How can we deal with our need for approval while doing good things – Hindi?
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Lecture Summary
- मानवीय स्वभाव: हम सामाजिक प्राणी हैं, इसलिए अच्छे काम करते समय भी हमें दूसरों के प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है (जैसे सत्संग में अधिक लोगों को देखकर उत्साह मिलना)।
- गलत संगति का प्रभाव (कर्ण का उदाहरण): यदि हम गलत या भौतिकवादी लोगों की सराहना पाना चाहते हैं, तो हमारा पतन होने लगता है। महाभारत के कर्ण इसका एक सटीक उदाहरण हैं। कर्ण स्वभाव से नेक थे, लेकिन दुर्योधन का अप्रूवल पाने की चाह में उन्होंने गलत कार्यों का साथ दिया और बाद में पछताए।
- सही संगति का महत्व: अप्रूवल की चाह बुरी नहीं है, बशर्ते हम सही जगह इसे खोजें। यदि हम सत्संग और अच्छे लोगों (भक्तों) के बीच सराहना खोजते हैं, तो यह हमें और अधिक नेक, दृढ़ और अच्छे चरित्र वाला बनाता है।
Full Transcription
मानवीय ज़रूरत: अप्रूवल की चाह
तो अगर हमें पता है कि हम कोई चीज़ अच्छी कर रहे हैं, फिर भी हमें दूसरों का अप्रूवल चाहिए, दूसरों की सराहना चाहिए। दूसरों ने बोलना चाहिए कि आप अच्छा कर रहे हैं। हाँ, वो जो है, वह एक साधारण मानवीय ज़रूरत है। हम एक सोशल (सामाजिक) जीव हैं, तो इसलिए क्या है, कि हम अकेले ही कुछ चीज़ कर रहे हैं, तो करना बड़ा मुश्किल होता है।
अगर मान लेंगे हम सत्संग में आते हैं और सत्संग में देखते हैं, सिर्फ दो-तीन लोग आए हैं, तो लगता है कि मुझे आना चाहिए था कि नहीं? पर जब हम सत्संग में आते हैं और देखते हैं कि 100-200 लोग आए हैं, तो इसलिए हमें संग में शक्ति मिलती है।
सही संग का चुनाव
पर कौन से संग का अप्रूवल देखना चाहिए? कौन से संग के अप्रूवल की सराहना चाहिए? वो चुनाव हम कर सकते हैं। अगर मुझे भौतिकवादी लोगों का अप्रूवल चाहिए, तो वो बोलेंगे शराब पीओ, नशा करो, ये करो, वो करो। और फिर वो बोलेंगे उनकी सराहना में। तो कई बार क्या होता है, हम ऐसे लोगों का अप्रूवल चाहते हैं जिससे हमारी ग्लानि होने लगती है, हमारा पतन होने लगता है। तो ऐसा नहीं करना है।
महाभारत से कर्ण का उदाहरण
मैं जैसे बता रहा था, मैंने महाभारत पे लेक्चर दिया है, तो कर्ण पे लगभग मैंने 15 लेक्चर दिए हैं। तो उसमें कर्ण एक ऐसा आदर्श उदाहरण है, जो अच्छा व्यक्ति बुरे लोगों की आसक्ति के कारण बुरा बन जाता है। कर्ण काफी नेक होता है, पर क्या होता है, उसको हमेशा दुर्योधन का अप्रूवल चाहिए होता है। दुर्योधन उसको अच्छा माने, दुर्योधन उसको पसंद करे, इसके लिए वो बहुत ऐसी चीज़ें करता है जिससे उसको पछतावा होता है।
जब वो सभा में, कर्ण ही सुझाव देता है कि अभी द्रौपदी को लेके आओ, द्रौपदी का वस्त्रहरण करो। कर्ण सुझाव देता है, पर बाद में जैसे बताया था, कर्ण कृष्ण को बोलता है, भीष्म को बोलता है कि मैंने बहुत बड़ा गलत किया। अभी दुर्योधन को बोलता है, “नहीं मैंने गलत किया।” दुर्योधन तो उल्टा बोलता है, “मैंने बहुत आत्म-निरीक्षण किया, पर मुझे मेरे कार्यों में एक भी गलत कार्य नहीं दिख रहा है।”
कर्ण एक अच्छा प्रभाव रखता था, पर बुरे लोगों के संग के कारण, बुरे लोगों से अप्रूवल प्राप्त करने की इच्छा के कारण, वह बुरा बन जाता है।
भक्तों का संग और निष्कर्ष
तो इसलिए हमें अप्रूवल की तो ज़रूरत है। और अगर हम सत्संग में अप्रूवल चाहते हैं, हम भक्तों के संग में आते हैं और वहाँ पर हम अप्रूवल चाहते हैं, तो क्या होता है? इसके लिए हम और नेक बन जाएँगे और भक्तों के संग में सुदृढ़ हो जाएँगे।
तो इसलिए हम अप्रूवल चाहते हैं। मुझे कहाँ से अप्रूवल मिल जाएगा, यह हम चुन सकते हैं। और वह अगर हम बुद्धिमानी से चुनेंगे, तो उसके द्वारा हमारा जो अच्छा चरित्र है, वह और अच्छा होगा।
प्रभुपाद की जय! गौर भक्त वृंद की जय! निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!