How can we prevent our eyes from seeing lustily – Hindi?
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Lecture Summary
इस व्याख्यान में इस बात पर चर्चा की गई है कि जब मन में अवांछित या कामुक इच्छाएं उत्पन्न होती हैं, तो हमें किस प्रकार की प्रतिक्रिया देनी चाहिए। मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- अवास्तविक अपेक्षाएं न रखें: संसार में प्रलोभन बहुत अधिक हैं, इसलिए यह अपेक्षा न करें कि मन में कभी कोई गलत इच्छा आएगी ही नहीं। मन की स्थिति एक साइन वेव (ऊपर-नीचे होने वाली तरंग) की तरह होती है, जो भक्ति के अभ्यास से धीरे-धीरे स्थिर होती है।
- अतीत या उस क्षण पर अधिक विचार न करें: यदि कोई गलत इच्छा आ भी जाए या कोई क्षण खराब हो जाए, तो उस पर बहुत अधिक चिंतन या कल्पना करके हताश होने की आवश्यकता नहीं है।
- मुख्य बात यह है कि आप उसके पहले और बाद में क्या करते हैं: महत्वपूर्ण यह नहीं है कि प्रलोभन के उन क्षणों में क्या हुआ, बल्कि यह महत्वपूर्ण है कि बाकी के समय में हम भक्ति और अपने कर्मों में कितना ध्यान दे रहे हैं। निरंतर भक्ति करने से धीरे-धीरे हमारी अचेतन मन (सबकॉन्शियस) की वृत्तियाँ भी शुद्ध हो जाती हैं।
Full Transcription
आँखों को कुदृष्टि से कैसे बचाएं?
जब इन्द्रियों के विषय के परिदृश्य और अनचाहे वे भी आकर्षित बजाता है, तो क्या करना चाहिए करें। यहाँ पे दो चीज़े हैं, सबसे पहला है कि मन के विरूप में इच्छा आना यह बहुत बड़ी चीज़ नहीं है। आ जाए, आयेंगे जाएंगे। क्या हम अपने बारे में क्या कर रहे हैं। कैसे है कि हम पूरी तरह से मन को शुद्ध बनाने को समय लग रहे हैं।
पर कैसे है कि एक बार आज चले गई कहीं, हो गया, पर उसके बाद नहीं क्या करना। उसके बाद नहीं, घूर घूर को देखते रहते हैं, नहीं, ये नहीं करना है। तो क्या है, इसके बारे में हमें थुड़ से अन्रियालिस्टिक एक्सपेक्टेशन नहीं रखना है। अन्रियालिस्टिक एक्सपेक्टेशन मतलब क्या है? मतलब ऐसी अपेक्षारी रखना है कि जो बासता में आसानी से संभौल नहीं है। इस दुनिया में इतने प्रलोबन हैं कि हम थोड़े-भोड़ आत्मष्ट हो जाएंगे।
बट क्या है कि एक साइन वेव होता है, वेव होता है जो उपर जाता है, नीचे आता है। जब हम भक्ति करेंगे, तो हमारे इच्छा है उपर जाती है, नीचे आती है, अचानक फ्लैट नहीं हो जाएगी।
बट क्या है कि हम भक्ति करते हैं, जो उपर जाता है, तो बहुत जादा उपर नहीं जाएगा वो, और बहुत समय तक उपर नहीं जाएगा, वो नीचे आजाएगा। तो हाँ, थोड़ी देखेगा कुछ इच्छा हो जाएगी, और उस पर हम बहुत चिंतर नहीं करने वारे, कल्पना नहीं करने वारे, उसमें, बहुती वारी लोग क्या कल्पना करते हैं, गहंते गहंते बताते हैं, आप अष्टिन चुत्र को दून के देखते हैं, तो यह हो रहा है, तो एक चीज़े की हम खुछ से बहुत ज़्यादा, बहुत अपिक्षा रखते हैं रशुद्र की, उससे हम हताश हो जाएगी, ठीक है, वो हो गया, हो गया, अगर चलो, उसके बाद मैं क्या कर रहा हूँ, उसके बाद मैं, मतलब क्या है, कभी इच्छा आ गई उसके पहलै, उसके पहले, देखदा क्या है शर तो जो हुआ सो हो गया, अभी मैं भगवान की भक्ति करूँगा।
तो जो वासना उपर बढ़ जाती है, उस समय क्या हो गया वो इतना महत्वपूर्ण नहीं है, कि उसके पहले और उसके बाद में मैं क्या करूँगा। तो तभी मैं दुर्बता से भगवान का समय शुद्ध कर रहा हूँ, तो फिर बाद में, बीच में, दुरे दुरे सद्ध शुद्ध हो जाऊंगा मैं, और उसके परे चला जाऊंगा। तो ज्यादा चिंता मत करो उसके बारे में, धीरे धीरे वो हो जाएगा।
और महत्वपूर्ण क्या है, कि वो क्षणों में क्या हुआ है महत्वपूर्ण नहीं है, बाकी क्षणों में हम क्या कर रहे हैं, वो महत्वपूर्ण है। अगर क्षणों में ध्यान पूरा भक्ति करेंगे, तो उस क्षण में भी, वो जो सबकॉंशियस चीज पे हो रहा है, वो भी शुद्ध हो जाएगा।