Increasing our willpower through restriction redirection and reconstruction – Hindi
[Sunday feast lecture at ISKCON, East of Kailash, Delhi, India]
Disclaimer: This transcript was generated using AI and may contain occasional errors or inaccuracies.
Lecture Summary
इस व्याख्यान में वक्ता ने मन की आंतरिक शक्ति (दृढ़ संकल्प) को बढ़ाने और बुरी आदतों से मुक्त होने के लिए तीन मुख्य सिद्धांतों—रिस्ट्रिक्शन (Restriction), रीडायरेक्शन (Redirection) और रिकंस्ट्रक्शन (Reconstruction)—पर विस्तार से चर्चा की है।
मुख्य बिंदुओं का सारांश निम्नलिखित है:
- मानसिक बंधन और आशा-पाश: हमें लगता है कि हम पूरी तरह से आज़ाद हैं, लेकिन मानसिक स्तर पर हम अपनी इच्छाओं और आदतों (जैसे लालच, क्रोध, या किसी अन्य बुरी लत) के गुलाम बन चुके हैं। भगवद्गीता के अनुसार, मनुष्य इन आशा-पाशों से बंधा हुआ है, जिसके कारण वह जो करना चाहता है वह नहीं कर पाता और अनचाही चीज़ों की तरफ खिंचा चला जाता है।
- इच्छाओं का चक्र (इम्पल्स से कम्पलशन): जब हम किसी चीज़ का बार-बार भोग करते हैं, तो वह प्रवृत्ति पहले एक साधारण आवेग (Impulsive) होती है और फिर एक ज़बरदस्ती की आदत (Compulsive) बन जाती है। इस मज़बूत रस्सी (बंधन) को केवल साधारण स्वेच्छा से नहीं काटा जा सकता, इसके लिए ज्ञान और भक्ति रूपी शस्त्र की आवश्यकता होती है।
- परिवर्तन के तीन मुख्य सिद्धांत:
- रिस्ट्रिक्शन (Restriction / दीवार बनाना): अपनी कमजोरियों और प्रलोभनों को अपने पास न आने देना। यदि सुविधा या प्रलोभन सामने नहीं होगा, तो मन का आवेग स्वतः शांत हो जाएगा (जैसे कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है)।
- रीडायरेक्शन (Redirection / दिशा बदलना): मन को गलत दिशा से हटाकर भगवान के स्मरण और साधना में लगाना। जिस प्रकार एक माँ ज़बरदस्ती अपने बीमार बच्चे को कड़वी दवाई पिलाकर ठीक करती है, उसी प्रकार बुद्धि रूपी माँ के द्वारा मन रूपी बालक को साधना रूपी नियम में चलाना पड़ता है।
- रिकंस्ट्रक्शन (Reconstruction / फर्श की रचना बदलना): भक्ति केवल कोई तात्कालिक भावना (Emotion) नहीं है, बल्कि यह एक साधना और कल्टीवेशन (Cultivation) है। जब हम अपनी भावनाओं पर निर्भर न रहकर नियमबद्ध रूप से निरंतर भक्ति करते हैं, तो हमारे मन का झुकाव भौतिकता से हटकर पूरी तरह भगवान की ओर हो जाता है (जैसे ढलान बदलने से पानी अपने आप सही दिशा में बहने लगता है)।
Full Transcription
संकल्प शक्ति और मानसिक बंधन: परिचय
हरे कृष्णा! मैं बड़ा भाग्यशाली हूँ कि राधा पार्सात्री के इस कार्यक्रम में आप सभी से कुछ भगवान के बारे में चर्चा करने का मौका मिला है। तो मैं आज इस विषय पर चर्चा करूँगा कि किस तरह से हम हमारी आंतरिक शक्ति जो है, जो मन की शक्ति है, हमारे दृढ़ संकल्प को और सुदृढ़ कैसे बना सकते हैं। मैं कुछ समय पहले अमेरिका में था, अभी तो वहाँ पे एक टीवी टॉक शो था जहाँ पे मेरा इंटरव्यू हुआ था। तो वहाँ पे पूछा गया था कि नया साल आ रहा था, तो हम लोग नए साल के रेसोल्यूशन्स (Resolutions) बनाते हैं, तो हम फैसला करते हैं मुझे ऐसा करना है, ऐसे नहीं करना है।
क्या मेरी आवाज़ सुनाई दे रहा है पीछे? नहीं? यह नहीं है? अभी सुनाई दे रहा है? यह नहीं है? हम सब चाहते हैं कि मैं एक अच्छा व्यक्ति बनूँ, एक अच्छा भक्त बनूँ, अच्छी तरह से कार्य कर सकें। तो इन सब के लिए जो हमारे अंदर की दृढ़ संकल्प की शक्ति है, वह बहुत महत्वपूर्ण है। तो कई बार जब नया साल आता है, तो लोग न्यू ईयर रेसोल्यूशन (New Year Resolution) बनाते हैं। अभी सुनाई दे रहा है सबको?
तो मैं इस पर अमेरिका में टॉक शो दे रहा था, तो तभी एक रिसर्च फाइंडिंग (Research finding) आया था कि अबाउट (About) 90% ऑफ़ द न्यू ईयर रेसोल्यूशन्स (90% of the New Year Resolutions) दैट पीपल् मेक आर नॉट न्यू (that people make are not new)। जो लोग न्यू ईयर रेसोल्यूशन को फॉलो (Follow) करते हैं, लोग नहीं-नहीं करते हैं, तो जो फैसले करते हैं वो नए नहीं होते हैं। मतलब क्या? पिछले साल वो फैसले करते थे पर वो टिक नहीं पाए, इसलिए इस साल भी वो ही करते हैं। तो अभी ऐसा क्यों होता है और उसके बारे में हम क्या कर सकते हैं? तो ऐसा क्यों है कि हमारे अंदर से कुछ ऐसी सही शक्ति आती है जो हमारे संकल्प को पूरा करने में हम समर्थ नहीं हो पाते हैं?
आशा पाश और आदतों का बंधन: हम वास्तव में कितने आज़ाद हैं?
मैं एक उदाहरण दूंगा और फिर उसके बाद में हम तीन प्रिंसिपल्स (Principles) कैसे हम खुद को परिवर्तित कर सकते हैं – रिस्ट्रिक्शन (Restriction), रीडायरेक्शन (Redirection) और रिकंस्ट्रक्शन (Reconstruction), इन तीनों के बारे में चर्चा करेंगे।
तो मैं एक आध्यात्मिक और एडिक्शन (Addiction) जो व्यक्ति बुरी आत्मा में फंस जाता है, तो उसके बारे में एक ग्रंथ लिख रहा हूँ, तो उसके बारे में मैं संशोधन कर रहा था। तो एक प्रिंसिपल आया था जो मैं पढ़ने को कहूँगा कि कैसे है कि हम सब समझते हैं कि मैं आज़ाद हूँ और हमें लगता है कि मैं आज़ादी के साथ जो भी करना चाहता हूँ कर सकता हूँ। पहले साथ-साथ मेरे भारत गुलामी में था या पहले गुलामी ऐसी होती थी जब एक किसी और को मालिक बनाते थे, मालिक बनते थे तो उसकी ज़िंदगी उसके हिसाब से चलती थी। हम सोचते हैं अभी मैं आज़ाद हूँ। हाँ, एक तरह से हम ज़िंदगी से आज़ाद हैं, पर दूसरी तरह देखा जाए तो हम सब बंधे हुए हैं।
भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय में बारहवें प्राकृतों को, भगवान कहते हैं:
आशा पाशैः शतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः। इहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचयान्।।
आशा पाशैः शतैर्बद्धाः, हम सब आशाओं से बंधे हुए हैं। कोई सिगरेट पी रहा है, कोई शराब पी रहा है, कोई किसी रूप में है, कोई किसी रूप में है। मैं शराब पी रहा हूँ, मैं गैम्बलिंग (Gambling) में हूँ, तो पर मुझे नहीं लगता है कि मैं गुलाम हूँ, मैं आज़ाद हूँ। तो ये तो एक बहुत ड्रामेटिक (Dramatic) उदाहरण है, पर हम सब हमारे जीवन में देख सकते हैं कि हम सबकी कुछ आदतें हो गई हैं जिससे हम फंस जाते हैं। कुछ लोग होते हैं जो टीवी देखे बिना रहता ही नहीं है, कुछ लोग होते हैं चाय पिए बिना रहता ही नहीं है। तो अभी ये इतना हानिकारक नहीं होगा, पर पॉइंट मेरा ये है कि हमको लगता है हम आज़ाद हैं, पर मानसिक स्तर पर हम सब बंधे हुए हैं, बंधन में बसे हुए हैं। पर मानसिक स्तर पर जो बंधन होता है, उससे क्या होता है? हम जो चाहते हैं वो कभी नहीं कर पाते हैं और जो नहीं चाहते हैं, उसकी तरफ खींचे जाते हैं।
तो आशा पाश से बंधा हाँ, भगवान कहते हैं कि इस तरह से हम सब अपनी इच्छाओं से बंधे हुए हैं। और इसमें क्या होता है? हम जो भी अच्छे कार्य करना चाहते हैं, हम फैसला करते हैं कि मैं ऐसे करूँगा, ऐसे नहीं करूँगा, पर क्या होता है? यह जो बंधन है, अगर मुझे कोई रस्सी से बांध लिया है और मैं चाहता हूँ मैं इधर जाऊँ, पर वो व्यक्ति उस रस्सी से खींचेगा मुझे, तो मैं विवश होकर उधर खींचा जाऊँगा क्योंकि वो रस्सी वहाँ भी है पहले से।
इच्छाओं का चक्र और रिस्ट्रिक्शन (Restriction) का सिद्धांत
तो इसी तरह से हम सब हमारी इच्छाओं के खिलाफ, हमारे दृढ़ संकल्पों के खिलाफ भी खींचे जाते हैं और यह इसीलिए है कि हमारी इच्छाएं जो है वो अभ्यास क्रम में गई हैं। तो कैसे होता है कि ये रस्सी हो गई है जो हमें बांधती है, जो हमें खींचती है? हर बार जब हम किसी चीज़ का भोग करते हैं, तो उसकी इच्छा और बढ़ जाती है और जब उसकी इच्छा और बढ़ जाती है, तो फिर वो रस्सी और मजबूत हो जाती है। और जितने बार हम उसका भोग करते हैं, तो पहले जो होता है वो इंपल्सिव (Impulsive) होता है। इंपल्सिव मतलब, नहीं, यह चीज़ है खा लो थोड़ा, यह देख लो, यह पी लो, जो भी करना है। पहले इंपल्स होता है, पर बार-बार अगर हम करते रहते हैं, तो जो इंपल्सिव है वो कंपल्सिव (Compulsive) बन जाता है। बहुत-बहुत जबरदस्त है यह, थोड़ा है फिर छोड़ नहीं पाते हैं।
तो अभी जो रस्सी है उसको काटना है, तो यह रस्सी को कैसे काट सकते हैं? सिर्फ स्वेच्छा से या दृढ़ संकल्प से यह नहीं होने वाला है। दृढ़ संकल्प मजबूत है, पर दृढ़ संकल्प किसके लिए चाहिए? अगर रस्सी से मैं बंधा गया हूँ, मैं दृढ़ संकल्प से खींचूँगा, उससे सिर्फ अगर रस्सी बहुत मजबूत है, तो मुझे सिर्फ दर्द होगा, ऊपर से मैं छूटने वाला नहीं हूँ। मुझे शस्त्र चाहिए, शस्त्र। अगर मुझे चाको (चाकू) मिल जाएगा, तलवार मिल जाएगा, उससे मैं वो काट सकता हूँ।
तो भगवान बताते हैं, भागवत में बताया गया है, हमारी आसक्ति मतलब क्या है? कि जिस विषय में हमारे विचार अपने आप चले जाते हैं। अगर कोई शराबी नहीं है, कुछ काम नहीं है, तो तुरंत शराब का विचार आता है। काम है, तो भी आता है विचार। पर काम है, तो क्या होता है? अगर परिवर्तन करना है, तो क्या करना है? अगर मैं चाहता हूँ कि ये पानी उधर नहीं चले, तो क्या तीन चीजें हैं उसके लिए? सबसे पहला क्या है? अगर ये पानी उधर जा रहा है, तो यहाँ पे एक बांध बना दो, यहाँ पे एक थोड़ी सी दीवार बना दो जिससे कि वो पानी उधर न चले। दूसरा है, जो पानी आ रहा है, उसको जबरदस्ती उधर खेल दो (धकेल दो)। और तीसरा है, वो फर्श की रचना बदल दो ताकि फर्श ऐसा हो जाएगा, अगर फर्श ऐसा हो जाएगा, तो फिर अपने आप पानी उधर चला जाए।
तो अब ये तीनों चीजें जो है, ये इंग्लिश में बोला – रिस्ट्रिक्शन (Restriction) – बांध बना देना, रीडायरेक्शन (Redirection) – मतलब पानी उधर खेल दो, और रिकंस्ट्रक्शन (Reconstruction) – फर्श को उधर वैसे कर देना, उधर झुकाना। तो ये तीनों जो है, ये तीनों भगवान के स्मरण से होते हैं, भगवान का स्मरण करते हैं, तो इससे तीनों परिवर्तन होता है। इस तरह से हमारी जो आदतें हैं, जो अच्छी आदतें नहीं हैं, इसे हम छूट सकते हैं, जो अच्छी आदतें बसानी (बनानी) हैं, बना सकते हैं।
तो अभी ये तीनों कैसे होता है? सबसे पहले, अगर मुझे एक दीवार बनाना है, तो दीवार बनाना मतलब क्या है? कोई भी चीज़ है, अगर मुझे नहीं करनी है, वो मैंने फैसला कर लिया है कि मैं ये नहीं कर रहा हूँ। कोई व्यक्ति होता है, उसको जैसे कोई शराबी है, बहुत शराब पी रहा है, अगर मान लीजिए वो शराबी है, तो उसका घर एक बार के ऊपर है। तो अभी वो बोलेगा, “मैं शराब नहीं पियोंगा।” तो क्या होगा? वो बार इतना पास में है कि भले ही उसका फैसला है कि मैं पीने वाला नहीं हूँगा, पर एक दिन ऐसी इच्छा आ जाएगी और तुरंत पास में ही चीज़ आ जाएगी और वो पी लेगी (पी लेगा)।
तो क्या होगा? जो भी हम सबकी कमियां है, हम सबकी कमजोरियाँ हैं, जिसमें हम फंस जाते हैं, तो उस मार्ग में जो हम जाते हैं, उसमें हमें कुछ बंधन लाना है, उसमें कुछ व्यक्ति लाना है। तो अगर कोई व्यक्ति है, जो बहुत खाता है और बहुत मोटा हो गया है, मोटेपन की वजह से बीमारियाँ हो रही हैं, तो उन्होंने फैसला कर लिया है कि मैं ज्यादा खाने वाला नहीं हूँ। तो अगर अपने घर में बहुत सारे स्वादिष्ट व्यंजन रखता है और बोलता है, “मैं खाने वाला नहीं हूँ।” तो क्या होता है? हो सकता है वो नहीं खाएगा, पर क्या है? जैसे ही इच्छा आ जाएगी मन में, वो ले लेगा, देखेगा।
तो क्या होता है? हमारे मन में जो इच्छा होती है, अगर हमारे चेतना इच्छाओं का ग्राफ (Graph) बनाएंगे, चित्र बनाएंगे, तो हमारे इच्छाओं को नियंत्रण करके इस तरह से रख सकते हैं। पर कैसे हो सकता है कि कोई बीच में इच्छा बढ़ जाता है? जैसे इलेक्ट्रॉनिक करंट होता है, तो उसमें कभी-कभी स्पाइक (Spike) आ जाता है। तो स्पाइक जो आता है, मतलब क्या? जैसे इलेक्ट्रॉनिक आइटम के लिए स्पाइक गार्ड (Spike guard) मतलब है, मतलब क्या? जैसे स्पाइक बढ़ गया, तो फिर वो उसको प्रोटेक्ट (Protect) करना चाहता है, उसको संरक्षण करना चाहता है।
द्वितीय श्लोक में शक्नोति इह यः सोढुं प्राक् शरीर विमोक्षणात्। कामक्रोधभवं बेगं स युक्तः स च सुखी नरः।।
यह कहते हैं कि जो इच्छाएं आते हैं काम और क्रोध के कारण, उसको आप अगर नियंत्रण कर लोगे, तो आप सुखी रहोगे। तो भगवान यहाँ पे यह अपेक्षा नहीं कर रहा है कि इच्छाएं आएगी ही नहीं, इच्छाएं आएगी, पर भगवान कहते हैं कि आप नियंत्रण कर लोगे कि जो प्रलोभन आएंगे और उनका आस्वादन नहीं करना है। तो अगर इच्छाएं बढ़ गया है अचानक, उस समय अगर मुझे भोग करने की सुविधा पास में है, मतलब शराब नहीं, फैसला किया कि मैं शराब नहीं पीने वाला हूँ और नियंत्रण करना है, पर बीच में इच्छा बढ़ गया है और जब इच्छा बढ़ जाती है और सुविधा भी पास में है, नीचे ही दुकान है, तो तुरंत जाकर पी लेगा। पर अगर सुविधा पास में नहीं है, तो क्या होता है? वो इच्छा रहेगी, इच्छा बढ़ गया है, तो तुरंत जाकर पीने पर… जब तक जाएगा, तो इच्छा उप जाती है (शांत हो जाती है), तो नीचे आ जाती है, “ठीक है, छोड़ दो, मुझे नहीं करना इच्छा।”
तो अगर किसी को बहुत खाता है, कम खाना है इस व्यक्ति को, पर फैसला कर लेता है कि मैं… तो फिर क्या? अगर सुविधा नहीं है, तो व्यक्ति उसमें फंसता नहीं है। तो ये पहला है, क्या है? हम एक दीवार बना जाती है (बना देते हैं), रिस्ट्रिक्शन।
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।
मन और बुद्धि का संबंध: रीडायरेक्शन (Redirection) की प्रक्रिया
दूसरा क्या है? रीडायरेक्शन, मतलब अगर मैं चाहता हूँ पानी इधर न जाए, तो मुझे कुछ ब्रांच (Branch) या कुछ जम्प (Jump), ऐसे कुछ चीज़ लेके उस पानी को उस ओर ढकेल देना। रीडायरेक्शन, इसका मतलब क्या है? कि हमारा मन जब गलत जाल में जाता है, जो मैंने फैसला किया है नहीं करता है और उसके बारे में विचार करने लगता है, तो भगवान बताते हैं क्या करना चाहिए? उसी समय:
यतो यतो निश्चलति मनश्चञ्चलमस्थिरम्। ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्।।
मन घूमता है, तुम उसके साथ तुम घूमते हो? मन घूमता है, तुम मत घूमो उसके साथ। मतलब क्या? “The mind may stray away, don’t let it stay away.” मन जाएगा गलत दिशा पर, पर क्या है? हम में शक्ति है कि इसको वापस ला सकते हैं, यह मन को नियमित करने के लिए, अगर कोई जो विचार लेना है हमें, तो क्या है? मन को हम बालक के समान समझ सकते हैं। कोई बालक, छोटा बालक है और उसको कोई बीमारी हो गई है, तो माँ जो है, बालक को डॉक्टर के पास ले जाती है। और जब डॉक्टर के पास ले जाती है, तो डॉक्टर जो है बालक के भले के लिए उसको चॉकलेट देगा या उसको बिस्कुट देगा और जो सीरियस बात करनी है, वो किसके साथ करेगा? माँ के साथ करेगा। माँ को बोलेगा, “देखो, इसको यह बीमारी हो गई है, इसके पेट में गड़बड़ है, इसको आगे सुबह, दोपहर, शाम यह दवाई देना।”
और अभी जब वो माँ घर जाएगी, तो अभी डॉक्टर तो हमेशा अपने साथ नहीं होगा, डॉक्टर क्या बोलेगा? माँ को आगे दवाई देना और दवाई देना, दवाई बच्चे को देना। ये कोई रीति-रिवाज नहीं है, इसके ऊपर रीति-रिवाज नहीं है। माँ ने एक चम्मच निकाला, दवाई मुँह में डाला, बच्चे ने मुँह बंद कर, सारा दवाई ऐसे चला गया। माँ, “मैंने एक चम्मच दवाई दे दी, तो तुमने दवाई दे, वो बच्चे ने ले ली।” माँ की जिम्मेदारी क्या है? वो दवाई बच्चा ने ले और जब वो अच्छा दवाई लेगा, उससे वो ठीक हो जाता है।
तो इस उदाहरण, इस उदाहरण में कितने पात्र हैं? चार चीजें ऐसी हैं – एक बच्चा, माँ, डॉक्टर और दवाई। तो जो बच्चा है, वो हमारे मन के समान है। जैसे बच्चा होता है, “नहीं, मुझे दवाई नहीं चाहिए, स्वाद नहीं है इसका अच्छा है, मुझे नहीं चाहिए।” तो जो बच्चा है, वो हमारे मन के समान है, मुझे जब नहीं करना है, भगवान का स्मरण नहीं करना है, इससे नहीं करना है। पर क्या है? जो माँ है, वो बुद्धि के समान है। बुद्धि से हम समझते हैं, नहीं, मुझे करने की इच्छा नहीं है, पर मैं यह करने वाला हूँ।
और अभी जो हमारे गुरु हैं, वो डॉक्टर के समान है। तो अभी जो गुरु कैसे बता रहा था? गुरु किससे बात करते हैं? हमारी बुद्धि से बात करते हैं, हमारी बुद्धि को समझते हैं, “देखो, ये करने से आप कोई बुरा परिणाम होगे, आप बंधन में…” पर क्या है? जो मन क्या है? वो बालक के समान है, जो बुद्धि है वो माँ के समान है, जो डॉक्टर है, जो गुरु हैं और जो रहलान (रहस्य/औषधि), वो दवाई है।
तो इसका मतलब क्या है? कि भले ही वो बालक बोले, “कोई दवाई नहीं लेनी।” तो माँ क्या करती है? किसी ना किसी बच्चे को समझाएगी, उसका मुँह पकड़ के उसे दवाई दे देगी। तो वैसे ही भगवान बोल गया है कि हमारा मन लगा नहीं रहा है, तो भी क्या है? मन जाएगा इधर-उधर, जाएगा, लेके आओ, उसको वापस, उसको वापस लेके आओ और उसको भगवान में लगाओ। तो निश्चलति, जहाँ भी जाएगा मन, आप लेके आ जाओ और दूसरे ध्यान में:
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः। वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।
कि आप इंद्रियों का नियंत्रण करो और उसमें महत्वपूर्ण क्या है? आप मुझे भी क्यों करो? पानी इधर जा रहा है, तो मुझे पानी को उधर ले जाना है। मतलब क्या? हमारा मन इंद्रियों विषयों के बारे में बुरी चीज़ों के बारे में विचार कर रहा है, तो विचार कर रहा है उधर, तो उसको हम भगवान के उधर ले जाना है।
अब इसमें थोड़ा जबरदस्ती करना पड़ता है। पानी इस दिशा में जा रहा है, तो जबरदस्ती नहीं, उस पानी को उधर ले जाना है। तो वैसे जो हम साधना भक्ति करते हैं, साधना भक्ति इज द प्रोसेस ऑफ वॉलंटरी फोर्स (Sadhana bhakti is the process of voluntary force)। साधना भक्ति मतलब क्या? खुद को हमें जबरदस्ती करना है, दूसरा कोई हमें जबरदस्ती नहीं करता है। माँ क्या है? माँ बच्चे को जबरदस्ती करना पड़ता है कभी, दवाई लेना पड़ेगा, तो वैसे हमारे बुद्धि से हमें क्या करना है? मन को थोड़ी जबरदस्ती करनी पड़ती है, मन को पूछना नहीं है, नहीं और यह मैं कहने वाला हूँ कि इससे शुद्धि करना हूँ, बात हूँ, इससे क्या होगा? मेरा विचार इस दिशा में जाए, भगवान में जाए।
रिकंस्ट्रक्शन (Reconstruction): साधना और भक्ति का प्रभाव
और तीसरी चीज़ जो बता रहा था, रिकंस्ट्रक्शन (Reconstruction)। यह रीडायरेक्शन हो गया है, रीडायरेक्शन मतलब पानी इधर जा रहा है, उसको उधर दे। हमारा मन बुरी चीज़ों के लिए हो जाता है, हम उसको भगवान में दे। जो भक्ति की विधि है, उसका उद्देश्य यही है कि हम, हमारी भक्ति, हम मन भगवान में देने का है। अभी जब हम मन भगवान में लगाते हैं, तो उससे क्या होता है? रिकंस्ट्रक्शन हो जाता है।
रिकंस्ट्रक्शन मतलब क्या? अभी फर्श ऐसे झुकी हुई है, वो फर्श को हम बदल देते हैं, फर्श ऐसे झुक जाती है, फर्श जब ऐसे झुक जाती है, मतलब क्या होता है? वो पानी अपने आप उधर जाए। तो वैसे ही क्या होता है चार? जब हम धीरे-धीरे भक्ति करते रहते हैं, तो क्या होता है? हमारा मन जो पहले भौतिक चीज़ों की ओर आसक्त था, वो धीरे-धीरे वो भगवान के लिए आसक्ति करता है और स्वाभाविक रूप से वो भगवान के लिए चिंतन करता है, भगवान के लिए आसक्ति करता है और हम भगवान के लिए आकृष्ट हो जाना है।
यही 64 श्लोक में भगवान बोलते हैं, दूसरे अध्याय के:
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।।
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते। प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते।।
वो कहते हैं कि आप राग और द्वेष से विमुक्त के करें। मुझे यह अच्छा लगता है, मुझे यह अच्छा नहीं लगता है, ऐसे विचारों में मत फँसो। क्या है? एक नियमबद्धता से आप भक्ति करो।
कभी-कभी क्या होता है, हम जब भक्ति करते हैं, तो आपको लगता है, “Are you willing to attend Bhakti by yourself?” आज मंत्र भीतर ही है, तो जॉब (Job) नहीं होगा। आज जप करने की इच्छा रहे हैं, तो जप कर… “If you are ready, you are on speaks.” आज जप करने की इच्छा नहीं हो रही है, तो मैं नहीं कर रहा। तो क्या है? हम भक्ति करते हैं, पर हम हमारे मन के मान के (मन के) मूल पर भक्ति को लगा दिए हैं। मन को अच्छा लगा, तो भक्ति करेंगे, तो भगवान को लगेंगे, पर ये डिसीजन (Decision) ठीक नहीं है।
और जब मंदिर में आते हैं, कभी हम भगवान का दर्शन करते हैं, कितना सुंदर है, कितना आकर्षक है! मैं इतना अच्छा लगता है मुझे मंदिर में भगवान का दर्शन करते हैं। कभी-कभी किचन में आते हैं, मुझे लगता है, ना मधुरता में सुख होती है। और कभी-कभी आते हैं मंदिर में दर्शन कर रहे हैं, वो मुझे देखते हैं, कब जाऊँ बाहर, बहुत होता है। क्या होता है? हमारा मन ऊपर-नीचे होते रहता है। जब ऐसे होता है, तो हमें क्या देखना है कि ये भक्ति एक भावना है, तो कभी भक्ति की भावना मुझ में आएगी, कभी नहीं आएगी। पर भक्ति केवल एक भावना नहीं है। भक्ति, डिवोशन इज़ नॉट जस्ट एन इमोशन, डिवोशन इज़ ऑल्सो ए कल्टीवेशन (Devotion is not just an emotion, devotion is also a cultivation)।
कल्टीवेशन मतलब, जिसे लोग वो समय बताते हैं कि अनुकूलस्य कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा। कि हम, भगवान कृष्णा के प्रति आकर्षण, उसका अनुपालन कर सकते हैं। तो भले ही मैं मंदिर में आऊंगा तो भक्ति करने की इच्छा हो या ना हो, आकर्षण हो ना हो, फिर भी मैं एक नियमबद्धता से आऊंगा। और इसलिए, नियमबद्धता के कारण हम क्या करते हैं? बच्चा जन्म होता है, तो माँ जब बच्चे को देखती है, तो इसको मैं प्रेरणा में मेरे जीवन में ट्रिगर (Trigger) में देखा था, अभी वो रो रहा है, अभी मेरा दूध पी रहा है। अभी बच्चे को देखती है, तो माँ को इतना स्नेह लगता है अभी बच्चे को देखती है। तो वो क्या है? वो स्नेह की भावना है।
माँ दिन भर बड़ा काम, मेहनत करके सोई होगी और रात को अचानक बच्चा रोने लगता है। जब बच्चा रोने लगता है, तभी वो माँ के हृदय में हर बार स्नेह उभरेगा, ऐसे नहीं है। “सोना है, क्यों रोएगा?” ऐसे। पर फिर भी क्या है? वो तभी स्नेह की भावना भले ही नहीं होगी, पर क्या है? वहाँ पर जो स्नेह है, प्रेजेंस (Presence) के कारण, वो एक कमिटमेंट (Commitment) होगी। तो उसी तरह से क्या है? भक्ति भी हमें कमिटमेंट के रूप में होगी कि मुझे लगा नहीं तो भी मैं करने वाला। तो क्या है? यह मेरा भगवान से संबंध होता है। तो हम जो संबंध होते हैं, अगर कोई गंभीर संबंध है हमारा, तो हम वो संबंध को हमारे मन पर निर्भर नहीं करते हैं। माँ तो रात को उठने की इच्छा नहीं है, पर फिर भी मेरे बच्चे को देखभाल करने के लिए उठ जाएगी। तो हम जो संबंध को करने के लिए, अगर कोई गंभीर संबंध नहीं करते हैं, तो हमारे कमिटमेंट के लिए उठ जाएगी। हमारे कमिटमेंट है, हमारे दृढ़ संकल्प के लिए उठ जाएगी क्या है। मुझे करने की इच्छा नहीं है, फिर भी अगर मैं करता हूँ, तो मेरा दृढ़ संकल्प है। तो उसके लिए भगवान कह रहे हैं कि अगर हम भक्ति एक कल्टीवेशन के रूप में करते हैं, मतलब क्या? कि मैं भगवान का दर्शन करता हूँ, भगवान का जप करता हूँ, भगवान की सेवा करता हूँ, इससे क्या होगा कि हमारा मन की दिशा परिवर्तन हो जाएगी।
विषयो विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः। वर्जवर्जयोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।।
मन एक दिशा में जाना चाहता है, पर नहीं, उसको रोक देंगे, इस दिशा में जाना चाहता है, भगवान के विषय में जाना जाना चाहता है। इससे क्या होगा धीरे-धीरे? प्रसादमधिगच्छति। हमको भगवान की प्रसाद हो जाएगी। अगर बड़ी विपत्ति आ जाते हैं, उसमें:
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः।
अगर कोई भगवान मधुसूदन स्मरण करता है, तो क्या होता है? विपत्तः तस्य संपत्तः। वो जो विपत्ति है, संपत्ति बन जाते हैं। यह भगवान ही विपत्ति का चमत्कार है। जो चीज़ें हमें अभी लगता है कि यह बुरी आदत है, यह बुरी घटना है, यह बुरा हुआ है, अगर उसके कारण हम भगवान का आश्रय ग्रहण कर लेते हैं, तो वहाँ जो बुरी चीज़ है, वहाँ बड़ा अच्छा फल देगी हमारी चीज़। कि अगर कोई भी चीज़ हमें भगवान के करीब लाते हैं, भगवान का आश्रय ग्रहण करते हैं, तो वो परम मंगल है। और इस तरह से हम भगवान का आश्रय ग्रहण करते हैं, जो भी परिस्थिति से जा रहे हैं, उसको हम मंगल के लिए बन सकते हैं।
सारांश और निष्कर्ष
तो सारांश यही है, जो चर्चा थी, किस तरह से हम हमारे दृढ़ संकल्प को बढ़ा सकते हैं। समझना है कि हम बंदी हो रहे हैं। एक बार शराब पी लेता है, दो बार शराब पी लेता है, तो क्या होता है? मन में बार-बार विचार आता है। हॉस्टल से कॉलेज आ रहा है, पीना है, नहीं पीना है, पीना है, नहीं पीना है। तो विचार द्वंद्व है, एक रस्सी है जो खींच रही है, “आओ इधर, पियो।” फिर मैंने वो शराब को उधार लिया, रात को निकला, ठंडी में गया, एक दुकान, दूसरा दुकान और वो फिसल गया, गिर गया। नहीं, नहीं, नहीं, नहीं… और वो तलवार क्या है? वो भगवान का स्मरण है और भगवान का स्मरण हमें कैसे हमारी बुरी आदतों से, बुरी आसक्तियों से मुक्त कर सकता है?
उसके लिए मैं दूसरा उदाहरण दिया हूँ, क्या है? एक फर्श का, अगर फर्श झुकी हुई है, तो पानी इधर जाएगा। पानी इधर जाना है, क्या करना है? तीन चीजें, पहले एक दीवार बांध – रिस्ट्रिक्शन, तो मतलब जो भी हमारी कमजोरियाँ हैं, जिसमें हम फंस जाते हैं, उस चीज़ में और हमें कुछ व्यक्ति बनाना है, तुम्हें कहीं। हाँ, जब वो इच्छा अचानक कुछ समय के लिए बढ़ जाती है, तभी हम उस कार्य में फंसते नहीं हैं, रुक जाते हैं क्योंकि वो सुविधा नहीं है, तुम्हें बुद्धि वापस आ जाती है, तो हम शांत हो जाते हैं, रिस्ट्रिक्शन तरह।
दूसरा है, रीडायरेक्शन, पानी इधर जा रहा है, मैं उसको उधर ढकेल लेता हूँ, मतलब क्या? कि हमारा मन बुरी चीज़ों की ओर जाता है, तो हम साधना के रूप मन को भगवान की ओर ले आते हैं। तो इसमें मैंने उदाहरण लिया माँ और बच्चे का, जैसे बच्चा… पर जब डॉक्टर, जो गुरु के समान हैं, वो दवाई देते हैं, जो है हरि नाम। तो बच्चा बोलता है, “नहीं चाहिए मुझे।” पर माँ बोलती है, तो उससे डर से… हमारा मन बोला कि भगवान का स्मरण नहीं करना है, भक्ति नहीं करना है, पर फिर भी हम एक नियमित रूप से, बुद्धि के स्तर पर वो कार्य करते हैं। वो कैसे है? पानी को उधर ढकेलने के समान हैं।
और तीसरा जो है, इस तरह से अगर हम करते रहेंगे, तो क्या होगा? क्या होगा? रिकंस्ट्रक्शन, मतलब जो अंदर का फर्श है, वो अभी ऐसा झुका हुआ है, वो ऐसा हो जाए। वो क्या, मतलब क्या? स्वाभाविक रूप से भगवान के प्रति आसक्ति जागृत हो जाएगी, तो हम लेगा कि भक्ति, ये केवल एक भावना नहीं है, ये केवल इमोशन नहीं है, ये एक कल्टीवेशन भी है। ऐसे भावना कभी आती है, कभी नहीं आती है, ऐसे नहीं है, भक्ति भावना को हम जागृत भी कर सकते हैं और वो कैसे करते हैं? बार-बार हम, जो भगवान की भक्ति की विधान हैं, वो करते रहते हैं, भले मुझे लगे, अच्छा लगे या ना लगे, फिर भी हम करते हैं।
हमारे जो भगवान का संबंध है, वो हमारे भावनाओं पर हम निर्भर नहीं करते हैं। जैसे माँ कभी रात को जब जागती है, तो उसको इच्छा नहीं होती कि जाग के भले बच्चे को संभाल करते हैं, पर फिर भी वो एक जिम्मेदारी है, कमिटमेंट है, वो करते हैं। उस तरह से जब हम भक्ति करते हैं, कमिटमेंट के रूप में, तो क्या होता है? हमारा शुद्धिकरण हो जाता है और फिर स्वाभाविक करते हैं, भगवान के लिए आकृष्ट हो जाते हैं और फिर अंदर से हमें प्रसाद मिल जाती है, शुद्धि मिल जाती है, आनंद प्राप्ति मिल जाती है और जो बुरी आदतें हमसे छूट जाते हैं। तो क्या है? जो बुरी आदतों से आनंद मिल जाता है, उससे से अच्छा आनंद हमें भगवान से मिल जाता है।
और इसका उदाहरण मैंने दिया कि जो विद्यार्थी था, अमेरिका में, वो जब उसका रिश्ते में, उसका रिश्ता टूट गया, तो पहले तो आत्महत्या करने की सोचा था, तो कि पैसे एक चित्र देखे थे, मूवीज़ देखे थे, तो क्या हो गया था? उसका मन उस विचार में चला गया। पहले जब उसने कुछ सत्संग सुना, तो क्या हो गया? नहीं, ये नहीं करना हूँ, उसका दीवार हो गया और फिर वो भक्ति करने लग गया, तो उसकी वृद्धि के लिए लग गया। और बाद में वापस से जब रिश्ता टूट गया, तो क्या हो गया? तो उसने भगवान का आश्रय नहीं किया और जो बहुत दुखदायक समय था, वो भगवान का कीर्तन में लीन होने से बड़ा सुखदायक बन गया।
तो क्या हो गया यहाँ पे? जो मन का प्रवाह जो है, तो बदल गया है, रिकंस्ट्रक्शन हो गया है। दुःख आ गया, तो मन जो आत्महत्या के जाने के लिए हो गया है, भगवान के लिए चढ़ गया है। यह भक्ति का चमत्कार है कि भक्ति के द्वारा हम सबका हृदय परिवर्तित हो सकता है और इस भक्ति की शक्ति को हमारे प्रभुपाद जी ने सारे विश्व भर प्रचार करके हम सबको यह मौका दिया है और जितना हम इसको स्वीकार करते हैं हमारे जीवन में, तो उतना हम इस शक्ति को पूरा आजमा सकते हैं और हम उसका परिवर्तन हमारे जीवन में यह बाहरी तौर से देख सकते हैं।
बहुत-बहुत धन्यवाद, हरे कृष्णा!