Role of determination and association in devotion – Hindi
[Brahmachari class at Belgaum, India]
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Lecture Summary
भक्ति में दृढ़ संकल्प और भक्तों के संग की भूमिका
इस व्याख्यान का मुख्य विषय आध्यात्मिक जीवन (भक्ति) में स्वयं के दृढ़ संकल्प और भक्तों के संग के बीच संतुलन और उनके महत्व को समझाना है।
1. शास्त्रों के उदाहरण:
- संग का महत्व: परीक्षित महाराज ने अपने अंतिम समय में सब कुछ त्याग कर शुकदेव गोस्वामी का संग चुना और सिद्धि प्राप्त की।
- दृढ़ संकल्प का महत्व: ध्रुव महाराज और प्रह्लाद महाराज ने विपरीत परिस्थितियों और अकेलेपन में भी अपने दृढ़ संकल्प के बल पर भक्ति की। पिंगला और अवंती ब्राह्मण जैसे उदाहरण भी बताते हैं कि व्यक्ति को भीतर से अचानक जागृति और संकल्प मिल सकता है।
2. संबंधों के तीन स्तर:
- डिपेंडेंट (Dependent – निर्भर): शुरुआत में भक्त नवजात शिशु की तरह दूसरों पर पूरी तरह निर्भर होते हैं।
- इंडिपेंडेंट (Independent – स्वतंत्र): समय के साथ भक्त को आत्मनिर्भर बनना चाहिए, ताकि यदि दूसरों का साथ न भी मिले, तो भी उसकी भक्ति न रुके।
- इंटरडिपेंडेंट (Interdependent – परस्पर निर्भर): यह सबसे उच्च स्तर है। इसमें भक्त स्वतंत्र होते हुए भी समान विचारधारा वाले भक्तों के साथ जुड़ते हैं, एक-दूसरे का सहयोग करते हैं और बिना किसी स्वार्थ या अपेक्षा के योगदान देते हैं।
3. श्रील प्रभुपाद का आदर्श: श्रील प्रभुपाद ने पाश्चात्य देशों में कृष्ण भावनामृत का प्रचार करने के लिए किसी भौतिक या भावनात्मक समर्थन पर निर्भर हुए बिना, केवल अपने गुरु के आदेश और अटूट दृढ़ संकल्प के बल पर सफलता प्राप्त की।
4. सुविधा (Facility) और स्वतंत्रता (Autonomy):
- जैसे-जैसे भक्त परिपक्व होते हैं, वे अपनी प्रेरणा और अनुभव के अनुसार सेवा करने की स्वतंत्रता (Autonomy) चाहते हैं, जो कि स्वाभाविक है।
- हालांकि, संस्थागत ढांचे में सुविधा और पूर्ण स्वतंत्रता एक साथ मिलना कठिन है। यदि आप अपनी मर्जी से कुछ करना चाहते हैं, तो आपको स्वयं ही सुविधाएं जुटानी पड़ सकती हैं (जैसे तमाल कृष्ण महाराज ने अमेरिका में बस पार्टी शुरू की थी)।
5. दृढ़ संकल्प कैसे बढ़ाएं?
- सकारात्मक दृष्टिकोण: संकल्प कभी भी नकारात्मक (“मैं यह नहीं करूंगा”) नहीं होना चाहिए, बल्कि सकारात्मक (“मैं रोज़ भागवतम् पढ़ूंगा”) होना चाहिए।
- जवाबदेही (Accountability): अपने संकल्प के बारे में किसी अन्य समान विचारधारा वाले भक्त को बताएं ताकि प्रेरणा बनी रहे।
- व्यावहारिक लक्ष्य: छोटे और स्पष्ट लक्ष्य तय करें और भगवान की कृपा पर निर्भर रहें, न कि अपने अहंकार पर।
6. नकारात्मक विचारों (Mental Weather) से निपटना:
- मन की स्थिति मौसम की तरह बदलती रहती है। कभी-कभी अकारण ही नकारात्मक विचार आ जाते हैं।
- ऐसे समय में यह सोचने के बजाय कि “यह विचार क्यों आया?”, उन भक्तिमय कार्यों (जैसे कीर्तन, श्लोक गान या प्रवचन श्रवण) में लग जाना चाहिए जिनमें आपको सबसे अधिक रुचि हो। इससे नकारात्मकता का प्रभाव धीरे-धीरे कम हो जाता है।
निष्कर्ष: भक्ति के मार्ग पर प्रगति के लिए भक्तों का संग हमें प्रेरणा और दिशा देता है, लेकिन अंततः चुनौतियों का सामना करने और लक्ष्य तक पहुँचने के लिए स्वयं का दृढ़ संकल्प ही सबसे बड़ा आधार है। दोनों ही तत्व अपनी-अपनी जगह अनिवार्य हैं।
Full Transcription
भक्ति में दृढ़ संकल्प और दूसरों के संग की भूमिका
हरे कृष्णा। तो मैं एक विषय पर चर्चा करूँगा अभी कि किस तरह से भक्ति में स्वयं का दृढ़ संकल्प और दूसरों का संग, इन दोनों की क्या भूमिका होती है?
शास्त्रों में अगर हम भागवतम् देखते हैं, हम दो प्रकार के भक्तों के बारे में देखते हैं। प्रकार मतलब ऐसे शब्द प्रकार नहीं है, पर अगर हम देखते हैं कि परीक्षित महाराज जब उनको जीवन के अंत का सामना करना होता है, तो वो क्या करते हैं? वो स्वयं भक्त होते हैं, उनके परिवार वाले भक्त होते हैं, वो राज्य भी भक्ति के अनुसार ही चला रहे हैं, पर वो उसको छोड़ के शुकदेव गोस्वामी के संग में जाते हैं, और शुकदेव गोस्वामी के संग में जाकर वो श्रवण करते हैं, और श्रवण करके वो अपने जीवन की सिद्धि प्राप्त करते हैं।
वैसे ही हम देखते हैं कि ध्रुव महाराज, वो जंगल में भगवान की खोज के लिए जाते हैं, और तभी वहाँ पर उनको नारद मुनि का संग मिलता है, और फिर नारद मुनि जब उनको भगवान की पूजा की विधि बताते हैं, तो वह विधि का पालन वो अकेला करते हैं, वो स्वयं करते हैं। प्रह्लाद महाराज को भी नारद मुनि उपदेश देते हैं, पर वह उपदेश जब माँ के गर्भ में थे, उसके बाद में प्रह्लाद महाराज जो सारी भक्ति करते हैं, वह खुद अकेले करते हैं। और सिर्फ अकेले ही नहीं करते हैं, वो क्या करते हैं, बाकी सब असुरों के पुत्र होते हैं उनको भी भक्त बनाते हैं, उन्हें भी भक्ति का प्रचार करते हैं, पर वहाँ पे स्वयं प्रधान रूप से भक्त हैं। बाकी सारा न केवल उनको संग नहीं है, पर बिल्कुल अभक्त भी नहीं, असुरों का संग है वहाँ पे। तो वो जो भक्ति कर रहे हैं, वो खुद के दृढ़ संकल्प से कर रहे हैं।
श्रीमद्भागवतम् और चैतन्य चरितामृत के दृष्टांत
और खास करके हम ग्यारहवें स्कंध में जो उद्धव गीता का संदेश है, उसमें हम देखते हैं, तो तीन-चार कहानी अलग-अलग पद से आती हैं। एक है पिंगला की कहानी, तो उसमें एकाएक उसको साक्षात्कार हो जाता है। ऐसे नहीं है कि वो किसी गुरु के पास जाती हैं, उससे श्रवण करती हैं। ऐसे बताया रहता है कि वो पूर्व में उसको कुछ अज्ञात सुकृति होती है, जिसके लिए उसकी जागृति हो जाती है। और फिर उसके बाद में भी वो क्या करती है, वो भगवान को अपना जीवन समर्पित कर लेती है। कैसे करती है, उसका कुछ वर्णन नहीं है। पर वो साक्षात्कार आता है, वो एक समय पर आता है, और वो एक तरह से अकस्मात आ जाता है। परिस्थिति होती है, पर परिस्थिति सिर्फ एक ट्रिगर (trigger) होती है, वो कारण नहीं होती है। उसके कारण वो आ जाता है।
वैसे ही अवंती ब्राह्मण भी है, उसको भी “मन ही मेरे दुखों का कारण है”, यह जो साक्षात्कार आता है, वो कैसे आता है? वो वास्तव में एकाएक आ जाता है, बड़े दुखों में है वो, लोग बड़ी तरह से परेशान कर रहे हैं, तभी एकाएक उसको जागृति हो जाती है।
हम देखते हैं, वही अगर भागवतम् से आगे जाते हैं, अगर चैतन्य चरितामृत की ओर आते हैं, उसमें चैतन्य महाप्रभु हमेशा भक्तों के संग में रहते हैं। फिर भी चैतन्य महाप्रभु का खुद का दृढ़ संकल्प होता है, जब वह फैसला करते हैं कि मुझे अभी घर छोड़ना है, संन्यास लेना है। वह सब भक्तों को बताते हैं, पर वह उनका दृढ़ संकल्प होता है।
मनस्थिति और परिस्थिति: अपनी उड़ान खुद भरना
तो अभी शास्त्रों में, ऐसे उदाहरण हैं, प्रभुपाद जी की शिक्षाओं में भी हम देखते हैं, तो दोनों चीज़ों के बारे में वर्णन आता है। प्रभुपाद जी कहते हैं कि अगर कोई सोचता है कि भक्तों के संग के बिना मैं भक्ति करूँगा, तो व्यक्ति कर नहीं सकता, लक्षण हो जाते हैं, ये साइन ऑफ इन्सनिटी (sign of insanity) है। भक्तों का संग बहुत ज़रूरी है। पर प्रभुपाद जी साथ-साथ, प्रथम स्कंध में जब युधिष्ठिर महाराज घर त्याग के जाते हैं, तो वहाँ पर लिखते हैं प्रभुपाद जी कि हम सबको अपना जो प्लेन (plane) है, खुद उड़ाना है। जो हमें खुद को फैसला करना है और फैसले को आगे बढ़ाना है।
तो सारी ट्रेनिंग जो है, वो हर एक को अपने-अपने साथ में मिलती है सब फाइटर पायलट (fighter pilot) को, पर जब फाइटिंग होती है, जब युद्ध होता है, तो अगर कोई एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइल (anti-aircraft missile) आती है, शत्रु की गोली आकर लगती है, वो हर एक फाइटर पायलट को अपने-अपने साथ मिलती है, और फिर तभी दूसरे लोग ज़्यादा महत्वपूर्ण नहीं कर सकते हैं। इसका मतलब यह है कि यह दोनों महत्वपूर्ण हैं, कि हमारा खुद का दृढ़ संकल्प महत्वपूर्ण है, और हमारा जो संग है, वह भी महत्वपूर्ण है।
अभी इनमें से अलग-अलग परिस्थितियों में, और अलग-अलग मनस्थितियों में, एक चीज़ दूसरे चीज़ से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है। यह जो आत्मा है, आत्मा एक मन में है, मतलब एक सूक्ष्म शरीर में है और एक स्थूल शरीर में है। तो जो हम सूक्ष्म शरीर में हैं, उसकी जो अवस्था है, उसको मनस्थिति कह सकते हैं, और जो स्थूल शरीर यहां पर है, उसको परिस्थिति कह सकते हैं। तो अभी मनस्थिति और परिस्थिति जो है, इन दोनों के प्रभाव के अनुसार फैसला होता है, वो अलग-अलग बदलती रहती हैं हमेशा।
संबंधों के तीन स्तर: Dependent, Independent, और Interdependent
एक तरह से देखेंगे, तो आत्मा जो है, कई बार इस भौतिक जगत को भवसागर कहा गया है। तो भवसागर जो है, उसमें यह आत्मा तैर रहा है। कभी लहरें अनुकूल होंगी, कभी लहरें प्रतिकूल होंगी, पर अगर किसी को अपने गंतव्य पर जाना है, तो उस व्यक्ति को अपने दृढ़ संकल्प पर सजाना है।
तो संबंधों के लिए कहते हैं, कि तीन प्रकार के संबंध होते हैं। यह भावनात्मक स्तर पे है, आध्यात्मिक स्तर पे नहीं है। कैसे? Dependent people, Independent people, और Interdependent people।
डिपेंडेंट (Dependent) मतलब, जो दूसरों पे बहुत निर्भर है। जैसे हम शारीरिक दृष्टि से देखते हैं, जो छोटा बच्चा होता है, तो वो क्या होता है, वो खुद कुछ नहीं कर सकता है, वो रोता है, रोता है, रोता है। स्वतंत्र होता है एक तरह से, सारी ज़रूरतें पूरी करने के लिए। एक स्तर पर पूर्णतः कोई भी स्वतंत्र नहीं हो सकता है, पर कुछ हद तक स्वतंत्र हो जाता है (Independent)। और फिर बाद में, वही व्यक्ति इंटरडिपेंडेंट (Interdependent) हो सकता है।
इंटरडिपेंडेंट मतलब, कि वह दूसरों से संबंध जोड़ के, “मैं यह करता हूँ, आप यह करो, और हम दोनों साथ में काम करते हैं,” ऐसे हो सकता है। तो कई बार संबंधों में बहुत परेशानियां आती हैं, कि अगर कोई व्यक्ति कभी स्वतंत्र बना ही नहीं है, वह इंडिपेंडेंट बने बिना वह किसी से संबंध जोड़ लेता है, तो फिर वह जो संबंध होता है, उसमें बहुत निर्भर हो जाता है। ऐसे ओवर-डिपेंडेंट (over-dependent) लोग जो होते हैं, कई बार ऐसे लोग जो होते हैं, उनकी सारी जो मन की शांति है, सुख है, खुद का सेल्फ एस्टीम (self-esteem) है कि मैं भी कुछ कर सकता हूँ, खुद की पहचान है, खुद की समझ है, वह सब कुछ दूसरे पर निर्भर कर देते हैं। और वह दूसरा व्यक्ति उनसे नाराज़ हो गया, तो मान लीजिए जैसे कि उनका जीवन ही अंत हो गया है, वह कुछ कर ही नहीं सकते हैं।
तो यह जो भावनात्मक स्तर होते हैं, कि हम सबको संबंध ज़रूरी हैं, किसी न किसी प्रकार के। हम सब, संबंध के बिना हम रह नहीं सकते हैं। पर जो संबंध हमें चाहिए, वह ऐसे संबंध होने चाहिए, कि हमें हमारा जो उद्देश्य है जीवन का, उसमें प्रवृत्त करें, उसमें हमें सपोर्ट करें, उसमें मदद करें, सहयोग करें।
भक्तों के संग में स्वतंत्रता का विकास
तो इसलिए अभी मैंने जो बताया कि, Dependent, Independent और Interdependent, तीन स्तर हैं। तो अगर, हम भक्तों के संग में आये हैं, तो भक्तों के संग में जब आते हैं, तो हमें तभी भक्तों के संग में इंडिपेंडेंट बनना है, डिपेंडेंट नहीं बनना है। इंडिपेंडेंट मतलब, हम एक-दूसरे से प्रेरणा लेते हैं, और एक-दूसरे को प्रेरणा देते हैं, एक-दूसरे के साथ में रहते हैं। अगर हम डिपेंडेंट बन जाते हैं, अगर किसी पे निर्भर हो जाते हैं, तो फिर अगर वो व्यक्ति नहीं है, वो व्यक्ति चला गया है, तो हम कुछ कर ही नहीं पाएंगे।
अभी यह ज़रूर सत्य है कि हमें आध्यात्मिक स्तर पे डिपेंडेंट रहना है, हम भगवान पे निर्भर हैं, हमारे गुरुदेव पे निर्भर हैं, भक्तों की कृपा पे निर्भर हैं। पर वो आध्यात्मिक स्तर पे है। जो भौतिक स्तर पे है, भावनात्मक स्तर पे है, तभी हमें खुद का दृढ़ संकल्प रखना चाहिए।
हम देखते हैं, प्रभुपाद जी के उदाहरण से अगर हम देखेंगे, तो उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य जो था, वो अपने गुरुदेव के आदेश के अनुसार फैसला किया। क्योंकि उन्होंने कहा कि आप पाश्चात्य देश में जाकर प्रचार करो। तो वे पाश्चात्य देश में जाकर प्रचार करने के लिए, उन्होंने अपना जीवन दांव पे लगा दिया। और जब वो ऐसे कर रहे थे, तो किसी ने उनको मदद नहीं की। उनके जो गुरुभाई थे, वहाँ सब अपने-अपने छोटे-छोटे कार्यक्रम थे, प्रचार थे, प्रोजेक्ट्स थे, उसमें ही उनकी सारी चेतना फँस गई थी। तो किसी को ऐसा बड़ा विज़न (vision) नहीं था, बड़ी दृष्टि नहीं थी, कि हमें ऐसे कुछ विश्व भाव प्रचार करना है।
तो प्रभुपाद जी, अगर किसी भी तरह, भौतिक स्तर से, अपने गुरुभाइयों पर, या उनकी संस्था पर निर्भर रहते, तो प्रभुपाद कुछ कर ही नहीं पाते। तो हमेशा वो कहते हैं कि “मेरे गुरुदेव का सान्निध्य मैं हमेशा महसूस करता हूं, क्योंकि मैं उनके आदेश का पालन करने का प्रयास कर रहा हूं।”
इसका मतलब क्या है, कि प्रभुपाद जी को भौतिक स्तर पर कुछ भी, उनके गुरुदेव की संस्था से नहीं मिला। न तो आर्थिक सपोर्ट मिला, न कोई वॉलंटियर्स (volunteers), कोई असिस्टेंट्स (assistants) मिले, कुछ भी नहीं मिला उनको। कुछ सपोर्ट भी नहीं मिला, और भावनात्मक स्तर पर भी उनके गुरुभाइयों ने ज़्यादा एन्करेज (encourage) नहीं किया। हाँ, “आप कर रहे हैं, आप कर रहे हैं, नहीं, आप कैसे कर सकते हो,” ऐसे डायरेक्टली उनको बोला नहीं पर, क्या उनको एन्करेज भी नहीं किया। भाव यह था कि “यह कैसे होने वाला है? यह होने वाला नहीं है। पाश्चात्य देश के लोग कोई भक्त बनने वाले नहीं हैं।”
दृढ़ संकल्प: स्वयं को प्रेरित करना (Self-Motivation)
तो प्रभुपाद जी न तो भावनात्मक स्तर पर, न भौतिक स्तर पर, व्यावहारिक स्तर पर, वे किसी पर निर्भर नहीं थे। वे अपने दृढ़ संकल्प से उन्होंने कृष्ण भावनामृत की स्थापना की।
और अभी जब हम भक्ति में आते हैं, तो ज़रूर हमारी जो प्रेरणा होती है, हम कई भक्तों के संग में आते हैं, हम प्रचार सुनते हैं, हम भक्ति संस्कृति देखते हैं, भक्तिमय जीवन देखते हैं, तो हम सोचते हैं, मुझे भक्ति करनी है अभी। और हम अलग-अलग भक्ति कर सकते हैं, हम सोचते हैं, मुझे मेरा जीवन समर्पण करना है इसके लिए, मुझे भक्ति करनी है वैराग्य के भाव में, तो फिर हम वो स्वीकार कर सकते हैं। तो हमें साधारणतया जो भक्ति में प्रेरणा मिलती है, काफी हद तक भक्तों के संग से प्रेरणा मिलती है। और ये ज़रूरी है, क्योंकि भक्ति ये केवल एक तत्वज्ञान नहीं है, ये एक जीवन शैली है। और जीवन शैली होने के कारण हमें उसको हमारे जीवन में अमल करना है।
तो कैसे है कि जब हम भक्ति में भी आते हैं, तो हम अलग-अलग स्तरों से आते हैं। पहले हम dependent होते हैं। dependent होते हैं मतलब क्या, कि हम ये सवाल का जवाब पूछते हैं, “ये करो, ये कैसे करना है, ये कैसे करना है?” सब कुछ भक्त होते हैं, हमको समझाते हैं और उसके कार्य करते हैं। पर धीरे-धीरे क्या होता है, हमें खुद को स्वतंत्र बनना होता है। स्वतंत्र मतलब क्या, कि हमें दूसरों से प्रोत्साहन मिले या ना मिले, हमें आगे भक्ति करनी है।
एक भक्त बता रहे थे मुझे कि, अगर हम परिपक्व नहीं बनते हैं, तो क्या होता है? हम जब मंदिर में पहले आते हैं, तो हमें पकोड़े खिलाए जाते हैं। हमको पकोड़े खिलाए जाते हैं, और अगर एक पकोड़े के लिए… हमको पकोड़े जैसे फ्राई किये जाते हैं। मतलब क्या होता है, ये एक तरह से स्वाभाविक है। स्वाभाविक मतलब क्या है? जब छोटा बच्चा होता है, तो सब उसकी देखभाल करते हैं। एक बच्चा रो रहा है, तो कोई दूर का रिश्तेदार भी आएगा, “अरे क्या हो गया” देखने के लिए। सब जो नया कोई होता है, तो क्या होता है, वो एक तरह से स्वाभाविक फर्क है। ऐसा कोई गलत नहीं है।
पर जब ऐसा होता है, हमको पकोड़े जैसे फ्राई किया जाता है, मतलब क्या है, हमको क्या लगता है कि कोई मेरी परवाह नहीं कर रहा है। सब मुझसे माँग ही कर रहे हैं, “ये करो, वो करो, वो करो, वो करो।” अब ऐसी परिस्थिति जब आती है, तो तभी जो भक्तों का संग है, उसमें हमें ऐसा लगता है कि मुझे यूज़ (use) किया जा रहा है। “मैं नहीं पकोड़े कर रहा हूँ, कि इनको ये सेवा करनी है, इनको ये सेवा करनी है, इनको ये सेवा करनी है, सब मुझे इस्तेमाल कर रहे हैं।”
अब एक तरह से, अगर हम भगवान की सेवा के लिए इस्तेमाल हो जाते हैं, अच्छी बात है, हमारा शुद्धीकरण हो रहा है, भगवान की सेवा हो रही है, हम आगे बढ़ रहे हैं। तो वो अंतिम दृष्टि से अच्छा ही है। बेहतर है कि हम भगवान की सेवा के लिए इस्तेमाल हो जाएं, बजाय कि कोई हम कंपनी जाके काम करेंगे, तो हमको यूज़ ही करने वाले हैं। पर फिर भी क्या है, हमें भावनात्मक स्तर पे थोड़ा सपोर्ट तो ज़रूर चाहिए। अगर हमको सिर्फ लगेगा कि “ये लोग सिर्फ यूज़ कर रहे हैं,” तो फिर हमारी प्रेरणा नहीं रहेगी।
तो इसलिए अभी जैसे छोटा बच्चा होता है, तो उसको बार-बार बोलते हैं, “पढ़ाई करो, पढ़ाई करो, पढ़ाई करो।” पर अगर कोई विद्यार्थी अभी कॉलेज में गया है, अभी कोई डिग्री, मास्टर्स डिग्री, या पीएचडी कर रहा है, तो उसको अपने माता-पिता बार-बार फोन करके बोलेंगे, “पढ़ाई कर रहे हो कि नहीं, पढ़ाई कर रहे हो कि नहीं?” तब तक उसकी खुद की बुद्धि हो जानी चाहिए कि “अभी मैं ये पढ़ाई कर रहा हूँ, ये डिग्री मुझे प्राप्त करनी है, मुझे पढ़ाई करनी है।” बीच-बीच में कुछ प्रेरणा मिलेगी, माता-पिता बताएंगे, फिर वो प्रेरणा ले सकता है उससे। पर उसको करना चाहिए, उसको दृढ़ संकल्प रखना चाहिए।
तो वैसे ही क्या है कि हमें हमारी भक्ति में, जैसे हम आगे बढ़ते हैं, हमें सेल्फ मोटिवेट (self-motivate) होना चाहिए।
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥
ये स्वयं चैतन्य महाप्रभु के साथ थे, पर क्या हुआ माया ने उसको पकड़ लिया। तो प्रभुपाद जी लिखते हैं, चलो माया से अगर आप नहीं पृथक होते हैं, तो रस्सी पकड़नी है। वो बोलेगा रस्सी पकड़ के आप चढ़ के ऊपर आ जाओगे। “मैं चढ़ के नहीं आ सकता।” “ठीक है, तुम पकड़ के रखो मैं खींच लेता हूँ।” और मैं बोलता हूँ, “मैं पकड़ भी नहीं सकता।” तो फिर वो बोलेंगे, “नहीं नहीं, आप भी ये बाहर खींचो।” तो बाहर कैसे खींचें? “ठीक है, मैं तुमको ये रस्सी की ऐसे गाँठ बाँध के देता हूँ, तुम अपनी कमर को बाँध लो इससे, मैं तुमको खींच लेता हूँ।” और कमर को बाँध लेता है। “नहीं नहीं, मेरी कमर को बहुत दर्द हो रहा है इससे।” “अरे फिर क्या करना है? नहीं नहीं सहन करना पड़ेगा दर्द।” ठीक है, फिर वो व्यक्ति क्या करता है, वो रस्सी ऊपर लेता है, रस्सी में एक बकेट (bucket) बाँध देता है और बकेट नीचे भेजता है। “तो इस बकेट में बैठो, मैं खींच लेता हूँ।” और फिर बकेट में बैठा है, तो वो बकेट ऊपर जा रहा है। बकेट थोड़ा टेढ़ा-मेढ़ा होता है तभी व्यक्ति गिर जाता है। तो वापस ऊपर कैसे आएगा वो? तो कम से कम वो बकेट को संभालने में, उसमें अपना खुद का बैलेंस रखना है।
तो हमारे सहयोग के बिना भगवान भी हमारी मदद नहीं कर सकते हैं। भगवान बहुत हद तक हमारी मदद कर सकते हैं, पर अंत में हमें कुछ न कुछ अगर हमारी तरफ से करना होता है, तो इसलिए हमारा दृढ़ संकल्प बहुत ज़रूरी है। इसलिए अगर हमारा दृढ़ संकल्प नहीं होगा, तो फिर हम प्रगति नहीं कर सकते हैं।
परिस्थिति के पार: दृढ़ संकल्प को बनाए रखना
और फिर जो भी परिस्थिति आ जाती है। अभी दृढ़ संकल्प का मैं जैसे पहले बताया कि determination means to keep our intention over our emotion. तो उसको दूसरी दृष्टि से बोल सकते हैं कि दृढ़ संकल्प का मतलब क्या है? कि जो जैसे मैंने बताया कि हमारी परिस्थिति होती है, तो यह परिस्थिति और मनस्थिति के दोनों के परे हमारा दृढ़ संकल्प होता है। तो परिस्थिति प्रतिकूल भी क्यों न हो, मनस्थिति प्रतिकूल भी क्यों न हो, फिर भी अगर हमारा दृढ़ संकल्प अच्छा रहेगा तो हम आगे बढ़ेंगे।
अभी यह जो दृढ़ संकल्प है, उसको यह ऐसी चीज़ नहीं है कि एक बार आ गया, हमेशा तक रहेगा। वो कभी-कभी हमारा दृढ़ संकल्प बढ़ता है, कभी कम होता है। तो इसको हमेशा उसका हमारा पोषण करना ज़रूरी है। जैसे शरीर की शक्ति होती है, वो आती है जाती है, तो हम अच्छी तरह से पोषण करते रहेंगे, अच्छी तरह से खाना खाते रहेंगे, अच्छी तरह से सेहत की देखभाल करेंगे, तो शक्ति रहती है हमारे पास। अच्छी तरह से हमें शक्ति साथ में रखनी है। हमारे दृढ़ संकल्प को संभाल के रखना, उसको अच्छा बनाये रखना, यह हमारी ज़िम्मेदारी है।
और अभी दूसरी बात है यह भक्तों के संग की। हमारे भक्तों का जो संग है, वह हमें अनेक पद्धतियों से मदद करता है। एक है कि हमें वह भक्तों का दृढ़ संकल्प देखते हैं, उससे हमें दृढ़ संकल्प मिलता है। भक्तों का उत्साह देखते हैं, उससे हमें उत्साह मिलता है। भक्तों के समूह में कभी हमारा जो मन होता है करने का, भक्तों का जो संग है उसका प्रभाव, हमें भक्ति में दो प्रकार से हो सकता है। मतलब, दो प्रकार से उसकी मदद हो सकती है: एक है सकारात्मक पद्धति से, दूसरा है नकारात्मक पद्धति से।
सकारात्मक पद्धति से मतलब क्या, कि “ये भक्त इतनी अच्छी तरह से भक्ति कर रहे हैं, कि ये इतनी अच्छी तरह से जप कर रहे हैं, ये इतनी अच्छी तरह से सेवा कर रहे हैं, मुझे भी करनी चाहिए।” वो एक सकारात्मक पद्धति से प्रेरणा मिलती है।
दूसरा है, कि अगर हम भक्तों के संग में हैं, और अगर हमें लगता है, “मुझे करना ही नहीं है, मुझे कुछ करना ही नहीं है,” तो हम सोचें, “पर मैं ये ऐसे करूँगा, या ऐसे नहीं करूँगा, तो भक्त क्या सोचेंगे ये भक्त?” तो वो सोच के हम सही कार्य करने लगते हैं। हमको लगता है कि “मुझे जप करना ही नहीं है।” पर कभी-कभी क्या होता है कि जो भी पद्धति से हमको प्रेरणा मिल जाए, वो अच्छा है।
तो ये क्या है कि association of devotees uses our ego in our devotional service. भक्तों का संग जो है क्या है, वो हमारे अहंकार को भी भक्ति की सेवा में लगाता है। कैसे? हमको लगता है कि भक्तों के संग में, लोग मुझे समझना चाहिए कि मैं अच्छा भक्त हूँ। तो लोग मुझे अच्छा भक्त हैं ये समझें, इसलिए मैं भक्ति करूँगा। अब ये उचित उद्देश्य नहीं है, पर क्या है, कभी-कभी ऐसे हमारे मन का विचार, मन इतना विचित्र होता है, कभी-कभी वो कुछ करने की इच्छा ही नहीं करता है। तो कुछ भी प्रेरणा मिल जाये, किसी भी तरह से हमको, खुद को धक्का मार सके, हमेशा वो अच्छा नहीं है, पर कभी-कभी वह कारण है: “मुझे भक्तों को लगना चाहिए कि मैं भी एक serious भक्त हूँ, इसलिए मैं ये ज़रूर करूँगा।” तो फिर उससे क्या होता है, उससे भी मैं आगे बढ़ता हूँ। सकारात्मक जो है अच्छा है, नकारात्मक जो है इतना अच्छा नहीं है, पर किसी भी तरह से आगे बढ़ सकते हैं।
भक्तों का संग: सहनशीलता और सहयोग
मैं एक बार, एक जगह में लेक्चर दे रहा था, कैसे भक्तों के संग में कैसे रहना है, उसके बारे में चर्चा चल रही थी। तो मैंने भक्तों के संग में कहा, “हम जब भक्ति कर रहे होते हैं, तो हमें बहुत सी चीज़ें सहन करनी पड़ती हैं, बहुत सी चीज़ें टॉलरेट (tolerate) करनी पड़ती हैं। तो क्या-क्या टॉलरेट करना पड़ता है?” तुरंत एक भक्त ने हाथ उठा लिया, “क्या टॉलरेट करना पड़ता है? भक्तों को टॉलरेट करना पड़ता है!” तो हमें बहुत सी चीज़ें सहन करनी पड़ती हैं, तो हम सबको सहन करना पड़ता है।
पर क्या है, उससे ऊपर भक्तों के संग में, जब हम रहते हैं, तो हमें भक्तों के संग में, साथ में सेवा करने का जो मौका मिलता है, वह उससे भी एक हमारी भावनात्मक, या emotional या relational, संबंधों की भावनाओं की जो ज़रूरत है, वह पूरी होती है हमारी। इसलिए संबंध हमें बहुत ज़रूरी हैं।
और उसके साथ-साथ क्या है, कि जो संबंध हैं, वह केवल किसी बाह्य चीज़ पर आधारित नहीं होते हैं। जो भक्तों की विचारधारा एक समान होती है, जो भक्त साथ-साथ कार्य करते हैं, जो विचार एक समान करते हैं, ऐसे भक्त अगर मिल जाते हैं, एक भी भक्त हमारी जर्नी में मिल जाएगा, तो हम काफी प्रगति कर सकते हैं भक्ति में। काफी हमें शक्ति मिल सकती है प्रगति करने के लिए।
अभी भक्तों के समाज में, ऐसे अलग-अलग भक्त होते हैं, और हर एक भक्त के जीवन में क्या गुज़र रहा है, हमको पता नहीं है। जब अमेरिका में था, अमेरिका में तीन-चार बार, प्रभुपाद जी के शिष्य थे। प्रभुपाद जी पृथ्वी पर थे, तो हज़ारों-हज़ारों की संख्या में लोग भक्त बन गए, कई हज़ार लोग प्रभुपाद जी के शिष्य बने। पर उससे भी और हज़ारों की संख्या में devotees थे…
Interdependent होने का अर्थ
भक्ति में इंटरडिपेंडेंट (interdependent) होने का मतलब क्या है? हम एक-दूसरे से जुड़ते हैं और उसमें प्रगति करते हैं। हाँ, इंटर-डिपेंडेंट का तीन मतलब होते हैं।
एक है कि हम नहीं सोचते हैं कि मैं अकेला भक्ति कर सकता हूं। हम ज़रूर संबंध जोड़ना चाहते हैं। और हम देखते हैं कि किस प्रकार के भक्तों से मेरा संबंध स्वाभाविक रूप से बढ़ता है। तो लाइक-माइंडेड (like-minded) भक्तों के संग को हम खोजते हैं और उससे संबंध जोड़ते हैं।
और दूसरा है इंटर-डिपेंडेंट का मतलब क्या होता है कि उसमें इंडिपेंडेंस आ गया है। अगर वो नहीं मिलता है मुझे उस प्रकार का संग, तो भी मैं चल सकता हूँ। मतलब कैसे है कि अगर ये पहली मंज़िल है, दूसरी मंज़िल, तीसरी मंज़िल है। तो पहली मंज़िल dependence है, दूसरी मंज़िल independence है, तीसरी मंज़िल interdependence है। तो जब हम तीसरी मंज़िल पर हैं, तो अपने आप दूसरी मंज़िल पर हैं, उससे ऊपर ही हैं। तो मतलब जो इंटर-डिपेंडेंट होते हैं, उनमें इंडिपेंडेंस अपने आप होता है।
एक एक्सपेक्टेशन (expectation) होता है और एक कॉन्ट्रिब्यूशन (contribution) होता है। मतलब हम दूसरे से कुछ उम्मीद करते हैं, और हम दूसरे को कुछ करते हैं, उनकी सेवा करते हैं, उनकी मदद करते हैं। तो इंटर-डिपेंडेंस कभी-कभी ऐसे हो सकता है कि एक रिश्ते में हमें उससे कुछ मिले ही नहीं पर हमें एक बहुत योगदान करना होता है। क्योंकि वो भक्त कुछ मुश्किल में जा रहे होंगे। तो तभी हमें लग रहा है कि मेरी ज़रूरत है, मेरी ज़रूरत कुछ पूर्ति करनी है, मैं इनकी ज़रूरत की पूर्ति कर रहा हूं। पर तभी क्या है, फिर भी हम सस्टेन कर सकते हैं। तो मतलब कभी-कभी योगदान हमें ज़्यादा करना पड़ता है, बजाय हमारी ज़रूरतें कम पूरी होती हैं, फिर भी हम आगे बढ़ सकते हैं।
अच्छा “अब कोई समस्या और कोई चीज़ नहीं चाहिए मुझे, भगवान के सिवा कुछ नहीं चाहिए,” एक इस भावना से हम आते हैं। और फिर…
(मुझे वो शुकदेव कहेंगे कि दूर चला जाऊँ। और कुछ इंडिया में नहीं करूँ। तो ये इस विचार का भावना कैसे आती है?)
पहले जो… जब हम भक्ति में पहले आते हैं तो सारी दुनिया की कुछ नहीं चाहिए। मुझे सिर्फ भगवान चाहिए। उस भाव से आते हैं। और कुछ साल भक्ति करने के बाद लगता है कि मुझे ये भी चाहिए। ये सुविधा चाहिए। ये स्वतंत्रता चाहिए। ये करना है।
भक्ति में Autonomy (स्वतंत्रता) और परिपक्वता
अभी ये एक तरह से स्वाभाविक है। क्योंकि क्या होता है कि जब हम पहले भक्ति में आते हैं, तो कई चीज़ें उसमें होती हैं कि हम एक तरह से दुनिया के खिलाफ बगावत कर रहे हैं। सबको दुनिया का छोड़ के मैं आ रहा हूं। तो तभी वो एक उत्साह रहता है। और ये एक तरह से स्वाभाविक है कि जैसे हम कुछ साल आगे बढ़ते हैं, हमें एक अनुभव आ गया है भक्ति का, हम खुद परिपक्व हो गये हैं। तो हम सब में एक ऑटोनॉमी (autonomy) के लिए चाहत होती है।
ऑटोनॉमी मतलब कि हिंदी में क्या बोलेंगे? स्वतंत्रता या खुद कार्य करने के लिए कुछ सुविधा होना, खुद की प्रेरणा के अनुसार, खुद के अनुभव के अनुसार कुछ करना। वो जो ऑटोनॉमी कहते हैं उसको, वो ज़रूरी है।
इसलिए बताते हैं कि अगर कोई व्यक्ति सेना में रहा है, और सेना में ऐसे बड़े पद पर नहीं, सोल्जर पद पर, उसको हमेशा आदेश देते हैं, “यह करो, यह करो, यह करो, यह करो, यह करो।” या फिर कोई जेल में रहा है कैदी, उसको हमेशा “यह करो, यह करो, यह करो, यह करो, यह मत करो।” तो ऐसे लोग जो होते हैं, अगर वो सेना से डिस्चार्ज भी हो जाते हैं, या कैद से बाहर भी निकल जाते हैं, उनको पता ही नहीं क्या करना है, क्योंकि क्या हो गया है, हमेशा उनको आदेश पालन करने की आदत हो गयी है। और अभी आदेश देने वाला भी कोई नहीं है।
तो ऐसे हमें डिसिप्लिन (discipline) ज़रूरी है, बेशक डिसिप्लिन ज़रूरी है। पर प्रभुपाद जी हमको ये भी बोले कि, हमें आदेश पालन करना है, पर हमें खुद भी विचार करना है। खुद की विचारधारा के अनुसार, हमें भक्ति का जो निष्कर्ष है, कैसे सत्य है, भक्ति कैसे करनी है, उसको हमारे दृढ़ संकल्प, हमारे साक्षात्कार के अनुसार, हमारी प्रेरणा के अनुसार भी हमें आगे आना चाहिए। तो जी जो ऑटोनॉमी, खुद की प्रेरणा के अनुसार, खुद के लिए जो ज़रूरी है स्पेस, वह एक स्वाभाविक मानवीय ज़रूरत है।
अभी उसकी पूर्ति कैसे की जाये, यहां हर एक भक्त के लिए, अपनी-अपनी परिस्थिति के अनुसार देखना पड़ेगा। क्या सेवा कर रहे हैं, कैसे प्रोजेक्ट में हैं। यह जीवन का एक मोड़ है, हम उसमें से जाते हैं ज़रूर।
इसलिए स्कूल में अगर होंगे, तो पहले कोई टीचर आता है, तो टीचर को बोलेंगे, “आप यह पढ़ाओ, यह किताब लो, यह पढ़ाओ।” पर वही अगर टीचर 10-20 साल तक टीचिंग कर रहा है, उसके बाद में टीचर को खुद का अनुभव आ गया है, तो वो पढ़ाई कैसे कराना है, विद्यार्थियों को कैसे समझाना है, उसके थोड़ा सा उसको भी वो अपने प्लान बनाता है, अपनी योजनाएं होती हैं और उसके लिए पढ़ाता है। तो हर फील्ड में ऐसे होता है। जो ज़्यादा अनुभव वाले हो गए होते हैं, उनको थोड़ा अपना और इंडिपेंडेंस दिया जाता है।
सुविधा (Facility) और स्वतंत्रता (Independence) में संतुलन
तो वैसे ही क्या है कि जो भक्त कुछ समय तक, कुछ सालों तक भगवान की सेवा कर रहे हैं, अगर ऐसा लगता है कि कुछ और सुविधा चाहिए, या कुछ और हमें करना है, हमारी प्रेरणा के अनुसार, तो वो गलत नहीं है। पर वो किस तरह से करना है, उसके बारे में थोड़ा विचार करना चाहिए।
क्या होता है कि साधारणतया हम जब किसी भक्ति में, हम संस्था में कुछ कार्य करते हैं, तो दो चीज़ें हैं: एक है सुविधा, और दूसरी है स्वतंत्रता। तो हमें दोनों कभी साथ में नहीं मिलेंगी। अगर स्वतंत्रता मतलब मुझे मेरी प्रेरणा के अनुसार कुछ कार्य करना है, मुझे यहां पे ऐसा प्रचार करना है, ऐसे मंदिर बनाना है, ऐसे यह करना है, ऐसे वो करना है—स्वतंत्रता हो गई। तो अगर मुझे स्वतंत्रता चाहिए, तो मैं सुविधा की अपेक्षा नहीं कर सकता।
क्योंकि क्या है कि जो भी संस्था के जो नेता हैं, उनका विज़न होता है, उनकी प्रेरणा होती है, उनकी दृष्टि होती है। उसके अनुसार कार्य जो है, उसके अनुसार उनको जो सुविधाएं मिली हैं, उसका उपयोग उस तरह से करेंगे। तो वो स्वाभाविक है, जो भी नेता हैं, जो भी वरिष्ठ भक्त हैं, उनकी जो प्रेरणा है उसके अनुसार वो प्रचार कैसे बढ़ाना है, वो देखेंगे।
तो अभी हमें साधारणतया कैसे है, ये तीन एक्स्ट्रीम्स (extremes) हो सकते हैं। एक है कि हम हमारी स्वतंत्रता को छोड़ दें, और जो भी वरिष्ठ भक्त बोलते हैं, वो ही करें। तो अगर ऐसा करते हैं हम, तो उससे क्या होगा, उनके पास जो भी सुविधा है, वो सारी सुविधा हमें मिल जाएगी, और हम काफी सुविधा के साथ भक्ति कर सकते हैं।
दूसरा एक्स्ट्रीम यह है कि हमें खुद प्रेरणा है, “मुझे ऐसे ही करना है,” तो हमें भी उसके लिए वरिष्ठ भक्तों का मार्गदर्शन, ब्लेसिंग्स उनका लेना है, आशीर्वाद लेना है। पर फिर मुझे अगर ऐसे कुछ करना है, तो फिर वो स्वतंत्रता अगर चाहिए, तो मुझे सुविधा की कुछ अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। मुझे खुद सब कुछ करना पड़ेगा।
तो भी कैसे है कि प्रभुपाद जी जब भारत में थे, तो तमाल कृष्ण महाराज, वो बॉम्बे प्रोजेक्ट के इंचार्ज थे। पर बाद में वो बोले कि “नहीं, मैं अमेरिका जाना चाहता हूँ।” तो वो चले गए अमेरिका। पर क्या था, अमेरिका में उनको कुछ सेवा नहीं थी। यहाँ पे तो वो एक बड़े प्रोजेक्ट के लीडर थे, वो टेंपल प्रेसिडेंट जैसे थे वहाँ पे। जो भी बोलना है, तो बहुत से भक्तों के साथ थे। और उनको जो भी करना था, अमेरिका में गए, वो अलग-अलग मंदिरों में गए, ठीक है, वो ऐसे एक विजिटिंग प्रीचर के समान आ गए। पर उनको जैसे, क्या बोलते हैं, कंट्रोल या कुछ उनको मदद करने के लिए भक्त थे ही नहीं वहाँ पे।
तो फिर अमेरिका में, उन्होंने देखा, “करूँ क्या मैं? प्रचार करना है, पर कुछ कैसे प्रचार?” तो फिर उन्होंने क्या किया, तभी राधा दामोदर बस पार्टी चालू की। राधा दामोदर बस पार्टी चालू की, मतलब क्या है, खुद उन्होंने भक्तों को प्रचार किया, खुद उन्होंने बुक्स डिस्ट्रीब्यूट करके धनसंपत्ति लाए कुछ, बस खरीदी, और पार्टी चालू कर दी। और बड़ा प्रचार किया उससे।
और एक बार प्रभुपाद जी अमेरिका आए, तो प्रभुपाद जी फिर उनको बोले कि “अभी आपका अमेरिका अनुभव हो गया, अभी आप भारत आ जाओ मेरे साथ।” तो प्रभुपाद जी यहाँ बहुत प्रचार कर रहे हैं, प्रचार मतलब फल दिखना चाहिए। तो प्रभुपाद जी से मिलने आ गए, वो सब एक गुलाब का फूल लेकर प्रभुपाद जी आ कर प्रभुपाद जी को सबको प्रणाम किया। एक के बाद, एक के बाद। प्रभुपाद जी बहुत प्रसन्न रहे, “बहुत बढ़िया, वेरी गुड, कंटिन्यू प्रीचिंग।” “बहुत अच्छा, आप यहीं पर प्रचार कर रहे हैं।”
तो क्या है, प्रभुपाद जी को भारत में ज़रूरत थी भक्तों की, पर प्रभुपाद जी का क्या भाव था कि भक्त सुखी होने चाहिए, सुखी रहने चाहिए। और ऐसे नहीं कि समय बर्बाद करना चाहिए, कुछ प्रोडक्टिव कुछ कार्य कर रहे हैं, तो अच्छी बात है।
सकारात्मक दृढ़ संकल्प कैसे लाएं?
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥
भगवान कहते हैं कि, आप अगर साधना भक्ति करते हैं, उससे मेरी इच्छा, मुझे प्राप्त करने की इच्छा आपको और बढ़ जाएगी। तो एक तरह से, भगवान के संपर्क में रहने से ही भक्ति की इच्छा बढ़ जाती है, दृढ़ संकल्प आ जाता है उससे।
पर दूसरा है कि हम कुछ कर सकते हैं जिससे कि वो दृढ़ संकल्प बढ़ा सकें। सबसे पहली चीज़ है कि दृढ़ संकल्प कभी भी नकारात्मक दृढ़ संकल्प नहीं करना है। “मैं आज के बाद ये कभी नहीं करूँगा। मैं आज के बाद कभी स्वीट्स नहीं खाऊंगा। मैं आज के बाद ये नहीं करूँगा।” क्या है, वो नहीं करने का जो determination होता है वो ज़्यादा रहता नहीं है। “मैं ये नहीं करूँगा। मैं ये नहीं करूँगा। मैं ये नहीं करूँगा।” तो उससे क्या होता है, उससे हमको थोड़ा deprivation लगता है। “अरे ये नहीं करूँगा मतलब इससे जो मुझे सुख मिल रहा था, इससे जो कुछ मिल रहा था वो ज़्यादा नहीं मिल रहा है।” तो उससे हम वो कर नहीं सकते हैं।
उससे बेहतर है कि “मैं ये करूँगा। मैं आज से भागवतम् रोज़ पढ़ूँगा। मैं आज से भगवद्गीता का एक श्लोक याद करूँगा। मैं ये करूँगा।” तो उससे क्या है, ऐसे अगर सकारात्मक determination करते हैं तो फिर वो और प्रेरणादायक होता है। यह एक चीज़ है।
दूसरी चीज़ यह है कि किसी और को अगर हम बोलते हैं, किसी और को हम बताते हैं—नहीं दुनिया को घोषणा करने की ज़रूरत नहीं है, पर किसी और भक्त को बताते हैं कि “मैं ये करने वाला हूं।” और फिर वो भक्त को बोलते हैं कि “मैं रोज़ 10 पेज पढ़ूंगा।” तो हमको थोड़ा पता भी होता है कि कोई पूछने वाला है। तो क्यों करते हैं? उससे थोड़ा हमको प्रेरणा मिल जाती है कुछ करने की। तो किसी और को बताना एक तरह से, generally बताना, पर जो हमारे accountability partner बन सकते हैं, वो उससे काफ़ी मदद होती है।
तीसरी चीज़ यह है, कि जब हम दृढ़ संकल्प करते हैं, तो हमें वो जो एक प्रायोगिक रूप पर, जो दृढ़ संकल्प हम कर रहे हैं, उससे क्या फायदा होने वाला है, वो हमें उसपे चिंतन करना है और उसका अनुभव करना है। मान लीजिए अगर मैं फैसला करता हूँ, मैं श्लोक याद करने वाला हूँ, तो फिर हमें कुछ न कुछ ऐसे फोरम, ऐसी जगह होनी चाहिए, जहाँ पर जो श्लोक याद किये हैं, उसको इस्तेमाल कर सकें।
तो फिर क्या होता है, कुछ दृढ़ संकल्प करना है, उसमें कुछ हमें शक्ति डालनी पड़ती है। और हमें क्या, वो करने से कुछ फायदा हो रहा है, अगर हमें लगता है, तो फिर वो करने की और प्रेरणा मिलती है। तो जो भी हम कर रहे हैं, उसको दृढ़ संकल्प करना चाहिए, कुछ tangibly हमको दिखना चाहिए, यह हो रहा है उससे।
और कुछ यह व्यावहारिक नहीं भी होगा, तो हम खुद अपने फोन में, या हमारे लॉकर में, एक कुछ मार्कर (marker) बना सकते हैं, कि “यह ठीक है, यह इतना होगा, इतना टारगेट होगा, इतना टारगेट होगा, इतना टारगेट होगा, यह इतना करना था, यह इतना हो गया।” उससे क्या होगा, हम कुछ ऐसे, एक स्थूल रूप पर कुछ ऐड (add) होता है, तो फिर क्या होता है, उससे प्रेरणा मिलती है हमको।
और अपने आप course of determination, यह भगवान की कृपा ही होती है। तो उसके लिए हमें भगवान से प्रार्थना करना बहुत ज़रूरी है। तो क्या होता है, कभी-कभी determination में हम यशस्वी हो जाएंगे, पर उससे शायद हमारी भक्ति में वृद्धि नहीं होगी, उससे हमारे अहंकार में वृद्धि हो जाएगी कि “देखो मेरा दृढ़ संकल्प कितना अच्छा है कि मैं यह कर सकता हूँ।” तो determination में हमारी भक्ति में वृद्धि नहीं होगी, नहीं हमारी अहंकार में वृद्धि होगी कि “मैंने यह करके दिखाया दुनिया को।”
तो इसलिए हम भाव रखते हैं, भगवान से प्रार्थना करके, उन पर निर्भर होके, हम करते हैं, तो फिर ज़रूर, भले ही जो हमने उद्देश्य रखा है, उसकी पूर्ति भी नहीं कर पाएँ। बहुत प्रार्थना करते हैं, जो हम दृढ़ संकल्प करते हैं कि ठीक है, “मुझे भागवतम् पढ़ना है”, और उसका हम उद्देश्य रख सकते हैं कि “ठीक है, मुझे यहां तक पहुँचना है।” पर उससे महत्वपूर्ण है, कि भागवतम् पढ़ने में मुझे रुचि लानी है।
तो जब हमारा दृढ़ संकल्प, हम किसी एक गंतव्य से जोड़ देते हैं, एक तरह से उससे प्रेरणा मिलती है हमको कि “हाँ मुझे यह करना है, मुझे एक महीने में एक स्कंध पूरा करना है।” प्रेरणा मिलती है उससे। पर अगर नहीं हुआ, तो हताश हो जाते हैं। तो देखना क्या है, कि “मुझे एक महीने में एक स्कंध पढ़ना है, और उसका उद्देश्य क्या है? मुझे भागवतम् पढ़ने की आदत डालनी है, भागवतम् पढ़ने में रुचि प्राप्त करनी है।” तो वो उद्देश्य रखता है। अगर यह नहीं भी हो पाया, तो भी मेरा direction है, यह एक पर्टिकुलर स्कंध नहीं मिला, पढ़ना चालू करते हैं। आधा स्कंध हुआ इस महीने में, क्योंकि बहुत सेवा आ गई थी, या तबियत खराब हो गई थी, यह हो गया था, तो खुद को पीटने की ज़रूरत नहीं है। उस दिशा में चलने तो लगा हुआ हूँ। करते हैं, करते हैं, करते हैं, आधा स्कंध… बादल, बारिश… आधा स्कंध, आधा स्कंध…
मन का वातावरण और नकारात्मक विचारों से निपटना
जैसे बाहर वातावरण होता है, वैसे एक अंदरूनी वातावरण भी होता है। हमारी भावनाओं का भी वातावरण होता है। तो अभी वातावरण क्यों बदलता है? उसका एक विज्ञान हो सकता है, पर हमें उसका पता करने की ज़रूरत नहीं है। वातावरण बदल गया, बदल गया है। हम समझते हैं कि जो खराब वातावरण है, वो हमेशा के लिए नहीं रहने वाला है। वो आएगा, वो जाएगा। तो उसका एक तरह से, उसको एक वातावरण के रूप में हम देख सकते हैं। हमारी भावनाओं का भी एक वातावरण है। वो आता है, जाता है। हमें क्या करना है, ऐसे जब आता है, तो उसका ज़्यादा, “उसमें क्यों आया” ये सोचने की बजाय, “आगे में, अभी, how can I tolerate it and move on,” वो देखना है।
तो जैसे मैंने पहले बताया था कि, जो चीज़ें हमें अच्छी लगती हैं भक्ति में, और जो भक्ति के कार्य, वो चीज़ अगर हम करने लगते हैं, तो वो जो नकारात्मक भावनाओं के पार जा सकते हैं। मुझे कीर्तन अच्छा लगता है, मुझे श्लोक गान अच्छा लगता है, मुझे किसी भक्त के प्रवचन सुनना बहुत अच्छा लगता है। तो उस समय वो कार्य करने लग जाओ। और वो भी करने की इच्छा नहीं होगी कभी, पर वो कार्य अगर करने लग जाते हैं, तो फिर वो धीरे-धीरे उसमें रुचि लगने लगती है। दूसरा कुछ कार्य करेंगे तो बहुत मुश्किल लगे वो उस समय। पर यह क्योंकि हमको वैसे भी अच्छा लगता है, तो वो करना थोड़ा आसान होता है। पर वो करने लगते हैं, तो फिर धीरे-धीरे वो शक्ति वापस आने लगती है। मन का पूरा पागलपन है वो कम होने लगता है।
यह एक प्रश्न है, वो क्यों आता है, कैसे आता है, वो उसको बोल नहीं सकते हैं। अमेरिका में एक साइकोलॉजिस्ट थे, उनसे बात कर रहा था। वो कहते हैं कि कई ऐसी स्त्रियां होती हैं, माँ होती हैं, उनके मन में ऐसे विचार आता है, कि उनका छोटा बच्चा होता है, शिशु, कि “I want to hurt my baby,” कि “उसको चिमटी मारो, उसको थप्पड़ मारो, उसको दर्द दिलाऊं।” माँ तो अपने बच्चे से प्रेम करती है, कौन सी माँ अपने बच्चे को दर्द देने की इच्छा करेगी? तो अभी उसके कारण क्या होता है, माओं को बहुत गिल्ट (guilt) फील होता है, बहुत आत्मग्लानि होने लगती है, और उससे फिर उनको और प्रॉब्लम आने लगते हैं। तो अभी कोई बोलेगा “नहीं, विचार आना ही नहीं चाहिए मुझे।” पर नहीं, वो आ जाता है।
क्या है कि हमारे मन में, आज कल जो वातावरण है खास करके, इसमें रजोगुण, तमोगुण बहुत है। तमोगुण मतलब क्या, कुछ भी नहीं करना, या तमोगुण में हिंसात्मक कुछ करना, destructive कुछ करना। तो कुछ तमोगुण के प्रभाव के कारण, कुछ भी आ जाता है मन में। तो वो क्यों आया है, उसका विचार करने की ज़रूरत नहीं है। विचार आता है, तो हमें सिर्फ उसको नेविगेट (navigate) करना है उससे, उसके पार जाना है।
So don’t take it very seriously. अगर उसको, अगर आप कुछ कोरिलेशन (correlation) निकाल सकते हैं, “ऐसा होने के बाद ऐसा होता है मेरे साथ,” तो फिर उसको ढूँढ सकते हैं। शायद ऐसे होता है कि, किसी भक्त से हमें कुछ अपेक्षा होती है, वो भक्त उसके बिल्कुल विपरीत कर देते हैं, तो उससे हम हताश हो जाते हैं। या फिर हमने कुछ सेवा में बहुत मेहनत की है, और उसमें कुछ फल नहीं मिलता है, तो हम हताश हो जाते हैं। तो बाद में हम ढूँढ सकते हैं, कि विचार की शुरुआत कैसे हुई।
पर उस समय कुछ सोचने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि उस समय सोचने की क्षमता ही नहीं है। उस समय कार्य करते रहो, ऐसे कार्य करो जिसमें हमको थोड़ी रुचि है, उससे फिर विपरीत शक्ति कम हो जाएगी, और आगे बढ़ पाएंगे हम।
बहुत-बहुत धन्यवाद, श्रील प्रभुपाद की जय, गौर भक्त वृंद की जय, निताई गौर प्रेमानंदे।