Animal Metaphors for understanding the mind – Hindi
[Youth Meeting at ISKCON, Punjabi Bagh, Delhi, India]
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Lecture Summary
यह व्याख्यान भगवद्गीता के छठवें अध्याय के पाँचवें श्लोक (उद्धरेदात्मनात्मानम्…) पर आधारित है, जिसमें मन को समझने, संभालने और अनुशासित करने के व्यावहारिक उपायों की विस्तृत चर्चा की गई है। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- मन को समझना क्यों आवश्यक है? भगवान कहते हैं कि व्यक्ति को अपने मन के द्वारा स्वयं का उद्धार करना चाहिए, पतन नहीं। किसी भी वस्तु या व्यक्ति को संभालने के लिए पहले उसे समझना आवश्यक है। मन हमारा सबसे बड़ा मित्र भी बन सकता है और शत्रु भी।
- मन की प्रकृति और दो उदाहरण:
- कुत्ते के समान (Dog Analogy): मन एक ऐसे कुत्ते के समान है जो ज़ोर-ज़ोर से भौंकता है और डराता है (इच्छाएँ, वासनाएँ, काम, क्रोध, लोभ उत्पन्न करता है)। यद्यपि मन प्रस्ताव रखता है, पर वह हमें ज़बरदस्ती कार्य करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। जब हम मन की अनुचित माँगों को ‘ना’ कहते हैं, तो वह और ज़ोर से गुर्राता है। परंतु अभ्यास से वह धीरे-धीरे कमज़ोर होकर शांत हो जाता है।
- भेड़ के समान (Sheep Mentality): मन में भेड़ की मानसिकता होती है—जो समाज में प्रचलित या लोकप्रिय होता है (फैशन, देखा-देखी, सामाजिक दबाव), मन उसका अंधानुकरण करने लगता है।
- इनर स्क्रीन और इनर सीयर (Inner Screen & Inner Seer): मन एक कंट्रोल रूम के मॉनिटर या ‘इनर स्क्रीन’ की तरह है, जिस पर पाँचों इंद्रियों के इनपुट और पुरानी आसक्तियाँ दिखाई देती हैं। आत्मा ‘इनर सीयर’ (देखने वाला) है। हमें स्वयं को मन के विचारों से अलग करके (Evaluate/परिक्षण करके) सही निर्णय लेना चाहिए।
- मन का नियंत्रण और सकारात्मक व्यस्तता: केवल नकारात्मक रूप से यह सोचना कि “मुझे यह नहीं सोचना है” (Pink Monkey Effect) काम नहीं करता। मन को शांत करने के लिए उसे भगवान की भक्ति, शास्त्रों के श्रवण, जप और सकारात्मक कार्यों में व्यस्त (Constructively engaged) रखना पड़ता है।
- जप और साधना में मन लगाना: जप के समय मन भटकना स्वाभाविक है। इसके लिए अपने मुख्य विक्षेपों (Distractions) का विश्लेषण करना, जप के वातावरण में सकारात्मक बदलाव लाना और निरंतर अभ्यास द्वारा मन को भगवान के नाम में ट्यून करना आवश्यक है।
- असफलता में हताशा से बचाव: यदि कभी पुरानी आसक्तियों के कारण पतन या भूल हो जाए, तो स्वयं को कोसने में समय व्यर्थ करने के बजाय पुनः पूर्ण उत्साह से भगवान के संबंध और भक्ति में लग जाना चाहिए (अपि चेत्सुदुराचारो…)। भगवान कभी अपने भक्त का त्याग नहीं करते।
Full Transcription
हरे कृष्ण! हरे कृष्ण! मैं कृतज्ञ हूँ कि आप सब के बीच में आज भगवान के संदेश के बारे में कुछ चर्चा करने का मौका है। तो मैं मन को समझने के बारे में कुछ चर्चा करूँगा। कुछ महीने पहले मैं यहाँ पे आया था इसके पहले, और तभी भी मन पे चर्चा की थी। दो उदाहरण लिए थे जानवरों की तुलना करके। आप में से कुछ भक्त थे तभी? तो मैं चार उदाहरण लिया था तभी, दो लिए थे तभी कि मन एक घोड़े के समान है और मन एक… किसी को याद है? या एक… what is wolf, लोमड़ी, भेड़िये के समान है। तो आज मैं दो और उदाहरण लूँगा कि मन कैसे एक कुत्ते के समान है और मन कैसे एक शीप, भेड़ के समान है।
तो सबसे पहले, मन को समझना ज़रूरी क्यों है? छठे अध्याय में, पाँचवें श्लोक में भगवान बताते हैं भगवद्गीता के कि:
$$उद्धरेदात्मनात्मानं\ नात्मानमवसादयेत्\।$$
$$आत्मैव\ ह्यात्मनो\ बंधुरात्मैव\ रिपुरात्मनः\॥$$
यह कहते हैं—”उद्धरेदात्मनात्मानम्”। आप उद्धार कीजिए, खुद का उद्धार कीजिए। जो है अपने मन के द्वारा, आपके मन का ऐसा इस्तेमाल कीजिए जिससे आपका उद्धार हो सके, न कि इस तरह से कार्य कीजिए जिससे कि आपका पतन हो जाए। “उद्धरेदात्मनात्मानम्” मतलब भगवान बता रहे हैं हमें कि हमारे मन को संभालना यह हमारी ज़िम्मेदारी है।
और किसी चीज़ को अगर संभालना है तो सबसे पहले उसको समझना होता है। जैसे अगर मान लीजिए अभी आप और बड़े हो जाएँगे, आपका परिवार होगा। अगर आपके कोई रिश्तेदार होंगे, बोले कि “मैं थोड़ा बाहर जा रहा हूँ तो आप मेरा बेटा है, उसको एक हफ़्ता आपके पास रख सकते हैं?” अगर आपके पास रहना है तो फिर आपको उसको समझना पड़ेगा कि यह ऐसा कार्य करता है, यह यहाँ जाता है, यह ऐसे करता है। किसी को संभालना है तो उसको समझना ज़रूरी है। तो समझेंगे नहीं तो संभाल नहीं पाएँगे, “क्या कर रहा है यह?” तो हमें हमारे मन को समझना इसलिए है कि हम उसको संभाल सकें और उसका इस्तेमाल कर सकें जिससे कि हम उचित कार्य कर सकें।
कोई बड़ा हाई सिक्योरिटी एस्टैब्लिशमेंट अगर होगा… मैं अमेरिका में गया था कुछ महीने पहले, तो वहाँ पे एक यूनिवर्सिटी में हाई सिक्योरिटी रूम में एक सेमिनार था। तभी जब वहाँ पे जा रहा था, उसके बाजू में एक कंट्रोल रूम था। और कंट्रोल रूम में एक बड़ा मॉनिटर था और वह मॉनिटर में अलग-अलग उसके विंडोज थे खुले हुए एक बड़े मॉनिटर में। और मैं देख रहा था कि अलग-अलग विंडोज में वहाँ पे जो भी उस बिल्डिंग के दरवाज़े हैं, वहाँ पे जो सीसीटीवी के कैमराज़ हैं, उसका इनपुट वहाँ पे आ रहा था। यह सारे इनपुट्स इस एक बड़े मॉनिटर में अलग-अलग विंडोज में आ रहे थे। और यहाँ पे जो चीफ़ सिक्योरिटी ऑफिसर है वह बैठा है और वह देख रहा है। और कोई भी दरवाज़े पे कोई भी कोई suspicious character दिखता है तो तुरंत बटन प्रेस करता है, फिर वह विंडो ज़ूम होकर खुल जाता है और फिर वहाँ पे क्या है, देख सकते हैं।
तो उसी तरह से हमारा जो मन है, वह एक मॉनिटर के समान है। और उस मन में जो हमारे पाँच इंद्रियाँ हैं, उनसे जो इनपुट आते हैं, वे डिस्प्ले होते हैं:
$$श्रोत्रं\ चक्षुः\ स्पर्शनं\ च\ रसनं\ घ्राणमेव\ च\।$$
$$अधिष्ठाय\ मनश्चायं\ विषयानुपसेवते\॥$$
fifteenth अध्याय के नौवें श्लोक में भगवान बताते हैं कि श्रोत्रम् मतलब क्या… श्रोत्रम्, चक्षुः, स्पर्शनम्, रसनम्, घ्राणम्—यह जो पाँच इंद्रियाँ हैं, उनका इनपुट मन के स्क्रीन पर आता है।
अभी यह स्क्रीन आपको दिख रहा है जिसपे अलग-अलग चीज़ें दिख रही हैं। अभी थोड़ा पीछे जाके यह स्क्रीन को कौन देख रहा है, वह देखने का प्रयास कीजिए। हम जब आँखें बंद करते हैं तो हमें आँखों पे कुछ न कुछ तो दिखता है, कुछ भी नहीं तो एक सिर्फ़ ब्लैंक स्क्रीन तो दिखता है। पर जो भी वह ब्लैंक स्क्रीन को देख रहा है, उसे देखने का प्रयास कीजिए थोड़ा पीछे होकर। हम जब उसको देखने का प्रयास करते हैं तो क्या होता है? वह भी हमारे साथ पीछे जाता है। कितना भी हम पीछे जाके वह जो अंदर से देख रहा है उसको देखने का प्रयास करेंगे, हम देख नहीं पाते हैं। हम अंदर में स्क्रीन देख सकते हैं, पर वह स्क्रीन को देखने वाला जो स्व (self) है, उसको नहीं देख सकते हैं। तीन साँसे लीजिए, फिर अपनी आँखें खोल सकते हैं आप।
So, the inner screen is the mind, and the inner seer is the soul. जो अंदर स्क्रीन होता है जिसपे हमको बहुत कुछ दिखता है, वह क्या है? वह मन है। और जो अंदर स्क्रीन को जो देख रहा है, वह आत्मा है।
ध्यानपूर्वक हम कार्य कर रहे होते हैं, तो जो इनर-स्क्रीन पर जो दिखता है, जो आउटर सीन में चल रहा है, वह दिखता है। आप अभी मुझे सुन रहे हैं तो आपको अंदर, मैं जो बात कर रहा हूँ, जो हाव-भाव कर रहा हूँ, आपको दिख रहे हैं। पर अगर मन कहीं और चला जाता है, तो वह जो इनर स्क्रीन है, वह कभी-कभी एक विंडो के समान, एक खिड़की के समान कार्य करता है और जो बाहर हो रहा है, दिखता है। पर जब हम डिस्ट्रैक्टेड हो जाते हैं, तो वह इनर स्क्रीन एक टीवी बन जाता है और कुछ और ही दिखने लगता है आपको। पर वह अंदर जो स्क्रीन है, वह हमेशा रहता है। और यह स्क्रीन जो है, यह मन है।
तो अभी यह इनर स्क्रीन, अंदर का जो स्क्रीन है, उस पर अलग-अलग चीज़ें अलग-अलग समय पर दिखती हैं। और ख़ास करके जिस चीज़ से हम आसक्त होते हैं, वह बार-बार वहाँ पर आ जाता है। जब वह इनर स्क्रीन पर कुछ चीज़ आ जाती है तो कई बार हम उससे पहचान लेते हैं उसको और फिर उसके अनुसार ही हम कार्य करने लगते हैं।
तो मान लीजिए हम कुछ बैठे काम कर रहे हैं कंप्यूटर पर, और फिर हमारे अंदर के स्क्रीन में आ जाता है यह विचार कि “अभी क्या स्कोर है, स्कोर क्या है देख लेते हैं।” अगर हम तुरंत फोन खोल लेते हैं, कुछ व्हाट्सएप वगैरह देखने लगते हैं, यहाँ पर क्या हो रहा है? जो अंदर के स्क्रीन में आ जाता है, वह तुरंत हम उसको स्वीकार कर लेते हैं।
तो अभी अंदर के स्क्रीन पे क्या आएगा, उसका नियंत्रण हम ज़्यादा नहीं कर सकते हैं, थोड़ा सा कर सकते हैं। जैसे मैं बताया, बाहर जो हम देखते हैं, वह अंदर भी दिखता है। पर कई बार बाहर एक चीज़ है, पर अंदर दूसरी चीज़ कुछ चल रही है। हम मंदिर में आए हैं, सामने भगवान के विग्रह हैं, पर विग्रहों को आँखें देख रही हैं, पर मन कोई और चिंता का विचार कर रहा है। तो क्या है, मन के स्क्रीन पर कुछ और ही चल रहा है।
तो अभी जिस हद तक हम समझते हैं कि मेरा मन और मैं अलग हूँ, तो वह मन के स्क्रीन पर जो भी आ जाता है, उसको हम इवैल्यूएट करते हैं, उसकी जाँच करते हैं और फिर फैसला करते हैं।
जैसे मैं बता रहा था सिक्योरिटी कैमरा में, जो कंट्रोलर होता है, जो चीफ़ सिक्योरिटी ऑफिसर, वह देखता है, “मुझे यह देखना है, इस खिड़की में क्या है, कैमरा के इस विंडो में क्या दिख रहा है मुझे”, और उस पर ज़ूम करता है। पर कभी-कभी कुछ और दूसरा ही विंडो ज़ूम हो गया, तो फिर कभी-कभी कोई चोर होते हैं, उनको चोरी करना है, तो वे क्या करेंगे, एक दरवाज़े पर डिॉय कहते हैं, एक दरवाज़े पर कुछ गड़बड़ कर देंगे, कुछ पटाखा बजा देंगे, बम का आवाज़ आ जाएगा और सब सिक्योरिटी वाले उधर चले जाएँगे और दूसरे दरवाज़े से अंदर आ जाएँगे, वहाँ पर चोरी कर लेंगे।
तो वह जो सिक्योरिटी ऑफिसर है, उसको अभी वहाँ पर कुछ बम हो गया है तो नैचुरली वह ज़ूम हो जाएगा, पर दूसरे जगह पर कोई खतरा आ रहा है, उसका भी ध्यान रखना चाहिए।
तो क्या होता है, हमारे मन की खिड़की में, मन के स्क्रीन पे हमारी जो पूर्व आदतें हैं, पूर्व आसक्तियाँ हैं, उसके अनुसार कुछ चीज़ें अपने आप ज़ूम हो जाती हैं, अपने आप वह बड़ी होकर आ जाती हैं। और अगर हम सतर्क नहीं हैं, तो उसी को हम ध्यान देते हैं।
तो यह समझने के लिए एक उदाहरण ले सकते हैं, कुत्ते का उदाहरण। अभी कुत्ता जो होता है, साधारणतया वह पहले दो चीज़ें करता था: एक है कि वह भौंकता है और दूसरा है काटता है। भौंकने से वह क्या है, कुत्ता चेतावनी देता है, संरक्षण करता है; और काटने से वह आक्रमण करता है।
आजकल पाश्चात्य देशों में कुत्ते की तीसरी ही एक भूमिका है, वह क्या है? Dog is your best friend, वह आपका सबसे अच्छा मित्र है। मैं अमेरिका में एक एयरपोर्ट पे था और वहाँ पे मैं एक एडवर्टाइजमेंट देख रहा था। “अभी आप जब सफ़र करते हो, आपको आपका जीवन पीछे रखने की कोई ज़रूरत नहीं है।” क्या है यह, मैं देखा। तो वहाँ पे एक young professional woman थी, अपने कंप्यूटर के सामने बैठकर कुछ काम कर रही थी और उसके बाजू में एक कुत्ता था। और वह अपने कुत्ते को इतने स्नेह से देख रही थी। और वह एडवर्टाइजमेंट क्या था? एक chain of hotels का था कि अगर आप आपके ऑफिस के काम से कहीं जाते हो तो आपका कुत्ता आपका जीवन है, तो आप कुत्ते को छोड़ो मत, आप हमारे होटल में रहो। और हमारे होटल में जैसे आपको फ़ाइव स्टार ट्रीटमेंट देते हैं, आपके कुत्ते को भी फ़ाइव स्टार ट्रीटमेंट देते हैं। तो उस होटल में जैसे कोई होटल में अटेंडेंट्स होते हैं कि जो आपको यह चाहिए लेकर आओ, तो उस होटल में specially trained dog attendants होते हैं।
तो यह कुत्तों के बारे में… मैं शाम के संडे फ़ीस्ट में और बोलूँगा। पर अभी हमारा समझ मन का है। तो यह जो है, कुत्ते साधारणतया… तो अभी कुछ-कुछ कुत्ते ऐसे होते हैं, वे भौंकते रहते हैं, बहुत भौंकते रहते हैं, पर अंदर से उनको दाँत रहे ही नहीं काटने के लिए। तो देखने को बहुत डरावने लगते हैं वे। और जब भौंकते भी हैं तो ऐसा आवाज़ आता है—बाप रे! भागना चाहिए यहाँ से! पर अगर उनके सामने खड़े रह गए, तो वे आ जाएँ काटने को, मुँह खोलेंगे, कुछ दाँत है ही नहीं, कुछ कर ही नहीं सकते हैं वे! देखने में बड़े डरावने हैं, भौंकने में भी बड़े डरावने हैं, पर काटने की क्षमता नहीं है उसमें!
हमारा जो मन है, यह ऐसा कुत्ता है। बहुत खतरनाक रूप से भौंकता है वह। ऐसे नहीं कि वह काट नहीं सकता है। मन भौंक सकता है—”यह करो, यह करो, यह करो, यह करो!” पर मन कभी हमको मजबूर नहीं कर सकता कि “मुझे यह करना ही है।” वह प्रस्तावना देता है। और कभी-कभी उसकी प्रस्तावना इतने ज़ोर से आती है कि इसको ‘ना’ बोलना बड़ा मुश्किल हो जाता है। पर ‘ना’ बोलना असंभव नहीं है, संभव है वह!
उसके लिए हमें क्या करना है? हमें चौकन्ना होना है। तो अभी मन जब भौंकने लगता है—”यह खाओ, यह खाओ, यह खाओ!” अभी हर चीज़ जो मन भौंकता है, उसको ‘ना’ बोलना भी ज़रूरी नहीं है। क्योंकि मन हमारे शरीर से संबंधित भी है। तो जो शरीर में संवेदना आती है, वह मन में आती है। अगर भूख लगी है, तो थोड़ा खाना है। और शरीर हमको बता रहा है क्योंकि मन में खाना है, तो थोड़ा खाना चाहिए। हर बार जो मन भौंकता है, उसको ‘ना’ बोलना भी ज़रूरी नहीं है। इसीलिए मैं पहले बोला कि हमें मन की, जो बोल रहा है, इसको इवैल्यूएट करना है, इसकी जाँच करना है।
पर कई बार हमारी जो आसक्तियाँ होती हैं, हमारी जो आदतें होती हैं, उसके अनुसार मन बोलता है—”यह करो, यह देखना है मुझे, यह खाना है, यह यहाँ जाना है, यह करना है, वह करना है।” तो मन इतने ज़ोर से भौंकता है तभी एक कुत्ते के समान कि हम डर जाते हैं। बोलते हैं—बाप रे! इतना भौंक रहा है, अभी मुझे सुनना ही पड़ेगा इसको! पर यह ज़रूरी नहीं है। मन जब भौंकने लगता है तो उसको ‘ना’ बोलना बड़ा मुश्किल होता है, पर ऐसे नहीं है कि उसको ‘ना’ नहीं बोल सकते हैं।
कई बार जब जानवरों को ट्रेनिंग देते हैं, उनको प्रशिक्षण देते हैं… अगर कोई शेर है या जंगली जानवर है, तो उसको अगर पालतू बनाना है तो उसकी एक पद्धति होती है। पद्धति होती है कि उसको भूखा छोड़ दो। और जब तक वह जानवर जो हम बोलेंगे वह करेगा नहीं, जो ट्रेनर बोलेगा वह करेगा नहीं, तब तक उस जानवर को खाना ही नहीं देते हैं। और जब जानवर को खाना नहीं देते हैं तो जानवर भौंकने लगता है। कुत्ता होगा, जंगली कुत्ता होगा तो भौंकने लगेगा; शेर होगा तो गुर्राने लगेगा। और उसको फिर भी खाना नहीं देंगे तो और ज़ोर से गुर्राएगा, और ज़ोर से गुर्राएगा, और ज़ोर से गुर्राएगा! तो अभी हिंसक कुत्ता होगा, और ज़ोर से गुर्राएगा। वह गुर्रा रहा है और ज़ोर से, और ज़ोर से, और ज़ोर से… पर अंदर से कमज़ोर हो रहा है!
तो उसी तरह से हमारी जो मन की आसक्तियाँ हैं, जो अगर हम उनको ‘ना’ बोलते हैं कि “मैं यह नहीं करने वाला हूँ”, तो वह और गुर्राने लगता है, गुर्राने लगता है, और गुर्राने लगता है, और लगता है सहन नहीं कर सकता मैं! पर वह जितना गुर्राते जा रहा है, गुर्राते जा रहा है, वास्तव में क्या हो रहा है? वह अंदर से कमज़ोर हो रहा है!
कई बार हमें लगता है कि हमारी इच्छाओं को हम ‘ना’ बोलेंगे तो वह और ज़ोर से चिल्लाती हैं, चीखती हैं। सही है यह। पर इसका मतलब यह नहीं है कि वह और प्रबल हो गई हैं। वह प्रबलता एक आखरी चीख के समान है! उसके बाद में फिर भी जो उसका ट्रेनर होता है, वह उसको खाना नहीं देता है, तो फिर वह जो जानवर गुर्रा रहा है, वह शांत हो जाता है। और फिर जो प्रशिक्षक जो बोलता है, वह करने के लिए तैयार हो जाता है।
तो उसी तरह से जो हमारा मन है, वह कई बार गुर्राएगा—”यह करो, वह करो, वह करो!” अभी, जैसे मैं पहले बताया कि मन जो हर चीज़ बोलता है, उसको नहीं करना ऐसे नहीं है। मन हमारा हमेशा शत्रु नहीं होता है। कई बार जो मन होता है, उसमें अच्छे विचार भी आते हैं। अगर हममें कुछ प्रतिभाएँ हैं, कुछ टैलेंट्स हैं, वह वास्तव में कहाँ है? कोई व्यक्ति बहुत बुद्धिमान होते हैं, कोई बुद्धिमान भी अलग-अलग प्रकार के होते हैं, कोई व्यक्ति बहुत गणित में बुद्धिमान होते हैं, नंबर को फ़टाफ़ट ऐड कर लेते हैं, कोई भाषा में बहुत बुद्धिमान होते हैं…
तो जब मन अंदर से आवाज़ आती है, तो हमें उसको इवैल्यूएट करना होता है, परीक्षण करना होता है उसका और फिर फैसला करना है। तो मन को अगर हमें संभालना है, तो दो चीज़ें इसमें: मन का परीक्षण करना और उसका प्रशिक्षण करना।
- मन का परीक्षण करना—जो मन बोल रहा है, वह क्या है, यह सही है या गलत है, ऐसे परीक्षण करना।
- और उसका प्रशिक्षण करना—उसको ट्रेनिंग देना।
यह दोनों ज़रूरी हैं। जब कुत्ता भौंकता है, उस कुत्ते को शांत होने में समय लगता है। हमारे जो टैलेंट्स हैं, उसको हमें डेवलप करने हैं—”मुझे इस चीज़ में रुचि है, यह चीज़ मुझे करनी है।” तो अभी हमें क्या देखना है? जो मन बोल रहा है, वह धर्म के अनुसार है या धर्म के विपरीत है। अगर हमें कुछ चीज़ में रुचि है और हमें उस चीज़ के अनुसार, उस कार्य में सेवा करनी है हमें, तो वह मन—”मुझे यह करना है, यह करने की बहुत इच्छा है”, तो उसको ठुकराने की ज़रूरत नहीं है। वह अगर हमें धर्म के मार्ग पे, अच्छे कार्यों में प्रेरणा दे रहा है, तो वह अच्छी चीज़ है।
पर हमारी जो वासनाएँ होती हैं—काम है, क्रोध है, लोभ है—इसमें अगर मन हमें उकसा रहा है, तो तभी वह कुत्ता भौंक रहा है, पर उसको सुनना नहीं है। हमने पहले इस मन की बातों का बहुत पालन किया है, इसलिए जो मन बड़ा शक्तिशाली बन गया है और उसकी भौंक बहुत खतरनाक हो गई है। उसको ‘ना’ बोलना मुश्किल है। पर फिर भी अगर हम समझते हैं कि मन मुझे ज़बरदस्ती कुछ भी चीज़ करने को नहीं लगा सकता है, मन प्रस्ताव रख सकता है और मुझे ही उसको स्वीकार करना है।
और अगर मन के प्रस्ताव को अस्वीकार करना है, तो वास्तव में हम किसी चीज़ के बारे में विचार नहीं करना, ऐसे नहीं कर सकते हैं। मान लीजिए, मैं अभी हाथ हिलाता हूँ, यहाँ पे हाथ लगाता हूँ और इसमें इलेक्ट्रिक करंट है, शॉक लग गया मुझे। तो मैं फैसला कर सकता हूँ कि बाद में अभी इस प्रवचन में मैं हाथ यहाँ पे नहीं लगाऊँगा। जो शारीरिक चीज़ें हैं, जो स्थूल चीज़ें हैं, मैं विचार कर सकता हूँ, इसको मैं स्पर्श नहीं करूँगा।
पर अगर मैं ऐसे विचार करूँगा कि “मैं अभी इस चीज़ के बारे में विचार नहीं करूँगा…” तो मनोवैज्ञानिक एक उदाहरण लेते हैं, इसको Pink Monkey Experiment बोलते हैं। “लोगों को अगले 30 सेकंड के लिए आप एक गुलाबी बंदर के बारे में मत सोचो! और जो भी सोचना है सोचो, पर कृपया गुलाबी बंदर के बारे में आप मत सोचो!” तो ज़िंदगी में कभी गुलाबी बंदर के बारे में नहीं सोचा होगा, पर तभी हम सोचने लग जाएँगे!
तो क्या है? To decide to not think of a thing is also to think of that thing. अगर मैं फैसला करता हूँ कि “मैं इस चीज़ के बारे में नहीं सोचने वाला हूँ”, पर “मैं नहीं सोचने वाला हूँ”, यह भी तो एक सोच ही है न? और उसमें मैं उस चीज़ के बारे में सोच ही रहा हूँ!
तो हम नकारात्मक भाव से मन का नियंत्रण नहीं कर सकते हैं। मतलब “यह मुझे नहीं करना है”, ऐसा अगर हम दृढ़ संकल्प बनाते हैं कि “इसके बारे में नहीं सोचने वाला हूँ, मैं इच्छा के बारे में नहीं सोचने वाला हूँ”, ऐसे नहीं कर सकते हैं। उसके लिए हमें क्या करना है? अगर वह मन के भौंक को नहीं सुनना है, तो हमें किसी और चीज़ को सुनना है! अगर हम हमारी चेतना को किसी और चीज़ में लगा देते हैं, तो फिर जो मन की भौंक है, उसको हम शांत कर सकते हैं।
अगर हम किसी चीज़ में नहीं लगे हैं सकारात्मक रूप से, तो फिर मन जो बोलता है, उसको सहन करना, उसको रोकना नामुमकिन है। जैसे ही हम कुछ अच्छा कार्य करना, सकारात्मक कार्य करना छोड़ते हैं, बंद कर देते हैं, जो मन है अपना पागलपन चालू कर देता है।
जो समाजशास्त्री हैं, समाज के जो अध्ययन करते हैं, वे बताते हैं कि लोग चिंता जब करते हैं… चिंता, यह बहुत बड़ी समस्या है ही आजकल समाज में। पर चिंता लोग कब करते हैं अधिकांश शुरू में? वे बोलते हैं कि जो लीजर टाइम (leisure time) लोगों का होता है—काम हो गया, नौकरी हो गया, घर की जिम्मेदारी हो गया, अब आराम से बैठो। During our leisure time, our mind works overtime! जब हम आराम से बैठते हैं तो हमारा मन ओवरटाइम काम करने लगता है—”अरे, उसने ऐसा बोला! इसका क्या हो जाएगा? वह ऐसा हो जाएगा! अरे, मुझे वह करना था, वह हुआ नहीं, वह कैसे करूँगा मैं?”
तो मन जो भौंकता है, वह तीन चीज़ों के बारे में भौंकता है प्रधान रूप से:
- राग (इच्छा या वासना/आसक्ति—”यह चाहिए, यह चाहिए, यह चाहिए”)
- भय (“अरे, यह होगा तो क्या होगा? ऐसा होगा तो बर्बाद हो जाऊँगा मैं!”)
- क्रोध (“उसने ऐसा कैसे किया, मैं उसको दिखाऊँगा अब!”)
वीत-राग-भय-क्रोध—भगवान चौथे अध्याय के दसवें श्लोक में बताते हैं:
$$वीतरागभयक्रोध\ मन्मया\ मामुपाश्रिताः\।$$
$$बहवो\ ज्ञानतपसा\ पूता\ मद्भावमागताः\॥$$
कहते हैं कि अगर हम “मन्मया मामुपाश्रिताः” का आश्रय ग्रहण करते हैं, तो जो मन है, इन तीन चीज़ों से—राग, भय, क्रोध—इनसे मुक्त हो सकता है। और ऐसा बहुत लोगों ने पहले किया—”बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः”। ज्ञान की तपस्या, ज्ञान से, बुद्धि से समझके उन्होंने मन को मुझ में लगाया है।
तो अभी मन के भौंकने को अगर नहीं सुनना है हमें, तो हमें भगवान के वचन को सुनना है। अगर हम सकारात्मक कार्य में लगते हैं—भक्ति में सेवा हो, या हमारी ज़िम्मेदारियाँ हों—जितना हम खुद को सकारात्मक रूप से कार्य में रत रखते हैं, उतना हम हमारे मन के भौंकने को रोक सकते हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि हमेशा भागते रहना है हमें—”यह करना है, वह करना है।” नहीं! Constructively engaged—मतलब हम शांति में बैठकर कुछ चीज़ के बारे में विचार कर सकते हैं। अगर हम योजना नहीं बनाते हैं कि मैं क्या करने वाला हूँ, तो मन के पास बहुत योजना है कि हमें क्या करना चाहिए! तो हमें कभी भी हमारे जीवन में ऐसा समय नहीं आना चाहिए कि “अभी मेरे पास एक घंटा है, अभी क्या करूँ मैं?” मन तुरंत बोलेगा—”यह कर, यह कर, यह कर, यह कर!”
इसका मतलब यह नहीं कि हमें पूरा खुद को ऐसा पैक कर देना कि हमारे पास साँस लेने के लिए समय नहीं है। हमें प्लान होना चाहिए कि “मुझे समय मिलेगा तो मुझे यह शास्त्र पढ़ना है, मुझे यह लेक्चर सुनना है, मुझे यह काम करना है, मुझे इससे मिलना है, यह करना है…” जो हमें प्लान होना चाहिए जिससे कि जो मन के भौंकने को हम मौका न दें।
और ऐसे नहीं कि मन की हर सुनी को, जो बोल रहा है, उसको अनसुनी कर सकते हैं। पर जब हम शांत होते हैं, जब हमने शास्त्र का अध्ययन किया है, जप किया है, श्रवण किया है, उसके बाद मन चिल्ला रहा है—”यह ऐसे है, वह ऐसे है”, तो फिर तब हम शांति से जो मन बोल रहा है, उसको इवैल्यूएट कर सकते हैं। अगर हम खुद रजोगुण, तमोगुण में हैं तो हम जो मन बोल रहा है, उसको हम जाँच नहीं करेंगे, उसको स्वीकार कर लेंगे, उसके अनुसार ही कार्य कर लेंगे।
तो मन को हम पूरी तरह से चुप नहीं कर सकते हैं, बंद नहीं कर सकते हैं, और करना भी नहीं चाहिए उसको। क्योंकि मन अच्छी चीज़ें भी बताता है कभी। पर क्या करना है? हम ऐसे समय में मन से बात करें जब हम खुद सतर्क हों।
मान लीजिए हमको एक नया मोबाइल खरीदना है। और एक मोबाइल सेल्समैन है जो अच्छा मोबाइल बेचता भी है। तो अगर हम उसके पास जाते हैं, “यह मोबाइल है, यह मोबाइल है, यह मोबाइल है”, और अब हमें कौन सा खरीदना है, हम सोच सकते हैं। पर अगर हम खुद दूसरे विचारों में बिज़ी हैं, ज़्यादा अच्छी तरह से सोच नहीं पा रहे हैं, तो जो मोबाइल उसको बेचना है, जिसमें उसका ज़्यादा प्रॉफिट होगा, वही उसको बेच देगा! और हमारा उससे फायदा है कि नहीं, वह पता ही नहीं है, शायद हमारा नुकसान हो जाएगा उससे।
तो जो मोबाइल बेचने वाला है, हमें चाहिए मोबाइल तो हम जा सकते हैं, पर ऐसा समय जाना चाहिए कि जब हम भी शांति से विचार कर सकते हैं उसके प्रस्तावों के बारे में। तो वैसे, जब हम सत्वगुण में होते हैं, तो जो मन बोल रहा है, उसकी जाँच कर सकते हैं। पर साधारणतया, हमें खुद को अगर हम सकारात्मक कार्यों में लगे रहते हैं, तो मन की समस्याएँ काफी कम हो सकती हैं।
चौथा उदाहरण… जो मैं पहले दो उदाहरण दिए थे: एक घोड़े का उदाहरण था, तो अभी चौथा उदाहरण देकर देखूँगा—अभी शीप, भेड़। भेड़ क्या है? भेड़ (Sheep mentality) कहते हैं। भेड़ की मानसिकता मतलब अगर एक भेड़ पहाड़ से नीचे कूद जाती है, तो बाकी सब भी कूद जाते हैं!
तो वैसे क्या है, हम सब… जो भी फैशनेबल चीज़ होती है, जो भी सब लोग कर रहे हैं, वह करना हमारे मन के लिए स्वाभाविक हो जाता है। अभी सब लोग चाहते हैं कि मैं स्पेशल बनूँ, पर जब फैशन होती है तो सब लोग फैशनेबल बनने के लिए वही चीज़ कर देते हैं—उसी प्रकार का हेयरकट कर लेंगे, उसी प्रकार की दाढ़ी रख लेंगे, उसी प्रकार का कपड़ा पहन लेंगे।
पर कुछ समय के बाद क्या होता है? वह फैशन बदल जाती है। और जो व्यक्ति खुद को फैशनेबल बताना चाहता है, उसके लिए कोई भी अपमान इतना असह्य नहीं है जितना कि उसके लिए “तुम तो ओल्ड फैशन्ड हो!” क्या, ओल्ड फैशन्ड!
तो एक ब्रिटिश लेखक थे ऑस्कर वाइल्ड। वे कहते हैं कि “फैशन वास्तव में इतनी अगली (ugly), इतनी कुरूप चीज़ है कि वह इतनी असह्य हो जाती है कि हर छह महीने में बदलनी पड़ती है!”
अभी जो समाज के साधारण लोग करते हैं, मन उसका अनुकरण करता है। अभी मनोवैज्ञानिकों ने संशोधन किया कि अगर मान लीजिए कोई ऑफिस है, उसमें कुछ लोग आए हैं, वहाँ पर कुछ मीटिंग हो रही है और वहाँ पर कुछ स्टेशनरी रखी हुई है। आपको कुछ फॉर्म भरना है, आपको कुछ लेटर लिखना है तो आप स्टेशनरी यूज़ कर सकते हैं। तो उसमें से उन्होंने क्या किया कि अभी लोग उसमें से कितनी स्टेशनरी खुद के काम के लिए अपने बैग में रख के खुद ले जाते हैं, वह देखना था।
तो साधारणतया तो (यह अमेरिका में हुआ) साधारणतया लोग… कुछ लोग लेके नहीं जा रहे थे। और उनको बोला कि आप जानबूझकर सब के सामने यहाँ से खुद के बैग में पेपर डाल के लेके जाओ। तो एक दिन उन्होंने रखा वैसे, तो लगभग 500 लोग आए थे, उसमें से सिर्फ़ एक आदमी खुद के काम के लिए पेपर लेके चला गया।
अगले दिन, जब यह पाँच लोग दिन की शुरुआत में आए और उन्होंने बहुत से पेपर खुद के लिए ले लिए, और वे जब ले रहे थे तो बाकी सब लोग भी देख रहे थे। जैसे ही इन पाँच लोगों ने ले लिए, तो उसके बाद में लगभग 200 लोगों ने और पेपर ले लिए!
तो क्या हो गया? अगर एक व्यक्ति कुछ गलत चीज़ करता है और बाकी लोग देख रहे हैं कि “यह कर रहा है, इससे कुछ नहीं हो रहा है, तो मैं भी करता हूँ।”
तो क्या होता है? Whatever becomes popular becomes acceptable. जो दूसरे लोग करने लगते हैं और जो लोगों को प्रिय लगता है, “यह करने से कुछ नहीं होता, अच्छा होता है”, तो वह acceptable होता है, गलत भी हो तो उसको स्वीकार कर लेता है।
जो मन है, इस तरह से कार्य करता है कि किसी चीज़ को अगर देखता है कि यह भी कर रहा है, यह भी कर रहा है, तो वह करने में मुझे आनंद मिलता है या उसमें मैं खुद को कष्ट नहीं दूँ, तो वह सब करें, सब लोग करें तो मैं भी कर लूँ।
भगवद्गीता में बताते हैं: “संगात्संजायते कामः”। तो संग का कई अर्थ हो सकता है। संग का आसक्ति हो सकता है, आसक्ति से वासना बढ़ती है। पर प्रभुपाद जी एक प्रवचन में यह भी बोलते हैं: संग मतलब सत्संग या किस प्रकार के संग में हम रह रहे हैं। तो जिस संग में हम रहते हैं, उससे हमारी इच्छाएँ बढ़ती हैं।
तो जो मन है… हमारे पास मन है, हमारे पास बुद्धि भी है। बुद्धि विचार करके कार्य करती है कि यह उचित नहीं है तो यह नहीं करूँगा मैं। पर जब हम कार्य करते हैं तो ऐसा नहीं है कि हर चीज़ के बारे में हम विचार करते हैं कि करना चाहिए या नहीं करना चाहिए, यह उचित है या उचित नहीं है। हम बहुत सी चीज़ें ऐसी कर लेते हैं जो हम दूसरों को करते हुए देख लेते हैं और वह कर देते हैं।
अभी पाश्चात्य देशों में वेगनिज़्म (Veganism) जो है, वह बहुत बढ़ रहा है। अभी भी भारत में लोग समझते हैं कि अगर मैं नॉन-वेज़ खाने लगूँगा तो मैं कूल होता हूँ, अगर मैं वेजिटेरियन हूँ तो मैं ओल्ड-फैशन्ड हूँ। और नॉन-वेज़ खाना फैशनेबल लोग सोचते हैं। पर पाश्चात्य देशों में अगर आप वेगन बन गए तो आपको फैशनेबल मानते हैं, कूल हैं आप अगर आप वेगन होंगे तो!
तो यहाँ पॉइंट क्या है, यह बता रहा हूँ कि जो पाश्चात्य देशों में अधिकांश लोग मांस खाते थे, भारत में बहुत से लोग मांस खाते हैं, पर जब वे मांस खाते हैं तो ऐसा नहीं है कि उनको जानवरों के प्रति हिंसा करनी है। वे देखते हैं बचपन से माता-पिता खा रहे हैं, दोस्त खा रहे हैं, टीवी पर देखते हैं स्टार्स खा रहे हैं, तो फिर वे भी खाने लगते हैं। पर जब अगर उनको पता चलता है कि इसमें इतनी हिंसा है जानवरों के प्रति, इतनी वेदना होती है उनको—”फिर नहीं, मुझे नहीं खाना है।”
यहाँ पर एक उदाहरण ले रहा हूँ कि हम जो खाते हैं, ऐसा नहीं कि हर चीज़ जो हम खाते हैं, उसके बारे में हम सोचते हैं कि यह खाना चाहिए कि नहीं खाना चाहिए। जो समाज में होता है, वह हम करते रहते हैं। अगर कोई जानबूझकर या कोई ख़ास करके हमें बताता है कि यह ऐसा है, यह ऐसा है—”अरे, ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए!”
तो हमारे जीवन में ऐसा नहीं कि हर चीज़ का हम परीक्षण करके फैसला करते हैं। बहुत सी चीज़ें हम इसलिए करते हैं कि सब लोग कर रहे हैं। और यह ऐसा ज़रूरी नहीं कि बुरा है यह, क्योंकि अगर हर चीज़ के बारे में हम उसका परीक्षण करने लग जाएँगे तो हमारा दिमाग जो है, वह ओवरलोड हो जाएगा बहुत! तो उसको हमें… कुछ चीज़ हम जो है, समाज जो कर रहा है वह करते हैं, वह सही है। पर कई बार समाज जो होता है, वह गलत होता है और उसको भी जो मन है, अनुकरण कर लेता है—”यह लोग ऐसा कर रहे हैं, यह लोग ऐसा कर रहे हैं, मैं भी ऐसा करता हूँ।”
इसके कारण जब हमारा मन बोलता है “यह करना है, यह करना है, यह करना है”, तो उसकी जो मानसिकता क्या होती है कि The mind seeks security in commonality. “बहुत से लोग यह कर रहे हैं मतलब यह अच्छा होगा।”
अभी इसके लिए एक अंतिम पॉइंट के साथ मैं समाप्त करता हूँ। एक प्रश्न ऐसा दे सकते हैं कि मन को… एक है समझना कि मन को समझना कैसे है कि जब मन कुछ बोलता है “यह करो, यह खाओ, यह देखो, यह ऐसा करो”, तो यह मन ऐसा क्यों बोल रहा है? अगर हम समझते हैं—”अच्छा, यह मन के ऐसा बर्ताव करने का स्वभाव है, माँगने का स्वभाव है, जो लोग कर रहे हैं वह करने का स्वभाव है”, इसे हम समझते हैं।
पर मन को हमें कभी-कभी समझाना भी पड़ता है। जैसे वैष्णव गीत होते हैं: “भज हूँ रे मन श्रीनंदनंदन अभयचरणारविंद रे।” इसमें वे क्या बोल रहे हैं? अपने मन को बोल रहे हैं—”हे मन! तुम जो भगवान हैं, उनका स्मरण करो। उनके स्मरण करने से तुम्हें शांति मिलेगी, तुम्हें सुरक्षा मिलेगी।”
तो हमें मन को समझाना भी है। हम पूर्णतया मन को नेगलेक्ट नहीं कर सकते हैं। तो कभी-कभी मन यह बोलता है—”मुझे ऐसा करना है।” “नहीं, ऐसा नहीं करना है।” “क्यों नहीं करना है? मुझे करना है!” तो हमें समझाना है मन को।
और कभी-कभी मन समझेगा, कभी-कभी नहीं समझेगा। जैसे माता-पिता होते हैं और बच्चा होता है। तो बच्चा बोलता है—”मुझे यह खाना है, मुझे यह देखना है।” माता बोलती है—”नहीं, अभी नहीं।” “नहीं, मुझे देखना है!” तो कभी-कभी माता-पिता सिर्फ़ ‘नहीं’ बोलते हैं, डाँटते हैं—”नहीं चाहिए मुझे!” “मुझे चाहिए!” “नहीं, अभी नहीं!” बच्चा रोने लगता है, पर फिर भी माता-पिता दृढ़ संकल्प रहते हैं। तो बच्चा समझता है नहीं मिलने वाला है, शांत हो जाता है।
पर जैसे बच्चा बड़ा होने लगता है तो माता-पिता वह ज़बरदस्ती नहीं कर सकते हैं, उनको समझाना है—”नहीं, तुम्हारे लिए क्यों अच्छा नहीं है, यह ऐसा करेंगे तो ऐसा होगा, यह ऐसा करेंगे तो ऐसा होगा, इसलिए तुम ऐसा करो, ऐसा मत करो।”
तो उस तरह से हम सबसे पहले जब शास्त्रों से ज्ञान सुनते हैं, तो हम बुद्धि से उसको समझते हैं। और बुद्धि से जब हम समझते हैं, फिर उसके बाद में वह जो बुद्धि से हम समझे हैं, उसके द्वारा हमें खुद को, हमारे मन को समझाना है। हमारा मन जो है, वहाँ कितनी भी हमारी बुद्धि शक्तिशाली क्यों न हो, वह एक छोटे बालक के समान नटखट होता है, चंचल होता है। तो उसको हमें समझाना है।
तो इसलिए हम शास्त्रों में जब सुनते हैं ज्ञान, महत्त्वपूर्ण है शास्त्रों में सुनना। पर “अगर मुझे किसी को समझाना है तो कैसे समझाऊँगा मैं?” यह भाव जब हम रखते हैं, इस भाव से हम श्रवण करते हैं तो फिर क्या होता है? हम किसी और को समझाते हैं—”यह ऐसा है, यह ऐसा है।” तो फिर जब हम इस तरह से किसी को समझाने का प्रयास करते हैं, तो जब मन चंचल होता है, कभी-कभी हम उसको नेगलेक्ट कर सकते हैं—”नहीं, मैं यह नहीं करने वाला हूँ।” कभी-कभी उसको हम डाँटते हैं—”चुप! चुप बैठो तुम!” कभी-कभी हमको, जैसे बच्चा बड़ा होने लगता है, वह समझाना होता है। और इसमें हमारा मन भी समझ जाता है।
अगर हम देखेंगे, हमारी कई ऐसी आदतें होती हैं जो हम पहले कर रहे थे, पर अभी उसमें करने की रुचि भी नहीं है। जैसे मान लीजिए कोई शायद पहले कोई मांस खाते होंगे, भक्ति करने लगते हैं, कुछ समय भक्ति करते हैं, फिर बाद में कोई मांस खाने को बोलता है तो “नहीं, मुझे नहीं चाहिए।” ऐसा नहीं कि प्रलोभन हो रहा है, खाना है, पर नहीं खा सकते हैं इसको। ऐसा नहीं, उसमें इच्छा भी नहीं रहती है। तो क्या हो गया इसमें? मन भी समझ गया है, यह अच्छा नहीं है।
कि जब हमारा मन समझ जाएगा यह सही है, यह गलत है, तो फिर उसके बाद में हमारी आध्यात्मिक प्रगति जो है, वह शांत, शांति और आनंद के साथ होगी। तब तक हमारा संघर्ष रहेगा। मन कहेगा—”यह करो।” मन… “नहीं करना है!” “करना है!” “नहीं करना है!” वह द्वंद्व और संघर्ष होते रहेगा।
पर धीरे-धीरे जब हम श्रवण करते रहेंगे… तो वास्तव में जब हम प्रवचन सुनते हैं, महत्त्वपूर्ण है यह प्रवचन सुनना, शास्त्रों का अध्ययन करना, तत्वज्ञान को समझना। पर बाद में हमें सोचना है कि “मेरे मन को मुझे संभालना है, मेरे मन को कैसे समझाना है, यह जानना मेरी ज़िम्मेदारी है।”
तो हम सबको देखना है कि “अच्छा, यह श्लोक मुझे बहुत अच्छा लगता है, यह श्लोक मुझे बताता है कि इतना अच्छा है, यह ग्रंथ मुझे बताता है कि इतना अच्छा है, यह लेक्चर मुझे इतना अच्छा लगता है, यह जो स्पीकर हैं…”
अगर हम समझते हैं कि मेरे मन को समझना और मेरे मन को समझाना यह मेरी ज़िम्मेदारी है, तो फिर हमारी बुद्धि को हम सतर्क करके, भगवान की सेवा में सुदृढ़ होकर, धीरे-धीरे हमारे मन को भी हम परिपक्व कर सकते हैं।
भगवान कहते हैं, अगर हम योग की साधना कर देते हैं:
$$प्रशान्तमनसं\ ह्येनं\ योगिनं\ सुखमुत्तमम्\।$$
$$उपैति\ शान्तरजसं\ ब्रह्मभूतमकल्मषम्\॥$$
जो मन जो शांत हो जाता है, फिर “उपैति शान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्” — उत्तम सुख का अनुभव करते हैं। क्योंकि सर्वोत्कृष्ट परम सत्य भगवान हैं, उनसे हमारा संबंध फिक्स हो जाता है, फर्म हो जाता है। और फिर उस भगवान में एकाग्र होने से परमानंद का हमें अनुभव होता है।
तो सारांश में, आज मैंने चर्चा की किस तरह से जो मन है, उसको हम समझें। तो मैंने सबसे पहले मन को समझने के लिए एक स्क्रीन का उदाहरण लिया। हमारे इंद्रियों से जो भी इनपुट्स आ रहे हैं, वे मन के स्क्रीन में अलग-अलग विंडो के रूप में आते हैं। और जैसे कोई बड़े हाई सिक्योरिटी एस्टैब्लिशमेंट में सीसीटीवी से सारे इनपुट आते हैं कंट्रोल सेंटर, कंट्रोल रूम में उसके मॉनिटर में… तो अभी जहाँ पे कोई खतरा है, वह ज़ूम होना चाहिए। पर हमारा मन जब बद्ध होता है, तो जो भी उसको आकर्षित करता है, वह ज़ूम हो जाता है। और कई बार जो ज़रूरी नहीं है, जो अच्छा नहीं है, वह ज़ूम होता है मन के स्क्रीन में।
तो हमें देखना है, सबसे पहले हमें समझना है कि मैं मन नहीं हूँ। तो दुनिया जो है, बाहर हम देखते हैं, मन अंदर का स्क्रीन है। और आत्मा जो है, अंदर से देख रहा है, वह स्क्रीन का द्रष्टा है।
तो अभी मन के स्क्रीन पर जब जो कुछ आ जाता है, तो वह करने की इच्छा बहुत हो जाती है। तो मन एक कुत्ते के समान है जो ज़ोर से भौंकता है। पर उसके दाँत नहीं हैं, वह काटने नहीं जाता है। वह कितना भी भौंके, मन ज़बरदस्ती नहीं कर सकता हमसे। अगर हम उसको ‘ना’ बोलेंगे, उस पर ध्यान नहीं देंगे, तो मन धीरे-धीरे चुप हो जाएगा।
जैसे जंगली जानवरों को पालतू कैसे बनाते हैं? उसको खाना न देकर उसको प्रशिक्षण दिया जाता है। तो वैसे मन जब उसको खाना नहीं देते हैं तो बहुत भौंकता है, बहुत भौंकता है और ज़ोर से भौंकता है, और ज़ोर से गुर्राता है। पर कितना ही ज़ोर से गुर्रा रहा क्यों न हो, उसकी अंदर से शक्ति कम हो रही है! वैसे ही जब हम मन को ‘ना’ बोलते हैं तो कभी-कभी बहुत गुर्राता है, पर अंदर से वह कमज़ोर हो रहा है।
और जितना हम सतर्क रहते हैं, उतना हम समझ सकते हैं। तो इसलिए, अगर हम समझते हैं कि अल्टीमेटली मेरी आध्यात्मिक प्रगति यह मेरी ज़िम्मेदारी है… ज़रूर मुझे मेरे वरिष्ठों के मार्गदर्शन के अनुसार कार्य करना है, ज़िम्मेदारियों को पूरा करना है। पर सेवा करना ही मेरी ज़िम्मेदारी नहीं है, एक भगवद्भक्ति का भाव रखना यह भी मेरी ज़िम्मेदारी है! अच्छी कृष्ण के अनुकूल चेतना रखना यह भी मेरी ज़िम्मेदारी है।
तो यह सेवा करते समय अगर यह ज़िम्मेदारी ले रहा हूँ पर उस समय चेतना खराब हो रही है, तो फिर वह चेतना को ठीक करने के लिए कुछ और भी करना है। तो वह करके हम खुद को सुरक्षित रख सकते हैं।
प्रश्नोत्तर (Q&A Session)
प्रश्न 1: जब किसी व्यक्ति के क्रोध का कारण हमें समझ नहीं आता, और वह क्रोध हम पर निकालता है, तो हमें उसके प्रति क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए?
उत्तर: परिस्थिति के अनुसार यह अलग-अलग हो सकता है। क्रोध क्यों आया है, यह समझना इतना आसान नहीं है। क्योंकि क्रोध जिसके कारण आ रहा है और क्रोध किसकी ओर जा रहा है, यह अलग-अलग होता है। कामना जब होती है, कामना जिससे आती है उसकी ओर ही आती है। तो यह काम और क्रोध में फ़र्क है।
तो अगर हम किसी व्यक्ति को जानते हैं अच्छी तरह से, तो फिर उनसे बातचीत करके, उनके जीवन के बारे में थोड़ा विचार करके समझ सकते हैं कि “अच्छा, इसके कारण ऐसा हो रहा है। यह उनके जीवन में ऐसा हुआ था, ऐसा हुआ था, ऐसा हुआ था। उसके कारण उनको इतना क्रोध आता है।”
कभी-कभी कई लोगों के क्रोध का एक कारण नहीं होता है। यह घटना बुरी हो गई, वह बुरी हो गई, वह बुरी हो गई… तो कई अगर बुरी चीज़ें किसी के जीवन में हो जाती हैं, तो उसके बारे में वे अंदर से ही कटु बन जाते हैं, कड़वे बन जाते हैं। तो फिर ऐसे बन जाते हैं तो वह कई प्रसंगों में आ रहा होता है।
तो अभी कुछ-कुछ लोग हैं, अगर उनको हम समझते हैं, उनको स्नेह देते हैं, उनको आदर देते हैं, तो धीरे-धीरे वह कटुपन कम हो जाता है। पर कभी-कभी अच्छा होता है, कभी नहीं होता है। तो हमें देखना है कि हममें क्षमता कितनी है। क्योंकि हमारी भी सहनशीलता की क्षमता असीमित नहीं है।
तो क्या होगा, हम उनसे आदान-प्रदान में खुद को सहन तो कर लेंगे, पर वह जो उसमें क्रोध है, वह हम किसी और पर डाल लेंगे! फिर क्या होता है, वह एक क्रोध की परंपरा शुरू हो जाती है—इसके कारण मैं क्रोध करता हूँ तुम पर, और तुम मेरे कारण उस पर क्रोध करते हो, और वह उसके कारण उस पर क्रोध करता है!
कई बार अमेरिका में जब मैं 3-4 महीने पहले था, तो लास वेगास में एक व्यक्ति ने लगभग 50-60 लोगों को अपने म्यूज़िक कॉन्सर्ट में मार डाला। तो क्या उसके ऊपर क्रोध था, कहाँ क्रोध था? उसने गन ले ली और किसी को भी मार डाला! तो क्या है, जो क्रोध है, वह काफी खतरनाक होता है इस तरह से, क्योंकि किसी का भी क्रोध हम किसी पर भी निकाल देते हैं।
तो इसलिए हमें देखना है कि हमारी क्षमता कितनी है। अगर हमारी क्षमता उतनी नहीं है कि उस व्यक्ति को परिवर्तित कर सकें, तो फिर हमें कुछ हद तक एक safe distance (सुरक्षित दूरी) क्रिएट करना पड़ता है उस व्यक्ति में और हममें। ऐसा नहीं कि संबंध ही छोड़ देते हैं, पर हमें देखना है कि अगर मैं खुद ही इसमें व्यथित हूँ कि मैं कुछ कर ही नहीं पा रहा हूँ, तो फिर मैं इस व्यक्ति के लिए क्या प्रार्थना कर सकता हूँ।
पर अगर हम भक्ति कर रहे हैं और भक्ति से हमको रुचि मिल रही है, शक्ति मिल रही है, तो अगर हम स्नेह दिखाते हैं, आदर दिखाते हैं, व्यक्ति को समझने का प्रयास करते हैं… पर उसके कारण क्या होता है, वे खुद को घावों से उबारने का प्रयास करते हैं। पर उसमें दूसरे एक प्रकार के घाव हो जाते हैं—अकेलेपन में रहते हैं, सारी दुनिया के बारे में बुरा सोचते हैं और दूसरे को भी घाव देते हैं।
तो क्या है कि हम सब संबंधों के लिए जी नहीं सकते। हम सबमें कभी-कभी बुरे अनुभव आते हैं, अच्छे अनुभव आते हैं, इस जीवन में चलता रहता है। अगर हम भगवान से संबंध जोड़ सकते हैं, उसमें हमें अगर स्थिरता मिलती है, तो फिर हमारे इस जीवन में जो भी संबंध हैं, उसमें कभी ऊपर-नीचे जो होगा, उसको हम सहन करने की क्षमता प्राप्त कर सकते हैं। और फिर उसमें उचित कार्य क्या करना है, उसके बारे में हम शांति से विचार करते हैं, फिर निर्णय लेते हैं।
प्रश्न 2: जप करते समय मन बहुत भटकता है और अनेक विचार आते हैं, इसे कैसे नियंत्रित करें?
उत्तर: जप करते समय बहुत से विचार क्यों आते हैं? तो वास्तव में हम जप नहीं कर रहे हैं, हमारी जिह्वा जप कर रही है, हमारा मन कुछ और भाग रहा है और हमारी आत्मा दोनों में सोच रही है कि क्या करना है!
तो उसमें क्या होता है अभी? कई बार मन को सुन लेते हैं। तो मन को जप में लगाना बड़ा मुश्किल है। जिह्वा है, मन है और आत्मा है। जब वास्तव में हम कुछ समझते हैं, तो जब यह आत्मा, मन और इंद्रिय साथ में होते हैं, तभी वह कार्य अच्छी तरह से होता है। अब मैं जैसे बोल रहा हूँ तो आप कुछ सुन रहे हैं, तो आप कब सुन पाते हो? अपने कानों से आप सुन रहे हैं, पर मन कहीं और जा रहा है तो सुन नहीं पाएँगे आप। तो यह तीनों जब साथ में आते हैं—आत्मा, मन और इंद्रिय—तब जो हो रहा है वह अच्छे से हम समझते हैं।
तो जप करते समय, वास्तव में जप का जो फायदा है तभी होता है हमें जब हम यह तीनों साथ में ला रहे हैं। तो कई बार मन को लगता है कि जप बहुत बोरिंग है, मुझे नहीं करना है। तो इसलिए, क्योंकि अभी हमने फैसला कर लिया है कि इतने माला करने हैं, तो मन फैसला कर लेता है—”तुम वह माला करो, मैं अपना काम करूँगा!”
इसलिए क्या होता है, जप के समय वह मन और भटकने लगता है क्योंकि उसको लगता है—”अभी तो मेरे लिए फ्री है पूरा! जो मैं करना चाहूँ करूँगा, दो घंटे यह तो मैं मौज करने वाला हूँ। जिह्वा जप करती रहे, मैं घूमते रहूँगा!”
तो इसलिए तभी हमें क्या करना है कि मन को उस विधि में कैसे लाना, यह देखना है। इसमें दो चीज़ें हैं। इस पर मेरा एक पूरा बड़ा सेमिनार है, उसमें मैं ज़्यादा जाऊँगा नहीं, पर मैं तीन चीज़ें देखता हूँ:
- कॉमन डिस्ट्रैक्शंस को समझना: अगर हम जप कर रहे हैं तो क्या जप के समय मेरे मन को विक्षिप्त करवाता है? हज़ार चीज़ें हो सकती हैं। पर अगर हम जप के बाद पाँच मिनट बैठते हैं और थोड़ा सोचते हैं, तो हम देखेंगे कि कुछ-कुछ चीज़ें रोज़ आती रहती हैं—”यह व्यक्ति, इसने ऐसा किया”, “मेरे जॉब का क्या होगा”, “मेरे पास अभी पैसे नहीं हैं”… कुछ-कुछ चीज़ें कॉमन आती रहती हैं। तो हमारे जो common distractions हैं, वह हमें समझना है। और फिर बुद्धि से उसको इस्तेमाल करते हैं—”ठीक है, मेरे पास पैसा नहीं है, पैसे का क्या करूँगा मैं?” तो फिर अगर हम उसका जो मन का विचार है, चिंता है, उसको एनालाइज़ करते हैं कि “मैंने यह योजना बनाई है, यहाँ से मैं सेविंग कर रहा हूँ, यह यह कर रहा हूँ…” उसको प्रैक्टिकली वह जो चिंता है, वह जो विचार है, उसको एड्रेस कैसे करना है, वह लिख लेते हैं। और फिर हम जानते हैं कि जप के पहले मुझे अगर यह भटकता है, तो वह क्यों भटक रहा है, उसको कैसे एड्रेस करना है, उसको बुद्धि के द्वारा हम विश्लेषण करते हैं। तो उससे वह डिस्ट्रैक्शन कम हो सकता है।
- कृष्ण की ओर आकर्षण (What attracts the mind?): जप करते समय कृष्ण की ओर मन को हम कैसे आकर्षित कर सकते हैं? शायद उस समय हम भगवान के कुछ चित्र हमारे सामने रख सकते हैं, हरे कृष्ण महामंत्र जो लिखा है उसके सामने रख सकते हैं, जप की जो महिमा है उसके बारे में कुछ श्लोक या उसके बारे में कुछ कोट सामने रख सकते हैं।
- खुद को मन से दूर ले जाना: जप करते समय कुछ ऐसी चीज़ें करते हैं कि जिससे हम खुद को मन से दूर ले जा सकें। तो शायद दो माला, चार माला, छह माला हो जाने के बाद कि मैं थोड़ा रुक के गहरी साँस लूँगा। और तभी जब गहरी साँस ले रहा हूँ, ध्यानपूर्वक—”अच्छा, क्या कर रहा हूँ? अच्छा, मेरा मन उधर जा रहा है, नहीं…” नहीं ध्यान करते हैं तो फिर मन बहुत भटकता है। तो फैसला करते हैं कि मैं उठूँगा और थोड़ा चलूँगा। तो चलने में इतना ध्यान नहीं लगता है, पर क्या होता है, चलते समय कम से कम “यह मैं इधर चल रहा हूँ, उधर चल रहा हूँ” तो मन की दुनिया में उतना भटकते नहीं हैं। तो कभी-कभी मन की दुनिया में बहुत भटक रहा है, तो स्थूल रूप से कुछ कार्य करने से… बीच में थोड़ा खुद को साँस लेकर या उठकर, चलकर, श्लोक बोलकर थोड़ी दूरी लाते हैं।
तो फिर हमें अहसास होता है कि “अरे! मेरा मन जा रहा है इधर।”
$$यतो\ यतो\ निश्चरति\ मनश्चंचलमस्थिरम्\।$$
$$ततस्ततो\ नियम्यैतदात्मन्येव\ वशं\ नयेत्\॥$$
भगवान कहते हैं, जहाँ भी मन भटकता है, उसको आप वापस ले आओ। और इस तरह से हम करते हैं, यह विश्लेषण करके, तो फिर मन को हम भगवान के जप में और लगा सकते हैं।
प्रश्न 3: जब हमारे अंदर नकारात्मक भाव या काम-क्रोध-लोभ जैसी कमियाँ आती हैं, तो उससे हताश हुए बिना कैसे आगे बढ़ें?
उत्तर: हमारी सबसे बड़ी कमज़ोरी यह नहीं कि हममें काम है, क्रोध है, लोभ है; हमारी सबसे बड़ी कमज़ोरी यह है कि हम यह विश्वास नहीं कर पाते हैं कि भगवान कृष्ण अभी भी मुझसे प्रेम करते हैं, मैं जैसा भी हूँ, वैसा भी!
ऑफकोर्स, भगवान का प्रेम हमें अहसास नहीं हो रहा है, क्योंकि हम आसक्त हैं बहुत। माता-पिता अपने बच्चे से बहुत प्रेम करते हैं, पर वह बच्चे को चाहिए—”यह खिलौना चाहिए।” अगर खिलौना मिल गया तो “माता-पिता कितने अच्छे हैं!” खिलौना नहीं मिला—”माता-पिता मुझे प्रेम नहीं करते हैं!” पर बच्चा माता-पिता के प्रेम को खिलौने की दृष्टि से देख रहा है।
तो वैसे जब हम आसक्त होते हैं, तो हम आसक्ति की दृष्टि से ही भगवान के प्रेम को देखते हैं। तो अगर जो आसक्ति की चीज़ मिल गई—”भगवान कितने अच्छे हैं!”, आसक्ति की चीज़ नहीं मिली—”भगवान कितने बुरे हैं, भगवान कुछ कर ही नहीं रहे!”
पर इसका भी विपरीत भाव होता है भक्ति में। जब हम वैराग्य का प्रयास करते हैं, अगर वैराग्य हो गया—”भक्ति कितनी अच्छी है!”, वैराग्य नहीं हो रहा है—”भक्ति का क्या फायदा है?” पर भले ही हम आसक्त हो पा रहे हैं, नहीं हो पा रहे हैं… वैराग्य भी मन का खिलौना बन जाता है कि “मुझे यह चाहिए, और नहीं मिलेगा तो कुछ भी नहीं होगा, तो फिर क्या फायदा है?” नहीं, ऐसा नहीं है!
हम सब अलग-अलग पूर्वजन्मों के संस्कारों से आए हुए हैं। और कभी-कभी किसी चीज़ में वैराग्य काम नहीं कर रहा है, दूसरी कई चीज़ें होंगी जहाँ पे हमारी भक्ति काम कर रही है, तो हम अनासक्त हो पा रहे हैं या नहीं हो पा रहे हैं… भगवान फिर भी हमारे हृदय में हैं! भगवान हमारा त्याग करके नहीं चले जाते हैं, भगवान हमारे साथ रहते हैं।
तो अगर हम यह फैसला कर लेते हैं कि “यह कुछ भी हो जाए, मैं अनासक्त हो पाऊँ या न हो पाऊँ, फिर भी मैं भक्ति करता रहूँगा।” तो वह जब हमारी दृष्टि होती है कि हम इंद्रिय विषय के प्रिज्म के मापदंड से भगवान को देखते हैं… एक है कि इंद्रिय विषय मुझे मिल गया तो भगवान अच्छे हैं; दूसरा है कि इंद्रिय विषय से आसक्ति चली गई तो भगवान अच्छे हैं—ऐसा नहीं है! भगवान सबसे परे हैं।
और हमारे पुराने संस्कारों के अनुसार कभी-कभी कुछ इंद्रिय विषय हमसे आसानी से छूट जाएँगे, कभी-कभी मुश्किल है। इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि हम भगवान से संबंध जोड़े रखें।
गजेंद्र अपनी प्रार्थना में भगवान से कहते हैं: “प्रभु! आप मुझे इस ग्राह के पाश से छोड़ो।”
भगवान कहें कि “क्यों छोड़ूँ?”
“प्रभु! आप मुक्त हो, मैं बद्ध हूँ, इसलिए मुझे आप छुड़ाओ।”
भगवान कहें कि “पर मैंने तुमको कितना छोड़ने का प्रयास किया है, तुम तो अपने कर्मों से ही बँधे हुए हो, मैं तुम्हें क्यों छोड़ूँ? पर तुम आसक्त रहते हो।”
“प्रभु! आप कभी थकते नहीं हो। आप कृपया अपना प्रयास कीजिए, मुझे छुड़ाइए।”
तो भगवान कभी थकते नहीं हैं, भगवान कभी हताश नहीं होते हैं। तो इसलिए जो भी इंद्रिय विषयों के संघर्ष में हमको विजय मिले या पराजय मिले, हमें महत्त्वपूर्ण है कि हम भगवान से संबंध जोड़ने का जो युद्ध है, वह बरकरार रखें।
प्रलोभन होता है, बुद्धि का विकास होता है और फिर हम समझ सकते हैं बेहतर कि “ठीक है, इस प्रलोभन का मैं सामना कैसे कर सकता हूँ, कैसे इससे मुक्त हो सकता हूँ।” अगर हम भगवान की भक्ति में हताश हो जाएँगे, तो फिर हमें शक्ति और शुद्धिकरण कहाँ से मिलने वाला है? तो कभी भी हम उसके पार जा ही नहीं सकते हैं।
दूसरा उदाहरण ले सकते हैं: कोई व्यक्ति घोड़े पर चल रहा है और वह घोड़ा रास्ते पर जा रहा है, पर उसको बाद में कोई फल दिख जाता है और उधर भागने लगता है। तो अगर वह घुड़सवार चौकन्ना है, तो तुरंत वह घोड़े को खींच लेगा। पर कभी-कभी ऐसा हो सकता है कि वह चौकन्ना नहीं है और घोड़ा भागने लगता है। और जितना तेज़ी से घोड़ा भागने लगता है, उतना उस घुड़सवार के लिए उस घोड़े को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है। और कभी-कभी घोड़े की रफ्तार इतनी बढ़ जाएगी कि वह घोड़े को रोकना नामुमकिन हो जाएगा और घोड़ा शायद रास्ते से निकल जाएगा, वह बाहर कहीं चला जाएगा, घुड़सवार गिर जाएगा नीचे। तो काफी घायल हो सकता है, कुछ एक्सीडेंट हो सकता है उसमें। पर फिर भी उसके बाद वापस वह उस घोड़े पर चढ़ जाता है और पुनः यात्रा शुरू कर सकता है।
तो उस तरह से कभी-कभी मन का प्रलोभन बहुत बढ़ जाता है और तभी नियंत्रण करना नामुमकिन सा हो जाता है। तो उस समय जो हो गया, उसके बारे में हम कुछ नहीं कर सकते हैं।
तो फिर उसमें जो भौतिक वासना है, कभी-कभी बीच में बहुत तेज़ बन जाती है। पर ऐसा नहीं कि वासना 24 घंटे हमें उतनी ही तीव्रता से परेशान कर रही होगी। कभी बहुत ज़्यादा हो जाता है, तो फिर जब वह बहुत ज़्यादा हो रहा है, तब शायद हम कुछ नहीं कर पाएँगे। पर बीच में क्या कर रहे हैं? वह भी बहुत बढ़ गया, बाद में खुद को कोस रहा हूँ—”मैंने ऐसा क्यों किया, क्यों किया, क्यों किया?” फिर कोसते रहता हूँ, तो उससे भी ज़्यादा फायदा नहीं होने वाला है।
वास्तव में तभी क्या हो रहा है? पहले मन बोल रहा था—”यह करो, यह करो, यह करो”, बाद में वही मन अपना बहुरूपी बन जाता है—”क्यों किया, क्यों किया? तुम कितने मूर्ख हो!” वह मन ही कोस रहा है!
अगर हमारी विवेक-बुद्धि अगर कोस रही है, तो उससे क्या होगा? हमारा दृढ़ संकल्प भक्ति करने का बढ़ जाएगा। पर जब मन कोसता है, वह बोलता है—”तुम इतने मूर्ख हो, तुम कभी सुधर ही नहीं सकते! तुम्हारे भक्ति करने से क्या फायदा, छोड़ दो भक्ति तुम!”
तो इसलिए, sometimes it is impossible to be not conscious of the mind, but that doesn’t mean that we have to be always conscious of the mind only. कभी-कभी मन की बात को अनसुनी करना नामुमकिन हो जाता है, पर वह प्रसंग हो गया, जो भी हो गया, सो हो गया। पर उसके बाद में मन की बात को नहीं सुनना, तभी तो मैं कृष्ण की बात सुनने लगूँगा! तभी मैं कृष्ण भक्ति में तीव्रता से लग जाता हूँ।
पर अगर ऐसा लगाऊँगा तो अगली बार जब वह इच्छा बढ़ जाएगी, तभी मैं… क्योंकि भक्ति की तो मेरी शक्ति और बढ़ गई है, बुद्धि और विकसित हो गई है, तो तभी संभावना अधिक है कि मैं तभी उसको नियंत्रित कर सकूँगा।
इसलिए जो मन अगर कभी नियंत्रित नहीं हो रहा है, तो फिर उसके बारे में खुद को कोसने की जगह पे बाकी समय में हम मन को नियंत्रित रख के भक्ति में लग सकते हैं। इसलिए जो भगवान कहते हैं:
$$अपि\ चेत्सुदुराचारो\ भजते\ मामनन्यभाक्\।$$
$$साधुरेव\ स\ मन्तव्यः\ सम्यग्व्यवसितो\ हि\ सः\॥$$
कभी-कभी कोई भक्त से कोई दुराचार हो भी जाता है, पर अगर वह भक्त बिना हताश हुए भगवान की भक्ति में लगा रहता है (“भजते मामनन्यभाक्”), तो फिर ज़रूर उसका शुद्धिकरण हो जाएगा और फिर:
$$क्षिप्रं\ भवति\ धर्मात्मा\ शश्वच्छांतिं\ निगच्छति\।$$
$$कौंटेय\ प्रति\ जानीहि\ न\ मे\ भक्तः\ प्रणश्यति\॥$$
जल्दी ही वह शुद्ध हो जाएगा, शांत हो जाएगा। भगवान प्रतिज्ञा करते हैं कि अगर कोई मेरी भक्ति में लगा रहेगा तो कभी भी उसका विनाश नहीं होगा।
बहुत-बहुत धन्यवाद!
श्रील प्रभुपाद की जय!
गौर भक्तवृंद की जय!
निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!