If feelings of satisfaction deter us from doing difficult duties what should we do – Hindi?
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Lecture Summary
- कर्तव्य और संतुष्टि का संतुलन: भक्ति से मिलने वाली शांति या संतुष्टि हमें हमारे आवश्यक और कठिन कर्तव्यों से पीछे हटने का बहाना नहीं बननी चाहिए। सिर्फ अनुकूल परिस्थितियों में संतुष्ट रहना ‘परिस्थिति-जन्य’ है, जबकि हर हाल में भगवान पर आश्रित रहकर अपना कर्म करना ‘दिव्य’ संतुष्टि है।
- परिस्थितियों के अनुरूप सेवा: जिस प्रकार श्रील प्रभुपाद जी ने अलग-अलग परिस्थितियों (वृंदावन में एकांत ग्रंथ लेखन और अमेरिका में हिप्पियों को प्रचार) में खुद को ढाला, उसी प्रकार हमें भी भगवान से जुड़े रहने के लिए हर स्थिति के अनुसार अपना कर्तव्य निभाना चाहिए।
- ईश्वरीय योजना को समझना: यदि हम अपनी जिम्मेदारियों से भागते हैं, तो हम वास्तव में भगवान की उस योजना और अवसर को खो देते हैं जो उन्होंने हमारे लिए बनाई है।
- अमेरिकन आर्मी के भक्त का उदाहरण: पार्थ सारथी प्रभु (जो अमेरिकन आर्मी में थे) भक्त बनने के बाद इराक युद्ध में नहीं जाना चाहते थे, लेकिन गुरु के निर्देश पर उन्होंने अपना कर्तव्य निभाया। युद्ध के दौरान भी भगवद्गीता के स्मरण से उनकी शांति देखकर जब बाकी सैनिक प्रेरित हुए, तब उन्हें समझ आया कि भगवान ने उन्हें वहाँ क्यों भेजा था।
निष्कर्ष: कृष्ण भावनामृत केवल कुछ निश्चित नियमों या पूर्व-धारणाओं तक सीमित नहीं है। बाहरी तौर पर सांसारिक लगने वाले कर्तव्यों को भी यदि हम सेवा भाव से और पूरी जिम्मेदारी के साथ निभाते हैं, तो हम यह समझ पाते हैं कि भगवान इस जगत में किस प्रकार कार्य करते हैं।
Full Transcription
संतुष्टि और कर्तव्य में संतुलन
तो अगर परिस्थिति में हम संतुष्ट हैं, पर हमें कोई कर्तव्य करना है या कुछ कार्य करना है, और संतुष्टि के कारण हमें वो कार्य करने की प्रेरणा नहीं मिलती है, तो हमें क्या करना चाहिए? संतुष्टि, भक्ति का कारण नहीं होनी चाहिए। यह संतुष्टि है कि भक्ति करने के कारण मैं संतुष्ट हो गया हूँ।
पर अगर कुछ लोग कहते हैं, “भगवान हैं, मैं भगवान को मानता हूँ। भगवान वहाँ पर सुखी हैं, मैं यहाँ पर सुखी हूँ। उनको वहाँ पर रहने दो, मैं यहाँ पर रहता हूँ।” यह जो संतुष्टि है, यह वास्तव में क्या है? यह मूर्खता की बात है कि “भगवान वहाँ पर सुखी हैं, मैं यहाँ पर सुखी हूँ।” पर कितने समय तक सुखी रहने वाला हूँ? इस जगत में दुख तो आने ही वाला है।
परिस्थितिजन्य संतुष्टि बनाम दिव्य संतुष्टि
तो हमें समझना चाहिए कि संतुष्टि दो प्रकार की हो सकती है—एक है कि संतुष्टि circumstantial (परिस्थिति-जन्य) हो सकती है, और दूसरी है कि संतुष्टि transcendental (दिव्य) हो सकती है।
जब बाहर से कोई समस्या नहीं आती है और इसलिए मैं संतुष्ट हूँ—यह परिस्थिति-जन्य है। और दूसरा है कि मैं भगवान के आश्रित हूँ, इसलिए संतुष्ट हूँ—यह दिव्य है।
कई बार लोग सोचते हैं कि अपनी चेतना में भगवान का आश्रय कैसे प्राप्त करेंगे। भगवान का आश्रय जो है, वो ऐसे नहीं है कि जैसे हमारे घर में पहले पानी नहीं आ रहा था, एक पाइपलाइन (pipeline) डाल दी, और अभी रोज़ पानी आने लगा है। तो ऐसा नहीं है कि हमारी चेतना में एक पाइपलाइन डाल दी और तुरंत भगवान का आश्रय आ गया।
हर परिस्थिति में भगवान का आश्रय
हमें हमेशा अलग-अलग परिस्थितियों में, जो उचित है, वह करना है, जिससे कि हमारा भगवान से संबंध जुड़ा रहे।
तो वही श्रील प्रभुपाद जी, जब वृन्दावन में थे तो ग्रंथ लिख रहे थे, और जब अमेरिका में गए, तो वहाँ अमेरिका में जो हिप्पी (hippy) लोग थे, उनसे कैसे बातचीत करनी है, उनको कैसे प्रचार करना है, ये सीख रहे थे।
तो अलग-अलग परिस्थितियों में हमें भगवान के आश्रित रहने के लिए, भगवान की सेवा करने के लिए, भगवान के अंशों को देखने के लिए, जो भी हो, अलग-अलग परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
कर्तव्य पालन और भगवान की योजना
तो फिर ऐसी परिस्थितियों में हमें समझना है कि अगर ये मेरी ज़िम्मेदारी है, और मैं ये ज़िम्मेदारी नहीं निभाऊंगा, तो एक तरह से, मेरी भगवान की योजना से जो परिस्थितियां आई हैं, मैं अपना कर्तव्य न करके उस योजना में आगे बढ़ने का एक मौका गंवा रहा हूँ।
तो फिर मुझे यहाँ पर अपना कर्तव्य करना होगा, वरना मैं इन परिस्थितियों की समस्या के हल ढूंढने में ही पड़ा रहूँगा।
अमेरिकन आर्मी के भक्त की प्रेरक कथा
हमें समझना चाहिए कि अच्छा, ऐसे भी हम कृष्ण भावना भावित हो सकते हैं। मैं कुछ तीन-चार साल पहले जब वहाँ आया था, तो मैं बता रहा था एक भक्त के बारे में—पार्थ सारथी प्रभु। वो अमेरिकन आर्मी (American Army) में थे।
वो अमेरिकन आर्मी में थे और बोल रहे थे कि, “मैं तो भक्त बन गया हूँ, मुझे जप करना है, मैं इन पॉलिटिकल कॉन्फ्लिक्ट (political conflict) में क्यों जाऊं?” उनकी जाने की इच्छा नहीं थी और उनको इराक (Iraq) में डेप्युट (depute) कर दिया गया था।
जब उनको इराक जाने को बोला गया, तो उन्होंने अपने गुरु के पास जाकर कहा कि, “मैं नहीं जाना चाहता हूँ।” गुरु ने कहा, “अगर आप सरकार की नौकरी करते हैं, यही आपकी नौकरी है, तो आपको जाना पड़ेगा।” तो वह वहाँ पर गए, और जब वहाँ गए, तो क्या हुआ?
तो उनके यूनिट (unit) में एक प्लाटून लीडर (platoon leader) थे। उन पर एक बार आक्रमण हो रहा था। कई बार वहाँ पर बहुत भयंकर परिस्थिति होती थी, तो वह भगवान का नाम लेकर, भगवद्गीता का स्मरण करके एकदम शांत रहते थे।
कृष्ण भावनामृत का वास्तविक अर्थ
और कई बार उन्होंने अपने यूनिट को बड़ी चपलता और दक्षता से हमलों से बचाया। तो एक बार ऐसे ही जब उन्होंने अपने साथियों को बचाया, तो उनके जो टीम मेंबर्स (team members) थे, जो सोल्जर्स (soldiers) थे, उन सैनिकों ने आदर से पूछा कि, “सर, आप इतना शांत कैसे रहते हैं?”
जब वह उनको जवाब दे रहे थे, तब उनको समझ में आया कि, “मुझे ध्यान में आया कि कृष्णा ने मुझे यहाँ पर इराक में क्यों भेजा है? इन लोगों के लिए!”
भक्ति के बारे में कई बार हम सोचते हैं कि कृष्ण भावना का मतलब केवल कुछ सीमित चीज़ें हैं। पर कृष्ण भावना का मतलब बहुत कुछ हो सकता है। कई बार ऐसी परिस्थिति जो बाह्य रूप से लगती है कि उससे कृष्ण भावना में कोई विकास नहीं हो रहा है, वहाँ भी विकास होता है। अगर हम एक सेवा भाव से, ज़िम्मेदारी के स्तर पर रहकर कार्य करते हैं, और अपने जो मूल कृष्ण भावना के कार्य हैं, वो करते हैं, तो लाभ होता है।
दृढ़ संकल्प और सेवा भाव
और साथ-साथ उस ज़िम्मेदारी को भी निभाते हैं, तो उसके द्वारा हम यह समझ सकते हैं कि कृष्ण कैसे कार्य करते हैं, कृष्ण भावना का सत्य क्या है, और कृष्ण कैसे इस जगत में सब संचालित रखते हैं।
तो इसलिए अगर भगवान की सेवा करनी है, तो इसमें हमें दृढ़ संकल्प पर रहना है। मुझे भगवान की सेवा कैसे करनी है, क्या परिस्थिति है, मुझे क्या करना है, उसके बारे में हमें खुले विचार रखने हैं। हम अपनी पूर्व धारणाओं में सीमित नहीं रह सकते। इसलिए कई बार हमें समय और परिस्थितियों को स्वीकार करके, भगवान की सेवा करने के लिए अपना कर्तव्य पूरा करना होता है।