How can we be Krishna conscious when we are not staying with devotees in a youth center – Hindi?
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Lecture Summary
इस व्याख्यान में इस बात पर मुख्य रूप से चर्चा की गई है कि यदि हम यूथ सेंटर या भक्तों के संग में नहीं रह पा रहे हैं, नौकरी या गृहस्थ जीवन में व्यस्त हैं, और हमारे पास समय तथा साधनों की कमी है, तब भी हम कृष्ण भावनामृत (भक्ति) में कैसे स्थिर रह सकते हैं।
मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- आंतरिक चेतना और नीयत (Intention): भगवान की भक्ति केवल बाहरी कार्यों या मंदिरों में बिताए गए घंटों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि हमारी आंतरिक चेतना और भगवान से जुड़ने की सच्ची इच्छा (Intention) पर निर्भर करती है।
- परिस्थितियों की स्वीकार्यता: यदि परिस्थिति वश समय कम है, तब भी दृढ़ संकल्प और सही भावना के साथ हम हर स्थिति में भगवान से संबंध जोड़ सकते हैं।
- प्रभुपाद जी का आदर्श: श्रीला प्रभुपाद जी का गृहस्थ जीवन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वे व्यवसाय और परिवार की जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी पूरी तरह कृष्णमय चेतना में रहते थे, क्योंकि उनका मुख्य उद्देश्य अपने कार्य को भगवान और गुरु महाराज की सेवा का माध्यम बनाना था।
- भक्ति का सही दृष्टिकोण: भगवत भक्ति कोई बाहरी दिखावा नहीं है, बल्कि अपने विचारों को इस प्रकार व्यवस्थित करना है कि हम अपनी हर परिस्थिति और कार्य में भगवान को केंद्र में रख सकें।
Full Transcription
जब हम कंपनी में काम कर रहे हैं, बहुत एक चीज़ों से बहुत आदम्यान कर रहे हैं, वक्तों का इतना संग नहीं है तो हम तभी भगवत चेतना कैसे रख सकते हैं? तो वास्तव में कुछ प्रैक्टिसेस हैं और कुछ प्रिंसिपल्स हैं, कुछ कार्य है और कुछ तत्व है।
परिस्थितियों की भिन्नता और कृष्ण भावना का स्तर
तो ऐसे नहीं है कि वही कार्य उसी स्तर पर हम हमेशा कर पाएंगे। ऐसे सुबह जब करना है, कीर्तन करना है, क्लास में आना है, यह एक स्तर पर हम प्रैक्टिस कर सकते हैं, जब हम भक्तों के संग में यूथ सेंटर में रहे हैं। अगर हम नौकरी कर रहे हैं, उस प्रकार की सुविधा हमें नहीं हो सकती है।
अगर हम गृहस्थ हैं, हमारी घर की जिम्मेदारियां हैं, तो उस हद तक हम नहीं कर सकते हैं। तो हमें समझना है कि हमारा कृष्णा के संबंध नहीं एक प्रैक्टिस के लिए जब करना है। हमारा कृष्णा संबंध वह किसी कार्य पर निर्भर नहीं है। कार्य महत्वपूर्ण है, हमें जब करना है, भगवान की पूजा करनी है, हमें श्रवण करना है, पर वो कार्य इस स्तर पर करूंगा तो ही मेरा भगवान के संबंध रहेगा और इस स्तर से नीचे आएगा कि मेरा भगवान के संबंध नहीं है, ऐसे नहीं है। भगवान हमारी परिस्थिति समझते हैं।
भगवान हमारी स्थिति को समझते हैं
कृष्णा है एक अंडरस्टैंडिंग। तो अगर हम ऐसी परिस्थिति में हैं, जब हमें पर समय बहुत कम है, जितना समय है, उसमें अगर हम हमारा उद्देश्य भगवान को अर्पण करने का प्रयास करते हैं, हम प्रार्थना करते हैं, हम भगवान में हमारा चेतना लगाने का प्रयास करते हैं, तो बाकी समय में हमें भगवान हमें बहुत करेंगे।
तो हम यह समझेंगे कि कृष्णा नहीं हमें बहुत करते हैं। भगवान कभी हमसे दूर नहीं चले जाते हैं। कभी-कभी हम उनसे दूर चले जाते हैं, पर भगवान हमसे दूर नहीं चले जाते हैं। तो इसलिए हम अगर यह भाव रखते हैं कि भगवान हमेशा मेरे करीब हैं और मैं भगवान से संबंध कैसे जोड़ सकता हूँ इस परिस्थिति में, तो फिर भले ही समय कम हो, भले ही उतना संग नहीं हो, फिर भी हम भगवान से हमारी इंटेंशन, हमारी इच्छा से, हमारे दृढ़ संकल्प से उस समय में भी संबंध जोड़ सकते हैं।
बाहरी दिखावे से अधिक आंतरिक चेतना का महत्व
कभी-कभी कुछ लोग कर सकते हैं, घंटे-घंटे मंदिर में रहते हैं, पर मंदिर में वो बहुत इच्छा कर रहे हैं, यहाँ पर ऐसा करना चाहते हैं, यहाँ पर इतना पैसा करना चाहते हैं, यहाँ पर यह कर सकते हैं, तो क्या फायदा है? मंदिर में भगवान का स्मरण करना है।
कोई लोग अपने घर में हो सकते हैं, पर वो इच्छा कर रहे हैं कि मैं कभी मंदिर में जाऊंगा, तो वहाँ पर क्या है? उनका भगवत स्मरण है। तो भगवत भावना यह भावना है, यह चेतना है और जब हम हमें भगवत भक्ति का एक सकारात्मक दृष्टिकोण होना चाहिए, नकारात्मक नहीं है। हमें भगवत भावना का स्मरण करना नहीं करना चाहिए। हमें भगवत भावना का हमें इस तरह से हमारे विचारों को आयोजित करना है, जिससे कि हम इस दुनिया में भगवान को देख सकते हैं।
अन्य भक्तों से प्रेरणा और व्यावहारिक दृष्टिकोण
और फिर जब जो दूसरे भक्त जो है, जो हमारी परिस्थिति में है, मान लीजिए जो कंपनी में नौकरी कर रहा है, जिनको प्यार संग नहीं है, उनसे हम थोड़ा बातचीत कर सकते हैं और फिर उसके द्वारा हम समझ सकते हैं कि किस तरह से इस परिस्थिति में मैं भगवत भक्ति कर सकता हूँ।
तो भगवत भक्ति यह किसी बाह्य कार्यों के मात्रा पर निर्भर नहीं है, वो अंतरंग चेतना है। प्रभुपाद जी जब गृहस्थ थे, तो तभी वो जब बिजनेस कर रहे थे, सारे भारत भर गए, तभी उन्होंने मुंबई में अपना नौकरी शुरू की, अपना कंपनी चालू की, उन्होंने बिजनेस किया, कभी इलाहाबाद में किया, कभी कलकत्ता में कर रहे थे।
श्रीला प्रभुपाद का जीवन और आदर्श
जब वो इलाहाबाद में थे, तभी उनके साथ बाजू में एक दुकानदार था उनके और वो मुलता था कि अभय बाबू कि अभय बाबू बहुत धार्मिक व्यक्ति थे, पर उस समय उनका एक इंचार्ज था मैं और पैसे कैसे करें? तो उस समय उस आश्रम में थे, उनका पैसे कमाना जरूरी था।
तो ऐसे नहीं है कि वो भगवान का स्मरण नहीं कर रहे थे। उनका भगवान की सेवा के लिए जो जिम्मेदारियां थी, उसको पूरा करना था। तो वो अगर अगर आप मुझे क्यों करूंगा तो पैसे और बढ़ेंगे, यह करूंगा तो और पैसे बढ़ेंगे, भगवान की इतना कहा है, पर वो क्या देखते? पैसा भी कमाना है, ताकि मैं मेरे परिवार को और कृष्णमय भी बना सकूं। मैं मेरे गुरु महाराज की सेवा के लिए और पैसा कमा सकूं, योगदान कर सकूं।
निष्कर्ष: संबंध का आधार इंटेंशन (इच्छा) है
तो हमें अगर कोई व्यक्ति बाह्य रूप से देखता था, तो हम बोलते हैं कि प्रावपाजी इतने व्यक्ति उतने हैं। अरे अभय बाबू ये धार्मिक तो धार्मिक प्रावपाजी है, उनकी पर ये तो पैसे-पैसे की बात कर रहे हैं।
पर ऐसे नहीं है, हमें देखना है नहीं कि कनेक्शन विद कृष्णा इज प्राइमरली थ्रू इंटेंशन एंड सेकंडरीली थ्रू एक्शन। कि हमारा कृष्णा के संबंध जो है, वो हमारे उद्देश्य के लिए है और कार्य है द्वितीय थ्रू।
अगर ऐसे नहीं है कि कोई कहेगा, मैं उद्देश्य तो हमेशा है मेरे भगवान की सेवा करने का, पर मेरे पास मंदिर में जाने का समय नहीं है, मैं मूवी देख रहा होता हूँ, मैं क्रिकेट मैच देख रहा होता हूँ, मैं शराब कर रहा होता हूँ। उद्देश्य है भगवान की सेवा करना? नहीं, ऐसे नहीं है। हम कहीं ऐसे अधार्मिक कार्य है, जो हमारी भक्ति को रास करते हैं। इन योर सवाल है किसी का।