How the mind spoils our relationships – Hindi
[Class at ISKCON, Chandigarh, India]
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Lecture Summary
भगवद्गीता (18.35) के आधार पर दिए गए इस प्रवचन में बताया गया है कि जब हमारा मन और बुद्धि तामसिक (अज्ञानता से ग्रसित) हो जाते हैं, तो वे हमारे मित्र की बजाय हमारे शत्रु बन जाते हैं। इस पूरे विषय के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- 1. प्राथमिकताओं का विकृत होना (Distorted Priorities): एक अनियंत्रित मन हमें यह भूलने पर मजबूर कर देता है कि जीवन में क्या अधिक महत्वपूर्ण है और क्या कम। उदाहरण के लिए— पति-पत्नी के आपसी झगड़े में बेकसूर बच्चे को अनाथ कर देना या शराब की लत के लिए परिवार के भोजन में कटौती करना। मन छोटी बातों को बड़ा बनाकर हमारे अनमोल रिश्तों को नष्ट कर देता है।
- 2. ‘शॉपिंग मॉल’ मानसिकता (The Shopping Mall Mentality): आधुनिक तंत्रज्ञान (Technology) ने हमें बाहरी चीजों (जैसे गर्मी लगने पर AC चलाना) को नियंत्रित करने की आदत डाल दी है। यही “बदल देने” की मानसिकता हम रिश्तों और अध्यात्म में भी ले आए हैं। कोई रिश्ता या नियम थोड़ा भी कठिन लगता है, तो हम उसे सुलझाने की बजाय “छोड़ दो, नया ले लो” की नीति अपना लेते हैं। हमें कमिटमेंट (दृढ़ संकल्प) की आवश्यकता है।
- 3. त्रिपक्षीय संबंध (Trilateral Relationships): भक्ति मार्ग में हमारे संबंध केवल दो व्यक्तियों (Bilateral) के बीच नहीं होते, बल्कि उनमें भगवान भी शामिल होते हैं (Trilateral)। जब कोई व्यक्ति हमारे साथ बुरा बर्ताव करे, तो हमें प्रतिक्रिया उस व्यक्ति के अनुसार नहीं, बल्कि “भगवान की सेवा” के भाव से करनी चाहिए।
- 4. समस्याओं के तीन समाधान (Tolerate, Mitigate, Emigrate): जीवन की हर समस्या से निपटने के लिए हमारे पास तीन विकल्प होते हैं, जिन्हें हमें ‘बदले की भावना’ से नहीं बल्कि ‘सेवा भाव’ से अपनाना चाहिए:
- Tolerate (सहन करना): जैसे पांडवों ने लाक्षागृह का षड्यंत्र सहन किया।
- Mitigate (प्रतिकार/बदलाव करना): जब पानी सिर से ऊपर चला जाए, तो धर्म के लिए डटकर खड़े होना।
- Emigrate (त्याग करना): जब कोई परिस्थिति हमारी आध्यात्मिक प्रगति में बाधक बने, तो उसमें व्यर्थ उलझने के बजाय उसे त्याग कर आगे बढ़ जाना।
- 5. हमारी असली पहचान (Revision of Self-Definition): हमारी सबसे पहली पहचान यह है कि “हम भगवान के सेवक हैं”। पिता, माता, पति, पत्नी, या भाई-बहन होना हमारी द्वितीयक (Secondary) पहचान है। जब हम अपनी पहली पहचान को केंद्र में रखकर सारे सांसारिक रिश्ते निभाते हैं, तो हम जिम्मेदार तो बनते हैं, पर उनमें इतने आसक्त नहीं होते कि उनके टूटने पर हमारा जीवन ही व्यर्थ लगने लगे।
- 6. भगवान की योजना पर विश्वास: हम वर्तमान को देखकर अपने भविष्य की योजना बनाते हैं, लेकिन भगवान हमारे भविष्य को देखकर हमारे वर्तमान की योजना बनाते हैं। जीवन में जो भी दुख या बाधाएं आती हैं (जैसे उस रशियन माताजी की गाड़ी का छूट जाना और दुर्घटना से बच जाना), वह भगवान की किसी बड़ी और सकारात्मक योजना का हिस्सा होती हैं।
Full Transcription
हरे कृष्णा! मैं भक्तगणों, आज आप सबके बीच में भगवान के कुछ संदेश के बारे में चर्चा करने का ये मौका है। तो मैं भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय के एक श्लोक पर चर्चा करूंगा:
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥
यह अठारहवें अध्याय का 35वां श्लोक है। इसमें भगवान बताते हैं कि जब हमारी बुद्धि तामसिक हो जाती है, तो फिर उस समय हम नकारात्मक, निराशावादी भावनाओं के वश में चले जाते हैं। और जो मन और बुद्धि वास्तव में साथ में हमारे अच्छे के लिए काम करनी चाहिए, पर यह दोनों मिलकर हमारे विनाश के लिए कार्य करती हैं। तो यह विषय जो है कि हमारा मन हमारे संबंधों को कैसे खराब करता है, हमारे मन को अच्छे के लिए कैसे काम करना चाहिए, तो मैं शुरुआत एक प्रसंग से करूँगा।
रिश्तों में अलगाव और बच्चों पर प्रभाव
अभी मैं दो तीन महीने पहले पाश्चात्य देश के दो महीने के टूर के लिए गया था। मैं एक विद्यार्थी से बात कर रहा था, तो बातचीत चल रही थी। तो मैं विद्यार्थी को बता रहा था कि अगर वो परिवार को जमता नहीं है बच्चा, तो वो बच्चों को छोड़ देते हैं, फिर किसी और फॉस्टर होम (Foster home) में चले जाते हैं। तो कई बच्चे फॉस्टर होम में रहते हैं। तो फिर मैंने उसको पूछा कि, “क्या हुआ आपके माता-पिता का कुछ एक्सीडेंट हो गया था, कैसे कुछ हो गया है?”
वो बोला, “नहीं, मेरे माता-पिता दोनों जीवित हैं।”
मैंने बोला, “अगर आपके माता-पिता जीवित हैं, तो फिर आप फॉस्टर होम में क्यों बड़े हुए?”
तो बोला कि, “जब मैं पांच साल का था, तब मेरे माता-पिता का डिवोर्स हो गया।” और साधारणतया जब डिवोर्स होता है, तो फिर जो माता-पिता होते हैं, उनमें कई बार कस्टडी बैटल्स (Custody battles) होते हैं। कि माता कहती है, बच्चा मेरे साथ चाहिए। पिता कहता है, बच्चा मेरे पास चाहिए। पर इसके साथ ऐसे हुआ कि दोनों माता-पिता ने कहा कि “मैंने जो शादी की थी, ये शादी मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती थी। और तुम (बच्चे को बोले वो) तुम मुझे मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती की याद दिलाते हो। इसलिए मुझे तुमसे कुछ लेना-देना नहीं है।”
तो दोनों माता-पिता जीवित होते हुए, दोनों ने बच्चे को ठुकरा दिया। और वो बच्चा माता-पिता होते हुए अनाथ बन गया वो। और उसको जाके किसी और के घर में रहना पड़ रहा था। तो वो बता रहा था मुझे, कि जब वो कभी भक्ति के संदेश में सुनता है, कि ‘कृष्ण माता, कृष्ण पिता, कृष्ण धन प्राणा’। तो बोलते हैं, “अगर कृष्ण मेरे माता-पिता जैसे हैं, तो मुझे कृष्ण नहीं चाहिए।” तो साधारणतया माता-पिता जो होते हैं, स्नेह देते हैं, प्रेम देते हैं। तो अभी यहां पे क्या हो गया है वास्तव में?
मन: मित्र या शत्रु?
हम कई बार कहते हैं कि मन हमारे शत्रु के रूप में कार्य करता है। हमारा जो सेंस पर्सपेक्टिव (Sense perspective) है मतलब, हमको सही तरह से देखना, जिससे कि हम समझें कि क्या ज़्यादा महत्वपूर्ण है, क्या कम महत्वपूर्ण है? वह जो समझना है, बहुत जरूरी है। प्रभुपाद जी, भगवद्गीता के दसवें अध्याय के तात्पर्य में लिखते हैं, बुद्धि का मतलब है कि हम समझें कि यह बहुत महत्वपूर्ण है, यह कम महत्वपूर्ण है, वह त्याग सकते हैं, यह रख सकते हैं, कोई चीज़ कम महत्वपूर्ण है, कौन सी बात अधिक महत्वपूर्ण है। यहाँ जो समझ है, कभी-कभी हमारा अनियंत्रित मन इसमें हमें गुमराह कर देता है।
तो हो सकता है कभी-कभी कोई दो व्यक्ति विवाह-शादी कर लेते हैं, पर फिर उनका जमता नहीं है। और अगर बहुत आशाओं के साथ हम किसी संबंध में आते हैं, और फिर उसमें निराशा होती है, तो उससे क्रोध भी आता है। पर कितना भी क्रोध आ जाए, कितनी भी नफरत आ जाए, तो वो नफरत इतना ओवरपावर (Overpower) नहीं कर देती है जो प्रेम (Love) के लिए होती है।
अभी वो पति-पत्नी का अगर नहीं जम रहा है, वो अलग भी हो रहे हैं, तो उनका एक-दूसरे के साथ नहीं जम रहा है, उसके कारण उनके बच्चे के प्रति नफरत कैसे आ गई? ये क्या है? वो बच्चा तो बिल्कुल बेकसूर है। तो ठीक है, एक-दूसरे से नहीं जम रहा है, ठीक है, पर नहीं जम रहा है, तो क्या कर सकते हैं? इसे भी सहन कर सकते हैं, पर उसको छोड़ दो। पर क्या हो गया वो नफरत इतनी बढ़ गई, कि जिसका उस नफरत से कोई संबंध नहीं है, उस पे वो नफरत हो गई। उस पे भी राग-द्वेष आ गया। भगवान कहते हैं, जो द्वेष होता है, ये मुझे बिलकुल नहीं चाहिए, मुझे इससे कुछ भी लेना देना नहीं है। वहां द्वेष बहुत बढ़ जाता है।
आसक्ति कैसे प्राथमिकताएँ बिगाड़ती है
मेरे एक मित्र रशिया में हैं, वह बता रहे थे, कि जब रशिया में कम्युनिज्म था, तभी वहां पे लोग वोदका बहुत लिया करते थे। और जब वोदका बहुत लेते थे (वोदका रशिया की शराब होती है), जब वो बहुत लेते थे, तो उससे बहुत से परिवार बर्बाद हो रहे थे। अगर वोदका की कीमत बढ़ गयी है, तो क्या आप शराब कम पियोगे? तो पिता बोलते हैं, कि “नहीं, अभी तुम खाना कम खाओगे।”
मतलब क्या हो गया? यहाँ पे शराब की आसक्ति इतनी बढ़ गयी, कि जो पिता है, वो उनका स्वाभाविक भाव है, कर्तव्य है, स्नेह है, कि अपने परिवार वालों की देखभाल करना, पर उनका खाना कम करके, वो व्यक्ति अपनी शराब को बनाए रखना चाहता है। तो हम बोलेंगे, कितना यह घृणास्पद कार्य है! पर अगर हम उसका विश्लेषण करेंगे, तो विश्लेषण में क्या हो गया है?
वो जो शराब है, वो इतनी महत्वपूर्ण बन गई है, कि अपने परिवार वालों की देखभाल की उसके आगे कीमत नहीं रही है। मन क्या करता है? हमारा परिवार, हमारी जो देखने की पद्धति है, उसको विकृत कर देता है। क्या कितना महत्वपूर्ण है, क्या कम महत्वपूर्ण है, वो हमें समझ में नहीं आता है। और उसके कारण हम छोटी चीज को बहुत बड़ी बना देते हैं, और उससे जो बड़ी चीज है, उसको हम खो देते हैं।
आध्यात्म की ओर झुकाव
जब आजकल के समाज में हम अध्यात्म की चर्चा करते हैं, तो अधिकांश लोग जो आध्यात्मिक मार्ग में आते हैं, उसका एक कारण होता है कि उनको दुख होता है, क्लेश होता है। तो भगवद्गीता में बताते हैं, भगवान के पास चार प्रकार के लोग उनके पास आते हैं: आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी। जो दुख में हैं, जो जिज्ञासा कर रहे हैं, जिनको ज्ञान है, और जो अर्थ चाहते हैं, धन-संपत्ति।
और अब ये दुख भी अधिकांश रूप से कहां से आता है? हमारे संबंधों में हम हताश हो जाते हैं, निराश हो जाते हैं, और उससे उत्तेजित हो जाते हैं, व्यथित हो जाते हैं, तो हमें कुछ आध्यात्मिक आश्रय चाहिए होता है।
मैं इस पर्सपेक्टिव को समतोल रखने के लिए तीन विषयों के बारे में थोड़ी चर्चा करूँगा: अटैचमेंट (Attachment), डिटैचमेंट (Detachment) और कमिटमेंट (Commitment)। भक्ति में एक बारे में अटैचमेंट और डिटैचमेंट होता है, भक्ति में एक बारे में कमिटमेंट होता है। अटैचमेंट मतलब आसक्ति, डिटैचमेंट मतलब अनासक्ति या विरक्ति, और कमिटमेंट मतलब हम कह सकते हैं दृढ़ संकल्प होता है।
यहां आसक्ति और विरक्ति, इन दोनों में मन घूमते रहता है। आजकल के लोग संबंध जोड़ना नहीं चाहते हैं, इसका मतलब यह नहीं कि उनको भोग की इच्छा नहीं है, पर क्या होता है, उनको कोई शाश्वत संबंध जोड़ना नहीं, कमिटमेंट नहीं चाहिए।
बाहरी दुनिया पर नियंत्रण की चाह
और यह मन का जो स्वभाव है, यह मन का स्वभाव क्यों आता है? क्योंकि जैसे आधुनिक समाज ने प्रगति की है, तो उस प्रगति के द्वारा हम अधिक-अधिक बाहरी चीजों पे नियंत्रण कर पा रहे हैं। पहले अगर बहुत गर्मी होती तो हमें सहन करनी पड़ती, अभी फैन होता है, एसी होता है, कार में भी एसी होता है। अमेरिका में एक शहर है, वो पूरा उसमें एयर कंडीशनिंग है, पूरे सिटी, पूरे शहर पे ही एक रूफ है, और उसमें एयर कंडीशनिंग कर दिया है। वो पूरा शहर नहीं, शहर का जो मेट्रोपॉलिटन एरिया है। तो इस तरह से हम बाहरी चीजों में जो दुख आते हैं, क्लेश आते हैं, उसपे हम नियंत्रण कर पा रहे हैं, तंत्रज्ञान के द्वारा।
पर इससे होता यह है, कि हमें लगता है, कि अगर कोई चीज मेरे मन के अनुसार नहीं हो रही है, तो फिर उसको बदलना है। बहुत गर्मी है, उसको मुझे एसी लगा दूँगा, फैन लगा दूँगा, और गर्मी को निकाल दूँगा। इसमें कोई बुरी चीज नहीं है। पर इसके पीछे जो भाव है, कि जो हमारे मन के अनुसार नहीं है, उसको सहन न कर पाना, यह जो है, काफी समस्या निर्माण कर सकता है। क्योंकि हम कितना भी नियंत्रण क्यों न कर लें, हम कभी भी परम नियंत्रक नहीं बन सकते हैं।
जो आत्मा है, तीन आवरणों में इस भौतिक जगत में ढकी हुई है। एक आवरण है अपने शरीर और मन का, आध्यात्मिक क्लेश कहते हैं उसको। दूसरा आवरण है हमारे समाज का, तो कहते हैं आधिभौतिक क्लेश। और तीसरा है निसर्ग का, तो कहते हैं आधिदैविक क्लेश।
अभी इन तीनों आवरणों पे हम निर्भर हैं। अभी हमारे शरीर की सेहत अच्छी होनी चाहिए, हमारा मन थोड़ा तो शांत होना चाहिए जिससे कि हम कुछ कार्य कर सकें। उसी तरह से हमारे समाज में अगर हमेशा उपद्रव मच रहा हो, समाज में सब लोगों में कुरुक्षेत्र चल रहा हो, तो फिर हम कुछ नहीं कर पाएंगे। वैसे ही निसर्ग में कभी-कभी तूफान आ जाता है, कभी-कभी भूकंप आ जाता है, पर उस पे भी हम निर्भर हैं। वो अच्छी तरह से चलना चाहिए तो हम कार्य कर सकें।
और ये तीनों चीजें जिन पे हम निर्भर हैं, इन तीनों आवरणों, इन तीनों से हम क्लेश पा सकते हैं। शरीर और मन से क्लेश आ सकता है, समाज से क्लेश आ सकता है और जो है, निसर्ग से क्लेश आ सकता है। उसको त्रिताप (त्रिविध ताप) कहते हैं। कई बार जो धार्मिक कार्यक्रम होते हैं, उसमें शुरुआत में या अंत में ऐसे कहते हैं- “ॐ शांति शांति शांति” तीन बार बोलते हैं। तो ॐ आध्यात्मिक क्लेश शांति, ॐ आधिभौतिक क्लेश शांति, ॐ आधिदैविक क्लेश शांति। मतलब जो हमको क्लेश मिल रहे हैं वो कम हो जाएं, ऐसा भाव होता है, ऐसी प्रार्थना होती है।
तो अभी जितना तंत्रज्ञान का विकास हो जाता है, उससे हम कुछ हद तक आधिदैविक क्लेश पे नियंत्रण कर पा रहे हैं। उसमें भौतिक क्लेश पर, शारीरिक क्लेश पर नियंत्रण कर रहे हैं। बीमारियां पहले थी, अभी भी बीमारियां हैं, पर पहले की जो कुछ बीमारियां थीं, प्लेग आदि, वो अभी काफी कम हो गई हैं। अभी दूसरी बीमारियां आ गई हैं, कैंसर है, हार्ट अटैक है, फिर ब्रेन डिजेनरेटिव डिजीज, अल्जाइमर, पार्किंसंस, अलग-अलग बीमारियां आ रही हैं। पर ऐसे लगता है कि हम कुछ नियंत्रण कर पा रहे हैं बाहरी चीज़ों पर, निसर्ग है, उसपे भी लगता है कि हम नियंत्रण कर पा रहे हैं, जिससे वातावरण बहुत गरम हो गया, बहुत ठंडा हो गया, उसपे नियंत्रण कर पा रहे हैं।
सहनशीलता का पतन और ‘बदल दो’ की नीति
पर जो क्लेश हैं, वो आने ही वाले हैं। जितनी हमारी भावना होती है कि हम नियंत्रण कर पा रहे हैं, तो उतना ही नियंत्रण न होने पर मुश्किल हो जाता है। अगर नियंत्रण न हो पाए, तो वो मुश्किल हो जाता है, और खास करके ये आधिभौतिक के बारे में हो जाता है।
हमारे संबंध होते हैं, उसमें हम अपेक्षा करते हैं कि “ये व्यक्ति ऐसे होना चाहिए, ये व्यक्ति ऐसे होना चाहिए, इसने ऐसे करना चाहिए, इसने ऐसे करना चाहिए, ये ऐसे क्यों कर रहा है, ये ऐसे क्यों कर रहा है?” तो हम अपेक्षा करते हैं कि हम नियंत्रण कर पाएंगे, और जब हम नियंत्रण नहीं कर पाएंगे, तो बहुत ही व्यथित हो जाते हैं। और जो सहन करना होता है, “ठीक है, अगर नियंत्रण नहीं कर रहा है, सहन करके हम आगे चलेंगे”, पर नहीं! क्योंकि, हमें नियंत्रण करने की जो क्षमता तंत्रज्ञान ने बढ़ा दी है, उससे हमें लगता है, नियंत्रण नहीं कर पाएंगे तो सहेंगे नहीं, बदल देंगे।
तो पर हम बदल देते हैं। तो अगर मेरा फोन काम नहीं कर रहा, बदल दो उसको। अगर मेरी गाड़ी में थोड़ी समस्या आ गई है, अमेरिका में मैं गया था, तो मैं एक जगह देख रहा था, “ये मायने नहीं रखता कि आपके पास कौन सी कार है”। तो वेबसाइट था, वो बोले कि “आपको जाने की भी ज़रूरत नहीं है कार शोरूम में, आप वेबसाइट पर ये ऑर्डर करो, मेरी ये कार है, ये कंडीशन है, आप ये देखो, आपको नई कार कौन सी चाहिए? एक्सचेंज रेट लेके चेंज करो।”
तो कई लोग, जैसे अभी आजकल के लोग, मोबाइल चेंज करते हैं, “ये नया ब्रांड आ गया, नया ब्रांड आ गया, नया ब्रांड आ गया”, तो वैसे लोग, वहाँ पर कार चेंज करते रहते हैं। और ये जो है बदलाव, “ये काम नहीं कर रहा, दुसरा ले लो।” अगर सही में बहुत समस्या है, तो बदलना ज़रूरी है। पर थोड़ा सा कुछ, “ये नहीं चल रहा है, छोड़ दो उसको, ये नहीं चल रहा है, छोड़ दो उसको, ये नहीं चल रहा है, छोड़ दो उसको।”
यह जो मानसिकता होती है, वो धीरे-धीरे बढ़के कहां आ जाती है, वो रिश्तों में ले जाती है। “ये फोन नहीं काम करता है, थोड़ी समस्या है फोन में, छोड़ दो नया फोन लेंगे। ये जो कंप्यूटर काम नहीं करता है, छोड़ दो नया लेंगे।” तो “ये रिश्ता काम नहीं करता है, छोड़ दो रिश्ते को।”
(हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, कृष्णा, कृष्णा, हरे हरे। हरे राम, हरे राम, राम, राम, हरे हरे।)
शॉपिंग मॉल मानसिकता
तो जब सबकुछ बदलता है, “ये बदल सकता हूँ, ये बदल सकता हूँ, ये बदल सकता हूँ।” तो मैं एक इंटरफेथ (Interfaith) मीटिंग में गया था, अमेरिका में। इंटरफेथ मतलब अलग-अलग धर्मों के लोग आये थे। तो वहाँ पर एक क्रिश्चियन प्रीस्ट मुझे बता रहा था कि आजकल के लोगों की मानसिकता कैसी है।
तो वह बोल रहा था कि एक टॉक शो पर था वह, और वहाँ पर एक आदमी आया था। वह रेडियो टॉक शो था, बोल रहा था कि “मैं एक क्रिश्चियन हूँ, पर मैं कोई चर्च से सम्बंधित नहीं हूँ, मैं क्रिश्चियन हूँ। अभी तक मुझे ऐसा चर्च नहीं मिला है, जो मेरे तत्वज्ञान के समान हो।” तो मतलब, वो धार्मिक संस्था में तत्वज्ञान सीखने नहीं जा रहा है, पहले से अपना तत्वज्ञान बना लिया है और अभी कोई मिलता है, जो मेरे तत्वज्ञान को मानता है, तो फिर मैं जाऊँगा।
तो ऐसे लोग क्या हैं, वो आध्यात्मिक मार्ग में खोज नहीं कर रहे हैं। हम जब शॉपिंग करने जाते हैं, तो क्या है, “यह अच्छा है, तो लेते हैं, नहीं तो छोड़ दो।” तो अगर हम पूरी दुनिया को एक शॉपिंग मॉल ही मान लेते हैं, अगर हम सोचते हैं कि पूरी दुनिया ही शॉपिंग मॉल है, तो “यह प्रोडक्ट अच्छा है, तो छोड़ दो, यह ले लो, यह ले लो, यह ले लो।” फिर उससे क्या होता है, हम हमारे जो रिश्ते हैं, उनको भी एक शॉपिंग आइटम के समान मान लेते हैं। समस्या आ गई, छोड़ दो उसको।
और यह अध्यात्म में भी आ जाता है। हम भक्ति करते हैं, भक्ति करते समय भी, “ठीक है यह समस्या आ गई, छोड़ दो उसको, यह समस्या आ गई, छोड़ दो उसको।” यह क्या है, क्या करने का फल है?
मन का नियंत्रण और कमिटमेंट
मैं एक जगह, मैं लन्दन में प्रवचन दे रहा था, जप के बारे में बोल रहा था, तो एक भक्त ने सवाल पूछा, कि “आप कहते हैं कि जप करने से मन नियंत्रण होता है, पर मैं देखता हूँ कि जप करने के लिए मन का नियंत्रण लगता है। अगर मन का नियंत्रण नहीं तो मैं भी जप करना, माला में नियंत्रण छोड़ देता हूँ कि कैसे उसे जपना होगा, मैं छोड़ देता हूँ।”
पर वास्तव में मैंने बताया कि आपको कोई भी कार्य करना है तो मन का नियंत्रण कुछ हद तक आवश्यक ही है। मान लीजिये अगर कोई हम स्वादिष्ट अन्न भी खा रहे हैं पर तभी हमारे मन में विचार आता है… प्रवचन सुनने के लिए भी मन का नियंत्रण थोड़ा लगता है, प्रवचन बोलने के लिए भी मन का नियंत्रण लगता है।
तो अगर हम कुछ स्वादिष्ट व्यंजन भी खा रहे हैं पर तभी अगर हमें याद आ गया कि “इसने मेरा अपमान किया था, इसने ऐसे बोला, इसने ऐसे क्यों बोला”, अगर वो याद आ गया और उतना मन का नियंत्रण नहीं है, तो वो स्वादिष्ट व्यंजन भी हम उसका आनंद नहीं ले पाएंगे। तो खाना खाकर, खाने का आनंद लेने के लिए भी थोड़ा सा मन का नियंत्रण लगता है। अगर एक व्यक्ति पढ़ाई कर रहा है तो वो पढ़ाई के लिए मन का नियंत्रण लगता है। अगर हम नौकरी कर रहे हैं, उसके लिए भी नौकरी में काम करने के लिए मन का नियंत्रण लगता है। तो इस दुनिया में कुछ भी चीज अगर हमें करनी है तो मन का नियंत्रण ज़रूर लगता है।
पर भक्ति ऐसी चीज है जिसमें भी हमें मन का नियंत्रण लगता है, पर वो मन का परिवर्तन भी करती है। क्योंकि भक्ति में हम हमारा मन नियंत्रित करके परम सत्य और परम पवित्र भगवान में लगाते हैं। और जब हम भगवान में मन लगाते हैं तो उससे हमारा मन स्वतः शुद्ध हो जाता है। और जब मन स्वतः भगवान में लगता है तो फिर उसका जो अनियंत्रित रहने का भाव है वह कम हो जाता है।
इसके लिए उदाहरण है, मान लीजिये अगर मुझे 50 किलो वजन उठाना है, तो अभी काफी मुश्किल है 50 किलो वजन उठाना। अगर मुझे किसी ने लीवर (Lever) दे दिया, मैं थोड़ा सा ताकत लगाऊँगा तो बड़ा वजन उठा सकता हूँ। तो उसमें भी मैं 5 किलो वजन उठाने की ताकत लगाऊँगा और 50 किलो उससे उठ जाएगा। वह लीवर का यंत्र होता है। अभी ऐसा जो यंत्र है उसको इस्तेमाल करने के लिए भी मुझे अपनी ताकत का इस्तेमाल तो करना ही पड़ेगा। कम से कम 5 किलो वजन उठाने का तकलीफ है, एफर्ट (Effort) है, प्रयास है, उतना तो मुझे करना ही पड़ेगा। पर साधारणतया 5 किलो वजन उठाना और लीवर के साथ 5 किलो की उतना ताकत लगाना, उससे क्या होगा? लीवर में 5 किलो की ताकत लगाने से 50 किलो का वजन उठ जाता है।
उसी तरह से थोड़ा सा मन का नियंत्रण तो हर चीज में हमें लगाना पड़ता है। पर हम जप में मन का नियंत्रण करते हैं, भक्ति में मन का नियंत्रण करते हैं, भक्ति में मन लगाते हैं, तो वो क्या है? जितना हम उसमें प्रयत्न करते हैं, उससे फल कई गुना अधिक मिलता है। क्योंकि क्या है? उस मन के नियंत्रण में जो हम प्रयास करते हैं, उससे हमारा मन शुद्ध हो जाता है। और शुद्ध होने से फिर वह काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य, इन सब के प्रभाव इतने कम हो जाते हैं, उतना वह मन अनियंत्रित नहीं रहता है।
तो अगर आप कहते हैं, “यह जप के लिए बहुत प्रयास करना पड़ रहा है, छोड़ो इसको।” तो हम कुछ दिन के लिए यह मार्ग ले गए, कुछ दिन वो मार्ग ले गए, कुछ दिन वो मार्ग ले गए, “चलो यह काम करता है, यह काम करता है, छोड़ो। यह काम करता है, अच्छा लगता है, यह अच्छा नहीं लगता है, छोड़ो।” यह अच्छा लगता है, यह अच्छा नहीं… अगर मैं थोड़ा एक डॉक्टर से लेता हूँ, दूसरा दूसरे डॉक्टर से लेता हूँ, तीसरा तीसरे डॉक्टर से लेता हूँ, चौथा चौथे डॉक्टर से लेता हूँ, और फिर किसी की ट्रीटमेंट मैं फॉलो नहीं करता हूँ प्रॉपर्ली, तो शायद मेरी बीमारी कभी ठीक नहीं होगी।
तो भौतिक जगत में भी हमें क्या होता है, कमिट (Commit) करना पड़ता है। हम इतना खुले दिमाग वाले हो जायें, कि हमारा दिमाग ही बाहर गिर जाये, तो वो नहीं चलेगा। हमें कमिटमेंट चाहिए आध्यात्मिक मार्ग में।
हमारा मन बोलता है, भक्ति बहुत अच्छी है। कभी-कभी हम जप करते हैं, तो अच्छा लगता है। जप करते समय, शक्ति मिलती है, शांति मिलती है, जप चलता ही रहे, जप कभी खतम नहीं हो। और कभी-कभी हम जप करते हैं, लगता है जप खतम ही नहीं हो रहा है। कभी-कभी हम जप माला निकालते हैं और देखते हैं, “अरे इसमें एक सौ आठ मणि है या एक हज़ार आठ मणि है?” तो क्या होता है, जो मन है वो अस्थायी रहता है। तो इसलिए कभी हमारे मन को कुछ माला निकालते हैं, कभी अच्छे नहीं लगते हैं। तो इसलिए क्या है कि हमें जो अच्छा लगता है करेंगे, जो बुरा लगता है नहीं करेंगे, तो हम कुछ भी पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकते हैं। किसी भी चीज़ में हम जो दक्षता है, मैच्यूरिटी है, वो प्राप्त नहीं कर सकते हैं।
त्रिपक्षीय संबंध (Trilateral Relationships)
तो अभी मैं संबंधों पे एक और चीज़ बोलके फिर विराम दूंगा। हम कुछ आपको सवाल होंगे तो हम सवाल देख सकते हैं।
मैं मेलबर्न में एक लेक्चर दे रहा था, तो उसके बाद में प्रश्न-उत्तर हो रहे थे, तो एक भक्त ने इसी चीज़ पे कुछ पूछा, कि “एक भक्त के साथ मुझे सेवा करनी पड़ रही है, पर वो भक्त ने सीधा मेरे मुँह पे कह दिया है मुझे कि तुम मुझे अच्छे नहीं लगते।”
तो फिर, मैंने जवाब दिया कि वास्तव में जब हम भक्ति कर रहे हैं, तो हमारा संबंध केवल किसी और व्यक्ति के साथ नहीं होता है। पर एक डिवोटी, अपने बर्ताव में बाइलेटरल (Bilateral) नहीं है, तो ट्राइलेटरल (Trilateral) है। मतलब हर एक संबंध केवल हमारा उस व्यक्ति के साथ नहीं होता है, हमारा संबंध भगवान के साथ भी होता है। हां, हम उस रिश्ते में कार्य करते हैं केवल उस व्यक्ति की प्रसन्नता के लिए नहीं, केवल उस व्यक्ति के बर्ताव के लिए नहीं, पर भगवान की सेवा के लिए। और भगवान की सेवा किस तरह से अच्छी तरह से हो सकती है, वहाँ देखकर हम कार्य करते हैं।
तो एक उदाहरण, मान लीजिए कोई कपड़े बेचने की दुकान है। उसमें अटेंडेंट्स होते हैं। उसमें जो कपड़े बेचते हैं वो दिखाने वाले लोग होते हैं, अटेंडेंट्स। तो साधारणतया कोई ग्राहक आ जाता है, तो सब लोग, जो ग्राहक होते हैं, सब जो अटेंडेंट्स होते हैं, वो पास जाते हैं, “तो आओ मेरे पास, मैं तुमको दिखाता हूँ।” अगर वो सेल करेंगे, तो उनको कमिशन मिल जाएगा।
पर कुछ-कुछ ग्राहक ऐसे होते हैं, जो पूरी दुकान देखते हैं और कुछ खरीदते ही नहीं हैं। तो अब ऐसे कोई कस्टमर होता है, “यह उच्चनी है, यह उच्चनी है, यह उच्चनी है।” तो अभी उनको पता चल गया है कि यह कस्टमर बहुत डिफिकल्ट कस्टमर है। तो फिर क्या होता है, ऐसे कहते हैं कि कुछ लोग ऐसे होते हैं जब भी वे आते हैं, सुख लाते हैं। और कुछ लोग ऐसे होते हैं जो जब भी वे जाते हैं, तो सुख लाते हैं। तो ऐसे हो जाता है।
तो अभी मान लीजिए ऐसा ग्राहक है, जो बहुत सबके साथ बहुत रूड रहता है, बहुत डिमांडिंग है, बहुत फॉल्ट-फाइंडिंग है, सब में दोष देखते रहता है। इसके द्वारा सेल नहीं आ रही है, कस्टमर मेरे बॉस के द्वारा आया था। और वो अगर अच्छी तरह से बर्ताव करता है, पोलाइट रहता है, नम्र रहता है, सुशील रहता है, तो फिर भले ही वो सेल न हो, वो बॉस देखता है। और बॉस कहता है कि “अरे, अरे, अरे, अरे… यह कर्मचारी बहुत अच्छा है।”
क्या भी, ऐसे, हम सबके जीवन में ऐसे होता है, कि कोई, कभी, कभी, कोई ना कोई तो ऐसा कार्य करेगा, हमें बहुत परेशान करेगा। और तभी हम सोचें, “तुमने ऐसे क्यों किया, मैं भी ऐसे करूँगा, तुमने ऐसे क्यों किया, मैं ऐसे करूँगा।” तो उसी में हम फंसे रहेंगे, तो फिर सारी ज़िन्दगी निकल जाएगी।
अगर हम देखेंगे, कि मैं इस संबंध में हूँ, पर इस संबंध में ही नहीं हूँ मैं, मैं वास्तव में भगवान का सेवक हूँ, और ये जो रिश्ता है, इसमें जो भी कार्य कर रहा हूँ, मैं भगवान की सेवा के रूप में कार्य कर रहा हूँ। तो फिर हम उस तरह से कार्य करेंगे, जिस तरह से, जिसके द्वारा हम भगवान को प्रसन्न कर सकें, जिसके द्वारा हम आध्यात्मिक प्रगति कर सकें।
इसका मतलब यह जरूरी नहीं है कि कोई भी व्यक्ति कुछ भी करे और हम सब कुछ सहन कर लें। इसका मतलब यह है कि सिर्फ उस व्यक्ति के कार्य के अनुसार हम प्रतिक्रिया नहीं कर रहे हैं, हम हमारे सेवा भाव के अनुसार फैसला कर रहे हैं कि मुझे क्या कार्य करना है। तो अगर हम सोचते हैं कि “ठीक है यह व्यक्ति थोड़ा परेशान कर रहा है मुझे, पर यह सहन करके मैं अगर भगवान को प्रसन्न नहीं कर सकता हूँ”, तो फिर हम उसको सहन करने की क्षमता बढ़ा सकते हैं।
तो मैं शुरुआत में बताया कि कैसे हमारा मन, हमारा सेंस पर्सपेक्टिव को डिस्टॉर्ट (Distort) कर देता है। क्या महत्वपूर्ण है, वो समझ हमसे चली जाती है, जब मन असंतुलित हो जाता है। तो अगर हम समझते हैं, कि मेरा भगवान के साथ का संबन्ध जो है शाश्वत है। यह संबन्ध है, कुछ समय के लिए है, जितना हो सकता है, मैं अच्छी तरह से कार्य करूँगा, और आगे बढूंगा।
(हरे रामा, हरे रामा, राम रामा, हरे रामा…)
टॉलरेट, मिटिगेट, या एमिग्रेट (सहन, प्रतिकार, त्याग)
हम संभाल सकते हैं। वास्तव में जब हमारे जीवन में कुछ समस्याएं आती हैं तो हमारे पास तीन पर्याय होते हैं। इसको मैं इंग्लिश में कहता हूँ टॉलरेट (Tolerate), मिटिगेट (Mitigate), या एमिग्रेट (Emigrate)। टॉलरेट मतलब सहन करो। मिटिगेट मतलब बदलाव/प्रतिकार करो। या एमिग्रेट मतलब चले जाओ/त्याग करो।
तो मान लीजिये अगर हम कोई ऐसी जगह पे रह रहे हैं जहां पे बहुत ठंडी है। कुछ समय पहले मैं टोरोंटो में गया था। टोरोंटो में, कनाडा में जब बर्फ गिरती है तो मुंह खोलते हैं तो मुंह से सांस नहीं निकलती है, मुंह से बर्फ निकलता है, जो सांस निकलती है, उसका बर्फ बन जाता है, इतनी ठंडी होती है वहां पे। तो अभी वो ठंडी बहुत मुश्किल होती है सहन करना।
तो आप देखते हैं कि अगर महाभारत में आप पांडवों का उदाहरण देखते हैं। पांडव भी अलग-अलग परिस्थिति में तीनों कार्य करते हैं। पहले जब कौरव भीम को जहर पिला देते हैं या फिर बाद में वारणावत में पांडवों को जलाने का प्रयास करते हैं, युधिष्ठिर कहते हैं “ज्यादा बड़ा मत करो, किसी को बताओ मत। इसको सहन करो।” तो सहन करते हैं।
पर बाद में जब कौरव द्रौपदी का अपमान करते हैं तो जो एक मर्यादा है उसको लांघ देते हैं। और उसके बाद भी पांडव वनवास में जाके आने के बाद भी क्या होता है? न तो उनको कौरव राज्य देते हैं पुनः, पर कुछ भी ‘मैंने कुछ गलत किया है’ ऐसा कोई भाव है ही नहीं। तो जैसा उन्होंने उस सभा में पहले द्रौपदी का अपमान करने का प्रयास किया था, वैसे ही वो कौरव उसी सभा में कृष्ण का अपमान करने का प्रयास करते हैं। कृष्ण वो राजाओं के राजा हैं और वो जब एक शांति दूत के रूप में आये हैं और अगर उनको वहाँ पर गिरफ्तार करने का प्रयास करते हैं तो ये बहुत बड़ा अपमान है।
मान लीजिये कि भारत-पाकिस्तान में टेंशन चल रहा है। तो अगर टेंशन हो रहा है तो फिर हम शांति चाहते हैं। तो भारत से कोई संदेष्टा जाता है, कोई मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस से कोई आता है। मान लीजिये भारत के प्रधान मंत्री पाकिस्तान में आते हैं शांति का संदेश लेकर और वहाँ पे पाकिस्तान की सरकार भारत के प्रधान मंत्री को अरेस्ट कर देती है। यह तो पूरे भारत का अपमान हो जाएगा। यह तो वैसे ही जब कृष्ण स्वयं जाते हैं तो पांडव के कौरव क्या करते हैं? कृष्ण को ही गिरफ्तार करने का प्रयास करते हैं। तो यह जब पांडव देखते हैं तो बोलते हैं “यह गिरफ्तार… अभी कभी सुधरेंगे नहीं।” तो फिर तभी क्या करते हैं? मिटिगेट। अभी सहन करने की मर्यादा खतम हो गई है, तो प्रतिकार करते हैं, निंदा करते हैं।
और फिर बाद में जब वो कई सालों तक राज्य करते हैं, उसके बाद में जब भगवान कृष्णा भौतिक जगत त्याग के चले जाते हैं। जैसे ही पांडवों को समाचार मिलता है तभी पांडव भी छोड़ देते हैं। “अभी हमारी सेवा पूरी हो गई, चलो अभी यहां से निकल जाओ। अभी भी राज्य की जिम्मेदारी हम ले सकते हैं, समस्याओं का हल कर सकते हैं, पर अभी कोई और कर लेगा यह। यह मुझे करने की ज़रूरत नहीं है।”
तो यह तीनों- सहन करना, प्रतिकार करना और त्याग करना- यह तीनों हम सेवा भाव से कर सकते हैं या तीनों हम घृणा भाव से कर सकते हैं। हम सहन अगर घृणा भाव से करते हैं मतलब क्या है? हम सहन तो कर रहे हैं पर अंदर से ज्वालामुखी जैसे बढ़ रहा है, बढ़ रहा है, बढ़ रहा है। हम जो सहन भी करते हैं, घृणा भाव से नहीं, सेवा भाव से। “ठीक है, यह समस्या है, यह व्यक्ति ऐसे कार्य कर रहा है पर मुझे भगवान की सेवा के लिए महत्वपूर्ण है तो मैं सहन कर लूंगा।”
उसी तरह से अगर हम प्रतिकार करते हैं किसी चीज़ का, प्रतिकार भी हम सेवा भाव से कर सकते हैं या प्रतिकार हम बदले के भाव से कर सकते हैं। “तुमने ऐसा मेरे साथ किया, मैं दिखाता हूँ तुम्हें क्या कर सकता हूँ।” तो फिर बदले के भाव से करते हैं तो क्या होता है? तो फिर हम वापस हमारी चेतना उसी में फंस जाती है। “मैंने ऐसे किया, तुमने ऐसे किया, तुमने ऐसे किया, मैंने ऐसे किया।” ऐसे कभी-कभी परिवारों में सदियों तक युद्ध चलते रहता है। “इसने पिताजी के साथ ऐसे किया, उसने उसकी बेटी को ऐसे किया, उसने ऐसे किया।”
तो हम प्रतिकार भी करना है, प्रतिकार करने का उद्देश्य ये नहीं है कि उस व्यक्ति को दुख देना। पांडवों ने जब युद्ध किया, वो बदले के लिए नहीं किया था। वो धर्म के लिए किया था। जो कौरव थे, वो धर्म को उध्वस्त कर रहे थे, तो इसलिए धर्म की प्रस्थापना के लिए युद्ध किया। अगर बदला ही उनका भाव होता तो फिर वो शांति का प्रस्ताव कभी रखते ही नहीं थे। प्रधान उद्देश्य क्या था? धर्म की संस्थापना। तो हम सेवा भाव से प्रतिकार भी कभी करना पड़े तो कर सकते हैं और कभी सेवा भाव से त्याग भी कर सकते हैं। “यह समस्या इतनी जटिल है, मुझे इसमें फंसना नहीं है। मुझे ज़िन्दगी में और बहुत सी चीज़ें करनी हैं, मैं इसमें नहीं फंसने वाला।”
प्रभुपाद जी का जीवन और सेवा भाव
हम प्रभुपाद जी के जीवन में देखते हैं, वो उनके जीवन में हम ये तीनों चीज़ें देखते हैं। उन्होंने सहन किया, जब वो अमेरिका में गए थे, तो वो हिप्पी लोगों में रहे। अभी जो हिप्पी लोग ऐसे होते हैं, उनका एक ही रेगुलेटिव प्रिंसिपल होता है। उनका एक ही नियम है कि सब नियमों को तोड़ते हैं। शराब पियो, मांस खाओ, जुआ खेलो, अवैध संग करो। और उसके साथ-साथ वो इतने अशुद्ध जीवन जिया करते थे, उसके बाद में वो खाना खाकर चले जाते थे, प्रभुपाद जी उनकी प्लेटें धोया करते थे। उन्होंने सहन किया, क्योंकि उन्होंने देखा कि “ये इनमें कुछ तो आध्यात्मिक चेतना है, तो मैं उनकी आध्यात्मिक चेतना का थोड़ा विकास करना चाहता हूं, करुणा करना।” तो सहन कर लिया।
पर कभी-कभी प्रभुपाद जी ने प्रतिकार भी किया। जब जुहू में इस्कॉन का मंदिर बन रहा था, तो तभी एक राजनेता था, उसने प्रभुपाद जी को बोला कि “मैं आपको जमीन दे दूँगा कम दाम में।” और फिर बाद में उसने पैसे ले लिये और फिर भक्तों को धमकी देने लग गया और कैसे षड्यंत्र कर लिया कि पैसे भी ले लिये और जमीन भी वापस ले ली। प्रभुपाद जी बोले “तभी मैं कृष्ण की लक्ष्मी है, कभी इसके पास जाने नहीं दूँगा।” और प्रभुपाद जी ने युद्ध किया ताकि वो भगवान कृष्ण की सेवा करें, जो राधा रास बिहारी मंदिर है वो प्रस्थापित हो सके। तभी प्रभुपाद जी ने प्रतिकार किया।
पर प्रतिकार करते समय भी, जब वो मिस्टर नायर थे, वो बाद में एक हार्ट अटैक में गुज़र गए। तो उनकी जो पत्नी थी वो भी पहले युद्ध करने का प्रयास कर रही थी पर बाद में वो शांत हो गई। तो जब वो उनसे मिलने आई, तो प्रभुपाद जी बड़े करुणा में से बोले, “तुम मेरी बेटी के समान हो, मैं तुम्हारी देखभाल करूँगा, चिंता मत करो।” तो प्रभुपाद जी का भाव बदले का भाव नहीं था, सेवा का भाव था।
उस तरह से प्रभुपाद जी ने कभी त्याग भी कर दिया। और वो क्या करने लग गए, वो जगह प्रभुपाद जी के ‘लीग ऑफ डिवोटीज’ का हेडक्वार्टर होने वाली थी। वहीं से उनको निकालने का प्रयास करने लगे। तो प्रभुपाद जी, वो पहले बिजनेसमैन थे, तो वो कोर्ट केस करके वो लड़ सकते थे। पर प्रभुपाद जी बोले कि “मुझे इसमें नहीं उलझना है।” देखा कि झांसी बहुत बड़ी जगह भी नहीं है। भक्ति सिद्धांत ठाकुर की इच्छा थी कि बड़े शहरों में मंदिर बनाएं। और साथ-साथ हो रहा है कि यहां पर जो लोग थे वे केवल धार्मिक लोग थे, आध्यात्मिक नहीं थे। मंदिर में जाना है, थोड़ी सेवा करनी है, आध्यात्मिक खोज ऐसे उनमें नहीं थी। तो गंभीरता नहीं आ रही थी। उनके लिए प्रभुपाद जी बोले, “मैं इसमें उलझने वाला नहीं हूँ।” तो उन्होंने त्याग कर दिया।
आत्म-परिभाषा (Self-Definition) का संशोधन
तो वास्तव में हम अगर भगवान का सेवा भाव रखते हैं तो जो भी समस्या आयेगी उसका हम उचित हल ढूंढ सकते हैं। भक्ति करना मतलब केवल मंदिर में आके जप करना या मंदिर में आके कोई कुकिंग करना या कीर्तन में जाना संगीत नहीं है। यह जरूरी है, यह सब करना है। पर भक्ति का मूल सिद्धांत क्या है कि Devotion means to revision of our self-definition (भक्ति का मतलब है अपनी आत्म-परिभाषा का संशोधन)।
मैं कौन हूँ? यह समझ में बदलनी चाहिए। मुझे समझना है कि मैं भगवान कृष्ण का सेवक हूँ, मैं भगवान कृष्ण का दास हूँ। मैं किसी भी रिश्ते में हो सकता हूँ। मैं किसी की बहन हो सकती हूँ, मैं किसी का बेटा हो सकता हूँ, मैं किसी का पिता हो सकता हूँ, मैं किसी की पत्नी हो सकती हूँ, मैं किसी का पति हो सकता हूँ।
पर अगर यह रिश्तों को हम हमारा डिफाइनिंग रिलेशनशिप (Defining relationship) बना देंगे कि अगर मैं सोचता हूँ कि मेरी पहली पहचान है मैं इसका पिता हूँ, मेरी पहली पहचान है कि मैं इसकी पत्नी हूँ, मेरी पहली पहचान है कि मैं इसकी बेटी हूँ, मैं इसका बेटा हूँ… तो फिर अगर उस रिश्ते में समस्या आ गई तो हमें लगेगा कि हमारा जीवन ही व्यर्थ हो गया।
पर अगर हम समझेंगे कि मेरी पहली पहचान क्या है? मैं भगवान का सेवक हूँ। और भगवान की सेवा के भाव में मैं इसका पिता हूँ, इसकी बहन हूँ, इसकी पत्नी हूँ, इसका पति हूँ, इसका पिता हूँ, तो इसका बेटा हूँ। तो फिर ये सब रिश्ते हम एक सेवा के भाव में करेंगे। और हम जब सेवा करते हैं, कुछ सेवा अच्छी तरह से होती है, कुछ सेवा अच्छी तरह से नहीं होती है। तो हम सेवा भाव रखेंगे तो हम उन रिश्तों में जिम्मेदार रहेंगे पर उन रिश्तों में हम आसक्त नहीं बन जाएंगे।
तो जो मैं शुरुआत में बताता था, अटैचमेंट और कमिटमेंट। कमिटमेंट मतलब हम देखते हैं कि मेरी जिम्मेदारी क्या है, मैं जरूर वो करुंगा। पर हम आसक्त नहीं हो जाएंगे। हम जिम्मेदार रहेंगे, आसक्त नहीं हो जाएंगे। क्यों, क्योंकि हमारा प्रधान संबंध जो है भगवान के साथ है। उससे जब हम कार्य करते हैं तो फिर हम दृढ़ संकल्प से कुछ भी हो जाए, जो भी परिस्थिति आ जाए, इस दुनिया में हमें बहुत दुख मिल सकते हैं और दुख मिलेंगे भी।
पर, अगर हमारी दृष्टि केवल दुनिया पर रहेगी तो हमें लगेगा ये दुख बड़े असहनीय हैं। पर जब हम भक्ति के मार्ग से हमारी दृष्टि को ऊपर उठाएंगे, भगवान पर दृष्टि रखेंगे, दुनिया में जो भी दुख आएंगे, भगवान के संबन्ध के द्वारा हमें राहत मिलेगी। दुनिया के द्वारा बहुत दुख मिल सकते हैं, बहुत वेदना हो सकती है, बहुत घाव हो सकते हैं। पर जब हम भगवान की ओर दृष्टि रखते हैं तो फिर भगवान में उन सब घावों से ठीक कर सकते हैं। न केवल ठीक कर सकते हैं, और सुदृढ़ बना सकते हैं। अगर आप मेरी चेतना में रहते हो तो आप कभी समस्याओं से दब नहीं जाओगे, आप समस्याओं के परे जाओगे।
भगवान की योजना सबसे उत्तम है
हम क्या देखते हैं? We look at the present and plan the future. हम वर्तमान को देखते हैं और भविष्य की योजना करते हैं। Krishna looks at the future and plans the present. भगवान भविष्य को देखते हैं और वर्तमान की योजना करते हैं।
इसलिए हम को लगता है “ये टाइम क्या गलत क्यों हो रहा है?” पर भगवान की दृष्टि से वो हमारे अच्छे के लिए ही हो रहा है। और वो कैसे अच्छे के लिए हो रहा है वो हमें बाद में पता चलता है। अगर हम श्रद्धा के साथ सेवा भाव में लगे रहते हैं, तो पता चल जाता है।
यह इसी पॉइंट पे मैं लेक्चर दे रहा था, फोर्ट लॉडरडेल में, फ्लोरिडा में। तो तभी उसके बाद में एक रशियन माता जी मुझे मिलने आयीं। वो बोलीं कि, “मुझे इसका अभी कुछ एक हफ्ते पहले साक्षात्कार हुआ। मैं न्यू वृंदावन में गई थी, और वहाँ न्यू वृंदावन इस्कॉन का एक सेंटर है, जो एक पहाड़ के ऊपर है, काफ़ी रिमोट है, वहाँ पर आ जाना बड़ा मुश्किल है। तो तभी मैं वहाँ पर कुछ दिनों के लिए गई थी, अचानक मुझे मेरे बॉस का कॉल आ गया, कि आपको तुरंत ऑफिस पर आ जाना है। वो शिप में काम करती थी, ‘तुरंत मुझे शिप पर आ जाना है’। मुझे हो गया, कैसे जाऊं मैं अभी!”
तो तभी उनको पता चला कि एक भक्त थे, वो जाने वाला था अगले दिन सुबह 10 बजे। तो उन्होंने उससे मिलीं, “क्या तुम मुझे एयरपोर्ट ड्रॉप कर सकते हो?”
“हाँ, तुम 10 बजे यहाँ पे आ जाओ, मैं तुमको पिक अप कर लेता हूँ।”
तो उन्होंने सुबह 10 बजे ही पहुँच गयीं। वो 10 हो गया, सवा 10, साढ़े 10। वो जगह रिमोट थी तो फोन भी नहीं लग रहा था। तो वो फोन ट्राय कर रही थी बार-बार, पौने 11, 11, सवा 11, साढ़े 11 हो गया। (भक्त नहीं आया।)
और एक नशा किया हुआ एक लड़का था, वो ड्राइव कर रहा था, और वो पूरा कोलिजन हो गया। और वो कार का एक्सीडेंट पैसेंजर साइड में हो गया। तो वो फोटो दिखाया कि वो लड़के के थोड़ी इंजुरी हुई थी, पर ज्यादा नहीं हुई। पर उसको उस प्रसंग में 6 घंटे में पता चल गया, कि ये क्यों हुआ (कि वह उस गाड़ी में लेट क्यों हो गई)।
कभी-कभी हमको कि ये क्यों हुआ, समझने के लिए 6 साल लग सकते हैं, कभी-कभी 60 साल भी लग सकते हैं। पर अगर हम सेवा भाव रखेंगे, तो “ठीक है, ये हो गया, जो हुआ, अभी मैं भगवान की सेवा कैसे कर सकता हूँ।” उस भाव से अगर हम सेवा करेंगे, तो जो भी समस्या आयेगी, उससे भगवान हमारी प्रगती के ओर मार्ग में हमें अग्रसर बनाये रखेंगे।