Resist the mind just as Sita resisted Ravana – Hindi
[Sunday feast class at ISKCON, Belgaum, india]
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Lecture Summary
- इस प्रवचन में रामायण के माध्यम से मन के मोह और भौतिक शरीर के बंधन को समझाया गया है। आचार्य के अनुसार, रावण हमारे मन का प्रतीक है, लंका शरीर का और सीता आत्मा का। जिस तरह रावण ने सीता को राम से दूर करके लंका में बंद कर दिया, उसी तरह हमारा मन हमें शरीर की चेतना में बाँधकर भगवान से दूर करने का प्रयास करता है।
- मन हमें बार-बार भोग, सुख, ऐश्वर्य और सांसारिक इच्छाओं का प्रलोभन देता है और भगवान की भक्ति को अनावश्यक बताकर भ्रमित करता है। शरीर की आवश्यकताओं को पूरा करना जरूरी है, लेकिन उन्हें जीवन का अंतिम उद्देश्य मान लेना सही नहीं है। जैसे गाड़ी में पेट्रोल आवश्यक है, लेकिन पेट्रोल भरना गाड़ी चलाने का उद्देश्य नहीं है, उसी तरह शरीर की आवश्यकताएँ जीवन के लिए जरूरी हैं, लेकिन जीवन का उद्देश्य केवल शरीर का भोग नहीं है।
- रामायण में सीता रावण के प्रलोभनों और धमकियों के बावजूद राम की भक्ति और स्मरण में अडिग रहती हैं। इसी प्रकार हमें भी मन के प्रलोभनों और नकारात्मक विचारों से प्रभावित हुए बिना भक्ति में स्थिर रहना चाहिए। हनुमान जी गुरु और भक्तों के प्रतीक हैं, जो हमें भगवान की याद दिलाते हैं और भगवान के प्रति हमारा उत्साह बढ़ाते हैं।
- प्रवचन में यह भी बताया गया है कि विज्ञान हमारी भौतिक और शारीरिक आवश्यकताओं को आसानी से पूरा कर सकता है, लेकिन जीवन का उद्देश्य क्या है, यह नहीं बता सकता। जीवन की दिशा और अंतिम उद्देश्य को समझने के लिए आध्यात्मिक ज्ञान आवश्यक है।
- अंततः, जीवन का वास्तविक उद्देश्य भगवान की भक्ति, भगवत्प्राप्ति और आध्यात्मिक प्रेम की जागृति है। यदि हम मन के मोह से बचकर निरंतर और श्रद्धापूर्वक भक्ति करते रहें, तो भगवान स्वयं हमारा उद्धार करेंगे और हमें इस भौतिक बंधन से मुक्त करके अपने आध्यात्मिक धाम तक ले जाएँगे।
Full Transcription
रामायण के आधार पर मन के मोह से कैसे बचें
हरे कृष्णा!
तो आज के कार्यक्रम में चर्चा करेंगे किस तरह से रामायण के आधार पर जो हमारा मन हमें मोहित करता है और इस मन के मोह से हम कैसे बच सकते हैं।
यह रामायण जो ग्रंथ है, ये शास्त्रों में बताए गए दो प्रकार के पुराण होते हैं। पुराण हैं, इतिहास हैं, वेद हैं, उपनिषद हैं, पुराण हैं। तो पुराण और इतिहास इसमें क्या है? जो प्राचीन काल में कुछ घटनाएँ हुई हैं, उनका एक काव्यात्मक पद्धति से उदाहरण किया गया है।
इस तरह से तो भी रामायण में रामायण—आयन मतलब जो journey, प्रवास—तो प्रभु श्री रामचंद्र के जीवन में क्या हुआ, उसका वर्णन आता है।
इसमें जो घटनाएँ होती हैं, शास्त्र में बताई गई हैं, वो ऐतिहासिक हैं, पर वो केवल ऐतिहासिक नहीं हैं। कि इतिहास के द्वारा हम क्या सीख सकते हैं, यह बताया गया है।
तो अभी श्री संप्रदाय में एक आचार्य हैं गोविंद आचार्य। उन्होंने इस पर, रामायण पर थोड़ा भाष्य लिखा है। तो उसमें कहते हैं कि जब पुरुषोत्तम रामचंद्र से सीता को छीन लिया, अपहरण कर लिया रावण ने, तो रावण सीता को कहाँ लेके गया? कहाँ लेके गया? लंका में।
तो जब लंका में रह रहे थे, तो वहाँ पर क्या था? लंका में सीता थी, रावण था और राम उनसे दूर थे।
तो वह कहते हैं कि यही वास्तव में स्थिति हम सबकी है इस भौतिक जगत में।
यह भौतिक जगत जो है, मान लीजिए यह एक लंका के समान है। और न केवल यह भौतिक जगत लंका के समान है, वास्तव में हम सब आत्मा जो है, वह सीता के समान है।
और इस भौतिक जगत में, वास्तव में यह भौतिक शरीर है। यह शरीर ही एक प्रकार से लंका के समान है।
और जो रावण है, वह हमारे मन के समान है।
जो रावण क्या चाहता था? कि वह सीता को खुद के लिए प्राप्त कर ले और सीता को राम से दूर ले जाने के लिए था।
तो उसी तरह से जो हमारा मन होता है, वहाँ हमको पर-नियंत्रण करके, हमको भगवान से दूर ले जाने का प्रयास करता है।
और क्या करता है? जैसे रावण ने सीता को लंका में बंद कर दिया, तो जैसे जो मन है, वह हमको शरीर की चेतना में बंद कर देता है।
शरीर की चेतना में बंद करना मतलब क्या? कि हम शरीर की ज़रूरतें हैं, उसको पूरा करना ही जीवन का उद्देश्य मान लेते हैं।
अब शरीर की ज़रूरतें पूरा करना यह ज़रूरी है। वह ज़रूरतें हैं, वह पूरा करना ज़रूरी ही है। पर यह जीवन का उद्देश्य नहीं है।
जीवन की ज़रूरतें और जीवन का उद्देश्य—ये दोनों अलग चीज़ें हैं।
जीवन की ज़रूरत और जीवन का उद्देश्य
मान लीजिए अगर हम कोई गाड़ी चला रहे हैं, तो गाड़ी में पेट्रोल डालना यह ज़रूरी है। अगर पेट्रोल नहीं होगा तो गाड़ी चलेगी ही नहीं। पर वो गाड़ी चलाने का उद्देश्य नहीं है कि उसमें पेट्रोल डालना।
गाड़ी चलाने का उद्देश्य है कि कहीं हमें जाना है, जगह पर जाना है, हम किसी से मिलना है, कुछ चीज़ को देखना है।
तो पेट्रोल यह गाड़ी की ज़रूरत है और ज़रूरत पूरी नहीं होगी तो हम कहीं जा नहीं पाएँगे, पर ज़रूरत पूरा करना वही गाड़ी चलने का उद्देश्य नहीं है।
अगर हम किसी को पूछते हैं, कोई गाड़ी चला रहा है—कहाँ जा रहे हैं?
“मैं गैस स्टेशन में जा रहा हूँ।”
इंडिया में हम पेट्रोल पंप कहते हैं। “मैं अमेरिका में गैस स्टेशन में जा रहा हूँ। पेट्रोल पंप जा रहा हूँ।”
“पेट्रोल पंप जा रहा हूँ।”
उसके बाद मैं रोज़ गाड़ी निकालता हूँ, रोज़ पेट्रोल पंप जाता हूँ और क्या करते हैं गाड़ी में?
“नहीं, मैं उतना ही करता हूँ।”
तो गाड़ी क्यों? गाड़ी की हमारी सेवा करनी चाहिए, नहीं कि हम गाड़ी की सेवा करें।
गाड़ी को पेट्रोल भरना यह ज़रूरी है, पर यह जीवन का उद्देश्य नहीं है।
जीवन की ज़रूरतें और जीवन का उद्देश्य—इन दोनों में फर्क है।
इंग्लिश में इसके लिए कहते हैं: what we live with and what we live for.
हम किस चीज़ के साथ जीते हैं और किस चीज़ के लिए जीते हैं?
तो हम जब तक शरीर है, शरीर की ज़रूरतों को पूरा करना यह ज़रूरी है। पर जो मन होता है, जब मन रावण जैसे प्रवृत्ति का हो जाता है, अब शरीर की ज़रूरतें हैं।
वास्तव में केवल ज़रूरतें नहीं हैं। सिर्फ ऐसे हम अन्न खाते हैं, तो एक तरह शरीर की ज़रूरत है। पर अन्न खाने में कुछ आनंद भी है। स्वादिष्ट अन्न होता है तो उसे पसंद होते हैं।
पर स्वादिष्ट अन्न खाना यही जीवन का उद्देश्य नहीं है।
कोई अगर कहता है कि मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? मैं स्वादिष्ट अन्न खाना चाहता हूँ।
वो बात ठीक है कि जीवन का उद्देश्य क्या है? नहीं, यही मेरा जीवन का उद्देश्य है।
जीवन का उद्देश्य नहीं करना है, तो क्या है?
जब यह मन आत्मा को शरीर में बाँध देता है, तो जब आत्मा होता है—कोई मनुष्य के शरीर में होता है, कोई जानवरों के शरीर में होता है—जब वो जानवरों के शरीर में होता है, तभी वह शरीर की ज़रूरतों के परे और कुछ सोच ही नहीं पाता है।
जानवरों के शरीर में हम समझाते हैं:
आहारनिद्राभयमैथुनं च
सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्।
तो इन दोनों में मनुष्य और पशु में सब समान है।
पर फर्क इसमें यह है कि जानवर इसके परे और कुछ सोच नहीं सकते। वही उनको चाहिए और उसके परे और कुछ भी पता नहीं उनको।
पर जो मानव है, हमारी चेतना इतनी विकसित हो गई है कि हम शरीर के परे भी कोई ज़रूरतें हैं।
शरीर की ज़रूरतें पूरी करने के अलावा भी मुझे कुछ और करना है मेरे जीवन में।
छोटी खिड़की और बड़ी दुनिया
यहाँ हम समझ सकते हैं। यहाँ हम समझ सकते हैं और फिर इससे बड़ा जीवन क्या है, ये खोज करने का प्रयास करते हैं।
मान लीजिए अगर कोई अँधेरी कोठरी में इसको बंद कर दिया है और ऐसी अँधेरी कोठरी में सिर्फ एक ही खिड़की है। मान लीजिए उसकी छोटी-सी खिड़की है, और उससे वो देख रहा है।
तो उस खिड़की से उसको क्या दिखता है? वो सोचता है इतना ही है, इतनी ही दुनिया है। इतना ही है, उतनी ही रोशनी है, इतनी ही दुनिया है।
पर मान लीजिए कि वह थोड़ा दूर आता है, बाहर और बाद में देखता है कि ये ऊपर ये दीवार है। वास्तव में ये ऊपर ये दीवार है। वो दीवार काँच की बनी है। ऊपर जो छत है, काँच का बना हुआ है।
और यहाँ से ऊपर से मुझे कुछ दिख रहा है। बाहर कुछ दिख रहा है।
ये क्या है? यह इतना बड़ा आसमान है, इतनी बड़ी दुनिया है। मुझे ये छोटी-सी खिड़की से जो दिख रही थी, उतनी नहीं है। उससे और बड़ी दुनिया है।
उस तरह से जब आत्मा जानवरों के शरीर में होता है, तो उसकी दृष्टि मान लीजिए वो एक छोटी-सी खिड़की से देख रहा है।
तो सारी दुनिया को क्या देखता है?
कैसे मुझे यहाँ पर आहार मिलेगा, निद्रा मिलेगी, कैसे भय से निवारण होगा, कैसे मैथुन प्राप्त कर सकता हूँ। उसके अलावा कुछ सोच नहीं सकता है।
उसकी खिड़की से देख रहा है।
मानना हम सब भी उसी खिड़की से देखते हैं, पर हम उसके परे कुछ नहीं देख सकते हैं।
ठीक है, यह सब ज़रूरी है। यह सब करना है। पर उसके परे और क्या है?
यह सब होने के बाद जीवन में क्या करना है?
तो क्या है? हम जीवन का जो बड़ा दृष्टि है, वहाँ हम देख सकते हैं।
ज़रूरतें पूरी होने के बाद
कैसे है कि हम सबकी, अगर मानने लगी हैं कि हमें बहुत प्यास लगी है। हम कोई बाहर से आ रहे हैं, हमें धूप है और हम घर में आते हैं और हमको बहुत प्यास लगी है।
तो जब बहुत प्यास लगी होती है, अगर घर में आके कोई हमारे पति है, पत्नी है, बच्चे हैं, वो हमसे कुछ बात करना चाहते हैं, वो क्या बात कर रहे हैं, वो हम सुन भी नहीं पाएँगे।
पहले मुझे पानी चाहिए।
पानी दो, पानी पिऊँगा।
और पानी पर जब ज़रूरत पूरी हो जाती है—ठीक है, भी पानी मिल गया। अब और क्या करना है?
तो वैसे भी जब हम मनुष्य शरीर में आते हैं, तो कभी-कभी हमारे जीवन में भी ऐसी परिस्थितियाँ आ जाती हैं कि कुछ इच्छाएँ—आहार, निद्रा, भय, मैथुन से संबंधित—इतनी शक्तिशाली हो जाती हैं, तभी हम कुछ और सोच नहीं पाते हैं।
पर जब वो पूरी हो जाती हैं, तो तब तक हम छोटी-सी खिड़की से ही देख रहे हैं। तो वो पूरा हो जाता है, तो यह बड़ी दुनिया है।
यहाँ पर क्या है? क्या करना है मुझे?
तो यह जो है, जिस तरह से रावण ने सीता को पकड़ लिया और लंका में बंद कर दिया, जो हमारा मन है, वहाँ हमें शारीरिक चेतना में बंद कर देता है।
सीता की भक्ति और रावण का प्रलोभन
तो अभी सीता की यह दिव्यता थी, की यह भक्ति थी कि वो रावण से आकर्षित नहीं हुई।
रावण की सुविधाएँ जो रावण दे रहा था, सबसे पहले जब रावण ने सीता से मिला, तो उसने क्या किया?
रावण को धर्म के कुछ चार प्रकार का ज्ञान नहीं था। तो उसने सोचा कि मैं सीता को मेरे बारे में आकर्षित कर लूँगा।
और क्या किया उसने?
जब पहले सीता से मिला, इसे कोई पुरुष किसी स्त्री की दृष्टि को आकर्षित करना चाहता है, तो सबसे पहले उसने सीता के सौंदर्य का गुणगान करने लगा।
“तुम इतनी सुंदर हो।”
पर सीता मोहित नहीं हो रही है।
तो फिर वह क्या करता है? उसने अपना रूप बदल लिया।
उसने कहा, “तुम जानते हो मैं कौन हूँ? मैं रावण हूँ। मैं लंका का पति हूँ और मेरे पास इतनी धन-संपत्ति है, इतना ऐश्वर्य है मेरे पास।”
तो भी पुरुष स्त्री के संदर्भ में बोलता है। फिर उसके बाद में खुद क्या ऐश्वर्य के बारे में बोलेगा कि मैं इतना शक्तिशाली हूँ, मैं यह हूँ, मैं तुमको यह दूँगा।
और फिर अगर वो उसको आकर्षित करना है, तो अगर वो किसी और से सम्मान दे तो क्या करेगा? उसकी निंदा करेगा।
तो फिर उसके ओर से राम की निंदा करने लगता है।
वो कहता है, “ये राम तुम्हें क्या दे सकता है? कि राम तुम्हें… तुम तो राजकुमारी थी, पर राम के कारण तुम जंगल में आके रहने लगी हो।”
“तुम्हें राम कुछ भी दे सकता है? मैं तुमको सब कुछ दे सकता हूँ।”
तो इस तरह से वो सीता को प्रलोभित करने का प्रयास करता है।
तो हमारा मन भी हमें यही करता है।
मन क्या करता है?
सबसे पहले कहता है, “आओ, पर सबसे पहले कहता है—तुम इतना भोग यह कर सकते हो, तुम यह कर सकते हो, तुम यह भोग कर सकते हो, तुम वो कर सकते हो, तुम वो कर सकते हो। और तुम्हें जो भी चाहिए, मैं दूँगा। तुम बस मेरी बात मान लो। मैं तुमको इतना सारा सुख दे दूँगा।”
और फिर क्या करता है?
मन कहता है, “भगवान! भगवान की बात क्या जा रही है? भगवान तुम्हें क्या नहीं है? तुम्हें भगवान नहीं है।”
तो इस तरह से वो सीता को प्रलोभित करने का प्रयास किया है और मन भी वैसे ही करता है।
अगर हम मन की बात सुनते रहेंगे, तो क्या होता है?
भगवान की भक्ति की क्या ज़रूरत है? भगवान की ही क्या ज़रूरत है? मैं खुश हूँ और मैं मेरी योजना बनाऊँगा।
इदमद्य मया लब्धम् इमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥
मन कहता है कि तुम मेरे रथ पर बैठ जाओ और मैं तुमको ले जाऊँगा।
कहाँ लेके जाऊँगा?
धन के मार्ग में लेके जाऊँगा, ऐश्वर्य के मार्ग में ले जाऊँगा। मैं तुम्हें सुख प्रदान कर दूँगा।
इस तरह से मनोरथम्—मन के रथ पर।
सीता जो थी, वो रावण के वचनों से बिल्कुल आकर्षित नहीं हुई।
और फिर रावण ने तभी देखा कि सीता मुझसे आकर्षित नहीं हो रही है, तो रावण ने सीता का अपहरण कर लिया।
और जब भी अपहरण कर लिया, तो वो रावण का इतना अहंकार था। वो सोचा था, मैं इतना धनवान हूँ, मैं इतना शक्तिशाली हूँ, कोई स्त्री मुझसे आकर्षित कैसे नहीं हो सकती? ज़रूर होनी चाहिए।
अशोक वाटिका
तो उसने क्या किया? जैसे ही वो लंका चला गया, सबसे पहले उसने सीता को अपना महल दिखाया।
उसका बड़ा महल था। सारे महल का उसको टूर दिया उसने।
“देखो, मेरे पास यही है, मेरे पास यह है, मेरे पास यह पुष्पक विमान है, जिसमें मैं उड़ा करता हूँ।”
सारे महल दिखाया और फिर कहा कि सीता को अपनी रानी बना जाता था, प्रधान रानी बना जाता था। पर सीता बिल्कुल तैयार नहीं थी।
तो उसने अपने महल में रहने की जगह दी।
सीता बोली कि मैं महल में नहीं रहूँगी। मेरे प्रभु जब तक वो वनवास में रहने वाले हैं, जो उनको वनवास की शर्त मिली है, उनको शर्त था वनवास में रहने का। जब तक वे वनवास में हैं, मैं भी वनवास में ही रहूँगी।
तो फिर रावण ने उनको अपने ही महल के बाजू में रावण का बगीचा था। एक क्या नाम था इसका? किसे को बताएँ?
अशोक वाटिका।
अशोक वाटिका था। बाद में जब हनुमान जी वहाँ पर आ गए, उन्होंने उसको शोक वाटिका बना दिया। उसको सारा तहस-नहस कर दिया।
तो अभी जो है कि वहाँ पर उनको रख दिया।
सीता का भाव यह था कि मैं रावण के साथ, रावण ने दी हुई किसी भी चीज़ का मैं भोग नहीं करूँगी।
शरीर के संरक्षण के लिए जो खाना देते थे, वह कुछ रावण के कुछ राक्षसियों के द्वारा देते थे। वह उसको पहरा देते थे और वह लेती थीं।
बहुत सीता के समान है।
शरीर का बंधन
और जब अभी आत्मा शरीर में फँस जाता है—अभी हम सब शरीर में फँसे हुए हैं—हमें कभी लगता नहीं कि हम शरीर में फँसे हुए हैं क्योंकि हम शरीर से ही पहचान लेते हैं।
“मैं शरीर ही हूँ।”
सोचते हैं, तो शरीर में फँसने की बात क्या है? मैं शरीर ही हूँ।
एक मित्र रूस में प्रचार के लिए गए थे। तो वो बोल रहे थे कि उनका प्रचार लगा है। वो बोल रहे थे कि मैं एक बार प्रवचन दे रहा था। वो कहा था कि आप तुम्हारे शरीर नहीं हो।
तो एक व्यक्ति ने हाथ खड़ा किया।
क्या सवाल है?
“मैं मेरा शरीर नहीं हूँ तो मैं किसका शरीर हूँ?”
मतलब क्या? मैं शरीर तो हूँ ही। अगर मैं मेरा शरीर नहीं हूँ तो किसका शरीर हूँ?
तो इस शरीर के परे कुछ तत्व है। यह समझना आसान नहीं है। हमको लगता है कि मैं शरीर ही हूँ।
पर कभी-कभी अगर हमारा शरीर हमारा साथ नहीं देता है—अगर मान लीजिए हमको ऐसी बीमारी हो जाती है, हम बिस्तर पर लेटे हुए हैं, कुछ उठ भी नहीं पा रहे हैं और मान लीजिए उसके पहले कहीं यात्रा जाने वाले थे, कहीं पिकनिक जाने वाले थे और सारे हमारे रिश्तेदार, मित्र वहाँ पर चले जाते हैं और तभी हमारा शरीर कमजोर होने के कारण बीमार हो जाता है—तभी क्या होता है?
तभी हमको लगता है, यह शरीर मुझे इतना सीमित कर रहा है।
जाने की इच्छा तो है मुझे, पर शरीर में क्षमता नहीं है।
तो ऐसे समय में जब हम कुछ करना चाहते हैं, पर जब हमारा शरीर साथ नहीं देता है, तो हम समझ सकते हैं कि वास्तव में मैं शरीर नहीं हूँ। मैं शरीर से अलग हूँ और शरीर मुझे सीमित कर रहा है। शरीर मुझे बंधन में डाल रहा है।
वास्तव में शरीर इस तरह ज़रूरी है, क्योंकि शरीर के लिए हम भौतिक जगत में कार्य नहीं कर सकते हैं। पर शरीर हमें सीमित करता है।
और ये सीमा क्या है?
न केवल हम इच्छाओं के पूर्ण होते हैं। हम हवा में उड़ना चाहें तो उड़ नहीं सकते हैं। हम मछली से तैरना चाहें तो तैर नहीं सकते हैं।
पर उसके साथ-साथ शरीर सबसे बड़ी सीमा डालता है।
मृत्यु और शरीर की सीमा
क्या है?
काल के आधार में महाभारत में कहते हैं युधिष्ठिर महाराज से कोई भी जीव मृत्यु के नियम को टाल नहीं सकता है।
अब सीमा होती है।
सीमा ऐसे हो सकती है कि कोई cage में है, तो तुम इस इलाके से बाहर नहीं जा सकते हो।
पर दूसरे प्रकार की सीमा हो सकती है। कोई हमें कहता है कि तुम इस बड़े आलीशान घर में रहो, पर इस घर में तुम सिर्फ एक महीना रहोगे और उसके बाद में तुम बाहर हो जाओगे।
तो कभी कोई व्यक्ति नौकरी कर रहा होता है, तो सरकार की नौकरी होती है, कोई कॉलेज में, hostel में नौकरी होती है। अच्छा, आज वो apartment मिलती है, तो रहने की जगह मिलती है, तो बड़ा अच्छा घर भी होगा।
पर क्या है? वो घर सीमित काल के लिए है।
और उसके बाद में हमारा शरीर का अस्तित्व भी सीमित है। जब तक हम शरीर से ही भोग करने के पीछे लगे रहते हैं, तो हम सीमित हैं।
कभी-कभी हमें समझ में भी नहीं आएगा, पर वास्तव में हमारा अस्तित्व तो सीमित है।
और जब इस तरह से रह रही थी वो, जब सीता रह रही थी लंका में, तो सीता को पता था कि सीता की इच्छा थी राम के साथ रहे और जबरदस्ती राम से दूर उन्हें रावण लेके आया था।
तो क्योंकि राम की स्मृति थी, इसलिए सीता को हर पल लग रहा था कि मैं इस बंधन में फँसी हूँ। कब निकलूँगी मैं यहाँ से?
तो जब तक हम भगवान की स्मृति नहीं करते हैं, भगवान की प्राप्ति की इच्छा नहीं होती है, तो कई बार यह शरीर यह बंधन है, यह समझ में नहीं आता है।
भौतिक भोग की सीमाएँ
वास्तव में भौतिकवादियों को भी, भौतिक व्यक्तियों को भी कभी-कभी समझ में आ जाता है कि हम भोग भी करना चाहते हैं।
अगर हम भौतिक भोग भी करना चाहते हैं, तो उसमें भी शरीर सीमा कर देता है।
शरीर हमें शारीरिक भोग भी मर्यादित रूप से कर सकता है।
Egypt में बड़े-बड़े pyramids होते हैं। बड़े-बड़े जो राजा हुआ करते थे, Pharaohs, उनको वहाँ पर उनकी mummies बना के वहाँ पर रखा गया था।
तो वहाँ पर एक pyramid में लिखा हुआ है—क्या है? क्या है?
कि उस समय जो Pharaohs हुआ करते थे, जो राजा हुआ करते थे, वह Epicureans थे।
Epicurean मतलब भौतिक भोग करना चाहते थे। तो जितना खाना चाहते थे, खाते थे।
तो अभी क्या है? पेट की क्षमता खाने की तो सीमित है।
तो फिर उन्होंने क्या योजना बनाई?
उन्होंने अपने उस समय के doctors थे, उनको बताया कि आप ऐसी कुछ दवाई बनाओ, जिससे बिना किसी दर्द के व्यक्ति उल्टी कर सके।
और वो क्या करते थे? पूरी मेजवानी पेट भरके खा लेते थे और खाने के बाद एक दवाई लेते थे और जो भी खाया है, उल्टी कर दो।
और पुनः खाओ, पुनः उल्टी कर दो, पुनः खाओ।
इस तरह से वो खा के भोग करने का प्रयास कर लेते थे।
पर वास्तव में क्या हुआ?
ये सिर्फ खाना मतलब पेट कितना खाली है, पेट कितना भरा है उतनी बात नहीं है। जब हम खाना खाते हैं तो सारे शरीर को मेहनत करनी पड़ती है उसको पचाने के लिए।
तो अगर व्यक्ति बार-बार, बार-बार खाते रहता है, तो फिर शरीर तंग जाता है।
तो वो जो Pharaohs थे, वो नौजवान वास्तव में उनकी मृत्यु हो गई और इसके बाद में किसी ने वो experiment वापस नहीं किया है।
जब शरीर हमें बंधन करता है, तो इस सीमा से हम बाहर कैसे निकल सकते हैं?
जब हम वो सीमा को देखते हैं, जब मर्यादा को देखते हैं, बंधन को देखते हैं—मैं इससे बाहर कैसे निकलूँ? मैं इससे बाहर कैसे निकलूँ?
जीवन के उद्देश्य की खोज
तो अभी सीता को तो पहले से ज्ञात था कि मैं इस बंधन में हूँ।
पर हम सब ऐसी परिस्थिति में हैं कि हम यह समझते नहीं हैं।
पर हर व्यक्ति के जीवन में ऐसा कोई पल आ जाता है जब उसके मन में सवाल आता है—
क्या जीवन में इसके परे कुछ और है?
क्या जीवन बस इस तरह से शरीर की ज़रूरतों को पूरा करने में, शरीर की इच्छाओं को पूरा करने में, शारीरिक भोग करने में इतना ही है?
या इसके परे और कुछ भी है?
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥
भगवान कहते हैं कि जो आसुरी प्रवृत्ति के लोग होते हैं, सोलहवें अध्याय के ज्ञान में कह रहे हैं, वो सोचते हैं कि शरीर के इस तरह भोग करना है, जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य है।
एतावदिति निश्चिताः।
निश्चय कर लिया है कि इसके अलावा जीवन का कोई उद्देश्य है ही नहीं।
और जब ऐसा भाव होता है तो फिर वो व्यक्ति जो भी सुनता है, जो भी देखता है, उसका अपने इच्छा के अनुसार ही वो उसका अर्थ निकाल लेता है।
अभी जो आध्यात्मिकवादी लोग हैं, वो कहते हैं कि अभी आप जवान हो, फिर भी क्या है? जवानी कुछ समय के लिए है। जवानी के जोश में मत चले जाओ।
तुम अभी भी computer से भक्ति चला करते हैं। बहुत क्वालिटी लोग भी वही बात लेते हैं कि आप जवान हो, जवानी कुछ समय के लिए है। जब तक जवान हो, भोग कर लो, बाद में भोग करने को नहीं मिलेगा।
तो क्या है? जो तत्व सत्य है, वो एक ही है, पर उससे निष्कर्ष बिल्कुल अलग-अलग निकाला जा सकता है।
जो दैवी प्रवृत्ति के लोग होते हैं, वो देखते हैं कि वास्तव में हम ठीक है, अभी जवानी है, अभी शरीर तंदुरुस्त है, तो उसके बाद में भविष्य में क्या है?
पर जो भौतिकवादी लोग होते हैं, वो क्या देखते हैं?
ठीक है, अभी जो भोग करना है, इतना भोग कर सकता है, उतना भोग कर बाद में कोई कुछ करवा ही मत कर।
पर वास्तव में बुद्धि का मतलब है कि हम भविष्य में क्या होने वाला है, वो देख पाना।
बुद्धि की एक और परिभाषा है कि भविष्य में क्या होगा, वो देख पाना।
रावण की Good Cop, Bad Cop Strategy
तो अभी जब सीता को पकड़ा होता है रावण ने, तो रावण क्या करता है?
सीता को अपनी ओर मनाने का प्रयास करता होता है।
तो उसके लिए क्या करता है वो?
इंग्लिश में कहते हैं Good Cop, Bad Cop Strategy.
अच्छा पुलिस वाला, बुरा पुलिस वाला।
मतलब क्या है?
कि अगर कोई गुनहगार को पकड़ लिया है, उसको कुछ जानकारी चाहिए और जानकारी दे नहीं रहा है, तो एक पुलिस वाला क्या करता है?
वो गुनहगार को पीटता है, पीटता है, पीटता है।
बोलो!
तो अभी कोई गुनहगार होता है। एक पुलिस वाला क्या करता है? वो bad cop बन जाता है। पूरा पुलिस वाला बन जाता है और इसको धमकाता है, इसको पीटता है, उसको बहुत दर्द पहुँचाता है।
“बोलो, कहाँ पैसा छुपा के रखा है? बोलो, तुम्हारे साथ कौन-कौन काम कर रहे हैं?”
और फिर वो बहुत पिटाई करके, धमकी देकर चाहता है।
फिर दूसरा पुलिस वाला जाता है और दूसरा पुलिस वाला क्या करता है?
वो good cop बन जाता है।
अच्छा पुलिस वाला बन जाता है।
“अरे रे, ये तुमको क्या हो गया? किसने तुमको इतना पीटा है? बड़े जानलेवा से पीटा है। तुमको मुझे पता होता, मैं ज़रूर ये रोक देता।”
क्या है कि वो जो पुलिस वाला है, वो बहुत खतरनाक है।
“मैं समझाने का प्रयास करूँगा उसे, पर तुम्हें भी मदद करनी चाहिए। मैं तुम्हारे संरक्षण करूँगा, मैं तुम्हारी मरहम-पट्टी करने का इलाज करूँगा, पर उसको शांत करने के लिए तुम थोड़ी मदद कर दो। तुम कुछ जानकारी दे दो।”
तो क्या होता है? दोनों का उद्देश्य है वो चोर से जानकारी लेना, पर वो दोनों साथ में काम करते हैं।
तो क्या होता है, वो चोर होता है, उसके मन पर उससे ज़्यादा प्रभाव पड़ता है।
तो कभी वो बुरा पुलिस वाला आता है, उसको पीटता है। बाद में वापस अच्छा पुलिस वाला आता है, उसको फिर थोड़ा सांत्वना देता है, थोड़ा उसको समझाता है, थोड़ा कुछ बताता है।
तो ऐसे करने से क्या है? वो धीरे-धीरे कमजोर हो जाता है वो जो गुनहगार है और वो जो जानकारी दे देता है।
मन का Good Cop, Bad Cop
हमेशा अगर हम हताश हो जाते हैं, तो वो हताशा के साथ हम जीवन जीने लगते हैं।
कई व्यक्ति जन्म से ही अंधा हो गया है और डॉक्टर ने कहा है कि आपको कुछ रोज़ देखने की क्षमता ही नहीं है। तो व्यक्ति स्वीकार कर लेगा, अब मुझे ऐसे ही जीना है।
पर मान लीजिए कोई व्यक्ति ऐसा है जो अंधा है, पर उसको कोई दवाई मिलती है, कुछ दिखता है, कुछ दिनों के लिए दिखता है, कुछ surgery होती है, कुछ दिखता है, वापस चला जाता है।
तो हर बार जब कुछ दिखता है, तो आशा बढ़ जाती है और फिर वापस दृष्टि चली जाती है, तो आशा चली जाती है।
तो क्या होता है? ऐसा अगर होता है, तो व्यक्ति का मन और विचलित हो जाता है।
तो ये मैं क्यों बता रहा हूँ?
कि रावण ने ऐसा ही किया सीता के साथ।
सीता को भी कमजोर करना था उसको।
तो उसके जो राक्षसियाँ थीं, तो उसमें से कुछ राक्षसियाँ थीं, वो बड़े दिखने में भी खौफनाक थीं। बड़े दाँत आ रहे थे, सींग थे, विकृत थे और वो आके सीता को धमकाते।
रावण खुद भी आके सीता को धमकाता, पर रावण के लिए उद्देश्य था—एक स्त्री मेरी बात को नहीं मान रही है, मुझे स्वीकार नहीं कर रही है।
तो बाकी अपने राक्षसियों को बोलता था, तो वो धमकाते, सीता को डराने का प्रयास करते थे।
और फिर बाद में उसने क्या किया?
विभीषण की पत्नी थी, उसको वहाँ पर भेज दिया।
“चलो, तुम उसकी दोस्ती करो।”
और उसकी इच्छा क्या थी कि विभीषण की पत्नी उसको बोले कि तुम यहाँ रावण की बात मान जाओ। कि रावण के हाल से तुम छूटने तो वाले नहीं हो। तुम कब तक इस तरह से खुद को दुखी करोगी?
पर क्या होगा वहाँ पर? विभीषण भक्त थे, उनकी पत्नी थी, वो भी धार्मिक प्रवृत्ति थी।
और यह एक तरह से प्रलोभन दे रहा था।
रावण खुद भी प्रलोभन दे रहा था।
कहता था कि “तुम आ जाओ मेरे साथ। मैं तुमको इतना भोग दूँगा। मैं तुमको मेरी प्रधान रानी बना दूँगा। सारी रानियाँ तुम्हारी सेवक बन जाएँगी।”
तो वो प्रलोभन दे रहा था, वो अच्छे पुलिस वाले के समान है।
और जो धमकियाँ दे रहा था, वो बुरे पुलिस वाले के समान है।
पर इसी में इसका भी कुछ प्रभाव नहीं हुआ।
तो वास्तव में क्या है?
हमारा मन भी ऐसे ही करता है।
मन हमें कैसे कमजोर करता है
जब हम कुछ अच्छा कार्य करना चाहते हैं, भक्ति करना चाहते हैं, कुछ good संकल्प करते हैं।
अभी नया साल होता है, तो नया साल के लिए कुछ लोग resolutions बनाते हैं कि मैं ऐसे करूँगा।
तो क्या होता है? मन कभी हमको बोलता है—
“यार, ये धमकाता है। ये क्या है? कैसे कर पाओगे? इतनी जल्दी ऐसे करोगे? नामुमकिन है ये। करी नहीं तो…”
तो फिर क्या होता है?
इस तरह से जब मन प्रलोभित करता है, धमकाता है, तो धीरे-धीरे-धीरे हम कमजोर हो जाते हैं।
पर वहाँ पर भी सीता बिल्कुल कमजोर नहीं होती हैं। अब भगवान की भक्ति में बनी रहती हैं वो।
और फिर जब रावण देखता है कुछ भी नहीं हो रहा है, फिर जब हनुमान आता है, हनुमान लंका को जला के चला जाता है।
उससे सीता का उत्साह और बढ़ जाता है।
कि हनुमान क्या करता है?
हनुमान जो है, सीता को संदेश देता है कि श्रीराम आपसे बहुत प्रेम करते हैं। वो आपके विरह में बहुत दुखी हैं और जैसे ही आपको जानकारी मिल जाएगी, आप कहाँ हो, तुरंत वो आपको लेने के लिए आ जाएँगे।
तो उससे क्या होता है?
जो सीता का उत्साह बढ़ जाता है, सीता का आनंद हो जाती है।
गुरु और भक्त हमें भगवान की याद दिलाते हैं
तो हनुमान जी जो हैं, वो हमारे गुरु के समान हैं, गुरु-वर्ग के समान हैं, भक्तों के समान हैं।
वो हमारे पास आते हैं।
हम शारीरिक चेतना में ही हैं। भगवान आध्यात्मिक चेतना में, आध्यात्मिक स्तर पर हैं। पर जो भक्त होते हैं, जो शिक्षा-गुरु, दीक्षा-गुरु सब होते हैं, वो क्या है?
हमारे सामने आते हैं और हमें भगवान का ज्ञान दिलाते हैं। हमें याद दिलाते हैं कि भगवान हम सब से प्रेम करते हैं और भगवान चाहते हैं कि हम उनके पास वापस चले जाएँ।
और अगर हनुमान जी लंका में आते और वहाँ पर लंका में देखते कि सीता शोक वाटिका में नहीं रह रही है, सीता रावण के साथ रह रही है और राम को भूल गई है, तो फिर हनुमान जी जाकर राम को संदेश देते।
तो क्या राम फिर भी उतने ही उत्साही होते सीता को लेकर आने के लिए?
तो क्या है कि जब हम भौतिक जगत में होते हैं, तो जो भक्त आते हैं, गुरु आते हैं, हमारे गुरु आते हैं और हमें जानकारी देते हैं।
जितना हमारा उत्साह है भगवान के पास जाने का, उतना भगवान हमारे पास आते हैं।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
जिस तरह से हम भगवान की शरण में जाते हैं, उतने ही उत्साह से भगवान हमारे पास आते हैं।
युद्ध और रावण का अंत
तो अभी जब युद्ध चालू हो जाता है, युद्ध चालू हो जाता है, तभी क्या होता है?
एक-एक करके जो रावण की योग्यताएँ हैं, उनका वध होने लगता है।
एक-एक करके वो सब जब गिर जाते हैं, तो रावण चिंता में आ जाता है, क्रोध में आ जाता है और सोचता है क्या करेगा।
तो जिस तरह युद्ध किया है मैंने सीता के लिए ही किया है, तो वो सोचता है कि अगर मैं किस लिए सीता को प्राप्त करूँगा तो फिर क्या होगा?
तो मेरी इच्छा पूरी हो जाएगी और फिर उससे जो राम का जो इच्छा है, सीता को प्राप्त करेंगे, जिसके लिए मैं युद्ध कर रहा हूँ, कि राम, वो भी तो पूरी जाएगी।
राक्षसों की मायावी शक्तियाँ
तो इसलिए राक्षसों के पास अलग-अलग प्रकार की शक्तियाँ होती हैं।
जैसे मारीच होता है। मारीच के पास क्या शक्ति होती है? क्या शक्ति होती है?
अलग रूप ले सकते हैं। सब राक्षसों के पास अलग-अलग रूप ले सकते हैं।
रावण भी साधु का रूप लेता है। पर मारीच जो होता है, उसके पास विशेष शक्ति होती है कि इस तरह से रूप को परिवर्तित करें कि वो अलग ही योनि का रूप ले ले।
रावण के पास भी रूप परिवर्तित करने की शक्ति होती है, पर रावण का शरीर जो होता है, माना जैसे होता है, राक्षस की बुद्धि होती है। पर मारीच जब होता है, तो वो वहाँ से एक साधु का रूप धारण कर लेता है।
शूर्पणखा भी एक राक्षसी होती है, पर एक मनुष्य जैसे सुंदर स्त्री का रूप धारण कर लेती है।
पर यहाँ पर एक मारीच जो होता है, वह दूसरे जानवरों का रूप भी ले सकता है।
तो वो किसका रूप लेता है? फिर हिरण का।
तो उस तरह से विद्युज्जिह्व नाम का एक राक्षस होता है। और यह विद्युज्जिह्व क्या होता है कि सब राक्षसों के पास कुछ माया शक्ति होती है, पर इसके पास विशेष माया शक्ति होती है।
तो रावण उसको बुलाता है।
होता है कि मुझे सीता का जो दृढ़ संकल्प है, वो तोड़ना है। तो तुम कुछ माया का कार्य कर दो।
तो फिर वो क्या करता है? विद्युज्जिह्व अपनी माया शक्ति से एक सिर बनाता है और वो बिल्कुल सिर ऐसा होता है जैसे राम का सिर होता है।
और फिर वो ऐसा धनुष्य बनाता है जो बिल्कुल राम के धनुष्य के समान है।
और फिर वो दोनों रावण को प्रस्तुत कर देता है।
और जब रावण को प्रस्तुत कर लेते हैं, रावण बड़ा प्रसन्न हो जाता है।
और फिर वो चलते हुए बड़े आराम से, गर्व से, अहंकार से, क्रोध से सीता के अशोक वाटिका में चला जाता है।
और वहाँ पर जाकर सीता से कहता है—
“देखो, तुम जिस राम के लिए मुझे ना कह रही थी, जिस राम पर तुम्हें इतना विश्वास था, उस राम का मैंने वध कर दिया है।”
सीता सुनती रही, तो “भला तुम्हें क्या हो गया है?”
पर फिर सीता का विश्वास होता है कि राम का वध हो नहीं सकता है। राम की शक्ति में उनको पूरा अविश्वास होता है? नहीं, राम की सामर्थ्य में उनको पूरा विश्वास होता है।
तो फिर वो पुनः रावण के लिए ध्यान नहीं देती है।
पर जब रावण देखता है, तो रावण बड़े ही क्रोध से कुछ चीज़ फेंकता है सीता की ओर और सीता के सामने आके गिरता है।
वो देखती है, क्या है वो?
वो राम का सिर है।
और जब वो देखती है, उसको सदमा पहुँच जाता है।
क्या हो गया?
और वो देखती है, बिल्कुल राम जैसे राम का सिर था, वैसे ही सिर है।
वो देखकर रोने लगती है, मूर्छित होने जैसे लगती है और वो कहती है—
“ये कैसे अनर्थ हो गया? ये कैसे संभव है? कि आपने तो बड़े-बड़े असुरों का वध कर दिया है राम, और ये आपका कैसे वध हो सकता है?”
तो रावण ने कहा है—
“दिन भर युद्ध करने के बाद, जब सारे वानर थके हुए सोए हुए होते हैं, तब राक्षस वानर पर टूट पड़े और सारे वानर का वध कर दिया और राम का वध कर दिया।”
क्योंकि रावण भी जानता है कि अगर वो कहेगा कि मैं राम के सामने जाके उससे युद्ध किया और राम का वध कर दिया, तो वो स्वीकार नहीं करेगी।
तो यह सीता भी उसको मानती नहीं।
इसलिए क्या कहता है वो?
“जब सो रहे थे, तब मेरे सैनिकों ने सारी सेना को तबाह कर दिया।”
जब सीता यह सुनती है, तो वो भयभीत हो जाती है, उदास हो जाती है, हताश हो जाती है, टूट जाती है।
कहती है कि ये कैसा अनर्थ हो गया? मेरा जब विवाह हो गया था, तब ही ज्योतिषी ने बताया था कि मैं सदा सौभाग्यवती रहोगी। कैसे उनकी भविष्यवाणी गलत हो सकती है?
और वो फूट-फूट के रोने लगती है।
मायावी सिर और सीता का विश्वास
अभी रावण जो होता है, वो बड़ा इतना स्वार्थी होता है, तो उसकी अपेक्षा होती है कि अभी राम की मृत्यु हो गई तो सीता मेरे पास में आ जाएगी।
पर सीता का राम के प्रति इतना प्रेम होता है कि जब राम का वध हो गया, ये सुन लेती है, तो फूट-फूट के रोने लगती है और रावण की ओर देखती भी नहीं है।
और फिर जब देखती है कि वहाँ पर सब लोग देख रहे हैं, तो रावण से कहती है—
“तुम जिस चिता में राम के शरीर को जला गए, उस चिता में मुझे जला देना।”
तो रावण देखता है, ये तो मेरी योजना ही थी।
रावण इतने सारे समय में उसका शरीर काम करता है, तो ये देखता है—वो योजना तो एक की होती है, पर ये कुछ अलग ही हो रहा है।
तो ये क्या करें, क्या न करें, सोच रहा होता है।
और तभी अचानक क्या होता है?
तभी कोई राक्षस सैनिक उसके लिए तैयार होता है।
क्या होता है?
मेघनाद, इंद्रजीत, अपने शस्त्र इस्तेमाल करके सारे वानरों को, अनेक वानरों को बेहोश कर देता है और राम और लक्ष्मण को भी बेहोश कर देता है।
पर क्या होता है?
इंद्रजीत तो सोचता है कि अभी हम सब जीत गए।
इनकी मृत्यु नहीं होती है, तो बेहोश हो गए होते हैं।
हनुमान जी संजीवनी लेकर आ जाते हैं।
तो संजीवनी लेकर आते हैं। तो इसके बारे में जो रावण को कुछ पता ही नहीं है।
तो हम सोचते हैं कि मेरे शत्रु already मर चुका है, पर अचानक क्या होता है?
जो वानर उसके ऊपर से कूद के लंका में प्रवेश कर लेते हैं और साथ तहस-नहस करने लगते हैं।
और ये सब क्या होता है?
जब यहाँ पर सीता को रावण प्रलोभित करने का प्रयास कर रहा था, धमकाने का, उसने राम का राम का कटाव सिर्फ दिखा दिया है उसको।
तो जो सैनिक आता है, जो वानर हैं, लंका में घुस गए, लंका में तहस-नहस कर रहे हैं।
लंका में कैसे आ गए?
तुरंत वहाँ से मुड़के राम चला जाता है और चला जाता है और फिर वो युद्ध की योजना करने लगता है।
और यहाँ पर सीता फूट-फूट…
यह जो सिर था, यह केवल एक मायावी सिर था।
और राम और वानरों ने अभी आक्रमण किया है लंका में और उसके कारण रावण वहाँ से चला गया है।
तो पहली सीता सुनती है, तो कुछ समझ भी नहीं आता है उसको।
क्या बोल रही है?
पर पुनः जब वो दोहराती है, तो सुन भी नहीं पाती होती है। पर जब वो सुनती है, तो फिर…
“राम अभी तक जीवित हैं!”
जैसे वो वचन उनके कानों तक पहुँच रहे हैं, तो पुनः आनंदित हो जाती हैं, पुनः उत्साहित हो जाती हैं।
मायावी सिर को पुनः ऐसा जीवन प्राप्त…
मन के मायाजाल से सावधान
तो इस तरह से जब रावण दूसरी तरह से भी सीता को फँसाने का प्रयास करता है, पर सीता फँसती नहीं है।
तो उस तरह से हमारा मन है, वह भी हमें कभी-कभी फँसाने का प्रयास करता है।
मन अलग-अलग प्रकार के मोह निर्माण कर देता है।
मोह निर्माण करता है।
कुछ नास्तिकवादी लोग कहते हैं भगवान है ही नहीं।
कुछ एक नास्तिकवादी था, कहा कि God is dead.
भगवान मर चुके हैं।
तो उसने तो डेढ़ सौ साल पहले कहा गया, भगवान मर गया।
पर वो कहने के बाद पंद्रह-बीस साल के बाद वो मर गया। भगवान तो अभी तक है ही।
मैं Australia में था। वहाँ पर एक प्रचार के पाँच महीने पहले वहाँ पे एक कॉलेज में एक discussion था।
तो discussion था। वो विषय क्या था?
Why is God still alive?
वैज्ञानिक हैं, बड़े-बड़े विद्वान हैं। वो कहते थे कि ये धर्म, ये तो केवल जो विज्ञान के युग के पहले, जो अंधविश्वास करने वाले लोग थे, वही भगवान को माना करते थे।
वैसे विज्ञान बढ़ जाएगा, तो क्या ये अंधश्रद्धा कम हो जाएगी और फिर सारे लोग नास्तिक बन जाएँगे और जब लोग नास्तिक बन जाएँगे तो भगवान में कोई नहीं मानेगा, तो भगवान भी मर जाएँगे।
तो ऐसी उनकी भविष्यवाणी थी।
पर यह भविष्यवाणी पूरी होने के लिए उल्टा ही हो रहा है।
कि सारी दुनिया भर में एक भौतिकवाद है और उसके साथ धर्म भी बढ़ रहा है।
अमेरिका को हम कई बार भौतिकवादी राष्ट्र कहते हैं, पर वास्तव में अमेरिका में भी बहुत लोग धार्मिक हैं। वहाँ पर Christian धर्म है, तो बहुत लोग धार्मिक हैं।
Britain में भी धार्मिक हैं।
रूस में तो जैसे Communism गिर गया, उसके बाद में धर्म इतना बढ़ गया है।
हरे कृष्ण आंदोलन वहाँ बहुत बढ़ गया है।
वहाँ पर जब हमारा अंतरराष्ट्रीय उत्सव होता है मायापुर में गौर पूर्णिमा के समय, तो वहाँ पे तीन division बाद यात्रा के लिए—ये भारतीय भक्त, अंतरराष्ट्रीय भक्त और Russian भक्त।
Russian में इतने सारे भक्त हैं।
हम China में भी Communism है, पर Communism के होते हुए भी बहुत से लोग धार्मिक बन रहे हैं।
विज्ञान जीवन का उद्देश्य नहीं बताता
तो अभी क्यों है?
जो भौतिकवादी, नास्तिकवादी लोग थे, वो कहते थे कि विज्ञान बढ़ जाएगा तो नास्तिकवाद बढ़ जाएगा, धर्म खत्म हो जाएगा।
पर वैसे नहीं हो रहा है।
क्योंकि विज्ञान क्या है?
विज्ञान केवल हमें हमारी शारीरिक ज़रूरतों को और आसानी से पूरा करने में मदद कर सकता है।
हमको पानी पीने को पहले हमको नदी के पार जाकर पानी लेना पड़ता था, पर विज्ञान के द्वारा एक pump से हमारे घर के अंदर पानी आता है।
पर विज्ञान हमें जीवन का उद्देश्य क्या है, जीवन में हमें करना क्या है, वो नहीं बताता।
आइंस्टीन कहते हैं—आइंस्टीन महान वैज्ञानिक थे—वो कहते हैं कि जो हमारी पाश्चात्य संस्कृति है, वो क्या है?
एक बड़े जहाज़ के समान है।
और इस जहाज़ में जैसे कोई cruise होती है, उसमें अनेक सुविधाएँ हैं। वहाँ पर swimming pool होता है, वहाँ पर movie theater होता है, वहाँ पर sports के लिए जगह होती है। बहुत कुछ भोग करने के लिए है। बड़े आराम का जहाज़ है ये।
पर जहाज़ में कोई compass नहीं है।
जहाज़ में दिशा दिखाने वाली कोई वस्तु ही नहीं है।
ये जहाज़ कहाँ जाना है, किसी को पता नहीं है।
तो बहुत अच्छा जहाज़ तो बन गया है, पर जहाज़ को कहाँ जाना है, किसी को पता नहीं है।
तो क्या है कि जीवन में अंत में हमें क्या करना है, यह उद्देश्य पता नहीं है।
तो भले ही मोह के द्वारा, नास्तिकवादी लोगों के द्वारा ऐसा माहौल हो कि भगवान मर गए, पर क्या है?
किसी सीता ने वो स्वीकार नहीं किया।
वैसे मानवीय हृदय ये स्वीकार नहीं करता।
हमारा जो हृदय है, वो कुछ और जानता है।
कि ठीक है, जीवन की ज़रूरतें पूरी करनी हैं, पर उसके बाद में और क्या है?
जीवन शास्त्र बताते हैं कि भगवत्प्राप्ति, भगवान की भक्ति करना, भगवान से आध्यात्मिक स्तर पर भक्ति, प्रेम की जागृति करना और उनके धाम में जाना—यह जीवन का अंतिम उद्देश्य है।
सीता की तरह भक्ति में स्थिर रहना
और जब सीता रावण के सारे मोहों से प्रलोभित हुए बिना बिल्कुल राम की भक्ति में बनी रही, अंत में क्या हुआ?
श्रीरामचंद्र ने आके सीता का उद्धार किया और पुनः उनसे सीता-राम का मिलन हो गया।
उस तरह से हमारा मन अलग-अलग प्रकार से मोह निर्माण करेगा।
पर अगर हम प्रामाणिकता से भक्ति करते रहेंगे, अगर हम कुछ भी हो जाए, भक्ति में लगे रहेंगे।
कभी-कभी हमारा मन बोलेगा—अच्छी नहीं भक्ति।
कुछ बोलेगा—अच्छी नहीं भक्ति।
पर फिर भी भक्ति करते रहेंगे।
और धीरे-धीरे क्या होगा?
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय।
भगवान कहते हैं कि अभ्यासयोग—आप साधना रूप से भक्ति करते रहते हैं।
जब करना है, कीर्तन करना है, भगवान की पूजा करनी है, सत्संग करना है—अगर हम करते रहेंगे, तो इससे क्या होगा?
इससे हमारा शुद्धिकरण हो जाएगा।
इससे भगवान के प्रति हमारा आकर्षण है, वो बढ़ जाएगा।
भगवान को प्राप्त करने की इच्छा और बढ़ जाएगी।
और यह इच्छा जैसे बढ़ती जाती है, बढ़ जाती है, उस क्षण तक हम…
और मन की बात है उसको प्राप्त को छुड़ाने के लिए पुरुषोत्तम राम आ गए थे, वैसे ही भगवान आ जाएँगे हमको शरीर से मुक्त करके उनके भगवत् धाम में जाने के लिए।
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।
भवामि नचिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥
भगवान कहते हैं कि—
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।
जो उनकी भक्ति करते हैं, मैं उनको इस संसार-सागर से मुक्त करूँगा।
भवामि नचिरात् पार्थ।
बहुत शीघ्र, हे पार्थ, उनको मैं मुक्त करूँगा।
मय्यावेशितचेतसाम्।
जो अपना चित्त मुझमें लगाते हैं।
सीता का उद्धार जिस तरह से हुआ, जिस तरह भगवान हम सबका भी उद्धार ज़रूर कर लेंगे।
सारांश
तो सारांश में आज हमने चर्चा की कि किस तरह से हमें मन से बचके भगवान की भक्ति करनी है।
तो रामायण जो ऐतिहासिक ग्रंथ है, पर केवल इतिहास ही नहीं है।
वह इतिहास के साथ-साथ जो शाश्वत शिक्षाएँ हैं, वह भी वहाँ पर बताई गई हैं।
तो आचार्य बताते हैं कि जो रावण है, वो हमारे मन के समान है। लंका शरीर के समान है। और सीता जो है, वो आत्मा है, जो मन के प्रभाव से शरीर के बंधन में फँस गई है।
शरीर के बंधन में फँसना मतलब कि शरीर की ज़रूरतों को पूरा करना यही हमारे जीवन का उद्देश्य बना देना।
वैसे कि गाड़ी को गाड़ी में पेट्रोल तो चाहिए और गाड़ी में पेट्रोल यह ज़रूरत है, पर गाड़ी चलाने का यह उद्देश्य नहीं है।
तो जानवर के शरीर में जब आत्मा होता है, तब उस समय आत्मा को शरीर की ज़रूरतें और इच्छाओं के परे और कुछ पता ही नहीं होता है।
तो मान लीजिए कोई अँधेरी कोठरी में है और सिर्फ एक छोटी-सी खिड़की है, उससे उसको दुनिया दिखती है।
तो वैसे ही क्या होता है हमारा?
जब जानवर के शरीर में आत्मा होता है, तो उसको खाना, सोना, भोग करना, संरक्षण करना—इसके अलावा कुछ सूझता ही नहीं है।
उसी छोटी-सी खिड़की से सारी दुनिया दिखती है।
पर जब हम मनुष्य शरीर में आते हैं, तो मान लीजिए ऐसी कोठरी है, अंदर कोठरी है और ऊपर से कुछ काँच है और थोड़ी-सी झलक मिलती है ऊपर बड़ी दुनिया की।
तो हम मनुष्य शरीर में होते हैं, तभी हमको हमारी ज़रूरतें पूरी करनी होती हैं। पर इन ज़रूरतों के परे और क्या है, वह भी जानना चाहते हैं जीवन में।
और उद्देश्य क्या प्राप्त करना है?
जो लोग शरीर की पूर्ति के लिए ही अपना जीवन डाल लेते हैं, शरीर की इच्छाओं की पूर्ति के लिए, वह क्या होता है? उसमें शरीर का ही विनाश कर देते हैं।
इसमें बताया कि जो लोग Egypt के राजा लोग थे, वो खाते थे और उल्टी करते, फिर खाते थे। तो उससे क्या हो गया? उनकी जवानी में मृत्यु हो गई।
हम भोग करने के लिए इतना भोग करने के लिए शरीर के लिए इतना भोग करने के लिए नहीं होते हैं।
तो वो भी एक प्रकार का बंधन है।
और सबसे बड़ा बंधन यह है कि जो शरीर है, हमारे लिए कुछ समय के लिए ही है।
हमारे पास कुछ समय के लिए ही है।
जैसे कोई quarters में रह रहा है, सरकार ने लिया है, सरकारी नौकरी में है, वो quarters में रह रहा है। उससे हमारा शरीर है, कुछ समय के लिए है।
और उस समय हो जाने के बाद जबरदस्ती हमको शरीर से निकलना पड़ेगा।
तो हम इस तरह से समझते हैं कि वास्तव में शरीर में मैं सीमित हूँ।
तो फिर इस सीमित जीवन से मैं कैसे बाहर निकल सकता हूँ?
समझ सकते हैं, इसके बारे में हम जाँच कर सकते हैं।
तो जैसे रावण ने सीता को कैसे फँसाने का प्रयास किया?
पहले सीता के सुंदरता का वर्णन किया, फिर खुद के ऐश्वर्य का वर्णन किया और फिर राम की अवहेलना की।
तो हमारा मन भी हमको फँसाता है।
कहता है—
“अरे, तुम बड़े भोगी हो। तुम बड़ा भोग कर सकते हो। तुम बड़ा आनंद कर सकते हो। तुम ईश्वर हो, तुम भोगी हो। और मैं तुम्हें जो भी भोग करना है, तुम्हें जो भी योजना बनाना है, वो सब मैं तुम्हें बता करूँगा।”
मन बार-बार हमें भोग की ओर आकर्षित करता है।
पर विज्ञान केवल हमारी शारीरिक ज़रूरतों को पूरा कर सकता है।
जो आत्मा की ज़रूरत है, जो जीवन में उद्देश्य है, क्या है—वो बताता नहीं है हमको विज्ञान।
विज्ञान में सिर्फ कैसे गाड़ी और देश चला सकती है, बताता है हमको।
और गाड़ी को कहाँ ले जाना है, यह हमें सिर्फ आध्यात्म बता सकता है।
आध्यात्मिक ज्ञान इन सब प्रलोभनों से, राक्षसियों से बिना प्रभावित हुए जो सीता श्रद्धा से राम के स्मरण में रहती थी और राम का चिंतन करती रही, तो फिर भगवान ने राम के रूप में उनका उद्धार किया।
राम से अगर हम शुद्ध भाव से भगवान की भक्ति करते रहते हैं, तो भगवान आएँगे।
तेषामहं समुद्धर्ता।
वे हमें इस भौतिक जगत के जंजाल से, इस पिंजड़े से, इस बंद घर से हमें छुटकारा प्राप्त करके उनके आध्यात्मिक धाम में ज़रूर ले जाएँगे।
बहुत धन्यवाद।
हरे कृष्णा!
कोई सवाल है तो वो रामायण की books कहाँ हैं, बताएँ?
किसी के कोई सवाल हैं?
बहुत धन्यवाद।
श्रील प्रभुपाद की जय!
गौर भक्तवृन्द की जय!
गौर प्रेमानन्दे!