We often direct our anger towards those who can’t hurt us – how to avoid getting angry – Hindi
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Lecture Summary
इस व्याख्यान में क्रोध की प्रकृति, उसके कारणों और उसे सही तरीके से प्रबंधित करने के व्यावहारिक और आध्यात्मिक उपायों पर विस्तार से चर्चा की गई है:
- भावनाओं को संभालने के तीन तरीके: भावनाओं को दबाना (Repress) या सीधे व्यक्त करना (Express) दोनों ही नुकसानदायक हो सकते हैं। सही तरीका यह है कि हम अपनी भावनाओं को समझें और उन्हें प्रोसेस (Process) करें।
- आध्यात्मिक दृष्टिकोण: यदि कार्यालय या बाहरी परिस्थितियों के कारण मन में क्रोध या तनाव उत्पन्न हो जाए, तो घर जाने से पहले भगवान का कीर्तन सुनना, मंदिर जाना या विग्रहों के दर्शन करना मन को शांत करने में सहायक होता है।
- तथ्यों की जाँच (Valid vs Invalid): क्रोध का कारण कभी-कभी सही (Valid) होता है और कभी-कभी मन उसे बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करता है (Invalid)। इसलिए अपनी शिकायतों और चिंताओं की बुद्धि से जाँच करनी चाहिए।
- जर्नलिंग (लेखन) का महत्व: मन में आने वाले विचारों को डायरी या जर्नलिंग के माध्यम से कागज़ पर उतार लेना चाहिए। इसके बाद बुद्धि का उपयोग करके यह देखना चाहिए कि कौन सा मुद्दा सही है और उसे बिना अत्यधिक क्रोध के शांत तरीके से कैसे हल किया जा सकता है।
- व्यावहारिक समाधान: यदि कोई परिस्थिति या बॉस बार-बार परेशान कर रहा है, तो उस पर तात्कालिक गुस्से में प्रतिक्रिया देने के बजाय शांति से सोचकर व्यावहारिक कदम (जैसे नौकरी बदलना या उचित जगह शिकायत करना) उठाने चाहिए।
Full Transcriptions
क्रोध प्रबंधन: हम अपनी भावनाओं को कैसे संभालें?
पिर फिर भी हम वो कर जाते हैं। तो हाँ तो वो कर जाते हैं। पर एक है कि हमारी भावना उसको रिपरेस करना। दूसरा है उसको एक्सप्रेस करना। तीसरा है उसको प्रोसेस करना। एक दबा देगे तो फिर हमको बाद में समस्य हो जाएगे। बोल देगे तो दूसरों को समस्य होगी। तो फिर हमें खुद को एक सेव जून दूना है।
मुझे पता है कि मेरे विज़े से क्रोध आ गया है। तो फिर आज ओफिस में बहुत समस्या होई। और अगर मैं ऐसी मस्य में घर जाओंगा, तो घर में मैं किसी में विस्पोर्ट करने वाला हूँ। तो फिर मुझे क्या करना चाहिए। हमें खुद को हमारे भावनाओं को कैसे मैनेज करना है। इसके लिए बुद्धी इस्तमाल करके कुछ योजना मनाने हैं। तो शायद अगर मुझे बगवान का कीरतन बहुत अच्छा लगता है। तो उस दिन मैं घर जाने के पहले, शायद मंदिर में जाओगा या कहीं आओं जगर जाओगा, और मैं आदा घंटा, एक घंटा कीरतन सुनुगा। तो उससे मेरा तोड़ा मन थंदा हो जाएगा।
फिर बाद में जाओगा मैं घर पे, तो फिर वो संभावना उस प्रकार से ख्रोत को व्यक्त करने की कम है। वो होगा ही नहीं, ऐसे ग्यारेंटी नहीं है, पर संभावना कम होती है। तो हम सब को, हमारी जो गलत भावनाएं हैं, उनको कैसे प्रोसेस करना है, उसके लिए एक पद्धति खुद को दूननी है। और क्या पद्धति काम किसके लिए करेगी, हर के लिए अलग होती है। कुछ-कुछ लोगों के लिए प्रवचन सुनना, हाँ, अगर ये सुनना, तो शांत हो गया। कुछ लोगों के लिए, जस मंदिर के वातावर में जाना, बहुत अच्छा लगता है मुझे। यहाँ, कुछ लोगों के लिए, अगर हम बगवान के विग्रहों का दर्शिन करते हैं, कुछ लोग पोलते हैं, उससे शांत हो जाती है।
क्रोध का आध्यात्मिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण
तो हमें देखना है, कि हमारे जो ख्रोध है, उसको हम प्रोसेस किस तरह से कर सकते हैं। कैसे, एक चीज़े, अध्यात्मिक पढ़ति से इसको देखना, उसको शांत करना। और एक ब्यावाहारिक पढ़ति से भी हमें देखना है, कि इस परस्तिति में मैं क्या कर सकता हूं।
तो कई बार, जब ख्रोध आता है हमें, तो ख्रोध का कुछ कारण वैलिड होता है, और कुछ कारण इनवैलिड होता है। कुछ बात उसमें सही होती है, और कुछ बात होती है, हमारा मन ने उसको और बढ़ा दिया होता है। तो जो असली हमारे कंसर्ण्स है, हमारे ग्रीवन्स्स है, उसको हमें जाज करके फिर उसके बारे में कुछ करना हैं हमें। तो इसके लिए, अगर हम सत्वगुण में होते हैं, तुम इसके बारे में विचार कर सकते हैं।
जर्नलिंग और बुद्धि का सही उपयोग
तो मैं क्या करता हूँ, कई बार मैं, लिखना मेरी एक सेवा है, तो कई बार मैं बहुत भक्तों से, बहुत लोगों से, ज़िन ज़िन, इमेल पर आदां परदां करता हूं। तो कभी कोई ऐसा कारे कर लेता है, जो से मैं बहुत गुसा हो जाता हूं। तो कई बार ऐसे होता है, कि उस चोबिस घंटे में वोई व्यक्ति कुछ और बोल देता है, वो माफ़ी मांग लेता है, वो कोई स्पश्टिकरण कर देता है, तो समसे आज हो जाती है। मेरे मन के अंदर तो नहीं दब रहा है। तो उसको एक्सप्रेस कर लिया।
फिर उसके बाद, मैं चोबिस घंटे के बाद, अगर थोड़ा मन शांत हो गया, फाद में देखते हैं, तो ये पॉइंट जो है, ये सही है के लिए मैं पता नहीं, मुझे और जानकारी प्राप् उसको बुद्धी से हम जाच करते हैं। ये पॉइंट सही है, पर इसको मैं और थोड़ा, इतने क्रोध से बोलने के जूरत नहीं, इसको और सौफ्टली बोल सकता हूँ। ये पॉइंट जो है, ये ठीक है, इसको मैं लिखते हूँ, उसको इवालिएट करते हैं। और कहीं बार ऐसे करने से, क्या होता है, वो समस्या को हम, सुलज नहीं जाए, पर कमसे कम उसको और बढ़ाते नहीं हैं।
तो हम सब को, एक व्यावाहरिक रूप पर भी क्या करना है, अगर मेरे बॉस बार बार मुझे परिशान कर रहा है, तो फिर शायद मुझे क्या दूसरी नौकरी दूननी चाहिए, या किसी को, आफिस में किसी को रिपोर्ट करना चाहिए इसके बारे में, क्या करना चाहिए, एक प्रक्टिकल रूप से भी हमें कुछ कारे करना है, तो पर वो प्रक्टिकल रूप से क्या करना है, वो हमें शानती से सोच के कारे करना है।
तो इसलिए, जो हमारी भावना है, अगर हम लिख लेते हैं, जर्नलिंग एक टूल होता है, जो कुछ लोगों को भी फायदा हो सकता है, उसमें क्या करते हैं, मन जो बोल रहा है, उसको लिख लो वहाँ पुरा, फिर बाद में बुद्धी को वहाँ पर लाओ, और बुद्धी से उसका, उसकी जाँच करो, यह पॉंट सही है, यह पॉंट इतना सही नहीं है, मैं इसको कहता है, कहता है कि मैं एक जर्नलिंग पर किताब लिखने के मेरे इच्छा है, कैसे हमारे बुद्धी को हमारे मन का काउंसेलर बना दे, मन जो बोलता है, हाँ, सुन लो उसको, पर बाद में बुद्धी से उसकी जाँच करो, और फिर ऐसे करने से, फिर हम फैसला कर सकते हैं, यह परिस्थिती जो है, जिहां मुझे बहुत परिशान कर रही है, पर अभी परियाय क्या है मेरे लिए, यह उचित है, यह उचित है, यह उचित है, यह परियाय का यह अच्छा है, यह बुरा है, यह परियाय का यह अच्छा है, यह बुरा है, यह परियाय का यह अच्छा है, यह बुरा है, तो इससे हम चानते रूप से विचार करते हैं, फिर व्यावारिक रूप से भी कुछ अच्छा हम फैसला कर सकते हैं। हरे कृष्ण