प्रस्तुत व्याख्यान में आध्यात्मिक पवित्रता, भक्ति, नेकता, पाप-पुण्य और आपद्धर्म के सूक्ष्म अंतर को बहुत ही सुंदर ढंग से समझाया गया है:
धन्यवाद। तो, पवित्रता और भल्राइ में क्या अंतर है? इन दोनों के बीच एक संबंध है। जब कोई व्यक्ति पुण्यात्मा होता है, तो उसके मन में एक पवित्र भाव होता है।
लेकिन आध्यात्मिक पवित्रता का अर्थ है कि इसमें कोई भौतिक इच्छा नहीं होती। जब पुण्य होता है, तो वह भौतिक संसार में हो सकता है। भौतिक संसार में, भक्ति बहुत प्रामाणिक होती है।
लेकिन यह भक्ति का पूर्ण रूप नहीं है। तो पवित्रता क्या है? जब आत्मा शुद्ध होती है, तो स्वाभाविक रूप से आत्मा भगवान की ओर आकर्षित होती है। भगवान के प्रति प्रेम उत्पन्न होता है।
तो पवित्रता का अर्थ केवल भगवान से प्रेम है। तो, जैसा कि चैतन्य महाप्रभु कहते हैं, मैं इस भौतिक संसार से कुछ नहीं चाहता।
शुद्ध प्रेम और भगवान की प्राप्ति
अधनं जनं सुन्दरिं कवितावा जगदीशिकामनि मम जन्मनी जन्मनी श्वरे भावतावा भक्ति करें। मुझे धन, जन, परिवार ये कुछ भी नहीं चाहिए। जब भगवान आप चले आते हैं, तो यह शुद्ध प्रेम है। अभी जो व्यक्ति नेक है, जो सत्वगुण में बड़ा हुआ भल्राइ रखता है, उस नेकता में, शायद भगवान के परिवार की इतनी आकांक्षा न हो। कि मैं धार्मिक रूप से कार्य करूँगा, पर भगवान में इतनी रुचि नहीं है। भगवान वहाँ पर कुछ हैं, मैं यहाँ पर कुछ हूँ। तुम वहाँ पर कुछ रहो, तुम मुझे यहाँ पर कुछ बनाओ। ऐसा वहाँ हो सकता है।
पाप, पुण्य और भक्ति का संबंध
तो उसमें क्या है? कि एक तरह से, दो प्रकार के दूषण हो सकते हैं, अशुद्धता हो सकती है। एक है, जो हम बुरे कार्य करें, पाप हैं। तो जो पाप यह है, यह एक बुरा कार्य है, वह रजोगुण, तमोगुण से आता है, उसको हमें त्यागना है भक्ति करने के लिए। तो जो पाप हैं, उसको हमें त्यागना है भक्ति करने के लिए, क्योंकि वह एक अशुद्धता है। पर दिव्य दृष्टि से देखेंगे, तो पुण्य यह भी एक अशुद्धता है कि पुण्य और भक्ति एक नहीं हैं। पुण्य का मतलब भौतिक दृष्टि से हम अच्छा कार्य करें। कोई भक्ति-पुण्य करेगा, तो वह स्वर्ग में जाएगा, पर स्वर्ग भौतिक जगत में ही है। पुण्य करता है मतलब क्या, मैं किसी के लिए भौतिक अच्छा कार्य करता हूँ, और मुझे अच्छा भौतिक फल मिलेगा उसके बदले, तो वह स्वर्ग में जाएगा। स्वर्ग में बहुत भौतिक सुख मिलेंगे, पर स्वर्ग भी लंबा जीवन है, पर वहाँ भी वह अस्थायी है।
भौतिक जगत की अस्थिरता और भगवान का धाम
आब्रह्मभुवनाल्लोका पुनरावर्तिनोऽर्जुन भगवान कहते हैं कि आप ब्रह्मलोक भी जाएंगे, इंद्रलोक क्या, ब्रह्मलोक उससे ऊपर है, उसमें भी जाएंगे, तो भी आपको पुनर्जन्म लेकर इधर आना पड़ेगा। मामुपेत्यु तु कौंतेय पुनर्जन्म न विद्यते। जब भक्ति के भाव से कार्य करते हैं, केवल भगवान की प्रसन्नता के लिए, साधारणतया भक्त जो होते हैं, नेक होते हैं। हमें साधारणतया नेकता से कार्य करना है। पर कभी-कभी कुछ एक्सेप्शनल सर्कंस्टांसेज, कुछ अजीब परिस्थितियों में चाहिए कि हमें नेकता का भी त्याग करना पड़े।
आपातकाल और आपत्तिकाल में धर्म का स्वरूप
मतलब कैसे हो सकता है कि मान लीजिए, अभी कुंती महारानी वो हमेशा सत्य व्रत होती हैं, हमेशा सत्य बोला करती हैं। वो उस समय क्या वेश में थे, वो एक ब्राह्मण के वेश में थे, तो वो पाँच पाण्डव ब्राह्मण थे और ये उनकी माता थीं। तो क्या है, उस समय अगर वे सत्य बोलते थे, तो क्या होता था? उनका सारा जो अज्ञातवास… कुंती अज्ञातवास नहीं थी, पाण्डव अज्ञातवास में बाद में थे। ये जो पहले जब वारणावत में जलाया गया था उनको, तो तभी वे भागे थे वहाँ से। तभी वे सत्य नहीं बोल सकती थीं। वहाँ से सत्य बोलना साधारण धर्म है, पर उस समय वहाँ सत्य बोलना उनके लिए समस्या आ सकती थी, तो उसको कहते हैं आपद्धर्म। जब आपदाएँ आती हैं, तो धर्म थोड़ा अलग हो सकता है। तो साधारण धर्म, भक्त सत्य बोलता है, पर कभी-कभी ऐसी परिस्थिति आ जाएगी कि सत्य बोलने से बहुत बड़ा संकट आ जाएगा, तो फिर क्या होगा? भक्त सत्य, भगवान की सेवा के लिए वह सत्य नहीं बोलता है।
भगवान की सेवा के लिए सत्य और असत्य की सीमा
ऐसे नहीं है कि कभी भी हम जब चाहें सत्य छोड़ दें और असत्य बोलें, ऐसे नहीं है। पर कभी-कभी ज़रूरत पड़ेगी, तो हमें सत्य, भगवान की भक्ति के लिए जो बोलना उचित है, वह बोलते हैं। तो वहाँ सत्य की पराकाष्ठा है, सत्य की सीमा है ऊपर से। तो कभी-कभी असत्य का तो त्याग करना है हमें भगवान की सेवा के लिए, झूठ नहीं बोलना है। पर कभी-कभी सच भी अगर हम बोलेंगे, तो उससे भगवान की सेवा नहीं हो रही है, तो सच इस तरह से बोलना है जिससे कि वह भगवान की सेवा हो सके। नेकता, नेकता, यह साधारण स्तर था, हमें नेक स्तर पर कार्य करना है भक्ति में। पर शुद्ध भक्ति का मतलब है, अगर नेकता का त्याग करना पड़े, तो वह भी हम भगवान की प्रसन्नता के लिए कर रहे हैं।