How to surrender amidst different and difficult situations – Hindi
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Lecture Summary
शरणागति (समर्पण) का वास्तविक अर्थ
- सक्रिय समर्पण: शरणागति का अर्थ केवल विपत्ति में असहाय होकर हाथ खड़े कर देना (जैसे द्रौपदी ने प्रारंभ में किया) नहीं है। अर्जुन की तरह पूर्ण तत्परता से अपना कर्तव्य (युद्ध) निभाना और स्वयं को भगवान का निमित्त मानना भी सच्ची शरणागति है।
- वर्तमान में प्रयास: शरणागति का सीधा अर्थ है— “अभी हमारे पास जो भी साधन और क्षमता है, उसी के साथ अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करना।”
परिस्थिति और हमारी प्रतिक्रिया
- स्वीकृति (Acceptance): किसी भी विपरीत परिस्थिति (या स्वयं की कमियों) से पार पाने की पहली सीढ़ी उसे स्वीकार करना है। वास्तविकता से घृणा करने या उससे लड़ने से केवल मानसिक पीड़ा बढ़ती है।
- नियंत्रण की सीमाएँ (टेनिस का उदाहरण): जीवन एक टेनिस मैच की तरह है। कई परिस्थितियाँ (Serve) हमारे नियंत्रण में नहीं होतीं, लेकिन उन पर हमारी प्रतिक्रिया (Return) हमारे हाथ में होती है। हमारे पास जितने भी विकल्प बचे हैं, हमें उन्हीं में सर्वश्रेष्ठ चुनाव करना चाहिए।
समस्याओं के प्रति आध्यात्मिक दृष्टिकोण
- ईश्वर की योजना पर विश्वास: भगवान की बुद्धि और दृष्टि हमसे कहीं अधिक श्रेष्ठ है। यदि कोई मार्ग बंद हो जाता है या कोई समस्या तुरंत हल नहीं होती, तो उसमें भी भगवान की कोई सकारात्मक योजना छिपी हो सकती है।
- अपेक्षाओं से अनासक्ति: भगवान से अपनी समस्याओं को सुलझाने की अपेक्षा रखना स्वाभाविक है, लेकिन उन अपेक्षाओं से अत्यधिक आसक्त होना (Attachment) हमारे और भगवान के बीच एक दीवार बन सकता है।
- शास्त्रों का मार्गदर्शन: शास्त्र केवल यह नहीं बताते कि यह संसार दुखों का घर (दुखालय) है, बल्कि यह भी मार्ग दिखाते हैं कि भगवान का सच्चा आश्रय लेने से हमारी चेतना इन दुखों के प्रभाव से मुक्त हो सकती है।
निष्कर्ष: सच्ची शरणागति का अर्थ है अपनी वर्तमान परिस्थितियों और स्वयं को स्वीकार करते हुए, मन से घृणा या निराशा को निकालकर, अपनी पूरी क्षमता से अपना कर्तव्य निभाना और परिणाम के लिए भगवान की इच्छा पर पूर्ण विश्वास रखना।
Full Transcription
शरणागति का अर्थ: द्रौपदी और अर्जुन का उदाहरण
हरे कृष्णा। आप सबका इस कार्यक्रम में स्वागत है। और आज हम गीता का जो अंतिम भाग है, जहाँ पर भगवान अर्जुन को शरणागत होने को कहते हैं, उसके बारे में चर्चा करेंगे। शरणागति के अलग-अलग भाव होते हैं। और शरणागति का मतलब हमारे जीवन में क्या है?
साधारणतः जब हम शरणागति के बारे में विचार करते हैं, तो द्रौपदी का चित्र मन में आता है। द्रौपदी, जब कोई भी उसकी मदद नहीं कर पा रहा था, तब उसने पुकारा— “गोविंद, गोपाल” पुकारा। शरणागति के अलग भाव होंगे। तो हाँ, ज़रूर यह एक पद्धति है शरणागति के लिए। भगवद्गीता के अंत में भगवान अर्जुन से बताते हैं— “सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।” तुम मेरी शरण में आ जाओ। और इसके जवाब में अर्जुन कहते हैं— “करिष्ये वचनं तव।” उन्होंने धनुष उठा लिया है और वो युद्ध करने के लिए पूर्णतया तैयार हो रहे हैं।
तो अर्जुन के लिए शरणागति क्या है? वो असहाय भाव से दोनों हाथ उठा लेना, ये शरणागति नहीं है। अर्जुन के लिए शरणागति है— पूर्ण तत्परता के साथ धनुष उठा लेना, युद्ध करने के लिए। और अर्जुन भी जब युद्ध कर रहा था, तब उतना ही शरणागत था जितनी कि द्रौपदी थी।
जब हम देखते हैं कि द्रौपदी दोनों हाथ उठा लेती है और शरणागत हो जाती है, तो क्या इसके पहले सारे उस प्रसंग में, वो असहाय स्वभाव में, क्या उसके पहले द्रौपदी शरणागत नहीं थी? उसके पहले भी वो शरणागत थी। उसके पहले जब वो सारी विपत्तियाँ आ रही थीं, तो द्रौपदी कोई न कोई विचार करके वो जो आपत्ति है, उसे टालने का प्रयास कर रही थी। तो उसने सभा में पूछा कि अगर युधिष्ठिर ने खुद को पहले जुए में गंवा दिया है, तो फिर मुझे दांव में कैसे लगा सकते हैं? तो इस तरह से तर्क-वितर्क करके वो क्या कर रही थी? वो अधर्म होने से रोकने का प्रयास कर रही थी और सबको धर्म की याद दिलाने का प्रयास कर रही थी। तो तभी भी वो शरणागत थी। और जब परिस्थिति आ गई जब वो कुछ भी नहीं कर पाई, उसके सारे प्रयास जो थे वो अयशस्वी हो गए, तब वो अपने हाथ ऊपर करके शरणागत हो जाती है।
शरणागति के दो छोर: असहायता और सेवाभाव
तो अगर हम दो छोर (extremes) देखेंगे, तो एक है— “हे प्रभु, मैं कुछ भी नहीं कर सकता क्योंकि आप ही को जो करना है, करना है।” यह है एक शरणागति का भाव। और अर्जुन जो है— “हे प्रभु, मैं निमित्त बन लेता हूँ, मैं आपकी सेवा करूँगा, मैं आपकी इच्छा पूरी करूँगा।” यह भी एक शरणागति है। तो वो दोनों ही शरणागति हैं। “प्रभु, मैं निमित्त बनकर कुछ सेवा कर रहा हूँ,” यह शरणागति है।
प्रभुपाद जी जब अमेरिका आए थे, तब उन्होंने यही अनुमान लगाया— “नाचे केनो आनिलेन एही दुरुहा स्थाने।” हे भगवान, मेरा यह अनुमान है, मेरा यह अंदाज़ है, कोई तो कारण होगा जिसके लिए आप मुझे यहाँ पर ले आए। नहीं तो फिर आप मुझे यहाँ पर क्यों लाते? श्रील प्रभुपाद जी बड़ी मेहनत करके आए। तो सोच रहे हैं कि बड़ी मेहनत तो की है, पर यह सारी योजना भगवान की है। इसलिए मैं आप पर आश्रित हूँ। तो यह उनकी शरणागति है— “अभी आप जो मेरे साथ करना चाहते हैं, आप करें।”
तो प्रभुपाद जी उस गीत के अंत में क्या बोलते हैं? “नचाओ नचाओ प्रभु नचाओ से मते। काष्ठेर पुतली जेनो नचाओ से मते। आमार इच्छा-कथा किछु नाई…” प्रभुपाद जी कहते हैं, नचाओ नचाओ प्रभु। हे प्रभु, अगर आप मुझे यहाँ पर ले आए हैं, तो मुझे आपकी इच्छा के अनुसार आप नचाओ मुझे। मतलब कठपुतली होती है, कठपुतली को जो उसका मालिक होता है, नियंत्रक होता है, वो नचाता है, तो वैसे आप मुझे नचाओ।
मतलब यहाँ पर यह जो उदाहरण है इसमें क्या है? प्रभुपाद जी स्वीकार कर रहे हैं, उनको कार्य करना है। जैसे कोई स्टेज में होता है, उससे वो कठपुतली को नचाने वाला कौन है दिखता नहीं है, कठपुतली ही दिखती है। प्रभुपाद जी जैसे बोल रहे हैं कि, हे भगवान आप मुझे नचाओ, जैसे आप चाहते हैं मुझे आप नचाओ। तो यहाँ पर शरणागति क्या है कि, “हे प्रभु, मैं नाचने को तैयार हूँ। जैसे आप सेवा करने का मौका मुझे दोगे, मैं सेवा करूँगा। तो आप मुझे जिसे बोलोगे, मैं वहाँ पर करूँगा।”
तो यहाँ पर दोनों हमको दिख रहे हैं। क्या है? निर्भरता है और सक्षमता है। दोनों में निर्भरता है— “आप जो भी प्रेरणा दिलाओगे, मैं उससे आपकी सेवा करूँगा।” जो सक्षमता है— “जहाँ भी होगा, मैं आपकी सेवा करूँगा।” तो यह दोनों जो भाव हैं शरणागति के, मतलब कि एक तरह से हम पूरी तरह सक्षम सेवा करेंगे, यह शरणागति है।
वर्तमान परिस्थितियों में हमारी सेवा
और इसमें समन्वय कैसे आता है? हम यह समझते हैं कि मेरे जीवन में कुछ चीज़ें हैं, उस पर मेरा नियंत्रण नहीं है। तो, ‘Surrender means to do what we can with what we have now.’ (शरणागति का अर्थ है— अभी हमारे पास जो भी है, उसके साथ हम जो कुछ भी कर सकते हैं, वह करना)। शरणागति मतलब जो हम कर सकते हैं, जितनी शक्ति, जितने साधन (resources), जितनी चीज़ें हमारे साथ अभी हैं, जो भी हमारे पास अभी है, उसके साथ हम जो भी कर सकते हैं, वो अभी करें।
प्रभुपाद जी को विश्व भर में प्रचार करना था। पर अगर उनसे मिलने को एक व्यक्ति आ रहा था, तो अपनी पूरी शक्ति के साथ उसे एक व्यक्ति से बातचीत करते हैं, उसे एक व्यक्ति को कृष्ण भावना का संदेश समझाते हैं। प्रभुपाद जी वहाँ बैठकर दर्शन देते थे। तो तीन लोगों से दर्शन होते हैं, या कभी हजारों लोग दर्शन में आते हैं, प्रभुपाद जी कई बार उतने ही उत्साह से प्रचार करते हैं। क्योंकि वो कृष्ण की सेवा कर रहे हैं। तो जो भी हमारे साथ अभी है, उसके साथ हम जो भी कर सकते हैं, वो करना। पर कब करना? अभी करना, यह शरणागति है।
कई बार हमसे होता है कि हमारे जीवन में प्रतिकूल परिस्थिति हो सकती है। कई बार हमारी मनःस्थिति भी प्रतिकूल हो सकती है। जो आत्मा है वह इन दो आवरणों से ढका हुआ है। एक है मनःस्थिति और दूसरी है परिस्थिति। तो इन दोनों से आत्मा ढका हुआ है। और ये दोनों कभी अनुकूल हो सकते हैं भक्ति के लिए, कभी प्रतिकूल हो सकते हैं। जैसी भी परिस्थिति है, जैसी भी मनःस्थिति है, उसमें “भगवान मैं आपकी सेवा करना चाहता हूँ, मैं आपकी सेवा कैसे कर सकता हूँ?” अगर ये भाव हम रखते हैं, तो फिर कोई भी परिस्थिति हो, हम हताश नहीं होंगे।
पहले हम परिस्थिति के बारे में बात करते हैं, बाद में मनःस्थिति पे आएँगे। कोई भी परिस्थिति है, उसमें हम हताश ही हो जाएँगे। वास्तव में हम कई बार चाहते हैं कि मुझे ये सेवा करनी है, मुझे ऐसे कार्य करना है, मुझे परिवार वाले अगर मदद करेंगे तो ऐसे हो जाएगा, अगर ये व्यक्ति ऐसे होगा तो अच्छा हो जाएगा। हमें बहुत बार ऐसे लगता है कि ये अन्य चीज़ें अगर अनुकूल हो जाएँगी, तो मैं अच्छी जगह से भक्ति करूँगा। और ये सत्य नहीं हो सकता है, कुछ परिवार प्रतिकूल हैं, उससे हमें समस्या आती है।
और यह जो हम बात कर रहे हैं, भक्ति करना, सेवा करना… सेवा करना मतलब यह नहीं है सिर्फ कि जब हम मंदिर में आकर सेवा कर रहे हैं, जप कर रहे हैं। वास्तव में भक्त के लिए अपना सारा जीवन जो है, वो एक सेवा का भाव होता है। अपने घर की ज़िम्मेदारी, अपने दफ़्तर की ज़िम्मेदारी, वो उसे भी सेवा के भाव में कर सकता है। “स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः।” भगवान ने बताया है कि अपने कर्मों के द्वारा मेरी पूजा करो। और उसके द्वारा आप मुझे प्राप्त कर सकते हैं।
तो सेवा भाव जो है, यह भक्त के पूरे जीवन में आता है। सिर्फ मंदिर में या भक्ति के कार्य में नहीं। और शरणागति का जो भाव है वो अभी हमारे पूरे जीवन में हम ला सकते हैं। हमारी जीवन-दृष्टि इस पर केंद्रित (focused) हो सकती है।
नियंत्रण की सीमाएँ: टेनिस मैच का उदाहरण
कुछ चीज़ें हमारे नियंत्रण में होती हैं, कुछ चीज़ें हमारे नियंत्रण में नहीं होतीं। हमारा मन जो होता है, कई बार जो चीज़ें हमारे नियंत्रण में नहीं हैं, उसके बारे में बहुत सोचता है कि ये ऐसी क्यों हैं? और बेवजह विचार करते हुए जो चीज़ें हमारे नियंत्रण में हैं, उसके बारे में हम कुछ कर नहीं पाते। और जो मौका हमें अभी मिला है कुछ करने का, वो मौका हम गँवा देते हैं। तो ये ज़रूर सत्य है कि हम सबके जीवन में अलग-अलग ऐसी परिस्थितियाँ हो सकती हैं जो प्रतिकूल हैं— हमारे खुद के लिए, हमारी भक्ति के लिए, हमारे परिवार के जीवन के लिए, हमारी नौकरी के लिए, हमारी सेहत के लिए। जो भी है, कुछ चीज़ें प्रतिकूल हो सकती हैं। कुछ चीज़ों में हमें ज़्यादा बदलाव करने का मौका ही नहीं मिलता। पर इसका मतलब यह नहीं है कि हम कुछ भी नहीं कर सकते।
तो जीवन की तुलना हम एक टेनिस मैच से कर सकते हैं। अभी टेनिस मैच में यह होता है कि, मैं भी इंग्लैंड से आ रहा हूँ, वहाँ पर टेनिस काफी होता है। अभी टेनिस मैच में क्या होता है, कभी कोई जो प्लेयर (player) होता है वो सर्विंग (serving) करता है और जो दूसरा प्लेयर होता है वो रिसीविंग (receiving) करता है। जो सर्विंग कर रहा होता है, उसके हाथ में गेंद होती है। वो जहाँ भी चाहे, वो गेंद को मार सकता है। जहाँ भी वो गेंद को डालेगा, जो रिसीविंग कर रहा है, उसको वहीं से, वहाँ से कैसे भी जवाब देना है। कभी वो एक जगह खड़ा होगा, दूसरी ओर गेंद आएगी, उसको वहाँ से जवाब देना है। कभी नीचे आएगी, कभी ऊपर आएगी, कभी पूरे शरीर में आ जाएगी।
तो अभी जब सर्विंग और रिसीविंग चल रहा होता है टेनिस में, तो क्या होता है? जो व्यक्ति सर्विंग कर रहा है उसके पास नियंत्रण ज़्यादा है, उसके पास आज़ादी ज़्यादा है, जहाँ भी चाहे वो बॉल बढ़ा सकता है। जो रिटर्न कर रहा है, उसके पास आज़ादी कम है, उसके पास जहाँ भी बॉल आएगा, वहीं से उसको लौटाना है। अभी जो रिटर्निंग (returning) है, वह भी बहुत महत्वपूर्ण है। यह एक प्रतिभा है। कुछ-कुछ ऐसे प्लेयर्स हैं, वो बॉल चैंपियन की तरह देखने में बहुत अच्छे रिटर्न करते हैं। उनका सर्व इतना बढ़िया नहीं था पर रिटर्न बहुत बढ़िया था। तो रिटर्न करना, यह भी एक प्रतिभा है। तभी करते समय व्यक्ति के पास आज़ादी, नियंत्रण करने की शक्ति बहुत कम है, पर उसमें भी शक्ति है, उसमें भी क्षमता है, उसमें भी प्रतिभा को बढ़ाया जा सकता है।
पर अगर जब रिटर्निंग चल रहा है, तभी वो प्लेयर सोचे, “मुझे इधर से बॉल मारना था, बॉल इधर क्यों आया? बॉल इधर आया, मैं इधर से मारूँगा। बॉल लगी थी…” तभी ऐसी आज़ादी नहीं है। तो क्या होता है, हमारे जीवन में भी कभी हम सर्विंग कर रहे होते हैं, कभी हमें रिटर्निंग करना होता है। कभी हमारे जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं, कि हम ज़्यादा कुछ कर नहीं सकते। जो भी परिस्थितियाँ आएँ, उसमें जैसे काम चलाना है, वैसे काम चलाना है। तो उस समय, जब ऐसी परिस्थितियाँ आ गई हैं मैच में, जब हमें रिटर्न करना है, तभी हम अपेक्षा करते हैं कि “मैं सर्विंग करना चाहता हूँ, मैं क्यों नहीं कर पा रहा हूँ?” नहीं, वो परिस्थिति ऐसी नहीं है। वो परिस्थिति ऐसी है कि तभी हमारे ऑप्शंस (options), हमारे पर्याय कम हैं। हमें तभी उस परिस्थिति में जितना कर सकते हैं, तभी हमें करना है।
विपरीत समय और भगवान की योजना
भागवतम के आठवें स्कन्द में, जब देवियों, देवताओं और असुरों का युद्ध चल रहा होता है, तो असुर जब देवताओं पर हावी हो जाते हैं, तब देवता भगवान का आश्रय ग्रहण करते हैं। और तभी भगवान देवताओं को बताते हैं कि ये जो समय है, आपके लिए प्रतिकूल नहीं (अनुकूल नहीं) है। इसलिए, अभी आप युद्ध मत करो। अभी आप समय की प्रतीक्षा करो।
यहाँ पर भगवान सर्वश्रेष्ठ हैं। और भगवान सब चीज़ों के स्वामी हैं। पर भगवान चाहें तो समय को बदल सकते हैं। समय के प्रभाव को बदल सकते हैं। पर भगवान बोलते हैं— “नहीं। अभी समय अनुकूल नहीं है। तो अभी तुम युद्ध करोगे, तुम हार जाओगे। इसलिए, अभी आप क्या करो? अभी आप निचली जगह ले लो खुद को, नम्र बन जाओ, और तुम खुद जाओ, इंद्र तुम बलि के पास जाओ, और तुम समझौते की याचना करो।”
समझौते की याचना करो। तो भगवान भी यहाँ क्या बता रहे हैं? कि अभी आपका काल अनुकूल नहीं है। तो काल अनुकूल नहीं, मतलब क्या है? इस समय आपके सामने पर्याय कम हैं। तो जब ऐसे पर्याय कम होते हैं, उस समय कई बार हमारा मन यही सोचता है, “अरे नहीं, जो मैं कर रहा हूँ, मैं क्यों नहीं कर पाऊँगा?” पर नहीं। जब हम नहीं भी कर पाएँगे जो चाहते थे, जितनी परिस्थिति है, उसमें भी हम कुछ कर सकते हैं। ऐसे नहीं है कि हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं। तो ऐसी परिस्थिति में, देवताओं की शरणागति क्या थी? भगवान ने जो उनको बताया, वो युद्ध करना चाहते थे, पर नहीं, यहाँ पर युद्ध नहीं करना है, समझौता करना है। असुरों से समझौता! असुर जो भगवान के खिलाफ हैं, उनसे अपनी शांति का प्रस्ताव रखना! यह भला कैसे शरणागति हो सकती है? भगवान ने बताया, इसलिए वो शरणागति है।
तो इसलिए क्या है, जो परिस्थिति में हम होते हैं, उस परिस्थिति में हम जो भी कर सकते हैं, उसे स्वीकार करना चाहिए। अब मेरी परिस्थिति ऐसी है, मुझे भी रिसीविंग (receiving) करना है, मेरे पास पर्याय कम हैं। पर्याय कम हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि पर्याय हैं ही नहीं! पर्याय ज़रूर हैं। मेरे पर्याय कम हो सकते हैं, पर जितने भी कम हैं, उसमें भी मैं चुनाव कर सकता हूँ। अगर हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं, तब भी हम हमारी चेतना को ठीक रख सकते हैं।
दृष्टिकोण और स्वीकृति
अगर मान लीजिए कोई बहुत बीमार हो गया है, बिस्तर पे पड़ा हुआ है, बिस्तर से उठ भी नहीं सकता है। उस समय व्यक्ति शारीरिक स्तर पर कुछ भी नहीं कर सकता है। पर उस समय भी व्यक्ति एक तरह से या तो घृणा कर सकता है— “मैं कुछ भी नहीं कर सकता हूँ, सारे लोग अच्छे मजे कर रहे हैं, मैं यहाँ पर बीमार पड़ा हूँ, मेरे साथ यह ऐसे क्यों हुआ है?”
तो अभी कई बार कैसे होता है, हम कुछ कार्य करने की योजना बना लेते हैं, और मान लीजिए कहीं हम यात्रा जा रहे हैं, पिकनिक जा रहे हैं। और पिकनिक जाने के एक दिन पहले हमको बुखार आ जाता है। और डॉक्टर बोलते हैं कि आप कहीं नहीं, अगले तीन दिन कहीं नहीं जा सकते हैं। और तीन दिन में वो पिकनिक ख़तम हो गई, सब वापस आ जाते हैं। तो हम बिस्तर में पड़े हुए हैं, “क्यों अभी हुआ ऐसा?” तो अगर एक तरह से देखेंगे, तो बुखार जो है, बुखार से कुछ हमेशा बहुत पीड़ा नहीं होती है, शक्ति कम होती है, और हमको थोड़ा रेस्ट (rest) करना है, सोना है। तो इससे बहुत पीड़ा नहीं होती है शारीरिक स्तर पर। पर क्या होता है? अगर मन घृणा से भर गया है, तो मन बड़ा पीड़ा करता है।
‘Resentment of reality often hurts more than reality.’ (वास्तविकता का विरोध अक्सर वास्तविकता से अधिक आहत करता है)। जो परिस्थिति है, परिस्थिति हमें कभी परेशान करती है, पर परिस्थिति के प्रति जो घृणा होती है हमारी, वो घृणा हमें और परेशान करती है। अगर हम घृणा छोड़ दें— “ठीक है जो हो गया है, मैं नहीं जा पाऊँगा, मैं पिकनिक जाना चाहता था, अभी तो मैं बिस्तर पर पड़ा हूँ, क्या करूँ? मैं कुछ भगवान के, कुछ अच्छे प्रवचन सुन सकता हूँ, कुछ पढ़ सकता हूँ, कुछ कीर्तन सुन सकता हूँ। मैं थोड़ा, अगर नहीं उठ पाऊँगा, तो ऐसे कर सकता हूँ।”
तो मैं सोचूँगा, जो भी है, ऐसा कार्य कर लेते हैं। जो पर्याय हमारे पास नहीं हैं, उस पर्याय को देखकर, हम— ‘वो क्यों नहीं है?’ इस तरह से उतावले हो रहे हैं। और जो पर्याय हैं, उसको अपना नहीं रहे हैं। तो शरणागति का, कभी-कभी ऐसी परिस्थिति हमारे जीवन में आ सकती है कि हम मंदिर जाना चाहते हैं, हम यात्रा जाना चाहते हैं, हम सेवा करना चाहते हैं, पर नहीं कर पा रहे हैं। शायद हमारी तबियत ठीक नहीं है, शायद परिवार वाले अनुकूल नहीं हैं, शायद घर में बहुत ज़िम्मेदारियाँ हैं, शायद ऑफिस में बहुत काम है।
तो अभी उन परिस्थितियों में, या अभी शायद कोई विद्यार्थी है, परीक्षा है। तो जो भी परिस्थिति है, उस परिस्थिति में, हाँ, हमारे पर्याय कम हैं। पर इसका मतलब ये नहीं है कि तभी हम शरणागत नहीं हो सकते हैं। तभी भी, “हे भगवान, ये परिस्थिति मेरे जीवन में आ गई है, मैं यहाँ पर कैसे सही दृष्टिकोण रख सकता हूँ? कैसे मैं सेवा भाव रख सकता हूँ? कैसे मैं आपका स्मरण कर सकता हूँ?” अगर हम ये विचार करते हैं, तो फिर उस परिस्थिति में भी हम कार्य कर सकते हैं, उस परिस्थिति में भी हम भगवान से संबंध जोड़ सकते हैं।
तो इसलिए जो प्रतिकूल परिस्थिति होती है, एक तरह से हम अगर वो प्रतिकूल परिस्थिति हमारे लिए अनिवार्य है, उसको टाल नहीं सकते हैं, तो उसको स्वीकार करके, उसमें कम से कम हमारे मन को अनुकूल बना लें। “इस परिस्थिति में भगवान की कैसे सेवा कर सकता हूँ? कल मैं स्वाध्याय कर सकता हूँ, मैं थोड़ा बहुत कुछ सुन सकता हूँ।” आजकल तकनीक (Technology) से हम जहाँ भी हैं, हम सुन सकते हैं, दर्शन कर सकते हैं। तो हमारी परिस्थिति को हम स्वीकार करेंगे, और उसमें हम प्रयास करेंगे कि मैं यहाँ क्या-क्या कर सकता हूँ।
कई बार ऐसे होता है कि हमारे जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति होता है, जिससे हमारी बनती ही नहीं है। तो फिर हम क्या, उससे इतनी घृणा करने लगते हैं— “यह ऐसा क्यों है?” फ़िलहाल अगर देखते हैं, अभी इस परिस्थिति में यह मेरे जीवन में है, मेरा संबंध यह है, मुझे इसके लिए कार्य करना है। हम उसको स्वीकार करते हैं।
‘Acceptance is the beginning of transcendence.’ (स्वीकृति ही पारलौकिकता की शुरुआत है)। अगर हमें परिस्थिति के परे जाना है, सबसे पहले परिस्थिति को स्वीकार करना है। “ठीक है, इस परिस्थिति में मैं आ गया हूँ। इस परिस्थिति के परे मैं कैसे जाऊँगा? उसके लिए मैं उपाय करूँगा, उसके लिए मैं विचार करूँगा, प्रार्थना करूँगा, पर सबसे पहले मुझे स्वीकार करना है कि यह परिस्थिति है।”
अगर यह परिस्थिति यहाँ पे क्यों आई है मेरे जीवन में, इसी से मैं मन में युद्ध कर रहा हूँ, तो फिर क्या होता है? वो परिस्थिति से कैसे सामना करना है, उसके लिए हमारे मन की शक्ति नहीं होती। टॉलरेन्स (Tolerance), मीन्स, हमारे जीवन में, परिस्थिति से कैसे सामना करना है। सांसारिक जीवन का मतलब क्या? जो सत्य है, उसके साथ जो हमारा युद्ध है, यही परिस्थिति है। मेरी आर्थिक परिस्थिति ऐसी है, मेरी शारीरिक परिस्थिति ऐसी है। अब यह ऐसी है, क्यों ऐसी है? अगर वही मानसिक स्तर पर मैं युद्ध करता रहूँगा, तो मैं व्यावहारिक स्तर पर कुछ नहीं कर पाऊँगा। “ठीक है यह परिस्थिति है।” कई बार ऐसे होता है कि हमने कोई पूर्व कर्म किए होंगे, हमें पता नहीं है, पर वो घृणा करने से बेहतर है, ठीक है, स्वीकार करें। तो यह स्वीकार करना भी शरणागति है। भले ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति में हम कुछ नहीं कर पाते, पर स्वीकार करना ही शरणागति है।
चुनाव और ज़िम्मेदारी
ऑफ़ कोर्स (Of course), यह केवल शरणागति में नहीं है, इसके साथ-साथ भक्ति में एक और भाव है, कि हमारे महत्वपूर्ण समय में जो है, वो हमें चुनाव करना है। तो भक्ति, भगवान ने जब शरणागति के छह अंग बताए हैं, आचार्यों ने बताए हैं, तो कई बार हमारे जीवन में परिस्थिति होती है कि हमें चुनाव करना है। उस समय हम सर्विंग (serving) कर रहे हैं। मतलब मान लीजिए, अगर मुझे कोई चुनाव करना है, “ठीक है, इस शाम को मैं यहाँ जाऊँ, मंदिर जा सकता हूँ, या यहाँ पे यह काम कर सकता हूँ।” तो अगर वहाँ पे हमें चुनाव करने की क्षमता है, कोई ज़बरदस्ती नहीं है कि यही करना है, तभी हम जो अनुकूल है, वो चुनते हैं और जो प्रतिकूल है उसे छोड़ते हैं।
तो एक दृष्टि से यह समझना बहुत जरूरी है, क्या अनुकूल है, क्या प्रतिकूल है। और जो अनुकूल है, वो चुनना जरूरी है। तो कई बार हमारे लिए चुनाव करने का मौका होता है। तो जब चुनाव करने का मौका होता है, तब हमें पूर्ण तत्परता से, जो भक्ति के अनुकूल है, जो चुनाव है, वो करना है। ऐसी परिस्थिति है, जब हम सर्विंग कर रहे हैं, तो सर्विंग कर रहे हैं, तब कहाँ सर्व करना चाहिए? जहाँ पर हमारी सबसे अच्छी ग्रिप (grip) है। तो तभी जब हमारे पास, जब चुनाव करने का मौका है, तब, अगर हम कहें “भगवान हैं, मैं हूँ, मुझे बात नहीं करनी है,” तो क्या होता है? तभी क्या है, तब हम मौका जो गँवा रहे हैं, वो हम शरणागति के खिलाफ जा रहे हैं।
तो मान लीजिए कोई विद्यार्थी है, परीक्षा है, परीक्षा के पहले— “मुझे मंदिर जाना है, मुझे कीर्तन करना है, मुझे सेवा करना है, मुझे इतनी पढ़ाई करना है।” तभी शरणागति मतलब क्या है? “मेरा पढ़ाई करना मेरा कर्तव्य है।” परीक्षा ख़तम हो गई। अगर कभी कुछ बुरी चीज़ हो जाती है, तो भगवान उसमें भी कुछ अच्छा चाहते हैं। तो अगर हम वो घृणा को निकाल देते हैं, तो उसमें भी भगवान की क्या योजना है, यह हम ढूँढ सकते हैं। उसमें भी सेवा का मौका हम निकाल सकते हैं।
तो जब हम हमारी एक योजना बनाते हैं, “मुझे इस तरह से सेवा करनी है,” और हमारा एक उद्देश्य होता है, “मुझे यहाँ पर जाना है,” तो कई बार हम योजना और उद्देश्य को एक मानते हैं। हम सोच लेते हैं कि, “यह रास्ता है और यह मंज़िल है।” तो अगर इस रास्ते में कोई समस्या आ गई, जिससे कुछ हो नहीं पाता है, “ऐसे क्यों हो गया?” तो क्या है, हाँ जरूर, वो रास्ता बंद हो गया, उसमें समस्या आ गई है। पर भगवान ने नया रास्ता खोल दिया है।
तो अगर हम घृणा करते हैं, मतलब क्या? मैं उस मार्ग में जा रहा था यहाँ से और दरवाज़ा बंद हो गया है। ठक! क्या हो गया है? अगर जो दरवाज़ा बंद हो गया है, उसको मैं घूर के देख रहा हूँ— “क्यों बंद हो गया? किसने बंद किया? किसकी ज़रूरत थी उसने बंद किया?” तो मेरे घूरने से मेरे पास कोई दिव्य शक्ति नहीं है कि उस दरवाज़े को खोल दूँ। वो दरवाज़ा बंद है। वो बंद दरवाज़ा है, उसको घूरने में लगे हैं। लेकिन कोई और दरवाज़ा खुला है।
हमें योजना बनाना ये भी एक जिम्मेदारी की बात है। अच्छी सेवा करनी है, हमको अच्छी तरह योजना बनाना ये भी एक जिम्मेदारी की बात है। पर परिस्थिति हमारे नियंत्रण में नहीं है। पर जब हम भक्ति के सिद्धांत को समझते हैं तो हम समझते हैं कि जो चीज़ें मेरे नियंत्रण से बाहर हैं, वह पूर्णतः अनियंत्रित नहीं हैं। वह मेरे नियंत्रण में नहीं हैं पर भगवान के नियंत्रण में हैं।
तो इसलिए ये है कि हम समझते हैं जब भौतिक चेतना है, “मेरी योजना से सब कुछ चल रहा है, ऐसा होना चाहिए।” मेरी योजना ऐसे हो गई, “क्या हो रहा है?” तो ये भौतिक दृष्टिकोण है। सिर्फ योजना ही सब कुछ नहीं है, भगवान भी हैं हमारी योजना में। तो जब हमारे उद्देश्य पर दृष्टि होती है, “मुझे भगवान की सेवा करनी है।” उत्साह नहीं छोड़ना। कैसे करना है, ये योजना थी मेरी। पर ये योजना नहीं सफल हो रही है तो क्या करूँगा? यह योजना क्यों नहीं हो रही, उसके बारे में मैं घृणा करता रहूँगा तो फिर कोई और मार्ग निकल भी रहा होगा तो हमको दिखेगा नहीं।
भगवान की योजना में विश्वास
इसलिए भाव रखते हैं कि— “नचाओ नचाओ प्रभु, नचाओ नचाओ।” हे भगवान आप जैसे चाहते हैं, नचाओ नचाओ। यह मेरी योजना है, मैं करना चाहता हूँ। अगर यह हुआ तो अच्छा है। यह नहीं हो रहा है, इसका मतलब नहीं है कि सारी दुनिया मेरे खिलाफ है, भगवान मुझसे नाराज़ हैं या मैं बिल्कुल निकम्मा हूँ। कुछ नहीं है ऐसा। इसका मतलब यह है कि कोई और मार्ग निकलेगा।
तो अगर हम आशा नहीं छोड़ते हैं, हम उत्साह बनाये रखते हैं, हौसला बनाये रखते हैं और जितनी भी हमारी परिस्थिति है उसमें हम प्रयास करते हैं, तो फिर जरूर कोई मार्ग निकलेगा। और हो सकता है कोई बहुत अच्छा मार्ग निकलेगा। तो अगर हम हमारी आँखें सिर्फ इस दुनिया पर रखते हैं— “यह गलत हो गया, यह गलत हो गया, यह गलत हो गया…” पर अगर हम अपनी नज़रें भगवान पर उठाते हैं— “भगवान मैं आपकी सेवा कैसे कर सकता हूँ?” अगर वो भाव रखेंगे, तो वो ज़रूर हमें बुद्धि प्रदान करते हैं एक-एक कदम आगे बढ़ाने के लिए। और फिर हम देखेंगे कि वास्तव में जो परिस्थिति है वो अनुकूल हो गई है, हम आगे बढ़ रहे हैं।
तो जब ऐसा होगा तो हमारी भगवान में श्रद्धा बढ़ जाएगी। क्योंकि हम सोचेंगे, “जब इतनी विपरीत परिस्थिति थी, तब भी इसमें से मार्ग निकल पड़ा।” तो उससे भगवान में श्रद्धा बढ़ जाएगी, और हमारी भी भक्ति करने का उत्साह बढ़ जाएगा। और यह भगवान में श्रद्धा, भक्ति में उत्साह बढ़ना, यह वास्तव में स्थायी प्राप्तियाँ हैं हमारे लिए। परिस्थितियाँ जब अनुकूल रहें, अच्छी बात है, उससे हम कुछ कर पाएँ, अच्छी बात है। पर यहाँ सारी वो प्राप्तियाँ इतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं जितना भगवान में श्रद्धा बढ़ना, भक्ति में उत्साह बढ़ना। भक्ति की शक्ति में विश्वास बढ़ना है। विपरीत परिस्थितियों में भगवान के आश्रय के द्वारा किये प्रयास से, यह श्रद्धा बढ़ेगी। तो फिर हम कोई भी समस्या जीवन में आ रही हो, सामना कर लेंगे।
द्रौपदी और अर्जुन की शरणागति के अलग-अलग भाव हैं। द्रौपदी हाथ ऊपर कर शरण ले रही है, अर्जुन जो है वो अपना धनुष उठा के युद्ध की तैयारी से शरणागति ले रहा है। तो ये जो हैं, दो छोर हैं। कभी ऐसा होता है कि हमारे जीवन में कुछ चीज़ें हमारे नियंत्रण में होती हैं, कुछ चीज़ें नियंत्रण में नहीं होती हैं। तो जो हमारे नियंत्रण में है, उससे पूरी सक्षमता से कार्य करना, तत्परता से कार्य करना— वो शरणागति का एक अंग है। और जो हमारे नियंत्रण में नहीं है, वो भगवान के हाथ में सौंपना— वो भी शरणागति है।
तो कभी बहुत चीज़ें हमारे हाथ में होती हैं, चुनाव करने का मौका बहुत होता है, कभी बहुत कम होता है। तो द्रौपदी और अर्जुन, ये दो उदाहरण हैं, दो एक्स्ट्रीम्स (extremes) हैं। तो हमें शरणागति मतलब जो भी परिस्थिति है, जो भी सुविधा है, उसके साथ अभी कार्य करना है। टेनिस मैच का उदाहरण लें— कभी कोई सर्विंग कर रहा है, पर वो कम मौके में भी सक्षमता, प्रतिभा दिखा सकता है।
तो अगर जो रिटर्न करते हैं वो सोचने लगे— “अरे मैं सर्विंग क्यों नहीं कर पाता हूँ?” तो फिर वो मौका खो देता है। ऐसे ही कभी-कभी हमारे जीवन में पर्याय बहुत कम रह जाते हैं। “तो यह पर्याय इतने कम क्यों हैं? यह ऐसे क्यों है? ऐसे क्यों?” अगर वो सोचते बैठेंगे हम, तो उन पर्यायों में जो हम कर सकते हैं, वो नहीं कर पाते। अगर मुझे बुखार आ गया है, मैं कहीं यात्रा पर नहीं जा पाऊँगा, मैं यहाँ पर लेटा हूँ। लेट के क्या कर सकते हैं? हम जप करेंगे। तो फिर हम वहाँ भी, कोई परिवार वाले प्रतिकूल हैं, कोई सेहत प्रतिकूल हो रही है, उसकी घृणा अगर हम छोड़ सकते हैं, तो फिर वहाँ भी वह स्वीकृति जो है, वह भी शरणागति है।
स्वीकृति के द्वारा हम चेतना में भगवान को ला सकते हैं। और फिर हम आगे बढ़ सकते हैं। और जब हमारे पास चुनाव करने का मौका है, तब हम पूरे उत्साह के साथ जो प्रतिकूल है उसको छोड़ते हैं, जो अनुकूल है उसको स्वीकार करते हैं। और इससे हम भगवान को हमारी गंभीरता, तीव्रता, उत्साह दिखाते हैं। पर चुनाव करने का मौका बहुत कम नहीं होते हैं। तो भगवान में मुझे पूर्ण विश्वास है।
मैंने कानपुर के दौरे में देखा, मैं भारत गया हूँ, जो मेरे लिए बहुत ज़रूरी था सेवा के लिए, वो अवसर चला गया। तो जो खुद को कोस रहा था, दूसरों को कोस रहा था, उससे ऐसा लग रहा था कि दिमाग पर सौ किलो वजन आ गया है। पर जब उसको स्वीकार कर लिया, तो राहत मिल गई। इसके बाद मेरी सेवा अच्छे से हुई। अगर हम जो परिस्थिति हमारे जीवन में आती है, उसकी घृणा अगर छोड़ सकते हैं, तो फिर उसमें भी हमें भगवान के द्वार दिख सकते हैं। एक दरवाज़ा बंद हो गया तो उसको घूरने की जगह पर जो दरवाज़े खुले हैं, उसको हम देख सकते हैं। और कौन सा दरवाज़ा खुला है, वो अगर मुझे दिख भी नहीं रहा है, फिर भी अगर हम आगे बढ़ते रहें, जितना आगे बढ़ सकते हैं, जो भी हमारे पास क्षमता है, कार्य करते रहें, ज़रूर भगवान हमें रास्ता दिखाएंगे।
प्रभुपाद जी का उदाहरण है— एक तरह से बहुत प्रयास करना और फिर भगवान पर छोड़ देना— “क्या करना है भगवान? आपकी योजना क्या है? जैसे आप नचाना चाहो, तो मैं नाचूंगा।” तो वो भाव अगर हम रखते हैं, “जो भी परिस्थिति है, उसमें मैं आपकी सेवा कैसे कर सकता हूँ?” यह भाव अगर हम रखते हैं, तो हम ज़रूर उसका सामना कर सकते हैं। भगवान के मार्गदर्शन के लिए, भगवान की कृपा के लिए प्रयास कर सकते हैं।
आत्म-स्वीकृति और अहंकार
हमारी स्वीकृति ही दिव्यता की ओर जाने के लिए, परिस्थिति को पार जाने के लिए शुरुआत है। वहाँ कहाँ तक हम कार्य कर सकते हैं? वास्तव में हम कई बार देखते हैं कि हम एक समाज में हो सकते हैं, सोशल सर्कल (social circle) में हो सकते हैं जहाँ पे मुझमें कुछ गुण कम हैं, कुछ क्षमताएँ कम हैं, किसी और में कुछ क्षमताएँ ज़्यादा हैं। तो “मैं इसके जैसा क्यों नहीं हो सकता? मैं इसके जैसा क्यों नहीं हो सकता?” क्योंकि कई बार हम ऐसी आकांक्षा करते हैं— “मैं ऐसा क्यों नहीं हूँ? ऐसा क्यों नहीं हूँ?” तो वास्तव में हमें खुद को स्वीकार करना है।
मैं जैसा हूँ, वैसा हूँ। इसका मतलब यह नहीं कि मैं जैसा हूँ, ऐसा ही रहूँगा। पर मैं जैसा हूँ, उसको स्वीकार करना है। तो वास्तव में खुद को स्वीकार करना जो है, यह भी बहुत ज़रूरी है। कई बार हम लोगों में देखते हैं, एक है सेल्फ सेंटर्डनेस (self-centeredness), खुद को बहुत बड़ा मानना। कुछ लोगों में बहुत अहंकार होता है— “मैंने ये किया, मैंने वो किया, मैं कितना बड़ा हूँ।” वो एक प्रकार का सेल्फ सेंटर्डनेस है, खुद को केंद्र बनाए जा रहे हैं। बहुत लोगों के लिए समस्या होती है कि वे खुद से नफरत करते हैं कि— “अरे मैं ये नहीं कर सकता, मैं वो नहीं कर सकता।” वास्तव में ये एक मानसिकता है जो व्यक्ति को कमज़ोर बना सकती है।
हाँ, हम सबने गलतियाँ की हैं, बहुत बड़ी गलतियाँ की हो सकती हैं। हममें कमियाँ हो सकती हैं, शायद बहुत बड़ी कमियाँ भी हो सकती हैं। पर वास्तव में हम सब अंश रूप में भगवान के हैं। अगर हम खुद से नफरत कर रहे हैं, हम खुद से नफरत अगर करते हैं तो हम भगवान से प्रेम कैसे कर सकते हैं? क्योंकि हम भगवान के अंश हैं।
तो खुद से इतना प्रेम कर लेना कि किसी और पर सोचना ही नहीं, वो एक एक्स्ट्रीम है। पर दूसरा है कि खुद को इतना बुरा मानना, वो भी गलत है। “मैं ऐसा हूँ, मुझमें ये क्षमता है, ये कमियाँ हैं।” पर जो भी हूँ उसको स्वीकार करना। और खुद को स्वीकार करना। अब जो खुद को स्वीकार करने के लिए देख सकते हैं, मुझमें ये कमियां हैं, ये कमियां हैं। ये जो कमियां हैं, इसको सुधारने का प्रयास करना, इसको निकाल देना बड़ा मुश्किल है।
एक बात मुझे बतानी है— मैंने कई ‘सेल्फ इंप्रूवमेंट प्रोजेक्ट्स’ (self-improvement projects) को अगले लाइफ टाइम (life time) के लिए पोस्टपोन (postpone) कर दिया है। कि ये जो बदलना है, ये इस जीवन में संभव नहीं है। अभी ऐसे नहीं है कि संभव नहीं है, पर कभी-कभी हमें लगता है कि यह बदल नहीं रहा है, बड़ा मुश्किल है। तो ठीक है, कोई कमी होगी मुझमें, उसको बदल नहीं पा रहे हैं, ठीक है, स्वीकार कर रहे हैं। तो दूसरी कमी हम उसको बदल सकते हैं। तो खुद को स्वीकार करना ये भी बहुत मुश्किल है। तो जब हम खुद को स्वीकार कर लेते हैं, तो फिर उससे हम क्या कर रहे हैं?
“भगवान ने हमें ऐसा बनाया है।” कोई कहते हैं— “नहीं, वो भगवान ने नहीं बनाया है, मेरे पूर्वकर्मों ने मुझे ऐसा बनाया है। अगर पहले कर्म बहुत बुरे थे, उसके बाद मैं ऐसा बना हूँ।” पर ऐसा नहीं है, हम सिर्फ पूर्वकर्मों से नहीं बने हैं। पर हमारे पूर्वकर्मों का जो संगठन है, जिसके द्वारा हम बने हैं, वह वास्तव में हमारी बुद्धि और विकास के लिए अनुकूल है। हम जिस तरह से बढ़ सकते हैं, जिस तरह से भक्ति कर सकते हैं, उसके लिए जो अनुकूल है, वो शरीर भगवान ने बनाया है। हम केवल कर्मों की दुर्घटना नहीं हैं। हम वास्तव में भगवान की योजना भी हैं। हमारे जो पूर्व कर्म भी हैं, उनको भगवान ने ऐसे व्यवस्थित किया है जो हमारी प्रगति के लिए अनुकूल हैं।
इसलिए खुद को स्वीकार करना है, यह बहुत ज़रूरी है। इस तरह से हमारी परिस्थिति में अलग-अलग लोग हो सकते हैं, हर व्यक्ति तो हम जैसा चाहें वैसा नहीं होगा, कुछ व्यक्तियों से मुश्किल होगी। हमें बात को स्वीकार करना है, उनसे ज़्यादा उलझने की ज़रूरत नहीं है। उसको स्वीकार करना है, इसके थोड़ा इतना अंतर रखके मैं कार्य करूँगा। तो यह स्वीकृति जो है, वह हमें बड़ी शांति दे सकती है। उसके बाद में हमारी शक्ति हम कहाँ डालेंगे, वहाँ हम सोच-विचार करते हैं। उस शक्ति को हम परिवर्तन में लगा सकते हैं।
जीवन के चार पुरुषार्थ और भक्ति
हमारा एक प्रॉब्लम (problem) होता है, इससे हमें कैसे उबरना है? और वो जो सेवा भाव होता है, इंटेंसिटी (intensity) की सर्विस एक्टिविटी (service activity) वो कभी-कभी बढ़ती है, नहीं तो वो मिनीमाइज़ (minimize) होती है। जैसे प्लेन्स की स्पीड ज़्यादा होती है, और कभी कम होती है, तो कभी-कभी बढ़ती है। तो उसको कैसे बढ़ाएं? हम सबको हमारी जो व्यक्तिगत रूप से कमियाँ हैं और शक्तियां हैं, उनको समझना है और उसके अनुसार हमें हमारे जीवन का आयोजन करना है।
तो जो लक्ष्य हैं वह बहुत महत्वपूर्ण हैं। जो चार पुरुषार्थ हैं— धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। ये पुरुषार्थ बताए गए हैं। तो इसका मतलब ये है कि इसको संभाल कर रखना, उसके बारे में ध्यान पूर्वक ज़िम्मेदारी से कार्य करना है। यहाँ भी हमारी ज़िम्मेदारी का एक हिस्सा है।
तो समस्या कब आती है? धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ये चारों वास्तव में हमें भगवान के करीब ले जाने के लिए हैं। धर्म में बहुत रीति-रिवाज हैं, क्यों हैं? वो भी इसलिए कि हमें भगवान के करीब जाना है। अर्थ इसलिए है कि हम इससे अपना जीवन चला सकें। जब हमारे आर्थिक हालात खराब हो रहे हैं, जब अड़चनें आ रही हैं, खराब हो रहे हैं, तो उससे क्या है, एक महत्वपूर्ण ज़रूरत कम हो रही है।
तो अभी व्यक्ति की महत्वपूर्ण ज़रूरत कम हो रही है, ये सत्य है। पर इसका मतलब ये नहीं है कि उसी में हमारे जीवन का सर्वनाश हो रहा है, अंत हो रहा है। इसका मतलब कोई व्यक्ति एक जहाज़ में जा रहा है और उसके पास उसकी बहुत प्रिय कोई चीज़ है, कोई छोटा बच्चा, कोई खिलौना है या कोई व्यक्ति है, शोपीस (showpiece) है, मोमेंटो (memento) है, किसी प्रिय ने पास में दिया है, कोई यादगार चीज़ है, और वो अचानक उसके हाथ से गिर जाता है और वो सागर में डूब रही है। अभी सागर में वो डूब रही है, अगर वो व्यक्ति को तैरना नहीं आता है और वो कूद जाता है… उसके लिए उसको लगता है “यह ज़रूरी है, यह चाहिए।” पर वो प्राप्त करने के लिए वो क्या कर रहा है? वो अगर पानी में जाता है और उसको तैरना नहीं आता है तो वो डूब जाएगा। और उसकी साँस चली जाएगी। उसकी साँस जो है, वो उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है।
तो अभी अच्छी परिस्थिति तो यह है कि वो जहाज़ में साँस भी ले रहा है। पर अगर चुनना है, तो फिर उसको अपनी साँस को चुनना होता है। साँस अगर रुक जाएगी, साँस नहीं ले पाएगा तो बाकी क्या पाएगा किसी चीज़ का?
तो उसी तरह से, वास्तव में जो आत्मा है, जैसे शरीर में साँस है, वैसे आत्मा के लिए भक्ति है। तो जब हम भक्ति से दूर चले जाते हैं, तो उसके लिए जैसे व्यक्ति को साँस नहीं मिलेगी तो तड़पने लगता है, तो व्यक्ति ऐसे ही भगवान से दूर हो जाता है। तो भगवान के लिए व्यक्ति तड़पने लगता है। और तड़प को व्यक्ति अलग-अलग चीज़ों से पूरा करने का प्रयास करता है। कुछ लोग शराब पी लेते हैं, कुछ लोग मूवी (movie) देखने लगते हैं, कुछ लोग क्रिकेट में लग जाते हैं, कुछ लोग और पैसा कमाने में लग जाते हैं। पर वास्तव में जो भी एक सांसारिक चीज़ के पीछे जा रहा है, वास्तव में वो क्या है? वो भगवान को इस चीज़ में ढूँढ रहा है। उसको पता नहीं है, वो भगवान को ढूँढ रहा है। हमारे सबसे बड़े आश्रय केवल भगवान हैं।
तो इसलिए अगर हम तत्वज्ञान के स्तर पर इसे नहीं समझते हैं, हम भूल करते हैं। “त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देव देव।” यहाँ पे पहले श्लोक में चार चीज़ें बताई हैं जो रिश्ते हैं— माता, पिता, मित्र (सखा), भाई या बंधु। और फिर आगे बाद में चीज़ें बताई हैं जो वस्तुएं हैं— एक है विद्या, और द्रव्य (धन)।
तो यहाँ पे भाव क्या है? यह सब चीज़ें हमारे जीवन में हमें आश्रय देती हैं। छोटे होते हैं तो माता-पिता का आश्रय लेते हैं, बाद में मित्र का आश्रय लेते हैं, भाई-बंधु हमें आश्रय देते हैं। हमारी बुद्धि का, हमारे ज्ञान का वास्तव में हम आश्रय लेते हैं। पैसे का आश्रय लेते हैं। तो हमें समझना है कि ‘त्वमेव द्रविणं’ मतलब क्या है? कि हे भगवान जो आश्रय मुझे धन-संपत्ति से मिलता था, वास्तव में आप मुझे वो आश्रय उसके माध्यम से देते हैं। तो जब हम धन-संपत्ति को भगवान से स्वतंत्र एक अलग आश्रय मान लेते हैं… धन वास्तव में ज़रूरी है, पर जब हम उसको भगवान से स्वतंत्र मान लेते हैं, तो फिर वो हमें भगवान से दूर ले जा सकता है। पर हम समझते हैं कि यह ज़रूरी है मेरे लिए, पर वास्तव में सबसे बड़े ज़रूरी और आश्रय भगवान हैं।
और भगवान से अलग आश्रय धन-संपत्ति को मान लेते हैं, तो अगर किसी परिस्थिति के लिए वो आश्रय चला जाता है, तो वो उसको प्राप्त करने के लिए भगवान को छोड़ देगा! वो क्या है, जैसे “यह प्रिय चीज़ है, उसको प्राप्त करने के लिए मैं अपनी साँस को छोड़ दूँगा।” तो मुझे तभी क्या करना है? भगवान का आश्रय लेना है।
भगवान की शरण और समस्या का समाधान
और भगवान का आश्रय करने के बाद, “अच्छा यह समस्या है, इसका हल करना है।” ऐसा नहीं है कि भक्त मतलब भौतिक चीज़ों की कुछ परवाह नहीं करता है। ऐसा नहीं है। पर उसमें जो भक्त है, और जो भक्त नहीं हैं (Pious materialist – पुण्यवान भौतिकवादी व्यक्ति हैं), उनमें फ़र्क क्या है? फ़र्क ये है कि जो पुण्यवान भौतिकवादी होता है, उसके लिए दुनिया पहले है, भगवान दूसरे हैं। दुनिया सब अच्छी चलती रहे, और वो अच्छा चलाने के लिए भगवान चलने चाहिए।
पर जो भक्त है, उसके लिए दुनिया से पहले भगवान हैं। मतलब क्या है? समस्या आ गई है, समस्या का हल जरूर करना है, पर पहले भगवान का आश्रय ग्रहण करना है। जब पहले हम भगवान का आश्रय ग्रहण कर लेते हैं, तो फिर वास्तव में हमें समाधान मिलता है, हम थोड़े सुरक्षित महसूस करते हैं भगवान के आश्रय में। और फिर ये समस्या का हल हम ढूँढ सकते हैं। तो पहले वास्तव में सॉल्व (solve) करने के लिए समस्या का हल करना है। जो समस्या को हल करने वाला है, वही ओवर-एनालाइज़ (over-analyze) करके समस्याओं को बढ़ाने लग जाएगा, तो फिर वह समस्या और बढ़ जाएगी।
तो सबसे पहले वो शरण लेते हैं। तो जब हम भगवान का आश्रय लेते हैं, भगवान से संबंध जोड़ते हैं, और फिर इसके बाद में जो भी कार्य हमें करना है, हम करते हैं। तो इसको, जो लक्ष्य और भक्ति, इन दोनों को हमें एक प्रतिस्पर्धी की तरह नहीं देखना है। प्रतिस्पर्धी की तुलना में, वास्तव में क्या देखना है? भगवान जो हैं, वही लक्ष्मी के स्रोत हैं। और जो लक्ष्मी से जो आश्रय मिलता है, वो भी भगवान हैं। तो अगर वो नहीं है, भगवान का आश्रय अभी भी मिल सकता है, भगवान का आश्रय देखना है। और उसी आश्रय के साथ, यह आश्रय वापस कैसे प्राप्त करना है, उसके लिए कार्य करना है।
दीर्घकालीन समस्याएँ और हमारी अपेक्षाएँ
इसमें सवाल कोई है? तब तक मैं इस विषय पर लगता हूँ। तो कई बार अगर हमारे जीवन में समस्याएँ बहुत समय तक रहती हैं, और जाती ही नहीं हैं, तो तभी हमारे भगवान पे विश्वास डगमगाने लगता है। तो कभी-कभी कुछ समस्याएँ आती हैं हमारे जीवन में, कि वो हमारे जीवन में काफी समय तक रह सकती हैं। किसी को अगर कोई ऐसी बीमारी हो रही है, किसी की कोई हानि हो रही है, तो फिर क्या उसका मतलब है? एक तरह से हमें समस्या के कारण, जो परिस्थिति प्रतिकूल है, उसके कारण हमें परेशानी हो रही है। और हमारी अपेक्षा है कि अगर मैं भक्ति कर रहा हूँ, प्रार्थना कर रहा हूँ भगवान से, तो कि ये समस्या टल जाए। तो वो स्वाभाविक है।
तो एक है अपेक्षा, और दूसरी है अपेक्षा से आसक्ति। अपेक्षा बुरी नहीं है परेशानी में, अपेक्षा होना स्वाभाविक है। हम कोई भी संबंध बनाते हैं, उसमें अपेक्षा तो स्वाभाविक रूप से करेंगे कि “मैं ये करूँगा, आप वो करेंगे।” तो अपेक्षा करना सब स्वाभाविक है, पर अगर हम वो अपेक्षाओं से आसक्त हो रहे हैं, मतलब— “अभी मैं आपकी बहुत भक्ति कर रहा हूँ, आप मेरी समस्या का कुछ हल निकालें,” तो क्या हो रहा है? तभी हम क्या कर रहे हैं कि हम अब वो समस्या को हमारे और भगवान के बीच में एक दीवार या फ़िल्टर (filter) बना रहे हैं।
तो कैसे है? जो समस्या है, आप प्रयास कर सकते हैं, हमारी क्षमता से प्रार्थना कर सकते हैं कि समस्या पार हो जाए। पर उस अपेक्षा से अगर हम आसक्त हो जाएँगे, तो फिर वो हमारे और भगवान के बीच में एक समस्या बन सकती है, वो आसक्ति। तो उससे हम शरणागत नहीं हो पाएँगे भगवान के प्रति। पर अगर हम देखते हैं कि— “हे भगवान, जो भी परिस्थिति होगी, मेरी आपकी सेवा होगी।” तो जो ऐसे-ऐसे भाव रखते हैं हम, तो ये क्या होता है, हम वो अपेक्षा से, आसक्ति से अधिक, भगवान पर आश्रित होते हैं। “जो भी हो जाएगा, भगवान मैं आपकी सेवा करूँगा। मेरी बुद्धि तो यही कहती है कि ये परिस्थिति मेरे लिए प्रतिकूल है, ये परिस्थिति अगर चली जाएगी तो बहुत अच्छा हो जाएगा।” और वो सत्य भी हो सकता है, पर हमें समझना है कि भगवान सर्वोपरि हैं।
और अगर वो समस्या का हल नहीं हो रहा है, तो फिर हमें क्या करना है? कि वो समस्या के बारे में, जितना हम सोच रहे हैं, उसको हमें कम करना है। कैसे? कि “अच्छा समस्या के बारे में, आज, जब हम बस इसी चिंता में और असर में रह रहे हैं… आज की जो बात है (matter of today), मैं आज को तो संभाल सकता हूँ। कल की समस्या, थोड़ी कल, बीता हुआ कल और आने वाला कल। दोनों कलों को मैं समस्या के ऊपर डाल देता हूँ। कि ये एक दिन हो सकता है।” तो क्या होता है? मैं सोचता था कि, “ठीक है वो एक समस्या है। मैं ये सोच रहा हूँ कि ये जिंदगी भर रहने वाला है।” क्या करूँगा? अगर मुझे ज़िंदगी भर ये सहना है, तो फिर वो एक दिन भी असहनीय हो जाएगा। “आज का दिन है, ठीक है। मैं आज क्या कर सकता हूँ? क्या करना है?”
तो ऐसे ज़रूरी नहीं है कि हमें हर चीज़ में सारी ज़िंदगी भर का विचार करना है। तो समस्या है, कितनी समस्या नहीं है, पर हम आज क्या करेंगे? आज की समस्या आज में है। और वो अपेक्षा लगानी ज़रूरी नहीं है कि ये समस्या का हल हो ही जाएगा। और ऐसा भी हमें डर नहीं रखना कि ये समस्या रहने ही वाली है। “जो भी हो मैं आपकी सेवा करूँगा।” जो भाव रखते हैं, तो कई बार ऐसा होता है कि वो समस्या जो है, वह एक तरह से हमें और सुदृढ़ बनाती है। वो समस्या जो है, वह हमें और मज़बूत बनाती है।
तो कभी-कभी ये समस्या हमारे विकास के लिए ज़रूरी होती है। तो ऐसे नहीं कि वो समस्या बुरी है। जैसे क्या होता है कि हम छोटे बालक होते हैं, “मुझे साइकिल चाहिए” तो माँ-बाप कहते हैं “बेटा अभी ऐसा नहीं है।” तो क्या होता है, वो बच्चा समझ जाता है कि माता-पिता भी सीमित हैं, तो इसलिए वो चाहकर भी नहीं दे सकते। तो क्या होता है, जब हम बड़े होने लगते हैं, तो हम हमारी अपेक्षाएँ कम कर लेते हैं, बच्चा छोड़ देता है कि माता-पिता सब कुछ दे सकते हैं जो भी मैं चाहूँ।
पर क्या होता है, जब भगवान के पास जाते हैं, भगवान तो असीमित हैं। भगवान अगर चाहें तो सब कुछ दे सकते हैं। तो भगवान की जो विशालता है, उससे क्या होता है, उससे हमारी अपेक्षाएँ विशाल बन जाती हैं। और क्या होता है, हम सोचते हैं कि “क्यों नहीं कर रहा है? अगर नहीं कर रहा है, शायद भगवान मेरी परवाह ही नहीं करते हैं!” पर अगर हम स्वीकार करते हैं कि भगवान हमसे बड़े हैं, हमसे श्रेष्ठ हैं, तो केवल भगवान हमसे शक्ति में श्रेष्ठ नहीं हैं, वो हमसे बुद्धि में श्रेष्ठ हैं। और उसका मतलब है कि अगर भगवान… अगर हम सोचते हैं कि यह समस्या हमारे जीवन में है, इससे कुछ अच्छा होने वाला है, मुझे पता नहीं है यह क्या अच्छा होने वाला है। पर अगर वो समस्या दूर नहीं करते हैं, तो इसका मतलब यह है कि इससे कुछ तो अच्छा भगवान कर रहे हैं मेरे लिए। कैसे है यह पता नहीं है।
तो ऐसे सोचने की ज़रूरत नहीं है कि यह समस्या ज़िंदगी भर रहेगी। “मैं कैसे सोचूँ कि क्या करूँगा? एक-एक दिन मुझे आप देखते हैं, क्या मैं अभी भगवान की सेवा कर सकूँ?” तो एक दिन करते हैं, तो एक दिन अगर हम करते रहेंगे, तो क्या होता है हम देखेंगे कि एक-एक दिन निकल जाते हैं। और वो समस्या जो हमारे मन में बड़ी जगह ले रही है, मेरे दिन में, वह कम हो जाएगी। भगवान की योजना कार्य करती है।
तो इसलिए क्या होता है कि जब हम जो विचारधारा रख रहे हैं, और भगवान की विचारधारा जो है, वो अलग है। इसलिए हम समझ नहीं पाते हैं। इसलिए हम परेशान हो जाते हैं कि “भविष्य में क्या आने वाला है?” हमें पता नहीं होगा, पर भविष्य के नियंत्रणकर्ता कौन हैं, ये हमें पता है। इसलिए आज की समस्या जो है, वो अभी कल होगी कि नहीं होगी, और कल बढ़ेगी, क्या होगा, कल की चिंता करनी ज़रूरी नहीं है। आज हमारी क्षमता से हम सेवा करते रहें, तो उससे हमारी बुद्धि भी विकसित होगी, तो कल जो भी आएगा, तो भगवान हमें बल देंगे, उससे हम आगे बढ़ते रहेंगे। बहुत अच्छी बात है।
मन का खेल और शास्त्रों का दृष्टिकोण
यह समस्या नहीं होगा (Specific) क्या है कि जो हमारा मन है, जैसे कहीं भारत-पाकिस्तान पे तनाव रहता है, तो क्या होता है अगर पाकिस्तानी आक्रमण कर रहे हैं, तो अगर वो एक सैनिक को पकड़ लेंगे, तो अगर सब साथ में रहेंगे तो किसी को पकड़ना मुश्किल है। युद्ध चलता रहेगा तो किसी एक को पकड़ना मुश्किल है। पर अगर कोई अकेला रह जाता है, तो उसको पकड़ लेंगे, और फिर उसके साथ बहुत कुछ करते हैं, मार-पीट के बहुत कुछ कर सकते हैं।
तो ऐसे ही हमारा मन क्या करता है? युद्ध चलते रहेगा तो एक को पकड़ना मुश्किल है, पर मन हमको अकेला करता है। और अकेला करने के बाद फिर हमको पूरा कमज़ोर कर देता है। तो ज़रूर हमारे जीवन में समस्या है, और ऐसे नहीं कि समस्याओं को हम कम बोलें। और कई बार ऐसे हो सकता है कि इस समय में हमारे जीवन में बहुत बड़ी समस्या है, और दूसरों के जीवन में कोई समस्या नहीं है। पर इस दुनिया में सबके जीवन में समस्या है। और वो ज़रूर प्रचारक का सवाल आ जाता है, “तुम्हारे जीवन में सबसे बड़ी समस्या अभी तक क्या आ रही थी?” वो ज़रूर बोलेंगे। किसी को समस्या नहीं चाहिए, पर समस्या सबके जीवन में है।
और जब हम समझते हैं कि “अभी मैं बड़ी विकट परिस्थिति से जा रहा हूँ, पर इस दुनिया में सब कोई बड़ी विकट परिस्थिति से जा रहा होता है।” अभी इससे राहत क्या है? इससे राहत यह नहीं है कि मैं दुखी हूँ तो सब दुखी हैं। पर यहाँ भाव क्या है कि अगर हम समझते हैं कि यह इस दुनिया का स्वभाव है। क्या होता है, कई बार हमें ऐसे लगता है कि यह मेरे साथ ही क्यों हो रहा है? मुझे एक परेशानी क्यों है? पर हाँ, मुझे अभी ऐसा हो सकता है कि इस परेशानी से मुझे बहुत समस्या है, पर दूसरों को भी समस्या है। और एक प्रचारक बनने का एक फायदा होता है कि दुनिया में कितनी समस्या है, बहुत आसानी से पता लग जाता है क्योंकि सब लोग आके अपनी समस्या बताते रहते हैं।
तो वास्तव में हैं, हम सब किसी न किसी परिस्थिति में हैं। वास्तव में हम चुनाव कर रहे हैं कि, “Am I counting my problems, or am I counting my blessings?” (क्या मैं अपनी समस्याओं की गणना कर रहा हूँ, या मैं अपने जीवन के आशीर्वादों की गणना कर रहा हूँ?) तो जब ऐसा हो रहा है, समस्या बहुत बढ़ रही है मेरे जीवन की, तो हमें ऐसे अगर कोई और भक्त है, कोई और मित्र है जो समझता है, जो हमारे मन को समझता है। और फिर हमारा मन कैसे विचार कर रहा है, वो हमें समझाता है।
कभी-कभी क्या होता है कि हमें एक समस्या है, और अगर वो व्यक्ति उसको समझता है कि ये क्या समस्या है, तो वो हमारी समस्या समझता है। पर वो हमारी समस्या में कैसे हमारे मन को समझे, वो अगर समझता है… तो अगर ऐसे कोई मित्र है, ऐसे कोई भक्त है, वास्तव में बहुत अच्छा है। पर अगर नहीं है, तो हमें ढूँढना चाहिए, और ऐसे संग में भक्त मिलेंगे तो बहुत मदद मिलती है और वृद्धि होती है।
अगर नहीं है, तो फिर भी अगर हम शास्त्रों का अध्ययन कर रहे होते हैं, तो तत्वज्ञान अगर हम सुन रहे होते हैं तो क्या होता है? ‘Study of philosophy’ मनन कर रहे होते हैं। अगर हम तत्वज्ञान का अध्ययन कर रहे होते हैं, तो क्या होता है कि जब मन हमें परेशान कर रहा है, मन हमारी समस्या को बढ़ा रहा है, मन हमारे उत्साह का ह्रास कर रहा है, पर तभी “हाँ ये मन है, ये मन कार्य कर रहा है।” समस्या है जरूर, पर वो समस्या की मात्रा है, कई बार मन उसको बहुत बढ़ा रहा है।
‘Life determines our problems, our mind determines the size of those problems.’ (जीवन हमारी समस्याएँ तय करता है, वो समस्या की मात्रा कितनी है, यह मन बनाता है)। तो इसलिए, अगर हम भक्तों के संग में, शास्त्रों के माध्यम से तत्वज्ञान को समझने का प्रयास करते हैं, तो तब हम समझते हैं कि इस दुनिया में समस्या है। और मन उसको और बड़ा चढ़ाकर दिखा रहा है।
तो एक है कि हम इस तरह से देखते हैं कि— “मैं भक्ति कर रहा हूँ, समस्या है और ये भक्ति का मार्ग ऐसा है…” इस तरह से उलझन है। यह वास्तव में मन बोल रहा है। पर हम शास्त्रों का अध्ययन कर रहे होंगे तो हम इसको उल्टा करेंगे। देखो, शास्त्रों ने बताया था कि ये जो जगत है, ये जगत् दुखों से भरा होगा (दुखालयम अशाश्वतम्)। ऐसा नहीं है कि हमेशा हमें दुख-ही-दुख होगा। पर हम सोचते हैं कि “मैं ही दुखी हूँ, मैं अपवाद हूँ, यह मेरे साथ ही क्यों हो रहा है?”
तो शास्त्रों ने जो बताया है, वह भी सत्य कैसे है, ये मैं अपने जीवन में देख रहा हूँ। शास्त्रों ने सत्य बताया है। तो वही समस्या का, अगर मैं मन को पकड़ लेता हूँ, उससे कार्य कर रहा है, तो वही समस्या की परिस्थिति में वास्तव में शास्त्रों में मेरी श्रद्धा बढ़ेगी। “हाँ, शास्त्र जो बता रहे हैं, वो सच है, समस्या है।” और शास्त्र सिर्फ यह नहीं बता रहे हैं कि— “अरे यह दुनिया दुखालय है, तुम दुखी रहो।” नहीं, यह शास्त्रों का संदेश नहीं है।
हम देखते हैं कि अर्जुन बड़े उद्विग्न थे भगवद्गीता के शुरुआत में। और भगवान ने यह नहीं कहा कि “जब यह जगत दुखालय है, तुम दुखी हो, तुम दुखी रहो।” भगवान देखते हैं, भगवान के संदेश के द्वारा अर्जुन शांत हो जाता है, उनका आत्मविश्वास, उनका उत्साह वापस आ जाता है। तो क्या है? इसका मतलब शास्त्रों का एक संदेश यह है कि जगत दुखालय है। शास्त्रों का दूसरा संदेश यह भी है कि अगर मैं भगवान का आश्रय ग्रहण करता हूँ, तो हम दुखों के पार जा सकते हैं।
दुखों के पार जाना मतलब दुख चला जाएगा, ऐसा नहीं है। पर हमारी चेतना दुखों के पार जा सकती है। मतलब शास्त्रों का एक संदेश यह है— मेरे आश्रय से आप समस्याओं के पार जा सकते हैं। हम मन को पकड़ते हैं, मन मुझे क्या कर रहा है? मुझे विक्टिम (victim – पीड़ित) बना रहा है। मन मेरी समस्या को और बढ़ा रहा है। “मैं समझ गया हूँ शास्त्रों की पहली सीख कि जगत दुखालय है, ये मैं अभी समझ गया, आज़मा चुका हूँ ना, इसका मुझे एहसास हो रहा है, साक्षात्कार कर रहा हूँ। शास्त्रों की दूसरी सीख जो है— अगर भगवान का आश्रय ग्रहण करते हैं तो फिर हम समस्याओं से राहत प्राप्त कर सकते हैं। तो मुझे अभी ये आज़माना है, क्या कर सकते हैं।”
तो अगर वो भाव रखेंगे, तो वही जो प्रतिकूल परिस्थिति, जो समस्या है, हमारे उत्साह को कम करने की बजाय, वही समस्या हमें भगवान के करीब ले जा सकती है।
समस्या का चश्मा और भगवान की कृपा
तो मतलब क्या है, यह संसार में क्या है? हम यहाँ पर हैं, भगवान यहाँ पर हैं, और समस्या यहाँ पर है। और हम सोचते हैं कि यह भगवान, यह समस्या को क्यों नहीं निकालते हैं? क्या कर रहे हैं हम? हम भगवान को समस्या के दृष्टिकोण से देख रहे हैं। मतलब समस्या का चश्मा मैं बीच में रख रहा हूँ। और तो भगवान को देख रहे हैं— “यह भगवान मेरी समस्या को क्यों नहीं निकालते हैं?”
और शास्त्र क्या करते हैं? हम शास्त्र का अध्ययन करते हैं, तो हम देखते हैं कि यह समस्या यहाँ पर नहीं है। यह समस्या क्या है? यह भगवान की दी हुई है, यह देख रहे हैं हम। यह समस्या है। समस्या का हल भगवान क्यों नहीं निकालते हैं, यह देखने की बजाय हम देखते हैं कि यह समस्या है, यह समस्या का हल है, और यह समस्या मेरे विकास के लिए है।
मतलब हम सोचते हैं कि यह समस्या का हल होगा, वो होगा समय के लिए। पर भगवान जो हैं, समस्या में भी हमें हल दे सकते हैं। हमें राह दे सकते हैं। तो समस्या रहेगी, पर समस्या का बोझ हमारे मन पर नहीं रहेगा। तो अगर हम देखते हैं कि समस्या यहाँ पे है और यह समस्या जो भगवान की ओर से है, तो वो समस्या के कारण हमें यह देखना है कि भगवान की भक्ति में लगने से समस्या से राहत मिल रही है। मतलब मेरी चेतना उससे ऊपर उठ रही है।
अगर इस तरह से हम विचार करके भक्ति के तत्वज्ञान का अमल करते हैं हमारे जीवन में, तो विपरीत परिस्थिति में मेरा उत्साह कम नहीं होगा, उत्साह और बढ़ जाएगा। और हम वास्तव में देखेंगे कि समस्याओं में भगवान अभी भी हैं। और फिर जो हमारा एक तरह से भौतिक दृष्टिकोण बना है कि “ये समस्या है तो भगवान की कृपा नहीं है”, हम देखेंगे कि समस्या है तब भी भगवान की कृपा है! और वास्तव में उससे हम दिव्य स्तर को प्राप्त कर सकते हैं।
बहुत-बहुत धन्यवाद करते हैं। श्रील प्रभुपाद की जय!