचाने न जा पाया क्योंकि जयद्रथ बीच में आ गया था!” तो धीरे-धीरे उनका शोक है वो क्रोध में परिवर्तित हो जाता है।
क्रोध में परिवर्तित हो जाता है तो क्या होता है? तभी अर्जुन प्रतिज्ञा करता है कि “मैं कल शाम तक क्या करूँगा? मैं जयद्रथ का वध करूँगा नहीं तो मैं अग्नि में प्रवेश करूँगा!” तो उस समय क्या होता है जिस तरह से बोलता है तो वो अपना शंख बजाते हैं तो कृष्ण भी अपना शंख बजाते हैं। तभी कृष्ण क्या करते हैं? कृष्ण अर्जुन का साथ देते हैं, अर्जुन का उत्साह बढ़ाते हैं, “हाँ ज़रूर तुम ऐसे करोगे!”
पर बाद में सारे अपने तंबू में चले जाते हैं। तो कृष्ण अर्जुन के तंबू में आते हैं। बाहर रूप से अलग हैं और अंदर से अलग हैं, दोनों तरह के साधु हैं। अब जो प्रतिकूल चीज़ें हैं वैसे क्यों हैं? क्योंकि क्या है कि भले ही कोई भगवे वस्त्र पहन ले या कोई धार्मिक संस्था में जुड़ जाये, वहां पर कोई पद पर तो आ जाये, इसका मतलब यह नहीं है कि उसके द्वारा ही व्यक्ति के जो विकार हैं, सब चले गए हैं। जो सुकृतियां हैं, वो अभी तक हो सकती हैं। और हमें दूसरों को जज (judge) नहीं करना है। मतलब हम खुद को न्यायाधीश बना कर दूसरों पे “तुम गलत हो, यह सही है, यह गलत है” ऐसा नहीं करना चाहिए।
(यहाँ से आगे जो ‘अगर आपको शास्त्र पढ़ने के लिए अहंकार नहीं करते हैं…’ का अत्यधिक दोहराव था, उसे नियम के अनुसार हटाया गया है।)
भौतिक और आध्यात्मिक जिम्मेदारियों का संतुलन
खेलने की आदत पड़ गई थी वो ऐसी कि अपनी जो क्षमता है जहाँ तक हम कुछ चाहते हैं, उस क्षमता से कृष्ण की सेवा में नहीं हैं और रिस्क ले रहे हैं। जो जुआ है, इन्द्रियतृप्ति का एक भाग है तो उसमें हमारी पूरी क्षमता लग जाती है। हम जुए में कम्फर्ट ज़ोन (comfort zone) में काफी फिक्स हो चुके हैं, वो कम्फर्ट ज़ोन बढ़ता है या जुआ बढ़ता है कि ये जुए से सेवा नहीं है। तो अगर हमारी क्षमता के लिए जुआ सेवा नहीं कर रहे हैं पर वो क्षमता से पूरा हमारी भौतिक जगत में लगे हैं, वहाँ पर खतरा लेकर हम प्रगति करने का प्रयास कर रहे हैं तो इससे हम कैसे निकलेंगे?
एक चीज़ है कि हमें भगवद गीता बताती है:
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ।
आप अपने कर्म के द्वारा भी भगवान की पूजा कर सकते हैं। ‘कर्म ही पूजा’ नहीं कहते हैं, ‘भगवान की कर्म के द्वारा पूजा’ कहते हैं। मतलब क्या है? एक तरह से हमारे भौतिक जीवन और आध्यात्मिक जीवन को हमें विभाजन करना है ताकि हम आध्यात्मिक जीवन के लिए भी समय दे सकें। हम सोचते हैं कि वास्तव में भौतिक और आध्यात्मिक जीवन के लिए क्या है? वो वास्तव में एक भावना है।
अगर मैं सेवा भाव का अनुशीलन कर रहा हूँ, सेवा भाव से मैं कार्य कर रहा हूँ, मैं सोचता हूँ कि ये परिस्थिति में मुझे अब भगवान की योजना से इस परिस्थिति में हूँ, और इस परिस्थिति में मैं ये नौकरी कर सकता हूँ, मैं इस क्षेत्र में अपनी क्षमता दिखा सकता हूँ। तो मैं वो भी एक सेवा भाव में कर सकता हूँ। तो ऐसे नहीं है कि मुझे हर चीज़ का निकाल करना है कि मैं ये सोचूं “अरे ये तो भौतिक है, क्यों करूँ मैं?” ये नहीं है। मैं सोचता हूँ कि इसमें मैं सेवा भाव कैसे बढ़ा सकता हूँ।
उससे क्या होगा? हम जो भौतिक कार्य हैं वो सकारात्मक पद्धति से करेंगे। अब सकारात्मक पद्धति से करना मतलब क्या? कि कई बार हमको भौतिक जीवन में जिम्मेदारियां होती हैं, कई बार हमको भौतिक जीवन में महत्वाकांक्षाएं होती हैं। कुछ लोग अपने आध्यात्मिक जीवन में इतनी रुचि प्राप्त कर लेते हैं, कुछ ऐसी भौतिक जीवन की जिम्मेदारियां हो सकती हैं जो व्यक्ति तुरंत छोड़ नहीं सकता है। तो व्यक्ति उसको पूरी करके फिर उसको बढ़ाता है कि “अच्छा ठीक है यह कर लिया, अब भक्ति कर लेता हूँ।” ऐसे भी हो सकता है।
तो हमें क्या करना है? जो भी हम कर रहे हैं उसको पूरे दिल से (whole heartedly) करना है, उसको पूरे उत्साह के साथ करना है। अगर हमारे परिवार के प्रति कुछ जिम्मेदारी है, हमारी नौकरी के प्रति कुछ जिम्मेदारी है, अगर हम उसको अच्छी तरह से नहीं करते हैं तो उसका परिणाम क्या होता है? कई बार वही काम हमको दोबारा करना पड़ता है! तो फिर क्या, उसमें और समय जाता है।
तो इसलिए जब भी हम कुछ जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं हमको ज़रूर इतना जिम्मेदार होना चाहिए, ये विभाजन करना चाहिए कि “ये समय मेरी भक्ति के लिए है, ये समय मैं निकालता हूँ उसके लिए।” ऐसे नहीं है कि मैं दिन भर, 24 घंटे, हफ्ते भर, महीने भर, साल भर मैं सिर्फ भौतिक जीवन करूँ और मैं बोलूं “यही मेरी भक्ति है।” ऐसे नहीं है! हमको भक्ति के कार्य में समय देना है और उसके लिए समय का विभाजन करना है। पर उसके बाद में मैं सोचता हूँ कि मेरा सारा जीवन ही मैं भगवान की सेवा में लगा सकता हूँ, तो हमारे भौतिक कार्यों को भी हम उस विचारधारा में ला सकते हैं।
अलग-अलग परिस्थितियों से गुज़रते हैं। तो कभी जैसे अगर आप रास्ते में जा रहे हैं तो कभी-कभी क्या होता है ट्रैफिक बहुत ज्यादा होता है तो हम चाहें तो भी ज़्यादा तेज़ नहीं जा सकते हैं, धीरे-धीरे जाना पड़ता है। और कभी कोई रास्ता साफ़ जाता है तो हम तेज़ जा सकते हैं। तो वैसे ही कैसे है, हमको भगवान के पास जाना है, पर हमारे जीवन के रास्ते में कभी-कभी भौतिक चीज़ों का, भौतिक जिम्मेदारियों का ट्रैफिक बहुत बढ़ सकता है! तो तभी हम बाहरी रूप से जो आध्यात्मिक कार्य हैं उतना नहीं कर पाएंगे। तो उसका मतलब यह नहीं है कि हम आध्यात्मिक जीवन छोड़ दें। हम फिर भी आगे जा रहे हैं पर तब धीरे-धीरे जा रहे हैं। पर बाद में क्या होगा? जब रास्ता साफ़ हो जाएगा तभी भी धीरे-धीरे नहीं जाना है, तभी हमको तेज़ जाना है। तो हम दिशा एक रख सकते हैं और अलग-अलग समय पे रफ़्तार अलग-अलग हो सकती है। तो इसलिए कभी-कभी भौतिक जिम्मेदारियों को ज्यादा समय देना पड़ता है, तो इसका मतलब ये नहीं है कि हम आध्यात्मिक नहीं हैं।
प्रभुपाद जी का इलाहाबाद का प्रसंग
जब प्रभुपाद जी (प्रभुपाद जी तो महा भागवत, परम भक्त हैं) वो जब इलाहाबाद में थे, वो अपनी फार्मेसी चला रहे थे। तभी लीलामृत में एक वर्णन आता है कि वे उनके जो पड़ोसी थे, दूसरा दुकान था जिनका, उनका इंटरव्यू हमारे यहाँ बताया गया है। तो बताते हैं कि “अभय चरण जो थे, वे बड़े ही धार्मिक पुरुष थे पर उस समय उनको एक चिंता थी कि मैं और पैसे कैसे कमाऊँ। और पैसे कैसे कमाऊँ?”
तो क्यों? क्योंकि उस समय वो गृहस्थ आश्रम में थे, उनको जिम्मेदारियां थीं और उनको यह भी इच्छा थी कि वो अगर और धन-संपत्ति कमाएंगे तो अपने गुरु के आंदोलन में वो और मिशन में भी और सेवा दे सकते हैं, योगदान दे सकते हैं। तो अभी ऐसे नहीं है कि प्रभुपाद जी हमेशा अपने जीवन भर 24 घंटे बाहरी रूप से आध्यात्मिक कार्य कर पाए। उनकी भी परिस्थिति ऐसी आ गई थी कि उनको अपनी भौतिक जिम्मेदारियों के लिए बिज़नेस करना पड़ रहा था। अगर आप प्रभुपाद जी को देखते हैं तो एक बार उन्होंने बॉम्बे में अपनी दुकान चालू की, कलकत्ता में पहले उनका था, तो बॉम्बे में गए, फिर इलाहाबाद में गए, बहुत कुछ प्रयास किया उन्होंने।
तो इसलिए हमें ऐसे भौतिक चीज़ को सब कुछ नहीं मानना है और अध्यात्म को छोड़ना नहीं है। पर जब भौतिक चीज़ों का कार्य कर रहे हैं, तभी हर बार यह नहीं सोचना कि “यह भौतिक है, भौतिक है” सोच के उसको कम नहीं करना है। उसमें भी पूरे उत्साह से कार्य करना है और देखना है कि “ये भी मैं भगवान की सेवा के लिए ही कर रहा हूँ।” उससे हम उत्साही रह सकते हैं और हमारा अध्यात्म जाग्रत रह सकता है।
हरि बोल!
निष्कर्ष:
भगवान श्रीकृष्ण और हमारे आचार्यों के उदाहरण हमें सिखाते हैं कि ‘वाणी की तपस्या’ केवल सत्य बोलने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें संवेदनशीलता, प्रोत्साहन और श्रोता के प्रति सम्मान का होना सबसे अनिवार्य है। चाहे वह महाभारत का युद्ध हो, द्रौपदी का धैर्य हो, या प्रभुपाद जी का अपनी जिम्मेदारियों को उत्साह से निभाना—हमें हर स्थिति में ज्ञान और प्रोत्साहन का संतुलन बनाकर ही भौतिक और आध्यात्मिक जीवन में सही प्रगति प्राप्त करनी चाहिए।