Snana-Yatra Meditation – Understanding how God can fall sick – Hindi
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Lecture Summary
- स्नान यात्रा और विरह भाव: यह कथा भगवान जगन्नाथ की स्नान यात्रा और उसके बाद 15 दिनों के ‘अनवसर’ (एकांतवास) के दौरान श्री चैतन्य महाप्रभु के विरह दुःख (राधा भाव) को दर्शाती है।
- भगवान के कार्यों की दिव्यता: जिस प्रकार किसी बड़ी हस्ती द्वारा किया गया साधारण कार्य (जैसे रिबन काटना) विशेष हो जाता है, उसी प्रकार भगवान का स्नान भी एक सामान्य क्रिया न होकर एक दिव्य और उत्सवपूर्ण लीला है।
- भक्ति से हृदय परिवर्तन: एक ईसाई पादरी का वास्तविक उदाहरण दिया गया है, जो पहले मूर्तियों को तोड़ना चाहता था, लेकिन ज्ञान (गीता डेली) पढ़ने और भक्तों के संग से उसकी बुद्धि शुद्ध हुई और वह विग्रहों की ओर आकर्षित हो गया।
- श्रवण और ध्यान की शक्ति: शुकदेव गोस्वामी से सुनकर जिस तरह परीक्षित महाराज की बुद्धि शुद्ध हुई, वैसे ही भगवान की लीलाओं को सुनने और महिमा को समझने से हमारा अनेक आसक्तियों में भटका हुआ मन एकाग्र, शांत और संतुष्ट हो जाता है।
- महामाया बनाम योगमाया: भौतिक जगत में लोग ‘महामाया’ के कारण भगवान को भूलते हैं, जबकि वृंदावन में भक्त ‘योगमाया’ के कारण भगवान का ऐश्वर्य भूल जाते हैं, ताकि वे उनसे अधिक घनिष्ठता और विशुद्ध प्रेम कर सकें।
- वैकुंठ और गोलोक के रसों में अंतर (प्रश्नोत्तर): भगवान प्रत्येक भक्त के भाव के अनुसार आदान-प्रदान करते हैं। वैकुंठ में ऐश्वर्य भाव है और गोलोक में माधुर्य भाव। यद्यपि गोलोक का माधुर्य रस अधिक विस्तृत (5 लीटर के भरे गिलास के समान) है, लेकिन वैकुंठ के शांत रस (1 लीटर के भरे गिलास) वाले भक्त भी अपनी स्थिति में पूर्णतः संतुष्ट रहते हैं। दोनों ही अवस्थाओं में आनंद पूर्ण है और कोई अभाव नहीं है।
Full Transcriptions
भगवान जगन्नाथ की स्नान यात्रा और भक्ति में चमत्कारिक परिवर्तन
जगन्नाथ स्नान यात्रा का उत्सव और चैतन्य महाप्रभु का भाव
हरे कृष्ण! आज हम जगन्नाथ रथ यात्रा और स्नान यात्रा का उत्सव मना रहे हैं। उस अवसर पर मैं चैतन्य चरितामृत से कुछ वर्णन करूँगा। चैतन्य चरितामृत का यह मध्य लीला का ग्यारहवाँ अध्याय और यह 61वाँ श्लोक है। हमें बता रहे हैं:
स्नान-यात्रा देखि’ प्रभुर हैल बड़ सुख।
ईश्वरेर अनवसरे पाइल बड़ दुःख॥
हमें बता रहे हैं कि स्नान यात्रा देखी, चैतन्य महाप्रभु ने स्नान यात्रा देखी तो ‘हैल बड़ सुख’, बड़ा आनन्द हुआ उनको। और फिर उसके बाद में ‘ईश्वरेर अनवसरे’, स्नान यात्रा के बाद में भगवान लगभग 15 दिन के लिए वे दृष्ट नहीं होते, हमारे सामने नहीं आते। तो तभी ‘पाइल बड़ दुःख’, चैतन्य महाप्रभु को बड़ा दुःख हुआ। तो मैं आज की कथा में स्नान यात्रा की थोड़ी चर्चा करूँगा। पर उसके साथ-साथ कैसे भक्त की भावनाएं भगवान से जुड़ जाती हैं, और उससे कैसे भक्त के जीवन में परिवर्तन होता है, उसके बारे में हम चर्चा करेंगे।
श्रील प्रभुपाद और जगन्नाथ जी का पाश्चात्य देशों में प्राकट्य
जगन्नाथ जी, ये भगवान कृष्ण के ही एक बहुत अद्भुत रूप हैं। जब श्रील प्रभुपाद जी अमेरिका में गए थे, तो एकाएक एक तरह से जगन्नाथ जी वहाँ पर प्रकट हो गए। कुछ एंटीक शॉप (Antique Shop) में, ऐसा दुकान जहाँ पर कुछ पुरानी चीज़ें मिलती हैं, वहाँ पर वह गए थे और वहाँ पर उनको यह कुछ अजीब प्रकार का रूप दिखाई दिया। तो वह लेकर आ गए, और उनको लगा कि ये कुछ भारतीय है, तो दिखाने को आ गए।
अभी लंदन में जो लंदन का प्रचार चालू हुआ, उसके अभी पचास साल पूरे हो रहे हैं। इसी साल में प्रभुपाद जी ने पहला मंदिर वहाँ पर स्थापित किया था जो सोहो स्ट्रीट में है, पहले बरी प्लेस (Bury Place) में था। तो वहाँ पर एक बड़ा विशाल रथ यात्रा का महोत्सव हुआ। तो अभी जो रथ यात्रा है, वह प्रभुपाद जी की कृपा से सारे विश्व भर में फैली हुई है। और जब भगवान को हम भक्ति की विधि के द्वारा पूजा करने का प्रयास करते हैं, तो भक्ति की जो संस्कृति है, भक्ति का जो ज्ञान है, तत्त्व ज्ञान है, वह हमें बताता है कि भगवान एक पूर्ण दृष्टि से एक व्यक्ति हैं। और व्यक्ति का मतलब है कि जिस तरह से हम एक साधारण व्यक्ति से बातचीत करते हैं, साधारण व्यक्ति से कार्य करते हैं, एक तरह से भगवान उसी तरह से अपने भक्तों से कार्य करते हैं, आदान-प्रदान करते हैं। तो यह जो अभी लीला है, अभी भगवान जगन्नाथ जी रथ यात्रा के लिए कुछ दिनों के बाद जाएंगे, उसके पहले अभी स्नान करेंगे।
स्नान यात्रा का दिव्य महत्त्व
कृष्ण जो हैं, वो जगन्नाथ के रूप में खास करके भक्ति भावनाओं से पूर्ण हैं। पर वो जो केमिकल रसायन लोग अपने लिए लगाते हैं, वो उससे पर्यावरण का भी कितना नुकसान होता है वो उसका विचार नहीं करते हैं। पर स्नान करना कोई सुसंस्कृत लोगों में कोई बहुत बड़ी चीज़ नहीं है, स्नान तो स्वाभाविक रूप से हम करते हैं। पर जब भगवान स्नान करते हैं, तो वह भक्तों के लिए एक उत्सव बन जाता है। क्योंकि भगवान के संबंध में हर एक चीज़ दिव्य हो जाती है।
अभी किसी ने कोई नई इमारत बनाई है, नया प्रोजेक्ट बनाया है, उसका उद्घाटन होता है। तो जब उद्घाटन होता है उसका, तो कभी कोई राष्ट्रपति आते हैं, कोई प्रधानमंत्री आते हैं, कोई बड़ी हस्ती आते हैं और फिर वो वहाँ पर रिबन को कट करते हैं। तो फिर सैंकड़ों फोटोग्राफर वहाँ पर आते हैं, रिपोर्टर आते हैं और वो सब फोटो निकालते हैं, सैंकड़ों लोग देखने आते हैं, वो अखबार में आता है। अगर मैं या आप अपने ही घर में एक रिबन बांधते हैं और वो काट देते हैं, तो कोई देखने नहीं आएगा। तो क्या कर रहे हैं, ये महत्त्वपूर्ण नहीं है, कौन कर रहा है, ये भी महत्त्वपूर्ण है। तो रिबन काटना एक साधारण चीज़ है, पर अगर कोई बड़ी हस्ती, कोई विशेष अवसर पर रिबन काट रही है, तो फिर वहाँ न्यूज़ वर्थी (Newsworthy) हो जाता है, वह अखबार में आ जाता है।
तो उसी तरह से भगवान जो भी कार्य करते हैं, भगवान वास्तव में दिव्य हैं और उनका स्नान भी दिव्य होता है। चैतन्य महाप्रभु, वही कृष्ण जो हैं:
राधा भाव द्युति सुबलितम् नौमि कृष्ण स्वरूपम्।
वह राधारानी के भाव में आये। तो अभी जगन्नाथ पुरी में क्या है कि एक दिव्य तरह से जो विरह वृन्दावन में हुआ था, उसका मिलन है। चैतन्य महाप्रभु, वही कृष्ण जो हैं, राधारानी के भाव में आये हैं।
एक क्रिश्चियन पादरी का अनुभव और विग्रह पूजा की समझ
ओल्ड टेस्टामेंट (Old Testament) या बाइबल का पहला भाग पढ़ते हैं, या फिर कुरान पढ़ते हैं, तो कई जगह पर ऐसे वर्णन आता है कि जब भी कोई राजा, कोई राज्य जीत लेता है, तो सबसे पहले क्या करता है, वह वहाँ आकर मंदिरों में जाता है और मंदिरों में मूर्तियों को तोड़ देता है। क्योंकि उनकी संकल्पना में है ही नहीं कि भगवान का कोई रूप है, उनको पता ही नहीं है। तो क्या हुआ, इसका वर्णन क्यों कर रहा हूँ मैं? कि एक क्रिश्चियन पादरी पहली बार मंदिर में आये और उन्होंने भगवान के विग्रहों को देखा, तो सबसे पहला इस क्रिश्चियन पादरी के मन में विचार आया, उनको तोड़ देना चाहिए।
पर फिर वह मंदिर में आने लग गए, उनको लगा ये भक्त अच्छे भक्त हैं। फिर भक्तों से बातचीत किया, फिर उनको लगा भगवान के लिए मुझे पढ़ना है। तो फिर उन्होंने गूगल (Google) पर सर्च किया। जब गूगल पर सर्च किया, मेरी एक वेबसाइट है gitadaily.com, तो वहाँ गीता पर रोज़ मैं एक छोटा सा लेख लिखता हूँ, 300 शब्दों का, और कई हज़ार भक्त पढ़ते हैं। तो उन्होंने जब उसको गूगल पर सर्च किया, तो उनको सब जगह सिर्फ गीता मिला पर गीता का कमेंट्री (Commentary) कहीं नहीं मिला, गीता का एक्सप्लेनेशन (Explanation) नहीं मिल रहा था अच्छी तरह, जो समझ सकें वैसे। तो बाद में वो गीता डेली मिल गया। तो गीता डेली, मेरी वेबसाइट को सब्सक्राइब कर लिया उन्होंने।
और जब वो मुझे मिलने आये थे, तो बोले कि मैं आपका गीता डेली पढ़ता हूँ, तो आप जो कह रहे हो, 90% मैं उसे मानता हूँ। पर फिर भी विग्रह की पूजा जो मुझे समझ में नहीं आ रही है, कुछ है। तो फिर जब मैं Google में सर्च कर रहा था, तो पहले गीता के बारे में सर्च किया, फिर गीता डेली पढ़ा, फिर मेरे बारे में सर्च किया। तो मेरी एक किताब थी, तो उन्होंने मेरे बारे में सर्च किया था।
पर मैंने देखा कि यह कृष्ण भावना की शक्ति कितनी है, परिवर्तन करने की। और यहाँ तक कि फिर उनसे मैंने काफी बातचीत की, फिर वो अलग-अलग वरिष्ठ भक्तों से भी मिले। तो अभी उन्होंने फैसला किया है कि वह बाह्य रूप से क्रिश्चियन का कार्य कर सकते हैं, पर वह बोले कि उनकी इच्छा क्या है कि वह क्रिश्चियन का प्रचार करते हुए वो क्रिश्चियन लोगों को वेजिटेरियन (Vegetarian) बनाने का प्रयास करेंगे। कम से कम आप मांसाहार तो छोड़ते हो। अगर वह बाह्य रूप से भक्त दिखा दें खुद को, तो क्या होगा? क्रिश्चियन का प्रचार करेंगे।
श्रवण से बुद्धि का शुद्धिकरण
वैयासकि-शब्दितेन
शुकदेव गोस्वामी, परीक्षित महाराज ने जब शुकदेव गोस्वामी के मुख से शब्द सुने, और उससे क्या हो गया? उनकी बुद्धि अभद्र बुद्धि से भद्र हो गई। भगवान जो हैं, उनका ध्वज है जो पक्षियों के राजा हैं गरुड़, उनका ध्वज हो गया। तो उनके पाद-पद्म को उन्होंने प्राप्त कर लिया। तो ठीक उसी तरह से तो क्या हुआ यहाँ पर? श्रवण से बुद्धि शक्तिशाली बन गई। भक्ति जो है, वो हम सबको भी हो सकती है।
अभी हमारा मन है, हमारे अनेक आसक्तियों में लगा हुआ है। और ये सब आसक्तियों के द्वारा क्या होता है? जितना हम उनका विचार करते हैं, उतना हम विचलित हो जाते हैं। इस दुनिया में बहुत सी चीज़ें हैं, हम उनका विचार करते हैं, ये ऐसा हो गया, वो ऐसा हो गया, सिर्फ हम विचलित हो जाते हैं उससे। अगर भगवान के बारे में विचार करते हैं, तो हम शांत हो जाते हैं, संतुष्ट हो जाते हैं।
तो भगवान के बारे में विचार करने में बड़ी शांति और संतुष्टि है, पर भगवान के बारे में चिंतन करने के लिए भगवान के बारे में आकर्षण जागृत करना है। और भगवान की ऐसी लीलाओं का श्रवण करके, और हमारी भगवान की महिमा को समझ के, हमारी बुद्धि को हम सुदृढ़ बना सकते हैं। और फिर उससे हम भक्ति में लगते हैं।
योगमाया और भगवत्ता की विस्मृति
तो जैसे चैतन्य महाप्रभु भगवान से दूर हों या पास हों, फिर भी वो भगवान के ध्यान में लगे रहते हैं। जैसे भगवान अनवसर के समय में दर्शन नहीं दे रहे हैं, फिर भी उनकी बड़ी तीव्रता से वो आकांक्षा कर रहे हैं कि कब भगवान का दर्शन हो पाएगा।
आनन्दाम्बुधि वर्धनम् प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनम्।
भौतिक जगत में लोग, आत्मा भूल जाता है कि ये कृष्ण भगवान हैं, वो महामाया के कारण होता है। ब्रजवासी भूल जाते हैं, वो योगमाया के कारण है। तो योगमाया यह शब्द क्या है? दो विरुद्ध अर्थों का एक संकलन है। तो उसमें भाव क्या है? यहाँ एक ऑक्सिमोरोन (Oxymoron) जैसे शब्दालंकार है। तो मैंने शब्दालंकार और अर्थालंकार की बात कही। शब्दालंकार मतलब ऐसे श्लोक जिनमें एक ही अक्षर है, दो ही अक्षर से सुंदर श्लोक बन जाता है। अर्थालंकार मतलब ऐसे अजीब प्रकार से अर्थ साथ में आते हैं। योगमाया—योग जो भगवान से जोड़ता है, माया जो भगवान को भुलाती है—जब वे साथ में आते हैं मतलब हम भगवान को इस तरह से भूल जाते हैं जिससे कि उनसे और ज़्यादा जुड़ जाते हैं, वह योगमाया है।
तो जब हम भगवान की भगवत्ता को याद रखते हैं, तो उनको बड़े आदर से हम उनसे आदान-प्रदान करते हैं। पर स्नेह उतना आगे आदान-प्रदान नहीं हो पाएगा। तो जब भगवान की भगवत्ता को भूल जाते हैं, तो जिससे हमें भगवान को डांटने की स्वतंत्रता मिलती है…
लोग विक्षेप दूर करा देते हैं, पर विक्षेप कराने वाली इंद्रियाँ हैं, उनको भी दूर करा देते हैं। तो इससे भगवान जो हैं, जगन्नाथ जी, ये कृष्ण के एक अलग ही रूप हैं, जो ब्रजवासियों के स्मरण में पूरी तरह से लीन हो गए हैं। और यह जो ध्यान पूर्वक करने वाला अनुशीलन है।
तो उसके संबंध में मैंने वो क्रिश्चियन के पादरी की कहानी बताई, जो पहले विग्रहों को देखे उनको घृणा हुई, पर वही विग्रहों की पूजा करने लगे बाद में। कैसे? यह साधना भक्ति के चमत्कारिक परिवर्तन हैं। जिस चीज़ को भी हम ध्यान देते हैं, उसको वह हमारा ध्यान पूरी तरह पकड़ लेता है। तो अगर हम भक्ति की विधि करते समय, अगर हम ध्यान देते हैं भगवान पर, तो फिर हमारा ध्यान भगवान से आकर्षित हो जाएगा, और हमारा जीवन परिवर्तित हो जाएगा।
तो जप करते समय, श्रवण करते समय, अगर मन भगवान में नहीं लग रहा है, तो हमें भगवान की महिमा को समझना है। इसलिए श्रवण करते हैं, हम अध्ययन करते हैं, भगवान की महिमा को समझते हैं। तो फिर उसके द्वारा बुद्धि तीक्ष्ण हो जाती है, फिर बुद्धि के द्वारा हम… हमारी जो अंतरंग चेतना है, वह एक मल्टी-चैनल टीवी (Multi-channel TV) के समान है। तो हमको भले ही जप उतना आकर्षक नहीं लगे, मन में जो भी विचार आ रहे हैं, वो ज़्यादा आकर्षक लगते हैं, पर अगर बुद्धि से समझते हैं कि ये बहुत महत्त्वपूर्ण है, तो हम एकाग्र, दृढ़ संकल्प से एकाग्र हो जाएंगे। और फिर भक्ति यह चमत्कारी परिवर्तन करा देगी। और फिर हम भी भगवान के लिए इतने आसक्त हो जाएंगे, हमारा मन उतना हमें शांति और संतुष्टि प्राप्त करा देगा।
बहुत-बहुत धन्यवाद! श्री जगन्नाथ स्वामी की जय! श्री जगन्नाथ स्नान यात्रा महा-महोत्सव की जय! श्रील प्रभुपाद की जय! गौर भक्त वृन्द की जय! निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!
प्रश्नोत्तर सत्र (Q&A Session)
प्रश्न: वैकुंठ में जो भक्त होते हैं वो जानते हैं कि ये भगवान हैं, विष्णु भगवान हैं, तो फिर क्या? इसका मतलब है कि वैकुंठ में योग-माया का प्रभाव कम है, गोलोक वृन्दावन में ज़्यादा है, या सब कुछ भगवान की इच्छा के अनुसार होता है?
उत्तर: भक्त जिस भाव से भगवान की पूजा करना चाहते हैं, उस भाव में भगवान उनसे आदान-प्रदान करते हैं। तो इसलिए कुछ-कुछ भक्त होते हैं, वो भगवान के ऐश्वर्य भाव को जानकर उनकी पूजा करना चाहते हैं, और उसमें उनको दिव्य आनंद होता है।
अभी प्रभु श्री रामचंद्र के महान भक्त हैं हनुमान जी। वो हनुमान जी की भक्ति कुछ कम नहीं है, उनकी भक्ति महान भक्ति है। पर वे कभी खुद को भगवान के सखा के रूप में नहीं देखते हैं, उनको ऐश्वर्य की जानकारी है। तो भगवान की भक्ति जो है, वो वैरीगेटेड (Variegated) है, उसमें अलग-अलग रस होते हैं। तो वैकुंठ में अलग प्रकार का रस है, गोलोक में अलग प्रकार का रस है। तो इसमें there is objective reality and there is subjective experience of reality. मतलब क्या कि एक तत्त्व के स्तर पर सत्य है, पर अनुभव के स्तर पर एक दूसरा सत्य है।
कैसे है कि मान लीजिए अगर आपके पास पाँच गिलास हैं, एक बड़ा है, उसमें पाँच लीटर पानी है, दूसरा चार लीटर, तीन लीटर, दो लीटर, एक लीटर, पाँच गिलास हैं। अभी पाँचों पानी से भरे हुए हैं। अभी उस गिलास की दृष्टि से सब गिलास भरे हुए हैं, कोई भी गिलास अपूर्ण नहीं है, सब गिलास पूर्ण हैं। पर क्या है, अगर इस गिलास में ज़्यादा पानी है… तो उसी तरह से जो ये अलग-अलग रस हैं भगवान की लीला में, तो माधुर्य रस जो है, वृन्दावन का माधुर्य रस बहुत ऊँचा है। तो एक तरह से वो पाँच लीटर का गिलास है। तो जो शांत रस है, वो एक लीटर का गिलास है।
पर ऐसा नहीं है कि जो शांत रस में हैं, उनको लगता है कि अब मुझमें कुछ अपूर्णता है, “अरे मुझे भगवान आलिंगन नहीं करते, मुझे भगवान ऐसे नहीं करते।” वो पूर्णतया संतुष्ट हैं। यह भगवान की दिव्य शक्ति है कि अलग-अलग भक्त, अलग-अलग परिस्थिति में, अलग-अलग भूमिकाओं में उनकी सेवा कर सकते हैं। पर वो सबको संतुष्ट कर सकते हैं, यह भगवान की दिव्यता है।
इसलिए हमें कभी वैकुंठ को कम नहीं मानना चाहिए। कभी-कभी भक्त ऐसे भाव करते हैं कि “कैसे हम तो गोलोक जा रहे हैं, वैकुंठ तो…”, वह चेतना में अपराध है। तो उसमें भगवान का आनंद अनुभव कर रहे हैं। इसलिए हमें भक्ति… भक्ति एक अपने आप में जीवन की बात है। तत्त्व भी है, पर भक्ति एक अनुभव है और अनुभव में कोई अभाव नहीं है।