Whom are we giving our mind – Hindi
[Bhagavatam class at ISKCON, Nasik, India]
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Lecture Summary
इस प्रवचन में ‘मन किसको दे रहे हैं?’ इस अत्यंत महत्वपूर्ण विषय पर विस्तार से चर्चा की गई है। इसका मुख्य सारांश निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत समझा जा सकता है:
- मानसिक समय और ऊर्जा की बर्बादी: हम भौतिक और व्यावहारिक स्तर पर तो अपने समय का हिसाब रखते हैं, लेकिन मानसिक स्तर पर हम अपनी ऊर्जा कितना व्यर्थ गंवा रहे हैं, इस पर ध्यान नहीं देते। किसी व्यक्ति या परिस्थिति के प्रति अत्यधिक विचार करने से हमारा मन और मानसिक समय व्यर्थ होता है।
- राग, द्वेष और आसक्ति: राग (आसक्ति) और द्वेष (घृणा) दोनों ही हमारे मन को जकड़ लेते हैं। क्रिकेट मैच या अन्य घटनाओं का उदाहरण देते हुए बताया गया कि कैसे किसी चीज़ के प्रति अत्यधिक जुड़ाव या घृणा हमारे मन को नियंत्रित कर लेती है और बार-बार ‘ऑटो-रिप्ले मोड’ की तरह हमारे विचारों में चलती रहती है।
- समस्या और उसके तीन दृष्टिकोण: जीवन में समस्याएँ आने पर हमारे तीन दृष्टिकोण हो सकते हैं—
- समस्या को भूलने के लिए भक्ति करना।
- समस्या का आध्यात्मिक हल ढूँढने का प्रयास करना।
- समस्या आने पर भक्ति पर ही प्रश्नचिह्न लगाना (जो कि अनुचित है)।
- कारण और उद्देश्य (Reason vs. Purpose): किसी भी घटना या बीमारी का भौतिक ‘कारण’ (Reason) कुछ भी हो सकता है, परंतु उसका आध्यात्मिक ‘उद्देश्य’ (Purpose) हमेशा हमें भगवान के करीब ले जाना और उनका आश्रय ग्रहण करना होना चाहिए।
- कर्मबंधन और उचित कर्त्तव्य: भगवान अर्जुन को युद्ध करने की आज्ञा देते हैं, किंतु यह स्पष्ट करते हैं कि कार्य कर्तव्य भाव से होना चाहिए, न कि द्वेष, घृणा या बदले की भावना से। निष्काम भाव से की गई सेवा हमें कर्मबंधन से मुक्त करती है।
- मन भगवान को समर्पित करना: भक्ति का मूल उद्देश्य अपने मन को भगवान में लगाना है। हमें विभिन्न परिस्थितियों और रिश्तों को निभाते हुए भी अपनी चेतना और आश्रय भगवान के चरणों में रखना चाहिए। जिस प्रकार गंगा तमाम बाधाओं को पार करते हुए अंततः सागर (भगवान) की ओर बढ़ती है, उसी प्रकार हमें भी हर परिस्थिति में भक्ति मार्ग पर अडिग रहना चाहिए।
Full Transcriptions
मन किसको दे रहे हैं? भागवत कथा का सार
जनशलाकाया चक्षुरुन्मिलितम् येना तस्मै श्रीगुरवे नमः।
नमो ॐ विष्णुपादाय कृष्णप्रष्ठाय भूतले श्रीमते भक्तिवेदान्तस्वामिन् इति नामिने। नमस्ते सारस्वते देवे गौरवाणीप्रचारेणे निर्विशेषशून्यावादीपाश्चात्यदेशतारिणे।
वाञ्कल्पतरूभ्यश्च कृपासिंधुभ्य एव च पतितानां पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नमः। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण! आज यहाँ आप सबके बीच आने का मौका मिला। श्रीराधा-गोविंदन-गोपाल के चरणों में और जो भागवतम का यह अवंतिक गीत है, यह मेरे लिए बड़ा प्रिय विषय है। भागवतम् पर पिछले बार भी इसी विषय पर मैंने चर्चा की थी, तो इस बार मैं मन के विषय पर चर्चा करूँगा। विषय होगा कि हम हमारा मन किसको दे रहे हैं? किसको दे रहे हैं? मैं यह पूछ रहा था।
अभी कई सालों से प्रचार करते-करते थोड़ा अनुभव आ जाता है। पता चल जाता है कि कभी-कभी लोग सवाल पूछते हैं, इसलिए क्योंकि उनको ध्यान चाहिए होता है। कुछ लोग सवाल इसलिए पूछते हैं क्योंकि उनको ध्यान दिखाना होता है। तो वो इतना लंबा सवाल पूछ देते हैं कि बाद में जवाब के लिए समय ही नहीं रहता है। तो फिर जब ऐसे कोई होते हैं लोग, तो बड़ा सेंसिटिव्ली पर एक्सपर्टली वहाँ से निकल जाते हैं। तो जब मैं ऐसे करके बात को टाल के निकलने का प्रयास करता हूँ, तभी मुझे विचार आया मन में कि कोई व्यक्ति मेरे सामने यहाँ पे है और इस व्यक्ति को मैं ज़रूरत से ज़्यादा समय नहीं दे रहा हूँ। क्योंकि मेरे समय से मुझे भगवान की सेवा करनी है, जहाँ पे वास्तव में सेवा हो सकती है, वहाँ पे समय देना चाहिए। तो यह व्यक्ति मेरे सामने है, तो इसको मैं ज़्यादा समय नहीं दे रहा हूँ, पर वो व्यक्ति भारत में है, हज़ारों मील दूर है, और उसको मैं मेरा मन कितने समय से दे रहा हूँ?
मैं इसके बारे में इतना विचार कर रहा हूँ—यह ऐसे क्यों कर रहा है, ऐसे क्यों कर रहा है, ऐसे क्यों कर रहा है? तो मैं व्यावहारिक रूप से मेरा समय यहाँ पे बचा रहा हूँ, पर मानसिक स्तर पर मेरा समय वहाँ पे कितना मैं व्यर्थ गंवा रहा हूँ? तो कई बार जब हम हमारे समय के बारे में विचार करते हैं, तो हम सोचते हैं, हम सोचते हैं कैसे कार्य कर रहे हैं, और कार्यों के स्तर पर कैसे हमारा समय जा रहा है, हम यह देखते हैं। पर मन के स्तर पर हमारा समय कैसे जा रहा है, किस पर हम हमारा समय मानसिक स्तर पर विचार करके हमारा समय व्यर्थ गंवा रहे हैं, या व्यतीत कर रहे हैं, उसके बारे में कई बार हम सोचते नहीं हैं।
मन की आसक्ति और हमारे मानसिक समय की बर्बादी
कभी-कभी दो लोगों में झगड़ा हो जाता है, तो वो दोनों मिलते हैं, एक व्यक्ति कुछ बात करने जाता है, वो उससे बोलता है, मैं तुमसे बात नहीं करूँगा। तो वहाँ पे वो उनको एक पल भी उस व्यक्ति को समय देने को तैयार नहीं है, पर उसके सामने एक पल नहीं देगा, पर बाद में घंटे-घंटे उसके बारे में विचार करते रहेंगे। इसने ऐसे क्यों किया हो, कैसे करने की हिम्मत कैसे, कैसे कर सकता है वो।
तो इस तरह से जो मन है, कई बार हमारा समय इतना ले लेता है, कि हमें पता भी नहीं चलता है। और यहाँ पर बताया गया है कि हम कुछ व्यक्ति को शत्रु मान लेते हैं, कुछ व्यक्ति को मित्र मान लेते हैं, और अरुन्तुदं, जो मन के वेग हैं, बड़े असह्य होते हैं। तो हमें हमारा, जिस तरह से हमारे, हम साधन देखते हैं, तो हमारा धन है, हमारा पैसा है, हम ध्यानपूर्वक खर्च करेंगे, किसी भी छोटी-मोटी चीज़, किसी भी चीज़ पे बहुत सारा पैसा हम खर्च नहीं कर देंगे। तो जैसे कहते हैं कि पैसा बहुत मूल्यवान है, वैसे हमारा समय भी बहुत मूल्यवान है, टाइम इज़ मनी कहते हैं, कि समय यह पैसा समाने ही है, बहुत ध्यानपूर्वक हमें इसका इस्तेमाल करना चाहिए।
पर वास्तव में, हमारे समय से भी महत्वपूर्ण है हमारी मानसिक चेतना, क्योंकि हमारे पास समय होगा भी, पर अगर हमारा मन विचलित है, मन इधर-उधर जा रहा है, मन किसी चीज़ में फँसा हुआ है, तो फिर समय का भी हम उपयोग नहीं कर सकते हैं। तो इसलिए हमारा मन कहाँ है, हमारा मन किसको दे रहे हैं, यह जानना बहुत महत्वपूर्ण है। वास्तव में हम बोलें कि मन किसी को देना, मैं किसी को मन देता नहीं हूँ, पर वास्तव में कैसे होता है, कि मन चला जाता है, और कई बार भगवान बताते हैं भगवद्गीता में, कि राग-द्वेष विमुक्तैस्तु—राग और द्वेष, दोनों से तुम मुक्त होने का प्रयास करो, क्यों? क्योंकि राग और द्वेष, दोनों हमारे मन को खींच लेते हैं। जब राग है किसी से, जब किसी चीज़ से आ सकती है हम, तो फिर उस चीज़ के बारे में हम बहुत विचार करते हैं। किसी व्यक्ति से आसक्ति है, तो उस व्यक्ति के बारे में हम बहुत विचार करते रहते हैं। पर उस तरह से, जब हम किसी से द्वेष करते हैं, और भले ही उस व्यक्ति ने कुछ ऐसे किया हो, जो गुणास्पद हो भी, कुछ बुरा कार्य किया भी हो, पर फिर भी उस व्यक्ति की ओर हमारा मन तुरंत चले जाता है। और जब मन चले जाता है, तो उसके बारे में बहुत विचार करते रहते हैं।
राग, द्वेष और क्रिकेट का उदाहरण
तो एक भक्त बता रहे थे मुझे कि अभी यह चैम्पियंस ट्रॉफी में इंडिया-पाकिस्तान का फाइनल था, और भारत, इंडिया बहुत बुरी चीज़ से हार गए। तो भक्त बता रहे थे कि पिछले तीन दिनों से मैं सो नहीं पाया। कि बोले, इंडिया ऐसे मकवास कैसे खेली। तो बोला कि मुझे लगा था कि मैं क्रिकेट से आसक्त नहीं हूँ, पर अभी मुझे पता चला कि इतना आसक्ति है, कि बोला कि ऐसे कैसे खेल सकते हैं वो।
यहाँ पे क्या है? यह खुशी नहीं है कि इंडिया जीत गए, पर इंडिया हार गई। यहाँ पे भी क्या हो गया? हमारा मन, जो है, वो आसक्ति के कारण किसी चीज़ में जा जाता है, और उसी तरह से, वो, जो, आसक्ति, राग और द्वेष, आसक्ति का जो, वो विरोध है, वो अनासक्ति हो सकती है, और आसक्ति का विरोध जो है, वो घृणा भी हो सकती है। कोई चीज़ हमें बहुत अच्छी लगती है, और कोई चीज़ हमें बहुत बुरी लगती है। दोनों में क्या है? हमारा मन और हमारी भावनाएँ उसी चीज़ में अटकी हुई हैं। जब विरक्ति होती है, तभी हमारी भावनाएँ उस चीज़ में है ही नहीं।
जब मैं कनाडा में था, तभी वहाँ पर आइस हॉकी का एक टूर्नामेंट चल रहा था, वर्ल्ड चैम्पियनशिप चल रहा था, और पूरे कनाडा में वो आइस हॉकी का नशा था। जिन भारत में बहुत लोग को तो इसके बारे में क्या दें, यह पता भी नहीं है। हॉकी पता है, आइस हॉकी, किसी को पता ही नहीं है। तो वहाँ पे लोग भावनाओं के स्तर पर उसमें मन बहुत अटका हुआ है। यहाँ पे हमारी कोई भावनाएँ हैं ही नहीं। तो कोई आइस हॉकी में जीते या हारे, कुछ फ़र्क नहीं पड़ता है।
हमारी जो आसक्ति और घृणा, यह दोनों एक तरह से एक ही सिक्के के दो भाग हैं। जितनी हमारी आसक्ति है किसी चीज़ के प्रति, वही चीज़ अगर उल्टी हो जाएगी, तो उसके प्रति घृणा भी हो जाएगी। तो जिस व्यक्ति के प्रति हम कभी बहुत आसक्त होते हैं, तो जब व्यक्ति हमारी अपेक्षाओं के ख़िलाफ़ कुछ करता है, तो फिर उसके प्रति घृणा हो जाती है, उसके प्रति अनासक्ति नहीं आ जाती है।
The difference between renunciation and aversion is the emotional investment or lack of emotional investment.
जब वैराग्य होता है, विरक्ति होती है, तो उसमें कुछ भावनाएँ है नहीं, वो renunciation है। पर जो aversion है, घृणा है, उसमें भावना अभी तक है, पर वो भावना इस तरह से है, कि उस चीज़ के बारे में सोचने पर हमको गुस्सा आता है, दुखी होते हैं हम, क्रोधित हो जाते हैं, अलग-अलग तरह से नकारात्मक भावना आती है, पर भावना आती ही है।
मन का शत्रु और भगवान से संबंध
तो अभी इस तरह से जो मन है, प्रह्लाद महाराज बताते हैं हिरण्यकशिपु को, कि तुम यह मत सोचो कि विष्णु तुम्हारे शत्रु हैं, वास्तव में तुम्हारा मन ही तुम्हारा शत्रु है, और तुम्हारा मन शत्रु होने के कारण तुम विष्णु को शत्रु मान रहे हैं। तो विष्णु को शत्रु मानना मतलब क्या? कि जब कुछ चीज़ ग़लत हो जाती है, तो फिर एक तो हम, जो व्यक्ति ने कुछ गलत किया है, उसको दोष देते हैं। और अगर हम तत्त्वज्ञान थोड़ा समझते हैं, थोड़ा समझते हैं, तो हम सोचते हैं कि भगवान ने ऐसे क्यों होने दिया, भगवान ने ऐसे क्यों होने दिया, और मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? तो कभी-कभी भगवान के प्रति हमारे नकारात्मक भाव हो सकता है। तो जब ऐसे हो जाता है, तो फिर हम भगवान का आश्रय नहीं ले सकते, भगवान की भक्ति नहीं कर सकते हैं।
तो जो मन है, वह वास्तव में हम कभी बोलेंगे नहीं कि भगवान मेरे शत्रु हैं। हम जानते हैं भगवान सर्वशक्तिशाली हैं और उनके ख़िलाफ़ हम नहीं जा सकते हैं। पर जब कुछ बुरी चीज़ हो जाती हैं, तो हम सोचने लगे कभी-कभी कि भगवान ऐसे होने दे रहे हैं, तो शायद भगवान किसी कारण मेरे ख़िलाफ़ हो गए, भगवान मुझसे क्रोधित हो गए, भगवान मुझसे नाराज़ हो गए हैं। और उसके ख़िलाफ़ ये सब गलतियाँ हो रही हैं। ये सब बुरी चीज़ें मेरे साथ हो रही हैं। इस तरह से जब मन की संकल्पनाएँ बढ़ जाती हैं, तो फिर यह जो मन की संकल्पनाएँ एक दीवार बन जाती है, हम में और भगवान में, हम में और दूसरे लोगों के बीच।
तो इसलिए जब हम हमारे साधारण जीवन में चल रहे हैं, तो हमारी भावनाएँ कहाँ जा रही हैं, कहाँ हम उसको जाने दे रहे हैं, किसमें वो लग रही है, यह देखना बहुत महत्वपूर्ण है। और कई बार जब हम किसी के प्रति बहुत आसक्त जाते हैं, उसके विपरीत कभी-कभी उसी व्यक्ति के प्रति घृणा भी हो सकती है। और जब आसक्ति या घृणा होती है, दोनों में हमारा मन उस व्यक्ति में, उस चीज़ में अटक जाता है।
और जब हम भक्ति करते हैं, तो कभी-कभी भक्ति का जो प्रायोगिक महत्व है या प्रायोगिक हित है, उससे हमें मदद हो सकती है, वो हम समझते नहीं हैं। तो जब हम भक्ति कर रहे हैं, तो हमारे जीवन में कुछ समस्या थी, कोई-कोई ने ऐसी कर दिया, वो से गलत हो गया, या व्यवहार बुरा हो गया था, हम भक्ति कर रहे, मंदिर में आ रहे, जप कर रहे, कथा सुन रहे हैं। तो अभी हमारे जीवन में, जिससे समस्या हैं और जो हमारे अभी भक्ति हैं, तो इसमें तीन प्रकार का संबंध हो सकता है।
भक्ति और समस्या: तीन दृष्टिकोण
एक तो हमारी समस्या से हल प्राप्त करने के लिए हम भक्ति करते हैं। मतलब कि यह समस्या इतनी मुझे पीड़ित कर रही है, मैं इसको भूलना इसलिए ताकि मैं कीर्तन में, जप में, कथा में मेरा मन लगा दूँगा और समस्या को भूलने का प्रयास करूँ।
दूसरा है कि मैं यह भक्ति के ध्यान के दौरान, भक्ति के आश्रय के दौरान इस समस्या का हल ढूँढने का प्रयास करूँ। एक है समस्या को भूल जाना, दूसरा है समस्या का हल ढूँढने का प्रयास करूँ। यह ऐसे क्यों हो रहा है? इससे भगवान मुझे क्या सिखाना चाहते हैं? मुझे इससे क्या करना चाहिए?
और तीसरा है कि यह समस्या, मैं भक्ति कर रहा हूँ, फिर भी यह समस्या आ रही है, तो भक्ति का क्या फ़ायदा है? तो यह समस्या जो है, वो हमारे और भक्ति के बीच में आ जाती है।
So, forgetting the problem, trying to solve the problem, and letting the problem come in between us and Krishna.
तीन प्रकार, तीन चीज़ें हो सकती हैं, इसके भी अलग-अलग चीज़ें उसमें भी हो सकती हैं, पर तीन ये प्रधान हैं। समस्या आती है, तो तीनों चीज़ें हो सकती हैं: कि समस्या हमको भगवान के और करीब लाती है समस्या को भूल जाने के लिए; समस्या हमें भगवान के और करीब लाती है वो समस्या का हल प्राप्त करने के लिए; या समस्या हमें भगवान से दूर ले जाती है, क्योंकि अगर समस्या का हल नहीं हो रहा है, तो भक्ति करने का क्या फ़ायदा है?
तब इस दुनिया में जो बैर है, किसी इस व्यक्ति का उस व्यक्ति से झगड़ा होना, किसी इस व्यक्ति का उस व्यक्ति से झगड़ा होना, यह अनिवार्य है। भूतानां यन्मिथः कलिः, जो कुंती महारानी कहती हैं, कि इस जगत में लोगों का अपने आप से झगड़ा होना, यह इसका स्वभाव ही है, कलियुग का स्वभाव है। उसने ऐसे किया था, ऐसे नहीं करना चाहिए। यह हम उसका व्यावहारिक रूप से हल ढूँढ सकते हैं, पर उससे महत्वपूर्ण यह है, यह समझना कि वास्तव में जो समस्याएँ हैं, उनका कोई एक हल है, उनका एक कारण है, और उनका एक उद्देश्य है।
कारण और उद्देश्य में अंतर
There is a difference between the reason and the purpose.
कारण मतलब यह क्यों हुआ? उद्देश्य मतलब यह किस लिए हुआ? क्यों और किस लिए, आपको लगा एक ही है, इससे फ़र्क क्या है? आहा, फ़र्क एक तरह से नहीं है, पर दूसरी तरह से देखें तो फ़र्क है भी।
कारण और उद्देश्य मतलब, जब हम कारण देख रहे हैं, तो हम एक भौतिकवादी दृष्टियों से भी कारण देख सकते हैं कि, ठीक है, अभी इसको मलेरिया हो गया। क्यों मलेरिया हो गया? क्योंकि यह मच्छर ने काट लिया। ये मच्छर ने काट लिया, जिससे मलेरिया का जो जंतु है, उसके शरीर में आ गया, इसलिए मलेरिया हो गया। तो यह उसका कारण है।
Reason or cause refers to where something comes from. Purpose refers to where something is meant to take us.
जो कारण जब हम बोलते हैं, कारण मतलब यह चीज़ आयी कहाँ से? यह मलेरिया आया कहाँ से? यह मच्छर ने काट खाया, इसलिए मलेरिया आया। उद्देश्य मतलब यह मुझे किस दिशा में ले जा रहा है? किस दिशा में जाना है? किस दिशा में जाना है? मलेरिया को डॉक्टर के पास जाना है, हॉस्पिटल जाना है, और कहाँ जाना है? वो ठीक है, पर वो तो भौतिक स्तर पर ही हो गया।
वास्तव में, प्रभुपाद जी ईशोपनिषद् के एक तात्पर्य में लिखते हैं, वो भौतिक जगत के तार्किक दुःख, क्लेश हैं, हम इस भौतिक जगत के नहीं हैं, हमें भौतिक चेतना से ऊपर उठने हैं, हमें आध्यात्मिक चेतना में आना है। तो जो समस्या का एक व्यवहारिक स्तर पर, हमें व्यावहारिक हल ढूँढने चाहिए और यह व्यावहारिक हल हो सकता है। कोई व्यक्ति ऐसी परिस्थिति में है जो हमारे मित्र के रूप में कार्य कर रहा है, कुछ लोग हमारे शत्रु की तरह कार्य कर रहे हैं और अगर कोई हमें हानि पहुँचाना चाहता है, तो हमें ख़ुद का संरक्षण करना पड़ेगा। कभी संरक्षण करने के लिए कभी प्रतिहार भी करना पड़ेगा।
पांडवों का उदाहरण और युद्ध का प्रसंग
हम देखते हैं, जो पाण्डव हैं, भगवद्गीता सुनने के बाद कौरवों से युद्ध करते हैं। और युद्ध करके वो कौरवों का नाश करते हैं। वही भगवद्गीता दो चीज़ें बताती हैं। एक है कि ग्यारवें अध्याय के तैंतीसवें श्लोक में भगवान बताते हैं अर्जुन को—तस्मात् उत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुंक्ष्व राज्यं समृद्धम् मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।
वो कहते हैं कि अर्जुन, अर्जुन को उठो आप। इसलिए मतलब क्या? इसके पहले श्लोक में भगवान ने अपना विश्वरूप दर्शन दिया है। और विश्वरूप दर्शन में बताया है कैसे कि सारे जो योद्धा हैं, शत्रु के योद्धा, वो सब उनका नाश होने वाला है—भीष्मं च द्रोणं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान्। मया हताँस्त्वं जहि मा व्यथिष्ट युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्। वो सारे इस विश्वरूप के मुँह में जा रहे हैं, सबका विनाश हो रहा है। तो क्योंकि सबका विनाश होने वाला है हे अर्जुन, इसलिए तुम उठो। आप शत्रुओं को हराओ, शत्रुओं की जीत प्राप्त करो, और एक समृद्ध राज्य का आप भोग करो। आपको केवल एक निमित्त बनना है।
पर यही भगवद्गीता के यही अध्याय में, यह 11 अध्याय का 33 श्लोक है, और 22 श्लोक बाद, 55 श्लोक में भगवान बोलते हैं अर्जुन से—मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः। निर्वैराह सर्वभूतेषु यो मामेति पाण्डव॥
वो कहते हैं कि निर्वैराह सर्वभूतेषु, किसी भी चीज़ से आप बैर मत रखो, और बिना किसी चीज़ से बैर रखते हुए, आप अपना कर्म करो। और किसके लिए कर्म करो? मेरे लिए कर्म करो—मत्कर्मकृत्। और जब इस तरह से कर्म करते हो, तो यह—मामेति पाण्डव, वो व्यक्ति ज़रूर मेरे पास आ जाएगा।
तो अभी एक तरह से यह विरोधाभास लगेगा, कि तेरहवें अध्याय में (ग्यारवें अध्याय में) भगवान ने बोला यह तुम्हारा शत्रु है, इनका वध करो तुम और तुम राज्य पाओ। और मैंने यह योजना कर दी है। और अभी बाइस श्लोक बाद भगवान बता रहे हैं कि किसी के प्रति बैर मत रखो। तब यह क्या हो रहा है?
वास्तव में क्या है? कि अगर इस भौतिक जगत में कोई हमारा शत्रु के रूप में भूमिका कर रहा है, शत्रु के रूप में कार्य कर रहा है, तो हमें जो उचित कार्य है, वो करना पड़ेगा। पर वो करते समय हमें उस व्यक्ति के प्रति बैरत्व, उसके प्रति घृणा, उसके प्रति नफ़रत, उसके प्रति क्रोध नहीं रखना है।
इडली का उदाहरण और कर्मबंधन
अब यह कैसे संभव है? किसी ने मेरी निंदा की है, किसी ने मेरे आक्रमण किया है, किसी ने मुझे हानि की है, तो फिर मैं कैसे उस व्यक्ति के प्रति घृणा नहीं रख सकता?
तो वास्तव में होना चाहिए कि जो भी घटनाएँ हमारे जीवन में होती हैं, उसका एक कारण नहीं है। एक बार एक व्यक्ति एक होटल में गया, और होटल में जाके बोला, मुझे कुछ खाने को दो। तो उसने वहाँ पर इडली-सांभर था, तो उसने इडली लिया, तो एक इडली खाया, और दो, दूसरा इडली खाया, फिर और दो, तीसरा इडली खाया, फिर और दो, और चौथा इडली खाने के बाद, ज़ोर से अपने जो हाथ था उस टेबल पर पटका। क्या हो गया? बोला, यह चौथी इडली खा के मेरा पेट भर गया, तो मैं पहले तीन इल्लियाँ (इड्लियाँ) फ़िज़ूल ही खाई, सीधा पहले चौथी इडली खा लेता, पेट भर जाता!
हम जानते हैं, वो चारों इडलियाँ जो हैं, वो उसको पेट भरने के कारण हैं, तो चौथी इडली मतलब पेट पूरा भर गया, पर पहले तीनों इडली से भी पेट भर गया है। पर क्या होता है? जब हमारे जीवन में कुछ घटना घट जाती है, तो सिर्फ वो चौथी इडली को हम देखते हैं, पर जो भी घटना हो रही है, वो अकेली उस चीज़ का, जो भी हुआ है, उसका कारण नहीं है, उसके पहले भी एक इतिहास है, और वो इतिहास को हम देखते ही नहीं हैं। तो यह व्यक्ति ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया, इसकी ज़रूरत कैसे हुई? मैंने इसके लिए इतना किया था और इतना यह खुदगर्ज़ निकला, इतना यह कृतघ्न निकला, कि इसने मेरे साथ ऐसा कर दिया।
ये वैसी भावना होती है, तो हम क्या देख रहे हैं? सिर्फ चौथी इडली को देख रहे हैं। ये चौथी इडली के कारण क्या हो गया? यह व्यक्ति ने ऐसे कैसे किया? पर वास्तव में, इसके पहले भी तीन इडलियाँ हैं। तीन इडलियाँ मतलब क्या है? वास्तव में व्यक्ति ने जो भी किया है, हमने भी पहले कुछ कर्म किया है। व्यक्ति ने किया होगा जो कार्य होगा, वह मेरे कर्म-बंधन का कारण बन जाएगा।
Action does not cause bondage. The intention with which action is done causes bondage.
हम जो कार्य करते हैं, उसके द्वारा बंधन होता है। कौरवों ने शत्रुओं के रूप में कार्य किया है। उनके प्रति कौरवों ने बड़ा अत्याचार किया है। कौरव शत्रु के रूप में कार्य कर रहे हैं। तो इसलिए पाण्डवों को कौरवों का प्रतिकार करना ज़रूरी है। पर ऐसे करते समय अगर पाण्डव कौरवों को तुम मेरे शत्रु हो और तभी हम क्रोध कर सकते हैं।
पर महत्वपूर्ण यह है कि हम जो क्रोध है, वो एक भावना और दूसरा है उद्देश्य है। तो कई बार भावना के स्तर पर कुछ क्रोध आ जाना वो स्वाभाविक है। पर वही हमारा हेतु बन जाता है। इस क्रोध के कारण मैं बदला लेने के लिए ऐसे कार्य करने वाला हूँ, तो फिर वो हमारे कर्म-बंधन का कारण बन जाएगा। पाण्डवों ने कौरवों से युद्ध किया बदला लेने के लिए नहीं। युद्ध किया धर्म की संस्थापना के लिए। धर्म संस्थापना अर्थाए—धर्म के लिए अधार्मिक जनों को निकालना था राजगद्दी से।
हमें भी कोई व्यक्ति अगर शत्रुत्व के स्तर पर कार्य कर रहा है, हमारा कुछ नुक़सान कर रहा है, तो उसका प्रतिकार करना पड़ेगा। पर वो प्रतिकार करते समय उस व्यक्ति के प्रति घृणा नहीं आने देनी चाहिए। जब घृणा आ जाती है, तो फिर वो घृणा के कारण हमारे कर्म-बंधन में प्रतिकार कर रहा है, हमें और भावनात्मक रूप से उसे अटका देता है। पर जब हम घृणा के कारण या क्रोध के कारण या बदले के बारे में कार्य नहीं करते हैं, हम एक सेवा के रूप में कार्य करते हैं कि ठीक है, अभी मुझे यह सेवा करनी है और इस सेवा में यह व्यक्ति का कार्य विघ्नरूप हो रहा है, तो इसलिए मुझे इसके बारे में कुछ करना पड़ेगा। और जब इस विचार से मैं कार्य करता हूँ, तो वो सेवा भाव से किया गया कार्य जो है, वो कर्मबंधन में नहीं फँसाता मुझे, वो वास्तव में कर्मबंधन से मुझे निकालता है कि मैं भगवान के करीब जा रहा हूँ।
मन भगवान को समर्पित करना
हमें हमारा मन किसी व्यक्ति को नहीं देना है, हमारा मन भगवान को देना है। मन भगवान को देना मतलब हमारा जो मानसिक चेतना है, भगवान जो चाहते हैं, हमारे भगवान की सेवा में, भगवान के सेवा के विचार हैं। तो मैं पहले बता रहा था, अभी समस्या है मेरे जीवन में और मैं भक्ति कर रहा हूँ।
तो एक है कि वो समस्या से भूलना है मुझे, समस्या से छुटकारा प्राप्त करना है। तो इसलिए जो भी समस्या है, मैं मंदिर में आता हूँ, शांति लगती है, तो इसलिए मैं भक्ति कर रहा हूँ, यह अच्छा है, किसी पद्धति से हम भक्ति कर रहे हैं, यह अच्छा है। और अगर हम, समस्या है मेरे जीवन में, हमें कुछ हल ढूँढने का प्रयास है, तत्त्वज्ञान का आश्रय लेते हैं, ऐसे क्यों हो रहा है, इसका उद्देश्य क्या है, और हम तत्त्वज्ञान को और तीव्रता से, ध्यान से सुनते हैं, समझते हैं, और उससे हमें कुछ जवाब मिलते हैं, वो भी अच्छा है।
पर यह दोनों से महत्वपूर्ण यह है कि वास्तव में हम भक्ति इसलिए करते हैं, कि हमें हमारा मन भगवान को देना है। भगवद्गीता में सबसे अधिक बार जो उद्देश्य भगवान देते हैं, भगवान को उद्देश्य देते हैं, वो है कि आप मेरा मन मुझ में लगाओ—मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमुरु। कि हमें हमारा मन भगवान को देना है। जब हम जप करते हैं, कथा सुनते हैं, शास्त्र अध्ययन करते हैं, तो उद्देश्य सबके पूजा करते हैं, विग्रहों की सेवा करते हैं, तो हमारा मन भगवान को देना है।
और देना है मतलब क्या? ऐसे नहीं, पाँच मिनट के लिए मन दे देना, वापस ले लेना, ऐसे नहीं है, हमारा मन भगवान के साथ रहना चाहिए, मन को भगवान से आसक्त करना है। भगवान से आसक्त करना मतलब कि हम जहाँ भी जाते हैं, हम भगवान की सेवा भाव के साथ जाते हैं, जो भी कार्य करते हैं, भगवान की सेवा भाव के साथ कार्य करते हैं।
जैसे अगर हम, हमारा परिवार था और हम कोई नौकरी कर रहे हैं, तो हम हमारे ऑफ़िस में जाते हैं, कोई मार्केटिंग करना है, इस शहर जाते हैं, उस शहर जाते हैं, जहाँ भी जाते हैं, वहाँ पर हमारा मन है—मुझे यह करना है, यह करना है। पर वहीं पर हमारा मन नहीं है, हमारे मन में यह भी है, मेरा परिवार यहाँ पर है, नासिक में है, मुझे उनकी देखभाल करनी है, मुझे उनके लिए लाना है, वो लाना है, इसलिए मैं यह सब कर रहा हूँ। तो जैसे होता है, कि वहाँ पर क्या है? हमारा मन एक जगह पर इन्वेस्टेड है।
The mind can be directed to many places, but it needs to be invested in Krishna.
जो मन है, हमें बहुत से कार्य करने हैं, कार्य करने हैं तो उसके बारे में विचार करना ही है। तो अगर हम मंदिर के लिए कुछ सेवा करनी है, तो उसके बारे में विचार करना है। हमारे बहुत से जगह कुछ ज़िम्मेदारी है, उसके लिए विचार करना है। तो मन को उधर जाना है, पर उसके साथ-साथ जो मन का जो इन्वेस्टमेंट है, मन का जो भावनात्मक स्तर पर जो उसका आश्रय है, वो भगवान है।
प्रतिकूलता और मन का रिप्ले मोड
जब ऐसे होता है, इस तरह से जब हम भगवान में आश्रित रहते हैं, तो फिर जो भी समस्या आती है, वो समस्या में हम देखते हैं कि ठीक है, मुझे भी सेवा करनी है, भगवान की सेवा कैसे करूँ? यह व्यक्ति मेरे भगवान की सेवा के लिए अनुकूल है, मुझे मदद करते हैं, मार्गदर्शन देते हैं, प्रोत्साहन देते हैं, उनसे मुझे प्रेरणा मिलती है, तो मैं इनका संग और करूँगा। यह व्यक्ति मुझे हमेशा निंदा करते हैं, यह व्यक्ति हमेशा मेरा हतोत्साहित करते हैं, तो फिर मैं इनसे थोड़ा दूर रहूँगा, यह व्यक्ति प्रतिकूल है मेरे भक्ति के लिए। तो इसमें हमारी भावना हम इस व्यक्ति में या उस व्यक्ति में अटकने नहीं देते हैं, मेरी भावना है भगवान की ओर, और भगवान की ओर यह भावना है, तो फिर उसके आधार पर हम देखते हैं कि इस व्यक्ति से कैसे आचरण करना है, उस व्यक्ति से कैसे आचरण करना है, और अगर कुछ प्रतिकूल है, तो हम उससे दूर रहते हैं।
तो जब व्यक्ति के लिए प्रतिकूल है, व्यक्ति के लिए प्रतिकूल है, पर मन उसके पास, कैसे वो कर सकता है? मैं इसको दिखा दूँगा अभी, एक दिन आए तो फिर मैं इसको दिखाता हूँ! फिर वो मन वहीं पे, पूरा वास्तव में, वो व्यक्ति, जिसने हमें जो कुछ भी किया है, जिसके लिए हम अपना क्रोधित हो गए हैं उसके प्रति, वो व्यक्ति ने हमारे मन को नियंत्रित कर लिया है, नहीं? वो व्यक्ति ने हमारे मन को नियंत्रित कर लिया है, वो व्यक्ति ने हमारे मन को नियंत्रित कर लिया है, फिर एक तरह से हम वो मन में जो भी विकार हैं, उसके एक कटपुतली बन जाते हैं, उसके अनुसार हम कार्य करते हैं।
तो भक्ति का, भक्ति करने का जो उद्देश्य है कि हमें मन भगवान को देना है, और जब हम यह समझते हैं, मन भगवान को देते हैं, तो जो भी रिश्ते हैं हमारे, जिसमें उचित पद्धति से हमें कार्य करना है—कोई व्यक्ति मित्र है, कोई व्यक्ति शत्रु के रूप में कार्य कर रहा है, कोई व्यक्ति उदासीन है—तो उन सब से हम उचित पद्धति से आचरण प्रदान करेंगे, पर हमारा मन भगवान में आश्रित रहेगा।
साधारणतया कोई निंदा करता है, तो उससे थोड़ा मन विचलित होगा, पर अगर हमारा मन उसी में है, उसी व्यक्ति से आसक्त है, या घृणा से है, तो फिर वही जो है, बार-बार चलते रहेगा। जो अभी मैं बता रहा था—एक क्रिकेट के मैच में यह व्यक्ति सो नहीं पाया तीन दिन तक, तो क्यों? क्या हुआ? वो क्रिकेट मैच तो ख़त्म हो गई, पर वो क्रिकेट मैच का एक्शन रीप्ले उसके मन में चल रहा है कंटीन्यूअस। कभी-कभी कुछ-कुछ वीडियो प्रोग्राम होता है, उसमें ऑटो रीप्ले मोड होता है—तो ख़त्म हो गई, आपस रीप्ले करो, तो आपस रीप्ले करो।
तो वैसे हम देखते हैं हमारे मन में कुछ-कुछ चीज़ों के प्रति ऑटो रीप्ले मोड होता है—उसने ऐसे बोला, कैसे बोल सकता है वो? उसने ऐसे बोला, कैसे बोल सकता है वो? कैसे बोल सकता है वो? वो ही घिसी-पिसी कहानी बार-बार-बार-बार चलते रहती है और हर बार चलते रहती है, तो क्या होता है? हमारा और घृणा बढ़ जाती है, क्रोध और बढ़ जाता है। तो यह जो भक्ति है, भक्ति से जो ऑटो रीप्ले मोड है, इसको हमको रोकना है।
जप के समय आने वाले व्यवधान और निष्कर्ष
और कभी-कभी अगर हम हमें मन भगवान को देना है, यह उद्देश्य अगर हम ध्यान में नहीं रखते हैं, तो फिर क्या होता है? जब हम जप करते हैं, जप के समय हमारा मन भगवान के लिए नहीं आता है, यह जो है, एक एक्सीलरेटेड ऑटो रीप्ले हो जाता है! जो भी हमें विचलित करता है, वो सारे विचार जप के समय आ जाता है—इसने ऐसे किया, उसने ऐसे किया, उसने ऐसे किया! क्योंकि दस साल पहले जिसने जो किया है, वो भी आ जाता है। दस साल तक याद नहीं किया है, पर जप करते हैं, तब आता है। क्योंकि क्या है? तभी जो अगर हमारा मन भगवान के पास चला गया, अगर हमने मन भगवान को दे दिया, तो फिर जो मन का हम पे नियंत्रण है, वो नियंत्रण नहीं रहेगा और इसलिए मन ये चाहता नहीं है कि वो अपना, उसका हमारा पे नियंत्रण हटे। इसलिए जप के समय जब हम भगवान को मन देने का प्रयास कर रहे हैं, उस समय वो सबसे ज़्यादा हस्तक्षेप करता है, सबसे ज़्यादा झंझटें लाता है।
पर जब हम यह उद्देश्य समझते हैं, कभी-कभी मुश्किल हो सकता है, मन भगवान की ओर केंद्रित नहीं होता है, क्योंकि पहले जो कारण है, वो हमको पता नहीं है, क्या कर्म है, वो बहुत बार हमें पता नहीं है। तो कई बार हमें कारण पता होना बड़ा मुश्किल हो जाता है, पर कुछ भी हो, हमें उद्देश्य पता हो सकता है। हमें उद्देश्य पता हो सकता है जो भी हो रहा है, कभी-कभी ऐसे लगता है कि जो हो रहा है कि वो भगवान से हमें दूर ले जा रहा है।
कभी-कभी क्या होता है कि भक्तों के बीच में कुछ झगड़े हो जाते हैं, ग़लतफ़हमियाँ हो जाती हैं, तो हमें समझना चाहिए कि अभी द्रौपदी रो रही थी कि कोई भी उसका मदद नहीं कर पाया उस समय तो उस समय क्या हुआ? केवल भगवान का आश्रय लिया। उसके बाद में उन्होंने अपने पतियों के प्रति कोई घृणा नहीं की कि तुमने मेरी मदद क्यों नहीं की? तभी वो हो गया, हो गया, पर उस समय उन्होंने भगवान का आश्रय लिया, द्रौपदी ने।
तो उसी तरह से कभी-कभी ऐसे हो सकता है कि साधारणतया जिन चीज़ों से और जिन माध्यमों से हमें भगवान का आश्रय मिलता है, उसी माध्यम में कभी-कभी कुछ हमारा मन विचलित हो सकता है, जो भक्तों के द्वारा हमें कभी आश्रय मिलता है, कभी-कभी वो भक्तों के द्वारा हमें विचलित हो सकता है। तो उस समय हम सोचे कि मैं भक्ति क्यों कर रहा हूँ? मैं क्या करूँ अभी? पर हमें समझना चाहिए उस समय भी कि हमारे जीवन में भगवान हमें आश्रय अलग-अलग माध्यमों से प्रदान करते हैं और कभी-कभी जो व्यक्ति हमें एक समय कुछ आश्रय प्रदान कर सकता है, कुछ मदद कर सकता है…
भक्ति, समस्या और हमारा मन: मार्ग और उद्देश्य (भाग-2)
जीवन के विभिन्न चरणों में आवश्यकताएँ
दूसरी परिस्थिति में शायद वह उतनी क्षमता नहीं होती है। क्या होता है, कभी-कभी जब एक व्यक्ति हमारे लिए कुछ करता है, तो हमारी उस व्यक्ति से अपेक्षा बहुत बढ़ जाती है। और उस व्यक्ति से अपेक्षा बढ़ जाती है, तो फिर अलग-अलग ज़रूरतें होती हैं। अलग-अलग समय पे, अलग-अलग परिस्थितियों में, अलग-अलग मानसिक स्तर पर, हमारी अलग-अलग ज़रूरतें होती हैं। और अलग-अलग लोग ज़रूरतें पूरी कर सकते हैं।
जैसे छोटा बालक जब होता है, तो उसको अपनी माँ की बहुत ज़रूरत होती है, माँ से दूध मिलता है, माँ उसकी पूरी देखभाल करती है। ऐसे जब बालक बड़ा होने लगता है, तो अभी उसको खेलना है, खेल-कूद करना है, तो माँ थोड़ी-बहुत खेल-कूद पर उसको अपने मित्र चाहिए। अभी जो मित्र जो उसकी ज़रूरत पूरी कर सकते हैं, वो माँ नहीं कर सकती है। माँ कितना भी प्रेम कर रही है उससे, वो माँ पूरी नहीं कर सकती है। तो उसके लिए अभी वो अपना बच्चा है, जो छोटा बालक है, पहले तो हमेशा माँ के साथ रहता था, जो अभी माँ जहाँ जाती है, वहाँ पर जाता है, थोड़ा बड़ा लगता है कि माँ बुलाती है तो भी आता नहीं है, खेलते रहता है। तो अगर माँ सोचने लगती है कि ये बच्चा अभी मेरी परवाह नहीं करता है, ऐसे नहीं है, परवाह नहीं कर रहा है। वास्तव में क्या है, वो उस समय उसकी ज़रूरत खेल-कूद की है, तो मित्र जो उसकी ज़रूरत पूरी कर रहे हैं, उनके साथ रह रहा है।
तो क्या है? अगर वो बालक सोचेगा कि मेरी माँ ने बचपन में मुझे दूध दिया, देखभाल किया, माँ ने मुझे… खेलना चाहिए। हाँ, माँ खेलेगी थोड़ा-बहुत, पर दूसरे मित्र जैसे खेल सकते हैं, वैसे नहीं खेलने वाली है माँ। तो दोनों की दृष्टि से, माँ की दृष्टि से और बालक की दृष्टि से, क्या है? अलग-अलग स्तरों में, अलग-अलग जीवन के स्तरों में, यह उनके फ़ेज़, यह उनके दौरों में हमें अलग-अलग हमारी ज़रूरतें हैं और अलग-अलग लोग पूरी करते हैं। ठीक उस तरह से हमारे भक्ति में भी हमें अलग-अलग परिस्थितियों पे अलग-अलग ज़रूरतें होती हैं और वो भगवान पूरी करेंगे। पर वो अलग-अलग जगह से कर सकते हैं।
माध्यम और भगवान के प्रति दृष्टिकोण
तो इसलिए जब हम समझते हैं कि ये व्यक्ति एक माध्यम है और वो माध्यम तो पूर्ण है, हम उस माध्यम को आदर देते हैं। पर अगर ये माध्यम का उद्देश्य क्या है कि मुझे भगवान के करीब जाना है। पर अगर किसी माध्यम से हम भगवान के करीब नहीं जा पा रहे हैं, उल्टा वो माध्यम जो है, अभी एक दीवार बन रहा है हमें भगवान के करीब जाने के लिए, तो हम उससे दूरी रखते हैं, आदर से दूरी रखते हैं और हम जिस माध्यम से भगवान की ओर जाते हैं, जा सकते हैं, उस माध्यम को अपनाते हैं।
द्रौपदी के पास उस समय जो पाँचों पुत्र थे, कोई भी उसको मदद नहीं कर पा रहा था। तो फिर क्या हो गया तभी? उसको सीधा उसने भगवान का आश्रय ले लिया। ऐसे नहीं है वो परिस्थिति के बाद उसने पतियों को ठुकरा दिया, नहीं। उसके बाद में, अगर वो भगवान का आश्रय लेती है, वह अगर भगवान की जगह ले लेती है, मतलब यही मेरा सर्वस्व है, अगर हम ऐसे तरह सोचते हैं, और फिर वो व्यक्ति, वो चीज़, वो कार्य, वो हमारे जो ज़रूरत है, पूरे नहीं कर पाती है, तो हम तभी सोचते हैं कि तो भगवान का क्या फ़ायदा है?
भगवान बहुत विशाल हैं और भगवान अनेक पद्धतियों से हमें आश्रय दे सकते हैं। और जिस भी माध्यम से, जिस भी व्यक्ति के द्वारा, जिस भी कार्य के द्वारा, जिस भी परिस्थिति के द्वारा, जिस भी माध्यम से भगवान ने आश्रय दिया है, उसके प्रति हमें कृतज्ञ हैं। पर साथ-साथ हम क्या करते हैं, हमारा मन, हमारी जो चेतना है, हम रिसेप्टिव रखते हैं, ओपन रखते हैं कि भगवान आश्रय किसी भी पद्धति से, जिस पद्धति से आश्रय देंगे, उस पद्धति से मैं आश्रय लूँगा।
गंगा की तरह भगवान की ओर बढ़ते रहना
जैसे कुंती महारानी कहती हैं, जैसे गंगा हमेशा सागर के लिए जाती है और एक साधारण उसका मार्ग होगा। पर अगर वो मार्ग जो है, वो किसी कारण से सूखा पड़ गया, वो मार्ग बंद हो गया, तो वो गंगा सागर पर जाना रोकने देगी? वो कोई और मार्ग ढूँढ लेगी और वो मार्ग से चले जाने लगेगी। विश्व में कहीं ऐसे जगह हैं जहाँ पर पहले एक बहुत बड़ी नदी हुआ करती थी और वहाँ पर पूरा सूखा है। अगर वो नदी ने दूसरा मार्ग नहीं ढूँढा, तो नदी भी सूख जाएगी।
तो क्या है? हमें हमेशा भगवान की ओर जाते रहना है और जैसे नदी, गंगा हमेशा सागर पर जाती है और कोई बाधा आ गई, तो कोई और मार्ग ढूँढ लेती है, कभी ऊपर से, नीचे से, बाजू से या उसे ही फिर इरोड करके चल जाती है। इसी तरह से हमें भी जाते रहना चाहिए भगवान की ओर। कैसे जाएँगे हम? वह अलग-अलग पद्धतियों में, अलग-अलग चीज़ से कर सकते हैं।
तो जब हम यह उद्देश्य समझ लेते हैं कि जो भी हो रहा है, उसके कारण मैं समझ पाऊँ या नहीं समझ पाऊँ, पर मैं उद्देश्य समझ लेता हूँ कि मुझे भगवान के करीब जाना है। जब भगवान के करीब जाते हैं, भगवान का आश्रय ग्रहण करते हैं, तो उसके बाद में भगवान हमें बुद्धि देते हैं। यह परिस्थिति है, यह समस्या है, इसमें मुझे क्या करना चाहिए? इसमें मैं सहन करना चाहिए, यह प्रतिकार करना चाहिए या चले जाना चाहिए यहाँ से दूर, जो भी करना है, वहाँ उचित पद्धति से हम कर पाएँगे। अगर हम भगवान का आश्रय ग्रहण कर लेते हैं।
कारण और उद्देश्य का विश्लेषण
अगर भौतिक समस्या का हम भौतिक स्तर पर आश्रय ग्रहण करते हैं, तो कारण और उद्देश्य… जब मुझे मलेरिया हो गया, उसका कारण क्या है? मच्छर ने मुझे काटा। पर वो ‘चौथी इडली’ है, मैंने पहले कुछ कर्म किया था, उसके लिए वो मच्छर ने मुझे काटा है। कारण कुछ भी हो, कभी हमें पता चल सकता है, पर उसके लिए उद्देश्य क्या है? जो उद्देश्य है कि जो भी हो रहा है, यह भौतिक जगत का सबका उद्देश्य है कि मुझे भगवान का आश्रय ग्रहण करना है।
तो जब हम भक्ति करते हैं, समस्याएँ जब हमारे जीवन में हैं, तभी तो एक है समस्या को भूलने के लिए, दूसरा है समस्या का हल ढूँढने के लिए, तीसरा है हम समस्या के कारण भक्ति का क्या फ़ायदा है, सोचने लगते हैं। पर वास्तव में तीसरा जो है, वो ग़लत है क्योंकि जो समस्या है, वो हमारे पूर्व कर्म के कारण आ रही है और भगवान हमें आश्रय देने के लिए तैयार हैं। वो आश्रय बस हमें लेना है।
शत्रुता, घृणा और भक्ति
कोई व्यक्ति हमें कुछ नुकसान कर रहा है, तो हम उसके प्रति घृणा कर लेते हैं, तो हमारा मन उसमें अटक जाता है। आसक्ति से मन अटकता है और घृणा से भी मन अटक जाता है। अनासक्त होना मतलब क्या? मन उसमें अटका नहीं है। तो हमें भौतिक चीज़ों से मन निकाल के भगवान में लगाना है। और जब ऐसा हम भगवान में मन लगाते हैं, वह धर्म की स्थापना के उद्देश्य से, वह सेवा के भाव से किया जाता है।
भगवान अर्जुन से कहते हैं कि ये तुम्हारे शत्रु हैं, इनका तुम वध करो, मैंने ही पहले कर दिया, तुम तो निमित्त बनो। पर वही भगवान कहते हैं कि किसी के प्रति वैर मत रखो। एक व्यावहारिक रूप से, हाँ, व्यक्ति तुम्हारे शत्रु हैं, तो उसके ख़िलाफ़ युद्ध करो। पर एक अंतरंग चेतना के स्तर पर हम समझें कि वास्तव में मेरा कोई दुश्मनी उस व्यक्ति से नहीं है, मेरा उद्देश्य है और जो सेवा के लिए अनुकूल है, वो मैं करूँगा। तो हमारे जीवन में भी अगर कोई व्यक्ति हमारे व्यक्तित्व के प्रतिकूल है, हमारे सेवा के प्रतिकूल हो रहा है, कर्तव्य के प्रतिकूल हो रहा है, तो उस व्यक्ति को ही हमें दोष नहीं देना है पर उस व्यक्ति में मैं मेरे मन को अटकने नहीं दूँगा।
ऑटो-रिप्ले मोड और सकारात्मकता
हम जब भक्ति के कार्य के द्वारा मन भगवान में आश्रित कर देते हैं, तो फिर जो इस दुनिया में जो मन अटक जाता है, वो अटकेगा नहीं और फिर हम शांति से उचित कार्य कर पाएँगे। क्योंकि जब मन किसी चीज़ में अटक जाता है, तो उसके द्वारा वो हमें नियंत्रित कर लेता है और मन नियंत्रण छोड़ना नहीं चाहता है। इसलिए जब हम भक्ति कर रहे होते हैं, तो मन बहुत बीच में आता है। पर उसके बावजूद जितना प्रयास हम करते हैं, भले ही हमारा मन भगवान में लगे नहीं, पर हम लगने का उद्देश्य रखे हैं, तो वो भी एक तरह से यश है।
और जितना हमारा मन धीरे-धीरे भगवान में लग जाएगा, उतना हम में क्रोध भी आ सकता है, पर क्रोध एक भावना के रूप में आएगा। क्रोध हमारा उद्देश्य नहीं बनेगा कि कार्य करने का उद्देश्य रहे। क्रोध आ गया, मुझे फिर भी भगवान की सेवा करनी है। सेवा भाव से भगवान में हमारा मन होता है, तो फिर हम हर परिस्थिति में उचित कार्य कर सकते हैं। जो कार्य हमें भगवान के करीब ले जाए, जो कार्य उस समस्या का हल करे, पर हम वो कार्य करते समय कर्मबंधन में न फँसें।
कभी-कभी जब हम भक्ति कर रहे हैं, जो भक्तों के बीच में झगड़े होने लगते हैं। जिन भक्तों के कारण हम भगवान के करीब आए, कभी-कभी वो भक्त ही हमें भगवान के पास जाने में ऐसा लग रहे हैं कि बीच में आ रहे हैं। हमें समझना चाहिए कि कोई भक्त भी भगवान का प्रतिस्पर्धी नहीं बनना चाहिए। भगवान के लिए भगवान ही सर्व-आश्रय है, सबका सर्व-आश्रय है और भगवान उसके भक्त जाएँ, वो मार्ग है।
तो द्रौपदी जब उनके पति उनको धर्म में बाधा कर रहे थे, तो वो पति की सेवा कर रही थी। जब पति मदद नहीं कर पाए, तो उन्होंने भगवान का आश्रय सीधा ले लिया। उसी तरह से हमारे अलग-अलग परिस्थितियों में, अलग-अलग ज़रूरतें होती हैं।
शास्त्र और बुद्धि का प्रयोग
जो नकारात्मक भाव होता है मन का, तो वो भक्ति के तत्त्वज्ञान को भी हम उल्टा ले लेते हैं। और वो यह ‘जग-दुःखालय’ है, तो भगवान ‘सुख के सागर’ हैं, भगवान हमारे आश्रय हैं। तो नकारात्मक भाव अगर हम रख रहे हैं अधिक, तो फिर उसका मतलब क्या हो रहा है? हमारी चेतना इस जगत में है अभी तक, भगवान में गई नहीं है।
तो हाँ, इस दुनिया में पर भगवान उनके द्वारा अच्छा निष्कर्ष लाकर हमें उनकी ओर करीब ले आ सकते हैं। तो अगर हमारी भगवान में चेतना होगी तो हम नकारात्मक नहीं होंगे, हम सकारात्मक होंगे। Bad things will happen in this world but Krishna will bring good even out of the bad.
जब मन नकारात्मक दिशा में चलने लगता है, तो मन सकारात्मक दिशा में कैसे जाए, उसका हमें विश्लेषण करना है। एक है कि ठीक है, पानी इधर जा रहा है, मैं उसको पानी नहीं जाने देना इधर, उसको बंद करता हूँ। पर अगर हम हमारी भक्ति में ढूँढते हैं कि क्या चीज़ें हैं जो हमारे विचारों को सकारात्मक दृष्टि में ले जाती हैं।
अगर किसी को हो सकता है, कीर्तन सुनने से बड़ा सुकून लगता है, किसी को अगर दर्शन कर लेते हैं भगवान का बहुत अच्छा लगता है, किसी को कुछ कथा सुन लेते हैं अच्छा लगता है, किसी को कुछ लोग गाने से अच्छा लगता है। जो भी है, हमें देखना है कि मेरा मन तेज़ी से भगवान की ओर किस कार्य के द्वारा जाता है।
तो ये एक युद्ध है और युद्ध में हमें हमारे शास्त्र साथ में रखने हैं। तो हम शास्त्र साथ में रखते हैं, तो फिर जो मन का नकारात्मक प्रभाव है, उसका हम प्रतिकार कर सकते हैं।
निष्कर्ष और सूचना
प्रभुजी, आपने कहा कि कैसे राग, द्वेष, ये जो emotions हैं, उसके द्वारा हम कर्मबंधन में फँस जाते हैं। और हम प्रायः देखते हैं कि कैसे ये emotions motivational factor रहते हैं काम करने के लिए। तो अगर हमको detached भी होना है और काम करने के लिए motivated रहना है, तो उसके लिए हम कैसे कर सकते हैं? कि emotional जो एक inseparable पार्ट हमारा रहता है कार्य करने के लिए।
पजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्। आत्मन्य एवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।
अभी हम बता रहे हैं कि सारे जो काम हैं, उनको छोड़ दो आप। सारी वासनाओं को छोड़ दो। अगर सारी वासनाओं को छोड़ दो, तो कुछ वासनाएँ पूरी हो जाती हैं, कुछ इच्छा पूरी हो जाती हैं तो सुखी हो जाते हैं, कुछ इच्छा पूरी नहीं होती हैं तो दुखी हो जाते हैं। तो सुखी और दुखी दोनों से जाएँगे। आत्मन्य एवात्मना तुष्टः – आप संतुष्ट रहोगे। आत्मा और आत्मा का भगवान का संबंध है।
कार्य का उद्देश्य नहीं है, हमारा भगवान की सेवा करना। तो भगवान के संबंध में जो भक्त हैं, उनको प्रसन्न करना, भगवान की सेवा के लिए कुछ करना, वह हमारा उद्देश्य रखना है। और उस उद्देश्य से जो भावनाएँ हैं, मन हमें भगवान में लाना है। मतलब क्या? हमारी भावनाओं को भगवान में केंद्रित करना है। और उस तरह से जब हम भगवान को केंद्र में रखके, हमारी भावनाओं में उनमें आश्रित रखके, फिर हम कार्य करते हैं, तो उसमें प्रेरणा रहेगी।
अंत में, कुछ सूचना इस प्रकार से है: कल तीन तारीख है, तो जो बॉयज टाउन स्कूल है, वहाँ पर हिंदी का कार्यक्रम आयोजित किया गया है, ईश्वर काले प्रभु। तो जो भक्त वो देखना चाहते हैं, वो सुबह 8 बजे कल बॉयज टाउन में जा सकते हैं। चार तारीख को आषाढ़ी एकादशी है, तो शाम को भजन संध्या का कार्यक्रम होगा और संपदा हिरे जी हैं, ये भजन संध्या लेने वाली हैं। तो आप सब इस विशेष भजन संध्या के लिए आमंत्रित हैं, एक बहुत ही विशेष भजन संध्या होगी। अगला मीटिंग शुक्रवार को नहीं होगा, वो गुरुवार को होगा। जो भी गीता कॉन्टेस्ट के वालंटियर्स हैं, यहाँ पे नहीं आए, कृपया आप उनको इंफॉर्म कर दीजिये, शाम को 8 बजे ये मीटिंग होगा। इसमें जो हमने हमारा बुकलेट बनाया है, गीता कॉन्टेस्ट का उसका प्रकाशन समारोह भी होगा, तो आप सारे भक्त उस विशेष कार्यक्रम के लिए आमंत्रित हैं।
हरे कृष्ण!