Gajendra Moksha Katha 5 – Which comes first – giving up lower taste or getting higher taste – Hindi
[Bhagavatam class at ISKCON Belgaum, India]
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Lecture Summary
- कामादि असह्य वेगों से मुक्ति: इस भौतिक संसार में काम, क्रोध और लोभ के वेग अत्यंत असह्य हैं। जो अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं करते, वे ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकते। परंतु जब कोई जीव भगवान का अनन्य आश्रय ग्रहण करता है, तो भगवान स्वयं उसकी इन असह्य वेगों से रक्षा करते हैं।
- श्रवण की महिमा एवं इच्छाओं का परिवर्तन:
- आध्यात्मिक प्रगति की शुरुआत इंद्रिय-निग्रह से अधिक ‘श्रवण’ (श्रीमद्भागवतम् व हरि-कथा के श्रवण) से होती है।
- श्रवण के माध्यम से अज्ञान दूर होता है और धीरे-धीरे सात्त्विक व आध्यात्मिक इच्छाएँ जाग्रत होती हैं।
- संग का वास्तविक अर्थ (Transfer of Desires):
- संग का अर्थ केवल एक ही स्थान पर रहना नहीं है, बल्कि इच्छाओं का आदान-प्रदान (Transfer of Desires) है।
- भक्त-संग का मुख्य उद्देश्य अपनी आध्यात्मिक संपत्ति (भक्ति के स्टॉक) को बढ़ाना और अपने भीतर सेवा की इच्छाओं को जगाना है।
- धर्म का वास्तविक उद्देश्य (अपवर्ग/मोक्ष):
- श्रीमद्भागवतम् (1.2.9 – धर्मस्य ह्यापवर्ग्यस्य…) के अनुसार धर्म का उद्देश्य केवल अर्थ (धन) और काम (भोग) की प्राप्ति नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष है।
- जब धार्मिक लोग केवल भौतिक लाभ के पीछे भागते हैं (Religious Materialism), तो इससे समाज में नास्तिकता और धर्म से विमुखता बढ़ती है।
- श्रील प्रभुपाद जी का आदर्श व त्याग: श्रील प्रभुपाद जी ने अपने गुरुदेव (श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर) के आदेश को अपने जीवन की मुख्य प्रेरणा (Driving Force) बनाया। उन्होंने भौतिक इच्छाओं को दबाने के बजाय अपने हृदय को आध्यात्मिक इच्छाओं (प्रचार व सेवा) से भर लिया।
- व्यावहारिक दृष्टिकोण (स्टॉक एक्सचेंज व अस्पताल का उदाहरण):
- स्टॉक एक्सचेंज: मंदिर/संस्था भक्ति का स्टॉक एक्सचेंज है, जहाँ अपनी भक्ति बढ़ाने की जिम्मेदारी स्वयं साधक की है।
- अस्पताल: जैसे अस्पताल में बीमारी से बचने के लिए सतर्क रहना पड़ता है, वैसे ही संस्था में रहकर दूसरों के अनर्थों से प्रभावित हुए बिना अपनी साधना व चेतना की रक्षा स्वयं करनी होती है।
Full Transcription
हरे कृष्णा! गजेन्द्र मोक्ष की कथा पर हम चर्चा कर रहे थे, पिछले चार प्रवचनों में। तो आज इसके अंतिम विभाग में चर्चा कर रहे हैं।
यहाँ पर प्रार्थना हो रही है कि गजेन्द्र कह रहे हैं—नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग… कि इस भौतिक जगत में जो वेग होते हैं—काम, क्रोध, लोभ… त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः—यह आत्मा का नाश करते हैं, यह तीन वेग हैं कि यह असह्य हैं। तो यह तीन असह्य वेग हैं, पर आप स्वामी हैं—शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय। और यह तीन शक्तियाँ जो हैं, वे हमारी धी, हमारी चेतना, हमारी बुद्धि पर कार्य करती हैं। और गुणाय—वे बाहर तीन विशेष जो इंद्रियों के विषय हैं, जो तीन गुणों के आधार पर प्रकट होते हैं, उनके द्वारा वे वृत्तियाँ बनती हैं।
तो ऐसे जो असह्य वेग हैं, उनसे कौन बचाते हैं? आप बचाते हैं! अगर कोई आपकी शरण लेता है, तो आप उनको बचाते हैं। जो आपकी शक्ति है, उसका कोई अंत नहीं है।
कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने…
पर जिन्होंने अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं किया है, वे आपको प्राप्त नहीं कर सकते हैं।
तो इस श्लोक में तीन चीज़ें बताई जा रही हैं:
- ये भौतिक वासनाओं का जो प्रवाह है (वेग है), वह असह्य है।
- अगर कोई भगवान की शरण में जाता है, तो भगवान उनकी इन सब वासनाओं से रक्षा करते हैं।
- जो अपनी इंद्रियों को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं, वे भगवान को जान नहीं सकते हैं।
तो यहाँ पर यह सवाल उठता है कि कैसे व्यक्ति आध्यात्मिक प्रगति शुरू करता है या आगे बढ़ता है? कई बार ऐसा कहते हैं कि अगर हम इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं कर रहे हैं, तो हम भौतिक चेतना में फँसे रहते हैं; और भौतिक चेतना में फँसे रहेंगे, तो आध्यात्मिक चेतना नहीं होती है, तो फिर हम भगवान को नहीं जान सकते।
दूसरी ओर से यह भी कहा जाता है कि जब तक आध्यात्मिक रुचि नहीं आती है, तब तक हम भौतिक भोग छोड़ नहीं सकते, क्योंकि आत्मा हमेशा सुख चाहती है, सुख के बिना रह नहीं सकती। इसलिए भगवान कहते हैं—परं दृष्ट्वा निवर्तते—कि जब हमको उच्च स्वाद मिलता है, तो हम शांत हो जाते हैं।
तो फिर इसमें पहले क्या आता है? क्या पहले हम भौतिक भोग छोड़ते हैं, फिर आध्यात्मिक रुचि प्राप्त करते हैं?
श्रवण की महत्ता एवं श्रुति-परायणता
सब से पहले आता है श्रवण!
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्…
सारी भक्ति की जो विधि है, उसकी शुरुआत होती है श्रवण से। और भगवद्गीता में बताते हैं कि जो व्यक्ति श्रुति-परायण है, जो श्रवण के लिए आसक्त है, वह व्यक्ति ज़रूर भव-बंधन के पार आ सकता है। जो श्रवण में आसक्त रहते हैं, भले ही वह बहुत आध्यात्मिक रूप से अज्ञानी भी क्यों न हो, पर अगर श्रवण करते रहेंगे, तो फिर धीरे-धीरे अज्ञान दूर होगा। और केवल श्रुति-परायण होने से, श्रवण करते रहने से क्या हो जाएगा? तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युम्—वे मृत्यु के पार चले जाएँगे, भवसागर के पार चले जाएँगे!
प्रभुपाद जी भी अपने… जो उन्होंने ‘मार्कने भागवत धर्म’ नाम का एक ग्रंथ लिखा (ग्रंथ नहीं, कविता लिखी), जब उन्होंने अमेरिका का कोस्ट-लाइन (अमेरिका का तट) पहली बार देखा, तो अपना चिंतन करते हुए वे बोलते हैं:
रजस्तमो गुणेर सबाई आच्छन्न ।
वासुदेव कथा रुचि नहे से प्रसन्ना ॥
भागवतेर कथा से तव अवतार ।
धीरे हया सुने यदि काने बार बार ॥
वे कहते हैं—”हे प्रभो! भागवत की कथा जो है, यह वास्तव में आपका ही अवतार है। और अगर कोई व्यक्ति इसे सुनता रहेगा, धीरे हया—वह धीर हो जाएगा, शुने यदि काने बार बार—अगर बार-बार सुनता रहता है, तो व्यक्ति धीर बन जाता है!”
तो इसका मतलब क्या है कि भले ही शुरुआत में हमें रुचि न आए… साधारणतः जीव भौतिक जगत में अधिकांश लोग भौतिक चेतना में होते हैं। और जब भौतिक चेतना में होते हैं, तो आध्यात्मिक रुचि ज्यादा नहीं होती है। तो फिर उनको, ऐसे जीवात्माओं को आध्यात्मिक रुचि देनी पड़ती है, उनको खुद को अपने आप नहीं आती है।
तो इसलिए विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ‘माधुर्य कादंबिनी’ में बताते हैं कि वास्तव में जो भगवत्तत्त्व में, भगवद्भक्ति में, भगवद्ज्ञान में श्रद्धा होती है, वह दो प्रकार से उत्पन्न हो सकती है:
- स्वाभाविकी: एक अंदर से ही व्यक्ति को आकर्षण है, श्रद्धा है।
- बलोत्पादिता: बलोत्पादिता मतलब कि कोई अगर बहुत महान भक्त होते हैं, तो उनकी जो श्रद्धा होती है, उनका जो प्रेममय व्यवहार होता है, उनकी जो करुणा होती है, उसके कारण लोगों को लगने लगता है कि “ज़रूर इसमें कुछ सत्य है, मैं इसे जानना चाहता हूँ!”
The greatest cause of devotion is devotees, and the greatest cause of atheism is theists, not atheists.
भक्ति में वृद्धि भक्तों के द्वारा होती है; और नास्तिकता में अगर कोई बढ़ जाता है, तो वह भी भक्तों के कारण ही होता है, धार्मिक लोगों के कारण ही होता है।
SBNR (Spiritual But Not Religious) एवं धर्म का विकृत रूप
मतलब क्या होता है कि इस दुनिया में हम भगवान को नहीं देख सकते हैं। और भले ही कभी-कभी हमें अनुभव हो जाए, ऐसा कई दुनिया में, अमेरिका में और भारत में आ रहा है, कुछ लोग कहते हैं, उनको कहते हैं कि I am SBNR। SBNR मतलब क्या? Spiritual But Not Religious (मैं आध्यात्मिक हूँ पर धार्मिक नहीं हूँ)।
वे क्यों कहते हैं ऐसा? ‘आध्यात्मिक’ मतलब मैं कुछ अनुभव करना चाहता हूँ, कुछ देखना चाहता हूँ, कुछ दुनिया के परे कुछ और है क्या मैं जानना चाहता हूँ। वह उसके प्रति, उसके प्रति रिसिप्टिविटी (receptivity), ओपननेस (openness), उसके प्रति मैं अनुकूल हूँ, मैं जानना चाहता हूँ—तो मैं स्पिरिचुअल (spiritual) हूँ।
‘धार्मिक’ मतलब क्या सोचते हैं वे? रिलिजियस (Religious)—कि आप कुछ अंधश्रद्धा रखते हो, आप कुछ बिना जाने रीति-रिवाजों का पालन करते हो, और आप दूसरे धर्मों के प्रति नफरत करते हो, युद्ध करते हो, हिंसा करते हो—तो ऐसा मुझे नहीं बनना है!
तो अभी जो भाव है इसमें, क्या हो गया है? ऐसे लोगों का भाव है, वे सोचते हैं कि वास्तव में मुझे आध्यात्मिक अनुभव, आध्यात्मिक दृष्टि प्राप्त करनी है, पर वे सोचते हैं धर्म यह रीति-रिवाजों तक सीमित है, संकीर्ण है।
तो ऐसे लोग जब सोचते हैं, तो वे क्यों सोचते हैं? अधिकांश रूप से इसलिए होता है कि उन्होंने जो धार्मिक लोग देखे हैं, वे धार्मिक लोग ज्यादा आध्यात्मिक नहीं थे। वह धर्म का एक नकाब जैसा है, कुछ रीति-रिवाज कर रहे हैं। भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर बोला करते थे कि कुछ लोग विग्रहों को दिखाते हैं ताकि कुछ दान प्राप्त कर सकें, तो उनके लिए विग्रह क्या है? वह एक धंधा बन गया है!
तो ऐसा हर धर्म में होता है। जो भौतिकवादी लोग जब कुछ धार्मिक मार्गों में आ जाते हैं, तो फिर वे अपना भौतिकवाद धार्मिक संस्थाओं में, धार्मिक मार्गों में लाते हैं। और फिर क्या होता है? जो बुद्धिमान लोग होते हैं, वे देखते हैं कि वास्तव में यह क्या है? जो तुम कर रहे हो, बाकी दुनिया भी वही कर रही है! बाकी दुनिया भौतिकवादी है, तुम भी भौतिकवादी हो, सिर्फ अधार्मिक रूप से कर रहे हैं या धार्मिक रूप से कर रहे हैं। फर्क क्या है उसके लिए?
तो इसलिए इन लोगों को—आजकल के पाश्चात्य देशों में, वेस्टर्नाइज्ड लोगों में—धार्मिक संस्थाओं में लोगों को रुचि नहीं है। कोई आध्यात्मिक व्यक्ति हो, ऐसे व्यक्ति हो, हमें उनसे संग करके लगता है कि यह वास्तव में प्रगतिशील वैष्णव हैं। उनके आदान-प्रदान से, उनके व्यवहार से, उनके प्रवचनों से, उनके कार्यों से हमें आध्यात्मिक प्रेरणा मिलती है, तो फिर क्या होता है? वह वृद्धि होती है।
तो अभी इसका मतलब यह नहीं है कि धार्मिक संस्था या धार्मिक रीति-रिवाज ये बुरे हैं। पर मैं यहाँ पर कहने पर जोर क्या दे रहा हूँ? हमारा विषय यह है कि हम भौतिक स्वाद से आध्यात्मिक स्वाद तक कैसे पहुँच सकते हैं?
तो उसमें मैंने कहा कि सबसे पहले श्रवण के द्वारा हमें पता चलता है कि आध्यात्मिक स्वाद कुछ है, और फिर हम उसके बारे में थोड़ा खोज करने लगते हैं। तो यह होता कैसे है? यह प्रधानतया भक्तों के संग से होता है।
तो अगर जो भक्त हैं, जो धर्म का पालन कर रहे हैं, जो अध्यात्म का ज्ञान दे रहे हैं, अगर हम देखते हैं कि वास्तव में उनको आध्यात्मिक रुचि है, वे आध्यात्मिक चीज़ों में आनंद ले रहे हैं, तो फिर हमें विश्वास होता है कि ज़रूर यह कुछ आध्यात्मिक सत्य है, और मुझे भी इसकी खोज करनी चाहिए।
इसके विपरीत, जो अगर आध्यात्मिक या धार्मिक लोग हैं, अगर वे भी भौतिक भोग ही कर रहे हैं, तो फिर लोग सोचते हैं कि धर्म करने की ज़रूरत क्या है? भौतिक भोग ही करना है, तो मैं इसके बिना भी कर सकता हूँ!
तो प्रभुपाद जी कहते हैं, चार पुरुषार्थ जो थे, वैदिक संस्कृति में बताए गए थे। कौन-से हैं चार पुरुषार्थ? धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।
तो प्रभुपाद जी कहते हैं कि आजकल के पाश्चात्य संस्कृति में लोगों को अर्थ और काम धर्म के बिना मिल जाता है। अब स्थायी रूप से नहीं मिलता है, पर मिल जाता है। आप मेहनत करो, कुछ धंधा करो, नौकरी करो, वह पैसा मिल जाएगा, फिर उससे काम (भोग) मिल जाएगा।
तो अब जब अर्थ और काम धर्म के बिना अगर मिल जाता है, तो लोग बोलते हैं—”फिर धर्म की ज़रूरत क्या है?” और अगर लोग देखते हैं कि धार्मिक लोग भी अर्थ और काम के ही पीछे हैं, तो फिर वे बोलते हैं कि अगर अर्थ और काम धर्म के बिना मिल जाता है, तो तुम्हारे धार्मिक लोगों के आदेश का पालन क्यों करें? तुमने जो नियम बनाए हैं, रीति-रिवाज बनाए हैं, उसका पालन हम क्यों करें?
श्रीमद्भागवतम् के दो मुख्य श्लोक
श्रीमद्भागवतम् के पहले स्कंध के दूसरे अध्याय के नौवें और दसवें श्लोक हैं:
धर्मस्य ह्यापवर्ग्यस्य नार्थोऽर्थायोपकल्पते ।
नार्थस्य धर्मैकान्तस्य कामो लाभाय स्मृतः ॥
कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभो जीवेत यावता ।
जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभिः ॥
ये दो श्लोक हैं। और प्रभुपाद जी एक बार एक प्रोफेसर थॉमस हॉप्किंस से बात कर रहे थे। तो थॉमस हॉप्किंस ने पूछा—”स्वामी जी! आपने इतने ग्रंथ लिखे हुए हैं, तो अगर आपके सारे संदेश का अगर आपको सार बोलना हो, तो आप क्या बताओगे?”
प्रभुपाद जी ने ये दो श्लोक बताए—पहले स्कंध के दूसरे अध्याय के नौवाँ और दसवाँ श्लोक! क्या श्लोक हैं ये? प्रभुपाद जी बताते हैं: धर्मस्य ह्यापवर्ग्यस्य—आपवर्ग्यस्य मतलब इस भौतिक जगत से परे जाना है हमें, हमें आध्यात्मिक प्रगति करनी है, आध्यात्मिक प्राप्ति करनी है। धर्म का उद्देश्य वह आध्यात्मिक उन्नति है, आध्यात्मिक प्राप्ति है; नार्थोऽर्थायोपकल्पते—अर्थ यह उद्देश्य नहीं है।
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष… इसमें व्यक्ति अधिकांशतः भौतिक चेतना में रहता है, और इसलिए कई जन्मों तक व्यक्ति इसमें फँसा रह सकता है। तो इसलिए समझना कि धर्म का अंतिम उद्देश्य मोक्ष है; मोक्ष भी नहीं, भक्ति में जो मोक्ष है वह!
तो धर्म से काम मिल जाएगा, अर्थ मिल सकता है, पर अर्थ यह धर्म का उद्देश्य नहीं है।
जैसे कोई भी हम कार्य करते हैं, उसका एक प्रोडक्ट (product) होता है और एक बाय-प्रोडक्ट (by-product) होता है। प्रोडक्ट मतलब जो प्रधान उससे मिल रहा है, बाय-प्रोडक्ट मतलब जो बाजू में उससे मिल जाता है।
कैसे? अगर कोई भक्त बन जाता है, कोई प्रचारक बन जाता है, तो अभी प्रचारक बन जाने से व्यक्ति को आदर मिल सकता है, सम्मान मिल सकता है। अभी व्यक्ति को प्रचारक इसलिए नहीं बनना चाहिए कि उसको आदर-सम्मान मिले। व्यक्ति को प्रचारक इसलिए बनना है कि वह खुद भगवान के करीब जा सके और दूसरों को भगवान के करीब जाने में मदद कर सके!
तो प्रभुपाद जी बोलते हैं कि नम्रता का मतलब यह है कि आदर प्राप्त करने की अपेक्षा से चिंतित नहीं होना चाहिए—”मुझे कितने लोग आदर करेंगे, कितने लोग आदर करेंगे? हाँ, आदर करेंगे तो बड़ा संतोष मिलता है, कब मुझे आदर करने वाले हैं?” ऐसी जो आकांक्षा है, तो वह ऐसा अगर होगा तो नम्रता नहीं है।
तो क्या है? यह उदाहरण मैं इसलिए दे रहा हूँ कि कोई चीज़ का एक प्रधान उद्देश्य होता है, और उससे बाजू में एक दूसरा फल भी मिल सकता है। तो प्रचार करने का प्रधान उद्देश्य है कि हम खुद भगवान की कथा करते हैं, हम भगवान के करीब जाएँ और दूसरों को भगवान के करीब जाने में मदद करें। उसके साथ-साथ अगर कुछ मान-सम्मान मिल भी गया, तो वह हम खुद के लिए नहीं लेते, जहाँ तक हो सकता है, भगवान के लिए अर्पण करते हैं। पर वह उसका उद्देश्य नहीं है!
तो इससे ही बता रहे हैं: नार्थोऽर्थायोपकल्पते—उसको भगवान की सेवा में लगाना है।
काम का सकारात्मक एवं नकारात्मक रूप
और फिर हम सब में इच्छा तो है—काम का, अर्थ का। कई बार हम ‘काम’ यह शब्द नकारात्मक भाव में लेते हैं—जो शारीरिक स्तर पर इंद्रियों का आकर्षण होता है, उसको हम काम बोलते हैं। पर भागवतम में काम यह शब्द नकारात्मक रूप से भी लिया है, सकारात्मक रूप से भी लिया है।
ऐसा बताया गया है कि युधिष्ठिर महाराज का जब राज्य था, तो वे इतना अच्छे धर्म से राज्य कर रहे थे कि सारी पृथ्वी और पृथ्वी के वासियों की जो इच्छाएँ थीं, वे पूरी हो रही थीं—कामं ववर्ष पर्जन्यः। इससे बता रहे थे कि पर्याप्त मात्रा में वर्षा होती थी और इससे जो भी लोगों की इच्छाएँ थीं, वे पूरी होती थीं।
तो काम क्या है? काम यह हमेशा नकारात्मक नहीं है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—इसमें काम जो है, वह एक पुरुषार्थ है। और पुरुषार्थ मतलब यह अच्छा है, यह बुरा नहीं है।
तो काम का कुछ सकारात्मक अर्थ हो सकता है, काम का नकारात्मक अर्थ हो सकता है। वह नकारात्मक कब हो जाता है? वह नकारात्मक तब हो जाता है जब उस इच्छा के प्रभाव में आकर हम भगवान को भूल जाते हैं, नैतिकता को भूल जाते हैं और आध्यात्मिक मूल्यों के खिलाफ कार्य करने लगते हैं! मतलब वह काम की पूर्ति ही हमारे जीवन का सर्वस्व बन जाती है और उसके लिए हम बाकी सब त्याग देते हैं, तो फिर काम हमारे लिए खतरनाक हो जाता है।
पर हमारी आत्मा का एक स्वभाव है—इच्छा करना! और उसके इच्छा करने के स्वभाव को नष्ट नहीं किया जा सकता है। हम इच्छाओं को मार नहीं सकते, हम उनका इलाज करके उनको ठीक कर सकते हैं। तो जो भौतिक इंद्रिय-तृप्ति के प्रलोभन की इच्छाएँ हैं, उनको हम अगर ठीक करते हैं, तो भगवान की सेवा, भगवान की भक्ति की इच्छाएँ जाग्रत हो जाती हैं। वे जब इच्छाएँ मिल जाती हैं, तो वे वास्तव में हमें भक्ति में प्रगति करने में सहायता करती हैं।
भक्ति के लिए… जैसे हम गुरु-पूजा में गाते हैं:
गुरु-मुख-पद्म-वाक्य, चित्तेते करिया ऐक्य, आर ना करिह मने आशा ॥
जो हमारे गुरुदेव ने हमें आदेश दिया है, जो उपदेश दिया है, उसको स्वीकार करना—यह हमारे जीवन का उद्देश्य है।
श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर एवं प्रभुपाद का दृष्टांत
अभी महान भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर एक महान वैष्णव थे, और उनके जो शिष्य थे वे भी महान वैष्णव थे, बड़े पंडित थे, बड़े समर्पित थे। और उन्होंने भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर को पूरे भारत भर में ६४ मंदिर बनाने में मदद की।
कभी-कभी हम यह सोचते हैं कि भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर के चले जाने के बाद गौड़ीय मठ में थोड़ा झगड़ा हो गया और शायद गौड़ीय मठ कुछ कार्य नहीं कर पाया। एक तरह से वह सत्य है, पर that is an over-simplification। काफी जो हुआ वह जटिल था, पर इसका मतलब यह नहीं है कि उनके जो शिष्य थे, वे अच्छे शिष्य नहीं थे!
जब भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर जीवित थे, तो उस समय प्रभुपाद जी अपनी गृहस्थी की जिम्मेदारी में ज्यादा व्यस्त थे, तो वे भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर को प्रत्यक्ष रूप से मदद नहीं कर पा रहे थे। तो जब भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने लगभग १९१९ से १९३५ तक (१५ सालों में) ६४ केंद्र भारत में बनाए, तो १५ सालों में ६४ केंद्र बनना यह बहुत बड़ी बात है! और यह भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर की प्रेरणा थी, पर उनके शिष्यों ने उनको मदद की थी, उसी के कारण वह हुआ। तो उनके शिष्य भी महान भक्त थे। पर उनके गुरुदेव के गुजर जाने के बाद कैसे एक साथ रहना है, वह समझ नहीं पाए। उसका भी कारण है, उसमें हम नहीं जाएँगे।
पर यहाँ पर मेरा कहने का भाव यही है, उद्देश्य है… मैं पॉइंट यही बोल रहा था कि भक्ति मतलब इच्छाओं को त्यागना नहीं है, भक्ति का भाव है इच्छाओं को (सही दिशा में) मोड़ना!
तो क्या हो गया, जब भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर गुजर गए, और फिर सारे गौड़ीय मठ के नेताओं में थोड़े झगड़े होने लगे, तो उन सबने सोचा कि “हमने जो हमारा मठ बनाया है, उसको बरकरार रखें, जो लोग यहाँ पर आए उनको प्रचार करेंगे।” और बहुत-से भक्त जो विरक्त हो गए—”संस्था बनाते हैं, झगड़े होते हैं, सब छोड़ दो, हम सिर्फ भगवान की भक्ति करेंगे।” पर वे अपनी भक्ति करते रहे प्रामाणिकता से, बहुत-से भक्त।
पर प्रभुपाद जी की विशेषता क्या थी? प्रभुपाद जी ने उनके गुरुदेव ने जो आदेश दिया था—कि पाश्चात्य देशों में जाकर प्रचार करो—उस आदेश को अपने जीवन का ड्राइविंग फ़ोर्स (Driving force) बना दिया! अपने जीवन को आगे चलाने के लिए वह उनकी अपनी प्रधान इच्छा बन गया।
तो प्रभुपाद जी एक्चुअली (actually) में क्या कर रहे हैं? वे जब न्यूयॉर्क में आए, छोटा-सा घर था उनका… प्रभुपाद जी जब उनके घर में थे, तो पहले ५-६ दिन तक उनके घर के सोफे पर प्रभुपाद जी सोए। फिर बाद में उनको लगा कि “यह सही नहीं है स्वामी जी के लिए”, तो उन्होंने एक दूसरा एक रूम लिया। तो प्रभुपाद जी उस रूम में रहते थे, और उस रूम में कुछ भी नहीं था—केवल एक कमरा था और एक बाथरूम था। तो वहाँ पर रहते थे, और फिर सुबह उठ के प्रभुपाद जी यहाँ पर आते थे, यहाँ पर किचन था, यहाँ कुकिंग करते थे। तो सब कुछ प्रभुपाद जी को खुद करना पड़ा!
और फिर जब वे प्रचार करने लग गए, तो खुद ही कहाँ प्रचार करना है, कमरा लेना, जगह लेना, उसके लिए पैसे प्राप्त करना… फिर अगर कोई लोग आने वाले हैं तो उनको बुलाना…
वे कहते हैं कि अगर मैं सोचता हूँ कि “मैं इस चीज़ का विचार नहीं करूँगा”… कैसे? अगर मैं बोलूँगा—मन और शरीर में फर्क है—अगर मैं बोलूँगा कि “मैं इसको छूऊँगा नहीं”, तो मैं सोचता हूँ यह मुझसे दूर है। पर अगर मैं सोचता हूँ “मैं विचार नहीं करूँगा इसके बारे में”, तो वह न करने… उस चीज़ के बारे में विचार न करने के विचार में भी उस चीज़ का विचार है ही! Are you getting this?
जब हम बोलते हैं कि “मैं इस चीज़ का विचार नहीं करूँगा”… अगर मैं बोलता हूँ कि “मैं एकादशी को खाने का विचार नहीं करूँगा”, ठीक है, पर “मैं खाने का विचार नहीं करूँगा” उसमें खाने का विचार आ गया है अपने आप! तो यह शुरुआत हो सकती है कि “मैं खाने का विचार नहीं करूँगा”, पर उसके बाद में क्या है? मुझे कुछ और चीज़ का विचार करना है! और उस विचार में जब मैं लग जाता हूँ, तो फिर यह खाने का विचार बाहर निकल जाएगा।
तो विचार ‘नहीं’ जाएगा… विचार नहीं जाएगा मतलब क्या? हमारे मन को जब हम भगवान के स्मरण से, भगवान की सेवा की इच्छाओं से भर देते हैं, तो बाकी इच्छाएँ बाहर चली जाती हैं!
तो प्रभुपाद जी की इच्छा क्या थी कि उन्होंने अपनी चेतना को इतनी सारी इच्छाओं से भर दिया था… तो जब हावर्ड व्हीलर प्रभुपाद जी से मिले, और प्रभुपाद जी की पूरी अलमारी भरी थी मार्जिन से मार्जिन तक लिखे हुए नोट्स से, तो बोले—”स्वामी जी! This is a lifetime work!” (यह तो पूरे एक जीवन का काम है!) उन्होंने सोचा कि एक-दो घंटे का थोड़ा और टाइपिंग होगा… “अरे! यह तो जिंदगी भर के टाइपिंग का काम होगा!” वे प्रभुपाद जी से मिले—”लाइफटाइम वर्क! एक जिंदगी नहीं, बहुत जिंदगी का काम है यह!”
आध्यात्मिक रुचि और संग का प्रभाव
तो हम जो भक्ति करते हैं, तो हमारा मूल विषय यह था जो हमको आध्यात्मिक रुचि प्राप्त करनी है और भौतिक भोग की इच्छा छोड़नी है। तो शुरुआत कहाँ से होती है इसकी? क्या पहले हम भौतिक भोग छोड़ते हैं, या आध्यात्मिक इच्छाएँ हमारे अंदर जाग्रत होती हैं?
तो संग का प्रभाव क्या होना चाहिए? श्रवण का प्रभाव क्या होना चाहिए?
सिर्फ शारीरिक रूप से अगर हम किसी के पास आते हैं, एक ही कमरे में आ जाते हैं, एक ही घर में आ जाते हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि हम उस व्यक्ति का संग कर रहे हैं। हो सकता है, but the essence of association is the transfer of desires. (संग का वास्तविक अर्थ है इच्छाओं का हस्तांतरण!)
अगर हम भक्तों के संग में आते हैं, भक्तों के हृदय में ज्वलंत इच्छा होती है कि “हमें भगवान की सेवा करनी है, भगवान का श्रवण करना है, भगवान के बारे में प्रचार करना है”, तो उनके संग से अगर हमारे हृदय में वह इच्छा आ जाती है, तो हम भक्तों का संग कर रहे हैं!
अगर हम भक्तों के संग में आ के देखते हैं—”यह भक्त देखो मंदिर में सो रहा है, देखो यह भक्त कितना खाता है, देखो यह भक्त…”—यह भक्त क्या है? हमेशा मंदिर में आ के दूसरों में दोष देखते रहते हैं। मैं आ के वही कर रहा हूँ, मैं क्या कर रहा हूँ? दूसरा सब का दोष देखते रहता है।
कुछ भक्त आते थे… मैं जब पुणे में था, एक भक्त आते थे। रोज़ सुबह श्रृंगार आरती के दर्शन करने आते थे, रोज़ सुबह! और श्रृंगार आरती के जैसे ही दर्शन हो जाता था, सीधे पुजारी डिपार्टमेंट में जा रहे थे और पुजारी को बोल जाते थे—”अरे! तुमने यह ड्रेसिंग में यह डेकोरेशन अच्छा नहीं किया, यह बराबर नहीं किया, यह बराबर नहीं किया!” रोज़ का रीति-रिवाज था उनका!
तो क्या था? वे दर्शन भगवान को देखने के लिए नहीं जा रहे थे, वे भगवान के श्रृंगार में क्या गलती हुई है, वह देखने के लिए जा रहे थे!
तो अभी यह भाव जो है, वह ज्यादा उचित नहीं है। तो भक्तों के संग में… भक्तों के संग में कुछ हो सकते हैं, वे कुछ गलतियाँ करते हैं, उनके अपने-अपने कंडीशंस (conditionings) हैं, उनकी अपनी-अपनी कमियाँ हैं—तो वह सब है। पर मैं भक्तों के संग में क्यों आ रहा हूँ? भक्त का संग जब कहते हैं, तो भक्त भी अलग-अलग दर्जे के होते हैं, अलग-अलग श्रेणी के होते हैं, अलग-अलग समर्पण के होते हैं।
तो मैं अगर भक्तों के संग में क्यों आ रहा हूँ? मैं इसलिए आ रहा हूँ कि मुझे मेरी भक्ति में वृद्धि करनी है!
दो व्यावहारिक उदाहरण: स्टॉक एक्सचेंज एवं अस्पताल
मैं दो उदाहरणों का वर्णन करता हूँ इसका। यह भौतिक उदाहरण हैं, पर यह आध्यात्मिक कर्तव्य हैं इसके लिए। प्रभुपाद जी संग के लिए उदाहरण देते हैं:
१. स्टॉक एक्सचेंज का उदाहरण (Stock Exchange Analogy)
जैसे कोई अगर बिजनेस में होगा, तो वह बिजनेस में अपना कोई बिजनेस चैंबर बना देता है ताकि सारे बिजनेस वाले लोग एक साथ में आएँ, और फिर वे बातचीत करके कुछ पॉलिसी बना सकते हैं, अच्छी तरह से कार्य कर सकते हैं। तो ऐसे बिजनेस में साथ में आएँ कि ‘स्टॉक एक्सचेंज’ बना देते हैं।
तो अभी स्टॉक एक्सचेंज में क्या होता है कि सब लोग आते क्यों हैं वहाँ पर? उनको अपना पैसा बढ़ाना है! “मैं १०,००० रुपये डालता हूँ, मेरी इच्छा है कि १५,००० हो जाए, २०,००० हो जाए।” पर अभी स्टॉक एक्सचेंज में जब हम आते हैं, हमारा पैसा हम डालते हैं, हमारा उद्देश्य क्या है कि हमारे पैसे को बढ़ाना।
पर सिर्फ स्टॉक एक्सचेंज में आ के अपने आप पैसा बढ़ने वाला नहीं है! स्टॉक एक्सचेंज में अलग-अलग प्रकार के ब्रोकर (Broker / दलाल) हो सकते हैं। और कुछ ब्रोकर ऐसे हो सकते हैं, कुछ दलाल ऐसे हो सकते हैं जो एक्सपर्ट हैं और जानते हैं—”आप यहाँ पैसा डालो”, फिर आपका पैसा बढ़ जाता है, और हम देखते हैं पैसा बढ़ जाता है।
पर कुछ ऐसे दलाल हो सकते हैं जो वहाँ पर दूसरों का पैसा फँसाने के लिए आए हैं! तो हम उनको अगर पैसा देंगे तो हमारा पैसा डूब जाएगा। या फिर कुछ ऐसे दलाल हो सकते हैं जो बेईमान नहीं हैं, पर वे अभी उतने एक्सपर्ट नहीं हैं, दक्ष नहीं हैं, तो उनको पैसा देंगे तो क्या होगा? उसका ज्यादा पैसे का वृद्धि नहीं होगा।
तो उसी तरह से जो भक्तों का संग है, भक्ति की संस्था है—वह मान लीजिए एक ‘भक्ति का स्टॉक एक्सचेंज’ जैसा है! तो हम सब के हृदय में थोड़ी-बहुत भक्ति है, थोड़ी-बहुत श्रद्धा है, वह आ के हम यहाँ पर इन्वेस्ट (invest) करते हैं। तो हमारा उद्देश्य क्या है कि हमारे भक्ति के स्टॉक को हमें और बढ़ाना है!
तो जब कोई स्टॉक एक्सचेंज आता है, तो उसके पैसे की वृद्धि करना यह उसकी खुद की जिम्मेदारी है! ऐसे नहीं बोल सकता है—”मैं स्टॉक एक्सचेंज में गया, अब वह स्टॉक एक्सचेंज की जिम्मेदारी है कि मेरा पैसा बढ़ाए।” नहीं, मेरी जिम्मेदारी है!
तो ठीक उसी तरह से, जब कोई व्यक्ति धर्म के मार्ग में आता है, तो यह उसकी जिम्मेदारी है कि उसकी श्रद्धा, उसकी भक्ति को बढ़ाना है!
तो कई बार ऐसे धर्म के नाम पर लोग होते हैं जो वास्तव में धार्मिक कार्य नहीं कर रहे होते हैं, वे धर्म के नाम पर अपना धंधा कर रहे होते हैं। ऐसे लोगों का संग करेंगे तो क्या होगा? हमारी श्रद्धा का नाश हो जाएगा! तो हमें ऐसे लोगों से संग नहीं करना है।
भक्तों के संग में भी अगर आते हैं हम, तो भक्त अलग-अलग श्रेणी पर होते हैं। तो कुछ भक्त ऐसे होते हैं, वे कैसे इनएक्सपर्ट (inexpert / अदक्ष) दलाल के समान हैं। तो उनका हम ज्यादा संग करेंगे तो क्या होगा? हमारी भक्ति… जो भक्त ज्यादा गंभीर नहीं है भक्ति में, जो ऐसे ढीली भक्ति करते हैं… अभी उनको जज (judge) नहीं करना है कि वे ढीली भक्ति क्यों कर रहे हैं। वह उनकी परिस्थिति हो सकती है, उनकी मनःस्थिति हो सकती है, जो भी है। पर अगर हम उनका संग करते रहेंगे, तो हमारी भक्ति ढीली रहेगी!
अगर हमारी परिस्थिति, मनःस्थिति ऐसी है कि हम वैसे ही भक्ति कर सकते हैं, तो उतने स्तर पर भक्ति करना अच्छा है बिना भक्ति न करने के। पर हमें समझना है कि जैसे मैं अगर स्टॉक एक्सचेंज में आ रहा हूँ तो मुझे मेरा पैसा बढ़ाना है, तो वैसे मैं मंदिर में आ रहा हूँ, भक्तों के संग में आ रहा हूँ, तो मुझे मेरे भक्ति का स्टॉक बढ़ाना है, और मेरे भक्ति का स्टॉक बढ़ाना यह मेरी जिम्मेदारी है!
तो कौन-से भक्तों के संग के द्वारा मुझे प्रेरणा मिलती है, कौन-से भक्तों के संग के द्वारा मेरी आध्यात्मिक इच्छाएँ बढ़ती हैं, कौन-से भक्तों के संग के द्वारा मुझे और श्रवण करने की, और विग्रहों की सेवा करने की, और प्रचार करने की, और ग्रंथों के वितरण करने की और अलग-अलग प्रकार की सेवा करने की प्रेरणा मिलती है—तो उन भक्तों का संग मुझे प्रधान रूप से लेना है!
तो दूसरे भक्तों का संग नहीं लेना है, ऐसे नहीं कि उनका अनादर करना है। पर हमें हमारा उद्देश्य क्या है, यह स्पष्ट रखना है। अगर हम उद्देश्य भूल जाते हैं, तो भक्तों के संग में भी हम गुमराह हो सकते हैं। क्योंकि क्या गुमराह हो जाएँगे?—”अरे! यह भक्त ऐसे कर रहा है, वह भक्त ऐसे कर रहा है, वह भक्त ऐसे कर रहा है, तो मैं भी ऐसे ही कुछ नहीं करता रहूँगा…” नहीं! हमारी आध्यात्मिक प्रवृत्ति यह हमारी जिम्मेदारी है, और भक्तों का संग मतलब क्या है? आध्यात्मिक इच्छाओं की जाग्रति होना!
तो अभी हमें आध्यात्मिक रुचि हो या न हो… नहीं, ऐसा नहीं है। हम सबको थोड़ी-बहुत आध्यात्मिक रुचि ज़रूर है, इसीलिए हम मंदिर में आ रहे हैं, भक्तों का, भक्ति की विधि का पालन कर रहे हैं। पर हम कभी… आध्यात्मिक रुचि में काम आ जाता है, क्रोध आ जाता है, लोभ आ जाता है, तो गुस्सा आ जाता है, तो हमको बुरा लगता है कि यह क्यों है? तो यह भी अच्छा है, हमको यह त्यागना है।
पर हमारा केंद्र क्या है कि इसको त्यागना या वह प्राप्त करना नहीं है, सबसे पहले क्या है? हमें आध्यात्मिक इच्छाओं की जाग्रति करना है! जितनी हमारी आध्यात्मिक इच्छाओं की जाग्रति होगी, उसके द्वारा अपने आप भौतिक जो आसक्तियाँ हैं, वे कम हो जाएँगी और आध्यात्मिक रुचि बढ़ जाएगी।
तो भगवान कहते हैं:
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥ (गीता १२.९)
वे कहते हैं—आप अभ्यास-योग का पालन करो। अभ्यास-योग मतलब क्या? वही भक्ति की विधि-विधान का पालन करो—भक्तों का संग करो, जप करो, कीर्तन करो, पूजा करो। इनके द्वारा क्या होना चाहिए? इसका फल यह होना चाहिए: मामिच्छाप्तुम्—आपको मेरी इच्छा, मुझे प्राप्त करने की इच्छा आपकी बढ़नी चाहिए!
तो जितना यह होगा, हमारी इच्छा भगवान को प्राप्त करने की बढ़ेगी, तो अपने आप जो भौतिक इच्छाएँ हैं, वे चली जाएँगी।
तो इसलिए हमें भक्तों का श्रवण करना, भक्तों का संग करना—सबका उद्देश्य यह है कि हमें हमारी भक्ति की वृद्धि करनी है, और उस भक्ति की वृद्धि मतलब हमारी आध्यात्मिक इच्छाएँ बढ़नी चाहिए!
२. अस्पताल का उदाहरण (Hospital Analogy)
दूसरा उदाहरण है अस्पताल का। जब हम अस्पताल में आते हैं, तो हमारा उद्देश्य क्या है कि मुझे मेरी बीमारी को ठीक करना है।
तो अभी अस्पताल में दूसरे लोग अलग-अलग प्रकार से बीमार हो सकते हैं। तो कभी-कभी ऐसा होता है कि… मैं एक बार पुणे में था, तो वहाँ एक जिंदल हॉस्पिटल में गया। तो मुझे थोड़ा मलेरिया था, उसके लिए हॉस्पिटल में गया। पर हॉस्पिटल में जब एडमिट हो गया, तो हॉस्पिटल में टीबी (TB) हो गया! तो मलेरिया तीन दिन में चला गया है, पर टीबी का ट्रीटमेंट नौ महीने लेना पड़ा उसके लिए! काफी एडवांस टीबी हो गया।
तो कभी-कभी अस्पताल में हम ठीक होने के लिए जाते हैं, पर अस्पताल में (दूसरा) बीमार हो सकते हैं! तो क्या है? अस्पताल में अलग-अलग लोग हैं। अस्पताल में अभी एक तरह से यह अस्पताल के अथॉरिटी की जिम्मेदारी है कि वे अस्पताल के एटमॉस्फेयर (atmosphere / वातावरण) को ऐसा रखें कि लोगों की बीमारी बढ़े नहीं। पर कभी-कभी क्या होता है, अस्पताल में भी कुछ जीवाणु/जंतु होते हैं और कभी बीमारी हो सकती है।
तो जब हम अस्पताल में आते हैं, तो हमें भी चौकन्ना रहना है कि मुझे किसी… अगर कोई व्यक्ति बीमार हो गया है, तो फिर उस व्यक्ति से अगर उसकी बीमारी संक्रामक है, तो हम उसका संग नहीं कर सकते हैं। तो मुझे जब टीबी हो गया था, तो फिर मैं लगभग नौ महीने मास्क लगा के बैठता था, क्योंकि जंतु सब बाहर न आएँ। तो एक भक्त आ के बोले—”अभी आप जैन साधु बन गए हो, मुँह पर पट्टी लगा दिया है!” पर क्या है, मुझे भक्तों के साथ ही संग करना है, पर वह ज़रूरी है उस समय क्योंकि हमको जंतु नहीं फैलाने हैं किसी में।
तो यह पॉइंट मैं बता रहा हूँ कि यह एक अस्पताल की जिम्मेदारी है, पर यह मरीज की भी जिम्मेदारी है कि “मैं जब अस्पताल में जा रहा हूँ, तो फिर मुझे दूसरी बीमारी नहीं आनी चाहिए, मैं यहाँ पर जा रहा हूँ ठीक होने के लिए!”
तो उस तरह से जो भक्ति की संस्था है, जो भक्तों का संग है—वह वास्तव में एक अस्पताल के समान है। और यहाँ पर हम आ रहे हैं ठीक होने के लिए, पर यहाँ पर भक्त अलग-अलग पृष्ठभूमि से आ रहे हैं, उनकी अपनी-अपनी कंडीशंस हैं, उनकी अपनी-अपनी बद्धता है, उनकी अपनी-अपनी कमियाँ हैं। तो कभी-कभी उनके संग से हमें वह कमियाँ हो जाती हैं।
तो कैसे नहीं होना है? हमें भक्ति में वृद्धि करनी है। तो अगर किस भक्त में कुछ अनर्थ भी है, तो एक तरह से वह संस्था की जिम्मेदारी है कि वह भक्त का ज्यादा प्रभाव दूसरे भक्तों के संग में न हो, जैसे अस्पताल की जिम्मेदारी है कि दूसरे लोग इन्फेक्ट (infect) न हों।
और उसके साथ-साथ यह व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि—”ठीक है, अगर इस भक्त के संग से मुझमें क्रोध बढ़ रहा है, इस भक्त के संग से मुझमें अहंकार बढ़ रहा है…”—तो ऐसा नहीं है कि हमें उस भक्त को बुरा कहना है! क्योंकि अगर कोई व्यक्ति बीमार है, बीमार है वह… तो जब कोई बीमार होता है, तो हम उसको बुरा नहीं बोलते हैं। पर हम उस व्यक्ति से थोड़ा डिस्टेंस (distance / दूरी) रखते हैं कि मुझे यह बीमारी न आए!
तो हमें हमेशा हमारी चेतना के बारे में सतर्क रहना है और देखना है कि भक्तों के संग से मेरी चेतना पर क्या प्रभाव हो रहा है। और हमारी चेतना की वृद्धि, उसकी प्रगति—यह हमारी जिम्मेदारी है!
संस्था के स्तर पर मैनेजमेंट की यह जिम्मेदारी है कि अगर कोई बहुत क्रोधी भक्त है, बहुत अहंकारी है, कोई भक्त बहुत कुछ अनर्थों से प्रभावित है, तो फिर उनको ज्यादा कुछ बड़ा इन्फ्लुएंशियल पोजीशन (influential positions) मूवमेंट में नहीं देना चाहिए ताकि वे दूसरों को प्रभावित कर सकें। पर उसके साथ-साथ यह हमारी भी जिम्मेदारी है!
और जब हम इस तरह से खुद की जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं कि “मेरी प्रगति यह मेरी जिम्मेदारी है, और मैं भक्तों के संग में आ रहा हूँ कि मेरी भक्ति की वृद्धि हो, और मेरी भक्ति की वृद्धि के लिए जो होगा वह मैं करूँगा…”—तो जिन भक्तों के संग से मुझे प्रेरणा मिलती है, उन भक्तों का संग मैं अधिक करूँगा। जिस सेवा करने में मुझे रुचि मिलती है, वह सेवा मैं ज़रूर करूँगा।
अभी क्या है कि संस्था में भी ऐसा होता है—”मैं मंदिर में आऊँगा… यह गलत क्या है? यह गलत हो रहा है, यह गलत हो रहा है, दुनिया में बहुत गलत हो रहा है!” कलियुग में उनको लगता है कि मैं दूसरा जो गलत हो रहा है वह देखने में… “देखो, मैंने गलती देखा!” लगता है कि गलती देखना यह बुद्धिमत्ता का लक्षण है, बाकी कोई लोग गलती नहीं देख रहे हैं, मैं देख रहा हूँ!
बट (But) कलियुग जो है, वह दोषों का सागर है! तो कलियुग में दोष देखने के लिए उतनी ही बुद्धि लगती है जितना कि सागर में पानी देखने के लिए! सागर में चारों ओर पानी ही है! तो हाँ, दोष ज़रूर हैं और दोषों को ठीक करना है। पर अगर कुछ नहीं कर सकते ठीक करने के लिए, तो ठीक है, नहीं तो फिर मुझे जो सेवा में प्रेरणा है, मैं वह सेवा करूँगा। और कम से कम उस क्षेत्र में मैं कुछ ठीक करते रहूँगा, बाकी क्षेत्रों में दूसरे लोग जाकर ठीक करते हैं।
तो अगर हमारा उद्देश्य हम स्पष्ट रखते हैं—”मैं यहाँ पर आध्यात्मिक प्रगति करने के लिए आ रहा हूँ”—तो फिर जो भी चीज़ें आएँगी हमारे जीवन में, भक्तों के संग में भी हो, उससे हम विचलित नहीं हो जाएँगे, उससे हम पदभ्रष्ट नहीं हो जाएँगे। हम समझेंगे कि यह मेरे भक्ति के लिए अनुकूल नहीं है, तो मैं इसको बाजू में रखूँगा; और मैं आगे प्रगति करते रहूँगा जो मेरे प्रगति के लिए अनुकूल है, मैं वह स्वीकार करूँगा और आगे बढ़ूँगा!
और इस भाव से जब हम… और दूसरों को भी हमें प्रेरणा देनी है, दूसरों को भी… पर हमारी क्षमता के अनुसार हम कर सकते हैं। जब हम खुद की यह जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं, तो फिर हम देखेंगे कि भक्तों का संग बहुत अनुकूल है। सब तरह से अनुकूल है, ऐसे नहीं है, पर भक्ति के लिए भक्तों का संग बहुत अनुकूल है!
गुरुभाइयों का संग एवं सेवा भाव
प्रभुपाद जी… मैं एक प्रसंग के साथ यहाँ अंत करता हूँ। प्रभुपाद जी जब एक बार अमेरिका में थे, तो उनके एक शिष्य मिलने आए। प्रभुपाद जी से बोले—”बाकी भक्त जो मंदिर में हैं, इतना परेशान करते हैं मुझे, इतनी समस्या हो रही है, मैं क्या करूँ?”
प्रभुपाद जी बोले कि—”ये गुरुभाइयों में हमें… गुरुभाइयों में… गुरुभाइयों में हमें सहते रहना पड़ता है। मेरे गुरुभाइयों ने मुझे बहुत परेशान किया!”
ऐसा जवाब तो उनको बिल्कुल अपेक्षा नहीं थी! तो प्रभुपाद जी बोले—”जब आपके लिए अच्छा करते हैं, आपके लिए… आपके लिए अच्छा करते हैं…” मतलब दूसरे भक्त आपके साथ कैसे भी व्यवहार कर रहे हों, क्योंकि हमारी सेवा में हमको एक आश्रय मिल जाएगा, हमारी सेवा में हमको रुचि मिल जाएगी, हमारी सेवा से हमारी प्रगति होती रहेगी।
तो चली जाएगी। भक्तों के संग में भी हमें क्या देखना है? कई भक्त ऐसे होते हैं जो स्नेहपूर्वक, आदरपूर्वक, अच्छी तरह से बातचीत करते हैं, कुछ नहीं करते हैं। पर हम यहाँ पर आए किसलिए हैं? कि हमें आध्यात्मिक प्रगति करनी है! हमारी कृष्ण भगवान से, हमारे गुरुदेव से जो संबंध है सेवा का, उसके द्वारा हमें आध्यात्मिक प्रगति होने वाली है।
तो प्रपन्नापालक तुरंत सत्य हैं… तो यहाँ बताया गया है कि जो शरणागत होते हैं, उनका भगवान संरक्षण करते हैं। तो शरणागत होना मतलब क्या? यह नहीं है, ज़रूरी नहीं है कि हमारे पास अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण होना चाहिए… नहीं! हमारी जितनी क्षमता है, उस हद तक हम सेवा करते रहें, उस हद तक हम शरणागत रहें, और धीरे-धीरे वह क्षमता बढ़ती जाएगी।
तो हमारी शुरुआत कहाँ से होती है? शुरुआत आध्यात्मिक रुचि से नहीं होती है, शुरुआत भौतिक अनासक्ति से नहीं होती है, शुरुआत यह सेवा-भाव से होती है! हम सेवा-भाव से थोड़ी-सी सेवा करने लगते हैं, उससे थोड़ी आध्यात्मिक रुचि आने लगती है, उससे थोड़ी भौतिक अनासक्ति आने लगती है, फिर और सेवा करते हैं और वह बढ़ता जाता है।
तो कोई भी यह नहीं कह सकता है कि “मैं कुछ भी सेवा नहीं कर सकता हूँ।” मंदिर में आए, प्रसाद तो ग्रहण कर सकते हैं, वह भी एक सेवा है! ऑफकोर्स (Of course) वह इकलौती सेवा नहीं है, हमें और भी सेवा करनी है। पर हम सेवा ज़रूर कर सकते हैं।
तो अगर हम सेवा करते रहेंगे, तो जो भौतिक प्रलोभन है, भौतिक रुचि है, वह चली जाएगी; आध्यात्मिक रुचि धीरे-धीरे जाग्रत हो जाएगी। और फिर उस तरह से हमारी सेवा में ही हमें संतुष्टि मिलेगी—सुसुखं कर्तुमव्ययम्। जो भक्ति बड़ी सुखमयी है, वह जितना हमारी चेतना सेवा में हम आसक्त कर देंगे, उतना हम भक्ति कैसे सुखमयी है, वह अनुभव कर सकते हैं।
बहुत-बहुत धन्यवाद! हरे कृष्णा!
प्रश्नोत्तर सत्र (Q&A)
प्रश्न: “क्या भगवान आत्मा को काट या विभाजित कर सकते हैं?”
चेतन्याचरण प्रभु:
आत्मा भगवान का अंश है। भगवद्गीता में आता है कि आत्मा को काटा नहीं जा सकता—अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयम्। तो क्या भगवान आत्मा को काट सकते हैं? क्या भगवान के लिए कुछ भी संभव है?
भगवान कुछ भी कर सकते हैं, पर भगवान अपने बनाए नियमों का बिना कारण उल्लंघन नहीं करते हैं।
पर इसके साथ-साथ हमारे गौड़ीय आचार्यादि बताते हैं कि जैसे चैतन्य महाप्रभु के कई पार्षद हैं, वे गौरांग-लीला में भी हैं और कृष्ण-लीला में भी हैं। वह एक ही पार्षद गौरांग-लीला में भी पहुँच जाते हैं। तो अगर कोई मुक्त हो जाता है, तो भगवान की इच्छा से वह शाश्वत काल में दोनों लीलाओं में एक साथ सहभागी हो सकता है! इस तरह से मतलब एक ही आत्मा दो लीलाओं में आ सकती है। तो मतलब उस तरह से हम कह सकते हैं कि काया-व्यूह (रूपांतरण) हो सकता है। पर यह भौतिक विभाजन नहीं है। अगर कोई लीला के लिए ऐसा करना ज़रूरी है, तो भगवान कर सकते हैं। पर स्वाभाविक रूप से भगवान ऐसा नहीं करते हैं। उनमें क्षमता नहीं है ऐसा नहीं है, पर भगवान ने जो योजना बनाई है, उसका उल्लंघन करने का कोई कारण नहीं है।
बहुत-बहुत धन्यवाद!
श्री गौर पूर्णिमा महोत्सव की जय! श्रील प्रभुपाद की जय!
गौर-भक्तवृंद की जय! निताई-गौर प्रेमानंदे हरि-हरि बोल!