Ramayana wisdom – How devotion frees us from doubt and dissension – Hindi
[Talk at ISKCON, Belgaum, India]
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Lecture Summary
1. संशय और नकारात्मक संकल्पनाएं (Concept vs. Reality)
- रिश्तों की जटिलता: रामायण एक ऐसा ग्रंथ है जो संबंधों (relational book) और उनमें आने वाली गलतफहमियों को नाटकीय और व्यावहारिक रूप से दर्शाता है।
- अंगद का संशय: जब वानर सेना सीता की खोज के लिए दक्षिण दिशा में गई और उन्हें सफलता नहीं मिली, तो राजकुमार अंगद के मन में सुग्रीव के प्रति गहरा संदेह और नकारात्मक भाव उत्पन्न हो गया। उन्हें लगा कि सुग्रीव उन्हें क्षमा नहीं करेंगे और उनका वध करवा देंगे।
- संकल्पनाओं का प्रभाव: भगवदगीता (अध्याय 18) के अनुसार, तमोगुण या नकारात्मक दृष्टिकोण के कारण हम किसी व्यक्ति के बारे में एक ही बात को सब कुछ मान लेते हैं।
- मूल सिद्धांत: दूसरों के कार्य सीधे तौर पर हमारी भावनाओं का कारण नहीं बनते, बल्कि उनके बारे में हमारी अपनी संकल्पनाएं (Conceptions) हमारी भावनाओं का कारण होती हैं।
2. दृष्टिकोण बदलने और स्पष्टीकरण के उपाय
- सकारात्मक दृष्टि विकसित करना: किसी व्यक्ति के केवल नकारात्मक पक्षों को देखने के बजाय उसके अच्छे कार्यों को भी देखना चाहिए।
- सही स्रोतों से सुनना: हम किसके साथ समय बिता रहे हैं और किसकी बात सुन रहे हैं, यह हमारी संकल्पनाओं को प्रभावित करता है। वरिष्ठ और विश्वासपात्र व्यक्तियों के विचारों को ही अधिक गंभीरता से लेना चाहिए।
- सीधा स्पष्टीकरण (Direct Clarification): हम अक्सर एक-दूसरे के बारे में बात करते हैं लेकिन एक-दूसरे से बात नहीं करते (We speak more about each other than with each other)। किसी महत्वपूर्ण रिश्ते में गलतफहमी दूर करने के लिए सीधे और शालीनता से संवाद करना चाहिए, न कि चरित्र पर सीधा प्रहार (चरित्र हत्या) करना चाहिए।
- स्थायी लेबल न लगाना: लोगों के स्वभाव और परिस्थितियां बदल सकती हैं, इसलिए किसी को भी हमेशा के लिए नकारात्मक लेबल (Permanent Labels) नहीं देना चाहिए।
3. संकट, प्रार्थना और अप्रत्याशित समाधान (सम्पाती का प्रसंग)
- हृदय की भूख: जिस तरह शरीर को ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है, उसी तरह हमारे हृदय को ‘समझने और समझे जाने’ (Understanding) की आवश्यकता होती है।
- बड़ी समस्या का समाधान: जब वानर दल मृत्यु के भय से ग्रस्त था और हनुमान जी भगवान से मार्गदर्शन की प्रार्थना कर रहे थे, तब अचानक विशाल गिद्ध सम्पाती का आगमन हुआ।
- अप्रत्याशित मदद: कई बार हम छोटी समस्या का हल मांगते हैं, और जीवन में बड़ी परिस्थिति आ जाती है। यह बड़ी समस्या हमारे मन को छोटी चिंताओं से मुक्त कर देती है। भगवान की प्रार्थनाओं का उत्तर अलग-अलग और अनपेक्षित पद्धतियों से आ सकता है।
4. सेवा भाव और भगवान से अटूट संबंध
- राम के प्रति निष्ठा: भले ही अंगद के मन में सुग्रीव के प्रति संशय और रोष था, लेकिन श्रीराम के प्रति उनका सेवा भाव और समर्पण पूरी तरह बरकरार था।
- भक्ति में बाधा न बनने दें: जीवन में किसी व्यक्ति या परिस्थिति के कारण हमें ठेस पहुँच सकती है, लेकिन द्वेष या नाराजगी को कभी भी अपने और भगवान के बीच नहीं आने देना चाहिए।
- श्रील प्रभुपाद का उदाहरण: जब प्रभुपाद जी भारत में प्रचार के दौरान कठिनाइयों का सामना कर रहे थे, तब एक साधारण पोस्टमैन के सुझाव (ग्रंथ लेखन) ने उनके जीवन और मिशन की दिशा बदल दी। यदि हम सेवा भाव बनाए रखते हैं, तो भगवान किसी न किसी माध्यम से हमें उचित मार्गदर्शन अवश्य प्रदान करते हैं।
Full Transcription
यहाँ आपके दिए गए प्रवचन के पहले भाग (Part 1 of 2) का सुधारा हुआ संस्करण है। इसे विशेष रूप से वर्डप्रेस (WordPress) में सीधे कॉपी-पेस्ट करने के लिए साफ़-सुथरे और सुंदर मार्कडाउन (Markdown) फॉर्मेट में तैयार किया गया है।
निर्देशों के अनुसार, मूल शब्दों को ज्यों का त्यों रखा गया है (Verbatim Correction), बस जो गलतियाँ (typos, grammar, spelling) थीं और जो संस्कृत का श्लोक टूटा हुआ था, उसे शुद्ध कर दिया गया है। मूल शब्द संख्या (word count) को पूरी तरह से बरकरार रखा गया है, केवल एक शब्द (“नहीं कहता है”) के अत्यधिक दोहराव और बीच में आई कुछ निरर्थक लिपियों (glitches) को साफ किया गया है ताकि पढ़ने में प्रवाह बना रहे।
रामायण में संबंधों और संशयों की नाट्यात्मकता
हरे कृष्णा, हरे कृष्णा! बहुत आभारी हूँ मैं। आप सबके बीच आज यहाँ पे भगवान के बारे में कोई चर्चा करने का मौका मिल रहा है।
तो आज रामायण के आधार पर मैं इस विषय पर चर्चा करूंगा कि किस तरह से हमारे मन में संशय आते हैं और उस संशय के परे हम कैसे जा सकते हैं। रामायण जो ग्रंथ है, यह अधिकांश रूप से, it is a relational book (यह संबंधों की पुस्तक है), संबंधों से भरा हुआ है। और संबंध जब होते हैं, तो संबंध में किस तरह से गलतफहमियां आती हैं, किस तरह से छोटी चीजें बड़ी हो सकती हैं, यह सब रामायण में बड़ा ही नाट्यात्मक तरीके से बताया गया है।
सीता की खोज और अंगद का संशय
तो हम किष्किंधा कांड में, उसमें से एक प्रसंग की चर्चा करेंगे कि जब वानरों को भेजा गया सीता की खोज के लिए। सबकी अपेक्षा थी, श्रीरामचंद्र की और औरों की, कि दक्षिण में जो समूह जा रहा है, वह सीता को खोज ला पाएगा। क्यों? दक्षिण वाला खोज पाएगा? कोई बोल सकता है? यह देखा था न? हाँ, देखा था न। सुग्रीव ने जब देखा था, सीता जा रही हैं, तो वह दक्षिण की ओर जा रहे थे, रावण लेकर जा रहा था। जटायु ने भी देखा था। पर असुर तो मोहमाया करते हैं, तो ऐसा भी हो सकता है कि रावण पहले दक्षिण में चला जाए। तो तब रावण ने ध्यान भी नहीं दिया, देखा भी नहीं कि सीता ने कुछ अपने गहने नीचे डाल दिए हैं वानरों को देख कर।
तो तभी जिस दिशा में जा रहे थे, वही सत्य हो सकती थी। इसलिए जब दक्षिण में जो वानर जा रहे थे, उसमें कई बड़े शक्तिशाली वानर थे। सबसे पहले थे हनुमान जी, जिनको प्रभु श्रीरामचंद्र ने खास करके सीता को दिखाने के लिए एक मुद्रिका (Signet) दी उनको। तो उसके साथ-साथ उस यूथ (समूह) के जो प्रधान थे, वो अंगद थे।
अभी अंगद की परिस्थिति जो थी, थोड़ी विचित्र थी। अंगद राजकुमार था, पर अभी इतना बड़ा नहीं था कि वो स्वयं राजा बन सके। और जब बाली का वध हुआ था, तब बाली ने अपनी मृत्यु के पहले जो घृणा या नफरत का भाव हो, उसको निकालने का प्रयास किया था। उसने सुग्रीव से कहा था कि तारा और अंगद का कोई दोष नहीं है, गलती मेरी ही थी, तो उनके प्रति आप कभी क्रोध मत करो। और उसने तारा और अंगद से भी कहा कि मेरे कर्मों से ही मेरी मृत्यु हुई है, तुम सुग्रीव को दोष मत मानना। तुम सुग्रीव के आश्रय में रहो और सेवा करो।
तो फिर जब यह पहले से बताया नहीं था, तो तभी अंगद ने ये बात मानी नहीं फिर भी। और अंगद इस अवस्था में था क्योंकि उसने जब राम को देखा, तब क्या होता है, तो राम के प्रति अंगद की श्रद्धा बढ़ गई। पर सुग्रीव के प्रति अभी थोड़ा संदिग्ध था, थोड़ा नकारात्मक भाव था।
धारणाएं और हमारा व्यवहार
कि हमारे मन में कैसे होता है, जिन लोगों से हम हमेशा मिलते रहते हैं, जब उनसे बात करते हैं हम, तो हमारे पहले जितने भी वार्तालाप उनके साथ हुए हैं, उसके आधार पर, उसके प्रभाव में आकर हम उनसे वार्तालाप करते हैं।
कई बार ऐसे लोग होते हैं, लोग रस्ते पर घूमने जाते हैं तो किसी से मिलते हैं तो बड़ा स्माइल करके, “गुड मॉर्निंग”, “कैसे हैं”, “हाय”, “हेलो” करते हैं। और वही लोग घर में आते हैं, तो घर में किसी से अच्छी बात नहीं करते हैं, चिल्लाते हैं, गुस्सा करते हैं। So people are polite, किसी से अच्छी बात नहीं करते हैं। जो जानते नहीं हैं, उनसे अच्छा बर्ताव करना ज्यादा मुश्किल नहीं है। जिनको अच्छे से जानते हैं, उनके साथ अच्छा बर्ताव करना मुश्किल होता है, तो अच्छा बर्ताव करते हैं।
पर क्या होता है, हमारा मन जो होता है, वही बात जब सुनते हैं, तो हम, हमारी दूसरे व्यक्ति के प्रति जो भावना है, उसके अनुसार उनके वचनों को हम समझते हैं।
अभी क्या हो… अभी जब वानर सोच रहे हैं कि क्या करना है अभी हमें? एक तो तभी, कुछ वानर कहते हैं कि हमने अभी काफी ढूंढ लिया, कहीं सीता नहीं मिली, कहीं हमको सीता मिली नहीं है। वापस जाकर बोलते हैं। समय भी हो चुका है, समय से ज्यादा हो चुका है। तो वापस जाते हैं, हम बोलते हैं सुग्रीव को, और फिर देखते हैं सुग्रीव क्या कहते हैं।
पर अंगद कहने लग गया कि हमें वापस नहीं जाना चाहिए। अगर हम वापस जाएंगे तो वहाँ पे हमारी बड़ी बेइज्जती हो जाएगी। सुग्रीव हमें सजा देगा। सुग्रीव कभी ऐसे नहीं करेगा… जो व्यक्ति अपने ही भाई को मार सकता है अपने स्वार्थ के लिए, वो दूसरों को मारने के लिए उसके लिए क्या बड़ी बात है?
जब ऐसा कहने लगता है… अब अंगद वो यूथ का राजा, यूथ का प्रधान होता है और अंगद राजकुमार भी है। तो अभी जो सारे वानर होते हैं, उनमें उपद्रव बन जाता है। और फिर उन दोनों में एक-दो समूह बन जाते हैं और दोनों झगड़ा करने लगते हैं।
मतभेद और उनका व्यक्तिगत निवारण
तो अभी जाम्बवान, हनुमान, सब अंगद को समझाने का प्रयास करते हैं, पर अंगद सुनने के लिए तैयार नहीं होते हैं। तभी एक कहावत है कि जब दो हाथी लड़ते हैं, तो सबसे ज्यादा नुकसान घास का होता है। वो एक हाथी जीते, या दूसरा हाथी जीते। अगर नेता के पद में कोई दो लोग होते हैं, अगर उनमें झगड़ा हो जाता है, तो उनको भले कुछ प्रभाव न हो, पर उनके अधीन जो भी होते हैं, उनकी बड़ी हानि होती है, उनका बड़ा नुकसान होता है।
तो इसलिए अगर कोई मतभेद भी है, झगड़ा भी है, तो बेहतर है कि वो प्राइवेटली (Privately), व्यक्तिगत रूप में उसका निवारण कर लें। कि सारी दुनिया के सामने जो व्यक्तिगत झगड़ा है, उसे उघाड़ने की (सामने लाने की) जरूरत नहीं है।
पर यहां पर क्या हो गया था, अंगद का भाव इतना… अंगद का क्रोध, घृणा जो भी थी, वो इतनी प्रबल हो गई थी इस समय कि वो सुग्रीव की भर्त्सना करने लग गया। और वो कहने लग गया कि हमें कदापि वापस नहीं जाना चाहिए। तो क्या करना चाहिए? हमने काफी ढूंढ लिया, कहीं सीता नहीं मिली। सुग्रीव हमारे साथ, परिवार वालों, हमारे साथियों के सामने वो हमारा वध कर देगा। वो हमें गुनहगार बोल देगा और उनके सामने हमारा वध कर देगा। उससे बेहतर ही है कि हम यहीं पे हमारा शरीर त्याग दें। वो इस तरह से जब सोचने लग गया…
तो तभी कुछ वानर उसके पक्ष में आ गए, कुछ वानर हनुमान जी की बात सुन रहे थे। वो उन्हें बोले कि ऐसा कभी नहीं होगा, सुग्रीव कभी अन्याय नहीं करेगा। पर वो बात सुनने को तैयार नहीं थे।
तमोगुण का प्रभाव और एकांगी दृष्टिकोण
क्या होता है कि भगवदगीता में… भगवदगीता के अठारहवें अध्याय में भगवान ने बताया है कि तमोगुण का प्रभाव जब हो जाता है, तो तमोगुण से जब हमारी दृष्टि प्रभावित हो जाती है, तो हम जो भी देखते हैं वो पूरी मात्रा में नहीं देखते हैं। उसमें एक चीज को देखते हैं और वो एक चीज को सब कुछ बना देते हैं।
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्। अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्॥ (गीता १८.२२)
एक चीज को सब कुछ बना देना, ये तमोगुण का लक्षण है। जब ऐसा लक्षण हो जाता है किसी का, तो वो व्यक्ति सोचता है— “किसी व्यक्ति ने, उसने दस साल पहले ऐसे किया था, इसका मतलब ये व्यक्ति ऐसा ही है। उसने ऐसे बोला था मुझे, इसका मतलब इसका स्वभाव ऐसे ही है।”
तो जो कोई व्यक्ति होता है, उनके चरित्र या उनके स्वभाव में अलग-अलग प्रकार के गुण होते हैं। कुछ सत्त्वगुण होते हैं, कुछ रजोगुण और तमोगुण होते हैं। और इन सबको मिलकर ही व्यक्तित्व बनता है। फिर कभी-कभी क्या होता है, अगर हमारा किसी व्यक्ति के प्रति नकारात्मक भाव है, तो व्यक्ति एक शब्द क्रोध में बोलता है, तो अगर हमारा नकारात्मक भाव है, हम बोलेंगे “कितना बुरा व्यक्ति है!” पर अगर हमारा नकारात्मक भाव नहीं है, तो हम कुछ परेशान नहीं होंगे।
हमारी भावनाएं और पूर्व-संकल्पनाएं
तो कार्य वही है, वचन जो हैं वही हैं, पर उसका निष्कर्ष हम अलग निकालते हैं। इस तरह से जब हम दूसरों की क्रियाएं देखते हैं, तो दूसरों की क्रियाओं के आधार पर हमारे मन में कुछ भावनाएं आती हैं। क्रियाओं के आधार पर हमारे मन में कुछ निष्कर्ष हम करते हैं। पर वास्तव में वह क्रियाओं के कारण वह भावनाएं, निष्कर्ष नहीं आ रहे हैं। वह क्रियाओं के साथ-साथ, उनके बारे में हमारे मन में जो संकल्पनाएं हैं, वह संकल्पनाओं के कारण भावनाएं आती हैं।
So people’s actions don’t cause our emotions, it is our own conceptions about them that cause our emotions. (लोगों के कार्य हमारी भावनाओं का कारण नहीं होते, उनके बारे में हमारी अपनी धारणाएं ही हमारी भावनाओं का कारण होती हैं।) हमारी भावनाएं हमारी संकल्पनाओं के कारण आती हैं। तो इन संकल्पनाओं को समझना और संकल्पनाओं को सुधारना, यह महत्वपूर्ण है।
तो यह जो प्रवचन है, यह तीन विभागों में लूंगा मैं। उसका पहला पार्ट यह था कि हमारी जो भावनाएं आती हैं, वह दूसरों के कार्यों से ही केवल नहीं आती हैं, पर हमारी संकल्पनाओं से भी आती हैं। तो इस पॉइंट तक किसी का कोई सवाल है? नहीं कुछ सवाल, नहीं कोई कमेंट? मैं तीन पार्ट में लूंगा, हर एक पार्ट के बाद कुछ समय होगा, अगर इस पर सवाल पूछना है तो पूछ सकते हैं।
तो अगर हमारी संकल्पनाएं जो हैं, वह तो हमारी दृष्टि के अनुसार या दृष्टिकोण के अनुसार निर्धारित होती हैं, बनती हैं। तो हमारी दृष्टि को कैसे बदल सकते हैं? अब इसमें कैसे है, ये ऐसे होता है कि मुर्गी पहले आई या अंडा पहले आया? तो हमारी दृष्टि पहले आई है या हमारी संकल्पना पहले आई है? जो भी पहले आया, हम जहाँ से परिवर्तित कर सकते हैं, वहीं से करना है हमें।
मतलब क्या है, तो अभी उसमें अगर वो व्यक्ति कुछ बुरा कार्य करता है, कुछ अच्छा कार्य करता है। So क्या होता है, अच्छा कार्य करता है, तो हम उसे कैसे देखते हैं? “ये तो सिर्फ दिखावा करता है!” इस हद तक हम तुरंत सोच लेते हैं।
दूसरों के बारे में राय और स्पष्टीकरण का महत्व
तो अगर अच्छा कार्य करता है, तो उसकी ओर भी देखना चाहिए। और उसके साथ-साथ संकल्पना है। तो अगर हमें लगता है कि यह व्यक्ति बहुत बुरा है, तो अगर दूसरे कोई हमारे मित्र हैं, हमारे दूसरे जान-पहचान में हैं, जो उस व्यक्ति के बारे में बहुत सकारात्मक हैं, तो हम उनसे बातचीत कर सकते हैं। “तो हमें इस व्यक्ति में क्या सद्गुण दिखते हैं इतने?” तो ऐसे कर सकें… क्या कर सकते हैं हम? वहां संकल्पनाओं को ही परिवर्तित कर सकते हैं।
तो इसमें क्या पहले करना है? जो भी हम पहले कर सकते हैं, वो पहले करना है। तो अपनी दृष्टि को बदल सकते हैं कि जब वो सकारात्मक कार्य, अच्छे कार्य करे, तब उसको देखना और उसका कुछ नकारात्मक रूप से अर्थ नहीं निकालना। और दूसरा है कि उनके बारे में जो अलग प्रकार की संकल्पना है, दूसरों की हमसे अलग संकल्पना है, उसको भी सुनना, उनसे बातचीत करना। ताकि हम समझ सकें, “ठीक है, यह भी हो सकता है, पर यह सिर्फ एक पहलू है, इसके अलावा दूसरे दृष्टिकोण भी हो सकते हैं।” यह समझना चाहिए।
क्योंकि हम सबके साथ उतनी मात्रा में आदान-प्रदान नहीं कर सकते हैं। सबका आदान-प्रदान उतना हम समझ नहीं सकते हैं। तो अगर किसी व्यक्ति ने किसी अन्य व्यक्ति के साथ ज्यादा समय व्यतीत किया है, तो उनसे हम कुछ सुनते हैं— “अच्छा यह ऐसा है, यह ऐसा है।” तो यह एक तरह से अनिवार्य ही है। पर इसमें हम तीन चीजें देख सकते हैं:
सबसे पहले, हम किससे सुन रहे हैं? किससे सुन रहे हैं, मतलब कि अगर हम एक समुदाय में रहते हैं, भक्तों के समुदाय में रहते हैं, तो उस समुदाय में रहने के बाद हम कुछ समझ सकते हैं कि यह व्यक्ति, यह साधारणतया लोगों के बारे में नकारात्मक बात करता है। ऐसे नहीं कि वो गलत है, पर नकारात्मक बात करते हैं। और कुछ व्यक्ति हैं जो सकारात्मक बात करते हैं। तो हम किससे सुन रहे हैं, उससे हमारी संकल्पनाएं प्रभावित होंगी। पर किसकी संकल्पना है, वो हमें देखना चाहिए।
तो अगर कोई वरिष्ठ भक्त है या विश्वासपात्र है, उनसे सुनते हैं तो उसको हम और गंभीरता से लेते हैं, उनकी सुनते हैं। तो ठीक है, एक व्यक्ति का ऐसा विचार हो सकता है, ठीक है। पर हर कहानी के अनेक पहलू होते हैं। तो इसलिए उनकी संकल्पना को कितनी गंभीरता से लेना है, वो हमें बुद्धि से देखना है। यह पहली चीज है।
दूसरी चीज यह है कि अगर हम किसी व्यक्ति के साथ काफी आदान-प्रदान करने वाले हैं, हमें काफी समय तक साथ में सेवा करनी है, तो फिर अगर किसी और से हमने कुछ सुना है और उससे हमारे मन में कुछ प्रभाव हो गया है, तो बेहतर है कि उसका स्पष्टीकरण कर लें। क्या होता है कि हम एक दूसरे के बारे में बात करते हैं, एक दूसरे से बात नहीं करते हैं, वह समस्या हो जाती है। We speak more about each other than with each other.
मतलब क्या है, कि वहाँ क्या हुआ था? इसके बारे में पूछताछ करने के बजाय हम सीधे मान लेते हैं कि “मैंने यह सुना था इसके बारे में, तुम ऐसे हो” वगैरह। क्या हुआ था, इसके बारे में जरूर पूछ सकते हैं। तो उनको उनके स्पष्टीकरण करने का मौका दे सकते हैं। तो इसलिए दूसरों से भी हम सुनते हैं। और यह सबके साथ पार (Clear) नहीं कर सकते हैं। पर कोई ऐसा व्यक्ति है, जो हमारे जीवन में महत्वपूर्ण है, जिनसे हमें बार-बार आदान-प्रदान करना है, तो उनके साथ बेहतर है कि यह सीधा स्पष्टीकरण कर लें।
और स्पष्टीकरण करते समय क्या करना है? इस पर भी पूरा एक प्रवचन है मेरा, सेमिनार है एक्चुअलि (Actually)। क्या है कि, एक तो व्यक्ति का कार्य है। एक प्रसंग है, उस प्रसंग में उस व्यक्ति का कार्य है। और उस व्यक्ति का कोई गुण है या दुर्गुण है।
मतलब क्या है कि कुछ ऐसी प्रसंग या घटना हुई है, उसमें हमने सुना है कि इस व्यक्ति ने कुछ बेईमानी की। तो क्या है, इसमें एक है वो घटना, दूसरा है उस घटना में इस व्यक्ति का कार्य। और तीसरा है कि उस व्यक्ति के चरित्र के बारे में एक निष्कर्ष निकालना, कि “तुम बेईमान हो।”
तो अभी क्या है, जब हम स्पष्टीकरण चाहते हैं, तो बेहतर है कि जो भी चीज किसी से बात करनी है… तो अगर मान लीजिए कोई सर्जरी करनी है किसी को, तो क्या होता है? अलग-अलग प्रकार होते हैं। अगर सिर्फ यहाँ पर हमारी स्किन (Skin) है, उसको काटते हैं, तो उसको इतना दर्द नहीं होता है। वो व्यक्ति का कार्य है। और व्यक्ति का चरित्र जो है, तो अगर व्यक्ति के चरित्र के बारे में हम कुछ बोलते हैं— “तुम बेईमान हो”, तो फिर वो क्या होता है? वो एक नर्व (Nerve) को काटने के समान है! वो उसको असहनीय होता है। और उस स्पष्टीकरण की जगह पे तभी कोई एक बड़ा झगड़ा हो जाता है।
तो हमें काटना भी है तो दूर काटना है (सतही तौर पर)। मतलब उनसे यह मत पूछो कि “तुमने तभी बेईमानी की थी क्या?” मैं बहुत ही क्रूडली (Crudely) बोल रहा हूँ, हम कभी ऐसे बोलना नहीं चाहते, पर मैं उदाहरण दे रहा हूँ कि ऐसे समय, उस प्रसंग में वहाँ पर क्या हुआ था? तो वो क्या है… अगर हम जानकारी प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं, वो बात अलग है। अगर हम कुछ जजमेंट (Judgment) दे रहे हैं, तो वो बात अलग है।
तो इसलिए स्पष्टीकरण करते समय, अगर हम ऐसे करते हैं, तो फिर क्या होता है? कई बार, हमारी संकल्पना परिवर्तित भी नहीं होगी, तो कम से कम विस्तारित हो जाएगी। “ठीक है, यह व्यक्ति ऐसा दुष्ट है, पर यह ऐसे भी हुआ था।” तो शायद जो हमारी दृष्टि है, हमारी संकल्पना है, वो विस्तारित हो जाएगी।
और तीसरी चीज यह है कि लोग भी बदलते हैं। तो भले ही किसी व्यक्ति ने पहले ऐसे किया हो, उसका मतलब यह नहीं कि वो अभी भी वैसे ही होगा। तो हाँ, ठीक है, ऐसे बोल सकते हैं कि इस व्यक्ति से वार्तालाप हुआ होगा, तो उसके कारण, उनके बारे में मैंने सुना, तो यह ऐसे व्यक्ति हैं, क्रोधी व्यक्ति हैं। पर ठीक है, ऐसे नहीं कि हमेशा क्रोधी रहेंगे।
तो इसलिए We should not put permanent labels on anyone (हमें किसी पर स्थायी लेबल नहीं लगाना चाहिए)। क्या है कि हमें कुछ हद तक ऐसे लेबल… लोग परिवर्तित भी हो सकते हैं। तो इसलिए हमें, अगर हमारी संकल्पना कोई बन भी गई है, तो हमें वो संकल्पना की दृष्टि से ही केवल उसको नहीं देखना है। “ठीक है, शायद यह बदल भी सकता है।”
तो जिनसे मतभेद बनते हैं, उनसे ही बात कर लेते हैं, स्पष्टीकरण। कोई ऐसा अपने आपको नहीं बोलेगा कि सबको अपना ही समझा है। हमें भी सोचना चाहिए सबसे पहले कि यह अपनी सफाई दे रहा है, यह उनकी दृष्टि है।
सत्य की खोज और इतिहास के अलग-अलग पहलू
तो कैसे है कि सत्य जो है, वह जानना बहुत मुश्किल है। मुझे एक प्रस्ताव मिला था कि हमें इस्कॉन (ISKCON) का इतिहास लिखना है, क्या आप वो इतिहास लिख सकते हैं? तो मैंने कुछ दो-तीन प्रसंगों के बारे में, कुछ भक्तों से जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया। और वह तीन भक्त थे, वह एक ही परिस्थिति में थे, एक ही जगह में थे, और तीनों की जो दृष्टि थी, ऐसे लग रहा था कि ये तीन अलग प्रसंग हैं!
यहाँ पे ऐसी कुछ घटना हुई थी, क्या हुआ था? तो खास करके अगर कोई घटना ऐसे कंट्रोवर्शियल (Controversial), विवादास्पद है, तो तभी लोगों का जो तर्क-वितर्क होता है, लोगों का दृष्टिकोण होता है, इतना अलग-अलग होता है, कि सत्य क्या है, ये जानना बहुत-बहुत मुश्किल होता है।
ऐसे कहते हैं कि इतिहास जो हम पढ़ते हैं, वो सारा इतिहास जो होता है, जीतने वालों का लिखा होता है। जो हार गए होते हैं, वो कहाँ से इतिहास लिखेंगे?
तो इसलिए इतिहास अगर हम लिखते हैं, तो वो सत्य होगा, ऐसा सुनिश्चित नहीं है। अंग्रेजी में वो कहते हैं कि History is permanently disputed territory (इतिहास स्थायी रूप से विवादित क्षेत्र है)। जैसे भारत और पाकिस्तान में, जो कश्मीर है, वो विवादास्पद इलाका है।
यहाँ आपके दिए गए प्रवचन के दूसरे भाग (Part 2 of 2) का सुधारा हुआ संस्करण है। इसे विशेष रूप से वर्डप्रेस (WordPress) में सीधे कॉपी-पेस्ट करने के लिए साफ़-सुथरे और सुंदर मार्कडाउन (Markdown) फॉर्मेट में तैयार किया गया है।
निर्देशों के अनुसार, मूल शब्दों को ज्यों का त्यों रखा गया है (Verbatim Correction), और जो गलतियाँ (typos, grammar, spelling) थीं, उन्हें शुद्ध कर दिया गया है। मूल शब्द संख्या (word count) को पूरी तरह से बरकरार रखा गया है ताकि प्रवचन का प्रवाह और भाव ज्यों का त्यों बना रहे।
सत्य की खोज और दृष्टिकोण की भिन्नता
पर इतिहास जो है, वो हमेशा के लिए विवादास्पद इलाका है। तो इसलिए सत्य क्या है, यह जानना तो बहुत मुश्किल है। हमें तो कार्य करना है, तो हमें कुछ तो समझ चाहिए, और समझ के आधार पर हम कार्य करेंगे।
तो हाँ, वो जरूरी है। तो इसलिए मैंने बोला कि क्या होगा, कि हम एक व्यक्ति से एक चीज सुनते हैं, तो उससे क्या होगा, हमारी दृष्टि विस्तारित हो जाती है। तो ऐसा जरूरी नहीं है कि ये व्यक्ति सही बोल रहा है, और ये व्यक्ति गलत बोल रहा है, या ये व्यक्ति सफाई दे रहा है, और ये व्यक्ति सत्य बोल रहा है, नहीं।
अभी क्या होता है कि हर एक व्यक्ति का अपना दृष्टिकोण होता है, और वो दृष्टिकोण में भी, ये बहुत सूक्ष्म है, कि कुछ-कुछ व्यक्ति होते हैं, वो जानबूझ के सत्य जो है, वो एक तरह से एक ट्विस्ट (Twist) कर देते हैं, उसको कहते हैं सफाई दे रहे हैं। पर कुछ-कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं, कि वो उनका जो दृष्टिकोण है, उस पर ज्यादा जोर देते हैं। और फिर ऐसा नहीं है कि वो सफाई दे रहे हैं, पर उनकी दृष्टि उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
व्यक्ति को समझना और सहानुभूति (Empathy)
तो क्या होता है कि यह अपनी भावनाएं हैं, हमें इसे भी एक व्यक्ति के… व्यक्ति के दृष्टिकोण को संपूर्ण सत्य नहीं मानना चाहिए। तो व्यक्ति का चरित्र होता है, व्यक्ति का अधिकार होता है।
जो हम कुछ… मैं कुछ साल पहले यात्रा कर रहा था। अमेरिका में एक मंदिर में था, वहाँ एक जीबीसी (GBC) के अधिकारी आये थे। तो वो बता रहे थे कि कैसे मैंने कुछ… थोड़ा होती है… अग्रेसिव (Aggressive) मतलब क्या करना, ऐसे करना, ऐसे करना। सब हॉद (बहुत) तनाव। तो तभी उनके खिलाफ काफी दूसरे भक्तों ने कंप्लेंट (Complaint) किया। तो वहाँ पर जो जीबीसी आये थे, जीबीसी बोले थे कि “अभी ये बहुत कंप्लेंट हो गया।” तो फिर उन्होंने जीबीसी से बात किया और उन्होंने कहा कि जब लोग आपसे कुछ बात करने आते हैं, तो तुम्हें उनसे सहमति करने की जरूरत नहीं है, पर उनको ठुकराओ मत। वो जो बोल रहे हैं, सुनो आप। सुनो और समझो क्या कर रहे हैं।
तो वो बोला था कि “मैंने छह महीने ये ट्राई (Try) किया है और”, वो बोला, “नब्बे प्रतिशत मेरी समस्याएं कभी की चली गईं।”
पर लेकिन अगर लोग अपनी समस्या के लिए आते हैं, तो अच्छा करते हैं कि “तुमने ऐसे किया था तभी, मुझे बहुत बुरा लगा।” या “मेरी ऐसे करने की इच्छा नहीं थी।” “मैं समझ सकता हूँ कि आपको ये बुरा लगा होगा।” तो क्या है कि अगर हम लोगों से सुनते हैं, उनको समझते हैं… तो कैसे है कि जैसे हमारे शरीर के लिए ऑक्सीजन (Oxygen) जरूरी है, वैसे हमारे हृदय के लिए समझना जरूरी है। Just as our body longs for oxygen, our heart longs for understanding. कि मैं जो कर रहा हूँ, मैं जो बोल रहा हूँ, मैं जिस परिस्थिति से गुजर रहा हूँ, वो समझना चाहिए।
तो भले ही हम उनके वृत्तांत को स्वीकार न करें पूर्णतया, तो हम “हाँ, मैं समझ सकता हूँ कि तुम इसमें बहुत क्रोधित हुए होगे।” उतना भी अगर हम उनको समझते हैं, तो उससे भी क्या होता है, उनका अगर हम… कैसे, emotional temperature (भावनात्मक तापमान) जो होता है, जो उनकी भावना का तापमान होता है, वो कम हो जाता है। फिर उससे हम आगे बढ़ सकते हैं।
संकट के समय हनुमान जी की बुद्धिमत्ता
इस समय जब ऐसी परिस्थिति, विपत्ति आ गई थी उनमें, कि अभी ये दो गुट हो गए थे दोनों में, और अभी हनुमान क्या कह सकते थे? हनुमान तो सुग्रीव के साथ वन में रहे थे, काफी समय से उन्होंने सुग्रीव को देखा था, और अभी सुग्रीव तो वानरों के राजा भी बन गए थे। तो अभी हनुमान अंगद से कह सकते थे कि “तुम हमारे राजा के खिलाफ बगावत पुकार रहे हो! तुम राजा के खिलाफ द्रोह कर रहे हो! तुम राजा के खिलाफ सारे वानरों को उकसा रहे हो!” और हनुमान इस तरह से आरोप करके अंगद पर आक्रमण कर सकते थे।
पर हनुमान जी, अंगद के वचनों के भाव के प्रति जागरूक थे। हनुमान अंगद के भाव को देख रहे थे। क्या भाव था? कि वो अभी एक युवक था। अभी कुछ ही समय पहले उसके पिता गुजर गए हैं, वो एक प्रकार का सदमा है। उसके बाद में अभी एक पूरा वानरों का समूह है, उसमें उसको प्रधान बनाया गया है, पर वानरों के समूह में उससे भी वरिष्ठ वानर अभी और हैं, उनको लीड (Lead) करना इतना आसान काम नहीं है। तो वहाँ काफी टेंशन (Tension) में होता है।
कैसे होता है? कि अगर हमें कोई क्लास देने को बोलते हैं, तो अगर कोई नए लोगों का प्रोग्राम है और वहां पर हमको जाकर क्लास देने को बोला है, तो वो इतना सच मुश्किल नहीं है, जाकर हम अच्छे से दे आएंगे क्लास। पर, अगर हमको मंदिर में क्लास देने को बोला है, वहाँ पे हमारे सारे भक्त, हमारे समान भक्त, हमसे वरिष्ठ भक्त और वो बैठ के सुनने वाले हैं। तो फिर क्या होता है? तो फिर टेंशन और आ जाता है।
तो उसी तरह से क्या था? अंगद को अकेले नहीं भेजा गया था, कुछ युद्ध करने को नहीं बोला था। उसको बताया गया था कि ये सारा समूह है, जो ये यूथ है, उसको आपको लीडर बनना है, उसका आपको लीडर बनना है। तो ये बड़ा मुश्किल था। तो उसके लिए क्या था? ये एक तरह से उसकी पहली बड़ी सेवा थी और उसमें उसको अपयश मिल रहा था। तो इंग्लिश में कहते हैं, Hurt people hurt people (आहत लोग दूसरों को आहत करते हैं)। जो लोग खुद वेदना में हैं, वो दूसरों को वेदना पहुंचाते हैं।
भगवान से प्रार्थना और अप्रत्याशित समाधान
तो अभी क्या हो रहा था, तो हनुमान जी ने देखा। और तभी हनुमान जी ने अंगद से कुछ भी नहीं कहा कि तुम विद्रोह करते हो। वो उनको समझाने लग गए कि सुग्रीव ऐसे नहीं करेंगे। पर क्या था, वो सुग्रीव के प्रति जो नकारात्मक भाव था, उसके लिए कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे।
तो हनुमान जी मन ही मन प्रभु श्रीरामचंद्र से प्रार्थना करने लगे— “अभी क्या करूँ मैं? कृपया मार्गदर्शन करेंगे, कृपया मदद करेंगे।”
और कभी-कभी क्या होता है, जब हमारे जीवन में कुछ समस्या होती है, और हम भगवान से मदद मांगते हैं। तो कई बार मदद आती है बहुत ही अनपेक्षित पद्धति से। और कभी-कभी तो हम समस्या का हल मांगते हैं और उससे बड़ी समस्या आ जाती है!
तो अभी ऐसे ही हो गया। जब हनुमान जी प्रार्थना कर रहे थे कि “क्या होगा, कुछ मार्ग बताओ”, तभी अचानक वहाँ पे एक विशाल गिद्ध आ गया। कौन था वह? सम्पाती! और वह चलते हुए आ गया। वह कहने लग गया— “आज से मेरा भाग्य खुल गया है! इतने सारे वानरों को खाने का मौका मुझे मिलेगा।”
और अभी जो गिद्ध होते हैं। गिद्ध। Vulture (वल्चर)। जो गिद्ध होते हैं। गिद्ध। वह गिद्ध होते हैं। तो वह कई बार जानवरों को मारते नहीं थे। वह मृत जानवरों को खाते हैं, कि एक मृत्यु के पास न आ बैठो, शायद उनको आक्रमण करते हैं।
मृत्यु का भय और अंगद का विलाप
तो अभी यह क्या हो गया? यह जो सम्पाती आया और वो धीरे-धीरे चलते हुए आया और वानरों के बाजू में बैठ गया। और अब ये अंगद और बाकी सब जो वानर थे, वो क्या कर रहे थे? उन्होंने प्रायोपवेश किया था। प्रायोपवेश मतलब वो उपवास कर रहे थे मृत्यु तक। वो उनके बाजू में बैठ गया और इंतजार करने लग गया— “जैसे तुम गिर जाओगे, मैं तुमको खा लूँगा।”
तो अभी मृत्यु तो भयावह होती है सबके लिए, पर यह सोचना कि मृत्यु के बाद मेरा शरीर कोई काट के खा लेगा, वो और भयानक होता है। सारे वानर जो थे, वो थोड़े विचलित हो गए, भयभीत हो गए। और तभी अंगद, उनके बाजू में वानर था, उससे कहने लग गए कि “हमारा कितना दुर्भाग्य है कि हम राम की सेवा के लिए निकले, पर राम की सेवा में हम व्यर्थ हो गए। जिस तरह से जटायु की मृत्यु हो गई राम की सेवा में, वो यश नहीं प्राप्त कर पाए, ऐसे लगता है हमारी भी वही गति होगी।”
जटायु का नाम और सम्पाती का हृदय-परिवर्तन
अभी जैसे ही अंगद ने ‘जटायु’ शब्द का इस्तेमाल किया, तुरंत जो उनके बाजू में सम्पाती बैठा था, वो उठ गया। “जटायु? क्या बोला? जटायु के बारे में बताओ मुझे!” जटायु का नाम सुनते ही उसका चौकन्ना हो गया।
और फिर जो वचन उसने सुने, तो क्या हुआ, वो उसके मन में रजिस्टर (Register) हो गया। कई बार अगर हम कुछ काम कर रहे हैं और कोई कुछ बात कर रहे हैं, बात करते समय शायद हमारा नाम लेते हैं वो, तो तुरंत एंटेना (Antenna) उठ जाते हैं हमारे— “क्या बात कर रहे हैं?”
और फिर जब हम सुनते हैं— “वानर! बताओ मुझे!” तो फिर अंगद ने कहा, “तुम जटायु को जानते हो?”
“जानता हूँ? मैं तो जटायु का बड़ा भाई हूँ! कितने सालों से हमारा विरह हो गया!”
और फिर उसने पूरी कहानी बताई। कैसे वो सूरज तक पहुँचने का प्रयास कर रहे थे, और जब उड़ते-उड़ते सूरज के पास चले गए तो उसकी किरणें इतनी गरम हो गईं कि वो जटायु जलने लग गया। तो इसलिए एक बड़े भाई के रूप में, अपने पंख सम्पाती ने फैलाए। और सम्पाती ने जब फैलाए, तो सम्पाती के पंख जल गए और वो नीचे गिर गया। जटायु बच गए, पर जटायु कहीं और चले गए और तब से दोनों बिछड़ गए थे।
तो फिर अंगद ने पूरी कहानी बताई। अंगद ने पूरी कहानी बताई, तो फिर सम्पाती रोने लग गया। और फिर सम्पाती ने कहा कि “यहाँ पास… वो सागर के तट के पास मिले तो, सागर के पास मिलेगा… मैं कुछ जटायु को जल अर्पण करना चाहता हूँ।”
तो फिर उसने बताया, “कैसे मैं जब यहाँ पे नीचे गिर गया तो एक ऋषि… मैं यहाँ पे विलाप कर रहा था, खेद कर रहा था, दुख में था। तभी एक ऋषि आ गए और उन्होंने मुझे आध्यात्मिक ज्ञान दिया। मैंने बताया कि आत्मा…” और ऋषि ने कहा कि “मैं तुम्हारे पंख तुम्हें वापस दे सकता हूँ, पर मैं तुम्हें अभी नहीं दूँगा। भविष्य में राम के सेवक आएंगे, भगवान अवतार लेने वाले हैं। और उनके सेवक जब आएंगे और तुम उनकी कुछ सेवा कर सकते हो…”
सीता की खोज और नया उत्साह
तो अभी ये जब बता रहा था, तभी अपने विचारों में था, इतिहास बता रहा था, और तभी अंगद ने सुना और अंगद सोचने लग गया। अंगद ने पूछा, “हम सीता को ढूंढ रहे हैं, क्या तुम जानते हो सीता कहां गई है?”
और जैसे ही उसने सुना, ये तुरंत उठ गया! हताश हो गया… जब हम हताश होते हैं, तो हम ऐसे होते हैं, उत्साही होते हैं तो उठ जाते हैं। वह समझ गया— “वास्तव में जो ऋषि ने बताया था मुझे, मैं अभी देख सकता हूँ कि रावण, सीता को यहां से ले गया है! और ये सागर के परे लंका है और लंका में सीता ने रावण… रावण ने सीता को वहाँ पर रखा हुआ है।”
तो जैसे ही ये सुना, सारे जो वानर हैं, उत्साही हो गए! उत्सव करने लग गए, बड़े आनंदित हो गए कि “हमें पता चल गया सीता कहां हैं! पता चल गया सीता कहां हैं!”
छोटी समस्या बनाम बड़ी समस्या
तो अभी यहां पे, इस प्रसंग में हम दो चीजें देखेंगे। कि सबसे पहले, जो समस्या में थे, वो तो समस्या के हल की प्रार्थना कर रहे थे, उसमें क्या हो गया? उससे और बड़ी समस्या आ गई!
जब बड़ी समस्या आ जाती है, तो कई बार हम हताश हो जाते हैं। जब हताश हो जाते हैं, तो बोलते हैं, “यह क्या है? मैं भगवान से मदद मांग रहा हूँ, तो उससे बड़ी समस्या आ जाती है!” पर क्या है, कभी-कभी छोटी समस्या का हल होता है बड़ी समस्या। और बड़ी समस्या का हल शायद उससे बड़ी समस्या होगा! यह क्या बात हो गई? बड़ी समस्या, छोटी समस्या का हल कैसे हो सकता है?
क्या है, समस्या जब होती है, तो समस्या में दो चीजें होती हैं। एक है कि वो बाहर की परिस्थिति जो कठिन है। पर दूसरा है कि हमारा मन क्यों रोता है? हमारा मन ऐसा है कि कई बार छोटी समस्या को बड़ा बना देता है। छोटी चीज को बहुत बड़ा बना देता है।
अगर किसी व्यक्ति को कुछ खाने के लिए है नहीं, तो फिर सोचेगा, खाना मिल जाता है, तो फिर कुछ भी खाना हो, संतुष्ट हो जाएगा, “मुझे खाना मिल गया।” पर कोई व्यक्ति है, कोई मेजवानी (दावत) खा रहा है और उसमें दस व्यंजन हैं। नौ बड़े स्वादिष्ट बनाये हैं, दसवां भी स्वादिष्ट है पर उतना अच्छा नहीं है। तो क्या होगा? वो शिकायत करेगा— “क्या है, यह अच्छा नहीं बनाया, यह अच्छा नहीं बनाया!”
तो अभी वो अच्छा नहीं बनाया व्यंजन, वो सत्य है। और एक तरह से जब हम कुछ पका रहे हैं, तो अच्छे से सब कुछ पका रहे हैं, तो अगर अच्छा नहीं बनाया है, तो वो सत्य है, पर वो कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं है। पर जब वो एक छोटी समस्या है, और छोटी समस्या को हम बड़ा बना देते हैं।
एक व्यक्ति मेजवानी के लिए गया है और वहाँ पर उसको एक चीज अच्छी नहीं लगती। तो कई बार लोग शादियों के लिए आते हैं, और शादियों के लिए आते हैं, वो शादी में आते हैं खाना खाने के लिए। और शादी कितनी अच्छी है, वो देखते हैं, उसको कितना अच्छा खाना वहाँ पर मिल रहा है। तो उसके आधार पर वो आते हैं। और फिर उसमें एक चीज भी अच्छी नहीं होती, वो देखते हैं, “क्या है, कुछ चीज नहीं बना रहा था।”
तो ऐसे जब होता है, फिर बाद में अगर वो घर में आते हैं और फिर वहाँ पर कुछ खा रहे हैं, और अगर मान लीजिए कुछ समस्या आ गई है, क्योंकि घर में कुछ खाने के लिए है ही नहीं! और फिर तभी कुछ खाने के लिए मिल जाएगा, तो वह उससे बड़ी समस्या है।
पर यह बड़ी समस्या क्या करती है? हमारा मन छोटी समस्या से निकाल देती है। हमारी समस्या है, वास्तव में यह समस्या है। पर कई बार वो समस्या कितनी बड़ी है, वो हमारे मन पर निर्भर होता है। जब उससे बड़ी समस्या आ जाती है, तो फिर क्या होता है, “तो यह कोई बड़ी बात नहीं है।” उस बड़ी समस्या का सामना करने के लिए जब हमारा मन लग जाता है, तभी यह छोटी समस्या निकल जाती है।
तो इसलिए कभी-कभी हम प्रार्थना करते हैं समस्या के हल के लिए और दूसरी समस्या ही तभी आ जाती है। तो हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि भगवान मदद नहीं कर रहे हैं। तो भगवान मदद कर रहे हैं, पर शायद कभी कैसे हो सकता है कि वो बड़ी समस्या के कारण हमारा मन छोटी समस्या से निकल जाता है। और उससे हमारा… हम जो छोटी समस्या को बड़ा बना रहे हैं, वो उतनी बड़ी नहीं रहती है।
भगवान का मार्गदर्शन और सेवा भाव
इसलिए भगवान का, हमारी प्रार्थना का जवाब अलग-अलग पद्धति से आ सकता है। और हमें, अगर हम सेवा भाव रखते हैं कि “भगवान, मैं आपका सेवक हूँ, आप मेरे प्रभु हैं”, तो कोई भी समस्या, छोटी आए, बड़ी आए, हमारे मार्ग में नहीं आएगी। तो यह समस्याओं का हल कभी समस्या हो सकता है, यह एक बड़ी दिलचस्प बात है।
इसमें क्या होता है कभी, हम कुछ भक्तों में मतभेद हो जाते हैं। मतभेद तो है, पर कोई बड़ी समस्या आ जाती है तो सारे भक्त साथ में आ जाते हैं। “इतनी बड़ी समस्या आ गई, हमें सबको साथ में कार्य करना है।” तो कई बार ऐसा होता है कि भगवान बड़ी समस्या इसलिए भेजते हैं कि हम छोटी समस्याओं को बड़ा न बनाएं। तो इसलिए भगवान के जवाब अलग-अलग पद्धति से आ सकते हैं।
तो किसी का कोई सवाल है इसके बारे में? मैं एक सवाल लेता हूँ। तो इसके बारे में हम कंक्लूड (Conclude) करके कुछ और सवाल ले सकते हैं।
दूसरा पॉइंट यह है कि इसमें कि अभी उस समय जब सम्पाती आ गया था वहाँ पर। सम्पाती यहाँ पर उनका इंतजार कर रहा था कि कब यह सब गिर जाएंगे और मैं उनको खा लूँगा। तभी अकस्मात ही, अपने आप ही अंगद ने जटायु का उल्लेख किया। वास्तव में एक तरह से जटायु का उल्लेख करने की जरूरत भी नहीं थी। और अंगद तो जटायु को जानता भी नहीं था। अंगद तो जटायु से कोई मिले नहीं थे, जहां तक रामायण में वर्णन था, तो कोई मिले नहीं थे। पर फिर भी उस समय अंगद ने जटायु का उल्लेख क्यों किया? कैसे किया?
एक तरह से यहां पर हम देख सकते हैं कि अंगद का अभी भी सेवा भाव का मिलन था। अभी क्या था, अंगद… सुग्रीव यहां पर… राम यहां पे। तो अंगद, वानरों के राजा सुग्रीव, उनके अधीन में सेवा कर रहे थे और उनके ऊपर कौन थे? राम थे। तो अभी अंगद का संशय सुग्रीव के प्रति था। पर अंगद का कोई संशय राम के प्रति नहीं था। अंगद को राम की सेवा करने के बारे में कोई हिचकिचाहट नहीं थी, “उस पद्धति में मैं कैसी सेवा करूँ?”
भगवान और भक्त के बीच संबंध
तो क्योंकि अंगद का सेवा भाव बरकरार था। उस सेवा भाव के कारण उसने अपनी परिस्थिति राम के दूसरे ही सेवक से तुलना की। और उस तुलना करते हुए उसने वचन बोल दिए, कि “जो जटायु की स्थिति हुई, वो हमारी भी हुई।”
जब हमारा सेवा भाव होता है तो कोई भी व्यक्ति… हमें समझना चाहिए कि मेरा भगवान से संबंध है, यह इतना महत्वपूर्ण है कि कोई भी व्यक्ति मेरे और भगवान के बीच में नहीं आना चाहिए। तो अभी क्या होता है? यह अगर मान लीजिए हम यहाँ पे हैं और कोई भौतिकवादी व्यक्ति है और वो हमको बोलता है, “ऐसे करते हैं, ऐसे करते हैं, ऐसे करते हैं”, कोई भक्ति के विरुद्ध कुछ कार्य करने को बोलता है। तो हम बोलेंगे कि “नहीं, मैं यह नहीं करूँगा।”
हम भले ही उनसे बहुत करीब हैं, फिर भी हम… अगर वो कुछ गलत कार्य करने को बोले कि हम नहीं करेंगे। तो कोई आसक्ति के कारण, अगर हमें भगवान से दूर खींचता है तो हम वो आसक्ति को काटने का प्रयास करेंगे। पर इसके विपरीत, अगर हम किसी के प्रति घृणा करते हैं, राग और द्वेष होता है, तो द्वेष होता है कभी, कभी कोई द्वेष इतना शक्तिशाली बन जाता है कि वो द्वेष के कारण, हम उस व्यक्ति को हमारे और भगवान के बीच में आने देते हैं।
कभी-कभी कुछ दो भक्तों में झगड़ा हो जाता है। और फिर, मैं ऑस्ट्रेलिया में था, एक मंदिर में, दो भक्तों में बहुत झगड़ा हो गया था। तो फिर, मैं दो भक्तों से बात कर रहा था, तो दूसरे भक्त मुझे बता रहे थे कि “जब तक ये भक्त मंदिर में आएगा, मैं मंदिर में नहीं जाऊंगा।”
तो मैं उनको बोल रहा था, कि “मतलब आप, आपकी भक्ति इस व्यक्ति पर निर्भर कर रहे हो!” तो साधारणतया, हम आसक्ति के कारण भगवान से दूर नहीं जाएंगे, राग के कारण दूर नहीं जाएंगे हम, पर द्वेष के कारण हम दूर जाएंगे! हम तो “ठीक है, कि ऐसे भक्त से हमारा जमता नहीं है, कुछ… उस भक्त ने हमारे साथ कुछ बुरा कार्य किया है।” सत्य है, हो सकता है सत्य है, और बाह्य दृष्टि से सत्य भी है। फिर भी हमारा भगवान के प्रति सेवा भाव कम नहीं होना चाहिए। “ठीक है, यह भक्त ने ऐसे किया मेरे साथ, पर फिर भी यह भक्त मेरे और भगवान के बीच में नहीं आना चाहिए।”
कैसे कभी क्या होता है, हम मंदिर में आते हैं, तो हमारे अलग-अलग भक्तों से संबंध बनते हैं। कुछ वरिष्ठ होते हैं, कुछ हमारे बराबर के होते हैं। और कुछ अगर वरिष्ठ भक्त हैं या बराबर के भक्त हैं, कोई हमारे साथ बुरा कार्य करते हैं। तो फिर हमें बहुत बुरा लगता है… क्षमा करें, बुरा लगता है। और फिर, “यहाँ मंदिर में मैं जाऊं ना जाऊं, भक्ति करूँ ना करूँ”, ऐसे सोचने लगते हैं।
तो हमें समझना चाहिए कि जो अलग-अलग भक्त हैं, हमारे अलग-अलग संबंध हैं, यह सब क्या हैं? अलग-अलग मार्ग हैं, जिससे कि हम भगवान से संबंधित हैं। तो ठीक है, अगर एक मार्ग बंद हो गया है, तो भी दूसरे मार्ग तो चालू रहना चाहिए।
भगवान का मार्गदर्शन और श्रील प्रभुपाद का उदाहरण
तो जब अंगद ऐसा करते हैं, अंगद के हृदय में राम के प्रति सेवा भाव अभी तक था। भले ही सुग्रीव के प्रति उनका थोड़ी घृणा आती है। और वो सेवा भाव के कारण क्या हो गया? उनके हृदय में भगवान परमात्मा के रूप में… और भगवान ने उनको वचन बोल दिए कि जटायु के समान… और वहाँ सुनकर सम्पाती का भाव पूरा बदल गया।
और सम्पाती जो एक तरह से उनके लिए विपत्ति के रूप में आया था, सम्पाती उनके लिए एक नया मौका देने वाला बन गया, नया मार्ग बताने वाला बन गया।
इसलिए अगर हम सेवा भाव रखते हैं हमेशा, कोई भी व्यक्ति क्यों न हो, कोई भी भक्त हो, कोई भी परिस्थिति क्यों न हो… परिस्थिति से हमें… हम घायल हो सकते हैं, हमें दुख हो सकता है किसी व्यक्ति के कारण से। पर हम हमारी भक्ति के सेवा भाव में व्यक्ति में आ जाते हैं— “मैं इसे नहीं कर सकता, मैं इस व्यक्ति से दूर रहूंगा, इस परिस्थिति से दूर रहूंगा, पर फिर भी मेरी भक्ति मैं करते रहूंगा।”
और अगर वैसा भाव रहेंगे, रखेंगे, तो धीरे-धीरे भगवान— ददामि बुद्धियोगं तं — हमें मार्ग बता देंगे कि हम किस तरह से आगे बढ़ सकते हैं। किस तरह से हम हमारे भगवान की ओर जाने के मार्ग में अग्रसर रह सकते हैं। और जो भी समस्या है, उसका हम कैसे हल ढूंढ सकते हैं, यह भगवान हमें मार्गदर्शन दे देंगे। अंदर से, बाहर से, कहां से देंगे, वो हमें पता नहीं है। पर अगर हम वो भाव रखेंगे तो कोई न कोई व्यक्ति कुछ ऐसे बोलेगा, हम कुछ बोलेंगे, कहीं न कहीं से भगवान मार्ग बता देंगे।
कि प्रभुपाद जी अपने गुरु महाराज के आदेश के अनुसार प्रचार करने का प्रयास कर रहे थे भारत में। तो उन्होंने वो बैक-टु-गॉडहेड (Back to Godhead) मासिक, भगवद दर्शन मासिक वितरित कर रहे थे और कोई ले नहीं रहा था। और तभी प्रभुपाद जी चाहते थे क्या करूँ? बहुत मेहनत कर रहे थे प्रभुपाद जी भगवद दर्शन पत्रिका छापने के लिए, वितरित करने के लिए।
अब बहुत अचानक, एक साधारण व्यक्ति, एक पोस्टमैन ने कहा— “स्वामी जी, आप ये मासिक बांट रहे हो, मासिक लोग पढ़ेंगे, फेंक देंगे। आप ग्रंथ लिखो, ग्रंथ लोगों के पास हमेशा के लिए रहेंगे।”
तो अभी यहाँ व्यक्ति, अपने आप, उस व्यक्ति ने क्यों बोला वैसे? साधारण लोग तो स्वामी जी, स्वामी को कोई एडवाइस (Advice) देते नहीं हैं। तो हमें उचित नहीं लगता है, पर फिर भी व्यक्ति ने एक सुझाव के लिए उन्हें बता दिया। और प्रभुपाद जी ने क्या देखा— “मेरे गुरुदेव मुझे मार्गदर्शन दे रहे हैं!”
और फिर प्रभुपाद जी ने भागवतम जब लिखा, 1963, 64, 65 अंदर में… एक-एक विभाग, वॉल्यूम, भागवतम के पहले स्कंध का उन्होंने छाप लिया। और जब वो तीन वॉल्यूम रेडी (Ready) हो गए, प्रभुपाद जी को लगा— “अभी मैं तैयार हूँ अमेरिका जाने के लिए।” वो उनके लिए जो शस्त्र थे उनके, शस्त्र के रूप में बन गए।
तो इस तरह से भगवान, हम जब समस्या में होते हैं, कहीं से भगवान दे सकते हैं (मार्गदर्शन)। अगर हम सेवा भाव बरकरार रखते हैं, तो हमारे वचनों से, दूसरों के वचनों से, हमारे कार्यों से, दूसरों के कार्यों से, किसी परिस्थिति से, कहीं से भगवान हमें मार्ग देंगे।
निष्कर्ष (Conclusion)
तो अंगद के मन… जब अंगद नेता थे वानर यूथ के, तभी उनके मन में जो सुग्रीव के प्रति घृणा थी, संशय था, नकारात्मक भाव था, वो प्रकट हो गया। कब? जब उनको अपयश मिल गया, वो सीता को खोज नहीं पाए। तो हमारे मन में जब समस्याएं नहीं होती हैं, तो भले ही कुछ, कुछ नकारात्मक भाव हों, वो छुपे हुए रहते हैं। और जो नकारात्मक भाव होते हैं, वो प्रकट हो जाते हैं, जब समस्याएं आती हैं।
तो जब हमारे मन में नकारात्मक भाव किसी के प्रति आता है, तो वो केवल उनके कार्यों के कारण नहीं है। कार्यों से ज्यादा हमारे मन में उनके प्रति संकल्पनाएं जो हैं, उसके कारण है। इसलिए, अगर हमारी संकल्पनाओं को हम परिवर्तित करते हैं, कम से कम संकल्पनाओं को विस्तारित करने का प्रयास करते हैं, तो फिर उससे हम नकारात्मक भाव को कम कर सकते हैं।
तो जब व्यक्ति के मन में नकारात्मक भाव आते हैं, तो हमारी संकल्पनाओं को हमें परिवर्तित करना है। तो हमें क्या करना है? हमें स्पष्टीकरण… तो संकल्पनाओं को परिवर्तित करने के लिए हम और जानकारी का प्रयास कर सकते हैं। तो व्यक्ति को… उस व्यक्ति को बुरा मानने के लिए, उस व्यक्ति के कार्यों को बुरा मानने के लिए, परिस्थिति क्या है, उसको समझने का प्रयास कर सकते हैं।
तो दूसरा हमने देखा… कई बार हमने दूसरा पॉइंट देखा कि कैसे, जब वानर मृत्यु के लिए तैयार हो गए थे, तभी सम्पाती वहाँ पर आ गया। हनुमान जी प्रार्थना करते हैं, “कैसे मार्ग निकालें इसमें से?” और तभी अचानक एक बड़ी समस्या आ गई!
और बड़ी समस्या तो… कभी क्या होता है, हम एक समस्या का हल चाहते हैं भगवान से, और दूसरी समस्या आ जाती है तभी। तो यह ऐसा नहीं है कि भगवान हमारी प्रार्थना को नहीं सुन रहे। तो कभी क्या होता है, छोटी समस्या का हल हमें ढूंढने के लिए क्या होता है, कभी-कभी जो मन उस छोटी समस्या को बड़ा बना रहा है, तो फिर बड़ी समस्या जब आती है, तो मन अपने आप उस समस्या से उठ जाता है।
मेजवानी में एक व्यंजन अच्छा नहीं है, और खाना ही नहीं है… तो जो शिकायत कर रहा है, “एक व्यंजन अच्छा नहीं है”, तो वो शिकायत खत्म हो जाएगी, अगर खाना ही नहीं मिल रहा है। बाद में खाना मिल जाएगा। तो इसलिए समस्या भी आ रही है, तो हमें यह नहीं सोचना है कि भगवान मदद नहीं कर रहे हैं, कुछ… भगवान की कुछ अलग योजना हो सकती है। और वो योजना समझने के लिए हमें हमेशा सेवा भाव बरकरार रखना चाहिए, रखना चाहिए।
तो अंगद ने एकाएक जटायु का उल्लेख किया, सम्पाती की वृत्ति बदल गई पूरी। तो वो उल्लेख क्यों किया? कि भले ही उनको सुग्रीव के प्रति संशय था, पर राम के प्रति कोई संशय नहीं था। तो हो सकता है कभी-कभी हमारा किसी भक्त से जमे नहीं है, और उनके प्रति हमारे मन में नकारात्मक भाव आ जाए, घृणा आ जाए। पर क्योंकि उस कारण हम…