When the mind gets obsessed with desire, it becomes impossible to control – what to do – Hindi?
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Lecture Summary
- मन रूपी बेकाबू घोड़ा: कभी-कभी हमारा मन किसी इच्छा के प्रति इतना अधिक आकर्षित हो जाता है कि उस पर नियंत्रण करना लगभग असंभव हो जाता है। यह स्थिति उस घुड़सवार की तरह है जिसका घोड़ा बेकाबू होकर रास्ते से भटक जाता है और सवार को नीचे गिरा देता है।
- पतन के बाद हताशा से बचें: यदि वासना या प्रलोभन के कारण हमसे कोई गलती (पतन) हो जाती है, तो हमें हताश होकर भक्ति नहीं छोड़नी चाहिए। ऐसे समय में मन हमें कोसता है और यह विश्वास दिलाने की कोशिश करता है कि हम कभी नहीं सुधर सकते, लेकिन हमें मन की इस नकारात्मक आवाज़ को अनसुना करना चाहिए।
- भक्ति से पुनः शुरुआत: गलती हो जाने के बाद, उस पर शोक मनाने के बजाय, बचे हुए समय का उपयोग पुनः कृष्ण भक्ति में करना चाहिए। निरंतर भक्ति करने से हमारी आध्यात्मिक शक्ति और बुद्धि में वृद्धि होती है, जिससे अगली बार प्रलोभन आने पर हम मन को बेहतर तरीके से नियंत्रित कर पाते हैं।
- भगवद गीता का परम आश्वासन: भगवान कृष्ण भगवद गीता (9.30 और 9.31) में स्पष्ट करते हैं कि यदि कोई व्यक्ति दुराचार या गलती करने के बाद भी बिना निराश हुए अनन्य भाव से उनकी भक्ति में लगा रहता है, तो वह शीघ्र ही शुद्ध और शांत (धर्मात्मा) हो जाता है। भगवान आश्वस्त करते हैं कि उनके भक्त का कभी विनाश नहीं होता।
Full Transcriptions
मन का आकर्षण और घोड़े का उदाहरण
कभी-कभी मन किसी चीज़ पे आकर्षित करने (अधिकार करने) लग जाता है, तो इतना शक्तिशाली हो जाता है कि उसको ‘ना’ बोलना बड़ा मुश्किल हो जाता है। ठीक है, तो तभी जो भी हो जाता है वो हो जाने दीजिए, उसके बाद में क्या?
कोई व्यक्ति घोड़े पर चल रहा है और वो घोड़ा रास्ते पे जा रहा है, पर उसको बाद में कोई फल दिख जाता है और उधर भागने लगता है। और कभी-कभी घोड़े की रफ़्तार इतनी बढ़ जाएगी कि वो घोड़े को रोकना नामुमकिन हो जाएगा और घोड़ा शायद वो रास्ते से निकल जाएगा, वो बाहर कहीं चला जाएगा, घुड़सवार गिर जाएगा नीचे। तो काफ़ी घायल हो सकता है, कुछ एक्सीडेंट हो सकता है उसमें, पर फिर भी उसके बाद वापस वो घोड़े पर चढ़ जाएगा और पुनः चल जाएगा।
पतन के बाद हताशा से बचाव
तो उसी तरह से कभी-कभी मन का प्रलोभन बहुत बढ़ जाता है और तभी नियंत्रण करना नामुमकिन हो जाता है। तो अगर यह अनियंत्रित हो जाता है, तो तभी जो हो गया वो हो गया, उसके बाद में आगे क्या?
क्या होता है कि कई बार हमसे एक चीज़ गलत हो जाती है, उससे हम इतना हताश हो जाते हैं कि बाद में कुछ अच्छा कर भी सकते हैं पर करते नहीं। मतलब, अगर हमारा समय और हमारी चेतना, उसका अगर हम ग्राफ बना देंगे, तो फिर उसमें जो बहुत एक वासना है, कभी-कभी बीच में बहुत तेज़ मिल जाती है। पर ऐसे नहीं कि वासना 24 घंटे हमें उतनी ही तीव्रता से परेशान कर रही है, होगी शायद, पर यह इतना नहीं होता है। तो यह बहुत ज़्यादा हो जाता है, तो फिर जब वो बहुत ज़्यादा हो रहा है, तब शायद हम कुछ नहीं कर पाएंगे।
मन की आवाज़ बनाम विवेक की आवाज़
पर बीच में क्या कर रहे हैं? वो भी बहुत बढ़ गया, बाद में कुछ-कुछ वापस बढ़ने वाला है, पर “क्यों किया, क्यों किया, तुम कितने मूर्ख हो”, वो मन ही कोस रहा है। अगर हमारा विवेक, बुद्धि अगर कोस रही है, तो उससे क्या होगा, हमारा दृढ़ संकल्प भक्ति करने का बढ़ जाएगा। पर जब मन कोसता है, वो बोलता है, “तुम इतने मूर्ख हो, तुम कभी सुधर ही नहीं सकते, तुम भक्ति करने से भी क्या फायदा है, छोड़ दो भक्ति तुम करना।”
तो इसलिए sometimes it is impossible to be not conscious of the mind, but that doesn’t mean that we have to be always conscious of the mind only.
भक्ति से आत्म-नियंत्रण की शक्ति
कभी-कभी मन की बात को अनसुनी करना नामुमकिन हो जाता है, पर वो प्रसंग हो गया, जो भी हो गया वो हो गया। पर उसके बाद मैं मन की बात को नहीं सुनूँगा, तभी तो मैं कृष्णा की बात सुनने लगा हूँ, तभी मैं कृष्णा भक्ति में तीव्रता से लगता हूँ। फिर अगर ऐसे लगूंगा, तो अगली बार जब वो इच्छा बढ़ जाएगी, तभी मैं, क्योंकि मैंने भक्ति की है, तो मेरी शक्ति और बढ़ गई है, बुद्धि और उचित हो गई है, तो तभी संभावना अधिक है कि मैं तभी उसको नियंत्रित कर सकूंगा।
इसलिए, जो मन अगर कभी नियंत्रित नहीं हो रहा है, तो फिर उसके बारे में खुद को कोसने की जगह पे, बाकी समय में हम मन को नियंत्रित रख के भक्ति में लग सकते हैं।
भगवद गीता का आश्वासन: कभी विनाश नहीं
इसलिए जो भगवान कहते हैं:
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥
कभी-कभी कोई भक्त से कोई दुराचार हो भी जाता है, पर अगर वो भक्त बिना हताश हुए भगवान की भक्ति में लगा रहता है, ‘भजते मामनन्यभाक्’, तो फिर ज़रूर शुद्धिकरण हो जाएगा। और फिर वो:
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥
जल्दी ही वो शुद्ध हो जाएगा, और शांत हो जाएगा। भगवान आश्वस्त करते हैं कि अगर कोई मेरी भक्ति में लगा रहेगा, तो कभी भी उसका विनाश नहीं होगा।
बहुत धन्यवाद। श्रील प्रभुपाद की जय, गौर भक्त वृन्द की जय, निताई गौर प्रेमानन्दे हरि हरि बोल!