Parikshit M – Dharma discussion – Don’t blame 3 – How to deal with troubling people – Hindi
[Sunday feast Class at ISKCON, Belgaum, India]
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Lecture Summary
प्रवचन के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
1. दूसरों में दोष न देखना (अपैशुनम्):
भगवद्गीता के 16वें अध्याय में वर्णित दैवी गुणों में से एक है ‘अपैशुनम्’ (दोष न देखना)। दूसरों में दोष देखने से हम खुद को उसी अज्ञान और दुःख में धकेल देते हैं। किसी ने समस्या क्यों खड़ी की, इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उस समस्या का समाधान कैसे किया जाए। मन में बार-बार पुरानी बुरी बातों का “रीप्ले (Replay)” करने से हम केवल खुद को ही दुःख पहुँचाते हैं।
2. दैववाद बनाम कर्मवाद:
- दैववाद (सब कुछ नियति है): यह मानना कि सब कुछ पहले से तय है और हमारे हाथ में कुछ नहीं है, पूरी तरह गलत है। ऐसा सोचने से व्यक्ति अपने हिस्से का प्रयास (कर्म) करना भी छोड़ देता है।
- कर्मवाद (सब कुछ मेरी मेहनत है): यह मानना कि केवल मेरी मेहनत से ही सब कुछ होगा, यह भी पूर्ण सत्य नहीं है क्योंकि बहुत सी चीज़ें (जैसे बारिश का आना) हमारे नियंत्रण से बाहर होती हैं।
- वास्तविक सत्य: कर्म (हमारा प्रयास) + दैव (ईश्वर की कृपा/परिस्थिति) + काल (सही समय) = फल। दैव के स्वामी स्वयं भगवान हैं।
3. समस्याओं को सुलझाने के तीन मार्ग (Tolerate, Mitigate, Emigrate):
जब कोई हमें परेशान करे या हम कठिन परिस्थिति में हों, तो हमारे पास तीन विकल्प होते हैं:
- सहन करना (Tolerate): छोटी बातों को नज़रअंदाज़ करें ताकि बड़ी चीज़ों पर ध्यान केंद्रित किया जा सके।
- प्रतिकार करना (Mitigate): जब सहन करना कमज़ोरी बन जाए और लक्ष्य में बाधा आने लगे, तो व्यावहारिक रूप से उसका समाधान करें या प्रतिकार करें (जैसे पांडवों ने अंत में युद्ध किया)।
- दूर जाना (Emigrate): अगर स्थिति बिल्कुल असहनीय हो जाए, तो वहाँ से दूर चले जाना। इसका अर्थ भक्ति छोड़ना नहीं है, बल्कि अपनी प्रगति के लिए सही वातावरण या समान विचारधारा वाले भक्तों का संग चुनना है।
4. सेवा भाव की प्रधानता:
हम चाहें सहन करें, प्रतिकार करें या दूर जाएँ, हमारा मुख्य उद्देश्य ‘सेवा भाव’ होना चाहिए। भौतिक दृष्टि (मैं नियंत्रक हूँ) से देखने पर हम असहाय महसूस करते हैं, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि (मैं भगवान का सेवक हूँ) से देखने पर हमें हर मुश्किल परिस्थिति में भगवान से उचित मार्गदर्शन मिल जाता है। (वक्ता ने अमेरिका के एयरपोर्ट पर ‘वृन्दावन की रज’ के कारण आई मुश्किल का उदाहरण देकर इसे समझाया)।
5. स्वेच्छा (Free Will) और भगवान की ज़िम्मेदारी:
“भगवान की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता” का अर्थ यह नहीं है कि दुनिया में हो रहे सारे बुरे काम भगवान करा रहे हैं। भगवान ने हर जीव को ‘स्वेच्छा’ (Free Will) दी है, जिसका वह उपयोग या दुरुपयोग कर सकता है। हमारे पूर्व कर्मों के अनुसार हमारी ‘स्वतंत्रता’ (Freedom) का एक दायरा तय होता है (जैसे रस्सी से बंधे कुत्ते का उदाहरण)। व्यक्ति अपने गलत कर्मों (जैसे हिटलर के अत्याचार) के लिए स्वयं ज़िम्मेदार है।
6. शुद्ध भक्तों का संग:
भक्तों के संग का अर्थ केवल उनके भौतिक जीवन, परिवार या कमाई की चर्चा (प्रजल्प) करना नहीं है। वास्तविक संग वह है जहाँ ‘कृष्ण कथा’ और आध्यात्मिक चर्चा हो। यदि किसी भक्त की रुचि हमसे नहीं मिलती है, तो हमें ऐसे भक्तों का संग करना चाहिए जिनकी विचारधारा हमारे समान हो (सजातीयाशये स्निग्धे), ताकि हम कृष्णभावनामृत में प्रगति कर सकें।
निष्कर्ष:
जीवन में कोई भी परिस्थिति आए, हमें भौतिक प्रतिक्रिया देने के बजाय आध्यात्मिक पर्याय चुनना चाहिए। दृढ़ संकल्प के साथ भगवान की शरण में रहने से, वे स्वयं हमारे हृदय से मार्गदर्शन करते हैं और हर संकट से पार लगाते हैं।
Full Transcription
दैवी गुण और दूसरों में दोष न देखना
हरे कृष्णा! आज के स्वागत के कार्यक्रम में हम चर्चा करेंगे कि किस तरह से जब हमारे जीवन में समस्याएँ आती हैं, तो हम दूसरों को दोष देना कैसे टाल सकते हैं। भगवद्गीता के 16वें अध्याय में भगवान बताते हैं कि जो दैवी प्रवृत्ति के लोग होते हैं, उनके क्या गुण होते हैं:
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥
यहाँ पर बताते हैं एक गुण है— अपैशुनम्। ‘अपैशुनम्’ मतलब कि दूसरों में दोष नहीं देखना। ‘मार्दवम्’, मार्दवम् मतलब मधुरता, मधुर बात करना, दूसरों से कटु वचन नहीं कहना। तो ये सब दैवी गुण हैं।
तो ये तीन प्रवचनों की शृंखला मैं ले रहा था। हम कल और परसों चर्चा कर रहे थे कि किस तरह से जब हम दूसरों में दोष देखते हैं, उससे हम खुद को भी कमजोर बना देते हैं। तो आप में से कितने लोग कल या परसों के प्रवचन के लिए थे? कल शाम के या परसों शाम के लिए थे?
दोष देखने से क्या होता है?
श्रीमद्भागवतम् में वर्णन आता है कि जब हम किसी में दोष देखते हैं, तो उससे हम एक चीज़ करते हैं— जिसने हमारे लिए समस्या खड़ी की है, वो व्यक्ति जिस अज्ञान में है, हम खुद भी वैसे ही अज्ञान में रहते हैं।
जब कोई व्यक्ति हमारे जीवन में कुछ समस्या उत्पन्न करता है, मान लीजिए हम कहीं नौकरी कर रहे हैं और कहते हैं, “अरे लोग तो कुछ बुरी बात कर रहे हैं”, या हमारे परिवार में कोई है। एक तरह से यह देखना स्वाभाविक है कि ये लोग, या यह व्यक्ति मेरी परेशानी का कारण है। पर ऐसा देखने से हम हल तक कहाँ पहुँच रहे हैं?
किसी में अगर मान लीजिए कोई बीमारी है, यह बीमारी इसके कारण हुई, यह जानना एक तरह से ज़रूरी है। पर उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि बीमारी को ठीक कैसे कर सकते हैं। अगर किसी को मलेरिया हो गया है, तो वह क्यों हुआ यह जानना ज़रूरी है, पर उससे ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि अब ठीक कैसे करना है। मलेरिया कहाँ हो गया, कैसे हो गया, किस परिस्थिति में हो गया, यह जान सकते हैं तो अच्छा है, पर सबसे महत्वपूर्ण क्या है? उसको ठीक कैसे करना है।
दैववाद: क्या सब कुछ नियति है?
तो जब हमारे जीवन में कोई कठिन परिस्थिति आ जाती है, तो साधारणतया हम दो स्तर पर इसको देख सकते हैं। एक है कि इसको हम सब कुछ नियति मान सकते हैं कि “मेरे हाथ में कुछ भी नहीं है, मेरी किस्मत ही फूटी है।” इसको ‘दैववाद’ कहते हैं। दैववाद मतलब सब कुछ दैव से निर्धारित है और मेरे हाथ में कुछ भी नहीं है।
मैं अभी कुछ समय पहले साउथ अमेरिका (South America) में था। वहाँ पर एक बड़ा राज्य था, एक बड़ी ट्राइब (Tribe) थी, एज़्टेक (Aztec) नाम की। तो उनकी ट्राइब में एक भविष्यवाणी थी कि जब अमावस्या की रात को एक अकेला सफेद घोड़ा आपके शहर या गाँव में आ जाएगा, तो वह लक्षण है कि आपके राज्य का अंत होने वाला है।
तभी क्या हुआ, वहाँ पे जो क्रिश्चियन मिशनरी (Christian Missionaries) गए थे, वे वहाँ अपना राज्य स्थापित करना चाहते थे, लोगों को कन्वर्ट (convert) करना चाहते थे। जब उनको पता चला कि इन लोगों में यह विचार है, तो उन्होंने जान-बूझकर उस रात को एक सफेद घोड़ा वहाँ भेज दिया।
यह एज़्टेक देश हज़ारों-हज़ारों की संख्या में था। फिर उसके बाद लगभग 400-500 लोगों की एक सेना उन पर आक्रमण करने के लिए आ गई। ये हज़ारों की संख्या में थे, पर क्योंकि पिछली रात को वह सफेद घोड़ा आ गया था, अगले दिन जैसे ही सेना आई, उन सारे हज़ारों लोगों ने अपने शस्त्र छोड़ दिए और हार मान ली।
तो क्या है, कि यह जो ‘दैव’ की बात कही जाती है, कभी-कभी इसके कारण व्यक्ति जो अपने हाथ में है, वो भी नहीं करता। अगर हम बोलते हैं कि सब कुछ दैव द्वारा निर्धारित है, हमारे हाथ में कुछ भी नहीं है, तो यह गलत है। ज़रूर हमारे हाथ में कुछ तो है। मैं अमेरिका में था, तो एक व्यक्ति ने सवाल पूछा कि “सब कुछ दैव द्वारा निर्धारित है?” मैंने पूछा, “क्या आपका यह सवाल पूछना भी दैव द्वारा निर्धारित है?” उसने कहा, “हाँ, यह भी दैव द्वारा निर्धारित है।” मैंने कहा, “ठीक है, तो फिर यह भी दैव द्वारा निर्धारित है कि मैं इसका जवाब नहीं दूँगा!” वह बोला, “नहीं नहीं, मैंने सवाल पूछा है, आपको जवाब देना चाहिए।”
शास्त्र, स्वेच्छा और हमारी ज़िम्मेदारी
वास्तव में, जब हम कहते हैं सब कुछ दैव द्वारा निर्धारित है, तो यह तर्क और शास्त्र दोनों के आधार पर उचित नहीं है। तर्क के आधार पर क्या होता है? अगर हम कहते हैं कि सब कुछ दैव द्वारा निर्धारित है, तो फिर हमारी खुद की ज़िम्मेदारी और स्वेच्छा का कुछ महत्व ही नहीं रह जाता। मान लीजिए कोई व्यक्ति अच्छा जीवन जी रहा है और फिर वो शराबी बन जाता है, तो क्या उसका शराब पीना दैव है या उसकी स्वेच्छा का दुरुपयोग है? अगर कोई व्यक्ति जान-बूझकर, जानते हुए कुछ गलत कार्य करता है, तो वो दैव नहीं है, वो उसकी खुद की गलती है।
शास्त्र कई जगह पर बताते हैं, “आप ऐसे करो, ऐसे मत करो”:
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥
क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए, यह बुद्धि से हमें समझना चाहिए, भगवान ऐसा कहते हैं। अगर शास्त्र बताते हैं कि आपको यह करना चाहिए, यह नहीं करना चाहिए, और अगर पहले से ही दैव द्वारा सब कुछ निर्धारित है कि हम क्या करने वाले हैं, तो फिर शास्त्र को यह बताने की ज़रूरत ही क्या है?
हमारे एक महान आचार्य बलदेव विद्याभूषण ने वेदांत सूत्र के गोविंद भाष्य में यही तर्क लिया है कि शास्त्र ही अर्थहीन हो जाएँगे, अगर सब कुछ दैव द्वारा निर्धारित है। क्योंकि हमारी कुछ स्वेच्छा है, इसीलिए शास्त्र बताते हैं कि यह करो, यह मत करो।
कर्मवाद और दैव का संतुलन
तो यह एक विचारधारा है कि सब कुछ दैव द्वारा निर्धारित है। दूसरी विचारधारा यह है कि सब कुछ हमारे कर्म द्वारा ही निर्धारित है। उसको कहते हैं ‘कर्मवाद’—कि अगर मैं मेहनत करूँगा, तो मैं ज़रूर यशस्वी हो जाऊँगा। अगर मैं मेहनत करूँगा, तो जो भी मेरी मन में इच्छा है, वह मैं पूरी कर सकता हूँ।
आजकल के आधुनिक समाज में अधिकांश लोगों का ज़ोर इसी कर्मवाद पर होता है कि आप अपनी इच्छा शक्ति प्रबल बना लेंगे, तो जो भी मन में ठानेंगे, वो कर सकते हैं। यह हमें आकर्षक लग सकता है, पर सत्य यह है कि हमारे जीवन में जो भी होता है, उसमें सिर्फ हमारा ही कार्य फल को निर्धारित नहीं करता है।
मान लीजिए कोई क्रिकेट टीम बहुत अच्छी तरह ट्रेनिंग करती है, बहुत अच्छी तरह खेलती भी है, और जीतने ही वाली है, तब बारिश आ जाती है और मैच बंद हो जाता है। अब वो कितना भी प्रयास करें, बारिश को तो रोक नहीं सकते। हम अपने जीवन में कितना भी प्रयास करें, कुछ चीज़ें ऐसी हैं जो हमारे नियंत्रण में नहीं हैं।
जब हम जीवन जीते हैं, तो देखते हैं कि कुछ चीज़ें हमारे नियंत्रण में हैं और कुछ नहीं हैं। जो चीज़ें नियंत्रण में हैं, जब लोग उन पर बहुत ज़ोर देते हैं, तो उससे कर्मवाद आता है। सत्य इन दोनों के बीच में है—हमारा कर्म भी महत्वपूर्ण है, और दैव भी महत्वपूर्ण है।
अगर हम इसको एक समीकरण (Equation) के रूप में लें, तो: कर्म + दैव + काल = फल।
इन तीनों का जब समन्वय होता है, तो फल आता है। अगर कोई किसान है, उसका कर्म है कि खेती करना, ज़मीन में बीज डालना। उसके बाद बारिश का सही मात्रा में और सही समय पर आना दैव है। इसी तरह, कई बार लोग प्रयास करते हैं पर बच्चा नहीं होता है। उनका प्रयास करना ही सब कुछ नहीं है; प्रयास के परे भी दैव है। और भले ही प्रयास से बच्चा हो रहा है, फिर भी उसको नौ महीने लगते हैं, वह ‘काल’ (समय) है। जब तीनों साथ में होते हैं, तो इच्छा का फल आता है।
संबंधों में परेशानियां और तीन विकल्प
दैव एक बड़ा विस्तृत विषय है, पर हम संबंधों पर ज़ोर दे रहे हैं। संबंधों में जब गलतफहमियां होती हैं, घृणा होती है, जब कोई हमें परेशान करता है, तो हम उनको दोष दें या ना दें, हम इसे कैसे देखें?
मान लीजिए हमारे जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति है जो हमें बहुत परेशान कर रहा है। हमारे दफ्तर में पहला बॉस अच्छा था, पर दूसरा बॉस आ गया है जो बार-बार हमें तंग कर रहा है। हम देख सकते हैं कि इसका एक ही कारण नहीं है। हो सकता है हमने कुछ ऐसा किया हो, या बॉस ने हमारे बारे में कुछ ऐसा सुना हो जिससे उसे लगता है कि हम अलग प्रकार के व्यक्ति हैं। कारण क्या है, हमें पता नहीं है। पर हम यह देख सकते हैं कि हमारे हाथ में क्या है।
पांडवों का जीवन देखिए। वे राजकुमार थे, पर उनका जन्म और बचपन जंगल में ऋषि-मुनियों के साथ बीता। उधर दुर्योधन को लग रहा था कि अगला राजा बनना मेरा अधिकार है। और जब सुशील और शीलवान पांडव वापस आ गए, तो परेशानियां शुरू हुईं।
जब ऐसी स्थिति आए, तो मैं अंग्रेज़ी में इसे कहता हूँ: Tolerate, Mitigate, Emigrate
- टॉलरेट (Tolerate) – सहन करो।
- मिटिगेट (Mitigate) – प्रतिकार करो या प्रभाव कम करो।
- इमिग्रेट (Emigrate) – कहीं और चले जाओ।
मान लीजिए हम किसी नई जगह में जाकर रहने लगते हैं, वहाँ नौकरी मिल गई, घर है। पर वहाँ का वातावरण बहुत ही गर्म है और हमसे सहन नहीं होता। तो क्या कर सकते हैं?
पहला विकल्प है ‘सहन कर लो’ (Tolerate)। यहीं रहना है, धीरे-धीरे गर्मी की आदत पड़ जाएगी।
अगर सहन नहीं होता है, तो ‘मिटिगेट’ (Mitigate)। मतलब कुछ प्रतिकार करो। घर में अच्छे फैन (Fan) लगा लो, एयर कंडीशन (AC) लगा लो।
पर अगर उससे भी बहुत परेशानी हो रही है, सहन ही नहीं हो रहा, अलग-अलग व्याधियां आ रही हैं, तो फिर “मैं यहाँ नहीं रह सकता, मैं कहीं और चला जाऊँगा”—यह है ‘इमिग्रेट’ (Emigrate)।
हर एक पर्याय के कुछ फायदे हैं और कुछ नुकसान हैं। हम चाहते हैं कि हमें बस फायदे मिल जाएं और कोई नुकसान न हो, पर ऐसा नहीं होता।
भीम और ज़हर की घटना
पांडवों ने ये तीनों मार्ग अलग-अलग समय पर इस्तेमाल किए। जब वो युवक ही होते हैं, तभी दुर्योधन षड्यंत्र रचता है। वह भीम को ज़हर खिला देता है। ज़हर खिलाने के बाद, जब भीम बेहोश हो जाता है, तो उसे बाँधकर पानी में फेंक देता है।
पर भगवान की योजना से, जिस नदी में वह उसे फेंकता है, वहाँ कुछ साँप होते हैं। जब साँप भीम को काटते हैं, तो उनके ज़हर से दुर्योधन के ज़हर का प्रतिकार (काट) हो जाता है। भीम होश में आता है और चारों ओर साँप देखता है। भीम बचपन से ही क्षत्रिय स्वभाव के थे। साधारणतया 15 साल का कोई लड़का चारों ओर 15-20 साँप देखकर डर जाएगा। पर भीम देखता है कि साँप ने मुझे काटा, तो उसे साँपों पर ही गुस्सा आ जाता है! वह एक साँप को उठाकर दूसरे साँपों को पीटने लगता है और उन्हें फेंक देता है। साँपों ने ऐसा बर्ताव कभी देखा ही नहीं था कि यह कैसा व्यक्ति है!
फिर वह नदी से बाहर वापस आ जाता है। भीम काफी क्रोध में होता है, वह समझ जाता है कि दुर्योधन ने उसे मारने का प्रयास किया है। पर जब युधिष्ठिर सारी कहानी सुनते हैं, तो युधिष्ठिर कहते हैं कि “यह घर की बात है…”
पांडवों का उदाहरण और सहनशीलता की सीमा
इसको और बढ़ाएँ, वो सोचते हैं कि हम अभी-अभी कुछ ही साल पहले इस परिवार में आये हैं। और जो भीष्म पितामह हैं, उनको दो पक्षों में फिर चुनाव करना पड़ेगा कि इसके पक्ष में हूँ, कि इसके पक्ष में हूँ।
और फिर इसके बाद वारणावत में उनको ज़िंदा जलाने की योजना बनाई जाती है, तभी पांडव बच जाते हैं। पर तभी पांडव निकल जाते हैं जंगल में, उसको सहन कर लेते हैं। और उसके बाद में उनको द्रौपदी का हाथ मिल जाता है। तब एक सीमा पार करते हैं, और क्योंकि द्रुपद राजा बड़े शक्तिशाली होते हैं, तो अभी क्योंकि पांडव उनके जमाई बन गए हैं, तो इससे धृतराष्ट्र उनको वापस बुलाते हैं और आधा राज्य उनको मिल जाता है।
तो अभी तक क्या है, पांडव, कौरव जो भी करते हैं, उसे सहन कर लेते हैं। पर उसके बाद में जब जुए का खेल होता है और इसमें कौरव न केवल पांडवों का जो कुछ था वह ले लेते हैं, पर द्रौपदी का अपमान कर देते हैं। तब एक सीमा पार हो जाती है और तब पांडव प्रण लेते हैं कि वो कौरवों को सज़ा देंगे। उसके बावजूद वे वनवास से आने के बाद फिर भी पांडव शांति का प्रस्ताव रखते हैं।
दुर्योधन का अहंकार और प्रतिकार की आवश्यकता
पर शांति का प्रस्ताव कौरव ठुकरा देते हैं। अभी ना बोलने के लिए अलग-अलग पद्धति होती है। अगर मान लीजिए कि हम किसी कार्यक्रम के लिए बोलते हैं कि आप आ जाओ, और कोई कहता है मुझे यहाँ जाना है इसलिए मैं नहीं आ सकता, तो यह एक तरह से ना बोल रहे हैं।
कोई बोलता है कि “मैं मर भी जाऊँगा तो मेरी लाश भी तुम्हारे कार्यक्रम में नहीं आएगी।” अगर कोई ऐसे बोलेगा तो इसका मतलब क्या है? वो केवल उस कार्यक्रम को ना नहीं बोल रहा है, उस व्यक्ति को ही ना बोल रहा है। वो केवल नहीं नहीं बोल रहा है, व्यक्ति के मुँह पर दरवाज़ा ज़ोर से बंद कर रहा है।
तो उसी तरह से जब दुर्योधन को कृष्ण शांति का प्रस्ताव देते हैं, तो दुर्योधन क्या कहता है? कृष्ण कहते हैं कि आप पांडवों को पाँच गाँव दे दो, और वो क्या जवाब देता है कि “मैं उतनी ज़मीन भी नहीं दूँगा जितनी कि आप सुई की नोक पर रख सकते हैं।” तो मतलब ये क्या है? ये केवल उस प्रस्ताव को ना नहीं है, उस व्यक्ति को ही ना है। तो इस तरह से ना बोल रहे हैं। तो मतलब व्यक्ति कुछ भी सही करने के लिए तैयार ही नहीं है, कुछ समझौते के लिए तैयार ही नहीं है।
तो अभी ऐसे व्यक्ति को सहन करने में कुछ मतलब नहीं है, उस व्यक्ति का प्रतिकार ही करना पड़ेगा। तो क्या होता है कि उसके प्रतिकार का मतलब क्या? पांडव तभी युद्ध करते हैं, जो कुरुक्षेत्र का युद्ध हो जाता है, और फिर दुर्योधन को उसके जो सारे अत्याचार हैं, उसकी सज़ा मिलती है, वो सारे कौरवों का वध हो जाता है।
क्या सहन करना हमेशा सद्गुण है?
तो अभी महाभारत में दोनों विचार दिखाए गए हैं, दोनों पर्याय दिखाए गए हैं, कि कोई व्यक्ति परेशान कर रहा है तो उसको सहन करो। पर वो जो सहन करना ही सर्वोच्च सद्गुण नहीं है। कुछ ऐसा समय आता है जब सहन करना एक कमज़ोरी बन जाती है। साधारणत: सहन करना एक शक्ति होती है, पर कभी-कभी सहन करना एक कमज़ोरी बन जाती है।
तो सहनशीलता का मतलब है कि छोटी चीज़ों को छोटा रखें ताकि हम जो बड़ी चीज़ है, उसपे ज़ोर दे सकें। तो अगर कोई हमें परेशान कर रहा है, तो ठीक है, परेशान तो कर रहा है। पर अगर हमारा सारा मन उसमें ही लग जाएगा, तो बड़ी चीज़ें छूट जाएँगी।
कोई खेल-कूद में, क्रिकेट में, टेनिस में, फुटबॉल में, जब स्पोर्ट्स प्लेयर (sports player) खेलते हैं, तो ऐसे होता है कि कभी भी किसी का शरीर 100% फिट नहीं होता है। अगर कोई एथलीट (athlete) बोलेगा कि “जब मेरे शरीर के किसी भी अंग में कोई दर्द नहीं होगा तभी मैं खेलूँगा”, तो वो कभी भी खेल नहीं पाएगा। क्योंकि दर्द नहीं भी होता है, तो एक्सरसाइज़ (exercise) करते हैं, वर्कआउट (workout) करते हैं, तो भी थोड़ा दर्द होता है।
तो ऐसा कभी होगा ही नहीं, शारीरिक स्तर पर किसी एथलीट के, कि वो पूरा 100% फिट है। फिटनेस (fitness) ज़रूरी है, पर थोड़ा सा दर्द होता है, थोड़ी सी समस्या होती है, वो सहन करके आगे बढ़ते हैं। तो जो शारीरिक स्तर पर होता है, कि शारीरिक स्तर पर अगर कोई व्यक्ति सोचेगा कि मुझे 100% फिटनेस चाहिए, वो बहुत मुश्किल होता है। बहुत कम ही समय आता है जब ऐसा होता है, और बहुत आसानी से चला भी जाता है।
और ऐसे ही, जैसे शारीरिक स्तर पर दर्द अलग-अलग प्रकृति का होता है। थोड़ा सा हम ज़्यादा वज़न उठा लें, थोड़ा दर्द होता है। कभी-कभी बिना वज़न उठाये थोड़ा दर्द रहता है, कभी-कभी इतना दर्द रहता है कि कुछ कर नहीं सकते हैं। तो फिर ज़रूर डॉक्टर के पास जाना पड़ता है, कुछ दवाई लेनी पड़ती है, कुछ फिर रेस्ट (rest) लेना पड़ता है।
तो जैसे शारीरिक दर्द होता है, उसका भी एक स्केल (scale) होता है। और वो स्केल जो होता है, उसका जो एक दर्जा होता है, उसमें हम देखते हैं कि मुझे जो काम करना है, उसमें यह दर्द मुझे कितनी समस्या कर रहा है।
मानसिक दर्द और समस्याओं का स्केल (Scale)
वही विचारधारा हम मानसिक दर्द के लिए कर सकते हैं। कोई संबंध में होता है, यह व्यक्ति जो परेशान कर रहा है, ठीक है अभी परेशानी तो है। पर हमारे लिए महत्वपूर्ण क्या है? और उस महत्वपूर्ण कार्य को करने की तुलना में, यह मुझे कितना परेशान कर रहा है?
जैसे ट्रेन में, वो व्यक्ति हमको धकेलने लगता है, हम उसको धकेलने लगते हैं। और धकेलने में हम इतना फँस जाते हैं कि हमारा स्टेशन आ जाता है, पर हम धकेलते ही रहते हैं। तब यह क्या है? यह व्यर्थ है।
तो ठीक है, अगर धकेल रहा है, ठीक है। तुमको इतनी अपनी शक्ति दिखानी है, हम थोड़े बाजू में खड़े हो जाएँगे। तुम्हें जो करना है, करो। हम थोड़े समय के लिए, आधे घंटे के लिए वहाँ पर हैं। ट्रेन में हमारा स्टेशन आएगा, उतर के चले जाएँगे। तो वहाँ पे वो व्यक्ति धकेलता है, छोटी सी बात है। पर वही व्यक्ति अगर हमको न केवल धकेलता है अपनी जगह से, पर ट्रेन से ही बाहर धकेलने लगता है, तो फिर उसको सहन नहीं कर सकते हैं, उसका प्रतिकार करना चाहिए।
तो एक दर्जा है, एक मात्रा है, कि उसमें हमारा महत्वपूर्ण कार्य क्या है, उसमें इस चीज़ से कितनी बाधा आ रही है। हमारा महत्वपूर्ण कार्य क्या है? हमको हमारे जिस स्टेशन पर जाना है, उधर तो जाना है। तो वो इतना धकेल रहा है, उससे थोड़ी जो दिक्कत आ रही है, मैं कहीं और खड़ा हो सकता हूँ। पर ट्रेन से बाहर धकेल रहा है, इसका मतलब मैं अपने लक्ष्य तक जा ही नहीं पाऊँगा। तो इसलिए मुझे अभी क्या करना है? मुझे इसका प्रतिकार करना है।
मन का रीप्ले (Replay) और नकारात्मकता का विस्फोट
ठीक उसी तरह से, आपको पता है कि टीवी पे या यूट्यूब (YouTube) पे रीप्ले (replay) होता है। अगर कोई क्रिकेट मैच चल रहा है और कोई बहुत अच्छा शॉट मार लेता है, तो फिर रीप्ले दिखाते हैं। कैसे शॉट मारा देखा है? एक बार, दो बार, तीन बार, चार बार, ऐसे रीप्ले टीवी पे होता है।
वैसे हमारे मन में भी रीप्ले होते रहता है। क्या होता है, रीप्ले पुनः होता है। किसी व्यक्ति ने हमारा कुछ ऐसा-ऐसा अपमान किया, ऐसा कुछ किया जिससे हमको बहुत दर्द हुआ है, तो क्या होता है, वह घटना तो एक बार हुई होती है।
पर हमारे मन में वो रीप्ले होते रहता है। और हमारा मन ऐसा होता है कि यह हर बार रीप्ले करता है, तो रीप्ले करते समय उसमें स्पेशल इफ़ेक्ट्स (special effects) जुड़ जाते हैं। “तो इसने ऐसे किया, ऐसे किया, ऐसे किया!” और जितनी हम घृणा करते हैं, जितना हम गुस्सा करते हैं, वो क्या होता है, वो रीप्ले और स्पेशल इफ़ेक्ट्स से भर जाता है।
“उस व्यक्ति ने पहले ऐसे किया था, बाद में ऐसे किया था, ऐसा ही प्रकार का व्यक्ति है!” व्यक्ति ने अपमान किया है, पर यह मन रीप्ले करते रहता है। वो व्यक्ति ने केवल मेरा अपमान ही नहीं किया, वो एक असुर बन जाता है, एक राक्षस बन जाता है, हैवान बन जाता है। और उसको हम पूरा रीप्ले से क्या करते हैं, बार-बार वही सोचते रहते हैं। तो उससे हम खुद को दुःख पहुँचाते हैं। व्यक्ति ने वो किया है, वो किया है, व्यक्ति तो चला गया, पर हम खुद को दुःख पहुँचाते रहते हैं।
ऐसी परिस्थिति में, हमें वो रीप्ले को बंद करना है। जो समस्या है, ज़रूर समस्या है, उसने जो किया है, वो है। पर वो छोटी समस्या को हमारा मन बहुत बड़ा बनाता है। मन उसी चीज़ को रीप्ले करता है: ऐसे हुआ, ऐसे हुआ, ऐसे हुआ।
तो उस समय, मन हमको विचार करने का मौका ही नहीं देगा। “अरे ये इतना बुरा व्यक्ति है, इसने ऐसे किया, इसने ऐसे किया, इसने ऐसे किया”—बार-बार वो बोलता रहेगा। हम कुछ विचार ही नहीं कर पाते हैं कि कब हमें प्रतिकार करना है, कब हमें सहन करना है, कब वो परिस्थिति को छोड़ के चले जाना है।
जैसे पांडव बाद में विचार करते हैं। भगवान कृष्ण अपना विचार रखते हैं। आज ये समस्या है, और मैं उसमें उलझना नहीं चाहता हूँ। इसको मैं सहन कर सकता हूँ, प्रतिकार कर सकता हूँ, पर वो दोनों में मेरा समय बहुत जाएगा। और मुझे जो काम करना है, वो बहुत महत्वपूर्ण है। कुछ और काम है, इसमें मुझे फँसना नहीं है। तो वो भी हम कर सकते हैं।
सेवा भाव और आध्यात्मिक दृष्टिकोण
पर इन तीनों में जो पर्याय चुनना है, सबसे महत्वपूर्ण क्या है? हमें सेवा भाव होना चाहिए। मैं सेवा के रूप में सहन करूँगा, मैं सेवा के रूप में प्रतिकार करूँगा, या सेवा के रूप में मैं यहाँ से दूर जाऊँगा और दूसरी सेवा करूँगा। अगर सेवा भाव नहीं है, अगर घृणा भाव होता है, तो फिर हम जो भी करेंगे, उससे समस्या का हल नहीं होगा, समस्या और ही बढ़ेगी।
अगर हम सहन करते हैं, पर वो सेवा भाव से सहन नहीं कर रहे हैं, तो वो क्या है? यह सोच होती है कि “मैं असहाय हूँ, यह इतना शक्तिशाली व्यक्ति है, मैं असहाय हूँ, क्या कर सकता हूँ, इसलिए मैं सहन कर रहा हूँ।”
तो फिर मैं सहन तो कर रहा हूँ, पर सारा नकारात्मक भाव जो है, वो मेरे हृदय में है, और फिर उसका एक न एक दिन विस्फोट हो जाएगा। तो उस तरह से सहन करने का मतलब खुद की भावना को दबाना नहीं है। सहन करने का मतलब अपनी भावना को कहीं और लगाना है, ताकि मैं इसमें अपनी भावना को नहीं लगाऊँगा। मेरे लिए महत्वपूर्ण यही चीज़ है जो मैं करने वाला हूँ।
तो इसके लिए सेवा भाव बहुत ज़रूरी है। जिस हद तक हम में सेवा भाव होता है, उस हद तक हमारा मन शांत रहता है। कैसे शांत रहता है? मुझे भगवान की सेवा करनी है। कैसे सेवा करनी है? मैं आगे बढ़ने का प्रयास करता हूँ।
जब कुन्ती महारानी भगवान श्री कृष्ण से प्रार्थना करती हैं, भागवतम् के पहले स्कन्ध के आठवें अध्याय में, तभी वो एक उपमा देती हैं कि जिस तरह से गंगा हमेशा सागर की ओर जाती है, वैसे मैं हमेशा चाहती हूँ कि मेरी चेतना हमेशा भगवान की ओर जाए।
जब हम ये भाव रखते हैं कि मुझे भगवान की ओर चेतना अग्रसर करनी है, भगवान की सेवा करनी है, और अभी यह जो परिस्थिति आ गई है, इसमें मैं भगवान की सेवा कैसे करूँ? जब हमारा भगवान के प्रति सेवा भाव होता है, तो ‘ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते’। भगवान कुछ मार्ग दे देंगे कि कैसे आप सेवा कर सकते हो, कैसे आप आगे बढ़ सकते हो।
अमेरिका में मेरे अनुभव और वृन्दावन की रज
मैं पिछली बार जब अमेरिका में गया था, तो जब अमेरिका की सिक्योरिटी (security) में मैंने एंटर (enter) किया, जो सिक्योरिटी क्लीयरेंस (security clearance) होता है, तभी अचानक ज़ोर से अलार्म (alarm) बज गया। मैं देख रहा था कि अलार्म कहाँ से आया। मैं देख रहा था तो अचानक 10-12 सिक्योरिटी गार्ड गन (gun) मेरी ओर पॉइंट (point) करके खड़े हो गए।
तो वहाँ का जो सिक्योरिटी इंचार्ज था, वह बोला कि आपकी जो कुबड़ियां (crutches) हैं, उसमें हमको हाई एक्सप्लोसिव अलर्ट (High explosive alert) आ गया है। इसलिए हमको आपका पूरा सर्च (search) करना पड़ेगा।
तभी मुझे एंटर करके अमेरिका में दूसरी कनेक्टिंग फ्लाइट (connecting flight) लेनी थी। तो मेरी जो फ्लाइट लैंड हुई थी, वह पहले ही थोड़ी लेट हो गई थी। मुझे जल्दी जाना था। मैं सोच रहा था कि इससे इतना समय और लेट हो गया है। तो पहले थोड़ा सा विचलित हो गया था मैं।
पर जब वो बोले और सारी गन के साथ पॉइंट करते हुए मुझे एक दूसरे रूम में लेकर गए। तो फिर अभी उसमें से एक सिक्योरिटी गार्ड आ गया। वो बोला कि आपकी जो क्रचेस (crutches) हैं, इसमें हाई एक्सप्लोसिव है, यानि इसमें कोई विस्फोटक चीज़ है, ऐसी हमको सूचना मिली है। तो वो बोला कि हमको ये क्रचेस तोड़नी पड़ेंगी, ये कुबड़ियां तोड़नी पड़ेंगी।
तो मैंने उनको बोला कि अगर आप कुबड़ियां तोड़ देंगे, तो मैं चलूँगा कैसे? तो वो व्यक्ति बोला, “That is not my problem, वह मेरी समस्या नहीं है।” मैं सोच रहा था कि अगर आप कुबड़ियां तोड़ देंगे तो मैं क्या करूँगा? तभी फिर वे पूरा सिक्योरिटी बेस चेक कर रहे थे और वो कुबड़ियां तोड़ने ही वाले थे।
क्या होता है तभी, चूँकि मुझे भगवद्गीता में काफ़ी रुचि है, तो भगवद्गीता के श्लोक मैं हमेशा काफ़ी हद तक मन में बोलते रहता हूँ। उस समय मैं भगवद्गीता का अठारहवाँ अध्याय मन में स्मरण कर रहा था। तभी अठारहवें अध्याय का एक श्लोक याद आया:
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥
श्लोक में भगवान कहते हैं कि सब जीव जो हैं, वो एक माया रूपी यंत्र पे बैठे हुए हैं और भगवान उनके हृदय में हैं, और उनके भ्रमण का मार्गदर्शन कर रहे हैं। तो जब मन ही मन मैं यह गाने लग गया, तो सोचने लग गया, विचार आया कि भगवान हमेशा मेरे साथ हैं। मैं भी 50-60 बार, 100-150 बार फ्लाइट में जा चुका हूँ। कितनी बार कहीं भी कोई समस्या आ सकती थी, एक्सीडेंट (accident) हो सकता था, कितनी सारी गलत चीज़ें हो सकती थीं, पर कुछ नहीं हुआ। भगवान ने इतनी सारी परिस्थितियों में कुछ मार्ग निकाल लिया है, तो अभी भी मार्ग निकाल लेंगे।
जब यह विचार करने लग गया, तो फिर क्या? हाँ, हम सब आत्मा हैं, अनेक शरीरों में हमारा भ्रमण हो चुका है। तो जब हम एक शरीर छोड़कर दूसरे शरीर में आते हैं, हमको पता भी नहीं होता कि कहाँ जाने वाले हैं, पर हम भगवान पर आश्रित होते हैं। तो जब ऐसे विचार आ गए, तो थोड़ा सा मन शांत हो गया। और फिर मैं भगवान से प्रार्थना करने लग गया कि जो भी आपकी इच्छा है, मैं क्या करूँगा? जो आपकी मर्ज़ी होगी, वही होगा।
और फिर उसने मेरी क्रचेस (crutches) उठा लीं, और फिर क्रचेस को उठाकर देखने लग गया। उसने देखा कि इसके अंदर मिट्टी कहाँ से आ गई? क्रचेस के अंदर मिट्टी फँसी हुई थी। उसने मिट्टी निकाली। मुझे भी पता नहीं था कि उसमें मिट्टी कहाँ से आ गई।
तभी याद आया कि क्या हुआ था। मैं अमेरिका जाने से पहले वृन्दावन गया था। और जब वृन्दावन गया था, तो वहाँ यमुना के किनारे गया था। तो अभी क्या हो गया? वो जो मिट्टी थी, वो उनको लगा कि ये एक्सप्लोसिव है! तो उन्होंने थोड़ी मिट्टी निकाली और बाद में बोले, “ये तुम्हारी क्रच को साफ़ करने का काम हमारा नहीं है, तुम्हारा है।” तो मैंने बोला, “ठीक है, मैं साफ़ कर लेता हूँ।”
तब मैं सोच रहा था कि उनके लिए जो एक्सप्लोसिव था, वो क्या था? वो वृन्दावन की रज थी! वृन्दावन की रज (व्रज रज) वास्तव में आध्यात्मिक दृष्टि से एक्सप्लोसिव (विस्फोटक) ही है। वो आध्यात्मिक दृष्टि से हमारी भौतिक आसक्तियों का विस्फोट कर देती है।
तो वो व्रज रज थी, उनको लगा और उनके मेटल डिटेक्टर (metal detector) ने बताया कि ये एक्सप्लोसिव है, यह एक विस्फोटक है। तो यह कहने का उद्देश्य यह था कि कभी-कभी हम ऐसी परिस्थिति में आ जाते हैं कि हम असहाय हो जाते हैं। कि वो व्यक्ति अभी अगर मेरी क्रचेस तोड़ देगा, मैं अमेरिका में हूँ, वो सिक्योरिटी इंचार्ज है, तो मैं कुछ कर नहीं सकता था।
परिस्थिति को दोष न देकर भगवान पर आश्रित होना
कई बार क्या होता है कि जो भी परिस्थिति होती है, परिस्थिति को हम दोष देने लगते हैं, तो हम असहाय हो जाते हैं। पर अगर हम भगवान से प्रार्थना करते हैं, और कुछ मार्ग निकालने का प्रयास करते हैं, तो मार्ग निकल जाता है। मार्ग कैसे निकलेगा, वो कई बार हमें पहले से पता नहीं होता है।
तो जब वो मेरी क्रचेस तोड़ने आ रहे थे, तो मुझे पता नहीं था कि क्या करना है। पर भगवान से प्रार्थना की, भगवान सर्वव्यापी हैं। तो तभी वही भगवान उस सिक्योरिटी इंचार्ज के हृदय में और उसके बॉस के हृदय में भी थे। वो बॉस बराबर वहाँ पर आ गया और उसने उसको बोला, “मैं सँभाल लूँगा।”
तो भगवान का क्या मार्ग है, उनकी क्या योजना है, कई बार यह हमें पता नहीं होती है। पर इसका मतलब यह नहीं है कि भगवान की योजना नहीं है; भगवान की योजना ज़रूर होती है। और हमको सहन करना है, प्रतिकार करना है, या दूर जाना है—कभी-कभी यह तीनों जो मार्ग हैं, एक तरह से यह भौतिक पर्याय हैं कि यह करना है, यह करना है या यह करना है। पर सबसे महत्वपूर्ण क्या है? आध्यात्मिक पर्याय चुनना है।
आध्यात्मिक पर्याय मतलब क्या है? कि हे भगवान, मैं आपका सेवक हूँ, मैं आपकी सेवा करना चाहता हूँ। मैं आपकी सेवा कैसे कर सकता हूँ? इस परिस्थिति में मैं क्या कर सकता हूँ? जब सबसे पहले हम यह आध्यात्मिक पर्याय चुन लेते हैं कि ‘हे भगवान, मैं आपका सेवक हूँ, आपकी सेवा कैसे कर सकता हूँ?’, तो जब यह आध्यात्मिक पर्याय हम चुन लेते हैं, तो फिर उससे हमें आंतरिक रूप से शांति और सुरक्षा महसूस होती है।
क्योंकि हम तो शाश्वत रूप से, इस दुनिया में जो भी हो जाये, भगवान के सेवक हैं। हम आत्मा हैं, आत्मा अविनाशी है, आत्मा शाश्वत रूप से भगवान की सेवक है। ‘जीवेर स्वरूप हय कृष्णेर नित्य दास’—यह विश्वास कर लेने पर फिर कोई दुःख नहीं है। दुःख नहीं है का मतलब ऐसा नहीं कि दुःख चले जाएँगे, पर उसका मतलब यह है कि जो भी दुःख या समस्याएँ आएँगी, उनमें से हमें मार्ग मिल जाएगा। वो जो दुःख है, उसको हम अपने मन के विचारों से और बढ़ाएँगे नहीं।
सबसे पहले जब हम आध्यात्मिक पर्याय चुन लेते हैं, फिर उसके बाद सेवा भाव रखते हुए हम चुनाव कर सकते हैं कि यह करना है, यह करना है या यह करना है। तो जब हम सेवा भाव का चुनाव पहले कर लेते हैं कि ‘भगवान मैं आपका सेवक हूँ’, तो उससे एक शांति मिलती है। उससे हम शांत रूप से विचार कर सकते हैं। नहीं तो, शांत रूप से विचार करना ही नामुमकिन हो जाता है, और फिर जो हम कार्य करते हैं, उससे ही समस्या और बढ़ जाती है।
भगवान बताते हैं: ‘मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि’। अगर आप मेरा स्मरण करते हो, आप मेरी चेतना में रहते हो, तो जो भी समस्या आएगी, आप उसके पार जा सकते हो। अब कौन सी समस्या कैसे आएगी, कौन सी समस्या के पार हम कैसे जाएँगे, यह हम पहले से नहीं जानते हैं। क्योंकि हमारी योजना—हम जो योजना बनाते हैं, और भगवान जो योजना बनाते हैं, उनमें फ़र्क होता है। फ़र्क क्या है? हम वर्तमान (present) को देखते हैं। और दैव मतलब जो हमारे हाथ में नहीं है उसके बारे में विचार करें। उसी को हम दैव बोलते हैं।
दैव और भगवान की शरण
तो जो दैव है, दैव के अधिष्ठाता वास्तव में जो हैं, वो भगवान हैं। जब पांडवों और कौरवों में युद्ध चल रहा होता है, तो दसवें दिन भीष्म पितामह गिर जाते हैं। तो उसके बाद कौरवों का अगला सेनापति कौन बनेगा, इस पर बहुत चर्चा होती है। दस दिन तक जब भीष्म सेनापति होते हैं, तब तक कर्ण कहता है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा। तो ग्यारहवें दिन कर्ण युद्ध में, रणभूमि में उतर जाता है।
तो अभी सबको लगता है कि कर्ण को ही दुर्योधन अपना सेनापति बना देगा क्योंकि कर्ण उसका बहुत प्रिय मित्र होता है। पर कर्ण कहता है कि आपकी सेना में मुझसे बड़े बहुत लोग हैं, और ख़ास करके जो द्रोण हैं, वो तुम्हारे गुरु हैं और तुम उनको सेनापति बनाओ। वो उम्र में बड़े हैं, अनुभव में बड़े हैं, शक्तिशाली हैं और तुम्हारे लिए युद्ध किया है।
जब द्रोण को सेनापति का पद मिलता है, तो द्रोण को बड़ी प्रसन्नता होती है। वह कहते हैं कि तुमने मुझे आदर दिया है, मैं तुम्हारे लिए कुछ करना चाहता हूँ। तुम मुझसे कुछ वर मांगो। दुर्योधन जानता था कि द्रोण प्रसन्न हो गए हैं और कुछ वर ज़रूर देंगे, तो उसने भी एक योजना मांगी।
तो द्रोण की आँखें बड़ी हो गईं, कि युधिष्ठिर इतना अजातशत्रु है कि तुम भी उसकी स्तुति करते हो, तुम उसको ज़िंदा गिरफ्तार करना चाहते हो? तो द्रोण कहते हैं कि इन दस दिन के युद्ध से मैं समझ गया हूँ कि यह भीम और अर्जुन इतने शक्तिशाली हैं कि इस युद्ध में हम जीत नहीं सकते हैं।
तो दुर्योधन कहता है कि मेरी योजना यह है कि अगर आप युधिष्ठिर को गिरफ्तार करके लेकर आ जाओगे, तो फिर मैं युधिष्ठिर को पुनः जुआ खेलने के लिए चुनौती दूँगा। और उसको जुए में हरा के वापस पुनः बारह साल वनवास भेज दूँगा। और फिर उस समय में अपनी सेना को और शक्तिशाली बनाऊँगा, फिर उसके बाद में मैं उनको हराऊँगा।
तो द्रोणाचार्य को समझ में आ गया कि तुम कभी सुधरोगे नहीं। तो वो कहते हैं कि मैं यह वरदान दूँगा, पर अर्जुन युवा है और उसने काफ़ी तपस्या करके दैवीय अस्त्र भी प्राप्त किए हैं। इसलिए अगर अर्जुन मेरे रास्ते के बीच में आएगा, तो मैं युधिष्ठिर को पकड़ नहीं पाऊँगा।
तो फिर तभी त्रिगर्त नाम के राजा होते हैं, सुशर्मा। उनकी सेना अर्जुन को युद्ध के लिए दूर ले जाती है, ताकि द्रोणाचार्य युधिष्ठिर को पकड़ सकें। पर भगवान कृष्ण अपनी माया से अर्जुन को वापस ले आते हैं। दैव का द्वार होता है और दैव के स्वामी जो हैं, वो अर्जुन के रथ पर हैं। इसलिए कौरव विवश हो जाते हैं। तो यहाँ पर यह महत्वपूर्ण बात है कि हमने कर्मवाद देखा, दैववाद देखा, पर दैव के परे दैव के स्वामी भगवान हैं।
तो अभी भगवद्गीता के अंत में क्या है? ‘यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः’। मतलब अर्जुन ने धनुष उठा लिया है युद्ध करने के लिए, मतलब वो अपना कर्म करने के लिए तत्पर है। पर वो केवल भौतिक स्तर पर कर्म नहीं कर रहा है, भगवान की सेवा में कर्म कर रहा है। ‘करिष्ये वचनं तव’। वो भक्ति में सेवा कर रहा है, अर्जुन।
और फिर कृष्ण, जो दैव के स्वामी हैं, वो उनके साथ हैं। जब कृष्ण और अर्जुन साथ में आ जाते हैं, तो तभी वहाँ पर यश अनिवार्य है, ज़रूर आएगा ही, विजय वहीं पे होगी।
दृढ़ संकल्प से कृष्ण भावना में स्थित होना
उसी तरह से, अब जैसे अर्जुन और कृष्ण एक रथ पर थे, हमारा शरीर भी एक रथ के समान है। और हमारे शरीर में हम आत्मा जो हैं, वो अर्जुन के समान हैं। और हम सब के शरीर में भगवान स्वयं परमात्मा के रूप में विराजमान हैं। तो इसलिए अगर हम दृढ़ संकल्प से भगवान की सेवा में लग जाते हैं, तो कितनी भी बड़ी समस्याएँ क्यों न आएँ, भगवान की योजना से हमें आगे का मार्ग मिल जाएगा।
अर्जुन को पहले से पता नहीं था कि कौन से योद्धाओं से कैसा युद्ध होगा, कैसे उनकी विजय होगी। पर वो दृढ़ संकल्प से आगे जाते रहे और अंत में उनकी विजय हो गई। उसी तरह से हमारे जीवन में आज क्या समस्या है, उसका क्या हल है, कल क्या समस्या आने वाली है, उसका क्या हल होने वाला है, वह सब हमको शायद अभी पता नहीं हो सकता है।
और कभी-कभी हम थोड़ा विचार करते हैं, फिर भी पता नहीं चलता है। पर अगर हम दृढ़ संकल्प से भगवान की सेवा करने का संकल्प लेते हैं, तो फिर अनेक विकल्पों में से कौन सा चुनना है, उसका मार्गदर्शन मिल जाएगा और हम अपनी परिस्थिति में आगे बढ़ सकेंगे।
अगर कोई हमें परेशान कर रहा है तो वह सत्य है, वो परेशान कर भी रहे हैं हमको। उसको एक व्यावहारिक रूप में हमें कुछ हल करना है। कुछ उसका प्रतिकार करना है, हमको सहन करना है, या उससे दूर जाना है, जो भी करना है वो करना है। पर महत्वपूर्ण क्या है? महत्वपूर्ण यह है कि हम कृष्ण भावना में बने रहें, जिसके लिए हम प्रतिकार कर रहे हैं।
मेरा सनातन संबंध भगवान के साथ है, तो मैं कृष्ण भावना में रहना चाहता हूँ, इस दिव्य चेतना में रहना चाहता हूँ। और जब हम जितना कृष्ण भावना में आ जाएँगे, उतना जो भी समस्या आ जाएगी, हमको सहन करने की शक्ति मिल जाएगी। और न केवल हम वो समस्या को सहन करेंगे, बल्कि उसके साथ-साथ भगवान के करीब भी जाएँगे। और जितना हम भगवान के करीब जाते हैं, उतना हम सब समस्याओं से मुक्त हो जाते हैं।
सारांश: कर्मवाद और दैववाद की वास्तविकता
तो सारांश में आज हमने चर्चा की कि किस तरह से जब हमारे जीवन में कोई हमें परेशान करता है, तो उसको दोष देने की वृत्ति से हम कैसे पार पा सकते हैं। तो ऐसी विपरीत परिस्थितियां जब आती हैं, उसको समझने के लिए और उसमें हम क्या कर सकते हैं, यह समझने के लिए हमने दो विचारधाराएँ देखीं।
एक है कर्मवाद, और एक दैववाद। दैववाद कहता है कि सब कुछ दैव द्वारा निर्धारित है, कुछ भी हमारे हाथ में नहीं है। तो उससे व्यक्ति जो कर सकते हैं, वो भी नहीं करते हैं। उसका मैंने दक्षिण अमेरिका का उदाहरण दिया, कि वो जो ट्राइब (tribe) थी, जो जाति थी, उन्होंने एक घोड़े को अमावस्या की रात को आते देखकर, खुद ही अपने शस्त्र छोड़ दिए और हार मान ली।
तो ऐसा दैववाद जो है, वो गलत है, क्योंकि उसमें हम खुद की ज़िम्मेदारी नहीं ले रहे हैं। और शास्त्र भी कहते हैं कि यह करो, वो मत करो, मतलब हमारे पास स्वेच्छा ज़रूर है।
और उसके विपरीत दूसरा है कर्मवाद, मतलब सब कुछ हमारे हाथ में है, मैं मेहनत करूँगा तो मैं यशस्वी होऊँगा। पर यह भी पूर्ण सत्य नहीं है, क्योंकि कई चीज़ें ऐसी होती हैं जो हमारे हाथ में नहीं हैं। क्रिकेट मैच में भले प्लेयर (player) बहुत अच्छे से खेलें, पर अगर बारिश आ जाएगी, तो वो जीत नहीं सकते हैं। तो कुछ चीज़ें हमारी परिस्थिति के परे भी हैं।
कर्म, दैव और काल का समन्वय
तो सत्य क्या है? कर्म, दैव और काल, ये तीनों जब साथ में आते हैं, तो फिर हमें फल मिलता है। तो खेती करना और संतान उत्पत्ति करना, ये उदाहरण दिखा रहे हैं।
संबंधों में इसका क्या महत्व है? हमारे जीवन में संबंधों के लिए क्या महत्व है कि किस तरह से कोई हमें परेशान कर रहा है? तो वो व्यक्ति हमारे जीवन में आ गया है, वो भले दैव से हो सकता है, या हमने कुछ गलती की है उसके कारण आ गया है, वो कर्म से हो सकता है। तो हमें देखना क्या है? कि मुझे मेरे धर्म, मेरे धर्म के मार्ग में रहने के लिए, मुझे क्या करना है।
तो ऐसी परेशानी में हमारे पास तीन मार्ग होते हैं—सहन करो, प्रतिकार करो या दूर चले जाओ (Tolerate, Mitigate, Emigrate)। इसका फैसला कैसे करते हैं? क्या हमारा जीवन में महत्वपूर्ण कार्य है और उसमें यह व्यक्ति कितनी बाधा डाल रहा है?
शारीरिक और मानसिक दर्द की तुलना
अगर कोई एथलीट है, कोई खिलाड़ी है, वो यह नहीं सोच सकता कि ‘मेरे शरीर में कहीं भी, कभी भी, कुछ भी दर्द नहीं हो, मैं पूरा 100% फिट रहूँ।’ ऐसा होना लगभग नामुमकिन है। पर थोड़ा सा दर्द है, तो उसको सहन करते हैं। अगर बहुत ज़्यादा दर्द है, तो फिर ट्रीटमेंट लेना पड़ेगा। तो जो शारीरिक स्तर पर होता है, वो मानसिक स्तर पर भी हम देख सकते हैं, भावनाओं के स्तर पर भी।
तो जो व्यक्ति जो भी कर रहा है, वो एक बार करता है, पर उसको बार-बार रिप्ले करके खुद को और दुखी बनाने की ज़रूरत नहीं है। ठीक है, उसने कुछ कर दिया, चलो आगे चलो अभी।
जैसे अगर हम जा रहे हैं ट्रेन में, कोई हमको ढकेलने लगता है, तो बाजू हो जाओ। पर अगर वो गाड़ी से बाहर ढकेलने लगता है, तो प्रतिकार करना पड़ता है। तो उस व्यक्ति से कितनी परेशानी हमें हो रही है, उसकी मात्रा हमें समझनी चाहिए, और उसके बाद में एक उचित मार्ग चुनना है।
सेवा भाव: भौतिक बनाम आध्यात्मिक पर्याय
तीनों पर्याय कभी-कभी उचित हो सकते हैं—कभी सहन करना, कभी प्रतिकार करना, कभी वहाँ से चले जाना। अलग-अलग पर्याय से हर एक उचित हो सकता है। पर कौन सा उचित है, यह समझने के लिए हमें सिर्फ इन तीन पर्यायों में से चुनना नहीं है, सबसे पहले मानसिकता जो है, उसको बदलना है।
भौतिक पर्याय मतलब ‘मैं नियंत्रक हूँ’, वो भाव है। और आध्यात्मिक चेतना मतलब ‘मैं सेवक हूँ’। जब हम वो पर्याय चुन लेते हैं कि ‘मैं सेवक हूँ, भगवान का सेवक हूँ, मुझे भगवान की सेवा कैसे करनी है?’ उस भाव से जब हम कार्य करने लगते हैं, तो फिर ‘ददामि बुद्धियोगं तं’—भगवान हमें मार्गदर्शन देते हैं कि उस परिस्थिति से हम कैसे बाहर आएँ।
तो कभी-कभी वो परिस्थिति क्यों आ रही है, समझ में नहीं आता है हमको। पर हम जोड़ते हैं कि ‘मैं क्या कर सकता हूँ उस परिस्थिति में?’ जिस हद तक हम सेवा भाव रखते हैं, तो भगवान की योजना भले ही अभी समझ में नहीं आ रही है, पर हमारे हाथ में हमारा कर्म करना है। जो दैव है, वो हमारे हाथ में नहीं है, पर दैव के स्वामी भगवान कृष्ण हैं।
इसलिए हम हमारा कर्तव्य सेवा भाव में अगर करते हैं, अगर भगवान की चेतना में रहते हैं, तो जो भी समस्या आएगी, उससे हमें मार्ग मिल जाएगा। जो व्यक्ति हमें परेशान कर रहा है, अगर हम कृष्ण भावना में, कृष्ण की चेतना में रहते हैं, तो फिर न केवल उस परिस्थिति का हम सामना कर सकते हैं, पर उस परिस्थिति के दौरान भी हम भगवान की भक्ति में विराजमान रह सकते हैं।
प्रवचन के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।
प्रश्नोत्तर सत्र (Q&A)
प्रश्न: आपने कहा कि दैव जो हमारे साथ कर्म करता है, तो ऐसा भी कहा जाता है कि भगवान की इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता है। तो इस पर क्या कहना है?
उत्तर: अच्छा, कि भगवान की इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता है। वास्तव में जो आचार्य इसके लिए कहते हैं, वह है कि भगवान के सैंक्शन (Sanction) के बिना, भगवान की अनुमति के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता है। ऐसा नहीं है कि सब कुछ भगवान की इच्छा से ही हिलता है।
अभी दुर्योधन जब पांडवों पर अत्याचार कर रहा था, क्या भगवान की इच्छा थी कि दुर्योधन ऐसे करे? क्या भगवान की इच्छा थी कि दुशासन द्रौपदी का अपमान करे? क्या भगवान स्वयं दुर्योधन के सामने गए थे और शांति की याचना कर रहे थे, शांति का प्रस्ताव रख रहे थे, और दुर्योधन ‘नहीं’ बोलता है? तो क्या भगवान की इच्छा थी कि दुर्योधन ‘नहीं’ बोले? तो फिर भगवान वहाँ गए ही क्यों थे?
इसलिए क्या है कि इस दुनिया में सबको भगवान ने स्वेच्छा दी है। और स्वेच्छा का मतलब है कि वो व्यक्ति अपनी स्वेच्छा का उपयोग कर सकता है और दुरुपयोग भी कर सकता है। और यह क्षमता उस व्यक्ति को दी गई है।
स्वेच्छा (Free Will) और स्वतंत्रता (Freedom) का दायरा
अभी किस हद तक वो दुरुपयोग कर सकता है और किस हद तक वो उपयोग कर सकता है? वो हमारे हर एक का क्षेत्र होता है। अभी क्षेत्र की संकल्पना समझना महत्वपूर्ण है।
प्रभुपाद जी उदाहरण देते हैं कि अगर कोई कुत्ता है, उसका मालिक है और कुत्ते को बाहर घुमाने के लिए ले जाते हैं। तो जब वो सुबह जाते हैं, कुत्ते को एक लीश (leash) पर डालते हैं, रस्सी होती है, उसके गले में बाँधते हैं और वो कुत्ते को ले जाते हैं। कुछ-कुछ लोग रस्सी बाँधते हैं वो लंबी होती है, कुछ छोटी रस्सी होती है। और फिर वो रस्सी जितनी लंबी है, उतने दायरे में कुत्ता घूम सकता है। यहाँ जा सकता है, उधर जा सकता है, यह देख सकता है, वो देख सकता है, और वो कुत्ते को लग सकता है कि मैं स्वतंत्र हूँ।
अगर वो कुत्ता रास्ते से बाजू में जाकर किसी जानवर को देखता है, उसका पीछा करने लगता है, या उधर उसको कुछ फल दिखेगा, फूल दिखेगा, उसके पीछे जा सकता है। पर जैसे ही मालिक बोलता है कि “मुझे यहाँ जाना है”, कुत्ता हवा में कूद रहा होगा और मालिक खींच देगा, तो वो हवा के बीच में ही खिंच जाएगा।
तो जितनी वो कुत्ते की रस्सी है, उतने दायरे में उसको स्वतंत्रता है। और उसमें जब तक मालिक चाहता है, वो जो भी करना चाहता है, कर सकता है।
तो उसी तरह से हम सबके जीवन में हमें हमारे पूर्व कर्म से कुछ क्षेत्र मिला है। तो क्या है? एक है फ्री विल (Free Will – स्वेच्छा) और दूसरा है फ्रीडम (Freedom – स्वतंत्रता)।
स्वेच्छा यह सबको है, पर फ्रीडम मतलब स्वतंत्रता।
अभी कोई कैदी है, कैदी के पास भी स्वेच्छा है पर कैदी के पास स्वतंत्रता नहीं है। स्वेच्छा मतलब अंदर से हमारी इच्छा का चुनना। स्वतंत्रता मतलब बाहर से उस इच्छा पर हम कितना कार्य कर सकते हैं।
तो अलग-अलग लोगों को अलग-अलग मात्रा तक क्षेत्र दिया गया है। और उस क्षेत्र में वो अपनी स्वतंत्रता का इस्तेमाल कर सकते हैं।
हिटलर का उदाहरण और भगवान की ज़िम्मेदारी
अभी मान लीजिए कोई बड़ा राजा था, जैसे पाश्चात्य देशों में हिटलर (Hitler) था। हिटलर ने करोड़ों यहूदी लोगों को मार डाला, बहुत से लोगों पर उसने अत्याचार किए। तो अभी हिटलर को उसके पूर्व कर्मों से कह सकते हैं कि उसको एक बड़ा क्षेत्र मिल गया था।
अभी उस क्षेत्र में क्या करना है, क्या नहीं करना है, वह उसकी अपनी स्वेच्छा पर निर्भर था। उसका ऐसा पूर्व कर्म था कि वह अनेक लोगों के मन पर प्रभाव कर सकता था, ओजस्वी वक्ता था, उसमें नेता के गुण थे। पर उस सब का उसने दुरुपयोग किया।
तो अभी उसके क्षेत्र में जो भी लोग थे, उन पर उसने काफ़ी अत्याचार किया। तो वो जो लोगों पर अत्याचार हुआ, वो अत्याचार हो, यह भगवान की इच्छा नहीं थी। यह उसकी इच्छा थी। और क्योंकि उसको उसके कर्म के अनुसार उतना क्षेत्र मिल गया था, तो उस क्षेत्र में जो लोग आ गए, उनको अत्याचार सहन करना पड़ा।
तो इसका मतलब यह है कि व्यक्ति जो होते हैं, उनके क्षेत्र में जो वे करना चाहते हैं उसके लिए वो ज़िम्मेदार हैं, भगवान ज़िम्मेदार नहीं हैं।
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥
भगवान भगवद्गीता के पाँचवें अध्याय के 14वें-15वें श्लोक में बोलते हैं कि भगवान ज़िम्मेदार नहीं हैं। तो ऐसा नहीं है कि जो भी हो रहा है वह भगवान की इच्छा ही है। भगवान की योजना में ज़रूर सब कुछ है, पर सब कुछ भगवान की इच्छा है—ऐसा नहीं है।
प्रश्न: भक्तों के समाज में देखा जाता है कि अन्य भक्तों के जीवन में क्या चल रहा है, उसमें बहुत ज़्यादा रुचि रहती है। क्या कमाते हैं, जीवन में क्या हो रहा है… यह एक आदत बन जाती है। तो इसको क्या करें?
उत्तर: वास्तव में क्या है कि भक्तों का संग मतलब, भक्तों के संग में हम भगवान का स्मरण करें, वह ज़रूरी है। अगर भगवान का स्मरण नहीं कर रहे हैं, तो हम भक्तों के संग में हैं, पर उस संग से हम शायद भक्ति में प्रगति नहीं करेंगे।
अगर कोई परिवार है, उसमें पति, पत्नी, बच्चे सब भक्त हैं, तो कह सकते हैं, ‘हम तो 24 घंटे भक्तों के संग में रहते हैं, हमको मंदिर में आने की ज़रूरत क्या है?’ नहीं, मंदिर में आने की ज़रूरत है।
और फिर उसमें आध्यात्मिक भगवान का संवाद है, भगवान का केंद्र कितना रहता है, वो भी देखना है। यहाँ तक कि अगर हम भक्तों के संग में भी रह रहे हैं, अगर हम सिर्फ भौतिक चर्चा कर रहे हैं, तो प्रगति नहीं होगी। प्रभुपाद जी ने संस्था का नाम जो दिया है, वह है ‘अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ’ (ISKCON)। वो कृष्णभावनामृत संघ है, वो कृष्णकार्य संघ नहीं है।
भले ही हम भगवान की सेवा कर रहे हैं, पर भगवान की चेतना में रहना है, भगवान की भावना में रहना है। तो इसलिए, कम से कम कुछ तो ऐसा समय हमारे जीवन में होना चाहिए, जब हम कृष्ण कथा के लिए बात करते हैं।
तो अगर शरीर के साथ कुछ हुआ है, परिवार के साथ कुछ हुआ है, मन के साथ कुछ हुआ है, तो फिर अगर हम वो जानकारी प्राप्त करके कुछ मदद कर सकते हैं, कुछ सहानुभूति दिखा सकते हैं, कुछ सेवा कर सकते हैं, तो वो जानना गलत नहीं है। पर वो क्यों जान रहे हैं, वो भी देखना ज़रूरी है।
अगर दूसरों के जीवन में क्या समस्या आ रही है, यह देखकर हमारे मन में भाव है कि “ठीक है, मैं उनकी कुछ मदद कर सकता हूँ”, तो ठीक है। पर क्या भाव यह है कि, “अच्छा! यह भक्त कितना गर्व कर रहा था, अभी देखो, वो भी नीचे आ गया है”? तो अगर हम उसके दुखों को देखकर सुख महसूस कर रहे हैं, या सिर्फ हम एक भौतिक प्रजल्प कर रहे हैं, तो फिर वो किस चेतना में कर रहे हैं, वो भी ज़रूरी है।
संग का चुनाव और प्रगति का मार्ग
कभी-कभी हम जिस कम्युनिटी (community) या समाज में रह रहे हैं, उसमें क्या हो रहा है, यह जानना भी ज़रूरी है। थोड़ी सतर्कता ज़रूरी है, पर महत्वपूर्ण क्या है? सेवा भाव है। तो भक्तों के संग में, अगर सेवा भाव रहता है कि ‘मैं भक्तों की सेवा करने के लिए आया हूँ, मुझे भगवान की सेवा करनी है’, तो उसलिए अगर हम बातचीत करते हैं, तो फिर वो गलत नहीं है।
मतलब यह है कि कुछ तो समय ऐसा होना चाहिए कि कृष्ण के बारे में ही चर्चा हो, भक्तों के संग में सिर्फ बाकी चीज़ों की चर्चा नहीं होनी चाहिए।
दूसरा यह कि अगर हम भक्तों के जीवन के बारे में भी चर्चा कर रहे हैं, अगर वो सेवा भाव से कर रहे हैं कि ‘मैं कुछ मदद कर सकता हूँ या मैं कुछ सीख सकता हूँ, मैं कुछ योगदान कर सकता हूँ’, तो उस भाव से वो ठीक है।
और तीसरा यह कि वो जो हम कर रहे हैं, उससे हम दूसरों के जीवन से कोई भौतिक आनंद नहीं ले रहे हैं, पर आध्यात्मिक दृष्टि से उसको देख रहे हैं, तो ठीक है।
और अगर हम देखते हैं कि यह प्रजल्प बहुत ज़्यादा हो रहा है, तो फिर हमें क्या करना पड़ेगा? हमें ऐसे भक्तों का संग करना चाहिए जो हमसे आध्यात्मिक जीवन के बारे में बात करते हैं। मान लीजिए हमारे 5-6 भक्त मित्र हैं, उनमें से 3-4 ऐसी (भौतिक) बातें करते हैं, तो कम से कम 1-2 भक्त मित्र ऐसे होने चाहिए जिनसे हम आध्यात्मिक बात करते हों। तो उससे आध्यात्मिक चेतना बनी रहेगी।
सहन करना, प्रतिकार करना और दूर जाना (Tolerate, Mitigate, Emigrate)
सहन करने पर: ऐसा ज़रूरी नहीं है कि सहन करने से ही शुद्धिकरण होता है। अभी सहन करना अगर उससे हम भक्ति में प्रगति कर रहे हैं, तो शुद्धिकरण हो रहा है। प्रभुपाद जी जब भारत में प्रचार कर रहे थे, लोग गंभीरता से भक्ति नहीं ले रहे थे। कभी लोग आते, कभी सेवा करते, कभी नहीं करते। प्रभुपाद जी कह सकते थे कि “मैं कृष्ण कथा करूँगा, दीवार से शुद्धिकरण हो जाएगा।” पर सिर्फ शुद्धिकरण करना ही हमारा उद्देश्य नहीं है, सेवा करना भी हमारा उद्देश्य है। प्रभुपाद जी ने देखा कि भारत में रहकर मैं सेवा नहीं कर पाऊँगा, तो वे अमेरिका चले गए। हमें सिर्फ अपना शुद्धिकरण नहीं करना है, हमें योगदान भी करना है, सेवा भी करनी है।
प्रतिकार (Mitigate) पर: मिटिगेट करना मतलब एक्चुअल में हिंदी भाषा में इसका मतलब केवल ‘प्रतिकार’ नहीं है। मिटिगेट मतलब जो भी समस्या है, उसका हल करने के लिए कुछ व्यावहारिक कार्य करना। प्रतिकार करना मतलब हमेशा संघर्ष करना नहीं होता।
जैसे कई बार भक्तों को शारीरिक समस्या अभक्तों से ज़्यादा होती है। क्योंकि भक्त जो भी समस्या आती है, उसे शरीर का क्लेश मानकर सहन करने लगते हैं। पर थोड़ा सा प्रिकॉशन (precaution) ले लें, थोड़ा सा परिवर्तन कर लें, थोड़ा सा ध्यान दे लें, तो फिर वो समस्या काफ़ी हद तक कम हो सकती है। पर कई बार हम कुछ परिवर्तन कर लेते हैं, तो उससे व्यावहारिक रूप से कुछ इम्प्रूवमेंट (improvement) हो सकता है।
प्रभुपाद जी भी हमेशा ऐसे “सहन करो” नहीं बोला करते थे। प्रभुपाद जी ने जीबीसी (GBC) को बोला था, “Never let one moment pass without thinking about how you can improve.” (एक भी पल ऐसा न जाने दें जिसमें आप यह विचार न करें कि आप कृष्णभावनामृत को और अच्छा कैसे बना सकते हैं)। तो उसको इम्प्रूव (improve) करना, यह भी सेवा भाव से हम कर सकते हैं।
दूर जाने (Emigrate) पर: एमिग्रेट करने से हम कृष्ण भावना से दूर जा सकते हैं, पर ऐसा ज़रूरी नहीं है। कभी-कभी उसके ज़रिए आप कृष्ण भावना में प्रगति कर सकते हैं। एमिग्रेट मतलब भक्तों का संग छोड़ना नहीं है।
एमिग्रेट का मतलब यह है कि कभी-कभी कुछ भक्त होते हैं, उनकी विचारधारा अलग प्रकार की होती है। तो उस विचारधारा से हमारी विचारधारा जमती नहीं है, तो शायद उस परिस्थिति में हम प्रगति नहीं कर पाएँगे। ऐसा नहीं कि वो भक्त गलत है या हम गलत हैं।
रूप गोस्वामी भी कहते हैं कि हमें ‘सजातीयाशये स्निग्धे’ भगवद् भक्ति संग चाहिए। ऐसे भक्तों का संग चाहिए जिनकी विचारधारा हमारे समान है। अगर कोई भक्त है जिसको ग्रंथ वितरण करने में बहुत रुचि है, और दूसरे को शास्त्रों का अध्ययन करने में रुचि है, अगर ऐसे दो भक्त साथ में आएँगे तो दोनों में कुछ समान ढूँढना थोड़ा मुश्किल हो जाएगा।
पर जिसे ग्रंथ वितरण करने में रुचि है, वह अगर दूसरे ग्रंथ वितरण करने वाले भक्त के संग में रहेगा, तो सुखी रहेगा। और जिसे शास्त्रों का अध्ययन करने में रुचि है, वह अगर अध्ययन करने वाले भक्त के संग में रहेगा, तो दोनों प्रगति करेंगे।
तो इसलिए दूर जाना मतलब भक्तों के संग से दूर जाना नहीं है। इसका मतलब है कि उस परिस्थिति से या उस संबंध से थोड़ी दूरी करना, जिससे कि हम आगे प्रगति कर सकें। ऐसा नहीं है कि हमें भक्ति छोड़नी है। हमें प्रतिकार करना है, मतलब ऐसा नहीं है कि हमें संघर्ष ही करना है, उस परिस्थिति में थोड़ा सा कुछ एडजस्टमेंट (adjustment) कर लेंगे, उससे शायद काफी चीज़ें और इम्प्रूव (improve) हो सकती हैं, यदि हम सेवा भाव रखेंगे।
तो ऐसा नहीं है कि सेवा सिर्फ सहन करके ही कर सकते हैं, या सेवा सिर्फ दूर जाकर कर सकते हैं, या सिर्फ प्रतिकार करके कर सकते हैं। सेवा हर परिस्थिति में कर सकते हैं।
बहुत बहुत धन्यवाद। श्रील प्रभुपाद की जय!