Parikshit M – Dharma discussion – Don’t blame 2 – If why has no answer focus on how – Hindi
[Class at ISKCON, Belgaum, India]
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Lecture Summary
प्रवचन का सारांश: दोष देने की प्रवृत्ति से मुक्ति और ‘क्यों’ से ‘क्या’ की ओर
यह प्रवचन जीवन में आने वाली विषम परिस्थितियों, दूसरों की गलतियों और उनके प्रति हमारे दृष्टिकोण पर गहराई से चर्चा करता है। मुख्य रूप से यह इस बात पर केंद्रित है कि हम कैसे दोष देने (Blaming) की आदत को छोड़कर समाधान और कर्तव्य की ओर बढ़ सकते हैं।
प्रवचन के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- माफ़ करना और विश्वास करना दो अलग बातें हैं (Forgiving vs. Trusting): परीक्षित महाराज ने कलि को क्षमा तो कर दिया, लेकिन उस पर अंधा विश्वास नहीं किया, बल्कि उसके रहने की जगह सीमित कर दी। माफ़ करना भूतकाल (Past) के लिए होता है ताकि हम पुरानी कड़वाहट से आगे बढ़ सकें। लेकिन विश्वास (Trust) भविष्य के लिए होता है, जिसे व्यक्ति को अपने सही कार्यों से अर्जित करना पड़ता है।
- परिस्थितियों को दोष देने का नुकसान: जब कोई प्राकृतिक आपदा (जैसे तूफान) आती है, तो हम उसे चुपचाप स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन जब कोई व्यक्ति हमारे साथ गलत करता है, तो हम उसे नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं और न कर पाने पर उसे दोष देने लगते हैं। किसी व्यक्ति या परिस्थिति को दोष देने का सीधा अर्थ है—अपनी खुद को सुधारने और आगे बढ़ने की शक्ति को खो देना।
- ‘क्यों’ के बजाय ‘क्या’ पर ध्यान केंद्रित करें (Not ‘Why’, but ‘What/How’): जब हमारे साथ कुछ बुरा होता है, तो हम अक्सर पूछते हैं—”यह मेरे साथ क्यों हो रहा है? इसने ऐसा क्यों किया?” इस ‘क्यों’ का कोई स्पष्ट जवाब नहीं होता और यह हमें मानसिक अंधकार और हताशा की ओर ले जाता है। इसके बजाय हमें खुद से पूछना चाहिए—“अब मैं क्या कर सकता हूँ?” यह सवाल एक इलेक्ट्रॉनिक रेगुलेटर की तरह है, जो धीरे-धीरे हमारे दिमाग में समाधान की रौशनी लाता है और हमें हमारे कर्तव्य की ओर मोड़ता है।
- रामायण का उदाहरण (नियति और कर्तव्य): जब कैकेयी ने श्रीराम को वनवास दिया, तो लक्ष्मण ने क्रोध में कैकेयी और दशरथ को दोष दिया। लेकिन श्रीराम ने इसे किसी का षड्यंत्र न मानकर ‘नियति’ (Destiny) माना। उन्होंने परिस्थिति पर विलाप करने के बजाय अपने ‘कर्तव्य’ (पिता की आज्ञा का पालन) पर ध्यान केंद्रित किया।
- श्रील प्रभुपाद का प्रेरणादायक उदाहरण: श्रील प्रभुपाद ने भारत में 30-40 साल तक कृष्ण भावनामृत का प्रचार करने का प्रयास किया, लेकिन लोगों ने रुचि नहीं ली। उन्होंने परिस्थितियों या लोगों को दोष देकर ‘क्यों’ नहीं पूछा। इसके बजाय, उन्होंने सोचा कि “मैं और क्या कर सकता हूँ?” और वे अमेरिका चले गए। वहाँ मिली सफलता ने अंततः भारतीयों को भी प्रभावित किया।
- नियति का सही अर्थ और हमारी ज़िम्मेदारी: अक्सर लोग अपनी गलतियों या अकर्मण्यता को ‘नियति’ का नाम देकर खुद को सही ठहराने की कोशिश करते हैं (जैसे परीक्षा के लिए न पढ़ना और फेल होने पर उसे नियति मान लेना)। सही दृष्टिकोण यह है: जब तक कोई चीज़ हमारे हाथ में है, तब तक हमें पूरी ज़िम्मेदारी से अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। लेकिन जब परिणाम आ जाए और वह हमारे नियंत्रण से बाहर हो, तब उसे नियति मानकर स्वीकार करना चाहिए और भविष्य की ओर (अब मैं क्या करूँ?) कदम बढ़ाना चाहिए।
- शास्त्रों के पात्रों से सही सीख: शास्त्रों के पात्रों (जैसे कैकेयी या महाभारत में धृतराष्ट्र) को जज करने (Judge) या उनकी निंदा करने के बजाय, हमें उनके जीवन से अपने लिए नैतिक (Moral) और आध्यात्मिक (Spiritual) शिक्षाएँ ग्रहण करनी चाहिए।
Full Transcription
दोष देने की प्रवृत्ति और सज़ा के प्रकार
हरे कृष्णा। आज हमने जो परीक्षित महाराज और कलि की लीला है, उसके बारे में आगे चर्चा करेंगे। कल हम इस विषय पर चर्चा कर रहे थे कि कैसे हम दोष देने की प्रवृत्ति से आगे बढ़ सकते हैं। जो भी चीज होती है, कोई बुरी चीज हमारे लिए होती है, उसके अलग-अलग स्तर पर कारण होते हैं। एक पास का कारण होता है, एक दूर का कारण होता है, एक अंतिम कारण होता है। जो पास का कारण है कि ‘इस व्यक्ति ने ऐसे किया, ये ऐसे हो गया, इसके आने से समस्या आई’, तो वो भी एक कारण है, पर वह अकेला कारण नहीं है।
कभी-कभी हम छोटी गलती करते हैं, उसके व्यक्ति बड़े हैं, उससे बहुत तांडव होने लगता है। कभी हम बड़ी गलती करते हैं। कोई बड़ा नेता अगर हो गया, उनको गिरफ्तार करते हैं, तो उनको house arrest में रखते हैं। तो सुविधा होती है अच्छी तरह से, पर फिर भी वो गिरफ्तार होते हैं। जगह निर्धारित करना या सीमित करना किसी के लिए, वो एक प्रकार की सजा है।
वैसे एक और प्रकार की सजा होती है कि, किसी की साधारण जगह है, उससे उसको निष्कासित कर देते हैं। जैसे किसी को वनवास में भेजते हैं, राज्य से बाहर भेजते हैं, एक्जाइल (exile) कर देते हैं। तो महाभारत में यह मत रह गया है कि किसी को वनवास में भेजना, ये किसी को जीवन की सजा देने से, मतलब उसको मारने की सजा से एक स्तर नीचे है। किसी गुनहगार को जेल में डाल सकते हैं, जेल में डालना वो बुरी सजा है, उससे बुरी सजा है उसको किसी वनवास में देना, और सबसे बुरी सजा यह है कि उसको मार डालना। तो एक्जाइल कर देते हैं, किसी को वनवास में देने से मतलब क्या है? कि उसके पास जो भी सब कुछ था, वो सब उससे छीन लिया। उसके घर है, उसकी संपत्ति है, उसके परिवार वाले हैं, उसके रिश्तेदार हैं, उसके आजू-बाजू जान-पहचान वाले हैं, सब कुछ निकाल दिया उसका।
कलि को क्षमा और वनवास का अर्थ
तो प्राचीन समय में कैसा था? कि राज्य हुआ करते थे और कई बड़े-बड़े जंगल हुआ करते थे, और जंगल भी राज्य में होते थे, पर वो राज्य में directly नहीं होते थे, तो लोगों को वनवास भेजा करते थे। अभी सारी भूमि जो है किसी न किसी राष्ट्र में है, तो किसी को वनवास में भेजना बड़ा मुश्किल है। तो अभी एक्जाइल नहीं करते किसी गुनहगार को, डिपोर्ट (deport) करते हैं कभी-कभी। डिपोर्ट मतलब क्या? कि अगर कोई भारतीय नागरिक या कोई पाकिस्तानी नागरिक कहीं और बसा है। सब लोग स्पैनिश बोलते हैं क्योंकि क्या हो गया? स्पेन से लोग आये थे और स्पेन से लोग जो जिये वहाँ पे वो अभी नहीं हैं, पूरा साउथ अमेरिका उनका नहीं है। तो साउथ अमेरिका में पहले जो लोग हुआ करते थे वो अभी हैं ही नहीं, जो 500-600 साल पहले जो लोग थे और पूरे खत्म ही हो गये। तो अत्याचार मानव लोग के इतिहास में हर जगह पे हुआ है और वो इसलिए हुआ है क्योंकि मानव में ही शोषण करने की प्रवृत्ति होती है। कि उन पर कुछ नियंत्रण था, कुछ सीमित जगह, यहां पे जाओ, यहां पे मत जाओ। मार-काट कर करोड़ों की मात्रा में अभी तक कोई जीवित है।
तो सारे कहने का उद्देश्य क्या है कि अलग-अलग तरह से किसी को नियंत्रित करना यही एक प्रकार की सजा मानी जाती है। तो उसी तरह से अभी कलि बड़ा अत्याचार कर रहा था तो इसीलिए परीक्षित महाराज ने सोचा कि तुम माफ़ी माँग रहा है तो माफ कर दूँगा तुमको, सब कुछ भूल जाओ क्या है।
Forgive and Forget: माफ़ करना और विश्वास करना
कभी-कभी we may forgive but we can’t forget. क्या है कभी-कभी माफ कर सकते हैं पर अगर भूल जाते हैं ये सब कुछ… किसी व्यक्ति ने हम पर आक्रमण किया है, हमपे हमें घायल किया है शारीरिक पद्धति से या मानसिक पद्धति से हमको, तो फिर हम उसको शायद माफ कर सकते हैं पर पुनः अगर उसने जो किया है भूल जाएंगे, तो शायद पुनः वहाँ पर वही कर जाए। हमने किसी को पैसा उधार दिया है और उसने पैसा वापस नहीं किया तो अभी हम झगड़ा नहीं करने जाते हैं, छोड़ दो भाई। पर दूसरी बार उसको पैसा नहीं देंगे हम। आपके पीछे पड़के आपको सुनाने वाले नहीं हैं। तो क्या है मेरा forgiveness पर, माफ़ करने पर पूरा seminar तीन पार्ट्स का… तो forgiving is not forgetting.
कभी-कभी हम कहते हैं forgive and forget तो उसका कहने का मतलब क्या है कि ठीक है जो हुआ भूतकाल में उसको भूल जाओ और आगे चलो। forget it मतलब ऐसे नहीं कि delete कर दो आपके दिमाग से। forget it मतलब क्या कि ठीक है उसके बारे में विचार करते हैं मतलब आगे बढ़ो अपने जीवन में। तो forgiving is also not trusting. माफ करना और किसी पर विश्वास करना, ये दो अलग चीज़ें हैं। माफ करना यह भूत के लिए है, विश्वास करना यह भविष्य के लिए है। forgiveness can be given but trust has to be earned. किसी ने गलती की है हम उसको माफ कर सकते हैं पर अगर उस पर विश्वास करना है वापस तो उनको विश्वास अर्जित करना पड़ेगा, जीतना पड़ेगा उनको। विश्वासात्मक कार्य करके विश्वास जीतना पड़ेगा।
कभी-कभी हमें माफ करना बड़ा मुश्किल लगता है क्योंकि हम माफ करना और विश्वास करना एक समान मान लेते हैं और हमको लगता है कि मैं इसको माफ करूँगा और विश्वास करूँगा तो ये वापस मेरे साथ विश्वासघात कर सकता है। नहीं! हम दोनों को अलग रख सकते हैं कि माफ करना, उनको भूत में हो गया है, उसको मैं बार-बार लेके बार-बार तुमको पीटने वाला नहीं हूँ। हो गया हो गया, पर इसका मतलब नहीं है कि मैं वही परिस्थिति में आ जाऊँ जहाँ से आप पुनः मुझे कुछ परेशान कर सकते हैं। नहीं, मैं विश्वास नहीं करने वाला हूँ।
कलि को स्थान देना: बीमारी और प्रतिकार शक्ति
तो यहाँ पे परीक्षित महाराज ने क्या किया है? माफ तो कर दिया पर कलि पर विश्वास नहीं किया। ऐसे नहीं है कि माफ कर दिया, कलि परिवर्तित हो गया, कलि अपना कलि का प्रभाव नहीं करने वाला। ऐसे नहीं है, कलि का प्रभाव ही है। तो उन्होंने उसे शरण दे दी पर उन्होंने कहा कि अब कुछ सीमित जगहों पर रह।
अभ्यर्थितस्तदा तस्मै स्थानानि कलये ददौ। (Srimad Bhagavatam 1.17.38)
कैसे कर दिया उन्होंने? यहाँ याचना की कलि ने उनसे। चार जगह दी:
द्यूतं पानं स्त्रियः सूना यत्राधर्मश्चतुर्विधः।
कि जहाँ पे मांसाहार होता है, जहाँ पे अवैध स्त्री-संग होता है, जहाँ पे नशापान होता है, और जहाँ पे जुआ खेला जाता है, तो तुम इन चार जगहों पर रह सकते हो। तभी कलि ने कहा ये तो ऐसा है कि कोई जगह दी ही नहीं आपने क्योंकि ऐसी जगहें हैं ही नहीं आपके राज्य में। उन्होंने कहा कि ठीक है एक पाँचवी जगह मैं आपको देता हूँ जहाँ पे धन का बहुत अधिक संचय हो जाता है। जहाँ पे लोभ के कारण खास करके सोना या धन का संचय होता है वहाँ पे ये सब चीज़ें आ जाएंगी तो आप वहाँ पे भी रह सकते हो और फिर कलि वहाँ पे रहने लगा।
तो अभी कैसे है, कलि को वहाँ पे रहने क्यों दिया? कलि वहाँ से समस्या कर सकता है। तो ये जो कलियुग है, कलि का प्रभाव जरूर होने वाला है। जैसे अभी मैं अगले महीने पंद्रह-बीस दिनों में ऑस्ट्रेलिया जा रहा हूँ। तो ऑस्ट्रेलिया का जो वीज़ा का फॉर्म भरते हैं तभी वह पूछते हैं कि आपको कभी ट्यूबरक्लोसिस (Tuberculosis) हुआ है क्या? तो वह पूछते हैं क्योंकि ट्यूबरक्लोसिस पाश्चात्य देशों में पूरा निकल गया है, उन्होंने बंद कर दिया है उसको, एलिमिनेट (eliminate) कर दिया है। भारत में अभी ट्यूबरक्लोसिस है तो आप वहाँ ट्यूबरक्लोसिस मत लाओ। इसलिए आपको ट्यूबरक्लोसिस होगा तो आप पूरा प्रॉपर टेस्टिंग करो फिर आओ।
तो अभी क्या होता है ऐसे जो ट्यूबरक्लोसिस बीमारी है, टीबी, अभी उसके जंतु सब में होते हैं। जिसको टीबी है नहीं उसमें भी टीबी के जंतु होते हैं, सब में होते हैं टीबी के जंतु थोड़े-थोड़े मात्रा में। पर जिन लोगों की इम्यून (immune) शक्ति, शरीर के प्रतिकार करने की शक्ति जो होती है वो अच्छी होती है, साधारण सर्दी भी अगर होती है तो वो जंतु उसको परिणाम नहीं करते हैं। निकाल देना लगभग नामुमकिन है, जंतु तो थोड़े-थोड़े रह ही गए।
तो अभी उनका प्रतिकार कैसे करते हैं? उनका प्रतिकार उनको पूरा निकाल देने से नहीं करते हैं। उनका प्रतिकार ऐसे कर सकते हैं जिससे कि व्यक्ति अपना सेहत अच्छा बनाए, अपनी प्रतिकार करने की शक्ति और अच्छी बनाए। तो उसी तरह से कलि का प्रभाव जो है वहाँ कलियुग में होगा ही, उसको पूरे तरह से निकाल नहीं सकते। जैसे जंतु तो बीमारी के जंतु रहते ही हैं पर अगर लोग अपनी सेहत का ख्याल रखते हैं और खास करके किसी जगह पे जंतु और बढ़ जाते हैं तो फिर वहाँ पे दवाई देते हैं, आप वैक्सीन देते हैं कि आप यह दवाई ले लो इससे आपकी प्रतिकार शक्ति बढ़ जाएगी। तो फिर उसी दवाई से क्या है कि कलियुग में कलि का प्रभाव रहेगा।
परिस्थिति को दोष देने के नुकसान
पर परीक्षित महाराज स्वयं जो एक बहुत धर्मनिष्ठ सतर्क राजा थे। तो जब तक परीक्षित महाराज राजा थे तब तक ऐसा है कि मान लीजिए जंतु हैं, पर शरीर की प्रतिकार करने की शक्ति बहुत अच्छी है। तो कलि है, कलि का प्रभाव जो है जंतु के समान है। अगर समाज को हम शरीर के समान मानते हैं तो कलि का प्रभाव मतलब शरीर में जंतु के समान है। परीक्षित महाराज का राज जो है, वह क्या है? वह शरीर की प्रतिकार शक्ति के समान है। तो परीक्षित महाराज ने कलि को जगह तो दे दी पर उसको किसी पर हानि करने का, किसी को नुकसान करने का, किसी को गुमराह करने का कोई क्षमता नहीं दी। उसको प्रतिकार करने के लिए बड़े सतर्क थे परीक्षित महाराज। तो अभी परीक्षित महाराज ने देखा कि कलि पर मैं विश्वास नहीं कर सकता। कलि माफ़ तो कर रहा है, कलि माफ़ी माँग रहा है, शरणागति बता रहा है, तो उसका स्वभाव ऐसे ही रहा है पर उसको नियंत्रित किया।
फिर उस तरह से अभी हमारे जीवन में भी कई बार ऐसी परिस्थितियां होती हैं जो हम बदल नहीं सकते हैं। चाहे कोई ऐसे व्यक्ति हो सकता है जो हमें बहुत परेशान करता है, चाहे हमारा शरीर है, हमें बहुत परेशान करता है, वातावरण में कुछ है वो परेशान करता है। तो क्या होता है हम कभी-कभी हमारी परिस्थिति है, परिस्थिति को दोष देने में बहुत निपुण बन जाते हैं। या परिस्थिति में कुछ लोग होते हैं, अब जो किस प्रकार के परेशान करने वाले लोग होंगे, परेशान करने वाली परिस्थिति होगी, वह सब के जीवन में हैं। अगर हम हमारी परिस्थिति को दोष देते हैं या किसी व्यक्ति को दोष देते हैं उससे एक ही परिणाम होता है। उससे परिणाम यही होता है कि हम हमारी खुद को परिवर्तित करने की, खुद को सुधारने की शक्ति को खो बैठते हैं। दोष देना मतलब खुद की शक्ति को गंवा देना।
तीन प्रकार के क्लेश और हमारा नियंत्रण
क्यों ऐसा है? क्योंकि जगत में दूसरे क्या करते हैं, उस पे हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। दूसरे क्या करते हैं, समाज कैसा है, समाज में आर्थिक परिस्थिति कैसी है, इस पे कोई नियंत्रण नहीं है। मैं अमेरिका में क्रॉस कंट्री (cross-country) जा रहा था कार में, लंबा 800-600-700 मील कार का टूर था, तो मैं देखा कि जब रिसेशन (recession) आ गया था, अमेरिका में, कैनेडा में था, रिसेशन आ गया था। तो ऐसे हो गया कि लोगों ने एक जगह पर… वहाँ पर ऑइल (oil) का बहुत बिज़नेस चल रहा था। क्योंकि क्या हो गया, वो उनका घर खुद का नहीं था, मोर्टगेज (mortgage) लिया था उन्होंने, कर्ज़ा लिया था, अभी कर्ज़ा पे (pay) नहीं करें, तो घर छोड़ दिया उन्होंने। तो क्या है, ऐसे समाज की परिस्थिति, अभी कोई भी नियंत्रण नहीं कर सकता है, एक-दो व्यक्ति कैसे करें। अगर अभी वहाँ पर कैनेडा में ऑइल बहुत होता है, तो ऑइल की कीमत गिर गई, तो क्या कोई कर सकता है? कोई कुछ भी नहीं कर सकता है। तो हम ऐसे जगत में हैं, कि कई चीज़ें ऐसे बदल सकती हैं, हम उसके बारे में कुछ नहीं कर सकते हैं। तो जब ऐसी परिस्थिति आ जाती हैं, तो उसको दोष देते रहेंगे, तो हम कुछ भी नहीं कर पाएंगे। पर अगर हम देखेंगे, ठीक है भई यह हो गया है।
तो अभी हमारे जीवन में तीन प्रकार के क्लेश होते हैं। कुछ जो क्लेश हैं वो आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक। आधिभौतिक मतलब दूसरे लोगों से आते हैं, आधिदैविक मतलब नैसर्गिक परिस्थिति से आते हैं। तब इन तीनों में यह होते हैं, पहला और तीसरा अगर क्लेश आ जाता है, तो हम समझते हैं इसके बारे में कुछ नहीं कर सकते। अगर शरीर बीमार पड़ गया है, मान लीजिए फ्रैक्चर हो गया, तो मैं चल ही नहीं सकता, कुछ नहीं कर सकता, कितना भी प्रयास करो, बल लगाओ, मैं नहीं चल पाऊंगा। और तभी हम स्वीकार कर लेते हैं, कि अभी मैं चल नहीं पाऊंगा, मैं ठीक होने के लिए…
अभी अचानक वो कार में एक जोर से अलर्ट आ गया, जो डिवोटी (devotee) ड्राइव कर रहे थे मैं, फोन पे हरिकेन (hurricane) अलर्ट हो गया, कि हरिकेन में तूफान आने वाला है, और आप सब यहां पर रुक जाओ। और सैकड़ों कार हम देख रहे थे, सब रस्ते पर खड़े थे, और पूरा दूसरे साइड पर चला गया रस्ते पर। तूफान की हवा आगे जा रही थी, और सब हम कार के अंदर बैठे थे देख रहे थे, और चार मिनटों के लिए तूफान था। तो भई कुछ भी नहीं कर पाए, और चार मिनट खत्म हो गये, सब कार वाले बैठे… तो अभी जब निसर्ग की शक्ति आती है, तो हम कुछ नहीं कर सकते हैं, हम स्वीकार कर लेते हैं, हमें कुछ शक्ति नहीं है।
पर यह दूसरा जो है, जब दूसरे लोगों से कुछ परेशानी आती हैं हमको तो हम यह सोचते नहीं हैं। हम सोचते हैं कि मैं इसका नियंत्रण कर पाऊंगा और जब हम नियंत्रण नहीं कर पाते हैं ‘यह एक ऐसे क्यों कर रहा है, उसको नहीं करना चाहिए ऐसे’ उसको समझाते हैं, दूसरों को बताते हैं, हम कोसते हैं, डांटते हैं। कुछ भी नहीं होता है, उसका सोचना वैसे के वैसे ही रहता है और फिर उससे हम बहुत परेशान होते हैं। तो क्या हो रहा है, जैसे हमें हमारे पूर्व कर्मों से अलग-अलग प्रकार के क्लेश आते हैं। जैसे शरीर खराब हो गया, वातावरण खराब हो गया, तो कुछ नहीं कर सकते हैं। तो कैसे, कभी-कभी कुछ सम्बन्ध भी ऐसे होते हैं, उसमें कुछ समस्या आ जाती है। तो जब तक हम उस परिस्थिति को, उस व्यक्ति को दोष देते रहते हैं हम कुछ ही नहीं कर सकते हैं।
दुर्घटनाओं और भूतकाल से आगे बढ़ना
तो अभी क्या करना है, अभी व्यक्ति समस्या, अभी जैसे तूफान आ रहा है, तो अभी वो तो स्वीकार करना पड़ा है तूफान आ रहा है ठीक है, तो भई रुक जाओ, तूफान चला जाएगा, फिर आगे बढ़ो। तो इसलिए जब तक हम दोष देने की प्रवृत्ति रखते हैं हमारे मन में… अभी दोष देना यह एक तरह से स्वाभाविक है कि यह भावनाएं होती हैं हमारे मन में ‘तुम्हारे कारण ऐसे हो गया, तुमने ऐसे किया, उसके कारण ऐसे हो गया’। एक तरह से व्यावहारिक स्तर पे हम थोड़ा विश्लेषण कर सकते हैं ‘यह ऐसे किया हुआ, इसने ऐसे गलती किया, इसके कारण ऐसे हो गया’ ठीक है। पर आगे बढ़ना, उसके पर विश्लेषण नहीं करना। ऐसे नहीं है, हमको जीवन में अंधे हो के चलना नहीं है।
अगर किसी ने कोई गलती की है, हम मानते हैं कि किसी ने गलती की है और फिर उस पर विश्वास नहीं करते हैं। मान लीजिए कोई हमें ड्राइव कर रहा है और ड्राइव करते-करते वो बड़े गैर-ज़िम्मेदार से ड्राइव करता है, एक्सीडेंट (accident) होता है। तो हम अस्पताल में होते हैं, हमें कुछ समय के लिए कुछ कर नहीं पाते हैं। तो अब उस व्यक्ति के कारण एक्सीडेंट हुआ है, वो सत्य है। पर अभी क्या, अभी एक्सीडेंट हो गया, अब जो भी करना है, ठीक करो तो ठीक कर जाओ और आगे चौकन्ने रहो कि वापस व्यक्ति को ड्राइव मत करने दो या व्यक्ति को कम-से-कम उसका प्रशिक्षण देना चाहिए और ज़िम्मेदार बनाना चाहिए। हम कुछ प्रिकॉशन (precaution), सावधानी ले सकते हैं पर उसी भूतकाल में हम रहेंगे तो हम कुछ भी कर नहीं पाते हैं।
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥
भगवान बताते हैं भगवद्गीता में कि “यया स्वप्नं भयं शोकं” कि ये सारे नकारात्मक जो भाव हैं यह तमोगुण के लक्षण हैं। कि अरे इसने ऐसे किया, ये बहुत गुस्सा आ रहा है, घृणा आ रही है, नफरत आ रही है… ये सब विचार बनाए रखना ये तमोगुण का लक्षण है। हमें समझना है कि मेरा जीवन, ये मेरी ज़िम्मेदारी है। मेरे जीवन में आगे कैसे बढ़ना है, यह मुझे देखना है।
दोष देने की बजाय खुद पर ध्यान केंद्रित करना
अगर ये व्यक्ति समस्या कर रहा है, ठीक है, वो समस्या है। फिर उसको दोष देके मैं खुद को हमेशा दुखी बनाने का कुछ फायदा नहीं है। वो सवाल जो है, व्यक्ति समस्या कर रहा है कि ये ऐसे क्यों कर रहा है? अभी लोगों के मन में क्या चल रहा होता है, ये पता करना बड़ा मुश्किल होता है। हम थोड़ा प्रयास कर सकते हैं, समझने का प्रयास करते हैं, अच्छा ये ऐसे क्यों कार्य कर रहे हैं?
जब हम किसी के संबंध में होते हैं, तो फिर हमको एक-दूसरे को समझने का प्रयास ज़रूर करना चाहिए। पर कभी-कभी लोग ऐसा कार्य करते हैं कि वो समझना नामुमकिन ही हो जाता है।
रामायण का प्रसंग: श्रीराम, लक्ष्मण और कैकेयी
तो जब रामायण में वर्णन आता है कि कैकेयी जब राम को वनवास में भेज देती है, तो सारा जो राज्य है, वहाँ सन्नाटा सा आ जाता है कि क्या कर रहे हैं, कैसे क्यों कर रहे हैं? तो तभी लक्ष्मण जो होते हैं, लक्ष्मण कहते हैं कि ये कैकेयी अपने बड़ा षड्यंत्र कर रही है। और क्योंकि क्या होता है, तभी दशरथ जब युद्ध के लिए गए होते हैं (आपको पूरी कहानी पता है), दशरथ जब युद्ध के लिए गए होते हैं तो कैकेयी उनके साथ गई होती है। दशरथ जब युद्ध के लिए गए होते हैं तो कैकेयी उनका जीवन बचा लेती है। तो कैकेयी जीवन बचा लेती है, तो दशरथ उनको वर देते हैं कि “तुम दो वर मांगो मुझसे, मैं तुमको भविष्य में दूँगा।”
अब ये जो वर देने की बात होती थी, वो केवल दशरथ और कैकेयी में हुई थी। तो जब लक्ष्मण को ये पता चलता है, लक्ष्मण बड़े क्रोधित हो जाते हैं। कहते हैं कि “ये जो दशरथ महाराज हैं,” वो उनको अपने पिताजी बोलते नहीं, “वो राजा हैं, वो काम वासना से पागल हो गए हैं। इसलिए तुम्हारी कोई गलती हुए बिना ही तुमको ऐसे जंगल में भेज रहे हैं।”
राम कहते हैं, “नहीं, नहीं। मैंने देखा कि हमारे पिताजी कितने दुखी थे। वो मुझे जंगल में भेजने के लिए दुखी हैं। वो उनकी इच्छा से नहीं भेज रहे हैं, वो विवश होके भेज रहे हैं, क्योंकि उन्होंने कैकेयी को ऐसे वर दिए थे।”
तो लक्ष्मण कहते हैं कि, “किसको पता है ये वर दिए थे? आज तक मैंने कभी सुना नहीं ऐसे वर के बारे में।” तो राम बोलते हैं कि, “नहीं, हाँ, हमारा जन्म होने के पहले ऐसी घटना हुई थी, तभी यह वर दिए थे।”
तो तभी पहले तो उनका क्रोध जो होता है दशरथ की ओर होता है। अभी क्रोध तो मन में है, किसी की ओर तो क्रोध करना है, तो वो दशरथ से कैकेयी के ऊपर हो जाता है। “कैकेयी कितनी स्वार्थी बन गई है कि उसके पुत्र को राजा बनाने के लिए तुमसे राज्य छीन रही है, और तुमको वनवास में भेज रही है।”
तो पुरुषोत्तम रामचंद्र बोलते हैं कि, “वास्तव में तुम्हें भी याद है कि कैकेयी का प्रेम मेरे प्रति उतना ही था जितना मेरी माता कौशल्या का है।” तो उनका प्रेम जो था, जैसे गंगा का निर्मल प्रवाह होता है वैसा कैकेयी का प्रेम था। “तो ये अचानक जो हो गया, वो ही मुझे समझ में नहीं आ रहा है। एक रात में गंगा सूख कैसे गई?”
तो फिर तभी पुरुषोत्तम श्रीराम जो थे, कहते हैं कि, “इसलिए जब कैकेयी के मुख से मैंने वचन सुने तो मैं समझ रहा हूँ कि कैकेयी नहीं बोल रही है, ये नियति का कार्य है, ये दैव का काम है।”
नियति और कर्तव्य का बोध: ‘क्यों’ नहीं, बल्कि ‘क्या’
तो तभी लक्ष्मण मानते नहीं थे। लक्ष्मण कहते हैं कि, “कायर ही होते हैं जो अन्याय को नियति मान के स्वीकार कर लेते हैं। जो वीर होते हैं, वो अन्याय का प्रतिकार करते हैं। हे राम, तुम कायर मत बनो, तुम वीर बनो, अन्याय का प्रतिकार करो।”
तो तभी पुरुषोत्तम रामचंद्र कहते हैं कि, “मैं ये राजा क्यों बनने वाला था? मैं मेरे पिता का सेवक हूँ। पिता की सेवा के भाव में, पिता की सेवा के लिए मैं राजा बनने वाला था। अभी वही पिता की इच्छा अगर यह है कि मैं जंगल में जाऊं, तो वही मेरा कर्तव्य है। मेरे कर्तव्य के रूप में मैं राजा बनने के लिए तैयार था, अभी कर्तव्य के लिए मैं राज्य छोड़कर जंगल में जाऊंगा।”
तो यहां पे क्या है कि जब हम किसी व्यक्ति के बर्ताव को समझ नहीं पाते, ‘व्यक्ति ऐसा था और अचानक ऐसे क्यों हो गया’, हम कुछ समझाने का प्रयास करते हैं, समझने का प्रयास करते हैं। जब नहीं समझ रहा है, तो फिर हम कहते हैं ये दैव का खेल है, ये नियति का खेल है।
और नियति का खेल है, इसका मतलब यह नहीं है कि सब कुछ मैं वैसे के वैसे स्वीकार करता हूँ। नियति का खेल है मतलब ‘अभी मैं मेरा कर्तव्य कैसे कर सकता हूँ? मेरा कर्तव्य कैसे करना है मुझे?’ उस पे अगर मैं ज़ोर देता हूँ। ‘यह ऐसे क्यों हुआ, ऐसे क्यों हुआ, ऐसे क्यों हुआ’, वो सोचते बैठेंगे तो वो ‘क्यों’ का जवाब है ही नहीं हमारे पास। और वो सवाल के जवाब में हम खुद को शक्तिहीन बना लेते हैं। और फिर क्या है, वो ‘क्यों’ का जवाब मिलता नहीं है तो हम व्यक्ति को दोष देते हैं। ‘व्यक्ति इतना क्रूर है, इतना स्वार्थी है, इतना असंवेदनशील है, इतना अहंकारी है, इतना ऐसे, इतना ऐसे’। उससे हमें क्या शक्ति मिल रही है? हमें क्या मार्ग मिल रहा है? हम कैसे आगे बढ़ रहे हैं?
तो इसलिए हमें वो सवाल को बदलना है। ‘क्यों नहीं, पर क्या?’ ये क्यों हो रहा है ऐसे नहीं, ‘अभी मैं क्या करूँ?’ क्या मतलब, ‘अभी मैं, ये क्यों हो रहा है, ये ऐसे क्यों कर रहा है’, वो सवाल का जवाब है ही नहीं, तो ‘अभी मैं क्या करूँ? अभी मुझे क्या करना चाहिए जिससे कि मैं मेरा कर्तव्य कर सकूं, मैं मेरा धर्म कर सकूं, मैं आगे बढ़ सकूं?’ तो अगर वो भाव हम रखते हैं, तो फिर दुनिया में जो भी समस्या है, लोगों से हो, परिस्थिति से हो, वातावरण से हो, मन से हो, शरीर से हो, उन सब में हम कुछ न कुछ तो मार्ग ढूंढ सकते हैं।
इलेक्ट्रॉनिक रेगुलेटर (Shade) का उदाहरण
तो अभी कुछ-कुछ इलेक्ट्रॉनिक शेड के बल्ब (रेगुलेटर) होते हैं। वो कैसे होते हैं? नॉर्मली बल्ब जो होता है, स्विच होता है। अगर ऊपर-नीचे करें तो ऑन हो जाता है, ऊपर करें तो ऑफ हो जाता है। पर कुछ-कुछ जो बल्ब होते हैं, वो फैन के नॉब के समान होते हैं। मतलब क्या, वो गोल घुमाते हैं। जितना हम घुमाएंगे, उतना वो और ब्राइट, ब्राइट और तेज हो जाता है। जितना दूसरी बार घुमाएंगे, तो वो और अंधेरा, अंधेरा, अंधेरा हो जाता है। वो पूरा बंद हो जाता है। एक समय तो इसी तरह से वो पूरा बंद हो जाता है। जितना घुमाएंगे कि वो और अंधेरा हो जाता है, और अंधेरा हो जाता है।
पर अगर हम हाँ सब, ‘अभी मैं क्या कर रहा हूँ? तो ठीक है, यह नहीं कर सकता, यह नहीं कर सकता, पर यह कर सकता हूँ, यह कर सकता हूँ, यह कर सकता हूँ।’ जब हम ये सवाल पूछते हैं, तो क्या होता है, वो हम रौशनी के बटन को ऑन कर रहे हैं और बढ़ रहा है, रौशनी धीरे-धीरे-धीरे बढ़ती है।
श्रील प्रभुपाद के जीवन का संघर्ष
अगर हम प्रभुपाद जी के जीवन को एक उदाहरण देखते हैं कि प्रभुपाद जी ने भारत में प्रचार करने का इतना प्रयास किया। वो इतना प्रयास कर रहे थे भारत में प्रचार करने का, कुछ भी नहीं हुआ, 30-40 साल तक प्रचार कर रहे थे। यह समस्या आ गई, वो समस्या आ गई। कभी कल बताया मैंने, जैसे ‘लीग ऑफ डिवोटीज’ झाँसी में बनाया था, तो वहाँ के लोगों ने उनके खिलाफ षड्यंत्र किया और वो जगह उनसे छीन ली।
वो जब ‘बैक टू गॉडहेड’ ग्रंथ बना के बांट रहे थे, तभी एक गाय ने उनको टक्कर मार दी और गिरके फिर एक दूसरी बार वो थकान से बेहोश हो गए दिल्ली के शहरों में। फिर एक बार वो अपने गुरुभाईयों के साथ कुछ काम कर रहे थे, सेवा कर रहे थे, पर गुरुभाई हर जगह पर उनको नीचा दिखा रहे थे। प्रभुपाद जी बोलते थे विशाल मात्रा में प्रचार को बढ़ाएंगे, उनकी प्रचार को बढ़ाने की कुछ इच्छा ही नहीं थी। प्रभुपाद जी ने अपना कुछ ग्रंथ लिखा, पर वो जो ग्रंथ है पढ़ने में ज्यादा कोई रुचि नहीं थी। प्रभुपाद जी के अपने जीवन में कुछ परिवर्तन करने के तरीके नहीं थे।
प्रभुपाद जी जब अमेरिका जाने वाले थे, जब सोचा था अमेरिका जाना है, तो सुमति मोरारजी, जिन्होंने प्रभुपाद जी को जहाज़ पर जाने के लिए जगह दी, ‘जलदूत’ पर। प्रभुपाद जी को पहले से जानते थे, कुछ साल पहले से। तो जब वो प्रभुपाद जी से मिले, जब प्रभुपाद जी उनको बोले कि “मैं अमेरिका जाना चाहता हूँ”, तो वो बोली कि “स्वामी जी, आप अमेरिका जाकर क्या करोगे?” वो बोले, “आपको भागवत की कथा करना है, तो आप मेरे घर में आएं, मैं रोज़ भागवत आपसे सुनूंगी।”
प्रभुपाद जी को वैसे भागवत कथा नहीं करनी थी। वो क्या भागवत था? वो पुण्यवान थी सुमति मोरारजी, पर उनको क्या है, वो एक पुण्य का कार्य है, भागवत की कथा करने से हमारा जीवन आगे बढ़ेगा और पुण्य का कार्य भी हम कर ले रहे हैं। प्रभुपाद जी को ऐसा नहीं था। प्रभुपाद जी को साधक जो बड़े गंभीरता से भक्ति करेगा, ऐसे लोग चाहिए थे।
भारत में प्रचार की तीन प्रमुख चुनौतियां
तो भारत में ऐसी परिस्थिति थी, अनेक तरह से उस समय समस्याएं थी। तीन प्रकार की समस्याएं थी:
एक था कि भारत अभी-अभी आज़ाद हुआ था, तो सब लोगों में राजनीतिक आशाएं बहुत थी कि राजनीति के द्वारा परिवर्तन हो जाएगा और सब अच्छा हो जाएगा।
दूसरा था कि बहुत से लोग अभी भी बहुत गरीब थे, और गरीबी का प्रतिकार करने में ही लोग बहुत लगे हुए थे।
और तीसरा कारण ये था कि भारतीय लोग उस समय पाश्चात्य देशों से बड़े आकर्षित थे। और क्या, ये सब पाश्चात्य देशों का अनुकरण करना ही उनका भाव था।
तो अभी ये तीनों जो हैं, ये राष्ट्रव्यापी मानसिकता है। प्रभुपाद जी अकेले उसको कुछ परिवर्तन नहीं कर सकते। ये पाश्चात्य देशों के प्रति जो आकर्षण है, वो अभी तक बहुत है। मैं लगभग 20-25 साल पहले जब भक्ति में आया, उसके पहले मैं इंजीनियरिंग पढ़ रहा था। तभी अमेरिका जाने का एग्जाम दिया था मैंने, और अमेरिका की कई यूनिवर्सिटीज से मुझे इनविटेशन (invitation) भी आया था वहाँ पर मास्टर्स करने के लिए। पर तभी मैं गया नहीं, फिर मैं मंदिर में ब्रह्मचारी बन गया। पहली बार जब मैं अमेरिका गया तो उसके बाद में मैं जब अमेरिका से वापस आया, तो मेरे कई रिश्तेदार जिन्होंने बीस साल से मुझे कुछ कॉन्टेक्ट (contact) नहीं किया था, उन लोगों ने मुझे कॉन्टेक्ट किया। “आप अमेरिका जा के आ गये, अभी आपका जीवन धन्य हो गया।”
तो जो अमेरिका के प्रति आकर्षण है, अभी भी है वो। अभी थोड़ा कम हो गया है उतना नहीं है, पर फिर भी है। तो उस समय तो बहुत था। तो अभी प्रभुपाद जी अगर सोचते, लोग रुचि क्यों नहीं ले रहे हैं भगवान के संदेश में? अगर वो सवाल पूछते रहते हैं तो कुछ भी नहीं कर पाते। “यह लोग क्यों नहीं सुन रहे हैं, क्यों नहीं समझ रहे हैं? कितना महत्वपूर्ण ज्ञान है, कितना महत्वपूर्ण ज्ञान है।”
भाषा और विचारधारा का महत्व
मैं अभी साउथ अमेरिका में गया था, वहाँ पर लोगों को इंग्लिश आती नहीं है। तो मैं इंग्लिश में प्रवचन दे रहा था, वहाँ पर लोग स्पैनिश में ट्रांसलेट (translate) कर रहे थे। और फिर मैंने कुछ वाक्य बताया था, कुछ गंभीर वाक्य बताया था, तो वो भक्त ने कुछ बताया था, सब लोग हंसने लग गये। हंस क्यों रहे हैं? मैं तो कुछ गंभीर बता रहा हूँ, हंसने लग गये। तो फिर वो क्या होता है, वो भक्त बाद में बताता है कि, “आपकी क्लास बहुत सीरियस (serious) होती है, तो मैं बीच में जोक कर रहा था।”
तो अभी क्या होता है, जब भाषांतर होता है, तो अगर कोई व्यक्ति एक भाषा में बोल रहा है, दूसरों को भाषा समझ में नहीं आ रही है, तो फिर वो कितना भी अच्छा भाषण हो, उसका कुछ फायदा ही नहीं है। कितना भी अच्छा प्रवचन हो, अगर लोगों को भाषा समझ में नहीं आ रही है, तो कुछ फायदा है ही नहीं इसका।
तो उस तरह से क्या है, लोगों की अपनी-अपनी विचारधारा होती है। तो वो उनकी विचारधारा उनकी भाषा के समान होती है। और हमारी विचारधारा अलग है, उनकी विचारधारा अलग है। तो हम कुछ भी बताएंगे, क्योंकि उनकी विचारधारा अलग है, ऐसे मान लीजिए हम एक भाषा में बोल रहे हैं, वो दूसरी भाषा में बोल रहे हैं, वो समझेंगे नहीं। तो उनको उनकी भाषा में समझाना पड़ेगा। तो भारतीय लोगों की विचारधारा क्या थी? ‘अरे जो पाश्चात्य देश के लोग कर रहे हैं, वो अच्छा है।’ अगर वो पाश्चात्य देश में गए, और भारतीय जो भाषा समझ सकते थे, उस भाषा में उनको समझा रहे हैं।
तो यह वास्तव में प्रभुपाद जी का यह बड़ा साहस था, बड़ी हिम्मत की बात है कि अकेले अमेरिका में चले गए, प्रचार किया, और हजारों-हजारों की मात्रा में लोगों को भक्त बनाया।
परिस्थितियों में सही दृष्टिकोण (Not Why, But How)
तो हम प्रभुपाद जी के जीवन से देखते हैं कि अगर दोष देना है, तो कितने चीजों को, कितने लोगों को प्रभुपाद जी दोष दे सकते थे। हम देखते हैं कि हम कितनी चीजों को दोष दे सकते हैं, पर दोष देने में कुछ फायदा नहीं है। ठीक है, अगर मदद नहीं हो रही, कुछ विपरीत हो रहा है, तो मैं आगे कैसे बढ़ूँ?
जब हम ये भाव रखते हैं कि “क्यों नहीं क्या, नॉट व्हाई बट हाऊ (Not why, but how)।” ये ऐसे क्यों कर रहा है? अब वो सवाल को छोड़के, “अब मैं क्या कर सकता हूँ?” जब इस सवाल पे हम ज़ोर देते हैं, तो फिर क्या होता है? जो अंधकार हमारे अंदर हो गया है, ‘क्यों कर रहा है, क्यों कर रहा है, क्यों कर रहा है’, उससे अंधकार हमारे अंदर बढ़ जाता है। तो अंधकार में एक रोशनी की किरण आ जाती है। “ठीक है, मैं ये कर सकता हूँ, मैं ये कर सकता हूँ, मैं ये कर सकता हूँ।” और धीरे-धीरे हम करते हैं, तो उससे हम आगे बढ़ने लगते हैं।
मैं कोलंबस में था अमेरिका में, वहाँ पर एक भक्त के घर में था। तो वहाँ पर बता रहे थे, वह भक्त, माता-पिता जो हैं, बहुत अच्छी भक्ति कर रहे हैं। उनका जो बच्चा है, उसको रोबोटिक्स (Robotics) में बहुत रुचि है। वह खुद अपने रोबोट, वह 10-12 साल का होगा, 10 साल का, पर वह खुद अपने रोबोट बनाता है। और अमेरिका में नेशनल लेवल रोबोट कंपटीशन है, उसमें उसने कुछ प्राइज (Prize) जीते हैं। तो बोले, वो दिन-रात रोबोट के बारे में पढ़ता है, रोबोट बनाता है, रोबोट के बारे में सोचता है। वो बता रहे थे कि, “हम उसको कृष्ण भक्ति के बारे में कुछ कहेंगे, उसको रुचि है ही नहीं, तो अभी क्या करें?” माता-पिता को बड़ा गर्व था कि वो रोबोटिक्स में बहुत अच्छा है, पर चिंता आती है कि वो कृष्ण भक्ति में बिल्कुल रुचि नहीं लेता है। तो फिर मैं उससे बात कर रहा था, बड़ा बुद्धिमान लड़का है…
रोबोटिक्स और कृष्ण भक्ति: एक अभिनव विचार
तो वो रोबोट कॉम्पिटिशन में, अगर कुछ नया आईडिया बना, रोबोट बना है, तो फिर आपका प्रदर्शन जो होगा, और आकर्षित होगा। तो मैंने उसको पूछा, “कि आप कृष्ण और अर्जुन के रोबोट बनाओ, और वो भगवद्गीता का संवाद, वार्तालाप कर रहे हैं।” उसने आगे… तो वो बोला, “कोई भी ऐसा नहीं बनाएगा।” नहीं, नहीं, नहीं। वो चला गया। फिर पाँच मिनट के बाद, मैं उसकी माताजी से बात कर रहा था, पाँच मिनट के बाद आया है। “पूरे अमेरिका के सारे कॉम्पिटिशनों में कोई भी ऐसा रोबो नहीं बनाएगा।”
तो मैंने उसको थोड़ा बताया कि, “तुझे बड़ा उत्साह था कि तू रोबो बनाते हो, तू किस प्रकार के रोबोट बनाते हो, क्या काम करने के लिए रोबोट बनाते हो?” तो अभी रोबोटिक्स का जो फील्ड है, वो रोबोट बनाने… अधिकांश रोबोट यूज़ हो रहे हैं, जो एक इंटरनेट पर कंपनी है, अमेज़न नाम की। अमेज़न में हम कुछ भी आर्डर कर सकते हैं, और वो आपके घर पर आ जाता है। तो अमेज़न के पास जो भी स्टॉक होता है, वो सब उनका पैकिंग, वो मानव नहीं करते हैं, रोबोट करते हैं। तो वो रोबोट बहुत यूज़ करते हैं। तो पूरे रोबोट कैसे… ‘ये इतना वज़न होगा, तो कैसे उठाना है, इतना वज़न है, तो कैसे उठाना है’।
‘क्यों’ से ‘क्या’ की ओर: अंधकार से प्रकाश तक
जब हम ‘क्यों’ प्रश्न पूछते हैं, तो हम खुद को शक्तिहीन बना देंगे, खुद को अंधकार में डाल देंगे। पर जैसे ही हम ‘क्या’, “अभी मैं क्या कर सकता हूँ इस परिस्थिति में?”, वो ‘क्या’ सवाल से जैसे ही होगा, धीरे-धीरे-धीरे हमारे अंदर रौशनी की किरण आएगी और रौशनी बढ़ते जाएगी। “यही कर सकता हूँ, यही कर सकता हूँ, यही कर सकता हूँ।” और फिर हम हमारे जीवन में अग्रसर हो सकते हैं।
तो अभी ‘क्या’ के जवाब में हमारे पास तीन पर्याय हैं। हम क्या कर सकते हैं? इसकी चर्चा मैं कल के, रविवार के प्रवचन में करूँगा। उसमें इस लेक्चर सीरीज का आखिरी भाग होगा, तभी मैं चर्चा करूँगा।
आज के लेक्चर का सारांश
आज के लेक्चर का समरी (summary)। आज मैंने चर्चा की कि किस तरह से हमें दोष देने की प्रवृत्ति होती है, उससे हम कैसे आगे बढ़ सकते हैं। तो मैंने शुरुआत की कैसे की… अभी दोष नहीं देना है, इसका मतलब नहीं है कि दूसरी व्यक्ति को वैसे के वैसे छोड़ दो और कुछ भी न करो। परीक्षित महाराज ने कलि को सजा दी, और सजा क्या थी कि उसकी जगह जो थी वो सीमित कर दी। और मैंने विस्तार से चर्चा की कि कैसे जगह सीमित करना ये एक प्रकार की सजा है। कैज़ (cage) में हो सकता है, एक रिज़र्व टेरिटरी (reserved territory) में हो सकता है, वनवास में हो सकता है, डिपोर्टिंग (deporting) के द्वारा हो सकता है।
और फिर उसके सन्दर्भ में तुलना की कैसे की… भारत में जाति पद्धति थी और वो बुरी है, उसमें अत्याचार… पर उससे कई गुना अधिक अत्याचार जो लोगों को पूरा रास (annihilate) कर दिया गया है, विनाश कर दिया, ऐसा हुआ था अमेरिका में, दक्षिण और उत्तर अमेरिका दोनों में।
क्षमा बनाम विश्वास और कलि का प्रतिकार
और फिर तो अभी जब किसी को माफ़ करना है… परीक्षित महाराज ने कलि को माफ़ कर दिया, पर ऐसे नहीं उसको विश्वास कर दिया, उसकी जगह सीमित कर दी। तो माफ़ करना मतलब भूलना नहीं है, माफ़ करना मतलब विश्वास करना नहीं है। माफ़ करने का एक ही अर्थ है कि जो भूत में हुआ, उसको मैं लेके अभी जिंदगी भर बैठने वाला नहीं हूँ। जो भूत में हो गया उसको छोड़ दो, अभी आगे बढ़ो। अभी विश्वास अगर करना है, तो उस व्यक्ति को विश्वास के योग्य बनना पड़ेगा, और ऐसे कार्य करने पड़ेंगे जिससे कि हम उसको विश्वास कर सकें।
और फिर उन्होंने कलि को जगह क्यों दी? क्योंकि ये कलियुग ही है। तो कलियुग में जैसे जंतुओं को पूर्णतया निकाल नहीं सकते हैं, पर हमारी प्रतिकार शक्ति को बढ़ा सकते हैं, वैसे परीक्षित महाराज ने, खुद के धर्म के राज्य के द्वारा उन्होंने कलि का प्रतिकार किया और कलि को जगह नहीं दी।
परिस्थितियों को स्वीकारना और ‘क्या’ का मार्ग
और सन्दर्भ में हमने आगे देखा कि हमारे जीवन में भी ऐसी परिस्थिति हो सकती है, ऐसे लोग हो सकते हैं जिनको हम निकाल नहीं सकते, जिनको हम बदल नहीं सकते हैं। तब हमें क्या करना है? हमने देखा कि जो विपरीत चीज़ें हैं हमारे जीवन में, वो हमारे शरीर से आ सकती हैं (आध्यात्मिक क्लेश), लोगों से आ सकती हैं (आधिभौतिक क्लेश), और निसर्ग से आ सकती हैं (आधिदैविक क्लेश)।
तो जब हमारा शरीर बीमार पड़ जाता है या तूफ़ान आ जाता है, तो हम समझ जाते हैं कि मैं कुछ नियंत्रण नहीं कर सकता हूँ और हम स्वीकार करके फिर जो भी उस परिस्थिति में कर सकते हैं, हम करते हैं। पर जब रिश्तों में कोई व्यक्ति दूसरा कोई गलत कार्य करता है, तो हमें ऐसे लगता है कि मैं इसका नियंत्रण कर सकता हूँ। और जब नियंत्रण नहीं कर पाते हैं, उससे बड़ा क्षोभ आता है, उससे बड़ी घृणा हो जाती है। समझना है कि हमें दूसरों के कार्यों पर नियंत्रण नहीं है। और न केवल उनके कार्यों पर नियंत्रण है, पर उनके विचार जो हैं, उनकी भावना है, उसको समझना भी कभी-कभी हमारी क्षमता के परे हो जाता है।
कैकेयी, नियति और कर्तव्य
कैकेयी ने अचानक ऐसा षड्यंत्र राम के खिलाफ क्यों किया? और अच्छा, यह राम ने क्या कहा वो पहले… लक्ष्मण को जैसे पता है, “कि दशरथ को दोष मत दो, कैकेयी को भी दोष मत दो।” क्यों? “यह नियति है।” तो नियति को मान लेना मतलब खुद को बिल्कुल असहाय मान के नियति को स्वीकार करना। और फिर पुरुषोत्तम रामचंद्र बोले, “मेरा कर्तव्य ये क्या है? मेरे पिता के आदेश का पालन करना।” तो वो मैं अभी करने वाला हूँ। तो नियति को स्वीकार करना।
जब कोई व्यक्ति हमें बहुत परेशान कर रहा है और वो हमसे समझ नहीं रहा है, वो हमारी बात समझ नहीं रहा है, मैं उनकी बात समझ नहीं पा रहा हूँ, तो क्या करना है? वो ये नियति का प्रभाव समझ सकते हैं। और “क्यों, क्यों, क्यों?” ये सवाल को पूछना मतलब क्या है? खुद को शक्तिहीन बना देना है। उसके लिए, जैसे कोई बटन होगा उसके लिए ‘क्यों’ घुमा रहे हैं, तो हमसे घुमा रहे हैं कमरे को और अंधकार में घुमा रहे हैं। तो हम सवाल को बदल सकते हैं और ‘क्या’ का सवाल को पूछ सकते हैं। “अभी मैं क्या कर सकता हूँ जिससे कि मैं मेरा कर्तव्य कर सकूँ, मेरा धर्म कर सकूँ, मैं आगे बढ़ सकूँ?” तो ‘क्या’ सवाल जो है वो हमारे अंदर रौशनी की किरण लाता है।
श्रील प्रभुपाद: ‘क्या’ का क्रियात्मक रूप
जैसे प्रभुपाद जी के जीवन में आर्थिक समस्याएं बहुत थी, उसके कारण लोगों को भक्ति में रुचि नहीं थी। तो प्रभुपाद जी ने तभी न केवल लोगों को दोष दिया, अपने गुरुभाईयों को दोष दिया, भारतीय सरकार को दोष दिया, किसी को दोष नहीं दिया। ‘क्यों’ का सवाल छोड़ दिया उन्होंने, और “क्या? अभी मैं क्या कर सकता हूँ?” तो तभी उन्होंने बड़े साहस के साथ पाश्चात्य देशों में जाके प्रचार करके, पाश्चात्य देशों के लोगों को भक्त बनाकर यहाँ पे लाया और फिर उसको देखकर भारतीय प्रभावित हो गए।
तो कभी-कभी लोगों की विचारधारा जो होती है, वह हमसे इतनी अलग हो सकती है कि मान लीजिए वो अलग भाषा ही बोल रहे हैं। तो हम कितना भी समझाने का प्रयास करेंगे, हमारी और उनकी भाषा ही अलग है, तो समझेंगे ही नहीं वो। तो हमें क्या करना पड़ेगा? उनकी भाषा जो है वो पहले हमें समझनी पड़ेगी और उनकी भाषा में उनको समझाना पड़ेगा। “तो क्या कर सकता हूँ मैं? कैसे भारतीयों को प्रभावित कर सकता हूँ मैं? पाश्चात्य देश में आकर प्रचार करके फिर उनको लाऊँ।”
तो उसी तरह से जो उदाहरण दिया कि, “क्यों लड़के को रोबोटिक्स में बहुत रुचि थी, भक्ति में रुचि नहीं थी?” “तो क्यों रुचि नहीं है, क्यों रुचि नहीं है?” वो सवाल, परेशानी से कुछ फायदा नहीं है। “पर क्या कर सकता हूँ?” तो रोबोटिक्स के द्वारा भक्ति में रुचि ला सकते हैं। जैसे हमारे जीवन में जो भी परेशान कर रहा है, परेशान कर रही है, ‘क्यों’ ये सवाल को छोड़कर हम, “अभी मैं क्या कर सकता हूँ?” यह सवाल देंगे। “अभी मैं भगवान की सेवा कैसे कर सकता हूँ?” वो सवाल पर हम ज़ोर देंगे, तो हम जो भी परेशानी है, उससे हम आगे बढ़ सकते हैं।
और ‘क्या’ का सवाल, “कैसे हम क्या-क्या सवाल कर सकते हैं?”, उसका विश्लेषण मैं कल के प्रवचन में करूँगा। किसी को कोई सवाल है? ‘क्यों’ प्रश्न पूछने से बेहतर है, “क्या करना करें?” ‘क्यों’ प्रश्न पूछने का कुछ भी फायदा नहीं हो सकता। हम कुछ करते क्या होंगे अगर हम कुछ सुना सकते हैं? अगर इस स्टेट में, तो उसका कुछ सवाल नहीं हो सकता है। प्रश्न पूछने से बेहतर है, ‘क्यों’ पूछने से बेहतर है ‘क्या’ पूछना।
प्रश्नोत्तर सत्र: कैकेयी और नियति का विश्लेषण
प्रश्नकर्ता: आपने बोला कि जैसे कैकेयी ने जो श्रीरामजी को वनवास दिया, तो वो दैव के खेल के कारण हो गया। तो क्या वो ‘क्यों’, ‘क्या’ वो पता नहीं कर सकते थे? तो वैसे कैकेयी को भी वो अंततः भुगतना तो पड़ा। तो उनको भी अंततः भुगतना पड़ा, कि ऐसा पता हो रहा होता है। तो वो कैसे जस्टिफाई करेंगी कि, “मेरा पति वो मेरे ही कारण मर गया है?”
स्वामीजी: अच्छा। तो अगर प्रभु रामचंद्र को ये लगता है कि “कैकेयी ने ऐसा क्यों बर्ताव किया है?”, वो समझना उनके लिए मुश्किल है, तो इसलिए मैं नियति को देख रहा हूँ। “नियति के कारण ऐसे हो गया है।” नियति के कारण नहीं हो गया हूँ। कैकेयी को पूरी तरह से लग रहा था कि मैं जो कर रही हूँ, सही है। “मेरे पुत्र का राज्य का अधिकार उससे छीना जा रहा है, षड्यंत्र रचा जा रहा है।” वो ये नहीं सोच रही थी कि “मैं षड्यंत्र रच रही हूँ।” वो सोच रही थी कि कौशल्या, दशरथ और राम, उन्होंने मिलके षड्यंत्र रचा है, रचा है कि भरत से राज्य छीनने के लिए। वास्तव में भरत का राज्य था ही नहीं, राम सबसे बड़ा पुत्र था, पर वो उसे सोच नहीं रही थी।
और वो सोच रही थी, “वास्तव में मैं ये सब लोगों की निंदा तो सहन कर रही हूँ क्योंकि मैं मेरे पुत्र भरत से इतना प्रेम करती हूँ, उसके लिए मैं ये सब कर रही हूँ।” इस तरह से वो खुद को समझा रही थी। साधारणतया जो व्यक्ति गलत कार्य करता भी है, बहुत कम लोग ऐसे होते हैं वो गलत कार्य करते हैं और सोचते हैं कि “मैंने गलत कार्य किया है।” अगर आप जेल में जाते हैं (ज़रूरत नहीं है जाने की), पर अगर हम जेल में प्रचार करने जाते हैं, तो जब कैदियों से कुछ बात होती है, कैदियों के जो वार्डन से बात होती है, तो अधिकांश कैदी यह मानते नहीं कि मैंने कुछ गुनाह किया है। कि, “अरे, परिस्थिति के कारण मैंने किया, पर इतना बड़ा होगा उसका…” तो क्या है, अपना जो मन होता है, वो ऐसी कहानी बना देता है, हमें लगता है कि “ये तूने गलत नहीं किया है।”
पर तो अभी कैकेयी को कैसे लगता है, “मैं सब भरत के लिए कर रही हूँ।” पर जब, तो इसके कारण जो दूसरा कोई भी कुछ भी बोलने का… पर जब भरत खुद वापस आ गया है और जब भरत ने बड़ी उसकी भर्त्सना की, “तुम मेरी माँ नहीं हो सकती। मेरी माँ कभी अपने भाई को वनवास में नहीं भेजेगी। मेरी माँ कभी अपने पति के मृत्यु का कारण नहीं बनेगी। तुम मेरी माँ नहीं हो। तुम जो विश्व का विनाश करने वाली देवी है, उसका अवतार हो तुम। मैं तुम्हें अपनी माँ के रूप में स्वीकार ही नहीं करता।”
जिम्मेदारी और पश्चात्ताप
जब भरत ने ऐसे वचन कह दिए, तब कैकेयी की जो भ्रांत धारणा थी, वो नष्ट हो गई। कैकेयी ने अपने मन में एक काल्पनिक भरत बना लिया था, और वो काल्पनिक भरत वो जो भी कैकेयी उसके लिए कर रही थी, उसकी सराहना कर रहा था। पर जब काल्पनिक भरत और असली भरत आमने-सामने आ गए, तो क्या हो गया, वो काल्पनिक भरत जो है… तभी उसने बोला, “आरे, ये क्या हो गया? क्या किया मैंने?” और तभी उसको भी बड़ा पश्चात्ताप हुआ। तो उसने ज़रूर ज़िम्मेदारी ली, और उसने वो… वो खुद वापस आई और जब भरत वन में, जंगल में गए थे पुरुषोत्तम रामचंद्र को याचना करने के लिए कि “आप वापस आ जाएं और राज्य स्वीकार करें”, तो कैकेयी भी उनके साथ गई थी।
तो इसलिए क्या है कि अगर कोई व्यक्ति ऐसे कार्य कर रहा है जो बहुत ही गलत है, बहुत ही विचित्र है, तो हम समझ सकते हैं वो नियति है। पर उस व्यक्ति को यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि “यह नियति है, वो मेरी गलती नहीं है।” और वो क्या है, मन इस तरह से भ्रांत धारणा फैला के वो गलती को सही बता सकता है। तो हम सब हमारे कर्मों के लिए ज़िम्मेदार हैं।
और पाश्चात्य भूमि में हम देख सकते हैं… पाश्चात्य भूमि नहीं, रेट्रोस्पेक्ट (retrospect) में। बाद में हम विचार करते हैं कि “यह व्यक्ति से हो सकता है”, पर जब हमें फैसला करना है, तभी हमें पूरी ज़िम्मेदारी से फैसला करना है।
व्यासदेव और धृतराष्ट्र का संवाद: कर्तव्य और नियति
जब महाभारत का युद्ध होने वाला होता है, उसके पहले व्यासदेव आते हैं, अलग-अलग ऋषिगण आते हैं, और दुर्योधन और धृतराष्ट्र को बताते हैं कि “आप पांडवों का राज्य दे दो, उनसे आप झगड़ा और बढ़ाओ मत।” वो बिल्कुल नहीं सुनते हैं। तभी व्यासदेव आते हैं, तो व्यासदेव धृतराष्ट्र को समझाने का प्रयास करते हैं। तो धृतराष्ट्र उनको कहते हैं कि, “नहीं, नहीं। यह नियति का है। नियति ने हमारे युद्ध डाला है, तो युद्ध होने ही वाला है, क्या कर सकते हैं?”
तभी व्यासदेव कहते हैं कि, “नियति की क्या योजना है, हमें पता नहीं है। हमें सिर्फ ये पता है कि हमारा कर्तव्य क्या है। इसलिए राजा, तुम विचार करो कि जो पांडव हैं, वो तुम्हारे भाई के ही पुत्र हैं। वो तुम्हारा भाई नहीं है, मतलब वो अनाथ हैं, वो तुम्हारे पुत्र के समान हैं। तो उनके… सिर्फ तुम्हारा स्नेह दुर्योधन के प्रति इतना है, पांडवों के प्रति कर्तव्य तुम भूल जाओ। तुम्हारा कर्तव्य क्या है, ये सोचो तुम।”
पर वही युद्ध हो जाता है, उसके बाद में सारे कौरवों का विनाश हो जाता है। और जब धृतराष्ट्र बड़ा विलाप कर रहे होते हैं, तभी व्यासदेव आते हैं और कहते हैं कि, “हे धृतराष्ट्र, बड़ा विलाप मत करो तुम। युद्ध था, वो नियति के द्वारा निर्धारित था।” अभी क्या मतलब है? “युद्ध नियति के द्वारा निर्धारित था” यह नहीं था। अभी क्या है, जब तक कोई चीज़ हमारे हाथ में है, तब तक हमें नियति के द्वारा विचार नहीं करना है। तभी हमें हमारी ज़िम्मेदारी के द्वारा विचार करना है। “मेरी ज़िम्मेदारी क्या है?” वो विचार करना है।
तत्वज्ञान का सही उपयोग: कर्तव्यनिष्ठा
पर जब हो गया है और जो परिणाम आ गया है, वो आ गया है। तभी क्या देखना है? “अभी मैं कुछ नहीं कर सकता हूँ। अभी जो नियति थी वो हो गयी है, अभी आगे बढ़ो।” तो इसलिए तत्वज्ञान है, और तत्वज्ञान का उद्देश्य है। तत्वज्ञान और उसके उद्देश्य को हम अलग कर देंगे, तो फिर तत्वज्ञान का दुरूपयोग भी हो सकता है। तो तत्वज्ञान का उद्देश्य क्या है? कि हमें और कर्तव्यनिष्ठ बनाए।
तो जब युद्ध नहीं हुआ है, तभी तत्वज्ञान का कर्तव्य क्या है? कि युद्ध को टालें, पांडवों के प्रति न्याय करें। पर युद्ध हो गया, अभी कौरवों का नाश हो गया, तभी तत्वज्ञान का कर्तव्य क्या है? अभी भूत के बारे में विलाप छोड़ दें, अभी तो कुछ आध्यात्मिक कार्य करें, अभी तो कुछ और चिंतन करें, अभी आगे बढ़ें।
तो इसलिए हमें कभी भी नियति के नाम पे हमारी ज़िम्मेदारी को त्यागना नहीं है। अगर कोई विद्यार्थी पढ़ाई कर रहा है परीक्षा के लिए, और फिर पढ़ाई बंद कर देता है, तो माँ कहे, “पढ़ाई करो, पढ़ाई नहीं करोगे तो तुम फेल होगे।” “नियति में जो मिल जाएगा, मुझे वो ही मिलने वाला है।” तो अगर पढ़ाई नहीं करेंगे, तो जो मार्क्स मिलने वाले हैं, वो नियति नहीं है, वो नियति कारण नहीं है, वो गैर-ज़िम्मेदाराना कारण है। पर मान लीजिए भई एग्जाम खत्म हो गए, कुछ हो गया, व्यक्ति को अच्छे मार्क्स नहीं मिले। जो हुआ, वो नियति है। अब ये अगली एग्जाम के बारे में तैयार करो।
लीलाओं को समझने के स्तर: दिव्य और नैतिक
तो क्या है, हमें देखना है, तत्वज्ञान को इस तरह से विचार करना है, जिससे कि हम हमारे कर्तव्य करने के लिए और प्रवृत्त हो जाएं। ठीक है? हाँ। कोई सवाल है? एक आखिरी सवाल। फोर मिनट्स जाएं, थ्री-फोर मिनट्स। हाँ, नन्दकुमार भाई।
प्रश्नकर्ता: तो ये मन का दोष है, या भगवान की योजना थी, कि मुझे वनवास हो?
स्वामीजी: अगर वनवास होती है, उसको अलग-अलग स्तर पर हम समझ सकते हैं। तो मध्वाचार्य अपने ब्रह्मसूत्र भाष्य में बताते हैं, तीन स्तर बताते हैं। अच्छा, अलग-अलग स्तर हो सकते हैं।
क्या है कि एक स्तर है, जिसमें हम समझ सकते हैं कि ये सब दिव्य है। भगवान की सारी लीलाएँ दिव्य हैं, और जो भी हुआ, सिर्फ उसका श्रवण करो, उससे आनंद लो, और और कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है। तो वो दिव्य स्तर पर हम देख सकते हैं।
दूसरा है, हम उसको नैतिक स्तर पर देख सकते हैं। नैतिक स्तर मतलब, ‘ये कार्य उचित था, ये कार्य उचित नहीं था’, उससे हम नैतिक शिक्षाएं प्राप्त कर सकते हैं। तो दिव्य स्तर भी ज़रूरी है, दिव्य स्तर पर सब लीलाओं को समझना भी ज़रूरी है। और दिव्य स्तर पर देखेंगे तो क्या है, हाँ, जो कैकेयी ने जो किया, उससे ही रामचंद्र का वनवास हुआ, फिर उसने जाके रावण का वध किया, उनके अवतार के उद्देश्य की पूर्ति हुई। हो सकती है। पर अगर हमें कुछ शिक्षाएं लेनी हैं, तो नैतिक स्तर पर, “ऐसा कार्य करना चाहिए, ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए”, यह भी हम समझ सकते हैं।
तो इसलिए हमें शास्त्रों में जो भी हस्तियाँ हैं, उनको जज (judge) नहीं करना है। उनके प्रति, ‘ये व्यक्ति गलत था, ये व्यक्ति सही था’, ऐसे नहीं है। मैंने नहीं कहा कि “कैकेयी इतनी स्वार्थी है, उसके लिए उसने ऐसे किया।” मैं चाहता था कि लक्ष्मण ने ऐसे कहा, लक्ष्मण ऐसे बोल रहा था। हम देख सकते हैं कि अगर ऐसा करेंगे, तो हम गलत मार्ग पे जा सकते हैं, तो हमारे लिए शिक्षा ले सकते हैं।
शास्त्रों के पात्रों से सीख
हमें कैसे… अगर भगवद्गीता में देखते हैं, अगर भगवद्गीता के पहले अध्याय के तात्पर्य में और दूसरे अध्याय के तात्पर्य में भगवान के अर्जुन के प्रति भाव में काफी फर्क दिखाई देता है आपको। पहले अध्याय में कई जगह भगवान बोलते हैं कि, “अर्जुन कितना सद्गुणी है कि युद्ध के समय में भी विचार कर रहा है वो। युद्ध करना चाहिए कि नहीं, इतना संवेदनशील है कि दूसरों की मृत्यु के कारण मृत्यु नहीं चाहता है वो। हिंसा नहीं चाहता है, इतना विचारवान है। और इसलिए वो ज़रूर दिव्य ज्ञान के पात्र है वो।” और दूसरे अध्याय में प्रभुपाद जी कहीं जगह बोलते हैं कि, “ये अर्जुन रो रहा है। ये क्लीबस्य (कायरता) के पात्र आ सकती है। ये अज्ञान के कारण है। ये अज्ञान के कारण हुआ है, और ऐसा अज्ञान भौतिक चेतना के कारण है।”
तो अभी क्या है, पहले अध्याय की बात सही है तो दूसरे अध्याय की बात सही है? क्या है, पहले अध्याय का उद्देश्य ये है कि वो पृष्ठभूमि बता रहे हैं। और पृष्ठभूमि में है, वहाँ पे अर्जुन कैसे ज्ञान के लिए पात्र था, वो बता रहे हैं पहले।
शास्त्रों में जो अलग-अलग पात्र होते हैं, उनको जज नहीं करना कि ‘ये सही है, ये गलत है’। हमें देखना है कि इनके कार्यों से मेरे लिए क्या सही कार्य हो सकता है, मैं कैसे गलत मार्ग पे न आ सकता हूँ, वो हम सीख ले सकते हैं।
बहुत-बहुत धन्यवाद।