How can we help people who are following some apasampradaya – Hindi?
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Lecture Summary
इस वक्तव्य का मुख्य सार यह है कि हम किसी भी व्यक्ति को ज़बरदस्ती परिवर्तित करके भक्ति के मार्ग पर नहीं ला सकते, क्योंकि वास्तविक परिवर्तन हमेशा भीतर से होता है। यदि कोई व्यक्ति किसी अपसम्प्रदाय में फंसा है या भक्ति को स्वीकार नहीं कर रहा है, तो हमें निराश होने या उनसे आक्रामक बहस करने के बजाय निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए:
- सकारात्मक व्यवहार (अज्ञात सुकृति): हमें लोगों के साथ ऐसा आदरपूर्ण और मधुर व्यवहार करना चाहिए कि भले ही वे हमारे विचारों से सहमत न हों, लेकिन उनके मन में भक्तों के प्रति एक अच्छी धारणा बने। यह सकारात्मकता (अज्ञात सुकृति) भविष्य में परिस्थितियां अनुकूल होने पर उन्हें भगवान की ओर ले जा सकती है।
- सदाचार पर ज़ोर (Product over Process): केवल नियमों और अपनी साधना का अहंकार करने के बजाय, अपने उत्तम चरित्र (सदाचार) से लोगों को प्रेरित करें। लोग यह देखकर प्रभावित होते हैं कि भक्ति ने आपके जीवन और व्यवहार को कितना सकारात्मक और निर्मल बना दिया है। आक्रामक प्रचार और अहंकार लोगों को दूर कर देता है।
- दरवाज़ा हमेशा खुला रखें: यदि कोई व्यक्ति भक्ति के मार्ग पर आने से मना कर देता है, तो उनसे संबंध तोड़ने या मुँह पर दरवाज़ा बंद करने के बजाय, एक सामान्य और प्रेमपूर्ण संबंध बनाए रखें। इसका अर्थ है कि उनके लिए ‘दरवाज़ा हमेशा खुला रखें’, ताकि भविष्य में जब भी उनकी चेतना जागृत हो, वे बिना किसी संकोच के वापस आ सकें।
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अपसम्प्रदाय से बाहर निकालने में मदद कैसे करें?
तो अगर कोई लोग अपसम्प्रदाय में फंसे हुए हैं, तो फिर हम उनको किस तरह से भक्ति में आने में मदद कर सकते हैं? दो चीज़ें हैं इसमें प्रधान। एक है कि हमें समझना है कि वास्तव में जो व्यक्ति का परिवर्तन है, किसी का भी कोई भी परिवर्तन हम नहीं कर सकते हैं। जिस प्रकार से लोग एक खेल के लिए बदलना चाह रहे हैं; किसी व्यक्ति को परिवर्तित होना है, तो ये जो दरवाज़ा है, अंदर से खुलता है। बाहर से कितनी भी चाबी डालो, खुलने वाला नहीं है वो।
तो हमें समझना है कि उस व्यक्ति को मुझे परिवर्तित करना है, और ये हर परिस्थिति माता-पिता के साथ है कि हमारा बच्चा अच्छा बने, और हम उनको कितना नियंत्रण कर सकते हैं। तो उसको हमें खुद का अपयश नहीं समझना चाहिए। अगर उनको भक्ति के बारे में पता ही नहीं है और हम उनको बताते नहीं हैं, तो हमारा अपयश है, हमें बताना चाहिए। पर अगर वो उसको स्वीकार नहीं करते हैं, तो वो उनमें और भगवान में है।
‘अज्ञात सुकृति’ और सकारात्मक व्यवहार का प्रभाव
तो हमें क्या करना है? हम इस तरह से बर्ताव करते हैं उनसे, इस तरह से बातचीत करते हैं कि अगर वो भक्ति भी नहीं करते हैं, तो भी उनको भक्तों के बारे में अच्छे विचार हों, सकारात्मक रहें। यह अच्छा विचार है कि ‘यह एक नाइस पर्सन (Nice Person) हैं। जो ये बोलते हैं, उससे मैं सहमत नहीं हूँ, पर यह अच्छा व्यक्ति है।’
अगर इस तरह से हमारा जो आदान-प्रदान है, एक सकारात्मक भाव पे अंत होता है, तो क्या होता है? वो उनके मन में रहेगा। भक्ति शास्त्रों में इसको ‘अज्ञात सुकृति’ बताया गया है। वो जो अज्ञात सुकृति है, बाद में जब परिस्थिति उचित हो जाएगी उनके जीवन में, तब वो उनको भगवान की ओर ले जाएगी।
तो इसलिए जब उनका कुछ अपना तत्त्वज्ञान होता है, उनकी विचारधारा होती है, तो कभी-कभी हमारी उनसे बहस भी हो सकती है कि ‘ये सही नहीं है, ये सही है।’ हम तर्क-वितर्क कर सकते हैं। तो तर्क-वितर्क उचित है, ठीक है, करना है तो कर सकते हैं। पर हम अज्ञात सुकृति के लिए तर्क-वितर्क से परे उनसे संबंध जोड़ सकते हैं।
प्रोसेस (साधना) के साथ-साथ प्रोडक्ट (सदाचार) पर ज़ोर
और धीरे-धीरे अगर इससे संबंध जुड़ जाता है उनका, तो फिर वो खुद देखेंगे कि जो वास्तव में शुद्ध भक्ति कर रहे हैं, या शुद्ध भक्ति की आकांक्षा से साधना भक्ति कर रहे हैं, उसमें जो रस है, उसमें जो शुद्धिकरण है, उसमें जो जीवन का परिवर्तन है, वो काफी चमत्कारिक होता है।
जब वो देखेंगे कि इस तरह से परिवर्तन हो रहा है, तो उससे वो प्रभावित होंगे। जैसे आप कहें कि “ये प्रोडक्ट अच्छा है, हेल्दी है, आप खरीदो।” और अगर दिखाओ, “ये देखो कपड़ा कैसे चमक रहा है!” वो देखें कि कपड़ा कैसे चमक रहा है, तो वो कहेंगे “आप वो वाशिंग पाउडर मुझे दो।”
तो क्या होता है, कई बार हम बोलते हैं, “ये आप करो, ये आप करो, ये करो।” हम प्रोसेस (Process) पर ज़ोर देते हैं, प्रोडक्ट (Product) पर ज़ोर नहीं देते हैं कि आपको ऐसे करना चाहिए, ऐसे करना चाहिए। पर वास्तव में अगर वो देखेंगे कि ये भक्त जो हैं, उनका जीवन परिवर्तित हो गया है, ये इतने अच्छे व्यक्ति हैं, तो वो प्रभावित होंगे।
प्रभुपाद जी को एक बार पूछा गया था कि “हम आपके अनुयायियों को कैसे पहचान सकते हैं?” प्रभुपाद जी ने कहा, “वो परफेक्ट जेंटलमैन (Perfect Gentlemen) हैं, परफेक्ट लेडीज (Perfect Ladies) हैं।” तो प्रभुपाद जी ने ये नहीं कहा कि “वो हमेशा कृष्णा का कीर्तन करते रहते हैं, जिसको भी देखें उसको सब कृष्णा के बारे में बोलते हैं।” वो सही है, पर बाहर के लोग जो हैं, वो ये नहीं देखने वाले हैं। अगर हम आदरपूर्ण भाव से बातचीत करते हैं, अगर हम जेंटलमैन जैसे बात करते हैं, बर्ताव करते हैं, तो वो देखेंगे और कहेंगे, “मुझे ऐसा बनना है।”
साधना का अहंकार और उसका दुष्परिणाम
कभी-कभी क्या होता है, हम सदाचार पर इतना ज़ोर नहीं देते। हम क्या करते हैं, हमारी साधना और सिद्धांत देखते हैं और उससे हम बड़ा गर्व करते हैं— “मैं इतना जप करता हूँ और तुम क्या करते हो? खुद को भक्त बोलते हो, क्या करते क्या हो तुम?”
तो हमारी साधना से कभी-कभी हमारा अहंकार बढ़ जाता है, हमारे सिद्धांत से— “तुमको कुछ पता ही नहीं है।” तो क्या होता है, जब ऐसा होता है, लोगों को हमारा अहंकार दिखता है। तो लोग पूरी तरह बंद हो जाते हैं।
मैं अमेरिका में टेक्सास (Texas) में था। टेक्सास जो है, वह एक क्रिश्चियन स्टेट (Christian State) है। अमेरिका में कुछ स्टेट्स हैं, कुछ प्रांत हैं, जिनको बाइबिल बेल्ट (Bible Belt) कहते हैं। वहाँ पे क्रिश्चियन लोग बहुत अग्रेसिव (Aggressive) हैं, वहाँ पे बहुत लोगों को परिवर्तित करने का प्रयास करते हैं। तो वहाँ पे एक कार पर मैंने एक नोटिस देखा, बंपर स्टिकर था— “ओ भगवान! प्रचारकों से मुझे बचाओ आप। हे भगवान! आपके प्रचारकों से मुझे बचाओ।”
अभी भगवान तो उनके प्रचारकों के माध्यम से ही बचाते हैं हमको, वो ही हमको भगवान का ज्ञान देते हैं। पर अगर भगवान के प्रचारक जो हैं, वो बहुत सेल्फ-राइटियस (Self-righteous) हो जाते हैं, बहुत दूसरों को नीचा दिखाते हैं, बहुत खुद को सही बोलते रहते हैं हमेशा, तो फिर क्या होता है, लोग बंद हो जाते हैं। तो इसलिए हमें क्या देखना है कि हमारे पास सिद्धांत है, हमारी साधना है, अच्छा है; पर लोग देखेंगे सदाचार। तो अगर हम उनसे अच्छी तरह से बर्ताव करते हैं, तो उससे वो थोड़ा परिवर्तित होते हैं। और धीरे-धीरे कुछ लोग तेज़ी से आ सकते हैं, कुछ लोग धीरे आ सकते हैं।
हमेशा दरवाज़ा खुला रखें
तो हमें क्या करना है? हम कई बार जब लोगों को प्रेरणा देते हैं आने की, हम उनके लिए दरवाज़ा खोलते हैं, “आ जाओ अंदर!” और वो बोलते हैं, “नहीं आना है।” तो हम क्या करते हैं? हम उनके मुँह पे दरवाज़ा बंद कर देते हैं— “दफा हो जाओ!” नहीं, ऐसे नहीं करना है।
हम दरवाज़ा खोलते हैं, अगर वो नहीं आते हैं, तो हम दरवाज़ा खुला रखते हैं। उनको जब भी आना है, वो आ जाएंगे। दरवाज़ा खुला रखना मतलब क्या? कि हमारा संबंध उनसे अच्छा रखना है। भले ही उनका सिद्धांत अलग है, उनकी साधना में कुछ और कर रहे हैं, या वो कुछ साधना नहीं भी कर रहे हैं, पर फिर भी हमें हमारा संबंध अच्छा रखना है।
संबंध अच्छा रखने का मतलब ये नहीं है कि घंटे-घंटे उनके साथ बिताना है, पर जब भी हम उनसे मिलते हैं, अच्छे से बात करते हैं। तो क्या होता है, वो दरवाज़ा खुला रहता है। और जब उनकी परिस्थिति उचित हो जाएगी, उनकी चेतना जागृत हो जाएगी, तो वो आ जाएंगे, दरवाज़ा खुला है। अच्छा।