How the mind distorts our vision of others and disrupts our relationships – Hindi
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Lecture Summary
- मन का अनियंत्रित होना और विकृत ज्ञान: भगवद्गीता के 18वें अध्याय के 22वें श्लोक (तमोगुणी ज्ञान) के अनुसार, जब व्यक्ति तत्त्व को समझे बिना किसी एक वस्तु, व्यक्ति या विचार को ही अपने जीवन का सर्वस्व मान लेता है, तो उसका मन अनियंत्रित हो जाता है और जीवन का संतुलन बिगड़ जाता है।
- संबंधों में अतिवादी दृष्टिकोण: पाश्चात्य संस्कृति और आधुनिक जीवनशैली के उदाहरण द्वारा समझाया गया है कि कैसे छोटी-छोटी असंतुष्टियों या एक ही चीज़ (जैसे तलाक, बच्चों या पालतू पशुओं से जुड़ी अति-आसक्ति) को सब कुछ मान लेने से व्यक्ति मानसिक रूप से विचलित हो जाता है और जीवन में विनाशकारी कदम उठा लेता है।
- भक्ति और सेवा का दृष्टिकोण: भौतिक समस्याओं या पारिवारिक कलह के समय केवल दार्शनिक ज्ञान देने के बजाय, हमें दूसरों की सेवा करने और भावनात्मक संबल देने का भाव रखना चाहिए। उदाहरणस्वरूप, प्रभुपाद जी ने वृद्ध स्त्री को बिना कृष्ण का नाम लिए भी उनके अकेलेपन को समझकर उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाया।
- अपेक्षाओं का नियमन: जीवन में दुख और हताशा तब आती है जब हम किसी एक ही व्यक्ति से अपनी सभी अपेक्षाएँ पूरी होने की जिद करते हैं। हमें यह समझना चाहिए कि हर व्यक्ति की अलग प्रवृत्ति होती है।
- शरीर और आत्मा का यथार्थ (व्याहारिक अध्यात्म): हम केवल शरीर नहीं बल्कि आत्मा हैं, किंतु व्यावहारिक जीवन में शरीर और उसकी ज़रूरतों को पूरी तरह ठुकराया नहीं जा सकता। अर्जुन को ‘भारत’ या ‘कौन्तेय’ जैसे शरीर-संबंधित नामों से संबोधित करने का यही अर्थ है कि हम अपनी शारीरिक पहचान (जैसे राष्ट्रीयता, सामाजिक भूमिका या पसंद) का उपयोग भक्ति और आध्यात्मिक प्रगति के अनुकूल साधनों के रूप में कर सकते हैं।
- मन को नियंत्रित करने के तीन मुख्य उपाय:
- संस्कृति (Culture/Environment): भौतिकवादी संस्कृति से दूर रहकर भक्तों और सकारात्मक सत्संग के बीच रहना।
- परिस्थिति (Circumstances): जो परिस्थितियाँ (जैसे बुरी आदतें या भटकाव) मन को अधिक विचलित करती हैं, उनसे दूरी बनाना।
- बुद्धि और मनस्थिति (Intellect): शास्त्रों के अध्ययन और सकारात्मक मानसिक छवियों (Impressions) द्वारा अपनी बुद्धि को सशक्त करना।
Full Transcriptions
श्रीमद्भगवद्गीता के आधार पर मन, संबंध और जीवन का संतुलन
हरे कृष्णा! बहुत खुश हूँ कि आप सबके बीच में आज यहाँ पर उपस्थित हूँ और हमारे मन के बारे में, भगवद्गीता के आधार पर मैं कुछ चर्चा करने का प्रयास करूँगा कि कैसे मन हमारे निजी जीवन में और खास करके हमारे संबंधों में हमें परेशान करता है।
भगवद्गीता में अठारहवें अध्याय में भगवान प्रकृति के तीन गुणों के बारे में बताते हैं और वो बताते हैं कि ये तीन गुण वास्तव में क्या करते हैं? वे हमें जो ज्ञान प्राप्त करते हैं, वह ज्ञान एक विकृत पद्धति से प्राप्त हो जाता है। तो अठारहवें अध्याय के 22वें श्लोक में वे कहते हैं कि जो तमोगुणी ज्ञान होता है, वह ज्ञान क्या होता है?
अतत्त्वार्थवद् अल्पं च तत्तामसमूदाहृतम्
अतत्त्वार्थवत् जिसमें पूरे तत्त्व को कुछ समझा ही नहीं है व्यक्ति ने, अल्पं च थोड़ा सा ज्ञान है—यत्तु कृत्स्नवद् एकस्मिन् कार्ये सक्तम्, वो क्या करते हैं? उसमें आसक्त प्राप्त करते हैं।
पाश्चात्य देशों में संबंधों की स्थिति और आधुनिक विडंबना
तो पाश्चात्य देशों में ऐसे भी हो गया है कि जो विवाह है, वह बहुत ही अस्थायी होता है। लोग विवाह करते हैं, कुछ समय के लिए रहता है, फिर चले जाता है।
मैं कार्टून देख रहा था, उसमें लिखा था—एक पति और पत्नी बैठे हैं और एक गार्डन में सामने कुछ बच्चे खेल रहे हैं। तो पति अपनी पत्नी से कहता है—”जस्ट सी, कितने खुशी से मेरे बच्चे, तुम्हारे बच्चे और हमारे बच्चे खेल रहे हैं।” तो इसमें यह हँसने की बात नहीं है, यह दुख की बात है एक तरह से।
मैं एक विद्यार्थी से मिला वहाँ पर अमेरिका में, तो मैं उससे बात कर रहा था, तो वह बता रहा था कि वो बोर्डिंग, वो फोस्टर होम में बड़ा हुआ। फोस्टर होम मतलब जो बच्चे अनाथ होते हैं, उनको अनाथालय में रहते हैं, पर अगर कोई उनको अडॉप्ट कर लेते हैं, तो जो अडॉप्ट करते हैं, उनको फोस्टर पेरेंट्स कहते हैं।
तो जब फोस्टर पेरेंट्स अडॉप्ट करते हैं किसी बच्चे को, तो कभी-कभी उनको जमता नहीं है, तो उनको छोड़ देते हैं। फिर वापस अनाथालय में जाता है, फिर किसी और फोस्टर होम में जाता है।
तो मैंने उसको पूछा—”क्या हुआ? क्यों? आपके पिताजी, माता-पिता कोई एक्सीडेंट में गुजर गए?”
मैं बोला—”नहीं, मेरे माता-पिता दोनों जीवित हैं।”
मैं बोला—”तो फिर आप, अनाथालय में, आप फोस्टर होम में क्यों हुए?”
लेकिन जब पाँच साल का था, तो मेरे माता-पिता का डिवोर्स हो गया और जब वो डिवोर्स हो गया, तो दोनों मेरी माता ने और मेरे पिता ने मुझसे यही कहा कि मैंने जब शादी की थी, यह मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती थी और तुम मुझे वो गलती की याद दिलाते हो, इसलिए मैं शादी अंत कर रहा हूँ, मुझे तुमसे भी कुछ लेना-देना नहीं है।
तो दोनों माता-पिता होते हुए, वह बच्चा अनाथ बन गया है। तो वह बता रहा था कि अगर, अगर वह भक्त बन रहा है थोड़ा-बहुत, पर वह बता रहा है कि जब वह कोई शास्त्रों में सुनता है कि भगवान कृष्ण माता, कृष्ण पिता, कृष्ण धन्य प्राण—तो अगर कृष्ण मेरे माता-पिता जैसे हैं, तो मुझे कृष्ण नहीं चाहिए।
तो ये जो है, बड़े दुर्भाग्य की बात है कि अभी ये ज़रूर हो सकता है कि कभी कुछ रिश्ते में झगड़े हो जाए और जो व्यक्ति एक दूसरे से स्नेह होना चाहिए, प्रेम होना चाहिए, वहाँ पर क्रोध आ जाती है, घृणा आ जाती है, नफरत आ जाती है। पर अगर वह नफरत इतनी बढ़ जाती है कि किसी और के प्रति पे वो नफरत आ जाती है, वो जो बच्चा है, वो अपने में एक व्यक्ति है। तो जो माता-पिता का अपने बच्चे के प्रति साधारणतया प्रेम होता है, वो क्या होगा? बच्चे के प्रति प्रेम चला गया और एक ही चीज़ क्या है—ये नफरत, ये घृणा! जब एक चीज़ को ही हम सब कुछ बना देते हैं, तो फिर जो जीवन है, उसका संतुलन रहना बड़ा मुश्किल हो जाता है।
तो एक चीज़ को सब कुछ बना देना मतलब, ये बच्चे की पहचान क्या है? ये मेरे जीवन की गलती का निशान है। बच्चा वो नहीं है, बच्चा एक आत्मा है, बच्चे का अपना व्यक्तित्व है।
तो हम सबके जीवन में कभी कोई हमें दुख दे सकता है, उससे कुछ क्लेश हो सकता है, उससे गुस्सा आ सकता है, पर नफरत की शक्ति को कभी प्रेम की शक्ति से ज्यादा बड़ा नहीं हो जाना चाहिए। यह क्या हो गए? एक चीज़ को इतना बड़ा बना दिया है कि बाकी कुछ देख ही नहीं रहे लोग!
बच्चों के स्थान पर पालतू पशुओं को पालने की प्रवृत्ति
तो उसी तरह से, अगर विवाह स्थिर रहता नहीं है, तो फिर क्या होता है? तो फिर लोग सोचने लगते हैं कि अगर बच्चा हो जाए, बच्चे को संभालेगा कौन?
कई ऐसे परिवार होते हैं, जो सिंगल पेरेंट फैमिली होते हैं, सिर्फ माता होते हैं कई बार, कभी-कभी सिर्फ पिता होते हैं। तो फिर लोग सोचते हैं कि बच्चे एक बोझ है, तो लोग सोचते हैं, बच्चे पालने की जगह पे हम कुत्ते पाल लें। बच्चे बड़े करने की जगह पे कुत्ते पाल लें!
तो आधुनिक सोसाइटी में अगर कोई परिवार है, कोई स्त्री है, उसको अगर बच्चा नहीं है, तो वह बच्चे पालती नहीं है, पर यह पाश्चात्य देश में, जो स्त्रियों को बच्चे नहीं हो गए होते हैं, हम बच्चे पालते नहीं हैं, हम बच्चों से मुक्त हैं। वो कहते हैं कि हमें बच्चा नहीं है, कमी नहीं है, हम बच्चों से मुक्त हैं!
अब वास्तव में, बच्चों को बड़ा करना, बच्चों को… यह एक निसर्ग की स्थितियों को एक बड़ा, एक ऐसी भेंट दी है, जो किसी और को नहीं है। पशुओं को वो शक्ति नहीं है। और जो स्वाभाविक, हर एक व्यक्ति को अलग-अलग प्रकार की ज़रूरतें हैं। तो हम सब जब 30, 40, 50 साल के होते हैं, तो हम सबको एक ‘need to nurture’ होता है कि किसी को, किसी की देखभाल करना, यह एक स्वाभाविक ज़रूरत होती है।
तो अगर यह ज़रूरत पूरी नहीं होती है, तो यह निसर्ग की योजना है, जिससे कि अनेक योनियाँ हैं, पर उसमें मानव की ऐसी योनियाँ हैं, कि जिसमें मानव का जो संतान होता है, वो काफी समय तक अपने माता-पिता पर निर्भर रहता है। कुछ-कुछ ऐसे जीव होते हैं, वो अंडे से उत्पन्न होते हैं, अपने आपको देखभाल करने लगते हैं, पक्षी होते हैं, कुछ समय तक उनको देखभाल होती है, पर मानव के समय में ऐसे कि बच्चे जो हैं, काफी समय तक माता-पिता को देखभाल करना होता है। और निसर्ग पर वो ज़रूरत, वो बच्चे की देखभाल करके, परिवार की जिम्मेदारी में रहके, वो करने के बजाय क्या करते हैं लोग? वास्तव में एक कुत्ते को दे देते हैं!
अमेरिका में योगा बहुत लोग प्रिय है, अभी लोग को कुत्ता भी बहुत प्रिय है, तो अभी एक नई चीज़ आ गई है, जो योगा और कुत्ते को साथ का मिलन कर दिया है, उसको कहते हैं ‘डोगा’!
मन का स्वभाव और नियंत्रण की आवश्यकता
मन जो है, ऐसा है कि उसको स्नेह करने का स्वभाव है, पर मन को जांच करने की शक्ति नहीं है। तो इसके कारण क्या होता है? अगर मन पर कुछ इच्छा कर गया तो… तो याल जो ख्याल उठता है… सभी ते कभी जाता है कि यहाँ पर… वो क्या करता है? एक व्यक्ति से भी स्नेह करता है और वो कुत्ते को कुछ बीमारी हो गई और कुत्ता मर गया और कुत्ता मर जाने के कारण इस व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली!
मैंने कुत्ता मर गया है, मैंने जीवन में क्या करूँ? मैंने आत्महत्या करना! यही बहुत दुखद चीज़ है। पर अभी कुत्ता मर गया है, इसलिए आत्महत्या करना… तो क्या है? जो स्नेह का, कई रोमांटिक मूवीज में देखते हैं कि अगर कोई व्यक्ति प्रेम करते हैं एक दूसरे से, अगर वो साथ में नहीं रह पाते हैं, तो फिर वो आत्महत्या कर लेते हैं। तो वही भाव है, पर यह कुत्ते की बात है।
तो जो मन तमोगुणी होता है, तो फिर वह जो कार्य करना है, वह कार्य—स्नेह दिखाना तो ज़रूरी है, पर वह मिसडाइरेक्ट हो जा रहा है। तो यह तो बहुत ही, हम कह सकते हैं, बहुत ही विकृत चीज़ है। पर इस उदाहरण से मैं कुछ प्रिंसिपल्स, कुछ तत्त्व बोलने का प्रयास कर रहा हूँ।
यह उदाहरण शायद हमारे समाज में अभी नहीं है, पर जो अमेरिका में होता है, वो 30-40 साल में भारत में भी होने लगता है। पर यहाँ पे महत्वपूर्ण यह है कि जो मन है, जब वो अनियंत्रित होता है, तभी वो एक चीज़ को सब कुछ बना देता है और उसके कारण वो सत्य को समझ नहीं पाता है।
भौतिक ज्ञान और आध्यात्मिक सांत्वना
तो कई बार जब हम किसी से संबंध जोड़ते हैं, हम किसी संबंध में होते हैं, तो तभी हम एक चीज़ को देखते हैं। तो कई बार लोग आजकल के समाज में लव मैरिजेज करते हैं। तो मैं एक अमेरिका में प्रवचन दे रहा हूँ, कॉलेज में लेक्चर दे रहा हूँ, तो तभी एक विद्यार्थी ने सवाल पूछा—क्योंकि प्रेम के खिलाफ नहीं है, वे लोग प्रेम के खिलाफ नहीं हैं।
अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु का वध होता है, तो अर्जुन is devastated, वो रोने लगते हैं, और तभी भगवान कृष्ण क्या करते हैं? भगवान कृष्ण तभी उनको यह नहीं बोलते हैं, “तुम्हें पुत्र से इतनी आसक्ति क्यों, क्या तुम जानते हो आत्मा शाश्वत है?” कृष्ण उनको सांत्वना करते हैं, कृष्ण उनको भावनात्मक रूप से सपोर्ट देते हैं।
तो तत्त्वज्ञान महत्वपूर्ण है, समझना ज़रूरी है, पर हमें देखना है कि तत्त्वज्ञान का भी उद्देश्य क्या है? हम सब हमारे जीवन में अग्रसर चल रहे हैं, हमें आगे चल रहे हैं। तो कभी-कभी हमें तत्त्वज्ञान के द्वारा शक्ति मिलती है, कभी-कभी भावनात्मक रूप से कोई हमारे साथ रहता है, कोई हमारे सहनूभूति दिखाता है, कोई हमें समझता है, मोरल सपोर्ट जोड़ता है, तो उससे हमें कोई शक्ति मिलती है।
तो हमें जब हम किसी के साथ वार्तालाप कर रहे हैं, तभी हमें एक interaction कर रहे हैं, तभी हमें देखना है कि मैं इस व्यक्ति की मदद कैसे कर सकता हूँ? अगर वो सेवा भाव हमारे पास होगा, तो उचित स्तर पे हम उचित कार्य कर पाएँगे।
प्रभुपाद जी जब अमेरिका में एक मंदिर में गए थे, तो तभी वहाँ पे छोटा सा मंदिर था, एक ऐसे कोंडो था, एक साइड में भक्त रह रहे थे, दूसरे साइड में एक वृद्ध स्त्री रह रही थी। प्रभुपाद जी कुछ भी नहीं बताया, और फिर प्रभुपाद जी वहाँ से निकल के आगे, भक्तों के सबके मन में सवाल था, प्रभुपाद जी भी सतर्कता से समझ गए, प्रभुपाद जी सिंपली बोले—“Sometimes old people become lonely, and because of loneliness they become irritable.”
तो फिर अब प्रभुपाद जी चले गए, इतना ही बोल के, और फिर क्या हो गया? बाद में वो जो वृद्ध स्त्री भक्तों से मिलने गई—”तुम्हारे गुरु इतने अच्छे, कि मैं टॉक सुना इसलिए इतनी…” और उसके जो कंप्लेंट थे, सब बंद कर दिए उसके बाद में।
तो प्रभुपाद, कृष्ण के बारे में एक शब्द बोले बिना, उस व्यक्ति को कृष्ण के करीब ले गए। तो यहाँ पर मेरा कहने का मतलब यह है, कि हमें जब दूसरों से आरंभ-आरंभ कर रहे हैं, तो हमें यह भाव रखना है, कि मैं इस व्यक्ति की सेवा कैसे कर सकता हूँ, इस व्यक्ति की मदद कैसे कर सकता हूँ। तो यह भाव अगर हमारा होता है, तो हमें हम दूसरों का कभी मोरल सपोर्ट चाहिए, कभी उनको फिलॉसॉफिकल नॉलेज देना है, वह उचित हम कर सकते हैं।
अपेक्षाओं का नियमन और शरीर तथा आत्मा का यथार्थ
और जहाँ तक हमारे जीवन में ऐसी परिस्थिति आ रही है, कि हमको मोरल सपोर्ट नहीं मिल रहा है, तो फिर हमें यह देखना है कि अलग-अलग लोगों की अलग-अलग प्रवृत्तियाँ होती हैं। तो कुछ-कुछ लोग ऐसे होते हैं, वो मोरल सपोर्ट नहीं दे पाएंगे, वो आपको तत्त्वज्ञान नहीं देंगे। तो अगर मेरी ज़रूरत यह है कि मुझे उस समय यह ज़रूरत है, तो मुझे यह देखना है कि कौन व्यक्ति यह पूरा कर सकता है।
हमारे जीवन में समस्याएँ कई बार इसलिए आती हैं कि जो हमारी ज़रूरत है, वह पूरी हो सकती है, पर हम चाहते हैं कि यह ज़रूरत इसी से पूरी हो, यह व्यक्ति मुझे सपोर्ट करे। पर वो जो मुझे सपोर्ट चाहिए, कोई और व्यक्ति दे सकता है, पर जब हम अपेक्षा करते हैं कि यह इसी से मिले और इससे नहीं मिलता है, तो हम हताश हो जाते हैं।
तो क्या है कि हमारी अपेक्षाओं को हमें मॉडरेट करना है। मॉडरेट करना है मतलब कि ऐसे अलग-अलग व्यक्तियों का अलग-अलग स्वभाव होता है, और कुछ-कुछ ज़रूरतें…
फिलासफी हमें पता रहती है, पर जब हमको अपने ऊपर इम्प्लीमेंट करनी होती है, तो वह अपने ऊपर बहुत अच्छा होती है। जब हम तत्त्वज्ञान जानते हैं कि मैं शरीर नहीं हूँ, आत्मा हूँ, पर उसको अमल करना बड़ा मुश्किल होता है। मैं शरीर नहीं हूँ, मैं आत्मा हूँ, यह तत्त्वज्ञान के रूप में महत्वपूर्ण है, पर व्यावहारिक रूप पे कार्य हम इससे नहीं कर सकते हैं।
पाश्चात्य में हम कार्य कर सकते हैं—I am more than my body. मैं इस शरीर में हूँ, और मैं शरीर की ज़रूरतों को ठुकरा नहीं सकता, शरीर के संबंध हैं, उसको ठुकरा नहीं सकता, पर I am not just my body, I am more than my body.
The journey to realizing I am not the body begins with acting at the level I am more than my body. मेरे शरीर की ज़रूरतें हैं, पर मेरा सारा जीवन शरीर की ज़रूरतों को पूरा करने में नहीं लगा सकता। मेरा मन भी है, मेरी आत्मा भी है, आत्मा की ज़रूरतें हैं। तो उसके स्तर पे मुझे कार्य करना है, उसकी ज़रूरतों को भी पूरा करना है।
पर उसके ही अगले श्लोक में, जब वो अर्जुन को संबोधित करते हैं:
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तिक्षस्व भारत॥
दूसरे श्लोक में ही भगवान अर्जुन को दो नामों से संबोधित करते हैं—एक है ‘भारत’, और दूसरा है ‘कौन्तेय’। और दोनों नाम शरीर से संबंधित हैं।
अगर अर्जुन शरीर नहीं है, आत्मा है, तो फिर वो कुंती के पुत्र कैसे हो सकते हैं? वो कुंती के, वो शरीर, शरीर का संबंध है। भारत—भरत वंश में आया है, तो वो भी शरीर का ही संबंध है।
तब इसका मतलब क्या है? प्रभुपाद जी तात्पर्य में लिखते हैं कि जो हमारे भौतिक संबंध हैं, उसको हमें, उसके द्वारा हमारी जिम्मेदारी होती है, और उसके जिम्मेदारी के अनुसार हम कार्य कर सकते हैं।
तो भगवान अर्जुन कहे, कि अर्जुन शरीर पे जो ऊपर-नीचे होता रहता है, उसको सहन करना मुश्किल है, पर तू एक महान स्त्री के पुत्र हो, इसीलिए तुम यह कर सकते हो, तुम्हें एक महान वंश में जन्मे हो, इसीलिए तुम यह कर सकते हो।
तो इसका मतलब क्या है? कि हमने शरीर के साथ जो हमारी पहचान है, उसको व्यावहारिक रूप पे हम ठुकरा नहीं सकते हैं। उसको हम व्यावहारिक रूप पे इस्तेमाल करते हैं आध्यात्मिक प्रगति करने के लिए।
प्रभुपाद जी जब भारत में आए थे, अमेरिकी भक्तों को लेके, शिष्यों को लेके, तो वो प्रभुपाद जी अभी तत्त्वज्ञान में हर बार बताते थे कि आप शरीर नहीं हैं, आत्मा। पर जब उनको बॉम्बे में एक बड़ा प्रोग्राम करना था, बहुत विशाल प्रोग्राम था, तो भक्त बोले—”हमारे पास तो हम इतने कम हैं, कुछ हमारे कुछ रिसोर्सेज नहीं है, हम कैसे करेंगे?”
तो प्रभुपाद जी बोले—”आप सब अमेरिकी लोग, सारे दुनिया के लोग बोलते हैं, अमेरिकी बहुत बड़े हैं, तो तुम दिखाओ, कैसे अमेरिकी लोग बड़े हैं, तुम कुछ बड़ा करके दिखाओ।”
तो अगर हम शरीर नहीं हैं, आत्मा हैं, तो वो अमेरिकी कहाँ है? पर क्या है? ये व्यावहारिक स्तर पे अमेरिकी, ये तो शारीरिक पहचान है। तो प्रभुपाद जी क्या कर रहे हैं? वो अमेरिकी की पहचान के द्वारा उनको भक्ति में लगा रहे हैं।
उसके बाद में जुहू मंदिर के वहाँ पे कुछ, जब बन रहा था, तो वहाँ पे कुछ लोग आए थे, भारतीय लोगों को प्रवचन दे रहे थे। तो प्रभुपाद जी वहाँ पे बोलते हैं कि ये भगवत गीता भारत का संदेश है, और आप सब भारतीयों… पर यह भारत का संदेश भारतीयों को सिखाने के लिए, मुझे परदेश के लोग लाने पड़ते हैं! यह आपका संदेश है, आप यह सीखो और आप यह सिखाओ।
अभी भगवद्गीता का संदेश है कि हम शरीर नहीं, आत्मा हैं, तो हम भारतीय भी नहीं हैं। पर अगर मैं भारतीय हूँ, यह पहचान मुझे भक्ति के मार्ग में लगाने के लिए, भगवद्गीता का अध्ययन करने के लिए अनुकूल है, तो मैं उसको स्वीकार करता हूँ।
इसलिए हमारी पूरी वर्णाश्रम की पद्धति है—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। अभी कौन आत्मा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र नहीं है, शरीर ही है, पर ये शरीर की पहचान हम हमारे भक्ति के अनुकूल बनाते हैं।
शरीर की पद्धति है कि मुझे यह चीज़ अच्छी लगती है, तो मुझे गाना अच्छा लगता है, तो मैं संगीत सीख के, कीर्तन करके भगवान की सेवा कर सकता हूँ। मुझे डेकोरेशन अच्छा लगता है, तो मैं डेकोरेशन की पद्धति है शरीर और मन की पद्धति है, पर मैं इसको भगवान की सेवा में इस्तेमाल करता हूँ।
तो हमारे मन और शरीर में कुछ ऐसी चीज़ें मांगें होती हैं जो भक्ति के प्रतिकूल होती हैं, कुछ वासनाएँ होती हैं, तो उसको हमें नियंत्रण करना है। पर पूरा शरीर को हमें, शरीर की पहचान को ठुकराना नहीं, व्यावहारिक ठुकराना नहीं। तो कुछ चीज़ें हैं जो शरीर की मांगें हैं, उसको ना बोलना है, पर शरीर का स्वभाव, जो प्रवृत्ति है, उसको हमें भक्ति में इस्तेमाल करना है। तो जो हम इस तरह से करने लगते हैं धीरे-धीरे, तो आध्यात्मिक साक्षात्कार जब बढ़ता है, तो फिर हम “मैं शरीर नहीं हूँ, आत्मा हूँ” इस साक्षात्कार के साथ कह सकते हैं।
मन को नियंत्रित करने के तीन उपाय: मनस्थिति, परिस्थिति और संस्कृति
तो मन हमारा शत्रु है, मन की बात नहीं समझनी चाहिए। तो मन को कैसे कंट्रोल करना चाहिए?
मन जो है, वास्तव में एक औजार है, एक टूल है, जो हमें इस भौतिक जगत में कार्य करने के लिए ज़रूरी है। पर मन जो है, उसपे अलग-अलग प्रकार के impressions हो जाते हैं, उसपे अलग प्रकार की छवि पड़ जाती है। तो वो जो पूरी छवि पड़ जाती है, उसके कारण वो हमें प्रवृत्त करती है—ऐसा कार्य करो, ऐसा कार्य करो, ऐसा कार्य करो।
तो मान लीजिए यहाँ पे किसी का घर है, यहाँ पे ऑफिस है, दफ्तर है, और यहाँ पे बीच में एक शराब की दुकान है। तो दो व्यक्ति यहाँ पे रहते हैं—एक व्यक्ति ने कई बार शराब पी है, और अब शराबी बनने के मार्ग पे लग गया है; दूसरे ने कभी नहीं पी है।
दोनों उसी रास्ते से आते हैं—एक के लिए “मन बोलता है, जाके पियो, जाके पियो, जाके पियो, नहीं, हाँ, नहीं, हाँ”, बड़ा द्वंद्व होता है। दूसरा, उसको ध्यान में भी नहीं आ गया है और अच्छी छवि मन पे लग गई है, इसलिए वो मन बोलता है… नहीं!
तो अभी अगर उसने शराब नहीं पी होती, तो उसका मन उसको वैसे नहीं बोलता था। तो उसका मन भी वो शत्रु नहीं बनता था उसमें।
तो मन पे जितना मानसिक जो छवि पड़ जाती है, उस छवि के कारण मन हमें बहुत कार्यों में क्रोध पैदा हुआ करती है। आजकल ये समस्या बहुत भारी है, खोलने के लिए, हम जा कर… तो हमें उस पर सकारात्मक छवियाँ डालनी हैं! अच्छे impressions उसे डालने हैं।
जब हम भक्ति के कार्य करते हैं, मंदिर में आते हैं, भगवान का दर्शन करते हैं, श्रवण करते हैं, जप करते हैं, इस सब से हम मन पे सकारात्मक छवियाँ डाल रहे हैं। जितने अधिक छवियाँ हम डालते हैं मन पे, उतना जो मन है, वह उसके बाद में हमें सकारात्मक कार्यों के लिए प्रवृत्त करना है।
मन की छवियों को परिवर्तित करना, यह सबसे फाउंडेशन, सबसे महत्वपूर्ण चीज़ है, अगर हमें मन को नियंत्रण करना है। पर यह मन की छवियों को परिवर्तित करने में काफी समय लगता है। इसलिए व्यावहारिक रूप से हम और कार्यों के लिए कर सकते हैं।
हम देख सकते हैं क्या चीज़ें हैं जो मेरे मन को बहुत विचलित करती हैं? तो उन चीज़ों से शायद मैं थोड़ा दूर रह सकता हूँ। इस परिस्थिति में जाता हूँ तो मेरा मन बहुत विचलित हो जाता है। क्या है? अंतरंग है।
और मन के नियंत्रण में तीन चीज़ें होती हैं—मनस्थिति, परिस्थिति और संस्कृति।
- मनस्थिति मतलब हमारे मन में क्या चल रहा है।
- परिस्थिति मतलब हमारे आजू-बाजू में क्या है।
- संस्कृति से संस्कार होती है।
तो अगर संस्कृति भौतिकवादी है, तो संस्कार भौतिकवादी हो जाते हैं। तो मैंने पहले क्या बताया? हमें संस्कृति को बदलना है। हम पूरी संस्कृति में नहीं बदल सकते हैं, पर हम खुद किस संस्कृति में जा रहे हैं, वो बदल सकते हैं। भक्तों के संग में आते हैं तो मन में जो संस्कार है, छवियाँ हैं, वो बदल जाती हैं।
पर उसके साथ-साथ हमारी मनस्थिति परिस्थितियों से भी निर्भर होती है। तो जिन परिस्थितियों में मेरा मन विचलित अधिक होता है, तो अगर मैं उन परिस्थितियों को टाल सकता हूँ। अगर मान लीजिए शराब का उदाहरण है, अगर कोई व्यक्ति फैसला कर लिया है कि मैं शराब नहीं पीने वाला हूँ, पर अगर उसका घर शराब की दुकान के बाजू में है, तो शराब छोड़ना उसका नामुमकिन हो जाएगा, क्योंकि इतना पास में इच्छा आ जाएगी और वो कार्य कर लेगा।
तो फिर शायद उसको फैसला करना है कि परिस्थिति मुझे बदलनी पड़ेगी, कहीं और जाना पड़ेगा। तो यह परिस्थिति को हम हमेशा बदल नहीं सकते हैं, पर कुछ तो हम उसमें परिवर्तन ला सकते हैं। यह एक बाह्य स्तर पे मन को नियंत्रित करने में हम मदद कर सकते हैं।
दूसरा है कि बुद्धि के स्तर पे हम हमारी बुद्धि को और सशक्त बना सकते हैं। तो तभी ये ऐसा क्यों नहीं करना है, ये हम हमारी बुद्धि को सशक्त करेंगे। तो हमें जब मन बोलेगा “ऐसे करो”, तो “नहीं, मैं ऐसे नहीं करने वाला, क्यों नहीं करने वाला? ये-ये कारण है।” तो वो भी हमें मदद कर सकता है।
तो बौद्धिक स्तर पे अगर हम शास्त्रों का अध्ययन करते हैं, सत्संग में आके भगवान के संदेश को सुनते हैं, तो उससे हमारी बुद्धि सशक्त होती है।
तो इस तरह से व्यावहारिक स्तर पे परिस्थितियों को थोड़ा बदल के, बौद्धिक स्तर पे बुद्धि को सशक्त करके, और आध्यात्मिक स्तर पे भक्ति के कार्यों के द्वारा भक्ति में छवियाँ मन पे डाल के, हम मन को नियंत्रित कर सकते हैं।
बहुत-बहुत धन्यवाद!
हरे कृष्णा, हरे कृष्णा, हरे हरे, राम हरे राम, राम-राम हरे हरे!