Select emotions with intelligence – Hindi
[Talk at Swaminarayan Center, Panama City, Panama]
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Lecture Summary
यह सत्संग मुख्य रूप से भगवद् गीता के श्लोक (18.58) “मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि…” पर आधारित है। इसमें जीवन की समस्याओं को पार करने, भावनाओं को सही दिशा देने और विवेक को जाग्रत करने के गहन सूत्र दिए गए हैं:
- ईश्वर की कृपा और अहंकार: यदि हम अपना चित्त (मन) भगवान में लगाते हैं, तो उनकी कृपा से जीवन की बड़ी से बड़ी बाधाएं (दुर्ग) पार हो जाती हैं। इसके विपरीत, अहंकार में डूबकर ईश्वर को नकारने से अंततः मनुष्य का विनाश होता है।
- आसक्ति vs स्नेह: धृतराष्ट्र और दुर्योधन के उदाहरण से स्पष्ट होता है कि ‘आसक्ति’ मनुष्य को अंधा कर देती है और वह गलत कार्यों का भी समर्थन करने लगता है। जबकि सच्चा ‘स्नेह’ वह है जिसमें मनुष्य सामने वाले की भलाई के लिए उसे गलत काम करने से रोकता है (उसे ‘ना’ कहना जानता है)।
- विचारों का स्नोबॉल इफेक्ट (Snowball Effect): मन में उठने वाले गलत विचार पहाड़ से गिरते बर्फ के गोले के समान होते हैं। यदि शुरुआत में ही विवेक से इन्हें न कुचला जाए, तो ये वासना, लोभ और क्रोध का विशाल रूप लेकर अंततः इंसान की नैतिकता को ही कुचल देते हैं।
- सच्ची बुद्धि केवल याददाश्त नहीं: आधुनिक शिक्षा स्मरण शक्ति (याददाश्त) तो बढ़ाती है, लेकिन ‘विवेक’ (क्या सही है और क्या गलत, यह समझने की शक्ति) नहीं देती। विवेक शक्ति का विकास शास्त्रों के नियमित अध्ययन से ही संभव है।
- आत्मा का अस्तित्व: डॉ. वाइल्डर पेनफील्ड के वैज्ञानिक प्रयोग सिद्ध करते हैं कि हमारी चेतना और शरीर अलग-अलग हैं। मनुष्य वास्तव में एक आत्मा है और इसकी सच्ची तृप्ति भौतिक वस्तुओं से नहीं, बल्कि भगवान की भक्ति से ही होती है।
- संतुष्टि एक निर्णय है (Satisfaction is a Decision): संतुष्टि केवल एक भावना नहीं, बल्कि हमारा अपना चुनाव है। दूसरों की थाली (जीवन) की ओर देखने के बजाय, ईश्वर ने हमें जो कुछ भी अच्छा दिया है, उस पर ध्यान केंद्रित करने से ही जीवन में सच्ची शांति आती है।
- सत्संग की महिमा: सत्संग न केवल हमारी बुद्धि को शुद्ध करता है, बल्कि हमारे अंदर ‘अच्छी इच्छाओं’ को भी जाग्रत करता है। जैसे बुरी संगति बुरे काम सिखाती है, वैसे ही सत्संग में भक्तों को देखकर हमारे भीतर भी धर्म और भक्ति की लालसा पैदा होती है।
Full Transcription
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥
भगवान कहते हैं कि, अगर तुम मेरे बारे में विचार करोगे, मेरी चेतना में रहोगे— “मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि”, अलग-अलग प्रकार के दुर्ग, मतलब समस्याएं आपके जीवन में आएंगी, पर जो भी समस्याएं आएंगी वो “मत्प्रसादात्” मेरी कृपा के द्वारा “तरिष्यसि”, आप उनके पार चले जाओगे। जो भी समस्याएं आपके जीवन में आएंगी, मेरी कृपा से आप उनके पार चले जाओगे। “अथ चेत्वमहंकारान्न”, पर यदि आप अहंकार के कारण सोचते हो, “न श्रोष्यसि” कि मुझे भगवान के मार्गदर्शन की कोई जरूरत नहीं है, तो फिर “विनङ्क्ष्यसि”, आपका विनाश हो जाएगा। तो इसको इंग्लिश में कहता हूँ एक बार: “With God we flourish, without God we perish” (भगवान के साथ जब रहते हैं, तो हम फलते-फूलते हैं, बिना भगवान के हम नष्ट हो जाते हैं)।
भगवद् गीता का आरम्भ और धृतराष्ट्र का मोह
महाभारत के छठे विभाग में आते हैं, भगवद् गीता के अठारह अध्याय हैं, यह भीष्म पर्व महाभारत का, उसमें आते हैं। और महाभारत के अठारह विभाग हैं, उसमें से पहले पाँच, बीच के पाँच हैं वह युद्ध का वर्णन है उसमें, और आखिरी अंत युद्ध के पाँच का वर्णन है। विश्व में अनेक धार्मिक ग्रंथ हैं, उन में से जो भगवद् गीता है उसका जो स्टेज है, जिस पृष्ठभूमि पर उसका वर्णन किया गया है, वह सबसे रोचक है। क्यों रोचक है? ये ऐसे बताया जाता है कि दोनों लोग, पाण्डव और कौरव, साथ में आ गए थे।
शुरुआत ही ऐसे होती है, अजीब ही शुरुआत, पहला श्लोक है भगवद् गीता का:
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥
धृतराष्ट्र अपने सहयोगी संजय से पूछ रहे हैं कि धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र है, उस पे जब “मामकाः”, मेरे पक्ष के लोग, कौरव और पाण्डव जो आ गए थे, “युयुत्सवः”, युद्ध करने के लिए आ गए थे, तो उन्होंने क्या किया? अब ये सवाल आता है, लगता है अगर कोई बोलते हैं, कुछ लोग होटल में खाना खाने के लिए गए, उसके बाद में उन्होंने क्या किया? होटल में खाना खाने के लिए गए तो खाना ही खाएंगे और क्या करने वाले हैं! तो अब रणभूमि पे युद्ध करने के लिए आ गए हैं, तो युद्ध ही करने वाले हैं। “किमकुर्वत”, इसे क्यों पूछते हैं वो?
उस प्रश्न का अर्थ ये है कि जो खींच होती है, उसके बारे में वर्णन करता है, उसे प्रदर्शन करता है। वास्तव में एक है आसक्ति और दूसरी है बुद्धि। आसक्ति जो है हमें एक ओर खींचती है और बुद्धि दूसरी ओर जाने को बोलती है। तो अभी बुद्धि से धृतराष्ट्र जानता था कि उसके जो पुत्र हैं वो अधर्म के पक्ष में हैं। उन्होंने कई बार पाण्डवों के प्रति अन्याय किया है। और कभी-कभी धृतराष्ट्र को हिचकिचाहट होती थी, पर ये जो बुद्धि की आवाज थी वह उसको पूरा बंद कर देते थे, उसकी आसक्ति की खींच।
स्नेह और आसक्ति में अंतर
आसक्ति क्या थी? आसक्ति मतलब वह दुर्योधन को कभी भी किसी भी चीज को “ना” नहीं कह सकते थे। तो क्या था उसका? एक है प्रेम, एक है स्नेह, और दूसरी है आसक्ति। स्नेह और आसक्ति: स्नेह करते हैं तो हम उनको प्रसन्न देखना चाहते हैं, पर उनको खुश करना चाहते हैं, पर इस तरह से खुश करना चाहते हैं कि उससे उनकी वृद्धि हो। पर जब किसी से आसक्त होते हैं, तो हम उनको सुखी देखना चाहते हैं, पर उस सुख के लिए अगर भले उस सुख का ऐसे परिणाम हो कि उस व्यक्ति को दुख मिलना है बाद में, फिर भी हम उसकी परवाह नहीं करते हैं। क्योंकि आसक्ति से हम भावनात्मक स्तर पर विवश हो गए हैं। परवाह नहीं करते हैं।
आजकल सोच के जंगल क्यों आए? अगर ये बात है, तो फिर जब भरत यहाँ पे आएगा, तो मैं भरत को कहूँगा कि तुम यहाँ पे जंगल में रह जाओ, और हे लक्ष्मण, तुम जाके अयोध्या के राजा बनो। तो जब इस तरह से प्रभु श्री रामचंद्र बोलते हैं, तो लक्ष्मण का सारा क्रोध शांत हो जाता है। जो गुस्सा हो जाता है, शांत हो जाता है। और जब वो देखता है, कितने निस्वार्थ भाव से, कितनी याचना करता है भरत, “कृपया आप आ जाओ, आप राज्य करो।” कहते हैं कि, “जो मान एक हाथी को मिलना चाहिए, वो एक छोटा सा जानवर कैसे ले सकता है? जो आदर एक गरुड़ को मिलना चाहिए, वो छोटा सा पंछी कैसे ले सकता है?” तो वो कहते हैं कि, “आप आ जाओ राज्य करो।” जब प्रभु श्री राम से नहीं बोलते हैं, तो फिर कहते हैं, “आप आपकी पादुका मुझे दो।”
तो अभी आजकर की दुनिया में, अगर एक भाई अपनी पादुका, अपनी चप्पल निकाले, तो दूसरे भाई को चप्पल उठाके, अपने भाई को ही मारेगा। तो इधर लक्ष्मण क्या करते हैं, चप्पल लेके अपने साथ जाते हैं, भरत जाते हैं अपने सिर पर रख के। तो उसके बाद में, लक्ष्मण और राम साथ में बैठे रहते हैं। लक्ष्मण छोटे भाई हैं, तो लक्ष्मण पूछते हैं राम से, कि “मुझे इतना गुस्सा क्यों आता है?” कि लक्ष्मण भरत को पूरा गलत समझ रहे थे, लक्ष्मण भरत को मारने की बात कर रहे थे, “कि मुझे इतना गुस्सा क्यों आता है?” तो लक्ष्मण के पीठ पर हाथ रखते हुए भगवान राम कहते हैं, कि “तू भावुक है, तुम भावुक थे।” तो लक्ष्मण सोचने लगते हैं, कि “भावनाएं क्या बुरी हैं?” तो प्रभु श्री राम कहते हैं, “नहीं, भावनाएं बुरी नहीं हैं, पर हमें वो भावनाएं छोड़नी हैं जो हमें धर्म से दूर ले जाती हैं। हमें उन भावनाओं को ठुकराना है जो हमें धर्म से दूर ले जाती हैं।”
भावनाएं, बुद्धि और सही चुनाव
तो भावनाएं महत्वपूर्ण हैं, पर हमें हमारी बुद्धि से चुनाव करना है, कौन सी भावनाओं का विकास करना है, कौन सी भावनाओं का हमें ह्रास करना है, विनाश करना है। अगर हम यह विवेक बुद्धि नहीं रखते हैं, अगर हम विचार नहीं करते हैं, विचार आएंगे, भावनाएं आएंगी, वासनाएं आएंगी, वह हमारा विनाश करती हैं। कैसे है यह? हम भगवद् गीता में बताते हैं भगवान, कि हम जिस भी चीज के बारे में विचार करते हैं, उसके बारे में धीरे-धीरे आसक्ति जागती है। दूसरे अध्याय के 62वें श्लोक में विचार करते हैं, हम जिस भी चीज के बारे में विचार करते हैं।
तो अगर कोई व्यक्ति अगर रस्ते पे जा रहा है और वहां पर उसे कोई जेवर की दुकान दिखती है। “यह जेवर इतना अच्छा है, मुझे चाहिए, पर मेरे पास पैसे नहीं हैं।” उसके पास विचार आता है, “चाहिए, मैं रात को यहां पर आ जाऊंगा, तो तोड़ के ये ले जाऊंगा।” साधारणतः व्यक्ति नेक होगा। चोरी का विचार नहीं करेगा। पर अगर उसके बारे में चिंतन करते रहेगा, चिंतन करते रहेगा, तो क्या होता है, उसमें लोभ जागता है। और जब ये भावना बहुत शक्तिशाली बन जाती है, तो फिर व्यक्ति की नैतिकता है, कुचल के व्यक्ति को अनैतिक बना देती है।
विचारों का प्रभाव: बर्फ के गोले का उदाहरण
आप जानते हैं कई बार ऐसे पर्वत होते हैं, जहां पे बर्फ गिरती है। बर्फ जब ऊपर आ जाती है, तो उसका गोला बनता है, वो नीचे आता है। जब बर्फ का गोला बनता है, वो जब ऊपर होता है, बाहर पर्वत के ऊपर, तब छोटा सा होता है। तभी अगर कोई व्यक्ति, अपने पैर से उसको एक ठोकर मार देगा, तो वो बर्फ का गोला वहीं टूट जाता है। पर अगर तभी कोई व्यक्ति नहीं आता है, वो बर्फ का गोला नीचे आने लगता है। जितना नीचे आता है वो, उतना उसमें और बर्फ जमती जाती है। और बर्फ जमती जाती है। और जब वो बर्फ का गोला नीचे आने लगता है, कभी-कभी वो इतना विशाल बन जाता है, कि पूरा ही मानव है, उसको कुचल देता है। तो वही बर्फ का गोला, जो पहले व्यक्ति अपने पैरों से कुचल देता, वही बर्फ का गोला जब नीचे आ जाता है, तो वह व्यक्ति को कुचल देता है।
उसी तरह से, हमारी जो इच्छाएं हैं, हमारी जो वासनाएं हैं, उन सब की शुरुआत विचार से होती है। जब विचार आता है, तभी अगर हम बुद्धि से उसका परीक्षण करते हैं, “क्या यही विचार है, क्या यही इच्छा है, क्या ये हमें धर्म की ओर ले जाने वाली है, या धर्म से दूर ले जाने वाली है?” अगर तभी हम विचार करते हैं, अगर धर्म से दूर ले जाने वाली है, उसको कुचलते हैं। तो तभी आसानी से कुचल सकते हैं। पर जितना हम उसको बढ़ने देते हैं, बढ़ने देते हैं, तो क्या होता है, वो बर्फ का गोला पहाड़ से नीचे आ रहा है। जितना नीचे आ रहा है, उतना और बड़ा बनते जा रहा है। और फिर जब वो नीचे आ जाता है, पूरे व्यक्ति को कुचल सकता है। उस तरह से हम ऐसा कार्य कर बैठते हैं, जो हम साधारणतः कभी नहीं करते हैं।
प्रलोभन और नरक के तीन द्वार
तो इसको अंग्रेजी में कहते हैं, “Whatever captures our attention, starts to control our action.” (जो भी चीज हमारी चेतना को पकड़ लेती है, हमारे ध्यान को पकड़ लेती है, वह हमें चलाती है)। आजकल समाज में अनेक प्रलोभन हैं। अनेक प्रलोभन इस तरह से हैं, कि वो व्यक्ति के मन को पकड़ें। और इन प्रलोभनों के द्वारा व्यक्तियों की वासनाएं हैं, उनको जागृत करके उनको अलग कार्य, बुरे कर्मों के लिए प्रवृत्त, उकसाया जाता है। इसलिए भगवान कहते हैं:
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥
सोलहवें अध्याय के 21वें श्लोक में भगवान कहते हैं कि नरक के तीन द्वार हैं: “त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।” इसलिए इनका त्याग करना है। इनका त्याग कैसे कर सकते हैं? इनका त्याग करना, यह मतलब नहीं है कि हमें सारे भौतिक जीवन का त्याग करना है या भौतिक चीजों का त्याग करना है। भौतिक भावनाएं हैं, भावनाएं बुरी नहीं हैं। हमें भावनाओं का त्याग नहीं करना है। हमें भावनाओं का चुनाव करना है! कौन सी भावनाएं हैं जो धर्म की ओर ले जाती हैं, उन भावनाओं का हम विकास करते हैं।
जब हम कीर्तन करते हैं, अभी हमने भजन किया, तो जब हम कीर्तन, भजन करते हैं तो भी हमें भावनाओं की महसूस ही होती है। पर यह भावना ऐसी है जो हमारी चेतना को ऊपर उठाती है। जो हमें धर्म के करीब ले जाती है, भगवान के करीब ले जाती है। तो अगर कोई अश्लील गीत है, वह सुनते हैं, उससे भी भावनाएं जागृत होती हैं। पर वह भावनाएं क्या होती हैं? वह धर्म से दूर ले जाती हैं। तो इसलिए हमें बुद्धि बहुत मजबूत करनी है। बुद्धि के द्वारा हम चुनाव करते हैं, “यह जो भावना है, इसका प्रभाव मुझपे क्या होने वाला है?” और उसके अनुसार फिर हम कार्य करते हैं।
सत्संग और शास्त्रों के अध्ययन का महत्व
अभी यह बुद्धि का विकास कैसे हो सकता है? बुद्धि के विकास के लिए शास्त्रों का अध्ययन बहुत महत्वपूर्ण होता है। हम जो सत्संग में आते हैं, भगवद् गीता जैसे ग्रंथ पढ़ते हैं, उनके बारे में चर्चा करते हैं, इससे हमारी बुद्धि का विकास होता है। आजकल के समाज में हम बुद्धि की गणना जिस तरह से करते हैं, वो केवल एक प्रकार की गणना है, और वो काफी अपूर्ण गणना है। आजकल के समाज में कोई विद्यार्थी है, उसको बुद्धिमान मान लेते हैं अगर उसको परीक्षा में बहुत से अंक मिल जाते हैं। अगर बहुत स्मरण शक्ति अच्छी है, तो हम मानते हैं बहुत बुद्धिमान है।
स्मरण शक्ति यह बुद्धि का एक अंग है। पर बुद्धि का प्रधान जो अंग है, वो स्मरण शक्ति नहीं है, वो विवेक शक्ति है। स्मरण शक्ति मतलब जो मैंने पढ़ा है वो याद रहना। वो अच्छा है, अगर है तो अच्छा है। पर विवेक शक्ति मतलब कि क्या सही है, क्या गलत है, वो समझने की शक्ति है। और बुद्धि का प्रधान अंग जो है, अगर हमें जीवन में प्रगति करनी है, जीवन में सुख और संतुष्टि प्राप्त करनी है, हमें भगवान के करीब जाना है, तो ये विवेक शक्ति का विकास बहुत जरूरी है।
आजकल के समाज में, शिक्षा पद्धति में जो हमें ज्ञान मिलता है, उससे क्या होता है? उससे स्मरण शक्ति की गणना होती है, पर उससे विवेक शक्ति का विकास नहीं होता है। अमेरिका के एक विचारवान नेता थे, मार्टिन लूथर किंग, उन्होंने कहा है कि “हमारे पास गाइडेड मिसाइल और मिसगाइडेड मैन हैं।” हमारी संचार शक्ति बहुत बढ़ गई है, पर हमारी चेतना, हमारा विवेक बहुत कम हो गया है। इसलिए अभी हमारी बुद्धि का विकास करना है, तो हम शास्त्रों का अध्ययन करते हैं।
शास्त्रों के अध्ययन से क्या होता है वास्तव में? शास्त्रों के अध्ययन से जो जीवन में समस्याएं आती हैं, उनके परे कैसे जाना है? जीवन में हमारे अलग-अलग प्रकार से जो हमें पथभ्रष्ट करने के लिए प्रलोभन आते हैं, उनके परे कैसे जाना है? इसका ज्ञान मिलता है।
आत्मा का अस्तित्व और वैज्ञानिक प्रमाण
तो भगवद् गीता में प्रधान ज्ञान दिया है कि हम इस शरीर में हैं, हम इस शरीर के अंदर एक अविनाशी तत्व हैं, आत्मा वो है। और वैज्ञानिकों ने भी इस सत्य की कई अनेक पद्धतियों से इसकी पुष्टि की है। मैं अभी कनाडा में था, तो कनाडा के एक नोबेल लॉरेट, नोबेल प्राइज जीतने वाले एक वैज्ञानिक थे वाइल्डर पेनफील्ड (Wilder Penfield)। तो उन्होंने एक किताब लिखी “मिस्ट्री ऑफ द माइंड” (Mystery of the Mind)। यह मन का रहस्य है। तो उसमें वो 40 साल तक उन्होंने जो दिमाग है, दिमाग पर संशोधन किया। और फिर उन्होंने उस संशोधन के आधार पर कि जो चेतना है, अपनी चेतना है, दिमाग के बाहर से काम करती है।
उन्होंने एक प्रयोग किया, जब वैज्ञानिक जानते हैं कि हमारा जो दिमाग है, दिमाग के अलग-अलग विभाग जो हैं, वो शरीर के अलग-अलग कार्यों को नियंत्रित करते हैं। कभी एक विभाग, शरीर का, दिमाग का खराब हो गया तो फिर व्यक्ति बोल नहीं पाएगा, तो कोई व्यक्ति हाथ नहीं हिला पाएगा, पैर नहीं हिला पाएगा। तो उन्होंने क्या किया कि एक व्यक्ति था, उसको बोला, सब्जेक्ट उनको बोला “अपना हाथ ऊपर उठाओ।” तो उसके दिमाग को उन्होंने एक कंप्यूटर में पूरा मॉनिटरिंग कर रहे थे, किस तरह से क्या-क्या परिवर्तन हो रहे थे। तो उन्होंने देखा बराबर जो दिमाग का विभाग है जो हाथ का नियंत्रण करता है, वह कार्यशील हो गया था। तो उन्होंने बोला “क्या हुआ? मेरा हाथ ऊपर गया था। क्या हुआ? हाथ नीचे करो।” और फिर उन्होंने देखा कि जो दिमाग का विभाग था वह कार्यशील से शांत हो गया था।
फिर बाद में उन्होंने क्या किया, इलेक्ट्रोड्स (Electrodes), एक कृत्रिम पद्धति से, तकनीक के उपयोग से उस दिमाग के उस विभाग को कार्यशील कर दिया। उसका हाथ ऊपर चला गया। “क्या हुआ?” तो पूछा उन्होंने, “तेरा हाथ ऊपर गया क्या? आपने हाथ आपने ऊपर उठाया?” “नहीं मैंने नहीं उठाया, वो आपने उठाया।” तो उन्होंने वो जो इलेक्ट्रोड्स थे, वो दिमाग बंद कर दिया, तो वो दिमाग का विभाग अकार्यशील हो गया, हाथ नीचे गिर गया।
पर इसका मतलब क्या है? अभी देखिए, अगर एक कंप्यूटर है, और मान लीजिए यहाँ पर कंप्यूटर के बाजू में एक प्रिंटर है। तो अभी कंप्यूटर में एक प्रिंट का बटन होगा। अभी यह मेरा कंप्यूटर है, मैं अगर प्रिंट का बटन दबाता हूँ, तो फिर क्या होगा? तो प्रिंटर चलने लगेगा। तो अभी जो व्यक्ति था, उसका हाथ ऊपर-नीचे होना वो प्रिंटर का जो हाथ हिलने के समान है। और दिमाग के विभाग को कार्यशील करना… वो दिमाग को कार्यशील किसने किया? वो डॉक्टर पेनफील्ड ने किया। उन्होंने वहाँ पे इलेक्ट्रोड्स यूज किया था, उसको कार्यशील कर दिया।
तो डॉक्टर पेनफील्ड ने सवाल पूछा कि “दूसरी बार तो मैंने ही दिमाग का बटन दबाया, पहली बार किसने दबाया?” क्योंकि दूसरी बार वो व्यक्ति बोला था कि “मैंने हाथ ऊपर-नीचे नहीं किया, आपने किया था।” और पहले बोला था कि “मैंने हाथ ऊपर किया, मैंने नीचे किया।” तो उन्होंने क्या किया, इस प्रकार से कई प्रयोग किए, और दिमाग के किसी भी भाग को उन्होंने कार्यशील किया, कभी भी व्यक्ति ने ऐसे नहीं बोला कि “मैंने हाथ ऊपर किया।” उसको वो एहसास कभी नहीं होगा।
तो यह जो व्यक्ति है, जो कार्य करता है, वो है दिमाग के परे है। वो जो व्यक्ति है वो वास्तव में आत्मा है। और यह आत्मा अविनाशी है, आत्मा का कभी नाश नहीं होता है। और यह आत्मा की संतुष्टि जो है, वो है भक्ति से होती है। जब हम भगवान की भक्ति करते हैं, तो क्या होता है? उसके द्वारा हमें सर्वोच्च संतुष्टि मिलती है। यह कैसे है?
भगवान बताते हैं कि इस दुनिया में अनेक आकर्षक चीजें हैं। फोन हो सकता है, कार हो सकती है, बंगला हो सकता है, पुरुष के लिए स्त्री आकर्षक होती है, स्त्री के लिए पुरुष आकर्षक होता है। सारे चीजें आकर्षक हैं दुनिया में। भगवान कहते हैं, इन सब चीजों का, सारे चीजों का आकर्षण जो है वो मुझसे आया है।
जीवन की परीक्षा और सही चुनाव
मान लीजिए आपको मुंबई, कलकत्ता, दिल्ली, चेन्नई और अहमदाबाद, पाँच में से एक चुनाव करना है। इसको Multiple choice question कहते हैं। तो अभी जब भी कोई Multiple choice exam होती है, Multiple choice question होता है, उसमें जो गलत चुनाव होते हैं, वो सही से ज़्यादा ही होते हैं। इस परीक्षा में भी जो गलत चीज़ें हैं वो सही से ज़्यादा हैं। पर जब हम परीक्षा दे रहे होते हैं, तो परीक्षा में जो हम चुनाव करते हैं, वह प्रोबेबिलिटी के आधार पर नहीं है, वह अंदाज़े के आधार पर नहीं है। शायद अंदाज़े के आधार पर नहीं करते हैं, नहीं करना चाहिए, पढ़ाई करनी चाहिए, ज़्यादा पढ़ाई करते हैं, तो सही चुनाव करते हैं।
ठीक उस तरह से जीवन जो है, यह एक परीक्षा है। और परीक्षा में अगर हम अंदाज़े से चुनाव करेंगे, तो हम फेल हो जाएंगे। पर अगर हमने पढ़ाई की है, शास्त्रों का अध्ययन किया है, तो फिर हम जो चुनाव करेंगे, वो सही चुनाव करेंगे। और इसलिए शास्त्रों का अध्ययन बहुत ज़रूरी है। तो इस दुनिया में जो भी चीज़ है आकर्षक, वो सब उनका आकर्षण भगवान से आया है। पर हमें चुनाव क्या करना है? कि कौन सी चीज़ों से आकर्षित होके मैं भगवान के करीब जाऊंगा, कौन सी चीज़ों से आकर्षित होके मैं भगवान से दूर जाऊंगा? जिन चीज़ों के आकर्षण से मैं दूर जाऊंगा, उनसे मुझे दूर रहना है। और जिन चीज़ों के आकर्षण के द्वारा मैं भगवान के करीब जाऊंगा, उनको मुझे चुनना है।
तो इसलिए भगवान राम, चंद्र, लक्ष्मण बताते हैं कि उन भावनाओं को चुनना है जो तुम्हें धर्म के ऊपर ले जाएं, न कि जो आपको धर्म से दूर ले जाएं।
दुर्योधन का अहंकार और बुद्धि का अभाव
अभी जब दुर्योधन को बताया जाता है कि तुम केवल पाँच गाँव दे दो, तो फिर पाण्डव संतुष्ट हो जाएंगे। अभी अगर हमें समझना है, सबसे पहले कृष्ण स्वयं जाते हैं शांतिदूत के रूप में। कृष्ण, वो तो सब योद्धाओं में सबसे श्रेष्ठ हैं, वो खुद राजा नहीं थे, पर राजा से भी श्रेष्ठ हैं, भगवान हैं वो सब। और वहाँ शांति की याचना लेके दुर्योधन के पास जा रहे हैं, जबकि वास्तव में सारी गलती दुर्योधन की ही है। पाण्डवों की गलती नहीं थी, दुर्योधन ने अन्याय किया था।
तो अभी के समय में भारत और पाकिस्तान में बहुत तनाव चल रहा है। तो मान लीजिए जब भारत और पाकिस्तान में तनाव चल रहा है, तब भारत के प्रधानमंत्री स्वयं पाकिस्तान जाते हैं शान्ति का प्रस्ताव लेके। और अभी जब “ना” कहते हैं किसी से, कि अगर आपने किसी अपने मित्र को सत्संग के लिए बुलाया, तो वो कहेगा कि “मुझे किसी काम से जाना है।” तो एक प्रकार का ना कहना है कि हम उस व्यक्ति को, उस प्रस्ताव को ना बोल रहे हैं, पर हम व्यक्ति को ठुकरा नहीं रहे हैं। “मैं चाहता हूँ पर वास्तव में मुझे इधर जाना है, ये काम है।” तो वो क्या है? यह “ना” है जो शिष्टाचार में करते हैं। दूसरे प्रकार का ना है, “तुम्हारा ये सत्संग! मैं भगवान में विश्वास नहीं करता हूँ। मैं मर भी जाऊंगा, तो मेरी लाश भी तुम्हारे कार्यक्रम में नहीं आने वाली है।” जब कोई इस तरह से बोलता है, तो क्या है? वो सिर्फ प्रस्ताव को ना नहीं बोल रहा है, वो सिर्फ व्यक्ति को थप्पड़ मार रहा है, ठुकरा रहा है।
तो दुर्योधन इतना अहंकारी था कि जब कृष्ण ने उनको प्रस्ताव दिया कि पाँच गाँव दो, तो उसने क्या जवाब दिया? कि “मैं उतनी ज़मीन भी नहीं दूंगा जितनी एक सुई की नोक पर आ सके।” मतलब क्या है? वो पूरी तरह से ठुकरा रहा है। तो यह है अहंकार। अभी दुर्योधन ने बार-बार क्या किया? गलत इच्छाओं का चुनाव किया। इससे उसका अहंकार बढ़ गया, उसकी ईर्ष्या बढ़ गयी, उसकी असंतुष्टि बढ़ गयी, और अंत में उसका विनाश हो गया। क्यों? क्योंकि बुद्धि विकसित नहीं थी। और बुद्धि विकसित होती तो फिर वह सही चुनाव करता। बुद्धि विकसित नहीं थी, इसलिए उसने गलत चुनाव किये। तो इसलिए हमें शास्त्रों के अध्ययन के द्वारा बुद्धि का विकास करना बहुत ज़रूरी है।
संतुष्टि: एक भावना नहीं, एक निर्णय है
अगर जो बुद्धि का विकास नहीं है, कि हम कैसे कर सकते हैं उन विचारों का, उन चीजों का चुनाव करना जो हमें सन्मार्ग पे ले जाते हैं, धर्म पे ले जाते हैं? मान लीजिए अभी इस सत्संग कार्यक्रम के बाद प्रसाद है। अभी अन्न है सब के लिए। पर एक बात ऐसे कल्पना के लिए, एक प्रकार की ऐसे मेज़बानी है, विशिष्ट प्रकार की क्या है कि हर एक के लिए अलग-अलग मेज़बानी है। आपके प्लेट में अलग है, आपके प्लेट में अलग है, मेरे प्लेट में अलग है, सब के प्लेट में अलग-अलग चीज़ें हैं। मान लीजिए अभी मेरे प्लेट में कई स्वादिष्ट व्यंजन हैं, और मैं उनको खाके आनंदित हो सकता हूँ। और मैं क्या करता हूँ? मैं देखता हूँ, उनके प्लेट में यह है, उनके प्लेट में यह है। अभी बाकी सब लोगों की प्लेट में क्या है, देखके मैं असंतुष्ट हो जाता हूँ। और मेरे प्लेट में भी काफ़ी स्वादिष्ट चीज़ें हैं पर मैं देखता ही नहीं हूँ। क्यों? बाकी सब की प्लेट में जो देख रहा हूँ। तो मैं असंतुष्ट हो जाता हूँ। आप अपनी प्लेट में खाओ, वो भी स्वादिष्ट है।
तो उस तरह से क्या है? हम सब के जीवन में कुछ चीज़ें अच्छी हैं, कुछ चीज़ें बुरी हैं। हम क्या करते हैं? दूसरों के जीवन में जो अच्छी चीज़ें हैं वो देखते हैं। “मेरे जीवन में यह नहीं चल रहा है, वो नहीं चल रहा है, वो नहीं चल रहा है।” पर सब के जीवन में कुछ चीज़ें अच्छी हैं, कुछ चीज़ें बुरी हैं। अगर हमारे जीवन में जो चीज़ें अच्छी हैं, हम देखते हैं, तो फिर हम कुछ संतुष्ट रह सकते हैं। भगवान बताते हैं, भगवद् गीता के सत्रहवें अध्याय के सोलहवें श्लोक में:
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥
मन की तपस्या। अंतर क्या है? संतुष्टि। संतुष्ट रहना ये मन की तपस्या है। तो Satisfaction is not just an emotion, it is also a decision (संतुष्टि ये केवल एक भावना नहीं है, ये एक निर्णय भी है)। मैं संतुष्ट रह रहा हूँ, संतुष्टि ये एक निर्णय भी है। “मेरे प्लेट में जो है मैं वही देखूंगा, दूसरों के प्लेट में मैं नहीं देखूंगा।” जब निर्णय करूँगा मैं, तो अपने आप संतुष्ट हो जाऊंगा। ये निर्णय मैं नहीं करूँगा, दूसरों की प्लेट में देखूंगा, तो क्या होगा? हमेशा के लिए असंतुष्ट रहूँगा। कितना भी प्राप्त करूँ, मैं कभी संतुष्ट नहीं होऊंगा।
भगवान की भक्ति से परम संतुष्टि
अब हमें भगवान की भक्ति में प्रगति करनी है, भगवान के करीब जाना है, तो हमें संतुष्टि का चुनाव करना बहुत ज़रूरी है। कभी-कभी हमारे घर में बालक हो सकता है, और बालक “मुझे ये खिलौना चाहिए।” तो मम्मी बोलती है कि “नहीं।” “मुझे खिलौना चाहिए!” “नहीं अभी नहीं।” “मुझे खिलौना चाहिए!” “नहीं अभी नहीं।” ना रोने लगता है, “तुम मुझे प्यार नहीं करती!” अभी माता-पिता ने बालक के लिए बहुत सी चीज़ें की हैं। पर जो भी माता-पिता ने किया है, बालक नहीं देखता है। बालक क्या देखता है कि “आप मुझे खिलौना नहीं दे रहे हो, मतलब आप मुझे प्रेम नहीं करते हैं।” अगर कोई बालक ऐसे करता है तो हम सुनेंगे तो हँसेंगे, “कैसी यह नादानी है!”
पर वास्तव में हम भगवान के साथ ऐसे ही करते हैं। कि हमारे जीवन में भी हमें कुछ चाहिए, हमको जो चाहिए है वो खिलौने से ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है। पर अगर हम देखते हैं, आत्मा सनातन है, जो आत्मा अनेक जन्मों के प्रवास के बाद यहां पे आयी है, तो उसकी तुलना में जो एक जीवन में अगर एक चीज नहीं चल रही है, तो वो कोई बहुत बड़ी चीज नहीं है। तो हम क्या करते हैं, अगर एक चीज अच्छी नहीं चल रही है, तो हमारा मन उसी में अटक जाता है। और फिर हम सोचते हैं कि “ये भगवान की भक्ति का क्या फायदा है? भगवान मेरी प्रार्थना सुनते हैं भी या नहीं सुनते हैं? भगवान मुझपे कृपा करते हैं या नहीं करते हैं?” यहां तक कि लोग सोचते हैं “भगवान का अस्तित्व है भी या नहीं?”
तो क्या है? वहाँ हमें बालक के स्तर से बड़ा होना है। और शास्त्रों का अध्ययन करते हैं, तो समझते हैं, ठीक है, कुछ चीज़ें गलत भी होंगी मेरे जीवन में, पर बहुत सी चीज़ें सही हैं। जो चीज़ें सही हैं उन पे केंद्र करें, और उससे संतुष्टि आएगी। और उन पे केंद्र करें और संतुष्टि से हम और कार्य करके भगवान के करीब जा सकते हैं।
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
जितने हम भगवान की चेतना में रहते हैं, उतना हम सुखी रहते हैं। जो भी समस्या आएगी उनके पार जा सकते हैं। कुछ चीज़ नहीं हो रही है, तो भी हम उसको सहन करते हैं। कुछ गलत इच्छाएं भी आ रही हैं, तो उनको हम दमन कर सकते हैं। क्योंकि हम भगवान में केंद्रित हैं। भगवान में केंद्रित रहना यह हमारे इस जीवन में और अगले जीवन में दोनों में सुखी होने के लिए सबसे सर्वोच्च मार्ग है।
सारांश में तो आज मैंने चर्चा की, सारांश में बताता हूँ। जैसे भगवान बताते हैं… तो हमारी जो बुद्धि है वो एक माता या पिता के समान हो जाएगी। और जो हमारा मन है, उसकी भावनाएं हैं वो एक बालक के समान होंगी। भावनाएं इधर-उधर जाएंगी, पर माँ जो है वो बालक को सही मार्ग पे लगाती है। आसक्ति और स्नेह में फर्क ये है कि आसक्ति में हम दूसरे को ना दुखी करने के लिए, वो दूसरा बुरा कार्य भी करता है तो उसको करने देते हैं, उसमें मदद भी कर देते हैं। पर स्नेह मतलब हम दूसरे को सुख चाहते हैं, पर उसके सुख के लिए भले ही उनको थोड़ा भी दुख देना पड़े, उनको “ना” कहना पड़े, उनको कह देते हैं। जैसे मां बालक को चॉकलेट के लिए ना कह देती है। धृतराष्ट्र दुर्योधन के लिए, राजपाठ चॉकलेट था, क्या राज उसको कभी ना नहीं बोल पाए, विनाश हो गया उसका अंत में।
तो हमने देखा कि जो हमारी हमें सही चुनाव करना है तो उसके लिए बुद्धि को शक्तिशाली बनाना है, शास्त्रों के अध्ययन से बना सकते हैं। राम और लक्ष्मण और भरत के लिए देखा की भावनाएं स्वाभाविक हैं। भावनाएं हमारे जीवन का अलंकार हैं। पर हमें वो भावनाएं चुननी हैं जो हमें धर्म के करीब ले जाती हैं, न कि वो भावनाएं जो धर्म से दूर ले जाती हैं। हमारे मन में जो भी विचार आते हैं, अगर हम बुद्धि से उसका चुनाव नहीं करेंगे तो कुछ विचार ऐसे होते हैं कि हमारा विनाश ही कर सकते हैं। जैसे बर्फ का गोला पहाड़ के ऊपर होता है तो आसानी से कुचला जा सकता है और जब पहाड़ के नीचे की तरफ आता है तो वो व्यक्ति को कुचल देता है। जिस तरह से हमारे जो विचार हैं, शुरुआत में ही संयम कर लें “नहीं इसके बारे में विचार नहीं करूँगा, ऐसी इच्छाओं के बारे में मैं चिंतन नहीं करूँगा”, तो फिर वहीं पर बात खत्म हो जाएगी। और जब हम विचार करते रहते हैं तो वो इतने बड़े बन जाते हैं कि हम बहुत ही घृणास्पद, बहुत गलत कार्य कर देते हैं। हमारी जो नैतिकता है, हमारी मानवता है, उसका विनाश हो जाता है।
तो हमें बुद्धि का विकास करना, यह केवल स्मरण शक्ति का कार्य नहीं है, यह वास्तव में विवेक शक्ति का कार्य है। इसलिए आधुनिक शिक्षण पद्धति से हमारी बुद्धि का विकास नहीं होगा, उसके लिए हमें शास्त्रों का अध्ययन करना है। शास्त्रों के अध्ययन में देखा कि अगर हमें भगवान से जुड़ना है, तो हमें क्या करना है? हमें संतुष्टि का अनुशीलन करना है। हम सब के जीवन में कुछ चीज़ें अच्छी चल रही हैं, कुछ चीज़ें गलत चल रही हैं। तो हम जो अच्छी चीज़ों को ध्यान देंगे, तो हम संतुष्ट हो जाएंगे। जैसे कि सब की प्लेट में अलग-अलग अच्छे व्यंजन हैं। हमारे प्लेट में जो व्यंजन हैं, हम देखेंगे तो हम संतुष्ट हो जाएंगे। हमारे सब के जीवन में जो कुछ अच्छा चल रहा है उसको देखेंगे संतुष्ट हो जाएंगे। जो गलत चल रहा है उसको ज्यादा विचार करेंगे तो फिर क्या होगा? जैसे बालक है, एक खिलौना नहीं मिल रहा है उससे वो माता के प्रेम पे संदेह करने लगता है, हम एक-दो चीज़ें जो हमारे हिसाब से न चलें उसके कारण हम पूछने लगे कि “भगवान की भक्ति का क्या फायदा है?”
पर भगवान का संबंध जो है, भगवान से संबंध हम जोड़े रखते हैं, भक्ति करके, शास्त्रों का अध्ययन करते हैं, भगवान के नाम का जप करते हैं, उससे क्या होगा? जो हमारी भावनाएं हैं वो ऊपर उठेंगी। न केवल शास्त्रों के अध्ययन से हमारी बुद्धि जानती है कि, समझती है कि किस चीज़ से मैं ऊपर उठता हूँ, भगवान की भक्ति से हमारी भावनाएं ऊपर उठेंगी। और इस तरह से हम इस जीवन में और अगला जीवन दोनों में संतुष्ट रहेंगे। बहुत बहुत धन्यवाद। हरे कृष्ण, हरे कृष्ण।
प्रश्नोत्तर: सत्संग और अच्छी इच्छाओं का जागृत होना
किसी का कोई सवाल है?
प्रश्न: “क्या सत्संग से भी बुद्धि विकसित होती है? कि इस बुद्धि केवल एक आंतरिक है, वो बाह्य रूप से नहीं, सत्संग से विकसित होती है?”
उत्तर: तो सत्संग में क्या होता है?
सङ्गात्सञ्जायते कामः
दूसरे अध्याय के 62वें श्लोक में बताते हैं कि संग के अनुसार हमारी इच्छाएं विकसित होती हैं। तो अभी बुद्धि के स्तर पे कई बार इंसान समझता है कि “ये सही है, ये गलत है।” पर क्या है, वो सही करना मुश्किल हो जाता है। पर जब सत्संग में आते हैं हम, तो ना केवल हमारी बुद्धि का विकास होता है, पर हमारी इच्छाओं का भी विकास होता है। जिस प्रकार के संग में जाएंगे हम, उस प्रकार से हमारी इच्छाओं का भी विकास होता है। यह हमारी इच्छाएं हैं, हम सोचते हैं कि खाने की चीज़ अच्छी है, खाना है। उस चीज़ को देखके हमारी इच्छाएं जागृत होती हैं। मैं यहाँ पे हूँ, वस्तु वहाँ पे है, उसको देखके इच्छाएं जागृत होती हैं। पर केवल ऐसे ही इच्छाएं जागृत नहीं होती हैं।
कई बार इच्छाएं जागृत होती हैं कि अगर नया फोन आ गया है, तो मान लीजिये कोई बड़ा क्रिकेटर है जैसे विराट कोहली, वो उस फोन को एंडोर्स करता है, तो हम लोग क्या सोचते हैं, “नहीं अच्छा, वो फोन यूज़ कर रहा है, मुझे भी चाहिए।” तो मतलब वो फोन देखके इच्छाएं जागृत नहीं होती हैं, दूसरा कोई व्यक्ति वो फोन इस्तेमाल कर रहा है वो देखके इच्छाएं जागृत होती हैं। तो क्या होता है? मतलब यहाँ पर इच्छा कैसे जागृत हो गई? मैं यहाँ पर हूँ, वो चीज यहाँ पर है। यहाँ पर व्यक्ति है, वो व्यक्ति को वो कार्य करते हुए देखके फिर मेरी इच्छाएं जागृत होती हैं।
धार्मिक चीज़ें, उनको देखके ही इच्छा जागृत नहीं होती है। कोई स्पोर्ट्स का मैगज़ीन होगा, कोई मूवीज़ का मैगज़ीन होगा, उसको देखके लोगों में इच्छा जागेगी, पढ़ना है। अखबार है, देखके पढ़ने की इच्छा हो जाएगी। पर भगवद् गीता का ग्रंथ देखके पढ़ने की इच्छा बहुत कम लोगों को होती है। और अगर वो भगवद् गीता का ज्ञान कोई व्यक्ति अच्छा समझाता है, भगवद् गीता में बड़ा रुचि कोई लेता है, उसमें बड़ा आनंद लेता है वो भगवद् गीता के ज्ञान में, तो हम सोचते हैं, “ये भगवद् गीता में क्या है?” तो वो व्यक्ति को भगवद् गीता के ज्ञान में आनंद लेते हुए देखके हम में भी इच्छा जागृत होती है।
सत्संग में क्या होता है? ये इच्छा हमारी अच्छे मार्ग में जागृत होती है। सत्संग नहीं है, अगर कुसंग होता है, दुस्संग में बुरी इच्छाएं जागृत हो जाती हैं। तो इसलिए सत्संग में न केवल बुद्धि जागृत होती है, बुद्धि शक्तिशाली होती है, पर उसके साथ-साथ हमारी अच्छी इच्छाएं हैं, वो भी जागृत होती हैं। इसलिए सत्संग बहुत महत्वपूर्ण है।