The mind is like a madhouse – 4 strategies for managing it – Hindi
[Bhagavatam class on Srimad-Bhagavatam on 11.23.46 at ISKCON, Nasik, India]
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Lecture Summary
1. व्यवहार को निर्धारित करने वाले 5 तत्व: कठिन परिस्थितियों में व्यक्ति कैसा बर्ताव करता है (क्रोध, हताशा, या शांति), यह मुख्य रूप से पाँच बातों पर निर्भर करता है:
- पूर्व जन्म के संस्कार
- बचपन की परवरिश
- लोगों की संगति (वातावरण)
- हमारी स्वेच्छा (Free Will)
- भगवान की कृपा
2. मन को सँभालने के 5 मनोवैज्ञानिक सिद्धांत: वक्ता ने मानसिक रुग्णालयों (Mental Hospitals) के उदाहरण से मन को सँभालने के पाँच उपाय बताए हैं:
- शांत करना (Pacifying): विचलित या क्रोधित मन को तुरंत शांत करने के लिए बुद्धि का प्रयोग करना।
- ठीक करना (Healing): केवल शांत करना काफी नहीं है; भक्ति रूपी औषधि से मन के विकारों (बीमारी) को जड़ से खत्म करना ज़रूरी है।
- नियंत्रण में रखना (Restraining): अपनी कमज़ोरियों को पहचानना और खुद को ऐसी परिस्थितियों से दूर रखना (जैसे शराबी का शराब की दुकान से दूर रहना) जहाँ विकार उत्पन्न हो सकते हैं।
- समझ और सहानुभूति (Understanding & Empathy): दूसरों की स्थिति को समझना, उन्हें बिना ‘जज’ (Judge) किए सुनना और मानसिक सांत्वना देना।
- सराहना (Appreciating): सुधार के छोटे-छोटे कदमों की भी सराहना करना, क्योंकि इससे व्यक्ति को आत्म-परिवर्तन की प्रेरणा मिलती है।
3. भक्ति में ‘जजमेंटल’ (Judgmental) होने से बचाव: कई बार लोग भक्ति का उपयोग दूसरों में दोष निकालने या खुद को श्रेष्ठ साबित करने के लिए करने लगते हैं। यह एक बहुत बड़ा अनर्थ है। भक्ति का वास्तविक उद्देश्य दुनिया को दिखाना नहीं, बल्कि अपने अंतर्मन की अशुद्धियों को दूर करना है।
4. आत्मग्लानि और सुधार की ठोस योजना: अगर कोई गलती हो जाए, तो सिर्फ ग्लानि (Guilt) में डूब जाना पर्याप्त नहीं है। अपनी ज़िम्मेदारी स्वीकार करना और भविष्य में उस गलती को न दोहराने का एक ठोस प्लान (Tangible Plan) बनाना ही वास्तविक प्रगति है।
Full Transcriptions
मन का नियंत्रण और धार्मिक कार्य
हरे कृष्णा! “आराधितो यदि हरिस्तपसा ततः किम्। नाराधितो यदि हरिस्तपसा ततः किम्।”
तो इस तरह से हमें बताया जा रहा है कि अगर मन नियंत्रण में है, तो फिर दान आदि धार्मिक कार्य करने की ज़रूरत क्या है? और अगर मन नियंत्रण में नहीं है, तो फिर दान आदि कार्य करने का फायदा क्या है? मैंने भी जैसे कृष्ण जन्म पर बताया, तीन महीने और दो महीने मैं अमेरिका में था, ऑस्ट्रेलिया में था। तो अमेरिका में एक जगह मैं गया, एक सीरीज़ ऑफ़ टॉक्स (Series of talks) के लिए, मेंटल हेल्थ केयर सेंटर (Mental Health Care Center)।
मेंटल हेल्थ केयर सेंटर, यह ब्लंट (blunt) मतलब… कैसे है? कई बार शब्द आजकल के समाज में इस तरह से इस्तेमाल करते हैं कि जो सत्य है उसको थोड़ा छिपाया जाए, उसको उतने स्पष्ट रूप से बताया नहीं जाए।
शब्दों का प्रभाव और उनका संदर्भ
तो कई ऐसे विधान हैं कि हम जो शब्द इस्तेमाल करते हैं उनका उद्देश्य यह होता है कि कुछ शब्द ऐसे होते हैं जिनको इंग्लिश में ‘यूफेमिज़्म’ (Euphemism) कहते हैं। जो कठोर शब्द हैं, उनको मधुर शब्दों में बताना। तो वास्तव में जहाँ पर मैं गया था, शब्दों के द्वारा हमारे मन में कुछ धारणाएँ आती हैं। और हर व्यक्ति के मन में उस शब्द के द्वारा क्या धारणाएँ आएँगी, वो अलग-अलग होता है। जो भाषा के तत्वज्ञानी होते हैं, फिलोसोफर्स ऑफ़ लैंग्वेज (Philosophers of language), उनमें तर्क होता है कि शब्दों के अर्थ कहाँ होते हैं? लोगों के मनों में होते हैं या शब्दों में होते हैं?
मतलब कि अगर हम शब्दों के अर्थ देखें, तो एक ही शब्द का अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग अर्थ हो सकता है। और जो संस्कृति है, जो मानसिकता है, उसके अनुसार शब्द का अर्थ अलग-अलग हो सकता है। मैं लंदन में एक जगह पर प्रवचन दे रहा था। उसके बाद वहाँ कॉलेज प्रोग्राम था और उसके बाद एक भक्त आए जिसने वो प्रोग्राम ऑर्गेनाइज़ किया था, और बड़ी खुशी से बोले— “तूने मार डाला!”
किसको मारा मैंने? मैंने बोला, मैं तो प्रवचन दे रहा था, किसको मच्छी को मार डाला या क्या किया मैंने? और इतना खुशी से बोल रहे थे ‘मार डाला!’ तो खुशी क्या है उसमें? यह वास्तव में इंग्लैंड में इसका अर्थ होता है कि बहुत अच्छा काम किया तुमने। वहाँ पर जब लोग हंटिंग (hunting) के लिए जाते थे, तो कोई शिकार करना होता है, तो अगर शिकार निशाने पे, आपकी गोली या तीर लग गया, तो वो अच्छी बात है। आपका तीर अच्छा लग गया… “पागल खाना” कोई बोलते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य देखभाल (Mental Healthcare) की आवश्यकता किसे है?
WHO Requires Mental Healthcare? A Person whose responses to difficult situations become dangerous is a person who requires mental health care.
क्या उनके रियेक्ट (react) करने की सिचुएशन है? साधारण स्थिति में सब साधारण कार्य करेंगे। जब जीवन में कुछ परेशानी आती है और समस्याओं का सामना करते समय कोई खतरनाक कार्य करने लगता है। सबको गुस्सा आता है। पर जब गुस्सा आता है तो गुस्से में लोग क्या करते हैं? कुछ लोग अकेले में बैठ जाते हैं और कुछ लोग शांत करने के लिए बहस करते हैं। कुछ लोग बॉक्सिंग का ग्लव्स लेते हैं और कुछ लोग पीटते रहते हैं। कुछ लोग नेचर (nature) में चले जाते हैं और वॉक्स (walks) पर चले जाते हैं।
कुछ लोग किसी पर चीखते हैं और कुछ लोग शारीरिक रूप से आक्रमण करते हैं। कुछ लोग किसी का वध भी कर सकते हैं। कुछ लोग तो यहाँ गन लेके सौ लोगों को मार डालेंगे। तो अभी क्रोध जो है, ये एक ही भाव है, सब में क्रोध आता है, पर क्रोध को व्यक्त कैसे कोई करता है? तो अभी अगर वो परिभाषा देखेंगे तो दुनिया में बहुत से लोगों को मेंटल हेल्थ केयर की ज़रूरत हो जाएगी। तो अभी इसमें बताया कि सबको क्रोध आता है, पर क्रोध में व्यक्ति कहाँ तक जाएगा? कोई व्यक्ति क्रोध में आएगा दूसरे पर थप्पड़ मारेगा, दूसरा व्यक्ति चाकू निकाल के चाकू मार देगा। तो अभी ये क्या… What determines this?
हमारे व्यवहार को निर्धारित करने वाले पाँच तत्व
तो वास्तव में ये हमारे पूर्व संस्कारों से फैसला होता है। जिस प्रकार का हमने बचपन जिया है, जिस प्रकार के संग में हम रहे हैं। हमारा जो बर्ताव होता है, वो पाँच चीज़ों के द्वारा निर्धारित होता है:
- पूर्व जन्म के संस्कार: पूर्व जन्म की जो छवियाँ हमारे मन में आई हैं, उसके द्वारा। तो कुछ बच्चे जो होते हैं, सब बच्चे बचपन में रोते हैं, पर कुछ बच्चे इस तरह से रोते हैं कि वो सब कुछ छोड़के, ‘जो मुझे चाहिए आपको देना ही पड़ेगा’। मुझे अपने माता-पिता के लिए क्यों करना है? मैं घर का मालिक कब बनने वाला हूँ? तब से ही सोचते होते हैं। तो क्या होता है कि बचपन से ही दो जुड़वा भी क्यों न हों, दोनों का जो व्यक्तित्व है, अलग-अलग होता है। क्यों? वो दो अलग-अलग आत्मा हैं और उनके पूर्व जन्म के अनुसार जो संस्कार हैं, अलग-अलग पद्धति से आए हुए हैं।
- हमारी परवरिश: जिस तरह से हमें बचपन में बड़ा किया गया है। तो अगर कोई बच्चे हैं जिन्होंने बचपन से ही घर में देखा है कि घर में लोग शराब पीते हैं, तो शराब पीना नॉर्मल (normal) हो जाएगा उनके लिए। तो फिर किसी को गुस्सा आ गया, किसी को दुख हो गया, तो चलो शराब पी लो। खुशी हो गई तो भी शराब पी लो। तो फिर वो नॉर्मल हो जाएगा उनके लिए।
- हमारा संग: जो बाद में जब हम कॉलेज में जाते हैं, हॉस्टल में जाते हैं, नौकरी पे लगते हैं, तो फिर किस प्रकार के लोगों में क्या स्वाभाविक है, क्या लोग नॉर्मल समझते हैं। तो भले हम वो करें या ना करें, पर वह जो है, वह एक्सेप्टेबल (acceptable) लगता है। हाँ ठीक है, यह कुछ बुरी बात नहीं है।
- हमारी स्वेच्छा (Free Will): अब ये तीनों जो चीज़ें हैं, यह हमें पुश (push) करते हैं, यह हमें एक दूसरी दिशा में धकेलते हैं। पर हम काउंटर पुश (counter push) कर सकते हैं, हम वापस से उसका प्रतिकार कर सकते हैं।
- भगवान की कृपा: भगवान की कृपा के द्वारा इन तीनों शक्तियों के प्रभाव को हम कम कर सकते हैं, उसका प्रतिकार कर सकते हैं।
पागलपन बनाम मानसिक अस्थिरता
तो जो मैं बता रहा था अभी कि अलग-अलग वो गुस्सा आता है। किसी व्यक्ति को गुस्सा आता है तो वो चिल्लाता है, कोई थप्पड़ मारता है और कोई मशीन गन निकाल के सौ लोगों को मार देता है। तो फिर यह भेद क्यों है? यह भेद इन्हीं चीज़ों से है कि किस प्रकार के संस्कार पहले से आए हैं, किस प्रकार की परवरिश हुई है, और किस प्रकार के संग में व्यक्ति रहा है।
तो अभी हम सब एक तरह से… हम कह सकते हैं कि हम पागल नहीं हैं। पागल एक शब्द बहुत… इसका कोई यूफेमिज़्म नहीं… पर पागल, इंग्लिश में मैड (mad) एक शब्द आता है। पर वो जो है, बहुत पागल नहीं, पागल का दूसरा ही अर्थ अलग होता है। हम सब मानसिक तरह से अस्थिर हैं, हम पागल नहीं हैं, पर हमारा मन एक मानसिक रुग्णालयों (अस्पताल) के समान है। तो अभी जब मैं वहाँ अस्पताल में था, तो मैं उन डॉक्टरों से बात कर रहा था कि किस तरह से वो पेशेंट्स को ट्रीट (treat patients) करते हैं, हील (heal) करते हैं, कैसे ठीक करते हैं। तो उस पर मैं विचार कर रहा था। वास्तव में वही चीज़ें हम हमारे मन को मैनेज (manage) करने के लिए, मन को सँभालने के लिए भी इस्तेमाल कर सकते हैं।
मन को सँभालने के पाँच सिद्धांत (5 Principles)
तो ब्रॉडली (broadly) पाँच प्रिंसिपल्स (principles) हैं, उस पे मेरा एक क्लास होगा आज। सबसे पहले है पैसिफाइंग (Pacifying)। I will explain pacifying, healing, restraining, alerting and empathizing.
पैसिफाइंग (Pacifying): मतलब, जैसे बता रहा था कि ये लोग पागल हों, जो इस प्रकार के मन के विकारों से रुग्ण होते हैं (I think रुग्ण is better than पागल)। तो फिर वो लोगों को कभी-कभी… हम कहें कि इनको ऐसे ही झटका आ जाता है। कभी क्रोध आ जाता है, कभी-कभी मायूसी आ जाती है। जब कुछ दुखी हो जाना है, डिप्रेशन (depression) हो जाता है। जो लोग आत्महत्या भी करते हैं, ऐसा नहीं है कि वो कोई अलग ही प्रकृति के लोग हैं। हम जैसे ही लोग होते हैं। पर वहाँ सबको कोई समस्या आती है, उद्विग्न हो जाते हैं, हताश हो जाते हैं। हम बहुत प्रयास करते हैं, कुछ यश प्राप्त करने का प्रयास करते हैं, और वह नहीं होता है, तो फिर हम सब हताश हो जाते हैं।
हमको लगता है क्या करूँ मैं, कुछ होता ही नहीं मुझसे जीवन में। तो यह हताश हो जाना तो स्वाभाविक है। पर जब हताश हो जाते हैं, तो अब हम क्या करते हैं? ‘मुझे कुछ समय के लिए अकेले रहना है, या मुझे सब कुछ भूल जाना है, कहीं और मैं घर से दूर चला जाऊँगा, कहीं वहाँ कुछ समय पर रहूँगा।’ या कुछ लोग बोले कि ‘मुझे ज़िन्दगी त्याग देनी है’।
सामाजिक प्रभाव और प्रतिस्पर्धा का खतरा
एक पेसिफिक ओशन (Pacific Ocean) में एक द्वीप है, जहाँ पे ‘सुसाइड बिकेम फैशनेबल’ (suicide became fashionable)। वहाँ पर आत्महत्या फैशनेबल हो गई थी। और जब फैशनेबल हो गई, तो एक समय 1980 to 1995, उस समय में, उस द्वीप के लगभग 45% यूथ्स (youths) ने आत्महत्या कर ली। क्या हुआ था वहाँ पे? 1980s में लगभग एक ऐसा मूवी आया था, जिसमें एक बहुत बुद्धिमान युवक था, उसने आत्महत्या कर ली। उसका एंड (end) था आत्महत्या करना। तो उनको लग गया, अरे यह तो बहुत अच्छी बात है।
तो क्या हो गया तभी, मन इतना विचलित है, मतलब विकार हो जाता है कभी-कभी। तो जो ये यूथ आत्महत्या कर रहे थे, उनमें इसमें स्पर्धा होती थी, और रोचक पद्धति से आत्महत्या कैसे की जाए। तो तभी वो रेलगाड़ी के नीचे लेट जाना आत्महत्या करने की एक पद्धति बन गई। तो उसके पहले लोग प्रैक्टिस करते थे कि मेरे हाथ-पैर कैसे कटना चाहिए जब रेल जाएगी। यह तो पागलपन ही है, पर क्या हो गया? उस संस्कृति में, उस परिस्थिति में, वो स्वाभाविक बन गया। आपको कुछ एक्स्ट्राऑर्डिनरी (extraordinary) करना चाहिए, पर आपका एक्स्ट्राऑर्डिनरी का डेफिनेशन क्या होना चाहिए? यह हम हमारे जीवन में साधारण क्या है, उसकी तुलना में देखते हैं।
तो अगर कोई ऐसी संस्कृति में है जहाँ सब लोग दान देते हैं, तो असाधारण कुछ करना है तो मतलब बहुत दान दो, यह सत्कार्य में लगता है। कोई संस्कृति में है कि कॉलेज में जाते हैं, कभी लोग कम्पटीशन (competition) करते हैं। सबसे ज़्यादा लिम्का, सबसे ज़्यादा थम्स-अप कौन पिएगा? सबसे ज़्यादा शराब कौन पिएगा? मैं मेलबर्न में था, तभी एक डॉक्टर मुझे मिले थे। वो हॉस्पिटल में काम करते थे। तो वो एक विद्यार्थी युवक था, उसने इतने पकोड़े खा लिए थे कि उसका गला बंद हो गया था और वो साँस नहीं ले पा रहा था। डॉक्टर बोले कि एक्चुअली मुझे तभी मुँह में डिवाइस डाल के गले से पकोड़े बाहर निकालने पड़े थे।
अभी ऐसा क्यों किया? क्योंकि उस कॉलेज में तभी ‘सबसे ज़्यादा पकोड़े कौन खा सकता है’, इसकी स्पर्धा हो गई थी और इसको बोला गया जीतना ही है। अलग-अलग लोगों की शरीर की क्षमता के अनुसार, पेट की मात्रा के अनुसार वो अलग-अलग चीज़ें खा सकते हैं। अभी यह लड़का बिल्कुल दुबला-पतला था तो उसके पेट की क्षमता उतनी ही थी। दूसरे विद्यार्थियों ने खा लिया, पचा लिया। यह खाते गया, खाते गया, बोला जीतना ही है। और क्या हो गया, खाते-खाते ही वो बेहोश हो गया। फिर उसको अस्पताल ले जाना पड़ा। तो क्या है, हमारी संस्कृति का, हमारे वातावरण का बहुत प्रभाव होता है हम पे।
हिंसा और इंटरनेट का दुरुपयोग (Implementation through Culture)
तो इसलिए जिस व्यक्ति को हम पागल कहते हैं, उनका पागलपन मतलब क्या है? ऐसे नहीं कि कुछ लोग हमेशा ही अलग दुनिया में रहते हैं। कुछ लोग साधारणतः नॉर्मल जीवन जीते हैं, पर जब ट्रिगर होते हैं तो उनकी प्रतिक्रिया बहुत ही हिंसात्मक हो जाती है। कभी-कभी हिंसा दूसरे लोगों की ओर हो जाती है, कभी-कभी खुद की ओर भी हो जाती है। खुद की ओर हिंसा करना मतलब आत्महत्या कर लेना। तो अगर किसी ने एक बार आत्महत्या का प्रयास किया है, तो पाश्चात्य देशों में उनको सुसाइड वॉच (suicide watch) पर रखते हैं। मतलब उनको ऐसे बताया जाता है कि तुम घर में अकेले नहीं रहोगे।
ऑफ़ कोर्स (Of course) भारत में अकेले रहना मुश्किल है क्योंकि घर बड़े नहीं होते हैं, बहुत से लोग एक घर में होते हैं। पर अमेरिका में, ऑस्ट्रेलिया में (ऑस्ट्रेलिया बहुत ही विशाल देश है, a big continent), वहाँ जगह की समस्या नहीं है। पर क्या है कि कई घरों में ऐसे नियम होता है कि घर के अंदर बेडरूम हो, बाथरूम हो, उसको लॉक नहीं होगा। बाहर के दरवाज़े को लॉक होता है, पर अंदर कोई डोर लॉक नहीं होता है। क्योंकि अगर किसी ने आत्महत्या कर ली, तो दरवाज़ा तोड़ के आने में समय चला जाएगा। तो समय बचाने के लिए ऐसा करते हैं।
साधारण समस्याएँ आती हैं, तो किस प्रकार की प्रतिक्रिया हम करते हैं वह हमारे पूर्वजन्म के संस्कार, हमारी परवरिश और हमारे वातावरण, इन तीनों चीज़ों से निर्धारित होती है। तो जब हमारे वातावरण में बहुत हिंसा होती है, बहुत अलग-अलग प्रकार के अनहेल्दी रिस्पॉन्स (unhealthy response) बताए जाते हैं, तो उस प्रकार की प्रतिक्रिया लोग करने लगते हैं।
जब मैं अमेरिका में था, तभी कैलिफोर्निया की ओर, लास वेगास में एक आदमी ने गन ले लिया और एक म्यूज़िक कॉन्सर्ट (music concert) चल रहा था और गोलियाँ मारने लग गया सबको। सौ से अधिक लोग मर गए। और अभी तक किसी को पता नहीं चला उसने क्यों मारी गोलियाँ। वो बहुत अच्छी तरह से प्लान किया था। व्यक्ति को गुस्सा क्यों ना आए, गुस्सा आने के बाद व्यक्ति क्या करता है? यह व्यक्ति के पूर्व संस्कार, परवरिश और वातावरण से जनित होता है। और आजकल का वातावरण हिंसा के लिए बहुत प्रेरित करता है।
गूगल (Google) में आप देखते हैं, तो लोग सर्च करते हैं। अगर “how to commit suicide” (आत्महत्या कैसे करें), अगर ये सर्च देखते हैं आप, तो 1970s, 1980s, 1990s की तुलना में 2010 और 2017 में इसका ग्राफ और बढ़ते जा रहा है। वैसे “how to murder” (मर्डर कैसे करें), यह भी बढ़ गया है। तो यहाँ क्या हो रहा है कि लोगों की कल्पना को उकसाने के लिए बहुत से साधन हैं। जो स्वाभाविक विकार हैं—क्रोध आना, मायूसी आना, ईर्ष्या होना या लोभ होना, यह सब मानवीय विकार हैं। पर इनको किस रूप से व्यक्ति प्रकट करता है, यह आजकल के समाज में काफी खतरनाक हो सकता है।
Both the imagination and the implementation is made easier by today’s culture. मैं क्या-क्या कर सकता हूँ, इसकी कल्पना लोग कर सकते हैं। और कल्पना करने के लिए इंटरनेट पर सर्च कर सकते हैं। मेरे एक मित्र हैं, उन्होंने एक डॉक्यूमेंट्री बनाई है कि एसिड अटैक जो होता है। कभी लड़का-लड़की में जमता नहीं है तो लड़का चेहरे पर एसिड डाल देता है। उन्होंने एक डॉक्यूमेंट्री बनाई है उस पर, “स्ट्रेंजर इन अ मिरर” (Stranger in a Mirror)। तो वह बता रहा था कि “how to do acid attacks”, यह लोग गूगल पर ढूँढते हैं। कल्पना करने के लिए सुविधा बहुत बढ़ गई है और उस पर अमल करने के लिए भी काफी सुविधाएँ मिल जाती हैं। तो इसलिए मन शत्रु के लिए कार्य करता है। अच्छे लोग अच्छा कार्य करेंगे, बुरे लोग बुरा करेंगे। पर जब अच्छे लोगों में बुरी इच्छाएँ आ जाती हैं तो इच्छा पे कार्य करना बहुत आसान हो गया है आजकल के समाज में।
मन को शांत और ठीक करना (Pacifying and Healing)
मैं बोला था कि मैं पाँच चीज़ें बताऊँगा कि किस तरह से ये मेंटल हॉस्पिटल (mental hospital) में लोगों को ट्रीट (treat) किया जाता है।
1. पैसिफाइंग (Pacifying): कि अगर किसी को झटका लग गया, किसी को क्रोध आ गया, किसी को मायूसी आ गई, तो जो डॉक्टर होते हैं, उनको प्रशिक्षण होता है कि व्यक्ति को शांत कैसे करें। ‘ठीक है, तुम विचलित तो हो गए हो, पर शांत कैसे करें?’ उसके लिए वास्तव में बुद्धि चाहिए। अगर क्षमता नहीं है, दक्षता नहीं है, तो व्यक्ति की छोटी सी समस्या काफी बड़ी हो सकती है। कैसे व्यक्ति को पैसिफाई (pacify) करना है? कभी उनसे मधुरता से बात कर लो। कभी उनको जाकर कोई दूसरी अच्छी चीज़ दे दो। कोई बोलता है कि किसी को डायबिटीज (diabetes) है, और “मुझे स्वीट चाहिए”। उसको स्वीट नहीं दे सकते, पर उसको सिर्फ ‘नहीं’ बोलेंगे तो वो हिंसक हो जाएगा। तो फिर शायद उसको कुछ और ऐसी मीठी चीज़ें दे सकते हैं जिसमें इतना शुगर (sugar) नहीं है।
2. हीलिंग (Healing): तो दूसरी चीज़ है हीलिंग। शांत करना एक चीज़ है, पर दूसरा है ठीक करना। वह ठीक करने के लिए काफी समय लगता है। जिस प्रकार की बीमारी है, उसके अनुसार व्यक्ति को ठीक करना होता है। तो जब हीलिंग करते हैं, तो उसमें अधिकांश रूप से लोगों को या तो कुछ दवाएँ दी जाती हैं, या फिर कुछ केमिकल (chemical) दिए जाते हैं, या फिर उनकी कुछ काउंसलिंग (counseling) की जाती है, जिससे कि वो शांत हो जाएँ।
तो हम जानते हैं भक्ति की विधि। कि हमारे लिए भक्ति एक अल्टीमेट (ultimate) दवाई है, जिससे कि मन का जो विकार है, वह निकल जाएगा हमारे मन से। पर भक्ति के द्वारा हमारे मन को परिवर्तित होने के लिए समय लगता है। आजकल के समाज में बहुत से लोगों का मन विचलित हो जाता है, तो वो ज़रूर मन को शांत करें, पर मन को केवल शांत ही नहीं करना है, ठीक करना है। शांत करने और ठीक करने में फर्क क्या है? एक है कि किसी को दर्द हो रहा है, उसको पेनकिलर (painkiller) दो, दर्द चला जाएगा, पर बीमारी ठीक नहीं हो रही उससे। हमको दर्द भी कम करना है, बीमारी भी ठीक करनी है। हम व्यक्ति को ठीक करने में बहुत ज़ोर देते हैं। हम जप कर रहे हैं, कीर्तन कर रहे हैं…
ये ज़रूरी है, पर मन को भी शांत करना है। हमारे मन को समझ सकें, हम अपने आप को समझा सकें, यह बहुत ज़रूरी है। किसी को संगीत में रुचि होगी, किसी को कुकिंग में रुचि होगी। यह भगवद भक्ति का मार्ग है। यह हमारे विनाश का मार्ग है। मन तो काफी खेल करता है। तो हमें विनाश के मार्ग में जाना है? मन का काफी खेल कहाँ के अकेले का मार्ग है! एक बात है कि आप उसे कैसे करें, इसका अन्वेषण हमें खुद करना है।
जप और मन की स्थिति
कभी-कभी भक्तिमय की विधियों से ही हो सकता है। किसी को कीर्तन बोलता है, कि कीर्तन में मन लगा लो, शांत हो जाएगा। श्लोकों का रिसाइटेशन (recitation) करो, या किसी से कुछ सत्संग सुनो। अब यह एक तरह से ट्रीटमेंट (treatment) भी है। पर हमें देखना है, तभी मन शांत हो रहा है। कभी-कभी हम जप करते हैं। हाँ, जप बाहर से कर रहे हैं, पर अंदर से मन चीख रहा है— “इसने ऐसे कैसे किया, क्यों किया उसने, ऐसे नहीं कहना चाहिए था उसको।” और हम जप कर रहे हैं, पर क्या हो रहा है? वो मन जप में बिल्कुल नहीं लग रहा है। यहाँ पर बाहर से, जिह्वा से जप चल रहा है। अंदर से मन चीख रहा है, चिल्ला रहा है।
और जप से मन शांत होना चाहिए। पर कभी-कभी मन इतना विचलित होता है कि जप का प्रभाव ग्रैजुअली (gradually) ज़रूर होगा, पर तभी हमको कभी राहत नहीं मिल सकती। तो कभी-कभी हम देखते हैं कि जप जो है, अगर हम सत्वगुण में नहीं हैं, जप अगर तभी हम करते हैं, तो हमको लगता है खत्म हो जाएगा। जितना हम सत्वगुण में होते हैं, तो जप का फायदा होता है। जप का फायदा हमेशा होता है, पर जप का फायदा हमें महसूस तब होता है जब हम सत्वगुण में हैं।
हरि नाम की ध्वनि हम ले रहे हैं, वो हमारे कानों, जिह्वा पे आ रही है, कानों में जा रही है, उससे हमारा शुद्धिकरण हो रहा है, पर वो धीरे-धीरे हो रहा है। तो कभी जब मन बहुत विचलित है, तो फिर मन को कुछ गहरी साँस ले के, या किसी से थोड़ी बात करके मन को शांत कर लेना, उसके बाद में अगर जप करते हैं, तो फिर पैसिफिकेशन एंड हीलिंग (pacification and healing), उसको शांत करना और उसको ठीक करना, कभी दोनों एक ही चीज़ से होगा, तो अच्छा है। पर नहीं होगा, तो हमें जो ज़रूरी है, वो करना कुछ है।
मन को नियंत्रण में रखना (Restraining)
फिर तीसरी चीज़ है, रिस्ट्रेनिंग (restraining)। रिस्ट्रेनिंग मतलब, कहीं ऐसे, अभी किसी रुग्ण को वहाँ पे, सुसाइड वॉच (suicide watch) पर लगा हुआ है, कि ये व्यक्ति ने आत्महत्या करने का प्रयास किया है, और आत्महत्या उसको नहीं करने देना है। तो फिर उनके कमरे में ऐसी कोई भी चीज़ नहीं रखते हैं, जिससे कि वो आत्महत्या कर सके। तो कभी-कभी लोग कपड़े लेके, कपड़े अपने गले में बाँध दें, तो फिर उनके रूम में कुछ चद्दर भी नहीं होता है। क्या होता है, वो उनके बिस्तर पे, जो ऐसे स्टिच्ड बेडशीट (stitched bedsheet) होता है, और उनका जो ये भी होता है, उनको बेडशीट होता है, एक होता है, ऊपर लेते हैं, तो ऊपर भी ऐसे होता है, कि उसको निकाल नहीं सकते हैं, उसको उसके अंदर घुसके उनको सोना पड़ता है।
तो क्या है, ये रिस्ट्रेनिंग, यह कई बार ज़रूरी होता है, क्योंकि वो व्यक्ति कुछ भी कर सकता है। वहाँ पर मैं एक डॉक्टर से मिला था, वो बता रहे थे, कि एक रुग्ण से वो बात कर रहे थे, और जब वो बात कर रहे थे, तो अभी उसको लगा था, वहाँ पर सिर्फ कंसल्टेशन के लिए आया था, उसके रिश्तेदारों ने उसको अच्छे से बताया नहीं था। कभी तो क्या होता है, सबसे बड़ी समस्या यह आती है, कि जब व्यक्ति मानसिक तरह से रुग्ण होता है, तो व्यक्ति मानता नहीं कि मैं बीमार हूँ।
तो भारत में इतना नहीं है, जैसे किसी व्यक्ति का शारीरिक हाथ फ्रैक्चर हो गया है, या कुछ ट्यूबरक्लोसिस (tuberculosis) हो गया है, तो अगर उसको अस्पताल में जाना पड़ेगा, तो ठीक है, हम उसको बीमार मान लेते हैं। पर किसी को मन के अस्पताल में जाना पड़ेगा, तो हम उसको डिसीज (disease) नहीं मानते हैं, उसको हम कैरेक्टर फ्लॉ (character flaw) बोलने लगते हैं। मतलब यह उस व्यक्ति में बीमारी नहीं है, यह व्यक्ति में कुछ कमी है। और उसके कारण एक तरह से उस व्यक्ति की बदनामी हो जाती है— “अरे यह व्यक्ति पागलखाने में गया था।” तो फिर क्या होता है उसके कारण, जो व्यक्ति को दवाई की ज़रूरत भी होती है, जाती नहीं है। तो यह जो रुग्ण था, उसको लगता है, तो क्या होता है, रिस्ट्रेनिंग बहुत ज़रूरत होता है।
तो अगर हमें पता है, कि हमें किस प्रकार की, हमारे मन के अनुसार, किस प्रकार के कार्यों में हम लगते हैं, किस प्रकार की हमारी कमज़ोरियाँ हैं, तो फिर उस दिशा में हमको रिस्ट्रेन करना चाहिए, खुद को रिस्ट्रेन करना चाहिए। रिस्ट्रेन करना मतलब, खुद को उस दिशा में कार्य करने के लिए मौका न देना। अगर कोई व्यक्ति शराबी है, और शराब से छूटने का प्रयास कर रहा है, तो फिर अगर मान लीजिए, उसका घर एक शराब की दुकान के ऊपर है, तो उसको शराब छोड़ना लगभग नामुमकिन हो जाएगा। क्या है, कभी भी इच्छा जाएगी, क्या है, चला जाएगा, नीचे ले लो। तो बाह्य रूप से परिवर्तन करना, यह लगभग हमेशा ज़रूरी होता है।
अंतरंग रूप से परिवर्तन करने के लिए, बाह्य रूप से परिवर्तन करना पर्याप्त नहीं है। अगर व्यक्ति को शराब पीना ही है, तो वो सौ मील दूर जाके, किसी दुकान में आके शराब भी ले सकता है। पर हम वो बात नहीं कर रहे हैं। हम यहाँ पर बात कर रहे हैं, कि हमारे मन में, अलग-अलग प्रकार की इच्छाएँ आती हैं। कुछ-कुछ इच्छाएँ होती हैं, उसको कहते हैं, circumstantial desires (परिस्थितिजन्य इच्छाएँ), और कुछ-कुछ होती हैं, कि they are central desires (केंद्रीय इच्छाएँ)। circumstantial desires मतलब, जो परिस्थिति से उत्पन्न हो जाती हैं, और कुछ-कुछ हमें बहुत अंतरंग हैं। तो इस परिस्थिति से आ गए, तो वो परिस्थिति को अगर टाल सकते हैं, या परिस्थिति में जाने से उत्पन्न हम खुद को बचा सकते हैं, तो फिर उससे फायदा यह होता है, कि हम, वो समस्या को हल कर सकते हैं।
परिस्थितिजन्य आत्म-नियंत्रण (Circumstantial Self-Control)
अभी किस तरह से खुद को restraining, हमारे परिस्थिति में restraining करना है, यह व्यक्ति-व्यक्ति के अनुसार फर्क हो सकता है, और हमें खुद को ढूँढना है, आत्म नियंत्रण करना। सबसे आसान कई बार ऐसे हो जाता है, कि वो आत्म नियंत्रण करने की ज़रूरत ही नहीं पड़े। मैं अमेरिका में था, गूगल (Google) में मैंने एक लेक्चर दिया था। तो वहाँ पर, गूगल में एक सर्वे हुआ था, उसके बारे मैं बता रहा था वहाँ पर।
क्या है कि सॉफ्टवेयर कंपनी में बहुत से लोगों को बैठे काम करना पड़ता है, तो बहुत से लोगों का वजन बढ़ जाता है, उससे समस्या हो जाएगी। तो उनका जो कैफेटेरिया (cafeteria) था वहाँ पर, जो कैंटीन था, वहाँ पर अलग-अलग बार चॉकलेट, कैंडी, स्वीट्स वहाँ पर होते थे। तो उन्होंने क्या किया उस एक्सपेरिमेंट में वहाँ पे, उन्होंने एक कुछ साइकोलॉजिस्ट के एडवाइस पे, सारे जो कैंडी के जो बॉक्स थे, उन सब को कवर कर दिया, और कवर कर दिया नॉन-ट्रांसपेरेंट कागज़ से (non-transparent paper)। मतलब उसके अंदर क्या है वो दिखेगा नहीं, अपारदर्शी कागज़।
तो उससे क्या हो गया, सिर्फ इतना करने से उन्होंने देखा कि लगभग 35% of sale of sugar candy decreased। क्या है मतलब लोग होटल में जाते हैं, ‘अच्छा यार ये चॉकलेट है ले लो’, पर चॉकलेट दिखता नहीं है, तो देखते नहीं है। तो अब ये इतना पर्याप्त नहीं है, पर ये कई बार आवश्यक है, तो रिस्ट्रेनिंग है, तो ये तीसरी चीज़ हो गई।
समझना और सहानुभूति (Understanding and Empathy)
चौथी चीज़ जो है, वह है कि अंडरस्टैंडिंग (Understanding), अंडरस्टैंडिंग मतलब कि एम्पैथी (Empathy)। जो ये लोगों को यहाँ, ‘तुम पागल हो’ बोलोगे, तो फिर क्या होता है, या तो वह खुद पर होता है, ‘मैं पागल हूँ, मैं कुछ कर ही नहीं सकता हूँ’। वो ऐसे नहीं है कि वो व्यक्ति, कोई व्यक्ति अगर पागलखाने में है, उसका मतलब वो बुरा नहीं है, अच्छे व्यक्ति हैं, पर बुरी परिस्थितियों में, उसके काम में कुछ बुरे कार्य हो गए हैं। तो हमें एक दूसरे को समझना बहुत ज़रूरी है।
तो जो डॉक्टर होते हैं, वहाँ पर बहुत बिज़ी होते हैं। डॉक्टर को इतने सारे पेशेंट को ट्रीट करना है, तो बिज़ी होते हैं। तो फिर ऐसे मेंटल हेल्थ केयर सेंटर में क्या करते हैं, वहाँ लोगों का कुछ ऐसा स्टाफ होता है, जिनका काम ही होता है पेशेंट से जाकर बात करने का। वहाँ पेशेंट के लिए करते हैं, कुछ नहीं, आपको क्या करना है, सेंटर से जाकर बात करना है। और वो लोग बात करते हैं, सुनना है, थोड़ा बोलना है, कुछ भी उस पे एडवाइस नहीं देना है। अगर माँगे तो आप उसको एडवाइस दे सकते हैं, पर सुनना है, समझना है उनको।
और कई बार लोग जब साइको थेरेपिस्ट (psychotherapist) के पास जाते हैं, पाश्चात्य देशों में, वो सिर्फ इसलिए जाते हैं कि कोई उनको सुने। मैं वहाँ पर एक व्यक्ति से मिला, हम काफी अच्छे मित्र हो गए थे, अमेरिका में। तो उनके घर में एक बहुत बड़ा कुत्ता था। तो मैंने उनको पूछा कि वो भी आध्यात्मिक विषयों में बहुत रुचि लेते हैं, आध्यात्मिक ज्ञान भी है उनको। मैंने बोला कि आपको, आपको कुत्ता पालने की ज़रूरत क्या है? तो उन्होंने जवाब दिया कि मैंने एक बहुत बड़ा कुत्ता पाला है…
अक्सर जब आप ड्राइव करते हैं तो हॉर्न कभी बजाने की ज़रूरत ही नहीं होती है। कि मैं लगभग कितने दस हज़ार मील मैं अभी ट्रैवल किया होगा कार में, तीन-चार महीनों में एक या दो बार ही मैंने हॉर्न सुना है। तो क्या है सब लोग देखते हैं अच्छा आपको जाना है आगे आप स्पीड जा रहे हैं सिग्नल दे दो मतलब हॉर्न से नहीं लाइट से सिग्नल होता है मुझे आगे जाना है आप जाओ आगे। इंडिया में तो ‘हॉर्न प्लीज’ लिखते हैं और people are very polite, कि एक तरह से polite हैं वो बहुत but they are not personal।
मतलब फर्क क्या है कि जब भी किसी से भी मिलेंगे रास्ते में भी अगर कोई इमिग्रेशन ऑफिसर (immigration officer) भी होगा, ‘how are you doing today’ कैसे हैं वो तुम आज, अभी उनको कुछ बोलने लगता है, ‘how are you’ लोग बोलते हैं और वो culture है, ‘हाँ, I am fine, I am doing well’। तो लोगों को एक दूसरों के लिए पहले समय नहीं है और उसके कारण जो अकेलापन होता है तो वो अकेलेपन में मन खा लेता है व्यक्ति को। When we are alone, we are alone with our mind. जब हम अकेले होते हैं हम अकेले नहीं हैं वास्तव में हमारे मन के साथ अकेले हैं। और फिर मन हमें बहुत परेशान करता है।
भक्ति में दृष्टिकोण और मूल्यांकन (Attitude in Bhakti)
तो इसलिए हमारे सबके जीवन में कोई ना कोई ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो हमें समझे, जिनको हम समझें। तो अगर एक भी ऐसे हो जाए कि मैं यहाँ पे हूँ, मैं यहाँ पे अकेला हूँ और सारी दुनिया मेरी दुश्मन है। और उसके कारण क्या होता है, जब ऐसे लगता है कि मैं अकेला हूँ सारी दुनिया मेरी दुश्मन है, तो फिर हम किसी से मदद भी मांगते नहीं हैं। और फिर हम मदद मांगते हैं, मदद भी देना चाहिए लोगों को।
कभी-कभी भक्ति में क्या होता है, हम भक्ति में आ जाते हैं तो हम भक्ति के प्रिंसिपल्स को लेके और जजमेंटल (judgmental) बन जाते हैं। और जजमेंटल बन जाते हैं यह मतलब है, “तुम्हें ऐसे नहीं करना चाहिए तुम ऐसे कर रहे हो तुम माया में गए हो तुम यह कर रहे हो तुम वो कर रहे हो।” नहीं, ऐसे नहीं है कि हम सब संघर्ष कर रहे हैं हमारी इंद्रियों से, हमारे मन से, और हमें एक दूसरे को जज नहीं करना है, हमें एक दूसरे को मदद करनी है।
जो दूसरा व्यक्ति कार्य करता है हम उसके लिए इवैल्यूएट (evaluate) करते हैं, हमें उसके लिए इवैल्यूएट करते हैं। नहीं, इवैल्यूएट करते हैं कि मेरे लिए इतना आसान है तुम्हारे लिए इतना मुश्किल क्यों है? मुझे भी वही समस्या है तुम इतना डर रहे हो मैं नहीं डर रहा हूँ। मुझे देखो तुम भी बड़े डरपोक हो। पर ऐसे नहीं है, मैं जिस स्तर पे हूँ वो उस स्तर पे अलग है शायद मुझे उतना डर नहीं लगता है जितना उनको डर लगता है। पर शायद मुझे क्रोध ज्यादा आता हो उनको क्रोध नहीं आता हो।
क्योंकि हमें कई बार हम जब compare करते हैं लोगों को तो क्या करते हैं we compare their weakness with our strength कि मैं इसमें इतना अच्छा हूँ तुमको इतना मुश्किल क्यों होता है। पर we need to compare their weakness with our weakness जो हमारी कमजोरी है वो कमजोरी को हमें पार जाने में कितनी मेहनत लगती है, आसान नहीं है हमारे लिए। तो उससे अगर हम तुलना करते हैं तो कहा है हाँ अगर इस स्तर पे, इस स्तर पे आया हो तो वो भी प्रगति है।
सराहना और प्रेरणा (Appreciation and Inspiration)
और जो मानसिक समस्याएँ होती हैं उसमें दवाई से व्यक्ति ठीक नहीं होता है, क्योंकि दवाई ज़रूरी हो सकती है कुछ-कुछ परिस्थितियों में, पर वास्तव में वो एक मानसिकता का भाव है और उसमें अगर व्यक्ति को appreciation मिलता है, ‘आज इतना क्या अच्छा किया इस परिस्थिति में’। कोई व्यक्ति ने शराब पीना छोड़ दिया था, शराब छोड़ने का फैसला किया है। पर कुछ परिस्थितियाँ ऐसी आती हैं शराब पी लेता है वो, फिर बाद में ‘नहीं, मुझे नहीं पीना चाहिए था’ वो आ जाता है बाहर। मैंने शराब पिया।
पहले वो उस समय क्या दस गिलास शराब पी लेता था, अभी आधा गिलास शराब पीता है। और फिर उसके अंदर भी झगड़ा चलता है, नहीं मुझे नहीं पीना है, पीना है तो आधा गिलास शराब पीता है फिर नहीं, नहीं, पर नहीं, उसके उस संघर्ष स्तर पे वो पूरा गिलास पी सकता था, कई गिलास पी सकता था, उसने आधा गिलास पी के छोड़ दिया है और आ गया है वापस। तो उतना जो उसने किया है उसकी सराहना करनी चाहिए। तो जब उस व्यक्ति के स्तर से हम तुलना करते हैं तो फिर उस सराहना से उसको प्रेरणा मिलती है और फिर वो धीरे-धीरे प्रगति करता है।
तो जब हम भक्ति कर रहे हैं तो भक्ति करते समय भक्ति के कार्यों से हमें परिवर्तन होने वाला है पर हमारे जो भक्ति के बारे में एटीट्यूड (attitude) है, भगवान के बारे में एटीट्यूड, दूसरे भक्तों के बारे में एटीट्यूड है, विचार धारा है, उससे भक्ति का प्रभाव है हमें प्राप्त होगा। कितनी प्रवाह से होगा, किस प्रकार से होगा यह निर्धारित होता है।
तो कई लोग हरे कृष्ण महामंत्र का जप सालों से करते हैं और एक तरह से हरे कृष्ण महामंत्र का जप करना बहुत ज़रूरी है और युगधर्म है। पर वो हरे कृष्ण महामंत्र का जप करके अगर कोई व्यक्ति और जजमेंटल बन रहा है, और क्या है कि मैं एक पॉइंट के साथ कंक्लूड (conclude) करूँगा, कि महामंत्र का जजमेंटल बन रहे हैं, हम भगवान का इस्तेमाल कर सकते हैं भगवान से दूर रहने के लिए।
मन का कपट और भक्ति का सही उद्देश्य
मतलब क्या है कि मान लीजिए मेरे अंदर दूसरों की निंदा करने की बहुत विचार धारा है और मैं जहाँ भी देखता हूँ सबको निंदा करता हूँ। और यह मेरी वास्तव में समस्या है, कोई व्यक्ति मेरे करीब नहीं आता है मेरे अच्छे संबंध नहीं बनते हैं किसी से। और फिर मैं भक्ति का तत्व ज्ञान सुन लेता हूँ और मैं कुछ चीज़ें बहुत स्ट्रिक्टली (strictly) करता हूँ भक्ति में। और फिर मेरे तत्वज्ञान के अनुसार और मेरी प्रैक्टिस के अनुसार मुझे दूसरों की निंदा करने के लिए और कारण मिल जाते हैं।
‘अरे तुम यह अच्छा नहीं कर रहे हो’, तो मैं भक्ति कर रहा हूँ पर मैं भक्ति कर क्यों रहा हूँ? दूसरों को दिखाने के लिए देखो मैं इतना स्ट्रिक्टली फॉलो करता हूँ तुम नहीं करते हो। तो उससे क्या हो रहा है, मेरा जो दूसरों को दोष देखने का अनर्थ है वह मेरी भक्ति के द्वारा बढ़ रहा है, कम नहीं हो रहा है। तो मैं भक्ति कर रहा हूँ पर भक्ति से मेरे अनर्थ जा नहीं रहे हैं क्योंकि वो अनर्थ को ही बढ़ाने के लिए मैं भक्ति कर रहा हूँ। जान बूझकर मैं ऐसे नहीं सोच रहा हूँ पर वैसे ही हो जाता है उस तरह से।
तो हमारी जो मानसिकता है उसको परिवर्तन करना हमें ज़रूरी है। एक तरह से भक्ति के द्वारा वो अपने आप हो जाएगा पर कभी-कभी मेरा मन इतना कनिंग (cunning) है इतना कपटी है कि जो चीज़ें मन को नियंत्रण करने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं उसी को वो नियंत्रण कर लेता है। और फिर क्या होता है वह व्यक्ति, वही चीज़ें हम करते हैं पर वो भगवान के पास जाने के लिए नहीं दुनिया को दिखाने के लिए, और फिर उससे हमारा अनर्थ बढ़ जाता है।
तो इसलिए हमें ज़रूरी है कि हम हमारी कमियाँ समझें, हमारे मन को समझें और हमारे मन के लिए नियंत्रण करने के लिए जो भी ज़रूरी है वह करने के लिए हम तैयार हो जाएँ। ऐसे करेंगे तो फिर क्या मन शांत हो जाएगा और जब मन शुद्ध हो जाएगा तो पूर्णतः शांत हो जाएगा। पर शुद्ध होने के पहले भी जब अशुद्धि है भी मन में, फिर विकार है भी मन में, फिर भी उसके द्वारा हम अधिक प्रभावित नहीं होंगे, उससे ज़्यादा हम अधिक समस्याओं में नहीं जाएँगे।
तो भागवत के लिए बताया गया है कि जब हम मन भगवान की सेवा में लगाते हैं सेवा भाव के द्वारा तो फिर उसके द्वारा हमारा मन पूर्णतया एक शत्रु से मित्र बन जाता है, यह हमारा अंतिम उद्देश्य है और यह अंतिम उद्देश्य भगवान की कृपा से हम सबको ज़रूर प्राप्त हो सकता है।
सारांश: मन के नियंत्रण की आवश्यकता
तो सारांश में आज मैंने चर्चा की है कि किस तरह से हम जब भक्ति में प्रगति कर रहे हैं तो हमें मन को नियंत्रण करना बहुत ज़रूरी है। अगर हम धार्मिक कार्य कर रहे हैं, पर उसके द्वारा मन नियंत्रित नहीं हो रहा है, तो फिर वो धार्मिक कार्य में क्या फायदा है। तो मैंने मेन (main) उदाहरण जो दिया था एक, इसे पागल खाने का उदाहरण था।
ऐसा नहीं है कि जो पागल खाने में लोग होते हैं, जो पागल जो हम कहते हैं, वो कुछ अलग ही प्रकार के लोग हैं। ऐसे नहीं हैं। हम जैसे ही लोग हैं, पर जब समस्याएँ आती हैं, तो उनकी जो प्रतिक्रियाएँ हैं, उसका जो दर्जा है, उसकी जो मात्रा है, वो अलग हमारे पूर्वजन्म के संस्कार, हमारी परवरिश और हमारे वातावरण, संस्कृति, इन से निर्धारित होता है। इसके अलावा, हमारी स्वेच्छा है और भगवान की कृपा भी है।
तो भी आजकल के समाज में, लोगों को अगर कुछ क्रोध आ गया है, कुछ करना है क्रोध में, कैसे क्या करना है, वो कल्पना करने के लिए बहुत सुविधा है, और कार्य करने के लिए भी बहुत सुविधा है। क्रोध आ गया किसी पे, तो फिर किसी को मारना है, ‘how to murder’ लोग गूगल पे जाकर सर्च करेंगे, और फिर लोगों के पास, खास करके अमेरिका में, लोगों के पास मशीन गन भी है, किसी को एक गुस्सा आ गया, सौ लोगों को मार डालेगा। तो हर तरह से, किसी को आत्महत्या करनी है, किसी को दूसरों को मारना है, तो आजकर संस्कृति में, मन का नियंत्रण करना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि अगर मन अनियंत्रित हो जाएगा, तो वह किस हद तक हमें ले जाएगा, उसके लिए संस्कृति से बहुत सुविधाएँ मिल जाती हैं उसको।
उपचार के 5 सिद्धांत (5 Principles of Healing)
तो जो पागल खाने में लोग होते हैं, हमने देखा कि वो लोग… शब्द पागल ये उचित नहीं है, उनको हम रुग्ण बोल सकते हैं, क्योंकि पागल से हम लोगों को बुरा मानने लगते हैं, वो बुरे नहीं हैं पर अच्छे लोग ही बुरे कार्य करने लग गए हैं। अगर उनको ट्रीट करना है तो पाँच चीज़ें थीं उसमें, क्या-क्या था?
- पैसिफाई (Pacify): सबसे पहले पैसिफाई, हमारा मन विचलित हो जाता है, हम पागल नहीं हैं, पर हमारा मन एक पागल खाने के समान है, और उसमें कभी-कभी कोई विकार आ जाते हैं, वो अगर अनियंत्रित रहें तो वो हमें पागल बना सकते हैं, पागल जैसा कार्य करने लगा सकते हैं। सबसे पहले शांत करना है, शांत करना है, पैसिफाई। कैसे पैसिफाई कर सकते हैं, हम सब को ढूँढना पड़ेगा, कि किस चीज़ से हमारा मन शांत हो सकता है।
- हीलिंग (Healing): दूसरा है, हीलिंग, कि सिर्फ शांत नहीं करना है, उसको हमें ठीक भी करना है। तो जो भक्ति की विधि है, वह सबसे उत्तम विधि है, मन को विकारों से, उसको विकारों से मुक्त करने के लिए।
- रिस्ट्रेनिंग (Restraining): तीसरा है, रिस्ट्रेनिंग, कि कोई व्यक्ति, पागल व्यक्ति दुखी हो जाता है, तो वो आत्महत्या कर सकता है, क्रोधित हो गया तो वो हिंसा कर सकता है, तो उसको नियंत्रण में रखना पड़ता है हमेशा। तो उसी तरह से हमें भी खुद पे नियंत्रण रखने के लिए क्या करना चाहिए, जो हमारी कमियाँ हैं, उस दिशा में अगर हमारा मन जाता है, तो उस दिशा में जाने के लिए सुविधा नहीं होनी चाहिए। तो कोई शराबी है, उसका घर शराब की दुकान के बाजू में नहीं होना चाहिए, मैंने बताया जैसे, वो लोगों को सुविधा दिखाई नहीं दिया है, तो खाना कम हो गया है स्वीट्स का, तो वैसे ही हमें खुद को रिस्ट्रेन करना चाहिए।
- अंडरस्टैंडिंग (Understanding): चौथा है अंडरस्टैंडिंग, कि जब हमें, हमारे मन के कारण कुछ परेशानियाँ होने लगती हैं, तो हमें कोई ना कोई ऐसा व्यक्ति चाहिए, जो हमें समझे, कि जज करे, कि ‘तुम इतने डरपोक क्यों हो’, नहीं, भय लग रहा है, तो सुनो, समझो, और फिर सांत्वना दो। लोग कई बार साइको थेरेपिस्ट के पास जाते हैं इसलिए, कि उनको कोई सुनने के लिए चाहिए। पाश्चात्य संस्कृति बहुत पोलाइट है, पर पर्सनल नहीं है वो। और फिर लोग कुत्ते भी पालते हैं, क्योंकि कहना है कि, कोई बिना शर्त के मुझे स्नेह दे, मुझे प्रेम दे, इसलिए। तो हमें वो कुत्तों से स्नेह चाहिए, हमें मानवों से ही ऐसे संबंध होने चाहिए, कि हमें वो स्नेह मिल सके।
- अप्रिशिएटिंग (Appreciating): और अप्रिशिएटिंग, मतलब, कि हमारे स्तर से, जब हम थोड़ी भी प्रगति करते हैं, हमें कोई ना कोई ऐसे चाहिए जो हमारी सराहना कर सके। और हम, हमारे जीवन में दूसरे लोग ऐसे हो सकते हैं, उनको हमें… उनकी कमियों की तुलना हमारी अच्छाइयों से नहीं करनी है, उनकी कमियों की तुलना हमारी कमियों से करनी है, कि जैसे मुझे यह चीज़ करने के लिए मुश्किल जाता है, उनको यह चीज़ करने के लिए मुश्किल जाता है। जो हम सराहना करते हैं, तो उससे प्रेरणा मिलती है, और उस प्रेरणा से ही आत्म परिवर्तन होता है।
तो भले यह छोटे कदम क्यों न हों, जितने वो कदम लेते रहेंगे, धीरे-धीरे वो रिकवरी (recovery), ठीक होने के मार्ग पे आगे अग्रसर रहेंगे। और हम स्थिरता से अगर भक्ति करते रहेंगे, तो जो मन में जो पागल विकार है, वो धीरे-धीरे निकल जाएँगे, और हमारा मन जो है, अंत में हमारा मित्र बन जाएगा। बहुत-बहुत धन्यवाद। हरे कृष्णा।
आत्मग्लानि और ज़िम्मेदारी स्वीकार करना
हमारा मित्र बन जाएगा। हरे कृष्णा आपके लिए है। लोग एक भूल करता था, उसको ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र… तो आज परिवर्तन नहीं होता। परिवर्तन नहीं होता। कुछ मतलब भी नहीं होता है उसका। यहाँ पर एक परिवर्तन नहीं होता है, क्या कि मेरे कारण alone यह सज़ा… एक तरह से ज़िम्मेदारी स्वीकार करना और आत्म ग्लानि, guilt is what? ग्लानि के नीचे डूब जाना, ये दोनों में एक line है।
और कभी-कभी क्या होता है, अरे मैंने ऐसे क्यूं किया, ऐसे क्यूं किया, ऐसे क्यूं किया। वो खुद को पीट रहे हैं और हताशा आ जाती है। जो लोग हताश हो गए हैं उनको एन्करेज (encourage) करना ज़रूरी है। तो मतलब क्या है उनको अंदर से ही महसूस हुआ है कि मैंने गलत किया है। और मैंने गलत किया है, ये नहीं करना चाहिए था मुझे। तभी उनको बाहर से भी डाँट मिलती है तो क्या होता है वो अंदर से और बाहर से डबल पिटाई हो रही है तो हताशा बढ़ जाती है।
पर मान लीजिए कोई व्यक्ति उसको अंदर से कुछ महसूस नहीं हो ‘अरे मैंने गलत किया है’, कभी-कभी क्या होता है कुछ लोग अगर हम बहुत क्राउडेड (crowded) जगह पर चल रहे हैं तो हम जा रहे हैं तेज़ी से किसी को धक्का लग जाता है तो हम मुड़ के बोलते हैं ‘सॉरी सॉरी’। पर कुछ लोग ऐसे होते हैं कि वो किसी को पूरा गिरा देंगे… तो कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं कि उनका जो विवेक है वो लगभग मर गया है। तो अगर उनके अंदर से कोई उनको ‘गलत किया है’ ऐसा एहसास ही नहीं हो रहा है तो फिर उनको बाहर से पनिशमेंट (punishment) देना बहुत ज़रूरी है। अगर वो अंदर से आवाज़ ही नहीं है तो बहुत गलत है, ज़रूरी है।
मैं बता रहा था शराबी का उदाहरण दे रहा था। शराबी वो खुद शराब छोड़ने का प्रयास कर रहा है और उसको भी ग्लानि है कि ‘मैं शराब पी रहा हूँ’, पर वो शराब पीने में ही खुश है और शराब पीते जा रहा है। दूसरों को बहुत समस्या आ रही है उसके कारण। तो फिर अगर शराब पीके वो ड्राइव करता है और तभी फिर शराब पीके ड्राइव करना है, अमेरिका में बहुत बड़ा गुनाह है आपका लाइसेंस चला जाएगा। और अमेरिका में लाइसेंस नहीं गया मतलब कि आपकी आज़ादी गई। ऐसे क्या करेंगे इतनी बड़ी जगह है कि जाना मुश्किल है।
तो फिर क्या है कि उसको अगर उसके अंदर से कुछ लगता ही नहीं गलत किया है तो फिर क्या है, तभी उनको सज़ा देना ही ज़रूरी है। एजुकेशन से काम नहीं करेगा, तो फिर सज़ा देनी है। पर हम यहाँ बता रहे हैं कि अंदर से उस व्यक्ति को बुरा लग रहा है तो बाहर से उसको पीटने की ज़रूरत नहीं है। पर अंदर से कुछ उसको लग ही नहीं रहा है तो फिर हमको बाहर से डाँटना बहुत ज़रूरी है। या फिर कभी कोई डाँट ही पर्याप्त नहीं हो सकती है कुछ और डिसिप्लिनरी एक्शन (disciplinary action) लेना ज़रूरी पड़ सकता है।
सुधार का मूल्यांकन (Evaluating the Intention)
सबसे पहले कोई व्यक्ति बात भी करता है तो प्रभुपाद कहा करते थे, ‘face is the index of the mind’ (चेहरा मन का सूचकांक है)। चेहरे के भाव से हम समझ सकते हैं कि व्यक्ति के मन का भाव क्या है। कभी-कभी लोग बहुत दुख में इस भाव को करते हैं, ‘मुझे ऐसा हो गया है, मुझे नहीं करना चाहिए था’। अगर कम से कम वो apologize कर रहे हैं, regret कर रहे हैं, वो माफ़ी माँग रहे हैं, ‘गलत किया मैंने’, ऐसे बोल रहे हैं। तो फिर वो एक है कि उनके चेहरे के हाव-भाव, उनके वचन, ये एक देख सकते हैं।
हाँ, दूसरा है, पर कभी-कभी कुछ लोग नकाब भी कर सकते हैं, दिखावा कर सकते हैं। तो उसके बारे में उनका कार्य देखना है कि अगर बार-बार वही गलती कर रहे हैं वो, और फिर गलती को कवर अप (cover up) करने के लिए मार्ग ढूँढ रहे हैं। मतलब जो बुद्धि है, बुद्धि को उस चीज़ को रोकने के लिए नहीं, वो इस्तेमाल कर रहे हैं उस चीज़ को ढंकने के लिए कर रहे हैं। तो फिर वह एक लक्षण है कि वह व्यक्ति अभी, ग्लानि उनमें नहीं है।
और तीसरी चीज़ है, उससे related है यह, वो उसको पुनः न करने के लिए क्या प्रयास कर रहे हैं? ठीक है मैं वहाँ पर एक शराबी है, मैं उस मित्र के पास गया था और उसने शराब दे दिया मैंने पी लिया। ठीक है वापस नहीं हो, ऐसे नहीं हो, उसके लिए क्या करने वाले हो? तो ‘मैं उस मित्र को उसके घर में नहीं मिलूँगा, ऑफिस में ही मिलूँगा’। कुछ tangible plan (ठोस योजना) बनना चाहिए, कैसे नहीं करेंगे।
तो मतलब, एक तरह से हमारे अनर्थ किस तरह से हम पे आक्रमण करेंगे और क्या होगा हमें पता नहीं है। वैसे ही व्यक्ति नहीं है, हम भी, हमसे, किसी से भी कुछ गलती हो सकती है एक तरह से। पर हम कितना… हमारा emotion क्या है, हमारा preparation क्या है और हमारा intelligence क्या हम कर रहे हैं, हम क्या तैयारी कर रहे हैं, हम बुद्धि किस दिशा में इस्तेमाल कर रहे हैं, हमारी भावना क्या है, वह हम देखेंगे, तो उससे हम समझ सकते हैं। और बार-बार वही गलती कर रहा है व्यक्ति, और बार-बार कुछ कारण बता रहा है और फिर कुछ सुधरने के लिए टाइम लग सकता है पर कम से कम वह सुधरने का प्रयास तो होना चाहिए। सुधरने के प्रयास की जगह पे अगर वह छिपने का प्रयास है, छिपाने का प्रयास है तो फिर उसमें कोई ग्लानि नहीं है।
मैं एक ट्रैफिक जोक देखा अमेरिका में। एक आदमी बहुत तेज़ चला रहा था गाड़ी, तो फिर वह ट्रैफिक कॉप (traffic cop) वहाँ पे आ गया। उससे पूछा, ‘did you not see the speed limit?’ (आपने स्पीड लिमिट देखा नहीं?)
‘हाँ कॉप, मैंने स्पीड लिमिट देखा, मैंने आपको देखा नहीं।’
मतलब वह लोग सोच रहा है कि स्पीड से चलाना प्रॉब्लम नहीं है, पकड़ा जाना प्रॉब्लम है। आपको पकड़ा जाना चाहिए… मुझे… एक आदमी बहुत तेज़ जा रहा है… कुंती महारानी कभी झूठ नहीं बोला करती थीं। पर जब पांडव अज्ञातवास में थे तो कुंती महारानी बोलीं कि हम ब्राह्मण हैं, ये मेरे पाँच ब्राह्मण पुत्र हैं। वो क्षत्रिय थे।