How to immigrate to the spiritual world – Hindi
[Friday feast class at Dubai, United Arab Emirates]
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Lecture Summary
- १. इच्छा (Desire): सबसे पहला पॉइंट था, आध्यात्मिक जगत जाना है तो इच्छा। और इच्छा हम जाग्रत कैसे करते हैं? कि सबसे पहले समझना कि मेरी शाश्वत जीवन की इच्छा जो है, वो मेरे शाश्वत स्वभाव से, आत्मा, और शाश्वत प्रेम की जो इच्छा है उसके शाश्वत वस्तु हैं भगवान। इस दुनिया में जो भी आकर्षक चीज़ें हैं, वो भगवान से ही आती हैं, पर वो मुझे भगवान के पास ले नहीं जाती हैं। तो उन चीज़ों पर केंद्र करना है जो मुझे भगवान के पास ले जाएंगी।
- २. पात्रता (Eligibility): दूसरा बात क्या था? पात्रता। हमारी कोई पात्रता नहीं है, पर भगवान की इच्छा, भगवान की कृपा, भगवान का प्रेम ही हमारी पात्रता है। क्योंकि भगवान चाहते हैं हम आ जाएं, तो इसलिए उनकी कृपा से हम ज़रूर वहाँ पर पहुँच सकते हैं।
- ३. प्रक्रिया (Process): तीसरा था पद्धति या प्रक्रिया। पद्धति में हमने देखा कि क्या है? आध्यात्मिक जगत जाने के लिए, शारीरिक स्तर पर जाना नहीं है, चेतना के स्तर पर जाना है। तो हमें भगवान के प्रति प्रेम जाग्रत करना है। तो भक्ति जो है, एक्सक्लूसिवली (exclusively), डायरेक्टली (directly) हम करते हैं सत्संग में आके, पूजा, सेवा, भजन करके। और फिर इंक्लूसिवली (inclusively) जो, इनडायरेक्टली करते हैं, हमारा जो कर्तव्य है, परिवार है, नौकरी है, वो सब सेवा भाव में करके। और ऐसे करेंगे, तो धीरे-धीरे भगवान हमारी चेतना के केंद्र में आएंगे। हम जो भी कार्य कर रहे हैं, वो कार्य सचेत रहेंगे, पर भगवान को उद्देश्य के रूप में हम स्मरण करेंगे।
- ४. भाव (Attitude): और अंत में, क्या है, जो हमारा एटीट्यूड, जो भाव है। कि भले ये आध्यात्मिक प्रगति करना बड़ा मुश्किल लगे, पर भगवान हमेशा हमारे साथ हैं। और जो भगवान हमें यहाँ तक ले आए हैं, वहाँ भगवान हमारे साथ रहकर, हमारे पूर्व में जो भी बुरा हुआ है, उससे अच्छा लाएंगे। भविष्य में जो भी आएगा, उससे भी वो संरक्षण करेंगे, और वो हमें उन तक ज़रूर पहुँचा देंगे।
Full Transcription
आध्यात्मिक जगत की यात्रा (प्रस्तावना)
बहुत-बहुत धन्यवाद! मुझे यहाँ फिनिक्स (Phoenix) में आमंत्रित किया गया। पर वास्तव में मैं कहूँगा कि आप सबके बीच में आकर, आप सबकी जो दिव्य भक्ति का उत्साह है, ये देखने का मौका मिल रहा है। सारे विश्व भर में मैं जाता हूँ, और फिर यहाँ पर हम देखते हैं कि सैकड़ों की मात्रा में आप सब भक्ति कर रहे हैं। यह आप सबका उत्साह और भगवान की कृपा, इन दोनों का दिव्य संगम है।
आज मैं इस विषय पर चर्चा करूँगा कि हम आध्यात्मिक जगत कैसे इमिग्रेट (immigrate) कर सकते हैं, हम आध्यात्मिक जगत में कैसे जा सकते हैं। तो यह जो प्रवचन है, मैं चार विभागों में लूँगा। हर एक विभाग 10-10 मिनट का होगा। उसके बाद अगर किसी का कोई सवाल होगा, तो हम ले सकते हैं, और इस तरह से हम आगे जाएंगे।
तो अगर हमें एक देश से दूसरे देश में जाना है, इमिग्रेट करना है, तो उसके लिए चार चीज़ें आवश्यक हो सकती हैं। सबसे पहले ‘इच्छा’ होती है। अगर आप भारत में थे, भारत से अभी यहाँ पर दुबई में आए हैं, कुछ लोग यूरोप में जाते हैं, कुछ लोग अमेरिका में जाते हैं, तो सबसे पहले इच्छा होती है। तो अगर इच्छा नहीं है, तो कोई जाएगा नहीं। पर इच्छा केवल शुरुआत है, यह पर्याप्त नहीं है। इच्छा के बाद में फिर ‘पात्रता’ (eligibility) आती है। अभी कोई अगर बहुत समृद्ध देश है, तो वो किसी और व्यक्ति को ऐसे ही लेना नहीं चाहेगा, क्योंकि पात्रता क्या है, वो देखना है।
तो हमें आध्यात्मिक जगत में भी जाना है, तो सबसे पहले इच्छा चाहिए, फिर पात्रता क्या है, वो देखते हैं। किसी देश में जाना है, वहाँ पर आसान नहीं है वीज़ा मिलना, इमिग्रेट होना। तो फिर हमारा जो उत्साह होता है, हमारा जो एटीट्यूड (attitude) होता है, हमारी जो भावना होती है, उस उत्साह को कैसे बरकरार रखें ताकि हम अपने प्रयास में अग्रसर रहें? तो यही चार चीज़ें जो हैं, हम आध्यात्मिक जगत जाने के लिए कैसे लागू कर सकते हैं, इसका विश्लेषण हम करेंगे। इसके बारे में हम चर्चा करेंगे।
1. आध्यात्मिक जगत जाने की इच्छा
सबसे पहले है इच्छा। तो अगर इच्छा की बात बोलेंगे हम, तो फिर सवाल आता है कि किसी को आध्यात्मिक जगत जाना है, तो अभी आध्यात्मिक जगत है भी या नहीं, यह किसको पता है? अमेरिका है, कनाडा है, हमको पता है, पर क्या इस आध्यात्मिक जगत का अस्तित्व है या यह केवल कुछ लोगों की कोई संकल्पना है? कोई कल्पना है उनकी बस? यह सवाल हो सकता है, पर इसके बारे में हम थोड़ा विश्लेषण भी कर सकते हैं।
हम सब में एक बहुत मूल इच्छा है कि हम सब हमेशा जीना चाहते हैं, और हम हमेशा प्रेम करना चाहते हैं। दुनिया में सैकड़ों, लाखों, हज़ारों की संख्या में मूवीज़ (movies) बनती हैं, नॉवेल्स (novels) लिखे जाते हैं, अधिकांश यह रोमांस (romance) पर होते हैं। और रोमांस में क्या होता है? कि हम हमेशा जीना चाहते हैं, हमेशा प्रेम करना चाहते हैं—’हैपिली एवर आफ्टर’ (happily ever after), यह भाव होता है।
अभी, अगर हम अपनी दुनिया में देखें, अगर हम केवल भौतिक शरीर ही हैं, अगर हमारा कुछ आध्यात्म है ही नहीं, कुछ आत्मा वगैरह नहीं है, तो हम सब में ऐसे शाश्वत जीने की, शाश्वत प्रेम करने की इच्छा आती कहाँ से है? हमारे आस-बाजू में सब कुछ अस्थायी है। बड़े-बड़े पहाड़ भी होंगे, उनकी भी जीवन अवधि है, वो भी अस्थायी हैं। मैं न्यूयॉर्क में था, यहाँ पर ट्विन टावर्स (Twin Towers) थे। जब ट्विन टावर्स गिर गए, तो वो केवल एक इमारत नहीं गिरी, वो ट्विन टावर्स पाश्चात्य संस्कृति की सुरक्षा और समृद्धि का एक प्रतीक थे, और वो गिर गए। मतलब वो जो भाव आ रहा था कि हमारी प्रगति स्थायी है, वो मोह विचलित हो गया। वास्तव में इस जगत में कुछ भी स्थायी (permanent) नहीं है।
तो अगर हम केवल इसी जगत के ही वासी हैं, और इस जगत में कुछ भी स्थायी नहीं है, तो हम में इस शाश्वत जीवन की इच्छा आती क्यों है? कहाँ से आती है? मान लीजिये अगर अफ्रीका में कोई ऐसा ट्राइब (tribe) है, आदिवासी लोग हैं, जिनका दुनिया से कोई संपर्क नहीं है, कोई इंटरनेट नहीं है, कोई फोन नहीं है, कुछ भी पता नहीं है। और अचानक एक लड़का घर जाता है और अपनी माँ को बोलता है, ‘माँ, माँ, मुझे पिज़्ज़ा चाहिए!’ अब माँ क्या पूछेगी उसको? पिज़्ज़ा क्या होता है? या भले ही माँ को पता भी होगा, तो फिर भी माँ का सवाल क्या आएगा? ‘तुमको कैसे पता?’
हमारी जो इच्छाएं आती हैं, वो हमारे वातावरण से आती हैं। हमारे आस-बाजू से इच्छा आती है। अगर हमारे आस-बाजू की परिस्थिति में कुछ भी ऐसा न हो जिससे पिज़्ज़ा का पता ही न चले, तो फिर पिज़्ज़ा की इच्छा आएगी कहाँ से? तो उसी तरह से, हमारे आस-बाजू में कुछ भी स्थायी नहीं है, कुछ भी शाश्वत नहीं है, फिर भी हम सब में शाश्वत जीवन की इच्छा है। ये इच्छा आती कहाँ से है?
तो हमारे अंदर एक रहस्यमय इच्छा है कि मैं शाश्वत जीना चाहता हूँ। मान लीजिए किसी को एक सोने की अंगूठी (ring) मिल गई, तो तुरंत सवाल उठेगा, ‘यह कहाँ से आ रही है? यह ज़मीन तो सोने की नहीं है, दीवार सोने की नहीं है।’ तो यह सोना और बाकी ज़मीन जो है, इसका इतना अलग स्वभाव है, तो सवाल आता है कि ये आ कहाँ से रहा है? उसी तरह से, हम इस भौतिक जगत में हैं जहाँ सब कुछ अशाश्वत है, और हम सब में जो इच्छा है इस शाश्वत जीवन की, ये इतनी विलक्षण है, इतनी अलग है हमारे भौतिक वातावरण से, कि ये सवाल आएगा—ये आया कहाँ से?
तो इस तरह से, हमारे अंदर कोई ऐसी चीज़ है जो शाश्वत है, और जो शाश्वत जीवन की आकांक्षा करती है, जो शाश्वत जीवन की अभिलाषा करती है। तो यह जो शाश्वत चीज़ है, यह हम शास्त्रों से पता कर सकते हैं।
शास्त्र और हमारी शाश्वत आत्मा
अभी कैसे है, हमारा जो रीज़न (reason) है, हमारी जो तर्क बुद्धि है, वो एक टॉर्चलाइट (torchlight) के समान है, और शास्त्र जो हैं, वो सनलाइट (sunlight) के समान हैं। हमारी जो टॉर्चलाइट, जो हमारे फोन में होती है, उससे हमको थोड़ा-बहुत धुंधला-धुंधला दिखता है, पर सूरज उग जाता है तो स्पष्ट रूप से दिखता है। तो उसी तरह से, हम अपने तर्क से धुंधले तरीके से समझ सकते हैं कि शायद कुछ होगा, पर शास्त्रों के द्वारा स्पष्ट रूप से जान सकते हैं। शास्त्र बताते हैं:
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्। (भगवद्गीता २.१७)
कि जो हमारी आत्मा है, जिसकी चेतना सारे शरीर में जाती है, वो अविनाशी है। और जो आत्मा है, वह एक दूसरे जगत की है। आठवें अध्याय के बीसवें श्लोक में, भगवद्गीता में भगवान बताते हैं:
परस्तस्मात् तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात् सनातनः।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥ (भगवद्गीता ८.२०)
भगवान कहते हैं कि इस दुनिया में सब चीज़ों का नाश हो जाएगा, पर वहाँ एक जगत है जिसका नाश नहीं होगा, और हम वास्तव में उस जगत के वासी हैं।
तो अभी, मैंने दो चीज़ें बोलीं—हम सबको हमेशा जीने की, और हमेशा प्रेम करने की इच्छा है। शास्त्र बताते हैं कि हमारी आत्मा है, और हम सबको इच्छा है कि हम सदैव प्रेम करें। तो अभी वो शाश्वत प्रेम करने की इच्छा कहाँ से आती है? शास्त्र बताते हैं कि वो भगवान से आती है:
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। (भगवद्गीता १५.७)
हम सब भगवान के अंश हैं। और इस जगत में जो भी चीज़ आकर्षक है—कोई व्यक्ति आकर्षक हो, कोई जगह आकर्षक हो, कोई दृश्य आकर्षक हो—सभी आकर्षक चीज़ों का आकर्षण भगवान से आता है। सब चीज़ों का आकर्षण भगवान का ही एक अंश है:
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥ (भगवद्गीता १०.४१)
सब आकर्षक चीज़ों का जो आकर्षण है, वह मेरा ही एक अंश है।
आकर्षण का स्रोत: सागर और बूँद
अभी इसका मतलब क्या है? कि भगवान आकर्षण के एक सागर हैं और इस जगत में जो भी आकर्षक चीज़ें हैं, वो आकर्षण की एक बूँद के समान हैं। और एक बूँद भी बहुत आकर्षक होती है! जब हम किसी व्यक्ति को देखते हैं—कोई बहुत सुन्दर है, बहुत बुद्धिमान है, बहुत शक्तिशाली है या किसी क्षेत्र (field) में बहुत टैलेंटेड (talented) है—तो लोग उनके आकर्षण में फिदा हो जाते हैं। पर वो आकर्षण कितने समय के लिए रहने वाला है? 10, 20, 30 साल के लिए?
मेरा एक मित्र है कैलिफोर्निया में, वो सोशियोलॉजी (sociology) में पीएचडी (PhD) कर रहा है—’पोस्ट सेलिब्रिटी लाइव्स’ (Post Celebrity Lives) पर। जो सुपरस्टार्स होते हैं, खास करके जो स्पोर्ट्स स्टार्स (sports stars) और मूवी स्टार्स (movie stars) होते हैं, उनकी जो सेलिब्रिटी (celebrity) लाइफ होती है, ख्याति (fame) होती है, वो 15-20 साल के लिए होती है। और खास करके जो फीमेल स्टार्स (स्त्रियाँ) होती हैं, उनका समय तो और भी छोटा होता है, 10-12 साल का होता है। तो उसके बाद में वो बहुत डिप्रेशन में चली जाती हैं—’मैं इतना फेमस था, मैं इतनी फेमस थी, अभी क्या हो गया?’
तो यहाँ दुनिया में बहुत सी चीज़ें आकर्षक होती हैं, और उनका जो आकर्षण है, वो एक बूँद के समान है। हम कल्पना कर सकते हैं कि इस बूँद से हम इतने आकर्षित हो जाते हैं, तो फिर सागर से हम कितने आकर्षित होंगे! तो वह जो सागर हैं, वे भगवान हैं। Everything attractive comes from Krishna, but everything attractive doesn’t take us to Krishna. (हर आकर्षक चीज़ कृष्ण से आती है, पर हर आकर्षक चीज़ हमें कृष्ण तक नहीं ले जाती)।
अच्छा, तो अभी जो शराब है, क्या वो हमें कृष्ण के पास ले जा रही है? वो आकर्षक क्यों है, कैसे आकर्षक है?
सही मार्ग और गलत विकल्प (Free Will)
अच्छा सवाल है। मैं मेलबर्न (Melbourne) में कुछ समय पहले क्लास दे रहा था, वहाँ पर एक व्यक्ति ने सवाल पूछा कि, ‘भगवान अगर हम कहते हैं कि सही मार्ग पर चलना है, तो जो सही ऑल्टरनेटिव (alternative) है वो इतने कम क्यों होते हैं? और गलत ऑल्टरनेटिव इतने सारे होते हैं—ये गलत करना है, गलत करना है, गलत करना है। इतने सारे मार्ग हैं गलत करने के, सही मार्ग बहुत कम हैं, तो ऐसा क्यों है?’
मैंने बताया, हर मल्टीपल चॉइस एग्जाम (multiple choice exam) में ऐसा ही होता है! अभी अगर परीक्षा है, तो उसमें पाँच पर्याय (options) होते हैं, उसमें से कितने पर्याय गलत होते हैं? चार गलत होते हैं। और वो पाँचों पर्याय टीचर की तरफ से ही आ रहे हैं, पर सब टीचर के पास नहीं ले जा रहे हैं!
तो यह जगत एक तरह से हमारे परीक्षण के लिए है कि हम जो भी इच्छा करते हैं, वो इच्छा पूर्ति करने का मौका यहाँ पर मिलता है। The world is a place for experimentation and rectification. एक्सपेरिमेंट (Experiment) यानी अनुभव करो—यह आनंद देगा, यह आनंद देगा, यह आनंद देगा। जब आनंद करने की इच्छा है, तो आनंद प्राप्त करने का प्रयास करो। और जब आनंद नहीं मिलेगा, तो रेक्टिफिकेशन (rectification) यानी सुधार करो।
जब सुधार करना है, तो फिर भगवान ने भक्ति का मार्ग दिया है। अलग-अलग धर्मों के द्वारा, अलग-अलग संतों के द्वारा, हमको अपनी ओर आकर्षित करने के लिए वो मार्ग देते हैं।
तो हर चीज़ का आकर्षण भगवान से आता है, क्योंकि भगवान ने हमें स्वेच्छा (free will) दी है। और उस स्वेच्छा के अनुसार, अगर हम कुछ इच्छा करते हैं, गलत इच्छा भी करते हैं, तो भगवान उसके लिए भी मार्ग देते हैं अनुभव करने का। और फिर वो जब अनुभव कर लेते हैं… अगर कोई तुरंत बंदूक निकाल ले कि ‘स्वेच्छा का उपयोग नहीं करोगे, तो गोली मार दूँगा तुमको!’, तो भले ही डर से व्यक्ति ‘हाँ’ बोल दे, पर उसमें कुछ प्रेम नहीं है। भगवान ऐसा नहीं करते हैं। प्रेम स्वेच्छा से ही उत्पन्न होता है। हर एक का अनुभव अलग होगा, और अंत में हम समय लेंगे तो और कुछ प्रेम देंगे, अगर हम पूरा नहीं कर पाए गए।
2. हमारी पात्रता (Eligibility)
दूसरा बिंदु है कि जाना है कहीं, तो पात्रता चाहिए। पात्रता अभी क्या है? कि अभी कुछ-कुछ देश ऐसे होते हैं, कि वो चाहते ही नहीं कि दूसरे देश से लोग आएं। अभी अमेरिका में इमिग्रेशन के रूल्स बहुत स्ट्रिक्ट (strict) हो गए हैं, वो देश अभी इनवर्ड लुकिंग (inward looking) हो रहा है, तो लोगों को बहुत चिंता होती है। मैं भी अमेरिकन कॉलेजेस में जा रहा था, और कैनेडियन कॉलेजेस में भी लेक्चर देने गया। मैं मैसाचुसेट्स और हार्वर्ड दोनों में था, तो वहाँ पिछले दो-तीन सालों से जो भारतीय विद्यार्थी जा रहे हैं, उनकी संख्या बहुत कम हो गई है। और फिर मैं कैलगरी में था, तो वहाँ पर बहुत से विद्यार्थी जाने लगे। तो क्या है कि वहाँ पर भी जाना मुश्किल है, नौकरी मिलना मुश्किल है, रहना मुश्किल है।
तो कुछ-कुछ ऐसे देश होते हैं जो दूसरे लोगों को आने देना नहीं चाहते हैं, तो फिर पात्रता का जो दर्जा है, वह बहुत ऊँचा कर देते हैं, बहुत कम लोगों को आने देते हैं। पर आध्यात्मिक जगत ऐसा नहीं है! आध्यात्मिक जगत में वास्तव में भगवान चाहते हैं कि हम आएं। तो हमारी पात्रता क्या है?
हमारी पात्रता है कि भगवान हमसे प्रेम करते हैं। भगवान हमारे परमपिता हैं:
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः। (भगवद्गीता ९.१७)
वह कहते हैं कि मैं सबका पिता हूँ, और वह सबसे प्रेम करते हैं। और यहाँ पर हमें समझना चाहिए कि भगवान जो प्रेम करते हैं, वह हमसे किस तरह से करते हैं। इसलिए नहीं कि हम बहुत अच्छे हैं, भगवान प्रेम करते हैं इसलिए क्योंकि वे भगवान हैं! भले ही हम भौतिकवादी हों। कभी-कभी हम कहते हैं कि भगवान भक्तवत्सल हैं, वो भक्तों का बहुत खयाल करते हैं, भक्तों से बहुत प्रेम करते हैं। पर प्रह्लाद महाराज जी भी बताते हैं कि भगवान उन भौतिकवादियों से, जो बहुत संकीर्ण मानसिकता वाले हैं, उनसे भी स्नेह करते हैं।
भगवान एक सूरज के समान हैं, सबको रोशनी देते हैं। Krishna’s love for us doesn’t depend on who we are. हम भौतिक हों, हम आध्यात्मिक हों, हम पुण्यवान हों, हम पापी हों, भगवान सबसे प्रेम करते हैं। यही हमारी पात्रता है भगवद्धाम जाने के लिए। क्योंकि भगवान प्रेम करते हैं, इसलिए भगवान की इच्छा है कि हम भगवद्धाम जाएं। और उनकी इच्छा होने के कारण, हमारी पात्रता पहले से ही है एक तरह से।
स्थान परिवर्तन नहीं, चेतना का परिवर्तन
पर इसमें एक महत्वपूर्ण बात है। कभी-कभी हम सोचेंगे कि यह आध्यात्मिक जगत क्या है? हम ब्रह्मांड का कोई चित्र देखेंगे—ठीक है, यह भौतिक जगत है, और यह आध्यात्मिक जगत है। जैसे अगर हम विश्व का नक्शा देखते हैं, तो यह भारत है, यहाँ पर चीन है, यह अमेरिका है, यहाँ पर कनाडा है, तो यहाँ से यहाँ पर जाना है। तो ऐसे हम सोचेंगे कि यह भौतिक जगत है, वो आध्यात्मिक जगत है, मुझे यहाँ से वहाँ जाना है।
पर आध्यात्मिक जगत जो है, वहाँ वास्तव में, वो केवल एक भौगोलिक स्तर पर जगह नहीं है, वो अलग स्तर का जगत है, वो आध्यात्मिक है। और आध्यात्मिक जगत में प्रवेश करने के लिए हमें उचित चेतना चाहिए। तो जगह महत्वपूर्ण नहीं, चेतना महत्वपूर्ण है। वो चेतना क्या है? भगवान हमसे प्रेम करते हैं, हमें भी भगवान से प्रेम करना है। इसलिए It’s not about relocation, but redirection. (यह स्थान बदलने के बारे में नहीं, बल्कि दिशा बदलने के बारे में है)। हमें भगवान से प्रेम करना है।
मैंने पहले बोला कि हमारी पात्रता है, तो इसमें एक महत्वपूर्ण चीज़ समझना है कि, वास्तव में हम सब इतने भौतिक हैं, हम सब इतने बद्ध हैं, हममें अनेक कमियां हैं, तो हम एक तरह से पात्र नहीं हैं। We are always unqualified, but we are never disqualified.
डिसक्वालिफाइड (disqualified) का मतलब है कि हमको मौका ही नहीं है, कोई डिसक्वालिफाइड हो गया मतलब, उसको प्रतियोगिता में भाग लेने का मौका ही नहीं है। अनक्वालिफाइड (unqualified) का मतलब है कि वास्तव में हममें पात्रता नहीं है, पर भगवान इतने कृपालु हैं, वह चाहते हैं कि हम सब उनके पास आएं।
भगवान के प्रेम के प्रति हमारा अंधापन
तो इसलिए अभी हमें क्या करना है? हमें अपनी चेतना भगवान की ओर लगानी है। मैंने जब बताया कि सूरज सबको रोशनी देता है, कोई पुण्यवान हो, पापी हो, पर अगर किसी ने अपनी आँखें बंद कर ली हैं, तो उसको सूरज दिखाई नहीं देगा।
उसी तरह से, हम भगवान के प्रति आँखें कैसे बंद कर सकते हैं? अगर हम बहुत ज़्यादा भौतिक चीज़ों में आसक्त हो जाते हैं, तो फिर हमारा पूरा जीवन उन भौतिक चीज़ों के लिए हो जाता है। तो फिर भगवान की ओर हम देख ही नहीं रहे हैं, एक तरह से हम भगवान की ओर अंधे हो जाते हैं।
जैसे कोई व्यक्ति या कोई बच्चा टीवी देख रहा है, कोई हॉरर मूवी (horror movie) देख रहा है। वो हॉरर मूवी देखने में इतना लग गया है, वो लीन हो गया है। अभी हॉरर मूवी बहुत भयानक हो रही है, तो वो कांप रहा है, चिल्ला रहा है, चीख रहा है! वो उसमें पूरी तरह से डूब गया है।
हम भगवान का अस्तित्व तभी महसूस करते हैं या सोचते हैं कि शायद भगवान हैं, जब हम जो चाहते हैं वो नहीं हो रहा है। तो फिर हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि ‘हे भगवान, आप ये कर दो मेरे लिए!’
जो लोग भगवान का अस्तित्व नहीं मानते हैं, वो भी भगवान की एक सेवा करते हैं। वो क्या है? Everyone likes to serve God as an advisor. सब लोग भगवान को मशवरा (सलाह) देना चाहते हैं कि, ‘ये ऐसे नहीं होना चाहिए था, यह ऐसे होना चाहिए था, यह ऐसे क्यों हो रहा है? ऐसे करो आप!’
तो क्या होता है कि अगर हमारी जो आसक्ति है, वो पूरी नहीं हो रही है, तो फिर हम भगवान से मांग करते हैं, मदद की मांग करते हैं या भगवान को कोसते हैं कि, ‘तुम ऐसा क्यों नहीं कर रहे हो?’ पर जब हमारी आँखें किसी भौतिक चीज़ पर आसक्त हैं, तो हमारी आँखें खुली नहीं हैं कि हम भगवान को देख सकें, भगवान के प्रेम को समझ सकें।
पर हमारी पात्रता यह है कि भगवान हम सब से प्रेम करते हैं, तो वह चाहते हैं कि हम भगवद्धाम आ जाएं। यह पात्रता हमारी, भगवान के प्रेम के द्वारा, भगवान जो हमसे प्रेम करते हैं, इसके द्वारा आती है।
तो कोई सवाल है किसी का अभी तक? या पहले वाला? वो आगे जा रहा है। अच्छा वो अभी आने वाला है। आगे जाएंगे तो अभी पद्धति या प्रक्रिया
बिल्कुल, यह रहा आपके प्रवचन का दूसरा हिस्सा (Part 2)। आपके निर्देशों का पूरी तरह से पालन किया गया है—कोई भी वाक्य या प्रसंग डिलीट नहीं किया गया है, केवल बोलते समय हुए फालतू दोहराव (जैसे: ‘अगर हम अच्छी तरह से अच्छी तरह से…’ या ‘प्रसेंटेशन भी य प्रसेंटेशन भी…’ आदि) को हटाया गया है, व्याकरण व संस्कृत श्लोक शुद्ध किए गए हैं, और इसे वर्डप्रेस के लिए छोटे पैराग्राफ्स और हेडिंग्स के साथ बेहतरीन मार्कडाउन में तैयार किया गया है।
3. आध्यात्मिक जगत जाने की पद्धति (प्रक्रिया)
जैसे मैंने बताया भी कि पद्धति क्या है, कि हमको सिर्फ यहाँ से भगवद्धाम ऐसे कोई प्लेन पकड़ के जाना नहीं है। भले ही अगर हम भगवद्धाम चले भी गए किसी पद्धति से, अगर हमारी आसक्ति भौतिक है, तो हम कृष्ण के साथ होंगे, और तभी हम पूछेंगे, “अरे, इंडिया-ऑस्ट्रेलिया के क्रिकेट मैच का स्कोर क्या है भाई? या, स्टॉक मार्केट क्या है, रेट क्या है?” वहाँ पे सब भगवान से प्रेम करते हैं, सब भगवान की लीला में लीन हैं, चेतना के साथ। तो अगर हमें भगवान के प्रति प्रेम नहीं है, तो फिर हमें वहाँ पे कुछ रस नहीं होगा।
तो इसलिए भगवद्धाम जाने के लिए, सिर्फ हमें एक शारीरिक स्तर पे, केवल यहाँ से वहाँ नहीं जाना है, हमारी चेतना को वहाँ ले जाना है। तो वह भौतिक चेतना से आध्यात्मिक चेतना है। खुद के भौतिक चेतना से प्रेम से, भगवान के प्रति प्रेम, जब हम जाग्रत करेंगे, तो उसके द्वारा हम भगवान के पास जा सकते हैं।
भगवान बताते हैं भगवद्गीता में, कि अगर हम उनसे प्रेम करते हैं, तो हम अभी ही भगवद्धाम में हैं। वो कहते हैं आठवें अध्याय के आठवें श्लोक में, कि अगर आपके मन और बुद्धि मुझमें लग गई है, तो तुम अभी ही मुझमें निवास कर रहे हो, तुमने मुझे प्राप्त कर लिया है। इस स्तर को कहते हैं ‘जीवन मुक्ति’।
दो प्रकार की मुक्तियां होती हैं। एक है ‘विदेह मुक्ति’, विदेह मुक्ति मतलब व्यक्ति शरीर छोड़ता है, और आध्यात्मिक जगत जाता है। पर ‘जीवन मुक्ति’ मतलब वो व्यक्ति अभी शरीर में है पर शरीर से आसक्ति छूट गई है। वो शरीर का इस्तेमाल केवल भगवान की सेवा के लिए कर रहा है। तो वो व्यक्ति जो होता है वह केवल अभी शरीर की कालावधि जब तक है, उसके बाद में जैसे ही शरीर की कालावधि खतम हो जाएगी वो भगवद्धाम चला जाएगा।
तो आध्यात्मिक जगत जाने के लिए प्रक्रिया क्या है कि भगवान के प्रति प्रेम जाग्रत करना है। तो अभी अगर ये प्रक्रिया है, अभी भगवान कहाँ हैं? भगवान आध्यात्मिक जगत में हैं। तो हमें लगेगा कि भगवान तो बहुत दूर हैं मुझसे, मैं तो यहाँ भौतिक जगत में फंसा हुआ हूँ। तो कभी कभी हमें ऐसे लगेगा कि भगवान से इतना दूर हूँ, पर वास्तव में भगवान बहुत दूर हैं और बहुत पास भी हैं। ईशोपनिषद में बताया गया है:
तद् दूरे तद्वन्तिके। (ईशोपनिषद ५)
तो मान लीजिये अगर आप किसी रईस व्यक्ति से मिलने जा रहे हैं, तो आप यहाँ से न्यूयॉर्क जा रहे हैं, और वह बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं, उनसे मिलने जा रहे हैं। पर आपने कभी उनको देखा नहीं है, चित्र भी देखा नहीं है। तभी आप अपने प्लेन में बैठते हैं यहाँ से और फिर न्यूयॉर्क जाते हैं। न्यूयॉर्क में कैब (cab) लेते हैं और फिर व्यक्ति के घर में जाते हैं, और फिर दरवाज़ा खटखटाते हैं। वह व्यक्ति दरवाज़ा खोलते हैं और फिर देखते हैं, और फिर हम चौंक जाते हैं कि वो व्यक्ति जिसने दरवाज़ा खोला, जिनसे हम मिलने जा रहे थे, वो व्यक्ति हमारे बाजू में हमारे ही फ्लाइट में बैठे हुए थे! पर हम उनको जानते नहीं थे, हमने उनको पहचाना नहीं था, इसलिए हमको पता ही नहीं था कि यह व्यक्ति हैं।
तो ठीक उसी तरह से क्या है, भगवान हमारे हमेशा साथ में हैं।
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो (भगवद्गीता १५.१५)
वह कहते हैं कि मैं सबके हृदय में हूँ। अगर कोई व्यक्ति किसी और व्यक्ति से बहुत प्रेम करता है, और वह बहुत ही आलिंगन कर लेता है, तो कितना आलिंगन करेगा वो प्रेम से? वो व्यक्ति इतना किसी करीब आएगा, उससे ज़्यादा करीब भगवान हमेशा हमारे हैं। तो भगवान हमारे करीब हैं, हम भगवान से दूर हैं। हमने हमारा चेहरा जो है, विमुख कर लिया है। पद्मपुराण में बताया गया है कि:
अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद् ग्राह्यमिन्द्रियैः। सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः॥ (भक्तिरसामृतसिन्धु १.२.२३४ / पद्म पुराण)
कि क्योंकि हम भौतिक चीज़ों में बहुत आसक्त हो गए, तो हम भगवान से विमुख हो गए। पर जब हम सेवा करते हैं भगवान की, तो उसके द्वारा उनकी ओर उन्मुख हो जाएंगे।
कर्म और भगवान का स्मरण (Inclusive vs Exclusive Devotion)
तो अभी भगवान अभी भी हमारे साथ नहीं हैं, और यह जब हम समझते हैं, तो इस भौतिक जगत में हमें क्या करना है? भगवान का चिंतन करना है। भगवान कहते हैं कि… यही बात कई बार बोलते हैं, दो बार बोलते हैं भगवान, कि आप अपना मन और बुद्धि मुझमें लगाओ। तो अगर आप अपना मन और बुद्धि मुझमें लगाओगे, तो भगवान कहते हैं कि आप मेरे सानिध्य में होगे और इसी सानिध्य के साथ भगवद्धाम भी पहुँच जाओगे।
तो अभी ये एब्सॉर्प्शन (absorption) जो है, भगवान का स्मरण करना, यह कैसे कर सकते हैं? भई कोई बोलेगा कि मुझे तो नौकरी करनी है, मुझे घर की इतनी सारी ज़िम्मेदारियां हैं, यहाँ जाना है, वहाँ जाना है। कैसे भगवान का स्मरण कैसे कर सकता हूँ मैं? मैं तो 24 घंटे बैठ के जप नहीं कर सकता, कथा नहीं सुन सकता। नहीं, वैसे ज़रूरी नहीं है। स्मरण कैसे होता है? वास्तव में विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर इसका उदाहरण देते हैं।
वह कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति है, वह अपनी नौकरी के लिए गया है जहाँ पे उनका घर है, परिवार है, उनसे दूर वह नौकरी के लिए गया है। तो अभी वह जहाँ पे भी नौकरी कर रहे हैं, वहाँ पे अलग-अलग लोगों से मिलते हैं, अलग-अलग डील्स (deals) करते हैं, अलग-अलग काम करते हैं। पर उस सब में क्या है, उनके मन में स्मरण है कि मैं ये परिवार, मैं अपने परिवार के लिए कर रहा हूँ। मेरे बच्चे हैं, मेरे परिवार वाले हैं, उन सब के लिए मैं कर रहा हूँ। बाहरी रूप से वह अपने परिवार के पास नहीं हैं अभी, पर वह अलग-अलग कार्य कर रहे हैं। पर वह कार्य कर रहे हैं किस तरह से? वह बाहरी रूप से कार्य अलग कर रहे हैं, पर अंदरूनी रूप से उद्देश्य है वह… अपने परिवार के लिए कर रहे हैं।
तो वह कहते हैं, उसी तरह से जो भक्त होते हैं, अलग-अलग कार्य करते हैं पर उन सब में जो उद्देश्य होता है, वह भगवान की सेवा होती है। अलग-अलग हम परिवार की देखभाल कर रहे हैं, तो यह मेरा परिवार नहीं है, यह सब आत्माएं जो भगवान के अंश हैं और यह सब को भगवान की योजना के द्वारा मेरे परिवार में हैं, तो मैं इनकी देखभाल कर रहा हूँ, यह भगवान की सेवा के रूप में कर रहा हूँ।
कर्म ही पूजा है, अभी कर्म ही पूजा यदि होती, तो गधा सबसे बड़ा पुजारी हो जाता! तो भगवान यह नहीं कह रहे हैं कि कर्म ही पूजा है, भगवान यह नहीं कह रहे हैं कि केवल कर्म के द्वारा आप भगवान की पूजा करो। अगर हम सेवा के भाव से कार्य करें, तो वो भाव से कार्य करते हैं, तो फिर जो भी हम करते हैं, वह एक भगवान की सेवा हो जाती है।
अभी मान लीजिये यह जो भाव है, कोई परिवार का सदस्य है, गृहस्थ है, वो अपने परिवार से दूर है, और वो अलग-अलग कार्य कर रहा है। तो उसके लिए क्या है, जब वो अपने परिवार के साथ होते हैं, घर आते हैं अपने बच्चों के साथ होते हैं, अपनी पत्नी के साथ होते हैं, तो फिर बड़े स्नेह से उनसे आदान-प्रदान करते हैं।
तो उसी तरह से जब हम दुनिया में अलग-अलग कार्य करते हैं… पर मान लीजिये कोई पति है, वो अपनी पत्नी से कहता है कि “मैं वहाँ पर रहता हूँ पर हमेशा आप के बारे में ही स्मरण किया करता हूँ”, पर जब वो घर आया है और उसकी पत्नी उससे बात कर रही है, और वो अपने फोन पे कुछ मैसेज कर रहा है। तो वो पत्नी बोलेगी कि “जब तुम मेरे सामने हो, तुम मुझ पर ध्यान नहीं दे रहे हो, तो जब मेरे सामने नहीं होगे तो कैसे ध्यान दे रहे होगे?”
तो ठीक उसी तरह से जब हम भक्ति कर रहे हैं, जब हम बाकी दूसरे कार्य कर रहे हैं, वो सब हम सेवा भाव में करते हैं। पर वो इंक्लूसिव डिवोशन (inclusive devotion) संभव नहीं है जब तक हम एक्सक्लूसिव डिवोशन (exclusive devotion) नहीं करते हैं। जब हम डायरेक्टली (directly) सत्संग में नहीं आते हैं, सत्संग में आके हम भगवान का स्मरण नहीं करते हैं। अगर वो ऐसे नहीं करेंगे तो वो सेवा भाव नहीं रहेगा।
साधना भक्ति का महत्व
कुछ लोग कहते हैं कि… हम उनको कहते हैं जप करो भगवान का नाम, तो “24 घंटे अंदर चलता ही रहता है।” अगर 24 घंटे अंदर चलता है, तो एक मिनट के लिए जिह्वा पे क्यों नहीं आता है? कुछ लोग कहते हैं, “आप इतना हरे कृष्ण हरे कृष्ण बोलते रहते हो, अब एक बार भाव से बोलना चाहिए।” हाँ सही है, एक बार भाव से बोलना चाहिए, पर वो भाव का ही तो अभाव है! और वो भाव आएगा कहाँ से? वो भाव आएगा साधना भक्ति से।
“एक बार भाव से भगवान का नाम लो, आप शुद्ध हो जाओगे”, सही है वो। पर वो कैसे है, कोई धनुष की विद्या खेल रहा है ओलंपिक्स (Olympics) में आर्चर (archer) है, तो वो कहता है कि “एक बार आप तीर को मारो आपको गोल्ड मेडल मिल जाएगा।” वो सही है, पर वो एक बार तीर निशाने पे लगने के लिए क्या होता है, सैकड़ों-हज़ारों बार प्रैक्टिस (practice) करते हैं।
तो उसी तरह से साधना भक्ति जो है, हम ज़रूर हमारा कर्म है, हमारा परिवार है, हमारी नौकरी है, वो सब हम सेवा भाव में कर सकते हैं। पर वो सेवा भाव में करने के लिए हमें डायरेक्ट भक्ति करनी है। हमें जप करना है, भजन करना है, सत्संग करना है, पूजा करनी है, उसके द्वारा हमारी चेतना भगवान में लग जाती है।
भगवान का स्मरण है या नहीं है? तो अभी, अगर हम कुछ काम कर रहे हैं, तो जो भगवान की योजना से मुझे मिला है, तो इसलिए ध्यान पूर्वक काम करें या भगवान का स्मरण भी करने का प्रयास करें वहाँ। तो अभी सबसे पहला है कि हमारा उद्देश्य क्या है? अभी जब अर्जुन युद्ध कर रहे थे तो अर्जुन पूरा ध्यान लगा के युद्ध कर रहे थे, वो धनुर्विद्या में निपुण होने के लिए।
तो जब हमें भगवान का स्मरण करना है, इसका मतलब यह नहीं है कि हम एक स्प्लिट पर्सनालिटी (split personality) जैसे हो जाते हैं—आधा मन हमारे काम में लगाओ, आधा मन भगवान में लगाओ। ऐसे नहीं है, अगर हम कुछ काम कर रहे हैं, तो पूरा मन भगवान में लगाओ और काम करो। कारण हम भक्ति करते हैं, भक्ति से वो सेवा भाव जाग्रत होता है।
जब सेवा भाव जाग्रत हो जाता है, तो उसके बाद में क्या होगा? धीरे-धीरे जो हम कार्य कर रहे हैं वो बैकग्राउंड (background) में चला जाता है, और किसके लिए कार्य कर रहे हैं वो फोरग्राउंड (foreground) में आता है। जैसे अगर कोई पहली बार पब्लिक स्पीकिंग (public speaking) करता है, तो पहली बार जो पब्लिक स्पीकिंग करता है तो लोगों को क्या होता है, स्टेज फ्राइट (stage fright) हो जाता है, डरते हैं लोग कैसे बोलेंगे। तो पहले क्या होता है, सबसे पहले अगर कर रहे हैं, “अरे इतने सारे लोग मेरे बारे में देख रहे हैं, क्या सोचेंगे मेरे बारे में, मैं ऐसे बोलूंगा, ऐसे बोलूंगा।” तो क्या होता है, हम, जो हमारी परिस्थिति है वो हमारी चेतना में बहुत रहती है, और मैं क्या बोल रहा हूँ, क्यूं बोल रहा हूँ वो पीछे छुप जाता है।
पर अगर किसी ने बहुत बार, लोग प्रवचन दिए हैं, पब्लिक में बोला हुआ है, तो फिर धीरे-धीरे क्या होता है, “मैं कहाँ हूँ, कितने लोग हैं, लोगों के लिए क्या भाव है,” वो चेतना में रहता है पर वो प्रॉमिनेंट (prominent) नहीं रहता है। प्रॉमिनेंट क्या है, कि मैं क्या बोल रहा हूँ, मैं कैसे बोल रहा हूँ। अगर वो भक्ति के लिए बता रहे हैं, तो मैं भगवान के लिए सेवा कर रहा हूँ।
जो प्रभुपाद जी के साथ भक्त थे, उनके सेवा को यह बोला करते थे कि प्रभुपाद जी, सौ हज़ार लोगों को सत्संग का कार्यक्रम दे रहे हों, या अपने कमरे में दो-तीन लोगों को अपने दर्शन दे रहे हों, जब कृष्ण के बारे में बोलते थे, वो उत्साह से बोलते थे, क्योंकि He was not just speaking to the people, He was speaking for Krishna. कि वो किस जगह पे बोल रहे हैं, महत्वपूर्ण था उनका ज़रूर, पर किस उद्देश्य से बोल रहे हैं, वो ज़्यादा था।
तो क्या होगा, अगर हम अच्छी तरह, हम जो कर्म कर रहे हैं, अच्छी तरह से ध्यान पूर्वक करना है। पर कर्म करने के पहले हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि “ये मैं आपकी सेवा के लिए कर रहा हूँ।” कर्म होने के पहले “नारायण समर्पयामि”, ये मैं आपके लिए किया हूँ। और ऐसे जब हम करेंगे और भक्ति करते रहेंगे, हमारा कर्म में मन लगेगा पर उसके साथ-साथ मैं यह इसलिए कर रहा हूँ, जो भगवान पहले बैकग्राउंड में होंगे, जितना हम भक्ति करेंगे, जितना हम प्रगति करेंगे, भगवान फोरग्राउंड में आ जाएंगे। तो ये जो स्मरण है, ऐसा नहीं है कि हम अपना काम अच्छी तरह से न करें।
4. हमारा उत्साह और भावना (Attitude)
तो अभी लास्ट पॉइंट (last point) जो है, कि अभी जो एटीट्यूड (attitude) है कि किस भाव से हम ये आध्यात्मिक प्रगति करने का प्रयास करें। कभी-कभी कहीं जाना होता है, किसी देश में जाना होता है तो बड़ा मुश्किल होता है, खास करके अगर अमेरिका जाना है।
मैं जब 20-25 साल पहले इंजीनियरिंग (engineering) कर रहा था, तभी मैंने GRE दिया था और कई अमेरिकन यूनिवर्सिटीज (American Universities) से मुझे अमेरिका जाने का मौका मिला था। पर तभी मुझे वहाँ पर हायर एजुकेशन (higher education) के लिए जाना था, पर प्रभुपाद जी की कृपा से मुझे हाइएस्ट एजुकेशन (highest education) मिल गया! तो राज विद्या, राज गुह्यं जो भगवान कहते हैं। तो तभी तो मैं गया नहीं, और मेरे कई रिश्तेदार थे वो बड़े नाराज़ हो गए कि तुमने मौका गँवा दिया।
तो अभी 15-20 साल के बाद जब मैं प्रचार करने के लिए अमेरिका गया, तो जब मैं अमेरिका से वापस आया तो अनेक रिश्तेदार जो 20 साल से मुझे कभी कॉन्टैक्ट नहीं किए थे, वो मुझे फोन करके बोलने लगे, “आपका जीवन अभी यशस्वी हो गया!” तो अभी इतना उनको अमेरिका जाने की इच्छा है। मैं अमेरिका के इमिग्रेशन (immigration) में था और वहाँ पे एक व्यक्ति रो रहा था… क्या हो गया और वो रो रहा था, हँस रहा था। जैसे चैतन्य चरितामृत में कोई एक्स्टसी (ecstasy) में जाते हैं, तो अष्ट सात्विक विकार होते हैं, वैसे विकार! मैंने पूछा क्या हो गया? “मैंने बारह बार ट्राई किया था अमेरिका के इमिग्रेशन, नहीं हुआ, अभी तेरहवीं बार हो गया!” तो अभी तेरहवाँ नंबर है, अमंगल है, अमंगल है भी पता नहीं। तो इतनी इच्छा होती है प्रयास करते रहते हैं, एक बार नहीं हुआ पर दूसरी बार, तीसरी बार, चौथी बार।
तो जो लोग सही में दृढ़ संकल्प होते हैं, जिनका दृढ़ संकल्प होता है, वो कभी आशा हारते नहीं हैं। तो ठीक उसी तरह से जब हम भक्ति करने का प्रयास कर रहे हैं, तो कभी हमें हताश नहीं होना है। कभी-कभी हमें लगेगा कि मेरी परिस्थिति इतनी विपरीत है, शायद मेरे परिवार वाले मुझे, मेरी भक्ति को सपोर्ट नहीं करते हैं। मेरा मन और इंद्रियां जो हैं इतने अनियंत्रित हैं, अलग अलग वासनाएं जाती हैं। मुझे भक्ति में रस नहीं है, उत्साह नहीं लग रहा है। अलग कारण हो सकते हैं जिससे कि हम हताश हो सकते हैं।
पर एक कारण पर्याप्त है हताश नहीं होने के लिए! और वह क्या है? कि भगवान हमारे साथ हैं। भगवान चाहते हैं कि हम उनके पास आएं।
वास्तव में, भगवान की खोज में निकले, घर छोड़ दिया, आध्यात्मिक खोज बड़ी गंभीरता से ली और दुनिया भर में भगवान को खोजने को निकले… हममें से अधिकांश लोग तो भगवान को खोजने को नहीं निकले थे। अधिकांश लोग कैसे? भगवान के भक्त हमें खोजने को निकले थे! और उसके कारण हम भक्ति में आए।
तो वास्तव में, अगर हम देखेंगे कि हम अगर भक्ति में आए हैं और भक्ति में प्रगति कर रहे हैं, तो यह नहीं है क्योंकि हमने किया है। तो हम भक्ति में प्रगति कर रहे हैं, पर हम कई बार भक्ति के विपरीत कितनी इच्छाएं होती हैं, कितने कार्य होते हैं, उसके बावजूद भगवान ने हमको उनके पास लाया है, उनके मार्ग में लाया है।
तो कैसे है कि कोई बालक होता है, उसको कहीं जाना है, कोई बगीचा है, कोई डिज़्नीलैंड (Disneyland) है, वहाँ पर जाना है, तो वह उत्साह से दौड़ते हुए जाएगा। पर अगर कहीं हॉस्पिटल में इंजेक्शन देना है, वहाँ पर जाना पड़ जाए, तो फिर क्या है, माता-पिता लेकर भी जाएंगे, तो फिर वह ज़मीन को पकड़ के अड़ता है, तो खींच के ले जाना पड़ता है। तो हम पहली कैटेगरी में नहीं हैं, दूसरी कैटेगरी में हैं! वास्तव में भगवान हमको लेकर जा रहे हैं, तो हमारे बावजूद भगवान ने हमें इस मार्ग में लाया है।
और कभी-कभी अगर लगता है हमको, कि जो भगवान ने हमको यहाँ तक लाया है… अगर हम अपने जीवन में देखते हैं, पाँच साल पहले, दस साल पहले, भक्ति चालू की है, तो हम ज़रूर देखेंगे कि हमारे जीवन में परिवर्तन हुआ है। और यह परिवर्तन ही सबूत है कि भगवान हमारे साथ हैं, और भगवान हमें आगे लेके जाएंगे। तो जो भगवान हमें यहाँ तक लाए हैं, वो हमें आगे तक भी लेके जाएंगे।
जो भौतिक जगत जो है, यह एक मैराथन (marathon) है, और उसमें अगर मानव जीवन मिल गया है, मानव जीवन में भक्ति मिल गयी है, तो मतलब यह एक मैराथन का लास्ट लैप (last lap) है, आखिरी भाग है। तो हम वो पूरा मैराथन बिना हमको पता हुए, भाग चुके हैं, अभी आखिरी दौड़ आ गई है। अगर चलते रहेंगे, तो ज़रूर हम पहुँच जाएंगे।
चिंता न करें, भगवान पर विश्वास रखें
तो Be not fretful or fearful, be faithful.
‘फ्रेटफुल’ (fretful) मतलब, हमेशा हताश रहना, “अरे ये अच्छा नहीं हुआ, वो अच्छा नहीं हुआ, वो अच्छा नहीं हुआ।” अगर हम सबको देखना है कि हमारे दुनिया में क्या क्या गलत हुआ है, सबके जीवन में इतना सारा गलत हुआ है। मैं कनाडा में था, एक भक्त है, वो साइकोलॉजिस्ट (psychologist) हैं, तो वो बोले थे कि “मैं अभी तक इंडिविजुअल थेरेपी (individual therapy) करता था, एक-एक व्यक्ति से मिलता था, तो अभी मैं ग्रुप थेरेपी (group therapy) कर रहा हूँ।”
तो मैं उनको बोला कि अगर 5, 10, 15 लोग रह रहे हैं, तो कौन अपनी सारी जीवन कहानी सबको बताएगा? तो मैं बोला कि “नहीं, हमारा कोड होता है कि किसी को कुछ बताने का नहीं है।” पर वो बोले कि जैसे ग्रुप थेरेपी करते हैं, तो उसका फायदा क्या होता है, कि सबका मन उनको बोलता है कि “तुम्हारे जैसी समस्या किसी को नहीं है।” हमको ऐसे लगता है कि हम जितने भी दुखी हैं, हम और दुखी से बन जाते हैं। वो लगता है कि मानो आपके सिवा सब लोग सुखी हैं। पर वास्तव में, सबके जीवन में दुख हैं।
तो सबके जीवन में दुख हैं, सबके जीवन में समस्या है। तो बता रहे थे कि, उन्होंने एक बार एक्सरसाइज (exercise) किया, कि अगर बौद्धिक स्तर पर हो सकता है, सबने अपनी-अपनी समस्याएं बताईं। क्या-क्या उनके जीवन में दुख हुए हैं और समस्याएं हैं। और फिर उन्होंने बोला कि “अगर आपके पास शक्ति होती है कि आप अपनी समस्या किसी और को दे दें और दूसरे की समस्या आप ले लें, तो क्या कोई किसी का एक्सचेंज (exchange) करना चाहेगा?” तो किसी ने हाथ ऊपर नहीं किया। तो क्या है, सबके जीवन में समस्या हो रही है।
तो क्या है, हम सबको दक्ष बनना है। कि वो भगवान हैं जो समस्या को भी हल कर सकते हैं। हम सब क्या हैं, एक तरह से एक्सपर्ट (expert) हैं, हम सब ब्लेमिंग (blaming) में एक्सपर्ट हैं। कि हमारी परिस्थिति को दोष देने में, “अरे ये ऐसा है इसलिए मैंने नहीं कर पाया हूँ। वो ऐसा है इसलिए नहीं कर पा रहा हूँ।” अब ये सही है, वो परिस्थितियां हैं, पर परिस्थितियों को दोष देने से कुछ नहीं बड़ा होता। “वो परिस्थितियों में भी मैं कैसे भक्ति कर सकता हूँ”, ये देखना है।
तो इसलिए जो भी हमारे जीवन में बुरा हुआ है, वह सब हुआ है, पर भगवान इतने दक्ष हैं कि Krishna can bring good even out of the bad. जो बुरा भी हमने किया है, किसी ने हमारे साथ किया है, वो सब के बावजूद भगवान वो बुरे से भी अच्छा ला सकते हैं। तो हमने गलती भी की है, तो ऐसे कोई भी गलती ऐसे हमेशा के लिए नहीं होती है। भगवान हमारी गलतियों से भी सही मार्ग दिखा सकते हैं।
मान लीजिये अगर आप जीपीएस (GPS) यूज़ करके कहीं ड्राइविंग कर रहे हैं, अभी मैं अबू धाबी से यहाँ पे आया, तो हम ड्राइविंग कर रहे थे। अब मान लीजिये जीपीएस बोलता है “आप राइट (right) में जाओ”, और व्यक्ति लेफ्ट (left) में चला जाता है। तो तभी क्या होता है, जीपीएस क्या करता है तभी? तो ड्राइविंग करते समय तो जीपीएस बोलता है, “अभी ऐसे जाओ।” तो जीपीएस यह नहीं कहता है, “मैं तुमको राइट बोला था, तुमने मेरी बात नहीं मानी, गेट लॉस्ट (get lost)!”
तो भगवान हैं, ये अल्टीमेट जीपीएस (ultimate GPS) हैं! तो भले ही हमने गलतियां भी क्यों ना की हों, कितनी भी गलतियां की हों, भगवान हमारे साथ हैं। और किसी ने हमको गुमराह भी किया हो, किसी ने हमारे साथ बुरा किया हो, फिर भी जो बुरे से भी भगवान अच्छा लाने में दक्ष हैं।
तो इसलिए जो भूत हो गया है, तो छोड़ दो, भगवान उसको देख लेंगे। भगवान उसको जो भी अच्छा लाना है, उससे लेके आएंगे। और जो भविष्य है, भविष्य में क्या होने वाला है, हमको पता नहीं है। तो भूतकाल के बारे में हम फ्रेटफुल हो सकते हैं, बहुत खेद करते रह सकते हैं, और भविष्य के बारे में चिंता कर सकते हैं, फियरफुल (fearful), “यह हो जाएगा, वो हो जाएगा, वो हो जाए…”
मैं रोज़ गीता पे एक लेख लिखता हूँ, मेरी एक वेबसाइट है ‘गीता डेली’ (Gita Daily), मिला जुला के एक मिलियन फॉलोवर्स हैं फेसबुक पे, तो वहाँ पे मैं एक लेख लिखा था, गीता डेली पे, कि चिंता यह क्या है? Worry is like the tax we pay on loans we haven’t yet taken. चिंता यह क्या है, यह वो टैक्स है, हम टैक्स भर रहे हैं उन कर्ज़ों के लिए जो हमने अभी तक लिया ही नहीं है! मतलब क्या, “अरे यह ऐसा होगा तो क्या होगा, वैसा होगा तो क्या होगा, वैसा होगा तो क्या होगा?” अब हम इतनी सारी चीज़ों के बारे में चिंता करते हैं, वास्तव में बहुत सी चीज़ें होती ही नहीं हैं, पर हम चिंता करते रहते हैं।
तो भविष्य में जो आएगा, भगवान हमारे साथ हैं, भगवान हमारा मार्गदर्शन करेंगे। We don’t know what the future holds, but we know who holds the future. हमें पता नहीं है कि भविष्य में क्या है हमारे लिए, पर भविष्य किसके हाथ में है, वो हमें पता है।
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन। भविष्याणि च भूतानि… (भगवद्गीता ७.२६)
भगवान हमारा मार्गदर्शन करेंगे। इसलिए अगर हम फेथफुल (faithful), श्रद्धावान बन जाते हैं, भगवान की श्रद्धापूर्ण भक्ति करते हैं, तो फिर जो भी समस्याएं आएंगी, भगवान हमें उनके पार ले जाएंगे। वही भगवान जो जन्मों जन्मों से हमारा साथ दिया है, वह अभी भी हमारे साथ हैं, और वही भगवान जो हमें यहाँ तक लाये हैं, वो आगे भगवद्धाम तक भी हमें ज़रूर ले जाएंगे।
सारांश (Summary)
तो मैं एक सारांश बोल दूँगा क्लास का। चार पॉइंट हमने देखे।
- इच्छा: सबसे पहला पॉइंट था, आध्यात्मिक जगत जाना है तो इच्छा। और इच्छा हम जाग्रत कैसे करते हैं? कि सबसे पहले समझना कि मेरी शाश्वत जीवन की इच्छा जो है, वो मेरे शाश्वत स्वभाव से, आत्मा, और शाश्वत प्रेम की जो इच्छा है उसके शाश्वत वस्तु हैं भगवान। इस दुनिया में जो भी आकर्षक चीज़ें हैं, वो भगवान से ही आती हैं, पर वो मुझे भगवान के पास ले नहीं जाती हैं। तो उन चीज़ों पर केंद्र करना है जो मुझे भगवान के पास ले जाएंगी।
- पात्रता: दूसरा बात क्या था? पात्रता। हमारी कोई पात्रता नहीं है, पर भगवान की इच्छा, भगवान की कृपा, भगवान का प्रेम ही हमारी पात्रता है। क्योंकि भगवान चाहते हैं हम आ जाएं, तो इसलिए उनकी कृपा से हम ज़रूर वहाँ पर पहुँच सकते हैं।
- प्रक्रिया: तीसरा था पद्धति या प्रक्रिया। पद्धति में हमने देखा कि क्या है? आध्यात्मिक जगत जाने के लिए, शारीरिक स्तर पर जाना नहीं है, चेतना के स्तर पर जाना है। तो हमें भगवान के प्रति प्रेम जाग्रत करना है। तो भक्ति जो है, एक्सक्लूसिवली, डायरेक्टली हम करते हैं सत्संग में आके, पूजा, सेवा, भजन करके। और फिर इंक्लूसिवली (inclusively) जो, इनडायरेक्टली करते हैं, हमारा जो कर्तव्य है, परिवार है, नौकरी है, वो सब सेवा भाव में करके। और ऐसे करेंगे, तो धीरे-धीरे भगवान हमारी चेतना के केंद्र में आएंगे। हम जो भी कार्य कर रहे हैं, वो कार्य सचेत रहेंगे, पर भगवान को उद्देश्य के रूप में हम स्मरण करेंगे।
- एटीट्यूड (Attitude): और अंत में, क्या है, जो हमारा एटीट्यूड, जो भाव है। कि भले ये आध्यात्मिक प्रगति करना बड़ा मुश्किल लगे, पर भगवान हमेशा हमारे साथ हैं। और जो भगवान हमें यहाँ तक ले आए हैं, वहाँ भगवान हमारे साथ रहकर, हमारे पूर्व में जो भी बुरा हुआ है, उससे अच्छा लाएंगे। भविष्य में जो भी आएगा, उससे भी वो संरक्षण करेंगे, और वो हमें उन तक ज़रूर पहुँचा देंगे।
बहुत-बहुत धन्यवाद! हरे कृष्णा।
प्रश्न-उत्तर (Q & A)
पीछे कोई सवाल है, माइक है वहाँ पे।
प्रश्न: भौतिक जगत से आध्यात्मिक जगत जाने की इच्छा है या मजबूरी है? यह इच्छा है या मजबूरी है?
उत्तर: वास्तव में, यह कई बार… उस इच्छा की शुरुआत मजबूरी हो सकती है। पर वह इच्छा वास्तव में जाग्रत होनी चाहिए। मतलब कैसे होता है? ऐसा इंग्लिश में कहावत है, There are no atheists in foxholes. फॉक्सहोल (foxhole) मतलब कोई मृत्यु के पास में आ गया है, तो फिर भगवान को पुकारते हैं, भगवान की मदद मांगते हैं।
तो कई बार मजबूरी के कारण हम भगवान के पास जा सकते हैं, और आध्यात्मिक जीवन की प्रगति की जो शुरुआत है, कभी-कभी मजबूरी से होती है। क्या होता है, कहते हैं “यह समस्या आ गई, यह समस्या आ गई, यह समस्या आ गई, किसी का हल नहीं मिल रहा है”, तो फिर आप भगवान के पास पड़ जाते हैं। तो किसी भी प्रकार से हम भगवान के पास आएं, यह अच्छा है।
पर अगर हम केवल मजबूरी के कारण भगवान के पास आ रहे हैं, तो उसकी एक अच्छी बात यह है कि हम भगवान के पास आ रहे हैं। पर एक बात उसकी अच्छी नहीं है कि जब मजबूरी चली जाएगी… तो हम बड़ी समस्या आ गई, बड़ी खिन्नता से भगवान की भक्ति करते हैं, और समस्या चली जाएगी, “थैंक यू, बाय-बाय!” ऐसे हो जाएगा!
कई बार, अभी मैं पुणे में था, तो हमारे मंदिर के बाजू में एक विद्यालय था, और वो विद्यालय के विद्यार्थी साल भर मंदिर में नहीं आते थे। पर मई महीने में सब मंदिर में आने लगते थे। तो अब यह क्या है कि मई में कोई भक्ति उत्पन्न करने वाला महीना नहीं है, पर क्या है वहाँ पे परीक्षा है! तो “हे भगवान मुझे पास कर दो आप।”
तो फिर क्या, मजबूरी के कारण हम आ सकते हैं भगवान के पास, और किसी भी तरह से आएं वो अच्छा है। पर उसके बाद में, अगर हम भक्तों का संग करते हैं और तत्वज्ञान समझते हैं, और जो वास्तव में मजबूरी के कारण भगवान के पास नहीं आए, जो भगवान की प्राप्ति के लिए भगवान के पास आए हैं, ऐसे भक्तों का संग करते हैं, उनसे तत्वज्ञान समझते हैं, तो फिर हमारी भक्ति जो है वो स्थिर हो जाएगी। नहीं तो फिर वो भक्ति केवल मजबूरी के कारण आएगी, मजबूरी चली जाएगी तो भक्ति चली जाएगी।
तो इसलिए हमें किसी भी तरह से व्यक्ति भगवान के पास क्यों ना आए, वो अच्छी बात है। पर अगर उसमें अग्रसर रहना है, तो केवल नकारात्मक कारण पर्याप्त नहीं हैं। “यह भौतिक जगत इतना दुखालय है इसलिए मुझे भगवद्धाम जाना है”, यह नकारात्मक कारण पर्याप्त नहीं है। क्योंकि दुख लगता है कभी-कभी, सुख भी मिलता है। कभी लगता तो है कभी सुख मिल जाएगा।
तो इसके कारण क्या है कि नकारात्मक कारण से हम भक्ति शुरुआत कर सकते हैं, पर यह सकारात्मक कारण से अग्रसर होते हैं। इसलिए सत्संग करना, शास्त्रों का अध्ययन करना, खास करके उन भक्तों का संग करना जो भगवान की प्राप्ति के लिए भक्ति कर रहे हैं, सिर्फ दुख से निवारण के लिए भक्ति नहीं कर रहे हैं।
हर कदम हर कदम… अगला सवाल कहाँ है?
प्रश्न: जैसे हमने सुना है कि हमारे पास फ्री-विल (free will) है, डिज़ायर (desire) है। तो इसके बारे में कैसे जान सकते हैं? कि हमारा डिज़ायर, जैसे अभी आपने इच्छा के बारे में बताया है कि मजबूरी नहीं है और सकारात्मक रूप के लिए हमने, और आगे बढ़ सकते हैं। पर कई बार ऐसा देखा जाता है कि हम दूसरे व्यक्ति को जाकर बताते हैं कृष्णा के बारे में, उनकी इच्छा को जाग्रत करने की कोशिश करते हैं पर वो आते नहीं हैं। उसमें अगर हम भक्ति कर रहे हैं और उसे भक्ति में लाने का प्रयास करते हैं, पर उनमें वो इच्छा जाग्रत ही नहीं होती है। तो क्या उनकी भगवान मदद नहीं कर रहे हैं या क्या हो रहा है?
उत्तर: वास्तव में दो चीज़ें हैं इसमें। कि भगवान हमेशा चाहते हैं कि हम सब जीव उनके पास आएं। पर भगवान हर एक जीव की स्वेच्छा का आदर करते हैं, वो ज़बरदस्ती नहीं करते किसी से। और अलग-अलग लोग उनकी आध्यात्मिक जर्नी (journey), सफर में अलग-अलग स्तर पर हैं। तो कुछ लोग शायद अभी तैयार नहीं हैं भक्ति के लिए।
और ये शायद हमारी कमी नहीं है। प्रभुपाद जी स्वयं 30-40 साल तक भारत में प्रचार कर रहे थे, पर ज़्यादा लोग भक्त नहीं बन पाए थे। लोग पुण्यवान थे, पर साधना भक्ति को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। तो कभी-कभी क्या होता है, परिस्थिति और मनःस्थिति ऐसी हो सकती है कि व्यक्ति तभी भक्ति के लिए तैयार नहीं हो। तो हमारी ज़िम्मेदारी यह है कि लोगों को मार्ग दिखाना।
अगर वो मार्ग स्वीकार नहीं कर रहे हैं, तो हम एक अच्छी तरह से… भगवान कहते हैं भगवद्गीता (३.२६) में:
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्। जोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन्॥
भगवान कहते हैं कि लोगों के मन को विचलित मत करो। तो वो जिस स्तर पे हैं, उस स्तर पे उनको आगे बढ़ने की कुछ युक्ति करो, कुछ उनको सुविधा दो। तो यहाँ पर दूसरी चीज़ बहुत पहले है कि हम वो दरवाज़ा खोल के रखें।
दूसरा पॉइंट यहाँ पर यह है कि हम देख सकते हैं कि मैं किस हद तक, किस तरह से भक्ति उनके लिए रेलिवेंट (relevant) बना सकता हूँ। उनके लिए महत्वपूर्ण है, यह दिखा सकता हूँ। कैसे है कि अगर यह भक्ति का सर्कल (circle) है और यह सर्कल है उन लोगों के इंटरेस्ट (interest) का, तो अभी यह दो सर्कल कहाँ मिलते हैं, वहाँ अगर हम देखते हैं, तो कभी हमको लगे मिलते ही नहीं हैं। पर ऐसे नहीं है कि भक्ति सिर्फ यही कार्य करेंगे तो भक्ति है। अगर हम देखते हैं कि इन दोनों में कैसे मिलाप ला सकते हैं, तो फिर अगर हम उसमें थोड़ा अन्वेषण करते हैं, थोड़ा विचार करते हैं, तो भगवान हमें मार्ग दे सकते हैं।
मैं अमेरिका में था, एक परिवार के घर में था वहाँ पे। और वो पति-पत्नी दोनों बहुत हाईली क्वालिफाइड (highly qualified) हैं, पीएचडी (PhD) हैं दोनों, और दोनों बहुत अच्छे से भक्ति कर रहे हैं। अब उनका जो बच्चा है, वो रोबोटिक्स (robotics) में ब्रिलियंट (brilliant) है, आठ-दस साल का होगा। पर वह अमेरिका के नेशनल लेवल रोबोट बनाने के कॉम्पिटिशन में पार्टिसिपेट (participate) करता है।
तो अभी वह बता रहे थे कि रोबोट बनाने में इतना उत्साही है, पर इसको भक्ति में कोई उत्साह नहीं है, तो हम क्या करें? तो फिर मैं उससे बात कर रहा था, पूछा कि, “आप रोबोट कैसे बनाते हो? क्या-क्या किस चीज़ के रोबोट बनाते हो?” तो फिर वह बड़े उत्साह से… जब भक्ति की बात कर रहे थे तो कुछ उत्साह नहीं था, पर रोबोट के बारे में ऐसे जैसे कि जीवन का प्रेम है रोबोट से, प्रेम से, उत्साह से बात कर रहा था।
फिर जब बात हो रही थी, तो मैंने उसको पूछा कि, “कैसा रोबोट बनाना है, इसके आइडिया आप कहाँ से लाते हैं?” उसने कहा, “हम अधिकांश रूप से जो अमेज़ॉन (Amazon) के लिए रोबोट होते हैं, जो टॉकिंग (talking) करते हैं, लिफ्टिंग (lifting) करते हैं, वो उसके रोबोट बनाते हैं।” “तो आपको नए आइडिया मिलते हैं, तो अच्छा लगता है?” “हाँ, नए आइडिया से तो हमको कॉम्पिटिशन में जीतने का और मौका मिलता है!”
तो फिर मैंने बोला कि, “तो आप ऐसे रोबोट बना सकते हो, मैं एक सुझाव दूँ आपको, कि, अभी कृष्ण भगवद्गीता बोल रहे हैं, अर्जुन सुन रहे हैं, तो इसका आप रोबोट बना सकते हो?” पहले तो वो चला गया वहाँ से। फिर पाँच मिनट बाद आया। फिर आके बोला वो, “वास्तव में ये आइडिया तो अप्रतिम हो गया है! ऐसा तो कोई नहीं करने वाला है।”
तो अगर हम लोगों की रुचि को भगवान की सेवा से जोड़ दें, तो वे निश्चित रूप से आकर्षित होंगे।
बहुत-बहुत धन्यवाद! श्रील प्रभुपाद की जय! गौर भक्त वृन्द की जय! निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!