Love selflessly, not headlessly – Hindi
[Sunday feast class at ISKCON, Noida, India]
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Lecture Summary
प्रवचन का मुख्य सारांश
- इस प्रवचन में प्रेम के वास्तविक स्वरूप, शारीरिक आकर्षण और निस्वार्थ सेवा भाव के बीच के अंतर को गहराई से समझाया गया है। प्रवचन के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- गलतियों से सीखना: यदि हमसे दैनिक जीवन में या कार्यक्षेत्र में कोई गलती हो जाती है, तो हमें अपना हौसला नहीं हारना चाहिए। अपनी गलतियों से निराश होकर भागने के बजाय, उन्हें ईश्वरीय चेतना (कृष्ण भावना) में रहते हुए ही सुधारने का प्रयास करना चाहिए।
- निस्वार्थ प्रेम बनाम बुद्धिहीन प्रेम: महाभारत में धृतराष्ट्र का दुर्योधन के प्रति प्रेम ‘निस्वार्थ’ (Selfless) नहीं बल्कि ‘बुद्धिहीन’ (Headless) था। जब कोई व्यक्ति किसी क्रूर व्यक्ति से अंधा प्रेम करता है, तो वह केवल उसकी कठपुतली बनकर रह जाता है। सच्चा प्रेम हमेशा दूसरे के वास्तविक हित की परवाह करता है।
- आकर्षण (Attraction) ही प्रेम नहीं: जिसे दुनिया अक्सर ‘लव एट फर्स्ट साइट’ कहती है, वह कई बार केवल मस्तिष्क के रसायनों (Chemicals) और भावनाओं का अल्पकालिक खेल होता है, जो कुछ महीनों में समाप्त हो जाता है। असली प्रेम समय और परिस्थितियों के साथ साबित होता है।
- प्रेम केवल भावना नहीं, एक कार्य (Action) है: प्रेम केवल कोई भावना या अपेक्षा (Expectation) नहीं है, बल्कि यह एक निरंतर किया जाने वाला ‘कार्य’ है। जिस प्रकार एक थकी हुई माँ रात में रोते हुए बच्चे की बिना मन के भी देखभाल करती है और उस सेवा कर्म से स्वतः स्नेह उत्पन्न हो जाता है, वैसे ही निःस्वार्थ कर्म से सच्चा प्रेम जन्म लेता है।
- सराहना (Appreciation) पर निर्भरता: मानवीय स्तर पर हर किसी को अपने काम के लिए सराहना की आवश्यकता होती है। समस्या अपेक्षा रखने में नहीं, बल्कि उस ‘अपेक्षा से आसक्त’ (Attached) हो जाने में है। हमारी खुशी दूसरों की तारीफ पर निर्भर नहीं होनी चाहिए, बल्कि सेवा या कार्य करने से मिलने वाली आंतरिक संतुष्टि पर केंद्रित होनी चाहिए।
Full Transcription
भगवान के चरण कमलों में प्रेम
हरे कृष्णा! मैं कृतज्ञ हूँ आज आप सबके बीच में इस सुन्दर मंदिर में, भगवान के चरण कमलों में उपस्थित होकर। क्या मेरी आवाज़ पीछे तक सुनाई दे रही है आप सबको या नहीं? थोड़ा आवाज़ बढ़ा दें। हरे कृष्णा। बैठ जाइए।
आज मैं इस विषय पर चर्चा करूँगा कि हमें प्रेम कैसे करना है। निस्संदेह, हमें निस्वार्थ भाव से प्रेम करना है, पर हमें बुद्धि को त्याग कर बुद्धिहीन पद्धति से प्रेम नहीं करना है। मैंने अभी कुछ समय पहले रामायण पर ग्रंथ लिखा है और अभी मैं महाभारत पर ग्रंथ लिख रहा हूँ। तो महाभारत में जब मैं धृतराष्ट्र के बारे में पढ़ रहा था, तभी मुझे इस विषय के बारे में प्रेरणा मिली। प्रेम अनेक संबंधों के बीच होता है। एक माता-पिता का अपने पुत्रों और बच्चों से हो सकता है, पति का पत्नी से, लड़के का लड़की से, भाई का भाई से और बहन से हो सकता है। और शास्त्र बताता है कि सारे प्रेम का जो मूल स्रोत है, वह आत्मा और भगवान का संबंध है।
निस्वार्थ प्रेम बनाम बुद्धिहीन प्रेम
प्रेम अलग-अलग व्यक्तियों से हो सकता है, पर जब हम प्रेम करते हैं, तो कभी-कभी प्रेम के नाम पर लोग बहुत कुछ बुरी चीज़ें कर देते हैं। और कभी-कभी प्रेम के कारण लोग बहुत अच्छी चीज़ें भी करते हैं। तो यह जो प्रेम है, यह वास्तव में क्या है? और वो कब हमारे अच्छे के लिए कार्य करता है, और कब हमारे बुरे के लिए कार्य करता है? अभी महाभारत में वर्णन आता है, कि जब विदुर जी, धृतराष्ट्र को उपदेश देते हैं, कि आपका जो पुत्र है, वह बड़े बुरे मार्ग पर जा रहा है, वह खुद का विनाश करेगा, सारे कुरु वंश का विनाश करेगा, और उसके साथ-साथ वह तुम्हें भी दुख में डालेगा। वह तुम्हारी शक्ति का इस्तेमाल करके, तुम्हारे पद का इस्तेमाल करके, उसका दुरुपयोग करके तुम्हें बदनाम कर रहा है।
अभी स्थिति कैसी है? कि महाभारत में जो धृतराष्ट्र है, उसको हम कह सकते हैं कि जैसे कोई कंपनी होती है, उसमें एक एक्टिव पार्टनर (Active Partner) होता है और एक स्लीपिंग पार्टनर (Sleeping Partner) होता है। मतलब उसने पैसे लगाए हुए हैं, पर वो खुद काम नहीं कर रहा है। एक एक्टिव पार्टनर होता है, जो खुद काम कर रहा होता है। और विकेडनेस (Wickedness) मतलब क्रूरता। इन दोनों में बहुत फर्क है। तो धृतराष्ट्र में जो थी, वो वीकनेस (Weakness) थी, कमजोरी थी। और कमजोरी क्या थी? कि वो अपने पुत्र दुर्योधन से बड़ा आसक्त था। और दुर्योधन में क्या था? वो केवल वीकनेस नहीं थी, वो विकेडनेस थी। उसमें क्रूरता थी।
कठपुतली बनने का खतरा
और क्या हो रहा था? यह एक ऐसा संबंध है, जिसमें एक व्यक्ति कमजोर है, और दूसरा व्यक्ति क्रूर है। इसके कारण जो क्रूर व्यक्ति है, वो कमजोर व्यक्ति को अपना एक पुतला बना लेता है। अपनी एक कठपुतली बना लेता है, और उससे खुद को जो करवाना है, वो करवा लेता है। तो धृतराष्ट्र कहते हैं महाभारत में, कि “वास्तव में मैं खुद के लिए कुछ भी नहीं चाहता हूँ। मैं तो अंधा हूँ, मैं राजा बनने वाला नहीं हूँ, पर जो मुझे नहीं मिला, वो मैं अपने पुत्र को देना चाहता हूँ। तो उसमें मेरी क्या गलती है? मैं तो निस्वार्थ भाव से, मेरे पुत्रों से प्रेम करता हूँ, और मेरी इतनी ही इच्छा है, कि वह सुखी हो जाएँ।”
तो अभी, यहाँ जो भाव है, वह बड़ा उच्च लगता है कि ‘मैं खुद के लिए कुछ नहीं चाहता।’ पर, यह निस्वार्थ प्रेम नहीं है, यह बुद्धिहीन प्रेम है। यह ‘सेल्फलेस लव’ (Selfless Love) नहीं है, यह ‘हेडलेस लव’ (Headless Love) है। इसमें फ़र्क क्या है? कि निस्वार्थ प्रेम जब होता है, तो हम खुद की परवाह नहीं करते हैं, बल्कि दूसरे व्यक्ति के वास्तविक हित की परवाह करते हैं।
प्रेम क्या है: तीन मुख्य विभाग
तो वास्तव में, मैं इस प्रवचन को तीन विभागों में लूँगा। सबसे पहले हम देखेंगे, कि प्रेम क्या है और प्रेम करने की प्रवृत्तियाँ आती कहाँ से हैं? दूसरा है, यह प्रेम करने की प्रवृत्तियाँ कैसे हमें कभी-कभी गलत मार्ग पर ले जाती हैं? और अंत में, कैसे हम सही मार्ग पर रह सकते हैं?
तो सबसे पहले यह ‘प्रेम’ मतलब है क्या? वास्तव में हम कह सकते हैं कि ‘प्रेम’ शब्द के अनेक अर्थ हो सकते हैं, अलग-अलग संदर्भों में। मैं ऑस्ट्रेलिया में एक कॉलेज में प्रवचन दे रहा था, तो वहाँ पर विद्यार्थी बोल रहे थे कि, “धार्मिक लोग प्रेम के खिलाफ क्यों हैं?” ऐसा कुछ नहीं है कि हम प्रेम के खिलाफ हैं। पर क्या वे लोग जो सोचते हैं, क्या वो सच में प्रेम है?
कुछ लोग, कई बार हम मूवीज़ (Movies) में देखते हैं, कि एक लड़का एक लड़की को देखता है, लड़की लड़के को देखती है, और वह कहते हैं, “लव एट फर्स्ट साइट” (Love at first sight)। उसे देखा, और मुझे ऐसा लगा कि मेरे शरीर में कुछ बिजली सी आ गई। और फिर, क्या यह वास्तव में प्रेम हो सकता है? हाँ, ऐसा हो सकता है कभी-कभी, कि दो लोग एक-दूसरे से मिलते हैं और उनका आकर्षण हो जाता है। पर वास्तव में वो प्रेम नहीं है, वो केवल एक आकर्षण है। तो जो लोग कहते हैं कि यह प्रेम है, वो क्या है? वह केवल अट्रैक्शन (Attraction) है, जो बस कुछ समय के लिए रहता है।
भावनाओं और रसायनों का खेल
तो असली अगर प्रेम है, तो वो ‘फर्स्ट साइट’ में क्या हुआ है, वो महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि कई बार मिलने के बाद क्या होता है, वो महत्वपूर्ण है। पहली बार देखते हैं, तो आकर्षण लगता है। पर 10 बार, 15 बार, 20 बार, या 100 बार मिलने के बाद, कितना आकर्षण शेष रहता है? जो लोग ऐसा कहते हैं, कभी-कभी प्रेम के नाम पर, पहले वो कहते हैं— “आई कांट लिव विदाउट यू” (I can’t live without you), और थोड़े समय बाद में कहते हैं— “आई कांट लिव विद यू” (I can’t live with you)। पहले कहते हैं, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता, और फिर कहते हैं, मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकता!
तो यह क्या है? यह केवल भावनाओं का खेल है। हमारी भावनाएँ जो हैं, वो ऊपर-नीचे होती रहती हैं। और जिसे कई बार लोग प्रेम कहते हैं, वो केवल एक शारीरिक और मानसिक स्तर पर भावनाओं का उत्तेजित हो जाना है। और जो भावनाएँ उत्तेजित हो जाती हैं, वो कुछ समय तक रहती हैं, और फिर उसके बाद में चली जाती हैं।
मेरे एक मित्र हैं अमेरिका में, वो मैरिज काउंसलर (Marriage Counselor) हैं। तो वो कहते हैं कि दो प्रकार के कपल्स (Couples) होते हैं। एक होते हैं जो एक-दूसरे से झगड़ा करते हैं, और दूसरे वो हैं जिन्हें आप अभी अच्छी तरह से जानते नहीं हो! इसका मतलब है कि अगर कोई दो लोग साथ में रह रहे हैं, तो थोड़ा-सा मतभेद होगा, झगड़े भी होंगे। पर अगर सिर्फ भावना के स्तर पर दो लोग साथ में आ गए हैं कि ‘ये मुझे बहुत अच्छे लगते हैं’, तो वो क्या है? वो केवल मन में, और हमारे दिमाग में कुछ रसायन (Chemicals) हैं, जो किसी आकर्षक व्यक्ति को देखकर उत्पन्न हो गए हैं। उससे लगता है कि यह अच्छा है, मुझे अच्छा लग रहा है। पर वो जो रसायन उत्पन्न होते हैं, वो लगभग 9 महीने, या 12 महीने तक रहते हैं। कभी-कभी उससे कम रहते हैं, कभी-कभी उससे थोड़े ज़्यादा रहते हैं। तो वह भावनात्मक आकर्षण रहता है और फिर चला जाता है।
और फिर जैसे ही जो लोग कहते हैं, “आई हैव फॉलन इन लव” (I have fallen in love), वही कुछ समय बाद कहते हैं, “आई हैव फॉलन आउट ऑफ लव” (I have fallen out of love)। और फिर क्या होता है? वह संबंध ज़्यादा स्थिरता से रह नहीं पाता।
प्रेम एक अपेक्षा और कार्य के रूप में
तो उसके बाद लोग कहते हैं कि “यू डोंट लव मी एनीमोर” (You don’t love me anymore) — कि अभी तुम मुझसे प्रेम नहीं करते हो! तो इसका मतलब क्या है? यहाँ पे प्रेम का अर्थ दूसरा हो गया है। यहाँ प्रेम एक अपेक्षा के रूप में है — “लव एज़ एन एक्सपेक्टेशन” (Love as an expectation)। मतलब, जब तुम मुझसे मिलते हो, तो तुम्हें मुझे देखकर हँसना चाहिए, मुझे कुछ भेंट देनी चाहिए, मुझसे अच्छी तरह से बात करनी चाहिए, ये करना चाहिए, वो करना चाहिए… और चूँकि तुम वो नहीं कर रहे हो, तो मतलब क्या?
पहले जो प्रेम था वो एक इमोशन (Emotion) था, एक आकर्षण था। पर ‘अभी तुम मुझसे प्रेम नहीं करते हो’ का मतलब यह है कि जो मेरी अपेक्षाएँ हैं, तुम उन्हें पूरी नहीं कर रहे हो। तो प्रेम अपेक्षा (Expectation) भी होता है कभी-कभी। और यह गलत नहीं है, क्योंकि हर संबंध में हम कुछ अपेक्षा रखते हैं कि मैं कुछ करूँगा, और आप मेरे लिए कुछ करेंगे। हर संबंध में ऐसा आदान-प्रदान होता है। मतलब हमारा कुछ कॉन्ट्रिब्यूशन (Contribution) होता है, हम दूसरे व्यक्ति के लिए कुछ करते हैं और हमारी उनसे कुछ एक्सपेक्टेशन होती है कि वो हमारे लिए कुछ करेंगे।
पर जब हम ऐसा कहते हैं कि ‘तुम मुझसे प्रेम नहीं करते’, तो यहाँ पर प्रेम की भावना का अर्थ ‘अपेक्षा’ बन जाता है। तुम मेरी अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर रहे हो। और जब ऐसा हो जाता है, तो लगता है कि वो भावना चली गई है, अपेक्षा पूरी नहीं हो रही है, तो फिर इस संबंध में क्या करना है? तो फिर संबंध टूट जाता है।
आजकल समाज में संबंधों को बहुत यूटिलिटी (Utility) के रूप में देखा जाता है। इसका क्या उपयोग है? इससे मुझे क्या मिल रहा है? पर संबंधों को हमें केवल यूटिलिटी के रूप में नहीं देखना है, बल्कि सैंक्टिटी (Sanctity) के रूप में देखना है। सैंक्टिटी मतलब उनकी पवित्रता, उनका जो धार्मिक भाव है, वो देखना है। और इसके लिए महत्वपूर्ण क्या है? “लव एज़ एक्शन” (Love as action), “लव एज़ डिसीजन” (Love as decision), “लव एज़ डेडिकेशन” (Love as dedication)। प्रेम जो है, यह केवल एक भावना नहीं है, यह केवल एक अपेक्षा नहीं है, यह एक ‘कार्य’ है। जो कार्य हम करेंगे, उससे वो भावना भी आ जाएगी और उससे वो प्रेम उत्पन्न हो जाएगा।
सेवा भाव और कार्य का महत्व
मान लीजिए कोई छोटा बच्चा है, शिशु है। माँ दिन भर काफ़ी काम कर चुकी है। रात को अचानक बच्चा उठ के रोने लग जाता है। तो बच्चा जो रोता है, वो एक ऐसे अलार्म क्लॉक की तरह है जो बिना सेट किए ही बज जाता है और कभी भी बज जाता है। तो माँ बहुत थकी हुई होगी। साधारणतः माँ को अपने बच्चे को देखकर वात्सल्य आता है, उसे संभालने की, उसकी देखभाल करने की इच्छा होती है। पर रात को जब उठना पड़ता है, तभी ऐसी कोई इच्छा नहीं होती। थोड़ा-सा गुस्सा आएगा, थोड़ी चिड़चिड़ाहट (Irritation) होगी। पर फिर भी, बच्चा रो रहा है।
अगर हमारा अलार्म बज रहा है तो हम अलार्म बंद कर देंगे, पर बच्चा रो रहा है तो माँ कभी यह नहीं कहेगी कि ‘बच्चा चुप बैठ’। वो फिर भी उठेगी, बच्चे को संभालेगी, उसको थोड़ा शांत करेगी। और जैसे ही वो बच्चे को उठाएगी, उसे शांत करेगी, तो उसके उस ‘कार्य’ से स्नेह का भाव अपने आप आ जाएगा। तो इसलिए, हम कार्य के लिए, एक सेवा भाव को प्रधानता देते हैं। इन कार्यों और सेवा भाव के कारण ही मैं अन्य सभी संबंधों में विश्वसनीय (Credible) हूँ। बहुत-बहुत धन्यवाद। हरे कृष्णा!
प्रश्नोत्तर: अपेक्षा और सराहना (Appreciation)
किसी का कोई सवाल है क्या?
हाँ, एक सवाल है कि लोगों की इच्छा होती है। लोगों की इच्छा होती है तो हम कहते हैं कि हमें खुद के नाम की, खुद के गुणगान की इच्छा नहीं रखनी चाहिए। पर वास्तव में हम इच्छा रखते हैं और जब हमें गुणगान मिलता है, तो हम उसमें बड़ा आनंद लेते हैं। तो इस बारे में हम क्या करें?
तो इसमें दो चीज़ें हैं। एक है कि हमें अहंकार के स्तर पे गुणगान चाहिए होता है। और दूसरा है कि एक मानवीय स्तर पर (Human level), “वी ऑल नीड एप्रिसिएशन एंड एनकरेजमेंट” (We all need appreciation and encouragement)। एक मानवीय स्तर पे हमको सराहना और प्रोत्साहन, यह सबको ज़रूरी है। अभी देखिए, जो भक्ति की संस्कृति है, महाप्रभु चैतन्य कहते हैं— अमानीना मानदेन। मान की अपेक्षा मत करो, पर दूसरों को मान दो। और इसका मतलब क्या है कि हम दूसरों को मान देंगे और दूसरे हमें मान देंगे।
तो ज़रूरी नहीं है कि वह केवल अहंकार के कारण हमें अच्छा लगता है। और अगर वह सराहना नहीं मिलती है तो हम सेवा छोड़ देते हैं, तो फिर क्या है? फिर हमारी सेवा में आसक्ति आ जाएगी। एक तरह से अपेक्षा ज़रूर होती है, मानवीय स्तर पे अपेक्षा ज़रूर है। इसलिए कहा जाता है— “एक्सपेक्टेशन इज़ नॉट द प्रॉब्लम, अटैचमेंट टू एक्सपेक्टेशन इज़ द प्रॉब्लम” (Expectation is not the problem, attachment to expectation is the problem)।
सराहना पर निर्भरता बनाम सेवा में संतुष्टि
अपेक्षा तो स्वाभाविक है, पर अगर व्यक्ति उस अपेक्षा से ही आसक्त हो जाता है, तो फिर व्यक्ति विचलित हो जाता है। तो अभी मैं लगभग 20-25 सालों से प्रवचन दे रहा हूँ। पहले जब मैं प्रवचन दिया करता था, तो मुझे बहुत अपेक्षा रहती थी। मैं सोचता था कि प्रवचन देने के बाद लोग आकर कुछ बोलें कि ‘बहुत अच्छा लेक्चर था, बहुत अच्छा लेक्चर था।’
एक बार मैंने बहुत अच्छा लेक्चर दिया। मतलब मेरे दृष्टिकोण से मैंने बहुत अच्छी तरह से प्रवचन किया, और फिर उसके बाद किसी ने एक शब्द भी नहीं बोला! तो मुझे तभी थोड़ा बुरा लगा। पर बाद में मेरे मन में विचार आया, क्योंकि जब मैं इस लेक्चर की तैयारी कर रहा था, तो मैं एक तरह से भगवान की स्मृति में, भगवान के संदेश में मगन था। जब मैं लेक्चर दे रहा था, तभी भी मैं भगवान के संदेश में मगन था। और जब भगवान के संदेश में मगन था, तो मैं उस समय अत्यंत संतुष्ट और सुखी था। तो अभी उसके बाद में, जब कोई सराहना नहीं मिली, तो मैं असंतुष्ट क्यों हो गया?
तभी मुझे विचार आया कि वास्तव में, ठीक है, कोई सराहना भी करेगा, तो वो कुछ पलों की सराहना होगी। पर अगर भगवान में मन लग जाता है, तो उससे जो संतुष्टि मिलती है, वो काफ़ी ज़्यादा समय तक रहेगी। तो इसमें क्या है कि हम सबको, मान लीजिए कोई अच्छा कीर्तन करता है, तो स्वाभाविक है लोग बोलेंगे कि अच्छा कीर्तन किया। पर अगर हम लगातार सेवा करते रहेंगे, तो धीरे-धीरे हमें यह साक्षात्कार हो जाएगा कि सेवा की सराहना से जो सुख मिलता है, उससे कहीं ज़्यादा सुख सेवा में मन लगने से मिलता है।
तो ऐसा नहीं है कि हम सराहना नहीं चाहेंगे, और सराहना आएगी तो उसे ठुकरा देंगे। ऐसा नहीं है। पर बात यह है कि हम उस सराहना पर निर्भर नहीं रहेंगे।
गलतियों से सीखना और कृष्ण भावना
तो अगर कोई भक्त हमें एप्रिशिएट (Appreciate) करते हैं, तो हमें उस एप्रिसिएशन को इनडायरेक्ट इंस्ट्रक्शन (Indirect instruction) के रूप में लेना चाहिए। अगर कोई हमारी सेवा के लिए सराहना करता है, उसका मतलब क्या है? वो कह रहे हैं कि आप यह सेवा अच्छी करते हैं, कृपया आप और सेवा करें। तो उससे हमें अहंकार या गर्व भी नहीं होगा। हमारे मन में क्या भाव आएगा? ‘हाँ ठीक है, मैं भगवान के लिए यह सेवा अच्छी कर पा रहा हूँ, तो मैं और अच्छी सेवा करते रहूँगा।’
तो अगर ये अपेक्षा है, तो वो बुरी नहीं है। मानवीय स्तर पर अपेक्षा ज़रूर है, पर हमारी सेवा को उस अपेक्षा की पूर्ति पर निर्भर नहीं होना चाहिए। उसी का पीछा अगर हम करने लगें, और फिर भगवान को भूल जाएँ, तो हम गुमराह हो जाएँगे। पर अगर हम यह देखते हैं कि ‘अच्छा, मैं उनकी अच्छी सेवा कर पाया… क्यों कर पाया? यह भगवान की कृपा है, भगवान ने मुझे कुछ क्षमताएँ दी हैं।’
पर अगर हम कुछ गलत चीज़ कर देते हैं… क्योंकि हम ऑफिस, दफ़्तर वगैरह जाते हैं और वहाँ हमारा अलग-अलग संग होता है। यहाँ पर अगर हम कोई गलत चीज़ कर देते हैं, हम जानते हैं कि यह सही है और फिर भी हमसे गलत हो जाता है, तो उसके बाद हम क्या कर सकते हैं? यह सबका संघर्ष है, यह मेरा भी संघर्ष है। तो इसमें महत्वपूर्ण यह है कि हम कभी भी अपना हौसला ना छोड़ें। क्योंकि अगर कुछ गलत हो भी गया, तो भी हम उसको सही कर सकते हैं।
तो यह ऐसा है कि हम इसे कृष्ण कॉन्शसनेस (Krishna Consciousness) में सुधार सकते हैं। इसका मतलब क्या है? कृष्ण भावना में अगर हम कोई सही चीज़ नहीं कर पाए, तो हम अपनी गलती भी कृष्ण भावना में ही सुधार सकते हैं। अपनी गलतियों के कारण हमें कृष्ण भावना के बाहर जाने की कोई ज़रूरत नहीं है।
बहुत-बहुत धन्यवाद।
श्रील प्रभुपाद की जय!
गौर भक्त वृंद की जय!
निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!