Bring out the best within, not the beast within – Hindi
[Youth meeting at ISKCON, Sant Nagar, Delhi, India]
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Lecture Summary
1. हमारे अंदर की अच्छी और बुरी चीज़ें
- हमारे अंदर अच्छाई और बुराई दोनों मौजूद हैं। यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपने अंदर से क्या बाहर लाते हैं।
- हमारी पाँच ज्ञानेंद्रियाँ (आँख, नाक, कान, जिह्वा, त्वचा) बाहर से जानकारी एकत्र करके मन को भेजती हैं, जिसे देखकर आत्मा प्रतिक्रिया करती है।
2. मन: एक कंप्यूटर प्रोग्राम और आंतरिक कमेंटेटर
- मन एक कंप्यूटर के सॉफ्टवेयर की तरह है (शरीर हार्डवेयर है और आत्मा यूजर है)।
- मन हर परिस्थिति पर अपनी अंदरूनी टिप्पणी (कमेंट्री) देता रहता है। जब यह कमेंट्री नकारात्मक हो जाती है, तो व्यक्ति तनाव, अकेलेपन और निराशा में चला जाता है।
3. इच्छाशक्ति (Will Power) और पशु-स्तर में अंतर
- इंपल्स (प्रस्तावना) $\rightarrow$ रिस्पॉन्स (प्रतिक्रिया): मन से आने वाले प्रस्ताव और हमारी प्रतिक्रिया के बीच का समय अंतर ही हमारी इच्छाशक्ति (Will Power) है।
- जानवरों में यह अंतर नहीं होता (प्रस्ताव मिलते ही तुरंत प्रतिक्रिया)। मनुष्य अपने मन के गलत प्रस्तावों को ‘ना’ बोलना सीखकर सकारात्मक कार्य कर सकता है।
4. भगवद्गीता द्वारा मन का नियंत्रण
- मन चंचल है और भागेगा, लेकिन बुद्धि के द्वारा इसे बार-बार खींचकर आत्मा और भगवान् में लगाना चाहिए।
- भक्ति योग से मन शांत (Pacification) और शुद्ध (Purification) होता है, जिससे जो मन पहले शत्रु था, वह मित्र बन जाता है।
5. जीवन एक मैराथन है (प्रश्न-उत्तर का सार)
- सफलता एक दिशा है: संकल्प टूटने पर खुद को कोसने के बजाय प्रगति को देखना चाहिए। सफलता कोई एक मंजिल नहीं, सही दिशा में बढ़ना है।
- जीवन 100 किमी का मैराथन है: किसी एक असफलता पर थमना नहीं चाहिए। बड़ी पिक्चर (Big Picture) को समझकर आगे बढ़ते रहना चाहिए।
- कमियों को स्वीकारना: भूलने की आदत या अन्य कमियों पर निराश होने के बजाय डायरी, रिमाइंडर्स और सकारात्मक अभ्यास जैसे व्यावहारिक उपाय अपनाने चाहिए।
Full Transcription
हरे कृष्णा! आप सबका यहाँ आने के लिए धन्यवाद। आज हम इस विषय में चर्चा कर रहे हैं कि हम हमारे अंदर से क्या बाहर ला रहे हैं? हमें बेस्ट थिंग्स बाहर लाने हैं? हमें सबसे अच्छी चीज़ें, वे बाहर आ रही हैं या हमें बुरी चीज़ें, वे बाहर आ रही हैं?
एक दिन पहले मैं कनाडा में था और कनाडा में दो विभाग हैं—जो ईस्टर्न साइड है, वहाँ पर काफी कॉमर्स होता है।
और जो आत्मा है, वहाँ पाँच इंद्रियाँ हैं: आँख, नाक, कान, जिह्वा और त्वचा। और इन सब से जो जानकारी प्राप्त होती है, वह सब मन के पास होती है। और मन पर जो चित्र आता है, उसको आत्मा देखता है और उसको प्रतिक्रिया करता है कि ऐसे करना चाहिए, ऐसे नहीं करना चाहिए।
और फिर हमारी कर्म इंद्रियाँ हैं—दो हाथ हैं, दो पैर हैं, हमारी जिह्वा है, जिससे हम काम करते हैं, बोलते हैं। क्योंकि बोलना भी एक काम होता है, यह बोलने से हम काम करवाते हैं।
मन: एक कंप्यूटर प्रोग्राम की तरह
और फिर हमारे अंदर हमारा मन है और यह जो बोलते हैं, हमारे अंदर क्या हो रहा है, वह बहुत महत्वपूर्ण है। हमारे अंदर हमारा मन है, और यह मन जो है, वहाँ काफी हद तक एक प्रोग्राम और कंप्यूटर के समान है।
मैं मॉन्ट्रियल में था, वहाँ पर एक मेंटल हेल्थ केयर हॉस्पिटल है। वहाँ पर मेंटल हेल्थ केयर प्रोवाइडर्स जो थे, उनको मैं एक संवाद दे रहा था। मेंटल हेल्थ केयर हॉस्पिटल और मेंटल हेल्थ केयर सेंटर—उसको भारत में कुछ लोग कहते हैं “पागलखाना”, पर वास्तव में वह पागलखाना नहीं है। वास्तव में जो लोग होते हैं, काफी बुद्धिमान होते हैं।
तो वहाँ पर एक लेडी हैं, जो मेरे लिए मित्र बन गईं, वह सुसाइड प्रिवेंशन काउंसलर हैं। मतलब क्या? कि अगर कोई बहुत निराश हो गया है और आत्महत्या करने वाला है, तो उसके पहले वह फोन करता है उस नंबर पर कि “मैं आत्महत्या करने वाला हूँ।” और फिर ये जो सुसाइड प्रिवेंशन काउंसलर होते हैं, उनका काम होता है कि उस व्यक्ति को आत्महत्या करने से रोकें, कुछ प्रोत्साहन दें, कुछ बोले और उसके द्वारा उसको समझ में लाएँ।
तो मैं उनसे बात कर रहा था कि यह काफी टेंशन का काम होगा, क्योंकि अगर आप सही समय पर नहीं बोल पाए, तो व्यक्ति कदम उठा लेगा।
क्योंकि क्या होता है? अमेरिका में, पाश्चात्य देशों में, मेरी जानकारी से, बहुत अकेलापन है। बहुत अकेलापन है, क्योंकि People in the West are polite, but not personal. अगर बात करेंगे, तो बहुत अच्छे से बात करते हैं। अगर आप आगे जा रहे हो, कोई दरवाजा खोलता है, तो आगे… पर व्यक्तिगत परिस्थिति के करीब जाना नहीं चाहते—”तुम मेरे जीवन में दखलंदाजी मत करो, मैं तुम्हारे जीवन में दखलंदाजी नहीं करूँगा।” तो उसके कारण इन लोगों को बहुत अकेलापन होता है। और जो अकेलापन होता है… तो वास्तव में हम अकेले कभी नहीं होते।
अच्छा, उसके बाद उसने बोला कि ऐसे नहीं… और उसने जहर के रूप में स्लीपिंग पिल्स ले ली। आत्महत्या का, क्योंकि स्लीपिंग पिल्स का बहुत ज्यादा डोज ले गया, तो फिर बहुत ज्यादा डोज ले गया, तो फिर वहाँ कुछ बचता नहीं है। तो उसके बाद ज्यादा डोज ले गया, तो फिर बहुत ज्यादा डोज ले गया, तो फिर बहुत ज्यादा डोज ले गया, तो फिर बहुत ज्यादा डोज ले गया, तो फिर बहुत ज्यादा डोज ले गया, तो फिर बहुत ज्यादा डोज ले गया, तो फिर बहुत ज्यादा…
मन की अंदरूनी कमेंट्री
हर व्यक्ति के अंदर एक मन है और जो मन है, वह अपनी-अपनी कहानियाँ बताता रहता है। जब मन अपनी कहानी बताता है, तो किस परिस्थिति में वह क्या कहानी बता रहा है, इसकी कोई भविष्यवाणी नहीं कर सकता।
उसके लिए क्या हो गया था? क्या उस लड़के ने उसका फोन नहीं उठाया, तो उसने सोचा कि शायद वह लड़का मुझे प्यार नहीं करता है, मैं बॉयफ्रेंड मुझसे प्यार नहीं करता है, मुझे छोड़ देगा। शायद वह किसी और के साथ है, शायद मैं अकेली हो जाऊँगी। मेरे पहले भी रिश्ते जमे नहीं, भविष्य में रिश्ते जमे नहीं होंगे, हमेशा मैं अकेली ही रह जाऊँगी। मेरे सारे मित्र-सहेलियाँ होंगी, वे सब अच्छे संबंधों में रहेंगे, सुखी रहेंगे।
अगर हम भले ही क्रिकेट मैच देख रहे हैं, तो फिर उसके क्रिकेट मैच साथ-साथ सुनते हैं, तो क्या हो रहा है, वह समझ में आता है। क्रिकेट मैच साथ-साथ सुनते हैं, तो वह समझ में आता है। क्रिकेट मैच साथ-साथ सुनते हैं, क्रिकेट मैच साथ-साथ सुनते हैं, तो वह समझ में आता है। क्रिकेट मैच साथ-साथ सुनते हैं, क्रिकेट मैच साथ-साथ सुनते हैं…
तो अगर ऐसी परिस्थिति है कि जो खिलाड़ी हैं, प्रेक्षकों के बीच में होते हैं, पर बॉल लगे… ऐसी परिस्थिति है कि खिलाड़ी अच्छी बैटिंग कर रहा है, पर कमेंटेटर बोल रहा है कि “यह आउट होने वाला है, यह एक शॉट गलत हो गया, आउट हो गया, तो पूरा मैच हार जाएगा।” और जितना भी अच्छा खेलता है एक प्लेयर, कमेंटेटर क्या कर रहा है? उसको नकारात्मक ही बोलना है! तो उससे क्या होगा? न केवल कमेंट्री अलग दिशा में जा रही है, कमेंट्री उल्टी जा रही है। जैसे ऐसा कमेंटेटर वास्तव में कुछ मदद नहीं कर रहा है, हिंसा कर रहा है!
तो हमारे अंदर, हमारा मन है, कई बार इस प्रकार का कमेंटेटर बन जाता है। मन जो है, जो भी हो रहा है, उसकी कमेंट्री बन जाता है। अभी हम किसी से मिलते हैं—”यह एक नंबर का आलसी व्यक्ति है”, तो विवरण देखते हैं—”यह इतना अहंकारी है, हमेशा खुद के बारे में बात करते रहता है”, “यह भुलक्कड़ है, कितनी बार इसको याद दिलाते हैं, वह भूल जाता है।”
अभी तो इस तरह से, जो भी स्थिति में हम मिलते हैं या स्थिति में जाते हैं, मन हमारा कमेंट करते रहता है। पर एक-दो कमेंट बात अलग है, पर कभी कोई कमेंट देता है, कमेंट्री बनने लगती है—एक के बाद, एक के बाद, एक के बाद! तो मन जो इस तरह से कहानियाँ बताने लगता है, तो फिर उससे क्या होता है? व्यक्ति बहुत नकारात्मक महसूस करने लगता है।
मनोविज्ञान और अस्तित्व के तीन स्तर
तो अभी यह मन वास्तव में है क्या? मन जो है, मेरा विषय है साइकोलॉजी (Psychology)। Psyche मतलब मन। तो पहले, 150-200 साल पहले साइकोलॉजी की परिभाषा थी कि Logos मतलब पढ़ना है, ज्ञान, स्टडी—तो मन के बारे में पढ़ना है। पर अभी जो है, यह क्या बन गया है? साइकोलॉजी मतलब Study of Behavior (व्यवहार का अध्ययन करना)। क्यों? क्योंकि वे कहते हैं कि मन क्या है, हमको वैज्ञानिकों को पता ही नहीं है! हमारा दिमाग यहाँ पर है कहते हैं, पर मन यह क्या है?
पर हम मन सत्य में है, इसका अनुभव करते हैं हमसे। पर यह मन है क्या वास्तव में? तो भगवद्गीता बताती है कि हमारा जो अस्तित्व है, वह तीन स्तरों पर है—शरीर, मन और आत्मा।
इसको समझने के लिए हम कंप्यूटर का उदाहरण ले सकते हैं। कंप्यूटर का हार्डवेयर होता है, यह आपको दिख रहा है यह हार्डवेयर है। फिर इसमें एक सॉफ्टवेयर होता है। और सॉफ्टवेयर के परे कंप्यूटर को चलाने वाला यूजर होता है। जैसे हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और यूजर होता है, वैसे ही शरीर, मन और आत्मा हैं।
- शरीर किसके समान है? हार्डवेयर के समान।
- मन? सॉफ्टवेयर के समान।
- और आत्मा? यूजर है।
तो आजकल जो आधुनिक प्रगति हो रही है, उससे क्या हो रहा है? हार्डवेयर को हम अच्छा बनाते जा रहे हैं। पर हार्डवेयर को अच्छा बनाते हैं और अगर सॉफ्टवेयर करप्ट हो गया है, तो फिर सिर्फ हार्डवेयर अच्छा बनाने से वह मशीन काम, कंप्यूटर काम नहीं करने वाला।
So, हमारा जो सॉफ्टवेयर है, वह आजकल बहुत करप्ट हो गया है। पाश्चात्य देशों में सुविधाएँ बहुत हैं, और सुविधाएँ हैं और उसके साथ-साथ लोगों में मानसिक तनाव, मानसिक समस्याएँ बहुत हैं। हर चार व्यक्तियों में से… उनके वीडियो में… happy चांस करता है… हर फ्रेंड बताते हैं कि मानसिक बीमारियों की वजह से सिर्फ काउंसलिंग ही नहीं, पर एस्टैब्लिशमेंट की ज़रूरत पड़ेगी। लगभग हर बीस व्यक्तियों में से एक व्यक्ति के मन में आत्महत्या का विचार आता है। और आंकड़े बताते हैं कि साल में एक मिलियन लोग आत्महत्या करते हैं।
और एक मिलियन—इसका मतलब उसका अर्थ होता है कि हर 40 सेकंड में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है। हर 40 सेकंड में! इसका मतलब हो गया कि जब से प्रवचन चालू हुआ है, लगभग 25 से 30 लोगों ने आत्महत्या कर ली होगी।
और यह जो 1 मिलियन है, वास्तव में इतना बड़ा… इतनी बड़ी संख्या है कि जितने लोग आतंकवादियों के अटैक्स में साल भर में मरते हैं, कुछ गैंग वार्स में, मर्डर्स में मरते हैं, या अगर कोई एक्चुअल युद्ध नहीं चल रहा है पर बॉर्डर पर टेंशन है पूरी दुनिया भर में कहीं अलग-अलग देशों में, तो वे जो तीनों की संख्या मिलाकर जितने लोग मरते हैं, उससे ज्यादा लोग आत्महत्या से मरते हैं।
तो जितना हमारा मन सक्रिय हो जाएगा, उतना हमारे अंदर से ही बुराइयाँ आ जाएँगी—चिंता आ जाएगी, क्रोध आ जाएगा, और नकारात्मक वासनाएँ भी आने लगती हैं।
वासनाएँ, संस्कार और मन के प्रस्ताव
अभी एक और मानसिक स्तर की समस्या है—एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन, एडिक्शन!
हम अपनी इच्छाओं से संघर्ष करते हैं। मन इस तरह से इच्छाएँ उत्पन्न करता है कि हम उसके बाद गलत कार्य करने जाते हैं। कोई बचपन से, माँ के गर्भ से शराब की बोतल लेकर जन्म नहीं लेता है। बचपन से साधारण व्यक्ति ही थे। हाँ, उनके कुछ पूर्व जन्म के संस्कार हो सकते हैं। पर यह मन के कार्यों के कारण होता है—”एक बार पी लो, एक और बार पी लो।” पर जितना हम प्रस्ताव को स्वीकार करते हैं, उतना वह और प्रस्ताव करने लगता है।
मान लीजिए आपके पास फोन है। पर आपके फोन पर आप कुछ वेबसाइट पर जाते होंगे। शायद से कोई वेबसाइट bollywood.com पर जाता है, तो bollywood.com पर जाता है—यह क्या है, यह मूवी क्या है, यह एक्टर क्या कर रहा है, इनका क्या संबंध है, क्या चल रहा है?
पर बाद में, अगर वह आध्यात्मिक संबंध में आ जाता है और उसको पता चलता है कि भगवद्गीता है, बहुत अच्छा ज्ञान है, तो अपने ब्राउज़र में भगवद्गीता के लिए ‘B’ टाइप करता है। और ‘B’ टाइप करेगा तो क्या आ जाता है? ‘Bollywood’ आ जाता है! क्यों? क्योंकि पहले से सेलेक्ट किया है वह। जो हमने पहले सेलेक्ट किया है, तो कंप्यूटर का एक सॉफ्टवेयर होता है, जो हमने पहले सेलेक्ट किया है, जिंदगी में वह अपने आप सजेशन/प्रस्ताव में आ जाता है।
जो हम कार्य करते हैं, उससे हमारे मन पर छवि बन जाती है। और वह जो छवि बन जाती है मन पर, उससे उसी का प्रस्ताव आता है।
मान लीजिए यहाँ पर किसी का घर है, यहाँ पर किसी का दफ्तर है, बीच में एक शराब की दुकान है। दो व्यक्ति हैं। एक व्यक्ति शराब नहीं पीता, तो उसको दुकान समझ आती है, उसको दुकान पर ध्यान नहीं जाता। पर जिसने शराब पी है, तो क्या होता है? एक व्यक्ति में द्वंद्व है, दूसरे व्यक्ति में द्वंद्व नहीं है। क्यों? क्योंकि जो प्रस्ताव आया था, दूसरे व्यक्ति ने स्वीकार किया—”मैंने प्रस्ताव किया, पियो”, तो उसने पी लिया।
तो जो उसका फैसला जो होता है, जो हमने कार्य किए होते हैं उस भूतकाल में, तो वह ही अनुचित विचारधारा हमारे मन में आती रहती है। तो जब तक हम हमारे मन के अनुसार कार्य करते रहते हैं, तो हम क्या होते हैं? हम मानवों के स्तर पर नहीं, हम जानवरों के स्तर पर चले जाते हैं।
मानव और जानवर में अंतर: विल पावर (Will Power)
अभी मानवों और जानवरों का फर्क क्या है? अभी मान लीजिए एक बिल्ली और वह एक चूहे को देखते हैं। बिल्ली चूहे को देखती है, वह सोचती है—”हाँ, आज एकादशी है, मैं नहीं खाऊँगी”? बिल्ली सोचती भी नहीं है। जो भी अगर चूहा दिख गया, भूखी है, तो चूहे पर झपटेगी।
तो हम सब में क्या होता है, एक इंपल्स (Impulse) होता है। इंपल्स मतलब अंदर से कुछ प्रस्ताव होता है, कुछ प्रस्ताव होता है—”यह करो।” और उसका हमारा रिस्पॉन्स (Response) होता है, उसकी प्रतिक्रिया होती है—प्रस्तावना और प्रतिक्रिया।
और यह प्रस्तावना और प्रतिक्रिया, इन दोनों के बीच में जो अंतर है, वह है हमारा Will Power, वह है हमारा आत्म-संकल्प, वह है हमारा दृढ़ निश्चय!
तो जितना यह प्रस्तावना और प्रतिक्रिया, इन दोनों के बीच में जितना अंतर बड़ा है, उतना हमारा जो Will Power है, दृढ़ संकल्प है, वह अच्छा है। और इन दोनों के बीच में जितना कम है, उतना हमारा Will Power बहुत कम है।
तो जो एडिक्ट हो गए हैं, कोई शराबी हो गए हैं, तो उसको शराब दिख जाती है, तो उसको पीना ही है।
अपने लिए ऑस्कर वाइल्ड नाम का एक ब्रिटिश लेखक था, उसने कहा है कि: “सिगरेट छोड़ना दुनिया की सबसे आसान चीज़ है, मैंने अब तक सौ बार किया है!” सौ बार मैंने सिगरेट छोड़ दिया! सौ बार छोड़ने की ज़रूरत क्या है? एक बार छोड़ दिया सिगरेट को, पर सिगरेट ने उसे छोड़ नहीं दिया, पूरा पकड़ लिया। पहले पूरा पकड़ लिया, फिर पकड़ लिया…
तो क्या होता है? जब कुछ प्रस्तावना आती है, जितना हमने पहले ‘हाँ’ बोला है, उसको बाद में ‘ना’ बोलना उतना आसान नहीं होता है। यह प्रस्ताव और प्रतिक्रिया, इन दोनों में अंतर जितना कम हो जाता है, उतने हम परवश हो जाते हैं।
और जानवरों में यह अंतर लगभग नहीं होता है। जैसे भी प्रस्ताव आ गया, प्रतिक्रिया हो गई। और जानवर के स्तर पर यह लोग जीते हैं, उन्हें भी ऐसे ही होता है—जो भी देखा, यह वह खाना है, यह भोग करना है, यह वह करना है।
तो जितना हम… वास्तव में हमें कोई भी चीज़ सकारात्मक करनी है, हमारे जीवन में कोई भी अच्छी चीज़ करनी है—चाहे पढ़ाई करनी है, किसी को स्पोर्ट्स स्टार बनना है, किसी को म्यूजिशियन बनना है, कुछ भी फिल्म में जाना है—तो हर एक व्यक्ति को यह जो मन से प्रस्ताव आता है, उसको ‘ना’ बोलना सीखना होता है।
अगर किसी को क्रिकेटर बनना है, तो एक तरह से क्रिकेट का ग्लैमर जो होता है, वह अच्छा लगता है—”इतने सारे लोग मुझे खेलते हुए देखेंगे।” पर उसके लिए सालों-सालों तक प्रशिक्षण करना पड़ता है, अनुशासन (Discipline) रखना पड़ता है, वर्कआउट करना पड़ता है, ट्रेनिंग लेना पड़ता है, और वह इतना आसान नहीं है। और वह करने के लिए, वह क्रिकेटर को लगता है—”बहुत हो गया, हम आज नहीं करेंगे”, वह प्रस्ताव आता है मन से, नहीं, उसको ‘ना’ करना पड़ता है।
तो जिस हद तक, जो मन से प्रस्ताव आएँगे, उसको हम ‘ना’ बोल सकते हैं, सबसे तो समझें… यह मन से प्रस्ताव आएँ, उसको ‘हाँ’ बोलना ज़रूरी नहीं है। हम फिर जज करते हैं—”मैं नहीं करूँगा, क्योंकि मुझे कुछ और महत्वपूर्ण करना है।” जिस हद तक हम यह समझते हैं, उस हद तक हम हमारे जीवन में कुछ सकारात्मक कार्य कर सकते हैं। अगर हम जो मन की बात बोलते हैं, वही करते रहते हैं, तो फिर क्या होता है? हम जानवरों के समान बनने लगते हैं।
क्योंकि मन की बात जो बोलते हैं, हम जानवरों के समान बनने लगते हैं,
भगवद्गीता का मार्गदर्शन: मन को कैसे नियंत्रित करें?
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥
भगवान् कहते हैं कि आपका मन भागेगा—एक रोक रोक, आपका मन इधर जाएगा, उधर जाएगा, उधर जाएगा। जहाँ भी जाएगा, उसको आप अंदर लाओ, जहाँ जाएगा वापस लाओ।
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥
कि धीरे-धीरे मन को शांत करो। कैसे शांत करो? बुद्धि के द्वारा! बुद्धि के द्वारा उसको शांत करो।
अभी यहाँ क्या… इसका मतलब क्या है कि शांत करके क्या करना है? आत्मसंस्थं मनः कृत्वा—आत्मा पर केंद्रित करो। “मैं खुद कौन हूँ? मेरी सबसे महत्वपूर्ण चीज़ें क्या हैं?” उस पर जोर दें, उसको समझे, और उसके बाद…
जब तक हमारे अंदर का मन बहुत कार्यशील होता है, पर जब हम मन की बात सुनते रहते हैं, तब तक हमारे अंदर से हमारा जानवर आ जाएगा। एक गलती करेंगे, दूसरी गलती करेंगे, यह टाइम वेस्ट कर देंगे, वह टाइम वेस्ट कर देंगे।
अगर कल एग्जाम है और मन बोले—”एक वीडियो देख लो, एक और वीडियो देख लो”, और फिर छह घंटे बीत जाते हैं। क्या करेंगे? फिर एग्जाम देते हैं पर फेल हो जाते हैं। तो क्या होता है? फिर खुद को कोसने लगते हैं, खुद से नफरत करते हैं—”क्या बेवकूफ हूँ इसमें, क्यों वेस्ट कर दिया?” तो क्या हो गया इसमें? वह जो मन को अच्छा लगता है—”एक वीडियो देख लो, एक एड देख लो, एक इमेज देख लो”, इसमें करते-करते गए और क्या हो गया?
अगर हम भगवान् में मन लगाते हैं, तो मन शांत हो जाता है और मन शुद्ध हो जाता है—Pacification and Purification. मन जितना… यह होगा, यह होगा, यह होगा, क्या करूँगा मैं… शांत हो जाता है। भगवान् नियंत्रण में हैं, जो भी होगा भगवान् उसमें से अच्छा ही लेकर आएँगे, शांत हो जाता है।
और दूसरा है—शुद्ध हो जाता है। शुद्ध मतलब क्या? मन में यह जो होता है, यह वासना होती है—यह करना है, यह खाना है, यह देखना है, यह करना है… शुद्ध नहीं है, उन सब चीज़ों में सुख है, थोड़ा सा सुख है, वास्तव में असली सुख…
एक छात्र की प्रेरणादायक कथा
तो मैं वहाँ गया, तो बोला कि “अभी मैं समझा कि वास्तव में यह मेरी इच्छा नहीं थी कि आत्महत्या करूँ, यह मेरे मन का प्रस्ताव था कि आत्महत्या करो, आत्महत्या करो, आत्महत्या करो!” तो फिर मैं समझा कि… तो बोला कि यह आपके प्रस्ताव के लिए नहीं है।
तो बोला कि भगवद्गीता मैंने दी—”तो आपको भगवद्गीता पढ़ो, आप समझो।” मैं भगवद्गीता पर रोज एक लेक्चर देता हूँ—Nita Daily है मेरी वेबसाइट पर, nitadaily.com।
तो वहाँ पर उसने कहा कि पुणे में वैसे एक लेक्चर सुनने आया था। मैंने दो-तीन साल हो गया… तीन साल हो गया… कि मैं किसी लड़की से रिश्ते में था, और उसने अचानक ब्रेकअप कर दिया—”मैं तुमसे बात नहीं करना चाहती हूँ, मैं तुम्हारा फोन ब्लॉक करने वाली हूँ।”
तो जैसे ही वह हो गया, उसका दिमाग पूरा सुन्न हो गया। वह सीधा वहाँ से अपने कमरे में चला गया। कमरे में चला गया, उसने अपना दरवाजा बंद कर लिया, लॉक कर लिया, खिड़कियाँ बंद कर लीं, कर्टन्स थे, कर्टन्स डाल दिए, लाइट बंद कर दी।
और वह जो भक्ति में आ गया था, उसको कीर्तन के लिए चला गया, पर बाद में उसको पहले से म्यूजिक में रुचि थी, तो उसको हरे कृष्णा कीर्तन बहुत अच्छा लगता था। वह वायलिन बजाता था। तो पूरा अंधेरा कर लिया था, दरवाजा पूरा अंधेरा कर लिया था, तो उसको वायलिन बजाना था… तो उसको वायलिन बजाना था, तो उसको वायलिन बजाना था, तो उसको वायलिन बजाना था, तो उसको वायलिन बजाना था, तो उसको वायलिन बजाना था, तो उसको वायलिन बजाना था, पूरा अंधेरा कर लिया था, तो उसको वायलिन बजाना था, तो उसको वायलिन बजाना था, तो उसको वायलिन बजाना था, तो उसको वायलिन बजाना था, तो उसको वायलिन बजाना था, तो उसको वायलिन बजाना था, तो उसको वायलिन बजाना था, बजाना था… तो उसको वायलिन बजाना था, तो उसको वायलिन बजाना था, तो उसको वायलिन बजाना था, तो उसको वायलिन बजाना था, तो उसको वायलिन बजाना था, तो उसको वायलिन बजाना था, तो उसको वायलिन बजाना था, तो उसको वायलिन बजाना था…
और इसके कुछ दिनों बाद उसका एग्जाम था। वह बता रहा था कि पिछली बार जब उसका एग्जाम था, ऐसे ब्रेकअप होने के बाद, तो लगभग एक भी पेपर में क्लियर नहीं हुआ था, पर इस बार सब क्लियर हो गया! एक्चुअली, वह तो लगभग पूरे के ऊपर GPA मिल गया उसको, काफी अच्छी ग्रेड मिल गई उसको।
तो वास्तव में कैसे हो गया? क्योंकि अंदर जो मन था, मन के परे वह भक्ति की विधि से जा पाया। यह भक्ति की विधि केवल भगवान् को प्राप्त करने के लिए नहीं है—वह परम उद्देश्य है जरूर—पर केवल भगवत्प्राप्ति ही नहीं होती, उसके साथ आत्म-संकल्प बढ़ता है। और जो भी हम करना चाहते हैं, हम उसको बहुत सकारात्मक और रचनात्मक पद्धति से कर सकते हैं।
अर्जुन का धनुष और हमारा उत्साह
भगवद्गीता के अंत में भगवान् कहते हैं कि जो अर्जुन हैं, अर्जुन ने अपना धनुष उठा लिया है:
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥
भगवद्गीता के अंत में भगवान् कहते हैं कि जो अर्जुन हैं, अर्जुन ने अपना धनुष उठा लिया है। पहले अध्याय के 46वें श्लोक में उसने अपना धनुष-बाण छोड़ दिया था—”मैं युद्ध नहीं कर सकता।” पर भगवद्गीता के अंत में, यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः, अर्जुन ने अपना धनुष उठा लिया है।
तो अर्जुन का जो धनुष है, अर्जुन हम सबको रिप्रेजेंट करते हैं। और अर्जुन का जो धनुष है, वह है हमारा उत्साह (Enthusiasm), हमारा आत्मविश्वास, हमारा दृढ़ संकल्प! वह उसके धनुष के समान है।
जो मन कहता है—”छोड़ो इसको”, पर मन के परे आत्मा और परमात्मा के स्तर पर जब हम पहुँच जाते हैं, उनको समझ जाते हैं, उससे हम खुद को पहचानते हैं, तो पुनः धनुष उठा लेंगे। जो भी समस्या है, उसमें हम भगवान् से शक्ति प्राप्त करके, प्रेरणा लेकर प्रयास करते हैं। जैसे अर्जुन विजयी हो गए भगवद्गीता का संदेश श्रवण करके, उसका अनुशीलन करके, वैसे हम भी भगवद्गीता के संदेश के द्वारा अपने जीवन की किसी भी समस्या का सामना करके विजयी हो सकते हैं।
आज हमने चर्चा की कि किस प्रकार से हम अंदर से जो अच्छाई है, वह बाहर लाएँ, न कि बुराई बाहर लाएँ।
जैसे कोई माइनिंग कर रहा होता है, तो उसको वहाँ पर सोना-चाँदी, तेल चाहिए, पर वहाँ पर बिच्छू आ सकते हैं, जहरीले काट सकते हैं। तो हमारे अंदर भी क्या है? कुछ अच्छा है, कुछ बुरा है। तो जो बुरा है, वह कई बार हमारे मन से आता है।
तो मन क्या है, इसके बारे में हमने चर्चा की। कैसे हम दुनिया में वार्तालाप करते हैं—तो हम बाहर से जानकारी प्राप्त करते हैं ज्ञानेंद्रियों से, और बाहर कार्य करते हैं कर्मेंद्रियों से। पर ये दोनों हम डायरेक्टली कार्य नहीं करते हैं, वह मन पर आता है। और मन पर जो आ रहा है, उसको हम देखकर फिर कार्य करते हैं।
तो मन बाहर से जो जानना है, दुनिया की परिस्थिति है, उसको देख नहीं रहा है, मन उसके ऊपर कमेंट्री देते रहता है। तो इसलिए एक सत्य होता है, पर मन की कमेंट्री अलग ही हो सकती है। जैसे मैं क्रिकेट मैच का उदाहरण देता हूँ—कमेंटेटर एक मैच छोड़कर दूसरे मैच के बारे में बोल रहा है, कुछ पुराने मैच के बारे में। या प्लेयर अच्छे से बैटिंग कर रहा है, पर कमेंटेटर जो है, उसको बोल रहा है कि “होने वाला नहीं है, होने वाला नहीं है, होने वाला नहीं है।” इससे क्या होता है? वह प्लेयर हताश हो जाएगा।
तो हमारा मन कभी-कभी जो बाहर की परिस्थिति है, उससे कुछ अलग ही बोलने लगता है, कभी उससे विपरीत भी बोलने लगता है। तो उसके कारण मन जो ऐसे कमेंट्री करने लगता है, उससे छोटी चीज़ को हम बढ़ा सकते हैं। जैसे एक फोन कॉल का किसी ने जवाब नहीं दिया, इसलिए वह आत्महत्या करने के लिए लग जाता है! मन की कमेंट्री क्या होती है, किसी को पता नहीं होता है।
तो मन ऐसे कमेंट्री क्यों देता है? मन हमारा वैरी क्यों बन गया है? क्योंकि मन में हमने ही उस प्रकार के इम्प्रेशन्स (Impressions) डाले हैं। इसलिए किसी व्यक्ति का मन उसको शराब पीने का प्रस्ताव क्यों करता है? क्योंकि उसने पहले प्रस्ताव सुना है, पहले उसने शराब पी है। जिसने शराब पी ही नहीं है, उसको शराब की दुकान दिखेगी भी नहीं, वह आगे चला जाएगा।
तो जब हम मन के प्रस्तावों को बार-बार सुनते रहते हैं, तो फिर वह लगभग हम इतने विवश हो जाते हैं। हमारी स्वेच्छा है, जो हमारी इच्छाशक्ति है, जो हमारी विल पावर (Will Power) है, वह क्या है? मन का प्रस्ताव और हमारी प्रतिक्रिया—उन दोनों में जो अंतर है, उसमें हमारी स्वेच्छा है, उसमें हमारा विल पावर है।
तो जिस हद तक ये दोनों में अंतर बढ़ा सकते हैं, उतना हमारा विल पावर बढ़ेगा। जिस हद तक दोनों में अंतर कम हो जाएगा, उस हद तक हम जानवर के समान बन जाते हैं। जानवर को खाना दिख गया, बिल्ली को चूहा दिख गया, खा जाएगा उसको। तो जानवर के स्तर पर रहते हैं हम, तो हम कुछ भी अच्छा कार्य नहीं कर सकते हैं। जिसको स्पोर्ट्स प्लेयर भी बनना है, तो उसका मन बोलता है—”अब थक गया हूँ मैं, आज आधा प्रैक्टिस करता हूँ।” तो मन के प्रस्ताव को ‘ना’ बोलना यहाँ बहुत ज़रूरी है।
और उसको ‘ना’ कैसे बोल सकते हैं? अगर यह मन के परे जो आत्मा है, उसके स्तर पर हम रहते हैं। आत्मा जो है, दिव्य है।
तो क्या है कि जो शरीर है, वह हार्डवेयर के समान है, आत्मा यूजर है। तो अभी क्या है, पाश्चात्य अध्यात्म/विज्ञान की प्रगति के द्वारा हार्डवेयर अच्छा हो गया है, पर सॉफ्टवेयर करप्ट हो रहा है। तो सॉफ्टवेयर करप्ट हो रहा है, लोगों को डिप्रेशन है, एंग्जायटी डिसऑर्डर्स हैं, एडिक्शन है, इससे बड़े व्यथित हो रहे हैं लोग, आराम से दुख में हैं लोग।
तो इसके लिए हमें क्या करना है? अगर हम प्रसिद्ध नहीं हो रहे हैं, तो हमें समझना है कि “ठीक है, सॉफ्टवेयर तो करप्ट हो गया है, पर मैं यह सॉफ्टवेयर नहीं हूँ। सॉफ्टवेयर करप्ट हो, इसको मैं नहीं करूँगा, मैं मेरी बुद्धि से कार्य करूँगा।”
तो उस तरह से जब हम समझते हैं कि मन के प्रस्ताव को स्वीकार करना भी ज़रूरी नहीं है, तो कैसे हम प्रस्ताव को ‘ना’ बोल सकते हैं? आत्मा के स्तर पर स्थित होकर! आत्मा के स्तर पर स्थित होना, उसको योग कहते हैं। परमात्मा जो भगवान् हैं, उनसे संबंध जोड़ना सर्वोच्च योग है, उसको भक्ति योग कहते हैं।
भक्ति योग से जब हम खुद को भगवान् के स्तर पर स्थित कर देते हैं, तो फिर उससे हमारा मन क्या होता है? शांत और शुद्ध हो जाता है—Pacification and Purification. फिर इसके द्वारा जो मन शत्रु बन रहा था, वह मित्र बनने लगता है।
अब वह जो विद्यार्थी था, जो पहले आत्महत्या करने पर आ गया था… और हमारा टेम्परामेंट, अगर हम भक्ति करते हैं, मन को शांत और शुद्ध करते हैं, तो वह काफी अच्छा हो सकता है।
और जिससे अर्जुन हताश होकर धनुष नीचे रख देते हैं और गीता का संदेश सुनकर उठा लेते हैं, वैसे ही हम सब हमारा धनुष भी—जो हमारा दृढ़ संकल्प है, उत्साह है—जो हम नीचे रख देते हैं समस्याओं को देखकर मन की कमेंट्री के कारण कि “कुछ होने वाला नहीं है”, पर जब भगवान् के संदेश को सुनते हैं, तो हमारा उत्साह बड़ा हो जाता है। तो जब अर्जुन विजयी हो गए थे, इसलिए हम भी हमारी समस्याओं में विजयी हो सकते हैं। बहुत धन्यवाद! हरे कृष्णा!
प्रश्नोत्तर सत्र (Q&A)
प्रश्न 1: संकल्प कैसे पूरा करें?
श्रोता: “हरे कृष्णा प्रभुजी! मैं डेली सोचता हूँ कि सुबह 6 बजे उठूँगा…”
वक्ता: जब अर्जुन विजयी हो गए थे, इसलिए हमारी समस्याओं में… बहुत धन्यवाद, हरे कृष्णा!
श्रोता: “प्रभुजी, मैं डेली सोचता हूँ कि सुबह 6 बजे उठूँगा…”
वक्ता: संकल्प करते हैं, संकल्प करना अच्छा है। हमारी… उसके यश की परिभाषा क्या है, वह समझना भी ज़रूरी है। क्योंकि हम सोचते हैं कि “मैं अगर यह संकल्प पूरा किया, तो मैं यशस्वी हूँ, अगर नहीं किया, तो मैं अयशस्वी हो गया हूँ।”
यह एक गलत बात है। सेल्फ-इम्प्रूवमेंट में सक्सेस एक डेस्टिनेशन नहीं, सक्सेस एक डायरेक्शन (Direction) है। आत्म-परिवर्तन में जो यश होता है, वह एक गंतव्य नहीं है, वह दिशा है। उस दिशा में हमें आगे बढ़ते रहना है। कोई भी ऐसे नहीं कह सकता है कि “मैं परफेक्ट हो गया हूँ।” हमेशा हम इम्प्रूवमेंट कर सकते हैं।
तो अगर हफ्ते में दो या तीन दिन, या एक दिन भी आपने किया है, सुबह उठ गए, तो यह देखो कि उतना तो यशस्वी हुए! छह दिन नहीं हुआ, वह देखकर खुद को पीटने की ज़रूरत नहीं है। एक दिन यशस्वी हुआ, वह देखें तो सही कि मैं कर सकता हूँ, यह असंभव नहीं है। कम से कम एक दिन तो कर पाया हूँ। तो उससे हम खुद को प्रोत्साहन दे सकते हैं, यह पहली चीज़ है।
भले ही मैं ठीक है, 6 बजे नहीं उठा, सवा 6 बजे उठा, साढ़े 6 बजे उठा, 7 बजे उठा… 10 बजे उठता था मैं, 9 बजे उठता था मैं—तो क्या है, उसको सिर्फ हम खुद के यश के लिए एक स्टैंडर्ड रख सकते हैं। पर सिर्फ उस स्टैंडर्ड में पहुँचना ही यश नहीं है, उसकी दिशा में जाना भी यश है! क्या 8 बजे के बजाय मैं 7 बजे उठा हूँ, 7 बजे के बजाय मैं 6:30 बजे उठा हूँ, वह भी यश है!
क्या है कि धीरे-धीरे जब कोई बालक चलने लगता है पहले, थोड़ा गिरता है, तो उठने का प्रयास छोड़ देना, वह हार है—Falling down is not failure, failing to get up is failure. कि गिरकर उठना, यह स्वाभाविक है, जिससे हम इम्प्रूव करते हैं। यह पहली चीज़ है।
दूसरी चीज़ है कि मन हमारा बड़ा ही धूर्त (Cunning) है। तो क्या करते हैं? मान लीजिए आपका अच्छा जीवन चल रहा है, और आपका एक दोस्त आता है, कहता है—”आपको एक करोड़ रुपये कमाने हैं क्या?”—”क्या? कैसे?”—”मेरे पास योजना है, हम दोनों जाकर बैंक में चोरी कर लेते हैं।”—”क्या बकवास है! नहीं, मुझे नहीं करना है।”—”नहीं-नहीं, मेरी फूल-प्रूफ योजना है, हम बैंक चोरी कर लेते हैं, हमको एक करोड़ रुपये मिल जाएँगे।”—”नहीं-नहीं!” फिर भी वह जबरदस्ती आता है, हमको लेकर जाता है। हम बैंक पर जाते हैं, जैसे ही अलार्म बज जाता है, वह भाग जाता है! और पुलिस हमको पकड़ लेती है। पुलिस हमको पकड़ लेती है, फिर हम जेल चले जाते हैं। फिर न्यायाधीश के सामने आते हैं, और जब न्यायाधीश के सामने आते हैं, तो हम देखते हैं कि वही दोस्त न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठा हुआ है! जो दोस्त ने पहले हमको चोरी करने को बोला, वही अभी हमको बोलता है—”मूर्ख! गुनाहगार!” और हमको जेल में डाल देता है!
तो क्या है? यह मन इस प्रकार का है, डबल रोल करता है! पहले हमको चोरी करने को बोला… तो जब उठना होता है, जब अलार्म बजता है, उठना होता है, तो बोलता है—”10 मिनट और सो जाओ, कुछ फर्क नहीं पड़ता।” तो 10 मिनट सो गया… तो 10 मिनट सो गया, तो 10 मिनट सो गया, तो 10 मिनट सो गया, तो 10 मिनट सो गया, तो 10 मिनट सो गया, तो 10 मिनट सो गया, तो 10 मिनट सो गया, तो 10 मिनट सो गया, तो 10 मिनट सो गया, तो 10 मिनट सो गया…
पर शारीरिक रूप से तो उतना विरोध नहीं होगा। और ऐसे कोई भी आत्म-सुधार की चीज़ करनी है, उसका अगर कोई हमें मित्र साथ मिल जाता है, तो बहुत अच्छा होता है।
क्या है, जब मन बोल रहा होता है—”ऐसा करो, ऐसा करो, ऐसा करो”, तो अगर तभी कोई और हमको बोलता है कि “यह मन की बात सुनने की ज़रूरत नहीं है, तुम यह सुनो”, तो उससे काफी फायदा होता है। इसलिए अच्छा संग होना बहुत जरूरी है। भक्तों का संग अगर होगा हमें, तो भी उस संग में हम सकारात्मक कार्य कर सकते हैं।
और आखिरी चीज़ इसमें जो है कि हमें खुद को, जब हमारी बुद्धि को सतर्क बनाना है, बुद्धि से लिखो—”क्यों मेरे लिए सुबह उठना जरूरी है, उससे क्या फायदा होने वाला है—एक, दो, तीन, चार।” पर्ची पर लिखकर रखो उसको। सबसे पहले उसको पढ़ो एक बार कि सुबह जल्दी उठना है। और सुबह जब नींद भी आ जाती है, तो फिर क्या है, सुबह उठ जाते हैं। तो वह ऐसी आदत बढ़ा सकते हैं कि सबसे पहले अलार्म बंद होने पर उठ जाएँ।
अगर हमें कोई डाइट को बदलना है, मन की चेतना में रहना है, किसी भक्त के संग की मदद लेना है, किसी और के जो भी सकारात्मक हैं उनके संग की मदद लेना है, खुद की क्षमता को समझना है, और बुद्धि से मन के प्रतिकार करने के लिए खुद को सक्षम बनाना है। ऐसे करेंगे, तो जो भी प्रतिकार के लिए है, उसको अमल करना और आसान हो जाएगा।
यहाँ सवाल है किसी का?
प्रश्न 2: टैलेंट है पर टेम्परामेंट (Temperament) कैसे बढ़ाएँ?
कल्याण कुमार: “हरे कृष्णा प्रभुजी, मैं कल्याण कुमार बोल रहा हूँ। प्रभुजी, टैलेंट तो है, लेकिन टेम्परामेंट कैसे बढ़ाएँगे? और प्रभुजी, इसका तरीका क्या है? तो टेम्परामेंट को और अच्छा करने का, बढ़ाने का तरीका क्या है? क्या होता है कि जब हमारा मन किसी एक चीज़ में फँस जाता है, तो प्रभुजी और अच्छा होता है… प्रभुजी मतलब हम पूरा एकाग्रता से कंसंट्रेट होते हैं।”
वक्ता: अच्छा मतलब, उसी में हमारा मन पूरा फँस गया है। तो अभी कुछ-कुछ चीज़ें होती हैं, वे बहुत महत्वपूर्ण होती हैं। जैसे एग्जाम है, तो एग्जाम में कैसे जवाब देता हूँ, वह बहुत महत्वपूर्ण है मेरे जीवन के लिए। पर उस चीज़ का महत्व जो होता है, उस महत्व के कारण परिणाम क्या होगा…
तो अभी क्या होता है, जब हम आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करते हैं, तो जब भौतिकवादी चेतना होती है हमारी, भौतिक संकल्पना होती है, तो हमें क्या लगता है कि जीवन एक 100 मीटर की दौड़ के समान है—अगर मैं पहुँच गया तो जीत गया, अगर नहीं पहुँच गया तो हार गया!
पर हम समझते हैं, जब आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करते हैं, जीवन कोई 100 मीटर स्प्रिंट नहीं है, वह एक 100 किलोमीटर का मैराथन है! कभी मैं पीछे रह जाऊँगा, कभी मैं आगे जाऊँगा, पर मुझे दौड़ते रहना है। पर हर कदम जो मैं ले रहा हूँ, उससे मैं आगे बढ़ रहा हूँ।
तो इससे क्या होता है? तो वैसे ही लंबा मैराथन है, तो हर कदम महत्वपूर्ण है, पर कोई भी कदम ऐसा नहीं है कि जिससे मेरा सारा सर्वनाश हो जाएगा! पीछे हो गया, आगे बढ़ूँगा। तो इस तरह से जो आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करते हैं, तो हम… जब बिग पिक्चर को भूल जाते हैं, जो दृष्टि को हम भूल जाते हैं और उस चीज़ को ही सब कुछ बना देते हैं, तो फिर क्या होता है? हाँ, हम अशांत ही रह सकते हैं।
तो टेम्परामेंट को बढ़ाने के लिए, हमें आध्यात्मिक ज्ञान का अनुशीलन करना है। उससे क्या होगा? हमारी चेतना और विस्तारित हो जाएगी, जिससे कि एक चीज़ में हम फ्रीज़ नहीं हो जाएँगे, बहुत टेंशन नहीं आ जाएगा।
उसके साथ-साथ, उसके साथ-साथ हमें खुद देखना है कि जब हमारा मन विचलित हो जाता है, उसको शांत हम कैसे कर सकते हैं? कि शारीरिक स्तर पर अगर हम ब्रीथ आउट करें—साँस लो, धीरे से साँस लो। जब साँस धीरे से लेते हैं, उससे क्या होता है कि मन की गति धीमी हो जाती है। जितना मन तेज़ दौड़ रहा होता है, उतनी साँस तेज़ हो जाती है, तो साँस को धीमी कर दो, मन भी शांत, धीमा हो जाएगा।
तो अगर भक्ति में कुछ विधियाँ हैं, जिससे हमको थोड़ा अच्छा लगता है—कीर्तन हो सकता है, दर्शन हो सकता है, वहाँ की प्रार्थनाएँ हो सकती हैं, कुछ लेक्चर में कुछ पॉइंट्स सुने हैं, अच्छे पॉइंट्स, इंस्पायरिंग पॉइंट्स, तो उनको किसी नोट्स में लिखकर वह पढ़ सकते हैं। ऐसे जब हम करते हैं, तो क्या होता है? उससे मन शांत हो जाता है।
तो टेम्परामेंट को डेवलप करने के लिए, न केवल आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना है, पर कोई आध्यात्मिक विधि जिससे कि हम मन को शांत कर सकते हैं, उसके लिए आदत डालनी है। यह लोग करते हैं, तो जो हमारा टेम्परामेंट है, वह और अच्छा हो जाएगा।
आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति करने के लिए, आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति करने के लिए, आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति करने के लिए, आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति करने के लिए, आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति करने के लिए, भगवान् हमेशा… भक्ति में संबंध से आए।
और जब हम इस तरह से दृढ़ हो जाते हैं, तो लोग भी समझते हैं कि आपको इस पर forced नहीं करना चाहते हैं। यह कभी हाँ बोलेगा, कभी नहीं बोलेगा, पर वे भी समझ जाएँगे और उससे वे स्वीकार करते हैं। और हमें बुद्धि मिले—कब हाँ बोलना है, कब ना बोलना है।
इसलिए हर एक संबंध का डायनामिक अलग-अलग होता है, और वह संबंध के आधार पर हमें कार्य नहीं करना है, हमारे जीवन का बड़ा उद्देश्य जो है, उसके आधार पर हमें ‘हाँ’ या ‘ना’ बोलना है। और उसके आधार के लिए, उसके लिए कभी किसी को ‘ना’ बोलना पड़े, तो हम ठीक हैं।
इसलिए हमें कार्य नहीं करना है, इसलिए हमें कार्य नहीं करना है… “मैं इस इच्छा, इस निवेदन, इस प्रस्ताव को ‘ना’ बोल रहा हूँ, पर मैं आपको ठुकरा नहीं रहा हूँ।” तो उससे हम ‘ना’ बोलते हैं, पर बाद में हम उनसे अच्छे से बात करते हैं, कुछ मदद करना है तो मदद कर सकते हैं। तो उससे हम दिखा सकते हैं कि “मैं आपको छोड़ नहीं रहा हूँ, आपको त्याग नहीं रहा हूँ, पर यहाँ मैं कर नहीं सकता हूँ।”
प्रश्न 3: अपनी कमियों और भूलने की आदत को कैसे सुधारें?
इसलिए आपको करना है? इसलिए आपको करना है? करना है इसलिए आपको करना है… करना है इसलिए आपको करना है… आपको करना है…
हम सब एक प्रकार का शरीर और एक प्रकार का मन पाए हैं। तो जैसा शरीर और मन है, तो हमारा एक यंत्र (Machine) है। तो उस यंत्र के अनुसार हमें कार्य करना है। तो अगर हम भूल जाते हैं, तो हमें समझना है कि यह मेरी कमी नहीं है, शरीर और मन ऐसा है तो उसके साथ हमें कार्य करना है।
मान लीजिए किसी के पास ऐसी गाड़ी है, जिसका फ्यूल बहुत जल्दी खत्म होता है। अगर गाड़ी बदल नहीं सकते हैं, तो उसको बार-बार फ्यूल करना पड़ेगा। तो जो हमें गाड़ी मिली है, उसके साथ हमें काम करना है।
तो अगर ऐसा है कि हम भूल जा रहे हैं, तो हमें सोचना है—”मेरे भूलने की संभावना ज्यादा है, तो फिर वह न भूलने के लिए मैं क्या कर सकता हूँ? मैं लिख सकता हूँ।” व्यापारी क्या करते हैं? वे लिखते हैं, तो भूलते नहीं हैं। पर कभी क्या होता है, हम लिख देते हैं और कहाँ लिखा है, वह हम भूल जाते हैं! तो फिर हम क्या करते हैं? हम एक डायरी रख सकते हैं, या आप फोन में नोट बना सकते हैं, उसमें लिख सकते हैं। फोन में आजकल हमको जो फोन में रिमाइंडर्स (Reminders) हैं, उनका इस्तेमाल कर सकते हैं।
क्या है कि There is no need to beat ourselves up because of our weaknesses. हम सब में कुछ-कुछ कमियाँ हैं। और उन कमियों के कारण… ऐसे नहीं कि उन कमियों के कारण मैं ऐसे ही रहूँगा। बोलना है—”ठीक है, यह मेरे भूलने की संभावना ज्यादा है, तो फिर मैं उसकी तैयारी करूँगा।”
मान लीजिए अगर हमारे घर से कॉलेज जाते हैं, तो जो रास्ता है उसमें बहुत से पॉटहोल्स (गड्ढे) हैं। तो उससे हम गाड़ी से जाते हैं, तो बहुत बंप होता है। तो अभी एक तरह से उस रास्ते पर बंप हैं, उस रास्ते पर गड्ढे हैं, उसका हम कुछ नहीं कर सकते हैं। सरकार जब चेंज करे, करे, उस रास्ते पर हमें चलना है।
पर जब मैं उस रास्ते पर चल रहा हूँ, तो मैं सबसे पहले स्वीकार करना है कि ऐसा ही रास्ता है! हर बार जब मैं कोसता रहूँगा कि “ऐसा ही रास्ता है, क्या फायदा इसका”, रास्ता वैसा ही है। पर जब मैं स्वीकार कर लेता हूँ कि ऐसा ही रास्ता है, तो ठीक है—जहाँ पर जो गड्ढा बड़ा है, वहाँ पर मैं इस तरफ हो जाऊँगा, यहाँ पर मैं इस तरफ हो जाऊँगा। तो फिर हम जो परिस्थिति है, उसको संभाल सकते हैं।
तो इसलिए हम सब में कमियाँ हैं, अलग-अलग कमियाँ हैं। और उन कमियों को स्वीकार करके, फिर उस कमी को कम करने के लिए क्या करना है, उसे हमें देखना है।
तो आप क्या करते हैं कि “मैं ऐसा ही हूँ, मैं कुछ नहीं कर सकता हूँ”? नहीं! “मैं ऐसा ही हूँ” स्वीकार कर सकते हैं, पर “मैं उसके बारे में क्या कर सकता हूँ?” उस तरह से अगर हम करेंगे, तो यह जो कमी है, वह कम भी हो सकती है। लिखने की आदत हो जाएगी, तो लिखते रहेंगे, फिर पढ़ेंगे तो याद हो जाएगी। फिर हम खुद देखेंगे कि अगर मैं याद रखता हूँ तो समस्या कितनी कम होती है। याद करने का वह प्रयास करेंगे, तो याद रखने की आदत बनती है। अगर याद रखने की आदत करते हैं हम, तो याद रखने की शक्ति बढ़ सकती है। अगर याद रखने की आदत करते हैं हम, तो याद रखने की शक्ति बढ़ सकती है।