Gajendra Moksha Katha 4 – How age helps us become renounced – and how it doesn’t – Hindi
[Bhagavatam class at ISKCON Belgaum, India]
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Lecture Summary
- गजेंद्र मोक्ष और अज्ञान से मुक्ति: गजेंद्र भगवान से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें इस नश्वर शरीर या संसार में पुन: नहीं जीना है (जिजीविषे नाहं इह…)। यह भौतिक शरीर अज्ञान से आवृत है और इस अज्ञान का नाश केवल काल के प्रवाह से नहीं होता।
- काल का प्रभाव एवं अज्ञान का बने रहना: काल बड़ी-बड़ी इमारतों, साम्राज्यों और शरीरों को नष्ट कर देता है, परंतु हमारी आसक्तियों, अविद्या और अज्ञान का नाश नहीं कर सकता। बिना भक्ति और तत्त्वज्ञान के वृद्धावस्था में भी तृष्णा बनी रहती है (जीर्यतो न जीर्यते तां तृष्णां…)।
- शुद्ध भक्ति की अवधारणा व प्रगति: शुद्ध भक्ति का अर्थ है अन्य सभी भौतिक अभिलाषाओं से मुक्त होकर अनुकूलता से कृष्ण की सेवा करना (अन्याभिलाषिताशून्यं…)। यद्यपि हम अभी उस स्तर पर नहीं हैं, फिर भी किसी भी भौतिक संकट या दुख में भगवान का आश्रय लेना (आर्त भाव) भक्ति की शुरुआत है।
- श्रील प्रभुपाद जी का व्यावहारिक दृष्टिकोण: प्रभुपाद जी अत्यंत दक्ष थे; वे लोगों को उनके वर्तमान स्तर पर स्वीकार करते थे। यदि कोई व्यक्ति अपनी किसी आसक्ति (जैसे मदिरापान) को तुरंत नहीं छोड़ पाता, तो प्रभुपाद जी उसे सिखाते थे कि “उस मदिरा के रस/स्वाद को भी भगवान का ही एक अंश समझकर कृष्ण का स्मरण करो।”
- आत्मा का स्वरूप एवं परमात्मा की अचिंत्य शक्ति: आत्मा अविनाशी और अखंडित है (अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयम्)। सामान्य नियम से इसका विभाजन नहीं होता, परंतु भगवान की अचिंत्य लीला-शक्ति से उनके पार्षद एक ही समय में भिन्न-भिन्न लीलाओं में विविध रूपों में सेवा हेतु प्रकट हो सकते हैं।
Full Transcription
हरे कृष्णा! हरे कृष्णा! हरे कृष्णा! हरे कृष्णा! हरे कृष्णा! हरे कृष्णा! हरे कृष्णा! हरे कृष्णा! हरे कृष्णा! हरे कृष्णा! हरे कृष्णा! हरे कृष्णा! हरे कृष्णा! हरे कृष्णा! हरे कृष्णा! हरे कृष्णा! हरे कृष्णा! हरे कृष्णा! हरे कृष्णा!
आश्रय ग्रहण करना मतलब हमारी चेतना को उनमें लगाना। और भागवतम में संपूर्ण भाव यह है कि किस तरह से भगवान का आश्रय ग्रहण करना है। और कभी भगवान का आश्रय शारीरिक स्तर पर भी संरक्षण में मिलता है, पर प्रधान भाव भागवतम का जो है, वह चेतना जब भगवान में लग जाती है, वह है जो आश्रय राजा परीक्षित को मिलता है। और वह है भागवतम का मूल सिद्धांत।
और कई कहानियों में पूर्व जन्म का उल्लेख आता है, और इस कहानी में बताया गया है कि किस तरह से पूर्व जन्म के आधार पर गजेंद्र को स्मृति हुई:
जाते प्राक्तनजन्मन्यनुशिक्षितम् ॥
इस अध्याय के पहले श्लोक में बताया गया है कि पिछले जन्म में जो सीखा था, उसके लिए स्मृति हुई। तो अभी वहाँ से गजेंद्र प्रार्थना करना शुरू करते हैं। तो उन्होंने जो आज की एक महत्वपूर्ण प्रार्थना है, उसके बारे में चर्चा कर रहे हैं। वे बता रहे हैं कि किस तरह से हमारा भगवान से संबंध है, खास करके ज्ञान के स्तर पर।
क्या है कि कई बार लोगों की… अरे, शारीरिक भगवान! और यह एक तरह से सही समझ है, जिसमें हम जीवात्मा हैं, हमसे बड़े देवता हैं, और सबसे श्रेष्ठ जो हैं, वे भगवान हैं। पर यह पूर्ण समझ नहीं है भगवान की।
God is not just the best of all beings. He is the basis of all being.
भगवान सब जीवों में केवल श्रेष्ठ नहीं हैं, वे सब जीवों के अस्तित्व के आधार हैं!
अभी सब जीवों में श्रेष्ठ भी बोलते हैं, तो अभी ऐसा हो सकता है कि विश्व में एक देश है, उसमें अमेरिका सर्वश्रेष्ठ देश है; या टेनिस में अलग-अलग प्लेयर हैं, उनमें से कोई एक प्लेयर नंबर वन है। तो अभी जैसे विश्व की आर्थिक या राजनीतिक पॉलिसी बदल जाएगी, और शायद चीन वर्ल्ड नंबर वन बन सकता है; टेनिस में कोई और अच्छा खेलने लगेगा, तो वह नंबर वन बन जाएगा।
तो अगर हम समझेंगे कि ऐसे जीवों की एक शृंखला है, उनमें सर्वश्रेष्ठ भगवान हैं, तो फिर ऐसी संकल्पना हो सकती है कि कोई और शक्ति प्राप्त कर लेगा, तो वह भगवान बन जाएगा! तो वैसा नहीं है कि भगवान सब जीवों में सर्वश्रेष्ठ हैं, पर केवल वह इतना ही नहीं है। उनका स्तर… जीवों में जो शक्ति है, सबकी शक्ति भगवान से आती है।
और यही प्रह्लाद महाराज हिरण्यकशिपु को बताते हैं। जब हिरण्यकशिपु सोचता है—”तुम्हारी शक्ति कहाँ से आ रही है?”, तो जो जवाब देते हैं, वह केवल उद्दंडता नहीं है: “मेरी शक्ति वहीं से आ रही है जहाँ से तुम्हारी शक्ति आ रही है, जहाँ से तुम्हारी शक्ति की शक्ति भी आ रही है! तुम्हारी शक्ति कहाँ से आ रही है? ब्रह्मा से आ रही है। उनकी शक्ति भी कहाँ से आ रही है? भगवान से आ रही है।”
तो प्रह्लाद:
Prahlada is trying to change Hiranyakashipu’s conception of Vishnu from a competitor to the basis.
“भगवान आपके प्रतिस्पर्धी नहीं हैं!” वह जो सोचता था कि “मैं तपस्या कर लूँगा, शक्ति प्राप्त कर लूँगा, मैं विष्णु का वध कर दूँगा, फिर मैं सर्वश्रेष्ठ बन जाऊँगा”—यह उसकी संकल्पना है। तो भगवान अब बता रहे हैं कि ऐसा नहीं है, तुम्हारी शक्ति… तुम ब्रह्मा से शक्ति प्राप्त कर लेते हो, ब्रह्मा जी की शक्ति भी विष्णु से आ रही है।
तो ठीक उस उदाहरण से, हम जो समझते हैं, हमें बताया जाए, हमारी सबकी बुद्धि—वह भी भगवान से आ रही है।
तो आत्मप्रदीपाय नमः… अगर हमें बताया जाए आत्मप्रदीपाय। वेदांत सूत्र में आता है कि आत्मा जो है, स्वयं ज्योतिमान होता है। हर आत्मा में चेतना की शक्ति होती ही है। हर आत्मा जो है—सच्चिदानंद है। ‘चित’ मतलब आत्मा में चेतना की शक्ति होगी।
पर चेतना की शक्ति आत्मा के पास है, फिर भी चेतना की शक्ति भगवान पर ही निर्भर है। जो भी हम देखते हैं, जो भी हम जानते हैं, वह भगवान के कारण जानते हैं। जैसे कि हमारी दृष्टि है, हमारी आँखें जब खुली होंगी तो हम देख सकते हैं। पर केवल हमारी आँखें खुली होना यह पर्याप्त नहीं है देखने के लिए। हमारी आँखें खुली होने के साथ-साथ बाहर रोशनी होनी चाहिए।
और जो भी रोशनी आती है, वह अलग-अलग स्रोतों से आ सकती है—कोई लाइट हो सकती है, कोई दिया हो सकता है, सूरज हो सकता है। पर जो भी अलग-अलग प्रकाश स्रोत हैं, वे कहाँ से आ रहे हैं? रोशनी सूरज से आ रही है, और सूरज की रोशनी भी भगवान से आ रही है!
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥
भगवद्गीता के १५वें अध्याय के १२वें श्लोक में भगवान कहते हैं कि सब की जो रोशनी है, वह मुझसे आ रही है।
तो जो भाव है कि सारा अस्तित्व जो है, वह भगवान पर आधारित है।
न तदस्ति बिना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
१०वें अध्याय के ३९वें श्लोक में वहाँ बोलते हैं कि सब चीज़ों का मैं ही बीज हूँ, सारे अस्तित्व का। और उसके साथ-साथ, किसी भी चीज़ का अस्तित्व मेरे बिना नहीं हो सकता।
तो यहाँ भगवान बता रहे हैं, यह श्लोक आता है। अभी गजेंद्र को बुद्धि आ गई है। गजेंद्र को भगवान से कैसे प्रार्थना करनी है, क्या प्रार्थना करनी है—यह बुद्धि कहाँ से आई? यह भगवान से आई। तो आत्मप्रदीपाय—जो आत्मा है, उसके पास जानने की शक्ति है, पर जानने की शक्ति भी भगवान पर निर्भर होती है। इसलिए आत्मा स्वतंत्र रूप से कुछ नहीं जान सकता।
चेतना का विकास: मनुष्य बनाम पशु
कुछ लोग सोचते हैं कि सिर्फ मानवों में आत्मा है, जानवरों में आत्मा नहीं है। तो वे कहते हैं… इसलिए एक पर्दा है। हम सोचते हैं कि जानवर शब्द के साथ… कुछ अध्यात्म के बारे में जान नहीं सकते हैं। अभी वह वास्तव में जो आत्मा का लक्षण है—चेतना। तो अगर चेतना है, तो आत्मा होनी चाहिए।
तो जो क्रिश्चियन लोग हैं—क्रिश्चियनिटी भी बड़ी विशाल है, हिंदू धर्म के लोगों के जैसा ही विशाल था—न केवल अलग-अलग आत्माएँ हैं, पर अलग-अलग प्रकार की आत्माएँ हैं। तो जानवरों में, पेड़ों में और मानवों में कहते हैं तीन प्रकार की अलग-अलग आत्माएँ हैं:
- पौधों में—Vegetative Souls (वानस्पतिक आत्मा) कहते हैं, कि वे केवल वृद्धि करते हैं और कुछ करते नहीं हैं।
- जानवरों में—आत्मा है और वह भावना अनुभव करती है, इसे Sensitive Souls कहते हैं।
- पर वे कहते हैं कि सिर्फ मानवों में ऐसी आत्मा है जो Rational Souls है—ऐसे जो कि बौद्धिक स्तर पर विचार कर सकते हैं।
और वे कहते हैं जिन आत्माओं में The light of reason is there, जो एक बौद्धिक स्तर पर विचारधारा ला सकते हैं, वे भगवान को जान सकते हैं। इसलिए लोग सोचते हैं कि जो मानवी आत्माएँ हैं, वही उनका जीवन विशेष है, वही आत्मा जीवन भगवान को जान सकती हैं। और जानवर हैं या पेड़-पौधे हैं, उनमें वह आत्मा जब सृष्टि होती है, जन्म होता है, मृत्यु हो जाती है तो वह आत्मा का विनाश हो जाता है—ऐसी उनकी परिभाषा है।
तो अभी यह पिछले क्रिश्चियनिटी के आदेश थे, पोप के। तो अभी क्या है, पाश्चात्य देशों में लोग जानवरों से बहुत प्यार करते हैं। लोगों के पालतू जानवर होते हैं—पेट्स (Pets)। तो क्या होता है पाश्चात्य देशों में, लोगों की विचारधारा बदली है। तो इसलिए क्या होता है, कई बार ऐसी स्त्रियाँ होती हैं जो बच्चे नहीं चाहती हैं।
और अभी यूरोप और अमेरिका में जो पापुलेशन ग्रोथ (जनसंख्या वृद्धि) है, वास्तव में कम हो रहा है। उन देशों में लगभग पापुलेशन ग्रोथ जो है—1.5, 1.6, 1.4 परसेंटेज है। मतलब क्या है, दो व्यक्ति लगभग 1.5 व्यक्ति को निर्माण कर रहे हैं। तो इससे क्या होगा, लोगों की संख्या कम हो रही है।
तो कई अमेरिकन और यूरोपियन शहरों में… तो अभी जो स्नेह करने का भाव है, वह सब में है। और खास करके स्त्री शरीर की यह विशेषता है कि वह तो निर्माण करने का भाव है, निर्माण करने का भाव मतलब किसी से स्नेह करके देखभाल करना। वहाँ जो आत्मा स्त्री शरीर में है, उसकी एक स्वाभाविक, प्राकृतिक ज़रूरत है। तो वे बच्चों को पैदा करके उनकी देखभाल नहीं करती हैं, तो क्या करती हैं? पालतू जानवर रख लेती हैं!
और वहाँ पर कई अमेरिकन शहरों में—अब जो ग्रामीण भाग हैं, अमेरिका में भी शहर हैं और ग्रामीण भाग हैं, ग्रामीण भाग में इस विचारधारा इतनी फैली नहीं है, पर शहरों में कई जगहों पर ऐसा हो गया है कि जो पालतू जानवर हैं (कुत्ते और बिल्लियाँ), कुत्ते और बिल्लियों की संख्या मानव बच्चों से ज्यादा है!
तो Children have been replaced by pets! पालतू जानवर—ये उनको बच्चों की जगह पर लोग अपना लेते हैं। और फिर जो स्नेह का एक परिवर्तित रूप आ गया, उसको कहते हैं ‘डोगा’। डोगा मतलब क्या? डॉग (Dog) के साथ जो योगा करते हैं, उसको ‘डोगा’ कहते हैं! तो आप और आपका कुत्ता दोनों साथ बैठकर योगा करो! और यहाँ पर डोगा टीचर्स भी होते हैं। यहाँ तक कि एक्चुअली अमेरिका में… “मेरा कुत्ता बड़ा डिप्रेस्ड हो गया है, उसको थोड़ा काउंसिल करो।” अब कुत्ते को काउंसिल कैसे करते हैं पता नहीं! पर क्या है, जो स्नेह बच्चों को दिखाना है, वह भी जानवर को दिखा रहे हैं।
तो फिर एक ऐसी स्त्री है, जो पालतू जानवर रखती है (क्योंकि उनको अपने पालन-पोषण करने का भाव कहीं न कहीं तो जाग्रत करना है)। तो एक स्त्री ने पोप से पूछा (वह क्रिश्चियन थी)—”मैं स्वर्ग जाऊँगी, तो क्या मेरा कुत्ता मेरे साथ आएगा या नहीं?” क्योंकि क्या है, उनकी संकल्पना है कि आत्मा जो है वह केवल मानव शरीर में ही है। शाश्वत आत्मा जो है वह मानव शरीर में ही है, तो शाश्वत जीवन केवल मानव शरीर वाले को ही मिलेगा।
तो भी क्योंकि लोगों को इतना कुत्ता प्यारा है, तो उसने अपने लोकल विशप से पूछा, तो फिर वह केस एस्केलेट हो गया और वह पोप तक पहुँच गया! और पोप ने कहा कि—”कुत्तों को… क्योंकि वह तुमसे प्यार करता है, तो जो कुत्ते बड़े प्रामाणिक रहकर अपने क्रिश्चियन मालिकों के प्रति रहे हैं, तो वे भी स्वर्ग में चले जाएँगे!”
अब कैसे होगा? अगर उनकी आत्मा ऐसी है कि जो नष्ट होने वाली है, तो क्या स्वर्ग में जाएगा? तो सिद्धांत के स्तर पर कुछ तय नहीं हुआ।
यह मैं क्यों प्रसंग बता रहा हूँ? क्रिश्चियनिटी की निंदा नहीं करनी है यहाँ पर। उद्देश्य यह है कि जो विचारधारा है कि “आत्मा केवल मानवों में है”, यह कई लोगों को लॉजिकल क्वैगमैन (Logical quagmire – तार्किक दलदल) में फँसा देती है। मतलब तर्क के स्तर पर उसको ठीक रख नहीं सकते, फँस जाते हैं लोग इस तरह में।
तो यह क्या है? वास्तव में ऐसा नहीं है कि जानवरों में आत्मा नहीं है, जानवरों में भी आत्मा है।
The difference between human bodies and animal bodies is not of nature, but of degree.
ऐसा नहीं है कि मानव में एक प्रकार की आत्मा है और जानवरों में दूसरे प्रकार की आत्मा है। एक ही प्रकार की आत्मा सब में है, पर वह जो आत्मा की चेतना किस हद तक विकसित हुई है, वह अलग है।
तो भगवद्गीता के १८वें अध्याय में भगवान बताते हैं २०वें श्लोक में:
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमिक्षते ।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥
वे बताते हैं कि जो सत्वगुण में व्यक्ति होता है, सत्वगुण में ज्ञान की क्या परिभाषा है? वह सब जीवों को देखता है, पर केवल जीवों के शरीरों को नहीं देखता है। सर्वभूतेषु येनैकम्—सब भूतों में, सब जीवों में एक चीज़ देखता है। क्या एक चीज़ देखता है? भावमव्ययमिक्षते—शरीर नश्वर है, पर शरीर के परे कुछ एक अव्यय भाव है, कुछ आध्यात्मिक तत्त्व है, जो समान है।
अविभक्तं विभक्तेषु—शरीर के रूप में बहुत से अलग-अलग विभाजन हैं—”मैं पुरुष हूँ, यह स्त्री है; मैं भारतीय हूँ, यह पाकिस्तानी है; मैं सफ़ेद हूँ, यह काला है; मैं छोटा हूँ, यह ऊँचा है”—ऐसे अलग-अलग भेद हो सकते हैं। “मैं मानव हूँ, यह जानवर है”—इतने भेद हो सकते हैं, पर अविभक्तं विभक्तेषु—यह सब भेदों के परे जो समान देखता है, वे कहते हैं: तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्—वह जो ज्ञान है, वह सात्त्विक ज्ञान है।
तो अभी जानवरों में और मानवों में फर्क क्या है? एक ही प्रकार की आत्मा है, पर वह आत्मा की चेतना का अलग-अलग प्रमाण से विकास हुआ है। तो मानव और जानवरों में आत्मा के स्वभाव में फर्क नहीं है, आत्मा के प्रकार में फर्क नहीं है, आत्मा की चेतना के विकास में फर्क है!
तो जो आत्मा की चेतना कम विकसित होती है, तो फिर वहाँ साधारणतया आध्यात्मिक चीज़ों के बारे में विचार नहीं कर सकते हैं। मानव शरीर का यह सुविधा है कि वह आध्यात्मिक तत्त्व का चिंतन कर सकता है।
भागवतम के ११वें स्कंध में वर्णन आता है कि भगवान ने जब संपूर्ण सृष्टि पूरी कर ली, उसके बाद में जब उन्होंने मानव की सृष्टि की, तब वे संतुष्ट हुए। क्योंकि मानव जो है, सृष्टि के उद्देश्य को पूर्ण कर सकता है। बाकी सारे जो जीव हैं, वे जीते हैं, वे संघर्ष करते हैं और उनकी फिर मृत्यु हो जाती है।
जो एक ज्ञानी थे डार्विन, उसने सिद्धांत प्रतिपादित किया कि Survival of the fittest—कि जो सबसे तंदुरुस्त हैं, वही जीएँगे। तो प्रभुपाद जी ने इसका खंडन किया था कि Even the fittest do not survive! कितना भी तंदुरुस्त कोई हो, अमर नहीं रहता, सबकी मृत्यु होती है। एक तुलनात्मक रूप से जो अधिक तंदुरुस्त हैं, वे ज्यादा समय तक जीएँगे, पर अंत में सबकी मृत्यु होती है।
तो जो जानवर शरीरों में हैं, वह आत्मा जीता है, संघर्ष करता है और फिर मृत्यु हो जाती है। मानव जीवन में भी ऐसा ही होता है, पर मानव जीवन में इस संघर्ष का उद्देश्य क्या है, यह साधारणतया व्यक्ति समझ सकता है अगर चाहे तो।
इसलिए शास्त्रों में बताया गया है: अथातो ब्रह्म जिज्ञासा। अभी मानव जीवन आपको मिल गया है, तो ब्रह्म जिज्ञासा—अध्यात्म का विचार करो! भौतिक चीज़ों के विचार में मत फँसो। बहुत ज़रूरत करना पड़ेगा, पर उसमें फँसना नहीं है, उसको जीवन का उद्देश्य नहीं बनाना है।
भक्तिविनोद ठाकुर, जो हमारे कृष्णभावनामृत आंदोलन के प्रधान आचार्य हैं, वे कहते हैं कि कौन-सा धर्म भौतिकवादी है और कौन-सा धर्म आध्यात्मिक है? सर्व-धर्म कहते हैं कि भगवान हैं, सर्व-धर्म कहते हैं कि भगवान के धाम में जाके हमको जीना है—यह सब अच्छा है। पर व्यावहारिक रूप पर जब तक लोग सोचते हैं कि यही जीवन सर्वस्व है, तो उनकी विचारधारा कुछ भी हो, उनका तत्त्वज्ञान कुछ भी हो, वे प्रैक्टिकली मटीरियलिस्ट्स (Practically materialists – व्यावहारिक रूप से भौतिकवादी) हैं!
जब तक हम सोचते हैं कि यही जीवन सब कुछ है, तब तक हम भौतिकवादी हैं। भले ही हम बोलें कि “मैं आत्मा में विश्वास करता हूँ, भगवान में विश्वास करता हूँ, मुझे स्वर्ग में जाना है”, पर अगर हम सोच रहे हैं… हमारी सारी विचारधारा, हमारे सारे कैलकुलेशंस (calculations), हमारे सारे तर्क-वितर्क, जो हम निर्णय करते हैं—”मुझे यह करना है, यह नहीं करना है”—अगर हम इस विचार से कर रहे हैं कि “इस जीवन में मुझे क्या फायदा होने वाला है?”, तो अगर इस जीवन के फायदे और नुकसान से ही हम सब कुछ विचार कर रहे हैं, तो हम व्यावहारिक स्तर पर भौतिकवादी हैं, भले हम अध्यात्म के बारे में कितना भी बातचीत करें!
तो इसलिए यहाँ तो बताया गया है कि अभी जो मानव जीवन में हम समझ सकते हैं कि अध्यात्म का उद्देश्य क्या है, शाश्वत कैसे प्राप्त करना है। तो यह ज्ञान मानव जीवन में कहाँ से आता है? एक तरह से आत्मा में यह हमेशा क्षमता होती है, पर यह क्षमता भगवान की कृपा से होती है, यह हमें बताया गया है:
नमोऽत्मप्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने ।
तो जो भगवान आत्मा को देखने की, समझने की बुद्धि देते हैं, वह भगवान क्या हैं? साक्षिणे—वे सब जीवों के हृदय में हैं साक्षी के रूप में, और वे देखते हैं हमारी इच्छा क्या है। अगर हमारी इच्छा है भगवान की भक्ति करने की…
गिरां विदूरायामनसश्चेतसामपि…
तो भी जो भगवान हैं, वे हमें ज्ञान देते हैं, पर वे हमारे ज्ञान के परे हैं। God is the giver of our knowledge, but He is beyond our knowledge. उनसे हम वह ज्ञान प्राप्त करते हैं, पर फिर भी वे हमारे ज्ञान के परे हैं। गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि—हमारी चेतना जो है… गिरां विदूराय मतलब कभी हम वाणी से समझने का प्रयास करते हैं, मन के स्मरण से समझने का प्रयास करते हैं, बुद्धि के स्तर पर विचार करके समझने का प्रयास करते हैं, तो इन सब से हम भगवान को (पूर्ण रूप से) नहीं समझ सकते।
अभी भगवान को नहीं समझ सकते, इसका मतलब यह नहीं है कि भगवान को बिल्कुल नहीं समझ सकते! भगवान को नहीं समझ सकते मतलब एक हद तक जितनी हमारी क्षमता है, उससे भगवान को समझने का प्रयास करते हैं, पर उसके परे भगवान बहुत बड़े हैं। भगवान को कभी हम किसी संकीर्ण ढाँचे में उनको फँसा नहीं सकते कि “अब मैंने भगवान को समझ लिया!” नहीं, ऐसा नहीं होगा।
प्रभुपाद जी कहते हैं कि हम उतना भगवान को समझ सकते हैं जिससे कि हम उनके प्रति भक्ति कर सकें, जिससे कि स्मरण हम कर सकते हैं। पर हम पूर्णतया आप्त नहीं कह सकते।
भगवान को कैसे हम… यह १०वें अध्याय के—भगवद्गीता के १०वें अध्याय के ‘चतुःश्लोकी भगवद्गीता’ में सुंदर रूप से बताया गया है:
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥
भगवान कहते हैं कि जो समझता है… “मुझे क्या-क्या किस धाम में… अहं सर्वस्य प्रभवो कि सब चीज़ें मुझसे आ रही हैं—मैं, आप, दुनिया, सब कुछ भगवान से आ रहा है। मत्तः सर्वं प्रवर्तते—और ऐसा नहीं कि सिर्फ मुझसे आ रही हैं और अभी मेरा कुछ काम नहीं है, अब मैं भी उनको अभी भी संभाल रहा हूँ!” जो ऐसा समझता है—इति मत्वा भजन्ते मां—वह मेरा भजन करने लगता है, वह मेरा भक्त बन जाता है, भावसमन्विताः—पूरे हृदय के साथ। क्योंकि वह क्या बन गया है? बुधा—बुधा मतलब बुद्धिमान बन गया है! जो समझता है कि “मैं सब चीज़ों का स्रोत हूँ”—इसलिए मैं ही (मतलब भगवान ही) सब चीज़ों के स्रोत होते हैं, इसलिए भगवान ही हमारे स्नेह, हमारे प्रेम, हमारी भक्ति के सर्वोच्च पात्र व्यक्ति हैं। यह समझ के जब हम भक्ति करने लगते हैं, तो फिर क्या है? वह व्यक्ति ‘बुधा’ है।
भक्ति बहुत लोग करते हैं, हर धर्म में अलग-अलग लोग अलग-अलग पद्धति से भक्ति करते हैं, पर कई लोग भावुक स्तर पर भक्ति करते हैं—”मैंने प्रार्थना की थी और प्रार्थना पूरी हो गई।” कभी वे कृष्ण मंदिर में आएँगे, कभी किसी बाबा के मंदिर में चले जाएँगे, कहीं और चले जाएँगे। वे सोचते हैं कोई न कोई है जो अगर मेरी ज़रूरतें पूरी कर लेगा, तो मैं जाता हूँ उसकी पूजा करता हूँ। तो क्या है, ऐसे भाव से वह भक्ति करता है, तो वह भावुक है।
पर तत्त्वज्ञान के स्तर पर ‘बुधा’ बनता है, मतलब वह समझता है कि भगवान जो हैं, वे सब चीज़ों के स्रोत हैं। तो वह बुद्धिमान है, वह ज्ञानवान हो गया है।
पर फिर भी अगले श्लोक में क्या बताते हैं?
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥
वे कहते हैं कि मेरे भक्त मेरी भक्ति किस तरह से करते हैं? मच्चित्ता—उनकी चेतना मुझमें लग जाती है। मद्गतप्राणाः—बहुत सुंदर कहते हैं। ऐसा नहीं कहते हैं वे कि “वे मेरे बारे में विचार करते हैं।” The thoughts of my pure devotees dwell in me. मतलब जो महान भक्त हैं, उनके मनों का… उनका जो मन है, उनके जो विचार हैं, उनके विचारों के लिए मैं एक ‘घर’ बन गया हूँ, उनके विचार मुझमें रहते हैं!
तो हम बहुत डिस्परसिव (dispersive) विचार करते हैं, पर वे विचार करते हैं, वापस कुछ और विचार करने लगते हैं। पर हम कहीं भी जाएँ, जहाँ से हम घर में आ जाते हैं वापस। तो वैसे भक्त जो होते हैं, वे बहुत-सी चीज़ों का विचार करके… केवल यह अकेले करने का कार्य नहीं है, संग में करने का है, इसलिए: बोधयन्तः परस्परम्—वे एक-दूसरे से आदान-प्रदान करते हैं और इसमें बड़ा आनंद लेते हैं! कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च—और इस तरह से एक-दूसरे से मेरी महिमा के बारे में चर्चा करके रमण करते हैं, बड़ा आनंद लेते हैं!
पर इसमें हमारे… हम यह जो पॉइंट देख रहे हैं यहाँ पर, कैसे हम हमारी बुद्धि से भगवान को (पूर्ण) समझ नहीं सकते। तो यहाँ पर उसके उल्लेख में क्या है? पहले भगवान ने बता दिया कि वे ‘बुधा’ हो गए हैं पिछले श्लोक में, पर अभी इस श्लोक में बता रहे हैं—बोधयन्तः परस्परम्। तो अगर वे पहले से उनको बोध हो गया है, तो अभी और बोध करने की ज़रूरत क्या है? पहले ही ‘बुधा’ हो गए हैं वे, तो अभी बोधयन्तः कैसे हो सकता है? पहले से अगर उनको ज्ञान है कि भगवान की महिमा क्या है, तो फिर एक-दूसरे से बातचीत करके और फिर वह कैसे और उनका ज्ञान कैसे बढ़ रहा है?
क्योंकि क्या है, भगवान के ज्ञान की महिमा जो है, वह असीमित है! कि जो पहले से ही ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं, वे… चूँकि भगवान असीमित हैं, “मैं इस तरफ से भगवान को देख रहा हूँ, तो मेरी सीमित दृष्टि से मैं भगवान की महिमा एक नहीं समझ सकता हूँ। कोई व्यक्ति इधर से देखता है, कोई व्यक्ति उधर से देखता है।” वे देखते हैं भगवान की महिमा ऐसी है, व्यक्ति इधर से देखता है भगवान की महिमा ऐसी है। तो इस तरह से जो है, हम भगवान के बारे में ज्ञान हमेशा प्राप्त कर सकते हैं।
इसलिए क्या है कि भगवान को पूर्णतया हम कभी समझ नहीं सकते। भगवान… जो भक्त अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करता है, इसलिए नहीं करता है कि भगवान को अपनी बुद्धि से जीत ले, इसलिए इस्तेमाल करता है कि अपनी बुद्धि से भगवान की सेवा कर सके! तो अपनी बुद्धि से जितनी क्षमता है, उतने हम समझते हैं।
गजेन्द्र का प्रसंग और पूर्व संस्कार
तो अभी इस कहानी में विशेषता क्या है कि गजेंद्र जो है, वह एक जानवर के शरीर में है। और जब कोई जानवर के शरीर में है, तो फिर उसको भला कैसे इतना सूक्ष्म तत्त्वज्ञान याद आ गया? कैसे ऐसे-ऐसे संस्कृत के श्लोकों में प्रार्थना करने लगा?
साधारणतया यह संभव नहीं है, जैसे मैं पहले बता रहा था कि जो आत्मा है, वह जानवर शरीर में आध्यात्मिक जाँच नहीं कर सकती है, आध्यात्मिक जिज्ञासा नहीं कर सकती है। तो फिर यहाँ पर गजेंद्र जानवर के शरीर में आध्यात्मिक जिज्ञासा कैसे कर रहा है?
तो यह है भक्ति की महिमा! कि भक्ति की शुरुआत जानवर शरीर में नहीं कर सकती है, पर भक्ति अगर पहले मानव शरीर में शुरू कर दी है, तो वह जानवर शरीर में बाद में भी बरकरार रखी जा सकती है!
तो जो भगवान कहते हैं:
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥
यह दूसरे अध्याय के ४०वें श्लोक में बता रहे हैं कि इस जो भक्ति की संपत्ति जो हम प्राप्त करते हैं, उसका कभी ह्रास नहीं होता है, उसका कभी विनाश नहीं होता है, कभी उसको खोते नहीं हैं।
उसका मतलब क्या है कि अगर हमारी चेतना भगवान की ओर आकर्षित हो गई है, तो फिर वह जो भगवान के प्रति आकर्षण है, वह हमेशा रहता है, वह कभी जाता नहीं है हमेशा। और भले ही किसी कर्म से व्यक्ति जानवर शरीर में चला जाए, तो भी वह आध्यात्मिक आकर्षण जो है वह रहता है।
अभी भगवद्गीता में जो व्यक्ति भक्ति करता है, उसकी क्या गति होती है? अगर आध्यात्मिक प्रगति करता है, पूर्णता नहीं प्राप्त होती है, उसकी क्या गति होती है? उसके बारे में दो पर्याय बताए हैं। एक बताया है जो अर्जुन पूछते हैं कि:
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चचलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥
वे पूछते हैं कि क्या गति प्राप्त होती है वह जो योग में पूर्णता नहीं प्राप्त करते?
सबसे पहले भगवान जवाब में आश्वासन देते हैं:
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥
वे कहते हैं—”हे पार्थ! तुम आश्वस्त रहो कि अगर कोई कल्याणकारी कार्य करता है, कोई आध्यात्मिक दिशा में प्रगति करने का प्रयास करता है, उसका कभी विनाश नहीं होगा!” यह ४०वें श्लोक में भगवान बोलते हैं।
फिर ४१वें और ४२वें श्लोक में दो पर्याय बताते हैं:
- अगर किसी ने थोड़ी-सी भक्ति की है और फिर वह पूरा नहीं किया है भक्ति में, पर बहुत-सी भौतिक इच्छाएँ हैं, वह उनको पूरा करना है—तो भौतिक इच्छाएँ पूरा करने के लिए उसको स्वर्ग में जाने का मौका मिलेगा। और स्वर्ग में जाकर वे इच्छाएँ पूरी करने के बाद फिर वह पुनः मानुष शरीर में जन्म लेगा: शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते—वह किसी सुशील परिवार में जन्म लेगा या धनी परिवार में जन्म लेगा। दोनों क्या हैं? अच्छी संस्कृति या अच्छी संपत्ति—ये दोनों क्या हैं? एक सुविधा है जिससे कि अगले जन्म में वापस भक्ति कर सके।
- और किसी ने बहुत प्रगति कर ली है, तो क्या होगा? अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् । एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥—फिर नहीं तो फिर बहुत प्रगति कर ली है, तो सीधा भक्त के घर में जन्म लेगा, जो ‘धीमताम्’ हैं।
पर किसी कारण से आध्यात्मिक प्रगति रुक गई है… वह हर एक व्यक्ति को खुद जाँच करना है। पर जो इस तरह से धीमान बन गए हैं, उनके घर में जन्म लेता है, तो क्या? बचपन से ही भक्ति के संस्कार मिल जाते हैं।
अगर कोई व्यक्ति भक्ति करता है पर भक्ति किसी कारण से पूरी नहीं करता है और आधी छोड़ देता है, तो व्यक्ति को संस्कार मिल जाता है।
और अधिकांश क्षत्रिय जो थे उस समय, वे पुण्य का जीवन जी रहे थे। और भगवान अर्जुन को बता रहे हैं कि आप पुण्य के जीवन में मत जियो, आप भक्ति के जीवन में जाओ। पुण्य के जीवन में क्या है—मतलब हम पुण्य अर्जित करते हैं और अगले जन्म में हमको अच्छे भौतिक फल प्राप्त होते हैं। भक्ति मतलब हम भगवान की सेवा करते हैं और भगवद्धाम जाने का प्रयास करते हैं।
तो भगवान यह दो संभावनाएँ बता रहे हैं कि आप या तो स्वर्ग में जाओगे या एक भक्त के घर में जन्म लोगे। तो वे कब बता रहे हैं? अगर व्यक्ति पुण्यवान जीवन जी रहा था और फिर वह अगर भक्ति करने लगता है, पर वह भक्ति पूरी नहीं करता है और फिर पुनः एक पुण्यवान जीवन जीने लगता है, तो फिर उसको यह प्राप्त होगा।
पर अगर व्यक्ति पहले पुण्यवान जीवन नहीं जी रहा था, पहले वह एक पापपूर्ण जीवन जी रहा था, बहुत भौतिक आसक्ति, बहुत भौतिक प्रलोभन के पीछे भागने लगा था… जैसे देवता हैं और असुर हैं, दोनों इंद्रिय-तृप्ति चाहते हैं। देवताओं के पास भी अप्सराएँ हैं, ऐश्वर्य है, वे भी इंद्रिय-तृप्ति चाहते हैं। पर फर्क क्या है? देवता धर्म के अनुसार इंद्रिय-तृप्ति चाहते हैं, असुर धर्म का उल्लंघन करके इंद्रिय-तृप्ति चाहते हैं।
तो अगर कोई ऐसा व्यक्ति होता है जो भक्ति छोड़कर पापमय कार्यों में लग जाता है, तो फिर भौतिक स्तर पर उसको उस पापमय कार्यों का फल मिलेगा और कभी-कभी व्यक्ति एक जानवर के शरीर में जा सकता है! कोई भक्त अगर मान लीजिए आत्महत्या कर लेता है, तो कोई भक्त भी भूत बन सकता है! वह क्या है? वह एक भौतिक स्तर पर भौतिक कार्य की भौतिक प्रतिक्रिया हो गई।
एक भक्त एक बार एक यात्रा को लीड कर रहे थे, तो वहाँ पर एक माता जी थीं। अचानक वह अलग कुछ बोलने लग गईं, वह स्त्री लगभग पुरुष की आवाज़ में बोलने लग गई! तो भक्त उनको मदद कर रहे थे, समझे कि उनको भूतों का कुछ साया है। तो फिर वह जब कर रहे थे, कीर्तन कर रहे थे, उसमें अलग नृसिंह मंत्र वगैरह बोले, तो फिर वह अचानक क्या हो गया, वह पुरुष की आवाज़ में बोलने लगा कि—”यह सब करने की कुछ ज़रूरत नहीं है।” वे सब वास्तव में मायापुर यात्रा जा रहे थे। तो वह बोला कि—”जब तुम लोग मायापुर पहुँच जाओगे, मुझे भी मायापुर जाना है!”
तो आध्यात्मिक स्तर पर उनको एक जानवर का शरीर मिल गया—गजेंद्र बन गया। पर जो आध्यात्मिक स्तर पर भगवान से आकर्षण था, वह अभी तक बचा रहा! और क्योंकि उस शरीर में थे, तो अभी ऐसा नहीं है क्योंकि कोई व्यक्ति पिछले जन्म में महान भक्त क्यों न हो, ऐसा नहीं है कि अगले जन्म में जन्म से ही स्वाभाविक रूप से अपने आप पहले से भक्ति जाग्रत हो जाएगी। जब भक्ति की प्रवृत्ति होती है, पर ऐसा नहीं है कि जो महान भक्त पिछले जन्म में था, जब जन्म होगा तो उसके हाथ में माला पहले से होगी! ऐसा नहीं होता है।
तो जब जन्म होगा, तो जो शरीर है, उस शरीर की प्रवृत्ति के अनुसार व्यक्ति कार्य करता है। तो छोटा बच्चा होगा तो रोएगा, उसको माँ का दूध चाहिए। छोटा बच्चा अपने-अपनी प्रवृत्ति के अनुसार होगा, पर धीरे-धीरे जैसे अध्यात्म की ओर उसको एक्सपोज़र (exposure) कराया जाता है, जब अध्यात्म से संपर्क कराया जाता है, तो फिर एक स्वाभाविक आकर्षण दिखाते हैं वे, और फिर अध्यात्म को बहुत आसानी से पकड़ सकते हैं!
मतलब शारीरिक स्तर पर जो प्रक्रिया स्वाभाविक होती रहती है, पर अध्यात्म मतलब कुछ और होगा कि जो सामान्य लोगों में आकर्षण नहीं है, उससे आकर्षण होगा उस व्यक्ति में!
तो वैसे ही गजेंद्र को जानवर का शरीर मिल गया, हाथी का शरीर मिल गया, तो हाथी के जैसे ही कार्य कर रहे थे। तो स्वाभाविक थे शरीर के जैसे कार्य करेंगे, पर जब एक बड़ी विपत्ति आ गई शारीरिक स्तर पर, कुछ रहा नहीं, तब क्या हो गया? तब आध्यात्मिक स्तर पर आ गए वे! और आध्यात्मिक स्तर पर जब आ गए, तो फिर उन्होंने भक्ति जो थी, वह पुनः जाग्रत हो गई। और उस तरह से वे भगवान के प्रति जो ज्ञान था, भगवान के प्रति भक्ति थी, उसके अनुसार वे अभी भगवान को प्रार्थनाएँ अर्पण कर रहे हैं।
तो जो हमारी चेतना है, वह हमेशा भगवान के… अगर चेतना को हमने भगवान से आकर्षित कराया है भक्ति के द्वारा, तो वह आकर्षण कभी नहीं जाता है! भले ही भौतिक स्तर पर कर्म के कारण, प्रकृति के कारण, किसी शाप के कारण कुछ भी उपद्रव आते रहे, भौतिक स्तर आते रहे, पर जो भगवान के प्रति चेतना है, वह हमेशा आकर्षित रहेगी। और यह जो चेतना के आकर्षण के कारण… अगर चेतना का आकर्षण पहले से दिखेगा नहीं, पर जो उचित परिस्थिति आ जाएगी, तब वह दिख जाएगा।
और दूसरे कारण जो हैं—गजेंद्र अभी इस तरह से सुंदर प्रार्थनाएँ अर्पण कर रहा है, और वह भगवान को अभी किस तरह से प्रार्थना अर्पण करते हैं, भगवान को और प्रसन्न करते हैं, और भगवान कैसे उनके सामने प्रकट होते हैं, वह उसकी चर्चा हम अगले प्रसंग में करेंगे।
बहुत-बहुत धन्यवाद! हरे कृष्णा!
प्रश्नोत्तर सत्र (Q&A)
प्रश्न १: “गजेंद्र आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी में से आर्त श्रेणी में आते हैं। तो अगर कोई इस भावना से भगवान के पास आ रहा है, तो पूर्व जन्म की भक्ति की क्या भूमिका है इसमें?”
चेतन्याचरण प्रभु:
अच्छा सवाल है! गजेंद्र जो हैं, तो बताया है कि जो चार प्रकार के लोग भगवान के पास आते हैं, तो उनमें से जो दुखी लोग होते हैं पीड़ा में, पीड़ा से मुक्ति प्राप्त करने के लिए आते हैं, उसका उदाहरण गजेंद्र दिया गया है।
देखिए, हम जब भी विश्लेषण करते हैं, तो विश्लेषण करते समय एक फ्रेम ऑफ रेफरेंस (Frame of Reference – विचारधारा की चौखट) रखते हैं जिससे हम देख रहे हैं उसको। तो यह ज़रूरी है, पर ऐसा नहीं है कि वही विचारधारा की चौखट में पूरा सच है! कोई भी हम फ्रेम ऑफ रेफरेंस, कोई भी विचारधारा की चौखट रखते हैं, वह सत्य की हमें एक परछाईं देता है, पूरा सत्य नहीं देता है।
जैसे हम कोई नक्शा (Map) लेते हैं, तो नक्शे से हमको उस इलाके की जानकारी मिलती है, पर वह इलाका उस नक्शे में नहीं है! उस इलाके में अलग-अलग इमारतें हो सकती हैं और बहुत-सी चीज़ें हो सकती हैं जो उस नक्शे में नहीं दिखती हैं। तो इसलिए जब भी हम कोई भी विश्लेषण करते हैं, वह एक दृष्टि से विश्लेषण कर रहे हैं। तो वह महत्वपूर्ण है और उससे सत्य भी हमको मिलता है, पर ज़रूरी नहीं है कि उसी विश्लेषण से पूर्ण सत्य मिलेगा।
तो इस जन्म की दृष्टि से अगर हम देखते हैं, तो फिर यह सत्य है कि जो गजेंद्र था, वह पीड़ा में होने के कारण भगवान के पास आता है। पर हम देखते हैं कि साधारणतया जो भगवान बताते हैं, ऐसे पीड़ा में जो लोग आते हैं, क्या होता है? भगवान उनकी सराहना करते हैं कि ये सुकृति हैं, ये उदार हैं। क्योंकि अलग-अलग लोग पीड़ा में… जब पीड़ा निकल जाएगी तो चले जाएँगे। पर जो ज्ञानी होते हैं—वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः—ऐसे लोग बड़े दुर्लभ हैं।
तो हम देखते हैं, भले ही एक दृष्टि से गजेंद्र जब पीड़ा में थे तब भगवान के पास आए, पर साधारणतया पीड़ित लोगों के समान गजेंद्र की चेतना नहीं थी! आगे के श्लोकों में हम देखेंगे, गजेंद्र बताते हैं कि—”हे प्रभो! आप मेरा जीवन मत बचाओ, मुझे जीने की कोई इच्छा नहीं है! विशेषकर इस अज्ञानमयी देह में जीने की इच्छा नहीं है। प्रभो! अगर मैं जी भी गया तो क्या होगा? मैं पुनः इस अज्ञान रूपी शरीर में रहूँगा। तो बेहतर है कि आप मुझे इस मगरमच्छ से बचाने से बेहतर है कि आप मुझे इस अज्ञान से मुक्त कीजिए!”
प्रश्न २: “क्या बूढ़े जानवरों को बूचड़खाने (Slaughterhouse) में काटने से वे भूत बनते हैं?”
चेतन्याचरण प्रभु:
साधारणतया नहीं। अगर किसी का कत्ल होता है, तो कभी-कभी वह व्यक्ति भूत बन सकता है, पर वह कत्ल के कारण नहीं बनता, वह कुछ और कर्म किया होगा उसके कारण होता है।
क्योंकि एक क्या है कि कर्म में हम किसके लिए जिम्मेदार हैं? जो मैंने किया, उसके लिए जिम्मेदार हैं। जो मुझ पर हुआ, उसके लिए मैं जिम्मेदार नहीं हूँ! जब मुझ पर कुछ हो रहा है, उसमें क्या है—मेरे पूर्व कर्म का मुझे फल मिल रहा है, पर उसका मैं (वर्तमान में) जिम्मेदार नहीं हूँ।
तो साधारणतया किसी का कत्ल होता है, तो उसकी प्रतिक्रिया के रूप में वह व्यक्ति भूत नहीं बनेगा। अगर वह पहले कुछ कर्म किया है जिसके लिए उसको भूत बनना है, तो फिर हो सकता है।
प्रभुपाद जी स्पष्ट रूप से बोलते हैं कि एक जानवर की अगर हत्या करते हैं, तो उस आत्मा को पुनः जानवर के शरीर में आना पड़ता है। क्योंकि आत्मा को पूर्व कर्म के कारण एक काल-अवधि तक एक जानवर शरीर में रहना था, इसके बाद उसकी प्रगति होगी और आगे जाएगा वह। तो अगर बीच में उस जानवर को मार डालते हैं, तो उसको पुनः जन्म लेकर उस जानवर के शरीर में आकर अपने जानवर के शरीर की जितनी जीने की अवधि है, वह पूरी करनी पड़ती है, उसके बाद वह अगले शरीर में जाएगा।
प्रश्न ३: “क्या धनी परिवार में जन्म लेने वाला व्यक्ति भटक सकता है?”
चेतन्याचरण प्रभु:
वास्तव में ऐसा ज़रूरी नहीं है कि कोई रईस परिवार में जन्म लेगा तो वह ज़रूर पथभ्रष्ट होगा ही। हो सकता है, हर चीज़ से व्यक्ति भ्रष्ट हो सकता है आध्यात्मिक मार्ग में। पर साधारणतया उस व्यक्ति ने पहले अध्यात्म का आचमन किया भी है और बाद में स्वर्ग में भी ऐश्वर्य का उपभोग किया है, इसलिए वह इस जन्म में अगर ऐश्वर्य मिलता है, तो उससे इतना प्रलोभित नहीं होगा।
भौतिक चीज़ों में भी एक तरह से देखेंगे तो हायर (higher) और लोअर (lower) होता है। अगर किसी व्यक्ति ने बहुत मेज़बानियाँ खाई हैं, तो वह साधारण भोजन से इतना प्रलोभित नहीं होगा। जिसने स्वर्ग में भोग किया है, तो इस भौतिक जगत में अगर इस पृथ्वी पर उसको बहुत ऐश्वर्य मिलेगा, तो उससे वह ज्यादा प्रलोभित नहीं होगा।
पर साधारण संभावना ज़रूर है कि जो हमें सुविधा मिली है भक्ति में प्रगति करने के लिए, उस सुविधा का अगर हम उचित उपयोग नहीं करते हैं, तो फिर हम भ्रष्ट हो सकते हैं। ऐश्वर्य जब आ जाता है, तो लगता है कि “इस दुनिया में मैं सुखी हो जाऊँगा”, इसलिए व्यक्ति आगे प्रगति नहीं करता।
यहाँ ‘पॉसिबिलिटी’ (Possibility – जो हो सकता है) और ‘प्रोबेबिलिटी’ (Probability – जिसकी होने की संभावना काफी है) में अंतर है। तो धन है तो पथभ्रष्ट होने की पॉसिबिलिटी तो है, पर प्रोबेबिलिटी ज्यादा नहीं है, क्योंकि उसको अध्यात्म का भी अनुभव है पहले से और स्वर्ग के भोग का अनुभव है, इसलिए इससे इतना प्रलोभित नहीं होगा।
श्रील प्रभुपाद जी के वचनों को समझने के लिए हमें संदर्भ देखना चाहिए। कभी-कभी प्रभुपाद जी ऐसी चीज़ें बोला करते थे जो कि रेटोरिकल (Rhetorical) थीं, जो उस परिस्थिति में ज़ोर देने के लिए बता रहे थे। तो हमें संदर्भ भी ज़रूर देखना है।
जैसे एक बार एक भक्त ने प्रभुपाद जी से कहा कि “भक्त सब पूर्वाचार्यों की रसिका किताबें पढ़ रहे हैं।” तो प्रभुपाद जी नाराज़ हो गए, प्रभुपाद जी बोले—”ऐसी किताबें पढ़ेंगे तो उनका मन दूषित हो जाएगा, ऐसी किताबों को जला दो!” तो फिर उस भक्त ने क्या किया? प्रभुपाद जी जब एक पॉइंट बोलते थे, तो वे बहुत ज़ोर से बोलते थे वह पॉइंट।
अब उसी चीज़ का एक दूसरा दृष्टिकोण भी हो सकता है, और प्रभुपाद जी ने दूसरा दृष्टिकोण भी दिया है, पर वह दूसरी जगह पर दिया है। तो इसलिए प्रभुपाद जी के वचनों को समझने के लिए (Prabhupada Hermeneutics) हमें प्रभुपाद जी ने सब कुछ जो कहा है वह देखना चाहिए, सिर्फ एक विधान नहीं देखना चाहिए। एक विधान देखेंगे तो हमको लगेगा कि यही अंतिम सत्य है, पर प्रभुपाद जी ने कई जगहों पर अलग-अलग चीज़ें कही हैं।
तो जो शास्त्र का सिद्धांत होता है, वह एक स्थायी शाश्वत संदेश है और एक पारिस्थितिक संदेश है। जैसे चैतन्य महाप्रभु के तीन अलग-अलग भक्त थे, तो तीनों को अलग-अलग गुणों का उपदेश दिया—एक को बोला कि “तुम संन्यासी बन जाओ”, दूसरे को बोला कि “तुम एक ब्रह्मचारी रहो, विग्रहों की पूजा करो, पुजारी बनो”, तीसरे को बताया कि “तुम जाकर घर जाओ, विवाह करो और परिवार की जिम्मेदारी संभालो।”
हमें कम से कम ज़रूरत है कि भगवान् कृष्ण शुड बी अवर स्ट्रॉन्गेस्ट डिज़ायर (Krishna should be our strongest desire)! हमारी सबसे शक्तिशाली इच्छा जो है, वह भगवान् में शुद्ध भक्ति होनी चाहिए। भले हम उस स्तर पर नहीं पहुँचे कि भगवान् के अलावा कोई और इच्छा ही नहीं है, पर कम से कम भगवान् के प्रति जो इच्छा है, वह बाकी सब चीज़ों से और केंद्रित होनी चाहिए।
बहुत-बहुत धन्यवाद!
श्रील प्रभुपाद की जय! गौर-भक्तवृंद की जय!
हरे कृष्णा!