4 significant words in the Gita’s last verse – Hindi
[Gitamrita class at ISKCON, Nasik, India]
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Lecture Summary
यह प्रवचन भगवद्गीता के 18वें अध्याय के अंतिम श्लोक “यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः…” (18.78) पर आधारित है, जिसे संजय धृतराष्ट्र से कह रहे हैं। व्याख्यान को मुख्य रूप से निम्नलिखित 4 प्रमुख स्तंभों और उनके व्यावहारिक जीवन दर्शन में बाँटा गया है:
1. योगेश्वरः (भगवान कृष्ण का अलौकिक रूप और समर्थता)
- अर्थ एवं संदर्भ: भगवान कृष्ण योगेश्वर हैं—समस्त योग और शक्तियों के स्वामी। संजय धृतराष्ट्र को याद दिलाते हैं कि जिन्होंने अंधे धृतराष्ट्र को अलौकिक आँखें और दिव्य विश्वरूप दर्शन दोनों प्रदान किए, वही योगेश्वर कृष्ण यहाँ उपस्थित हैं।
- व्यावहारिक सीख: जीवन में जब समस्याएँ हमारे सामर्थ्य से बहुत बड़ी प्रतीत हों, तो हमें हताश होने के बजाय यह याद रखना चाहिए कि उन समस्याओं से भी बड़े ‘योगेश्वर’ भगवान हमारे साथ हैं। वे किस पद्धति से संकट हल करेंगे, इसकी भविष्यवाणी हम नहीं कर सकते; हमें केवल प्रयास करते रहना है।
2. धनुर्धरः (अर्जुन की पुनः तैयारी और उच्च उद्देश्य)
- दृष्टिकोण में बदलाव: भगवद्गीता के प्रारंभ में अर्जुन ने मोह और हताशा के कारण अपना धनुष बाजू में रख दिया था, परंतु गीता ज्ञान सुनकर वे पुनः ‘धनुर्धर’ बनकर युद्ध हेतु तैयार हुए।
- पद, संबंध और धर्म (Position, Relations, Devotion): अर्जुन सोच रहे थे कि वे राज्य (Position) के लिए अपने संबंधियों (Relations) को मार रहे हैं। भगवान ने उनकी दृष्टि को ऊँचा उठाया कि यह युद्ध न तो संपत्ति के लिए है और न ही केवल रिश्तों के खिलाफ, बल्कि यह ‘धर्म की स्थापना’ (Devotion/Duty) के लिए है।
- उच्च उद्देश्य की शक्ति (Strength of Purpose): जब हमारा उद्देश्य छोटा (स्वार्थ या संपत्ति) होता है, तो बाधा आते ही हम रुक जाते हैं (जैसे साइकिल के आगे पेड़ गिरना)। पर जब उद्देश्य ऊँचा और दिव्य होता है, तो वह बड़े ट्रक की तरह मार्ग की हर बाधा को धकेल कर आगे निकल जाता है।
3. मतिर्मम (स्वेच्छा से विवेकपूर्ण सहमति)
- अर्थ एवं भाव: ‘मतिर्मम’ का अर्थ है “यह मेरा मत है”। संजय यहाँ यह दर्शा रहे हैं कि भगवद्गीता के दिव्य ज्ञान को समझकर वे स्वयं भी पूरी तरह आश्वस्त (Convince) और सहमत हो चुके हैं।
- व्यावहारिक सीख: भक्ति या जीवन का कोई भी नियम केवल ज़बरदस्ती थोपा नहीं जाना चाहिए, बल्कि उसके पीछे का तत्व ज्ञान समझाया जाना चाहिए। जब व्यक्ति नियम का अर्थ और हित समझ जाता है, तो वह अपनी बुद्धि और स्वेच्छा से उसे स्वीकार करता है।
4. यत्र (ऐतिहासिक और शाश्वत सत्य)
- ऐतिहासिक अर्थ: धृतराष्ट्र के अप्रत्यक्ष प्रश्न (रणभूमि में क्या हुआ?) का संजय उत्तर देते हैं कि जहाँ भगवान कृष्ण और समर्पित अर्जुन हैं, विजय और ऐश्वर्य वहीं निश्चित है।
- शाश्वत अर्थ (Eternal Meaning): यह केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं है। हमारा शरीर एक रथ है, आत्मा उसमें बैठी है और परमात्मा (कृष्ण) सारथी हैं। जब-जब हम ‘अर्जुन’ बनकर भगवान के मार्गदर्शन में ट्यून (Tune) होते हैं और उनकी सेवा में समर्पित होते हैं, तब-तब हमारे जीवन में विजय, नीति और मंगल की प्राप्ति होती है।
5. शंका समाधान एवं जीवन दर्शन (Q&A Key Takeaways)
- लक्ष्य (Goal) बनाम उद्देश्य (Purpose): ध्येय/लक्ष्य एक बाहरी लैंडमार्क है जो बदल सकता है, पर ‘उद्देश्य’ जीवन की एक दिशा (भगवान की सेवा) है जो कभी नहीं बदलती। यदि एक रास्ता बंद हो जाए (जैसे गंगा का मार्ग या प्रचार का माध्यम), तो हमें उद्देश्य में स्थिर रहते हुए कार्य करने के तरीके में लचीलापन (Flexibility) रखना चाहिए।
- कलयुग में अधर्म और धर्म की जय: कलयुग प्रतिकूल काल (वर्षा के मौसम) के समान है, जहाँ अधर्म का प्रभाव रहेगा। पर जैसे बारिश में हम छाता लेकर बच सकते हैं, वैसे ही व्यक्तिगत स्तर पर हरि-कीर्तन और भक्ति द्वारा हम स्वयं को सुरक्षित रख सकते हैं और समाज को भी प्रेरित कर सकते हैं।
- भक्ति और कर्तव्य (Inclusive vs Exclusive Devotion):
- Exclusive Devotion: मंदिर जाना, जप व सत्संग करना, जिससे आध्यात्मिक चेतना मज़बूत होती है।
- Inclusive Devotion: अपने पारिवारिक और सांसारिक कर्तव्यों को केवल भौतिक आसक्ति से नहीं, बल्कि भगवान के अंशों की सेवा समझकर भक्ति भाव से निभाना।
- केवल भौतिक कर्तव्य बिना आध्यात्मिक चेतना के मोक्ष नहीं दे सकते, पर भक्ति भाव से किए गए कर्तव्य व्यक्ति को आध्यात्मिक प्रगति की ओर ले जाते हैं।
Full Transcription
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः
संजय यह धृतराष्ट्र से बोल रहा है। भगवान ने सारे सात सौ श्लोक नहीं बोले, पर क्योंकि भगवान का सानिध्य है उसमें, भगवान के वचनों के पास ही बाकी सब वचन हैं। इसीलिए बाकी जो संजय बोलते हैं, धृतराष्ट्र बोलते हैं, या अर्जुन बोलते हैं, उसको भी भगवद्गीता का अंग बताया गया है।
“यत्र योगेश्वरः कृष्णो” — जहाँ भगवान कृष्ण हैं, जो कि योगेश्वर हैं। “यत्र पार्थो धनुर्धरः” — जहाँ पार्थ अर्जुन हैं, जिन्होंने अपना धनुष उठा लिया है। “तत्र श्रीर् विजयो भूतिः” — वही पे श्री होगी, वहीं पे ऐश्वर्य होगा, वहीं पे विजय होगी, वहीं पे शक्ति होगी, वहीं पे नीति होगी। “ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम” — यही सत्य है, ‘मतिर्मम’ — यह मेरा मत है।
इसमें चार शब्द हैं: ‘योगेश्वरः’, फिर ‘धनुर्धरः’, फिर ‘मतिर्मम’, और फिर ‘यत्र’। यत्र को अंत में हम देखते हैं।
भगवद्गीता में प्रयुक्त शब्दों का संदर्भ और महत्त्व
तो अभी देखते हैं, वास्तव में भगवद्गीता में जो अलग शब्द इस्तेमाल किए गए हैं, उन सबका विशेष, उनके संदर्भ में महत्त्व होता है। संदर्भ में महत्त्व क्या होता है? कि अभी मान लीजिए, हम किसी से बात कर रहे हैं, तो अलग-अलग लोगों से हम अलग-अलग अभिव्यक्ति से बात कर सकते हैं। जैसे उनका जो पहला नाम होता है, उससे बात कर सकते हैं; उनका जो दूसरा नाम होता है, उससे बात कर सकते हैं; सरनेम से बात कर सकते हैं।
तो पहले नाम से अगर उनको उल्लेख कर रहे हैं, तो उसका मतलब है कि थोड़ा इंटिमेट, स्नेह का संबंध है। अगर उनको दूसरे नाम से बात कर रहे हैं, तो फिर उसमें थोड़ा गंभीरता, आदर और Formality है उस संबंध में। या अगर हम किसी को उनके Designation (पदवी) से बात कर रहे हैं, तो फिर उसका भी कुछ अर्थ हो सकता है।
तो अगर किसी का इंटरव्यू ले रहे हैं, और उनको बोलते हैं कि ‘मिस्टर स्वैल्स’, या उनको बोलते हैं ‘मिस्टर प्रेसिडेंट’, तो जिस नाम से उल्लेख करते हैं, वह हम किस भाव में आदान-प्रदान कर रहे हैं, वह उसकी ओर संकेत करता है।
भगवान कृष्ण का ‘योगेश्वर’ रूप
तो अभी यहाँ पर ‘योगेश्वरः’ शब्द है। यह इसके पहले भी कुछ श्लोक पहले संजय ने इस्तेमाल किया:
$$परिचिक्षिप्य\ संस्मृत्य\ संस्मृत्य\ रूपमद्भुतम्\ हरेः\।$$
$$विस्मयो\ मे\ महान्\ राजन्\ हृष्यामि\ च\ पुनः\ पुनः\॥$$
राजन्! संस्मृत्य संस्मृत्य… तो वह जब बता रहे हैं, इसके पहले श्लोक 74 से शुरू होता है संजय की बात, और वहाँ पे कहते हैं:
$$इत्यहं\ वासुदेवस्य\ पार्थस्य\ च\ महात्मनः\।$$
$$संवादमिममश्रौषमद्भुतं\ रोमहर्षणम्\॥$$
$$व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं\ परम्\।$$
$$योगं\ योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः\ स्वयं\॥$$
तो अलग नाम उल्लेख किए उन्होंने। वासुदेव बोला है, ऐसे वो नाम बोले, पर यहाँ पर ‘योगेश्वर’। अभी योगेश्वर का अर्थ क्या है? किसी को पता है योगेश्वर का अर्थ? योगेश्वर का अर्थ क्या है? मान लीजिए हम टीवी देख रहे हैं। हमारे घर पर टीवी मुझे दिख रहा है और हम कहीं काम कर रहे हैं, तो हमको कुछ दिख नहीं रहा है, सिर्फ आवाज़ सुनाई दे रही है। तो अब अचानक कुछ अजीब आवाज़ सुनाई दे रही है, क्या हो रहा है?
तो वैसे ही धृतराष्ट्र को क्या हुआ? संजय ने कहा… कहते हैं, “नहीं नहीं, वो आप विश्वरूप दिखा रहे हैं। कृष्ण भगवान उन्हें विश्वरूप दिखा रहे हैं।” तो तभी धृतराष्ट्र निवेदन करता है कि, “कृपया आप मुझे… यह विश्वरूप दिखा रहे हैं, मैं कभी कुछ देख नहीं पाया, कृपया मुझे आपका विश्वरूप दिखाएँ।”
तो अभी जब भगवान तभी अपनी कृपा से धृतराष्ट्र को आँखें देंगे… तो यहाँ पे वास्तव में धृतराष्ट्र ने भगवान के योगेश्वर होने की शक्ति दो पद्धतियों से देखी। सबसे पहले, जो उनको कभी आँखें नहीं मिली थीं, उनको आँखें मिल गईं।
अभी किसी को कोई शरीर में कमी है, आँख काम नहीं करती, कान काम नहीं करते, तो वे पूरा प्रयास करेंगे—कुछ ऑपरेशन कराएँ, कुछ दवाई लें, किसी न किसी पद्धति से उसको काम कराने में लगा दें। अभी धृतराष्ट्र तो राजा था, तो उनके पास राज्य का सारा ऐश्वर्य था, संपत्ति थी, तो पूरा प्रयास किया होगा उन्होंने, पर कोई भी उनकी आँखें उनको वापस नहीं दे पाया था।
पर यहाँ पर भगवान ने उनको आँखें दीं। जैसे ही निवेदन किया, भगवान ने आँखें दे दीं। तो यही एक बहुत अलौकिक चमत्कार है। तभी धृतराष्ट्र ने यह अनुभव किया कि भगवान में बस यह शक्ति है, योगेश्वर ही अपने आँखें दे सकते हैं जी।
और फिर न केवल आँखें दीं, पर उसके बाद कुछ देखने को भी अद्भुत दिया। “अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा” — भगवान बाद में अर्जुन से कहते हैं और अर्जुन के लिए कहते हैं कि यह जो रूप है, यह बहुत कम लोगों को देखने का भाग्य मिलता है। तो वह जो रूप जो बहुत कम लोग देख सकते हैं, उनको देखने का मौका भगवान ने दिया था। जो देव भी ऐसे रूप देखने की इच्छा करते हैं, वह धृतराष्ट्र को दिखा दिया।
तो मतलब, देखने की शक्ति और देखने की चीज़, दोनों भगवान ने अपनी योगेश्वर की क्षमता से उनको प्रदान कर दी। तो वही ‘योगेश्वर’ शब्द संजय इस्तेमाल करते हैं जब 11वें अध्याय में बताते हैं कि भगवान अपना विश्वरूप दर्शा रहे हैं।
धृतराष्ट्र को सजग करने का प्रयास
संजय की इच्छा क्या है? कि वह इसके द्वारा धृतराष्ट्र को याद दिलाएँ कि यह जो भगवान हैं, उनकी शक्ति अपनी है, उनकी शक्ति अद्वितीय है। तो दुर्योधन ने अपने सैनिकों के साथ भगवान को बाँधने का प्रयास किया था, वह यशस्वी नहीं हुआ था। वह योगेश्वर जो हैं, उनकी ऐसी शक्ति है, उनके खिलाफ आप कैसे जा सकते हैं?
तो वही योगेश्वर, जिन्होंने उस समय विश्वरूप दिखाया था, वही योगेश्वर ने अभी इस भगवद्गीता के संदर्भ में भी विश्वरूप दिखाया है, और वही योगेश्वर यहाँ पे हैं। तो इस तरह से क्या कर रहे हैं वे? कि धृतराष्ट्र की जो मति है या विवेक है, उसको जाग्रत करने का प्रयास कर रहे हैं।
धृतराष्ट्र जो था… अभी सभा में भगवान ने भी अपना विश्वरूप धृतराष्ट्र को दिखाया। क्यों दिखाया? क्योंकि उनकी इच्छा थी कि जो युद्ध है, वह टल जाए। अभी धृतराष्ट्र राजा हैं, पर धृतराष्ट्र दुर्योधन से बड़ा आसक्त हैं, इसलिए दुर्योधन की किसी बात के खिलाफ जाने को तैयार नहीं थे।
पर यहाँ पर भगवान जब शांतिदूत के रूप में गए, तो हर तरह से उन्होंने प्रयत्न किया कि युद्ध को टाल सकें, हर तरह से। तो उन्होंने साम, दाम, दंड, भेद इस्तेमाल कर दुर्योधन को समझाने का प्रयास किया। पहले तो वह धृतराष्ट्र से बात करेंगे। धृतराष्ट्र राजा थे। धृतराष्ट्र को बात समझाने की कोशिश करेंगे। धृतराष्ट्र कहते हैं, “आप जो कहते हैं वह सब कुछ सही है, पर मैं क्या करूँ? जहाँ यह दुर्योधन है, मैं उसकी बात टाल नहीं सकता।” फिर भगवान कहते हैं कि, “आप उनसे बात करेंगे…” और फिर भगवान ने कहा कि, “पाँच गाँव तो दे दो,” आप वह भी सुनने को तैयार नहीं थे।
तो यहाँ पर, अभी भगवान क्या करना चाहते थे? धृतराष्ट्र की आसक्ति दुर्योधन के प्रति ज़रूर है, तो एक तो है, वह उसको दुखी नहीं देख सकते हैं। पर यहाँ पर अपना विश्वरूप दिखाकर बता रहे थे कि इस शक्ति के खिलाफ तुम कैसे जा सकते हो? इसके खिलाफ तुम कैसे जीत सकते हो? तो भले ही तुम दुर्योधन से आसक्त हो, तो उस आसक्ति के कारण उसके जीवित रहने की परवाह करो। उस आसक्ति के कारण उसके जीवित रहने की परवाह करके तुम उसको रोको।
तो ऐसे नहीं… मतलब आसक्ति तो छूट नहीं सकती है, पर कम से कम आसक्ति के कारण गलत मार्ग पर मत जाओ। तो वह उपदेशना है।
जीवन में सही उद्देश्य की शक्ति
तो कैसे होता है कि किसी व्यक्ति को अगर किसी सही मार्ग पर लगाना है, तो उसके लिए अलग-अलग पद्धतियाँ इस्तेमाल करनी पड़ती हैं। तो कभी-कभी सीधा हम उनको समझा देंगे और वे मान जाते हैं, पर ऐसा बहुत कम बार होता है। तो अलग-अलग तरह से उनको बताना पड़ता है। और वही निपुणता है।
चाणक्य पंडित कहते हैं कि अगर राजा को युद्ध में जीतना है, तो तलवार की चालाकी के साथ जिह्वा की चालाकी भी ज़रूरी है। कि तलवार से वह अकेला युद्ध कर सकता है, पर जिह्वा से अपने सैनिकों को युद्ध करने के लिए प्रेरित कर सकता है।
तो भगवान यहाँ पे अपने वचनों से, अपने कार्यों से दिखा रहे हैं कि देखो, यह शक्ति है, इसके खिलाफ तुम कैसे जाकर जीवित रह सकते हो? और अभी भी वही धृतराष्ट्र को संजय याद दिला रहे हैं—योगेश्वर हैं वे। योगेश्वर ने विश्वरूप दर्शाया था पहले, उन्होंने अभी भी विश्वरूप दर्शाया है। आप उनके खिलाफ कैसे जा सकते हैं?
तो इसके कारण ‘योगेश्वर’ शब्द का महत्त्व यह है कि जो भगवान ने चमत्कारिक रूप दिखाया था पहले… अर्जुन जब जयद्रथ वध के समय युद्ध कर रहे थे, तो अपनी दैवीय शक्ति के द्वारा उन्होंने सूरज को ढँक दिया था कि योगेश्वर भगवान हैं। इस तरह से ही योगेश्वर भगवान की जो महिमा है, उसको दर्शाने के लिए योगेश्वर शब्द है।
तो जब हम भी हमारे जीवन में कुछ कार्य करना चाहते हैं, तो कभी-कभी ऐसा लग सकता है कि अगर हमें कुछ भगवान की सेवा करनी है, कुछ समस्या आ गई हमारे पास, तो कैसे इसका सामना हो पाएगा? तो हमें हमारी पद्धति से प्रयास करते रहना है, और भगवान की जो शक्ति है, वह हमसे काफी बड़ी है। और भगवान कैसे कार्य कर सकते हैं, इसकी हम पहले से भविष्यवाणी नहीं कर सकते हैं। भगवान अपनी अलौकिक पद्धति से कार्य कर सकते हैं।
प्रभुपद जी जब अमेरिका गए अकेले, तो तभी भी क्या कहते हैं? ‘मार्कीने भागवद्धर्म’ जो गीत था, उसमें भगवान को कहते हैं, “आप योगेश्वर हो और आप चमत्कार कर सकते हो। मेरे पास यह वचन नहीं है, मेरे पास यह क्षमता नहीं है, पर आपके पास वचन है।”
तो भक्त जो होते हैं… कभी हम यहाँ पे हैं, हमारी समस्या यहाँ पे है, तो हम देखते हैं कि मैं इतना छोटा हूँ, यह समस्या इतनी बड़ी है। अगर हमको लगता है यह समस्या छोटी है, मैं बड़ा हूँ, मैं कुछ भी कर लूँगा; पर यह समस्या बड़ी अगर लगती है, तो क्या होता है? हमसे कैसे सामना हो पाएगा? पर हम इतने हैं, समस्या हमसे बहुत बड़ी है, पर इस समस्या से बड़े भगवान हैं!
तो जब हम समस्या को देखेंगे, तो हमारा हौसला ढह जाएगा। पर इस समस्या से बड़े भगवान को देखेंगे, उनकी ओर दृष्टि रखेंगे, तो फिर क्या है? वे योगेश्वर हैं, वे किस पद्धति से किस समस्या का हल कर सकते हैं, वह हम भविष्यवाणी नहीं कर सकते हैं। इसीलिए ‘योगेश्वर’ शब्द देखा।
‘धनुर्धरः’ अर्जुन का पुनरुत्थान
‘धनुर्धरः’ — धनुर्धर का मतलब क्या है? कि अर्जुन ने अपना धनुष उठा लिया है। अभी अर्जुन भगवद्गीता की शुरुआत में धनुष उठाकर युद्ध करने के लिए तैयार हो गए थे, पर जब उन्होंने देखा कि किस तरह से सब खड़े हैं:
$$दृष्ट्वेमं\ स्वजनं\ कृष्ण\ युयुत्सुं\ समुपस्थितम्\।$$
$$सीदन्ति\ मम\ गात्राणि\ मुखं\ च\ परिशुष्यति\॥$$
देखा कि भीष्म, द्रोण उनके खिलाफ हैं, कैसे युद्ध कर सकते हैं? तो वह देखकर क्या कर दिया? धनुष बाजू में रख दिया। “मैं युद्ध नहीं कर सकता हूँ।” अभी धनुष बाजू में रख देना, उसका अर्थ क्या है? कि “मैं युद्ध नहीं करूँगा।”
किसी विद्यार्थी की परीक्षा है, परीक्षा शुरू हो गई है, परीक्षा में कुछ उत्तर लिखने के पहले ही विद्यार्थी अपने पेन को बाजू में रख देता है। अभी पेन बाजू में रख देना, कुछ लिखेगा नहीं, तो अपने आप में वह फेल हो जाएगा बिना कुछ किए भी। तो अर्जुन ने इस तरह से धनुष-बाण बाजू में रख दिया। इसका मतलब है कि वे अपना हौसला हार गए थे।
पर भगवद्गीता के वचनों के द्वारा क्या हो गया? उनका हौसला पुनः आ गया—”धनुर्धरः”। उन्होंने अपना धनुष पुनः उठा लिया।
दृष्टिकोण में परिवर्तन: पद, संबंध और भक्ति
और यह क्यों हुआ? भगवान ने अर्जुन की दृष्टि बदल दी। अर्जुन क्या सोच रहे थे?
तीन चीज़ें होती हैं:
- Position (पद/संपत्ति)
- Relations (संबंध)
- Devotion (भक्ति)
तो मैं अगर अमेरिका में था, मैं प्रिंसटन में एक लेक्चर दे रहा था, प्रिंसटन यूनिवर्सिटी (अमेरिका की बड़ी यूनिवर्सिटी) में, तो वहाँ पे कुछ हिंदुइज्म के प्रोफेसर गए थे। तो एक प्रोफेसर पूछ रहा था ऐसा सवाल कि, “Does God consider positions more important than relations?” कि क्या भगवान ऐसा देखते हैं कि हमारी संपत्ति हमारे संबंधों से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है? कि वह राज्य प्राप्त करने के लिए उन्होंने अर्जुन से कहा कि तुम युद्ध करो, अपने संबंधियों को मारो? तो क्या उसके लिए… तो ऐसा कैसे हो सकता है? लोग कहते हैं कि हमारी संपत्ति ज़रूरी है, पर संबंधों से ज़्यादा ज़रूरी नहीं है।
तो वास्तव में यह जो विचारधारा थी, यह अर्जुन की विचारधारा थी! यह कृष्ण की विचारधारा नहीं है। अर्जुन यही कहता है:
$$यद्यप्येते\ न\ पश्यन्ति\ लोभोपहतचेतसः\।$$
कि वे लोग लोभ के कारण देख नहीं रहे हैं कि वे गलत कार्य कर रहे हैं, पर मैं लोभ के लिए, राज्य प्राप्ति के लिए, मैं मेरे रिश्तेदारों के खिलाफ युद्ध कैसे करूँ?
$$निहत्य\ धार्तराष्ट्रान्नः\ का\ प्रीतिः\ स्याज्जनार्दन\।$$
बार-बार वह वही बात बता रहे हैं कि मैं अपनी कुछ संपत्ति प्राप्त करने के लिए मेरे रिश्तों को क्यों त्यागूँ? मैं रिश्तों के खिलाफ युद्ध कैसे करूँ?
तो भगवान बता रहे हैं यहाँ पे कि आप युद्ध किस दृष्टि से कर रहे हैं? जब हमारी दृष्टि होती है कि यह इसलिए कर रहे हैं, वह इसलिए कर रहे हैं, उस दृष्टि से देखते हैं तो अर्जुन को लगता है—अर्जुन की बात तो सही है। और भगवान बता रहे हैं कि तुम न तो संपत्ति के लिए युद्ध कर रहे हो, न तुम रिश्तेदारों के खिलाफ युद्ध कर रहे हो, तुम धर्म की पुनर्स्थापना करने के लिए युद्ध कर रहे हो!
तो जो उच्च उद्देश्य है, भगवान कहते हैं:
$$धर्मसंस्थापनार्थाय\ सम्भवामि\ युगे\ युगे\।$$
“मैं धर्म की स्थापना करने के लिए आता हूँ।” और फिर बाद में यह चौथे अध्याय में बताते हैं, और फिर 11वें अध्याय में बताते हैं: “निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्” — कि हे अर्जुन! धर्म की स्थापना करना जो मेरा उद्देश्य है, उसके लिए तुम एक निमित्त बन जाओ मेरे लिए।
तो भगवान क्या करते हैं? ऊँची दृष्टि देते हैं। यह कार्य तुम क्यों कर रहे हो? न तो तुम संपत्ति के लिए कर रहे हो, न संबंधियों के खिलाफ युद्ध कर रहे हो, तुम धर्म की स्थापना करने के लिए कर रहे हो।
अधर्म का प्रतिरोध और उच्च उद्देश्य की शक्ति
अभी क्या है कि हाँ, यह अर्जुन के लिए रिश्तेदार हैं और उनसे युद्ध अर्जुन कदापि करना नहीं चाहते थे। पर अर्जुन एक क्षत्रिय हैं। क्षत्रिय को धर्म की स्थापना करना ज़रूरी होता है, और वह धर्म की स्थापना नहीं करेंगे तो क्षत्रिय अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट रहे हैं।
तो अभी मान लीजिए कोई चोर चोरी करता है। साधारणतया चोर चोरी कैसे करते हैं? कि कोई घर में नहीं है, तो अंधेरे में कोई देखेगा नहीं, आप जाके चुपचाप किसी घर में जाके कहीं जाके चोरी करते हैं। पर कोई चोर होता है साधारणतया कि दिन-दहाड़े वह जाता है किसी के घर में और उसके सामने बंदूक रख के चोरी कर लेता है। तो अकेले में कहीं अंधेरे में छिप के चोरी करना यह बुरी बात है, पर सब के सामने चोरी करना यह तो उससे बड़ा दुस्साहस है!
पर मान लीजिए कोई चोर पुलिस स्टेशन में जाता है और पुलिस स्टेशन में वहाँ जो कुछ पैसा रखा हुआ है, पुलिस स्टेशन में पुलिस के सामने चोरी कर लेता है, तो यह तो मतलब… यह तो पूरा गैर-कानूनी कार्य की पराकाष्ठा हो गई!
तो उसी तरह से, अभी जब हम देखते हैं दुर्योधन, दुशासन, कर्ण—वे सब द्रौपदी का अपमान करना चाहते थे, द्रौपदी की जो इज़्ज़त है वह चुराने का प्रयास कर रहे थे। अभी ऐसा कार्य अगर कोई करता है तो बहुत बुरा व्यक्ति है। पर साधारणतः ऐसा जाहिल लोग किसी अकेले रास्ते पे किसी को पकड़ के जबरदस्ती करेंगे। पर अगर रास्ते में सब के सामने कर रहे हैं, तो मतलब ये तो इतने गुनाहगार हैं कि उनको किसी का भय ही नहीं है। पर मान लीजिए ये पुलिस स्टेशन जा के ऐसा कार्य करते हैं, तो मतलब सारा कानून टूट गया है!
तो दुर्योधन-दुशासन ने अनादर करने का प्रयास किया, वह क्या था? सब के सामने था! न केवल सब के सामने, जो राजागण हैं, जिनकी धर्म, नियम और न्याय का पालन कराने की जिम्मेदारी है, उनके सामने करने की कोशिश की। तो ऐसे लोगों को, खासकर दुर्योधन को अगर राज्य करने की शक्ति अनियंत्रित मात्रा में मिल जाए, तो वह तो सारे राज्य में विध्वंस कर देगा, पूरा अधर्म कर देगा।
तो जब पांडव 13 साल जंगल में थे, तभी दुर्योधन ने ज्यादा कुछ अधार्मिक कार्य नहीं किया, क्योंकि उसको नागरिकों को और जो मंत्रीगणों को अपनी ओर जीतना था। इसलिए तभी उसने ऐसा दिखावा किया कि “मैं अच्छा राज्य कर सकता हूँ, मैं दान दूँगा, मैं सबका कल्याण करूँगा।” पर वह सब एक दिखावा था, नकाब था, जिससे कि वह पांडवों से जो राज्य प्राप्त किया है, वह अपने पास रख सके। अगर पांडवों का खतरा निकल गया, तो फिर क्या होगा? तो फिर वह पूरा अपना जो बेरहमी है, अपनी अधार्मिकता है, वह सब खुलेआम करने लगेगा।
तो इसलिए ऐसे व्यक्ति को रोकना बहुत ज़रूरी था। तो भगवान ने क्या किया? अर्जुन की दृष्टि को ऊपर उठाया। “तुम संपत्ति के लिए युद्ध नहीं कर रहे हो।” अगर पांडव संपत्ति के लिए युद्ध कर रहे होते, तो फिर भगवान क्यों जाते शांतिदूत के रूप में? तो पांडव राज्य के लिए युद्ध नहीं कर रहे थे। और वह ऐसे थे कि अपने रिश्तेदारों के साथ युद्ध करने में कोई आनंद नहीं मिल रहा था। पर अगर वे रिश्तेदार किसी अधार्मिक व्यक्ति, जो अधर्म की मूर्तिमान रूप दुर्योधन है, उसके साथ हैं, तो क्या करेंगे?
तो कभी क्या होता है, हमारी सीमित दृष्टि होती है—यह इसलिए करना है, यह इसलिए नहीं करना है। तो कभी क्या होता है, हम सबका अपने जीवन में उद्देश्य होता है कि “मैं यह नौकरी इसलिए कर रहा हूँ, मुझे पैसा कमाना है”, “मेरे परिवार में इसलिए हूँ, मुझे यह करना है।” और जो हमारा उद्देश्य अगर पूरा नहीं होता है, तो हमें लगता है, “मैं यह क्यों कर रहा हूँ? यह करने का क्या फायदा है?”
तो भगवद्गीता में अर्जुन का ऐसे ही हौसला ढह गया—”मैं युद्ध क्यों करूँ?” पर भगवान ने क्या किया? उसको एक उच्च उद्देश्य दिया। उच्च उद्देश्य क्या था? कि “तुम युद्ध कर रहे हो, तब धर्म की स्थापना कर रहे हो।”
और कैसे होता है कि जितना हमारा उद्देश्य उच्च होता है, उतनी उस उद्देश्य में शक्ति होती है कि समस्याओं के पार जा सकते हैं। क्या होता है? That the strength of our purpose gives momentum to our motion.
कि जब हम मान लीजिए चल रहे हैं आगे… अगर हम एक साइकिल लेके चल रहे हैं और बीच में एक पेड़ गिर जाता है, तो क्या होगा? हम पेड़ के सामने रुक जाएँगे। पर हम एक बड़े ट्रक में जा रहे हैं और एक पेड़ ऐसे गिर गया, तो ट्रक तेज़ी से चल रहा है, तो क्या है? पेड़ को बाजू में धकेल के ट्रक आगे निकल जाएगा।
तो वैसे क्या होता है, हम सबके जीवन में समस्याएँ आती हैं। और हम सबका उद्देश्य होता है कि “मैं यह इसलिए कर रहा हूँ, मैं वह इसलिए कर रहा हूँ।” और जब हमारा उद्देश्य होता है, उसकी पूर्ति नहीं होती है, तो “मैं तब क्यों कर रहा हूँ? किसलिए कर रहा हूँ मैं? यह उद्देश्य तो पूरा नहीं होने वाला है।”
पर तभी हमको एक उच्च उद्देश्य मिलता है। उच्च उद्देश्य मतलब क्या? कि “अंत में, मैं यह केवल इस व्यक्ति को प्रसन्न करने के लिए, इस देह की प्राप्ति के लिए नहीं कर रहा हूँ। मैं वास्तव में यह भगवान की प्रसन्नता के लिए कर रहा हूँ, यह मैं भगवान की सेवा के लिए कर रहा हूँ।”
जितना हमारा उच्च उद्देश्य होगा, उतना हम समस्याओं के पार जाएँगे।
वैज्ञानिक शोध और आध्यात्मिक उद्देश्य
मैं अमेरिका में एक साइंस और स्पिरिचुअलिटी के सेमिनार में था—विज्ञान और अध्यात्म। तो वहाँ पे अभी कुछ ऐसा बड़ा दिलचस्प रिसर्च हो रहा है कि कैसे आध्यात्मिक कार्यों से… अगर कोई जप करता है, कोई ध्यान करता है, तो उसके द्वारा बहुत से लोगों को ऐसा अनुभव हुआ है कि उनके मन में शांति होती है।
पर अभी एक वैज्ञानिक स्तर पर ऐसा पता चला है कि हमारे ब्रेन में, हमारे दिमाग में जो वायर्स होते हैं… हम जब कार्य करते हैं, तो दिमाग में जो सिनैप्सेस (synapses) कहते हैं, जो छोटे-छोटे अध्याय होते हैं, जो भी हैं… और जो लोग नकारात्मक होते हैं, दुखी होते हैं, हमेशा शिकायत करते रहते हैं, हमेशा उदास रहते हैं, उन लोगों की वायरिंग अलग प्रकार से होती है।
तो अभी यह जो होता है… तो यह वायरिंग परमानेंट नहीं होती है, उसको बदल सकते हैं। तो अभी क्या हुआ है? संशोधन में पता चला है कि जो लोग नियमित रूप से ध्यान करते हैं, जप करते हैं, उनके दिमाग की वायरिंग ही बदल जाती है! तो अगर पहले नकारात्मक भाव की वायरिंग होगी, तो अभी सकारात्मक भाव की बन जाती है।
तो अभी जो वैज्ञानिक यह संशोधन कर रहे थे… तो क्या हुआ है? वे बता रहे थे तभी कि अनेक वैज्ञानिक यह कर रहे थे, पर यह वैज्ञानिक काफी प्रॉमिनेंट हैं। वे बता रहे थे कि जब वे ऐसा करने लगे… तो आजकल कैसा है कि मेनस्ट्रीम साइंस (विज्ञान) में कोई भी धर्म या भगवान के बारे में बात करो, तो कहते हैं, “नहीं, बात मत करो इसके बारे में।” कहते हैं कि, “यह वैज्ञानिक बाजू में रखो, भगवान बाजू में रखो। विज्ञान और धर्म को आप मिक्स मत करो, विज्ञान और भगवान को मिक्स मत करो।”
तो कोई भी चीज़ धार्मिक आ गई, तो फिर वे उसको इजाज़त नहीं देते, उसको आगे बढ़ने नहीं देते। पर इसके… यह जो वैज्ञानिक था, उसको बड़ी समस्या आ गई। क्योंकि उसके शोध में दिख रहा था कि अगर कुछ दिव्य नाम लेते हैं, भगवान का नाम लेते हैं, तो उसका सकारात्मक प्रभाव होता है। तो फिर क्या हुआ? जब उसका फंडिंग कट हो गया, उसको कुछ फंडिंग और फैसिलिटी नहीं मिल रही थी…
उसको खुद एक Spiritual experience (आध्यात्मिक जीवन का अनुभव) आया था। और उसका जीवन परिवर्तित हुआ था। “वैसे ही मैं दूसरों के जीवन को परिवर्तित करना चाहता हूँ। और उनको दिखाना चाहता हूँ कि आपका जीवन परिवर्तित होता है अध्यात्म के द्वारा। यह कुछ Unscientific (अवैज्ञानिक) नहीं है, वैज्ञानिक ही है।”
तो जब उसने यह विचार किया कि “मैं क्यों कर रहा हूँ? मैं ख्याति के लिए नहीं कर रहा हूँ, पैसे के लिए नहीं कर रहा हूँ”, तो उसके द्वारा क्या हो रहा है? उसको पुनः प्रेरणा मिल रही है। और फिर भले ही वैज्ञानिक स्वीकार नहीं कर रहे थे, अधिकांश वैज्ञानिक, पर क्या हो गया? उसके संशोधन में इतना आकर्षण था कि उसने किताबें लिखीं, यूट्यूब के वीडियो बनाए, और उसके द्वारा लोगों में प्रसिद्ध हो गया। फिर उसके बाद में भले वैज्ञानिक उसको सीरियसली न लें…
तो फिर यह मैं उसके उद्देश्य के हिसाब से बता रहा हूँ। यह युक्ति क्या है? कि अगर हमारा छोटा सा ध्येय होगा, तो समस्या आ जाएगी, तो हम बोलेंगे, “छोड़ दो यह।” छोटा सा उद्देश्य होगा… तो अर्जुन जो हताश हो गए थे, वे ‘धनुर्धरः’ कैसे बन गए? कि उनकी दृष्टि ऊपर उठ गई—”मैं यह किसलिए कर रहा हूँ? मैं इस उद्देश्य के लिए कर रहा हूँ, मैं भगवान के लिए कर रहा हूँ।”
तो वैसा धनुर्धर… जब हम हताश हो जाते हैं, तो हमें यह देखना चाहिए कि “मैं किस उद्देश्य से कर रहा हूँ?” जब तक हम किसी छोटे उद्देश्य में लगे रहते हैं, तो फिर हताश होने का सामना करना पड़ता है। जितना हमारा बड़ा उद्देश्य है, उतना हम हताशा से बचते हैं।
तो अर्जुन… भगवद्गीता हमको ऐसा एक Sublime Purpose (दिव्य उद्देश्य) देती है हमारे जीवन के लिए। जो भी हमारी समस्या है हमारे जीवन में… “मैं इस परिस्थिति में क्यों हूँ? मैं भगवद्गीता की सेवा के लिए यहाँ पर हूँ।” इस भाव से हम कार्य करते हैं, तो उस समस्या के सामने जाने का मौका, उसकी शक्ति हमें मिलती है।
तो अगर हम किसी छोटे से उद्देश्य के लिए—पैसा कमाना है, मुझे ख्याति कमानी है, मुझे यह करना है—उस उद्देश्य के लिए हम कर रहे हैं, तो हम एक साइकिल के समान हैं। एक पेड़ आ जाएगा, हम रुक जाएँगे। पर “मैं भगवान की सेवा के लिए कर रहा हूँ, भगवान के गुणगान के लिए कर रहा हूँ, दूसरों के कल्याण के लिए (परिवार वाले हों, दूसरे हों) मैं इस बड़े उद्देश्य से कर रहा हूँ”, तो क्या होगा? उस उच्च उद्देश्य के लिए कार्य कर पाएँगे।
तो यह दूसरा पॉइंट था कि कैसे अर्जुन का हौसला वापस आ गया, कि भगवान ने कोई दिव्य दृष्टि प्रदान की थी।
‘मतिर्मम’: स्वेच्छा से भगवान के मत से सहमत होना
तीसरा शब्द था ‘मतिर्मम’। मतिर्मम का मतलब है—”यह मेरा मत है।”
हमारे मत बदलते रहते हैं। एक व्यक्ति है, वह कहता है… एक कॉमेडियन है, वह कहता है कि, “मैंने अपना ओपिनियन चेंज कर लिया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं गलत था। मेरा मत तो बदल गया है, पर यह सत्य कि मैं सही था, वह नहीं बदला है।”
हमारे मत बदलते हैं। संजय यहाँ यह नहीं कह रहे हैं कि यह केवल मेरा मत है। इसका भाव यह है कि भगवद्गीता का उद्देश्य वास्तव में क्या है? भगवद्गीता का उद्देश्य केवल यह नहीं है कि भगवान की महिमा को बताना है। हाँ, वह उद्देश्य है, पर वह प्राथमिक उद्देश्य नहीं है। उसका प्राथमिक उद्देश्य मानव की चेतना को बदलना है, उसके उद्देश्य को बदलना है।
इसलिए हम कहते हैं साधारणतया कि जहाँ नारायण हैं, वहाँ लक्ष्मी होती हैं। तो अगर वह बात होती, तो संजय कह सकते थे कि जहाँ पर योगेश्वर हैं, वहाँ पर विजय है। जहाँ पर योगेश्वर हैं और जहाँ पर धनुर्धर हैं, वहाँ पर विजय है—यह बोलने की ज़रूरत क्या थी? अर्जुन का उल्लेख करने की ज़रूरत क्या है वहाँ पर? जहाँ पर कृष्ण हैं, वहाँ पर विजय है—यह सत्य है।
पर यहाँ पर भगवद्गीता का उद्देश्य क्या है? कि “भगवान महान हैं”, यह बताना मात्र नहीं है। ज़रूरी है, सत्य है कि भगवान महान हैं, पर भगवान महान हैं, इसलिए हमें भगवान की इच्छा के लिए, उनकी योजना के लिए कार्य करना है। तो कैसे भगवान की महिमा को जानकर हम हमारी इच्छा को, हमारे इरादे को बदल सकते हैं, यह भगवद्गीता में दर्शाया है।
मान लीजिए कोई डॉक्टर बहुत बड़ा डॉक्टर है, कि उसने यह सर्जरी की है, उसने इतने सारे मरीजों को ठीक किया है, उसने इतने सारे पेपर छापे, किताबें लिखी हैं, यहाँ-यहाँ उसके पेशेंट्स हैं। अब यह उस डॉक्टर की महिमा है, यह सही है। पर अगर कोई मुश्किल ट्रीटमेंट है, मान लीजिए कि कैंसर हो गया, तो कीमोथेरेपी लेनी है, रेडियोथेरेपी लेनी है, थोड़ा दर्द होता है ऐसे इलाजों में। तो तभी कोई मरीज है, रुग्ण है, वह लेने को तैयार नहीं है ट्रीटमेंट। “ट्रीटमेंट मुश्किल भी है, पर यह डॉक्टर अगर इतने महान हैं, तो क्योंकि ट्रीटमेंट से ज़रूर मैं ठीक हो सकता हूँ, इसलिए मुझे ट्रीटमेंट लेना चाहिए।”
तो हॉस्पिटल में डॉक्टर की महिमा बताने का उद्देश्य क्या है? यह उद्देश्य यह है कि उससे पेशेंट को प्रेरणा मिलेगी यह ट्रीटमेंट लेने की।
तो यहाँ पे क्या है? भगवान यहाँ हैं, वहाँ पे विजय होने ही वाली है, पर अर्जुन भगवान के साथ आ गए। मतलब क्या है? अर्जुन का भाव बदल गया है। और उसी तरह से जब ‘मतिर्मम’ संजय कहते हैं, तो उसका मतलब क्या है? वह कह रहे हैं कि, “मैं भी समझ गया हूँ कि भगवान की महिमा ऐसी है कि जो भगवान के साथ में रहेंगे, वही विजयी होंगे। जो भगवान से विमुख हो जाएँगे, भगवान से अलग हो जाएँगे, उनका विजय नहीं होगा।”
तो यहाँ पे जो ‘मतिर्मम’ (यह मेरा मत है), इसका मतलब ही क्या है? कि संजय यह कहने से… संजय भी कन्विंस हो गए हैं! संजय भी पूरा समझ के स्वीकार कर लिए हैं।
इसलिए जब हमें भगवद्गीता का संदेश सुनना है, समझना है, तो क्या है? कि हमारा जो मत है, वह भगवान से सहमत होना चाहिए। वह दर्शाया गया है ‘मतिर्मम’ से। ऐसा नहीं है कि भगवान आदेश देंगे और हम (अंधभक्त होकर) स्वीकार करेंगे। “भगवान यह आदेश क्यों दे रहे हैं? भगवान ऐसा करने को क्यों बता रहे हैं? और जब इस तरह से बता रहे हैं, तो मुझे क्यों करना चाहिए?”
अगर हम कुछ नियम बताते हैं कि “आप ऐसा करो, आप ऐसा मत करो”, तो “हमें ऐसा क्यों करना चाहिए, ऐसा क्यों नहीं करना चाहिए?” ज़बरदस्ती अगर किसी को लगाते हैं, “मैं बोल रहा हूँ ऐसा करो”, तो क्या होगा? जब तक हम उसके सामने देख रहे हैं, वह काम करेगा; पर हम नहीं होंगे, तो वह कार्य नहीं करेगा।
एक बार एक व्यक्ति गाड़ी चला रहा था और बहुत तेज़ गाड़ी चला रहा था। तो फिर ट्रैफिक पुलिस ने उसको पकड़ लिया। ट्रैफिक पुलिस ने पकड़ लिया, फिर उससे पूछा, “क्या तुमने यह स्पीड लिमिट नहीं देखा था?” “हाँ, मैंने स्पीड लिमिट देखा, मैंने आपको नहीं देखा था!”
तो मतलब क्या है यहाँ पर? कि अगर किसी व्यक्ति को यह समझ में नहीं आता कि स्पीड लिमिट के अंदर जाना चाहिए क्योंकि इससे मेरी ही सुरक्षा है, तो अगर वह खुद स्वीकार नहीं कर रहा है, तो क्या होता है? वह स्पीड लिमिट तब तक पालेगा जब तक कोई देखेगा। कोई देख नहीं रहा है, तो स्पीड लिमिट तोड़ देगा।
तो उसी तरह से, ज़बरदस्ती से अगर हम किसी को कार्य करने में लगाते हैं, तो ज़्यादा समय तक वह कार्य नहीं करेंगे। पर अगर उनको खुद समझ में आ जाए कि ऐसा क्यों करना है, तो फिर ज़रूर वे खुद अपनी इच्छा के अनुसार, अपनी बुद्धि के अनुसार कार्य करेंगे।
प्रभुपद जी के एक वरिष्ठ भक्त हैं, वरिष्ठ शिष्य हैं, सन्यासी गुरु हैं हमारे आदरणीय, मैं उनसे मिला था अभी अमेरिका में। तो मैं भी कॉलेज में प्रचार करता हूँ। अमेरिका में प्रचार करना एक बहुत मुश्किल काम होता है। तो वे बता रहे थे कि प्रभुपद जी ने उनको बताया कि, “अगर कृष्ण भावना सिर्फ नियम के रूप में बताओगे, तो तुम लोगों को दूर भगा दोगे। It is the worst thing, सबसे बुरी चीज़ कर सकते हो।”
तो कृष्ण भावना में क्या है? ज़रूर नियम हैं, पर वह नियम क्यों हैं, उसके लिए तत्व ज्ञान है। तत्व ज्ञान से हम समझते हैं, तो अपने आप वह नियम का अर्थ क्या है, महत्त्व क्या है, उसमें क्या हित है, यह सब समझ आता है।
तो ‘मतिर्मम’ का अर्थ क्या है कि संजय का मत भगवान से सहमत हो गया है। क्योंकि भगवान ने ज्ञान बताया है, इतने अच्छी तरह से बताया है। तो अच्छी तरह से हमें यह देखना है कि लोगों को “मुझे यह करवाना है” यह ज़रूरी नहीं है, लोगों को समझाना ज़रूरी है। किसी से हमें कुछ बताना है, “तुम यह करो, यह करो”, वह नहीं… “क्यों करो”, वह अगर हम पहले समझाते हैं, तो फिर लोगों को वह करने की प्रेरणा मिलती है। तो यही ‘मतिर्मम’ का अर्थ है।
‘यत्र’: ऐतिहासिक और शाश्वत अर्थ
और आखरी पॉइंट जो था—’यत्र’।
“यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः” — जहाँ यह कृष्ण हैं, जहाँ अर्जुन हैं। तो ‘यत्र’ का महत्त्व क्या है यहाँ पे? इसके दो स्तर हैं:
- Historical (ऐतिहासिक)
- Eternal (शाश्वत)
एक है इतिहास के स्तर पर। धृतराष्ट्र ने सवाल पूछा था कि इस रणभूमि में क्या हुआ:
$$धर्मक्षेत्रे\ कुरुक्षेत्रे\ समवेता\ युयुत्सवः\।$$
$$मामकाः\ पाण्डवाश्चैव\ किमकुर्वत\ सञ्जय\॥$$
“क्या हुआ वहाँ रणभूमि में?” तो अभी वे जो पूछे “क्या हुआ”, उसका मतलब क्या है? वे जानना चाहते हैं क्या हुआ, किसने क्या किया। पर अंत में वे जानना चाहते हैं कि यहाँ पर विजयी कौन है? तो वह जो सवाल है, थोड़ा इनडायरेक्ट सवाल है। और अप्रत्यक्ष रूप से जो सवाल पूछा गया है, उसका एक अप्रत्यक्ष रूप से संजय जवाब दे रहे हैं।
अब यह सवाल थोड़ा अजीब है एक तरह से। मान लीजिए अभी इस कार्यक्रम के बाद आप सब के लिए प्रसाद है। मानने की ज़रूरत नहीं, प्रसाद है! पर मान लीजिए अगर कोई कहता है कि पूरा कार्यक्रम हो गया, फिर सब लोग बैठे, उनको प्रसाद सर्व किया। अब सब लोग बैठे थे, प्रसाद सर्व करने के बाद उन्होंने क्या किया? यह पूछने की बात है? कि प्रसाद खाया! तो यह पूछने की बात क्या है उसमें?
तो वैसे ही, जब रणभूमि पर सब युद्ध करने के लिए आ गए थे, उसके बाद में क्या हुआ? युद्ध हुआ, वह तो साधारण जवाब है उसमें। पर यहाँ पे सवाल का अर्थ क्या है कि उस युद्ध में क्या हुआ? युद्ध सही में हुआ या नहीं, युद्ध में क्या हुआ?
तो वह बता रहे हैं… वहाँ पर एक भय क्या था? कि क्योंकि यह धर्मक्षेत्र है, तो शायद धर्मक्षेत्र में धर्म का प्रभाव हो जाएगा दुर्योधन पे, और शायद दुर्योधन कहे कि “हमें युद्ध नहीं करना है।” तो धृतराष्ट्र को ऐसा संशय था कि यह धर्मस्थल है, यहाँ पर कुछ ऐसी ध्वनियाँ होती हैं, प्रभाव होता है, तो उसकी वजह से युद्ध नहीं हो पाएगा।
तो यहाँ पूछ रहे हैं… मान लीजिए अगर कोई ऐसा सवाल पूछ रहा है कि सब लोग प्रसाद खाने बैठ गए, मतलब क्या होगा? और अगर तभी किसी ने कुछ नटखट करने के लिए, मान लीजिए उसने किसी पाइप को तोड़ दिया है, सब जगह पानी-पानी हो गया है, तो सब गीले हो जाएँगे, सब भाग जाएँगे, प्रसाद को छोड़ देंगे। तो उसने जैसे कुछ अधार्मिक उद्देश्य छोड़ दिया।
तो यहाँ पर जवाब दे रहे हैं कि ‘यत्र’ — कि वहाँ पर युद्ध हुआ, पर युद्ध में क्या हुआ? युद्ध में, क्योंकि धर्मराज, जो धर्म के स्रोत हैं, भगवान कृष्ण हैं वहाँ पर, तो वहीं पर उनका ही विजय होगा।
और यह तो ‘यत्र’ का ऐतिहासिक अर्थ है।
और ‘यत्र’ का एक और अर्थ है जो कि इतिहास के परे है। भगवद्गीता यह न केवल एक ऐतिहासिक ग्रंथ है, यह एक शाश्वत ग्रंथ है। भगवान ने उपनिषदों में बताया है कि हमारा शरीर जो है, यह एक रथ के समान है। और इस रथ में हम सब आत्मा के रूप में बैठे हुए हैं, और भगवान हमारे परमात्मा के रूप में हैं। तो भगवान हमारे मानवीय रथ के सारथी हैं।
“यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः” — मतलब जहाँ-जहाँ भगवान हैं (भगवान तो हरेक के हृदय में हैं) और जहाँ भगवान की सेवा के लिए समर्पित भक्त है (‘पार्थो धनुर्धरः’ मतलब हम सब अगर भगवान की सेवा करने के लिए सक्षम हो रहे हैं, हम तैयार हो जाते हैं), तो क्या है? वहीं पे यश है।
$$तत्र\ श्रीर्\ विजयो\ भूतिर्\ ध्रुवा\ नीतिर्\ मतिर्\ मम\॥$$
वहीं पे यश है, वहीं पे विजय है। यह ‘यत्र’ का अर्थ है कि भगवद्गीता केवल ऐतिहासिक ग्रंथ नहीं है, वही शाश्वत ग्रंथ है। जो वचन भगवान ने भगवद्गीता में बताए थे, वही भगवान हमारे हृदय में हैं। और वही भगवान हमें भी मार्गदर्शन करने के लिए तत्पर हैं, तैयार हैं।
हमें सिर्फ उनकी ओर मुड़ना है, उनसे श्रवण करना है। जितना हम भगवद्भावना में आते हैं, भगवच्चेतना में आते हैं, भक्ति करते हैं… तो बाह्य रूप से जब हम मंदिर में आते हैं, सत्संग करते हैं, साधना करते हैं, उससे क्या हो रहा है? हम भगवच्चेतना में आ रहे हैं। जितना हम भगवच्चेतना में आ रहे हैं, उतना भगवान हमें अंदर से मार्गदर्शन करेंगे, तो वह हम मार्गदर्शन सुन पाएँगे।
जैसे रेडियो होता है… अभी आजकल ज़्यादा लोग रेडियो ट्यून नहीं करते हैं, पर ट्यून करते हैं, तो रेडियो को अगर हम किसी स्टेशन पर ट्यून करेंगे जहाँ कोई कमेंट्री आ रही है, न्यूज़ आ रही है, कोई कार्यक्रम आ रहा है, जितना हम ट्यून करेंगे उतना वह कमेंट्री हम सुन पाएँगे।
तो वैसे ही क्या है, भगवान अंदर से बात कर रहे हैं हमसे, पर हमें खुद को ट्यून करना है। तो जो अर्जुन ट्यून हो गया है, वह प्रदर्शित होता है ‘पार्थो धनुर्धरः’ से। तो इस तरह से, अगर हम ध्यानपूर्वक भगवान का स्मरण करते हैं, भगवान के बारे में श्रवण करते हैं, भगवान का जप करते हैं, तो उसके द्वारा हम हमारी चेतना ट्यून कर रहे हैं। जब हम चेतना ट्यून कर रहे हैं, तो हमें सही मार्ग पर भगवान सही मार्ग का दर्शन देंगे कि “ऐसे नहीं करना चाहिए, ऐसे करना चाहिए। इससे मैं ऐसा करूँ।”
और फिर हम देखेंगे कि हम किसी परिस्थिति में आ जाएँगे, भगवान हमें आगे मार्ग दिखाएँगे। और हम हमारे जीवन में अग्रसर रहेंगे। तो भगवद्गीता यह केवल ऐतिहासिक नहीं है, यह शाश्वत है। जो भगवद्गीता भगवान ने अर्जुन को कही थी रथ पे, वही भगवद्गीता का ज्ञान भगवान हमें हमारे हृदय से भी देंगे। अगर हम अर्जुन हो जाते हैं, तैयार हो जाते हैं भगवान से सुनने के लिए, तो भगवान के मार्गदर्शन के द्वारा हमारे जीवन में अर्जुन के समान अग्रसर रहेंगे।
सारांश
सारांश में चर्चा की चार पॉइंट्स की:
- योगेश्वरः कैसे हमें ट्रक के समान बन जाना है और समस्याओं का सामना करके आगे जा सकते हैं।
- धनुर्धरः अर्जुन का हौसला कैसे वापस आया।
- मतिर्मम: मतिर्मम का मतलब है कि “यह मेरा मत है।” इसका मतलब यह नहीं है कि यह तुच्छ मत है, पर भगवद्गीता का ऐसा उद्देश्य है कि न केवल भगवान के आदेश का पालन करना है, पर भगवान के संदेश को समझ के स्वेच्छा से, अपनी बुद्धि से उनके मत से सहमत होना है। जब कृष्ण भावना किसी को बताते हैं तो ऐसे नियम नहीं बताना है, हमको तत्व ज्ञान बताना है पहले कि यह नियम क्यों है, उससे क्या फायदा होने वाला है। पहले प्रोडक्ट बताओ, बाद में प्राइस बताओ। तो यहाँ पर जो बता रहे हैं मतिर्मम, मतलब जैसे अर्जुन सहमत हो गए हैं भगवान से, वैसे संजय भी सहमत हो गए हैं। तो अगर हमारा मत भगवान से सहमत हो जाता है, तो मतलब जो भगवद्गीता की शिक्षा हमारे अंदर आ गई है, न केवल बाह्य रूप से हमने स्वीकार की है।
- यत्र: जहाँ ‘यत्र’ का एक ऐतिहासिक अर्थ है कि जो धृतराष्ट्र से कह रहे हैं कि वही विजयी होगा जहाँ योगेश्वर और धनुर्धर हैं, मतलब तुम्हारे पुत्रों का विजय नहीं होने वाला, उसके बाद कुछ कल्याण नहीं होने वाला।
प्रश्नोत्तर एवं शंका समाधान
प्रश्न: जब जीवन में बहुत समस्याएँ आ जाती हैं, तो भले ही हमारा उद्देश्य बरकरार रहे, तो भी जैसे अभिमन्यु पर बहुत से योद्धाओं ने एक साथ आक्रमण कर दिया तो वह हार गया… जैसे लगता है कि हम भी हार मान लेते हैं, तो क्या करें?
उत्तर: भक्ति ऐसी चीज़ है कि हार और जीत क्या है, यहाँ आसान नहीं है समझना। जैसे हम देखते हैं प्रभुपाद जी के जीवन में भी एक तरह से कितनी बार उनकी हार हुई! उन्होंने ‘भगवद् दर्शन’ (Back to Godhead) भारत में चालू करने का प्रयास किया, पर कोई लेने को तैयार नहीं था। वह दिल्ली की सड़कों में गर्मी में जा के बाँट रहे थे। वह इतनी थकान के कारण बेहोश हो रहे थे, एक गाय ने आकर उनको टक्कर मार दिया था। फिर भी ‘भगवद् दर्शन’ का उनका प्रयास जारी रहा।
तो अभी क्या है कि हम सबका थोड़ा फ़र्क है ‘गोल’ (Goal/ध्येय) में और ‘पर्पस’ (Purpose/उद्देश्य) में। जो ध्येय और उद्देश्य में सूक्ष्म फ़र्क है। ध्येय क्या होता है? ध्येय एक बाहरी लैंडमार्क जैसा है—मुझे यहाँ तक पहुँचना है। पर जो उद्देश्य है, वह एक दिशा है—मुझे इस दिशा में जाना है।
तो भक्त का क्या होता है कि हम सबको अलग-अलग प्रकार से, अलग-अलग परिस्थितियों में समस्याएँ आती हैं। अगर समस्याएँ आती हैं तो फिर तभी हम हो सकता है ऐसे कि हम कोई एक कार्य करना चाहते हैं।
अगर गंगा का उद्देश्य ही हो जाए कि “मुझे इसी मार्ग से सागर तक जाना है”, तो फिर क्या होगा? वह पहुँच नहीं पाएगी। तो क्या है कि मान लीजिए उधर रास्ता है, उधर से कुछ ऐसी जगह है जहाँ पे झरना बनने वाला है और उधर से उसको जाना है, पर उधर बंद हो गया रास्ता, तो बाजू से जाएगी। तो इतना कुछ झरना बनने वाला नहीं है, कुछ स्पेक्टेकल नहीं है, धीरे-धीरे जाने वाली है।
तो गोल मतलब क्या है कि मुझे इसी रास्ते से जाना है, मुझे यह लैंडमार्क क्रॉस करना है। पर उद्देश्य मतलब कि मुझे उस दिशा में जाना है!
तो कई बार हमारे जीवन में हम ध्येय बनाते हैं और वे कभी सफल नहीं होते हैं। तो क्या है कि हमें हमारे जीवन को कभी भी किसी केवल एक धारा में संकुचित नहीं करना है। हमारा परिवार है, हमारी आर्थिक ज़िम्मेदारियाँ हैं, हमारी सेहत है, हमारी शिक्षा है—अलग-अलग चीज़ें हैं। तो इन सब में एक में, दो में, तीन में कभी-कभी रुकावटें आ सकती हैं। पर क्या है, हम सब इनके द्वारा सीमित नहीं हैं। यह सब हमारे भाग हैं, पर हम इनसे बड़े हैं!
तो भले ही यहाँ पर सीमा आ गई, यहाँ पर बंधन, यहाँ पर बाधा आ गई, तो यहाँ से चले जाएँगे। तो इसलिए जब हम कहते हैं उद्देश्य, तो अगर भगवान की सेवा का उद्देश्य है, तो फिर हम खुद बुद्धि का इस्तेमाल करके: “ठीक है, मैं कैसी सेवा कर सकता हूँ जिससे कि मैं आगे बढ़ सकता हूँ?”
तो प्रभुपाद जी ने एक तरह से तो कहा कि अगर आप प्रचार करते हैं और कोई नहीं आएगा (उनके गुरुदेव ने कहा था) तो कोई नहीं आता है तो आप दीवारों से प्रचार करो! दीवारों से प्रचार करो! पर जब प्रभुपाद जी भारत में प्रचार कर रहे थे, जब लोग गंभीरता से नहीं ले रहे थे, तो प्रभुपाद जी ने दीवारों को प्रचार नहीं किया, वह अमेरिका चले गए! उन्होंने अमेरिका जा के फिर वहाँ प्रचार किया, और फिर अमेरिकन लोग जब भारत में आ गए, तो फिर भारतीय लोग भी प्रभावित हो गए।
तो इसका मतलब क्या है? जिस भक्ति सिद्धांत महाराज ने कहा कि “कोई नहीं आ रहा है तो दीवारों से प्रचार करो”, इसका मतलब क्या है? कि हौसला मत हारो! पर उसका मतलब यह लिटरली नहीं कि आप दीवारों को प्रचार करते रहो!
तो क्या है कि अगर हम एक मार्ग पर चल रहे हैं, तो जब तक फैसला किया है कि मुझे अब यह सेवा करनी है, तो पूरे शक्ति से प्रयास करने का। पर अगर ठीक है, यह नहीं हो रही है सेवा, अगर यह कार्य में यश नहीं मिल रहा है, तो ठीक है यह नहीं हो रहा है, मैं इधर से जा रहा हूँ, यह करने लगा।
तो हमें एक तरह से प्रयास करना चाहते हैं और प्रोसेस के लिए सेवा करना चाहते हैं कि हमारे उद्देश्य में हमें स्थिर रहना है, उसमें बदलना नहीं है—भगवान की सेवा करना है, भगवान के पास जाना है। पर कैसे करके जाना है, वह अलग-अलग परिस्थिति में अलग-अलग होगा। तो वह जो फ्लेक्सिबिलिटी (लचीलापन) है, वह हमें ज़रूरी रखना है।
कभी-कभी कोई व्यक्ति कृष्ण भावना का कोई कार्य नहीं कर पाएगा, पर वह कार्य न करके भी वह कृष्ण भावना में प्रगति कर सकता है।
मान लीजिए हम कोई बड़ा कार्य करते हैं, बड़ा इवेंट करते हैं और वहाँ पर कोई आता ही नहीं है, तो एक तरह से वह अपयश हो गया। एक भक्त बता रहे थे मुझे कि उन्होंने अमेरिका में राधानाथ महाराज के लिए बड़ा कार्यक्रम ऑर्गेनाइज़ किया था। बड़ी यूनिवर्सिटी में बड़ा ऑडिटोरियम लिया था और लगभग छह सौ-सात सौ, एक हज़ार विद्यार्थी आने वाले थे। तो फिर वे जब समय पर कार्यक्रम हुआ, तो तभी क्या हो गया? वे आए और वहाँ पर एक भी विद्यार्थी नहीं!
क्या हो गया? और जब वे बड़े ऑडिटोरियम में गए वहाँ पर, तो ऑडिटोरियम को ताला लगा हुआ था! क्या हो गया? और फिर महाराज उनके साथ थे, और फिर उन्होंने देखा कि वह जो प्रोग्राम था, वह 17 तारीख को था, पर गलती से टाइपिंग मिस्टेक से वह 11 हो गया था पोस्टर में! नहीं, वह 17 था पर गलती से 11 हो गया था। तो क्या हो गया था? वह सब जगह में पोस्टर थे, सैकड़ों पोस्टर थे, पर वह अलग दिन के लिए थे। तो यहाँ पर महाराज आ गए थे, कोई भी नहीं था!
और फिर तभी महाराज बोले कि उनको 17 तारीख को दूसरे देश में जाना था। तो अभी यह भक्त इतने हताश हो गए—बड़ा कार्यक्रम बनाया, इतनी छोटी सी गलती हो गई, कोई भी नहीं है यहाँ पर! तो तभी महाराज वहाँ आ गए थे, तो तभी क्या हो गया? तभी कोई प्रोफेसर आ गया।
और वह प्रोफेसर वहाँ पर आ गया, तो “तुम कौन हो?” उसने पूछा। तो महाराज ने अपना परिचय दिया कि, “मैं एक कृष्ण भक्त हूँ, मैं भगवद्गीता सिखाने आया हूँ।” तो प्रोफेसर बोला कि, “मैं भगवान को नहीं मानता हूँ, नास्तिक हूँ।”
और फिर वह महाराज से कहा, “आप मेरे केबिन में आइए, मैं आपसे एक बात करना चाहता हूँ।” और फिर वहाँ पर वह महाराज को एक के बाद एक नास्तिकता की बातें बताने लगा—”यह धर्म से ऐसे होता है, यह होता है, भगवान कल्पना हैं, वह हैं।” और महाराज बहुत शांति से जवाब देने का प्रयास कर रहे थे।
पर वह पूरा ऐसा… कुछ लोग एथिस्ट होते हैं और कुछ लोग एंटी-थिएस्ट होते हैं। न केवल नास्तिक हैं, बल्कि वे भगवान के खिलाफ आक्रमण करते रहते हैं। तो वह उस प्रकार का व्यक्ति था।
तो महाराज शांति से जवाब दे रहे थे, अच्छा जवाब दे रहे थे, पर वह बिल्कुल सुनने को तैयार नहीं था। और अभी यह भक्त महाराज के साथ थे, तो वे और उदास हो गए। तो तभी क्या हो गया? वास्तव में वह जो प्रोफेसर थे, वे पीजी गाइड (PG Guide) थे। उनका एक पीजी स्टूडेंट था, उससे उनका अपॉइंटमेंट था। तो उन्होंने महाराज को बुला लिया केबिन में। तो वह जो पीजी गाइड का स्टूडेंट था, वह महाराज की बात सुन रहा था!
और वह प्रोफेसर तो बिल्कुल सुन नहीं रहा था, पर वह जो विद्यार्थी था, वह बहुत इम्प्रेस हो गया! और फिर न केवल वह भक्त बन गया, उसने बहुत लोगों को भक्त बनाया! फिर उसने चार साल बाद, पीजी पास होने के पहले, उसने पहला प्रोग्राम बनाया था—एक हज़ार विद्यार्थी आने थे, दो हज़ार विद्यार्थियों के लिए प्रोग्राम बना दिया उसने!
तो यहाँ पर क्या हो गया? जो मार्ग से जाने वाले थे, वह मार्ग तो पूरा ब्लॉक हो गया। दूसरा मार्ग भी ब्लॉक ही दिख रहा था, पर वहाँ से कुछ और मार्ग निकल गया!
तो क्या है कि जब हमें लगता है कि यह भी काम नहीं कर रहा है, वह भी काम नहीं कर रहा है, तो क्या है कि हमें थोड़ा भगवान को काम करने के लिए जगह देनी चाहिए। तो हम देखते हैं यह काम नहीं कर रहा है, यह काम नहीं कर रहा है, पर भगवान अपनी पद्धति से काम कर रहे हैं।
तो अगर मान लीजिए महाराज नाराज हो जाते और महाराज चले जाते कि यह प्रोफेसर तो बात नहीं कर रहा है, तो यह विद्यार्थी नहीं आ पाता। क्योंकि महाराज ने अपना सेवा भाव बरकरार रखा कि “ठीक है, यहाँ पर…”
प्रश्न: कलयुग में अधर्म का ही बोलबाला दिख रहा है, तो धर्म की जय कैसे होती है?
उत्तर: हम देखते हैं भागवत में बताया है कि धर्म की जीत होती है, पर हम आजकल देखते हैं कलयुग में अधर्म की ही जीत हो रही है। ऐसा नहीं है। जब भगवान कहते हैं कि धर्म की जीत होती है, उसका मतलब यह नहीं है कि हर पल धर्म की ही जीत होगी। इस भौतिक जगत में काल होता है—कुछ काल अनुकूल होता है, कुछ काल प्रतिकूल होता है।
तो शास्त्रों में हम देख सकते हैं कि जब भगवान रामचंद्र बनवास में गए थे, तो तभी हमने देखा कि एक जगह पे हड्डियों का ढेर हो गया था। हड्डियों का ढेर हो गया था! मतलब क्या? कि जो जंगल में ऋषि-मुनि आए थे, ऋषि-मुनि तपस्या करने आए थे, वे राक्षस बनवास में उनको खा लेते हैं, उनके हड्डियों का ढेर यहाँ पे हो गया। तो वह रामचंद्र जी वहाँ पे गए।
तो अभी मतलब जो भगवान की सेवा के लिए, आध्यात्मिक प्रगति के लिए जीवन को त्याग चुके हैं, उनको क्या हो रहा है? राक्षस खा रहे हैं! तो वैसा तो आजकल नहीं हो रहा है।
तो ऐसा क्या है कि जो मन होता है ना, वह समस्या को बहुत बड़ा बना देता है। पर जगत में समस्याएँ आती रहती हैं, जाती रहती हैं। तो कुछ-कुछ काल ऐसा हो सकता है कि जब अधर्म ज़्यादा शक्तिशाली हो जाता है। तो ऐसा तभी हो गया था—राक्षसों का आतंक काफी समय से चल रहा था, तो भगवान परशुराम, रामचंद्र ने वह आतंक को बंद किया।
तो कलयुग ऐसा समय है कि जब जो जीव भगवान के खिलाफ जाना चाहते हैं, उनको जो वे करना चाहते हैं वह कार्य करने के लिए सुविधा दी गई है। तो इसलिए कलयुग में एक तरह से अधर्म यह अपेक्षित ही है।
कैसे है कि अगर यह अलग-अलग युग हैं, उनको हम कह सकते हैं यह अलग-अलग ऋतुओं के समान हैं। तो अगर वर्षा का ऋतु होगा, तो तभी बारिश तो आएगी। पर बारिश आएगी, इसलिए ज़रूरी नहीं कि हम सबको भीगना है! हम सब छाता ले सकते हैं, रेनकोट ले सकते हैं, और इसके द्वारा हम खुद को सुरक्षित कर सकते हैं।
तो उसी तरह से यहाँ पर कलयुग में बताया जा रहा है:
“कलेर् दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान् गुणः।”
“कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः। द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात्॥”
तो यहाँ पर क्या है कि समाज में जो अराजकता या अधर्म है, वह कलयुग में काफी हद तक रहेगा। क्योंकि कलयुग में उस प्रकार के जीवों को सुविधा दी जा रही है। जो जीव शुद्ध थे, वे सत्ययुग में, त्रेतायुग में, द्वापर में शुद्ध होकर भगवद्धाम चले गए। पर जो जीव अशुद्ध थे, उन जीवों से अब इस युग में आबादी भर गई है। तो इसलिए इस युग में उन जीवों को सुविधा है।
तो कहेंगे कैसे कि धर्म यह एक व्यक्तिगत स्तर पे हो सकता है और यह सामाजिक स्तर पे हो सकता है। तो सामाजिक स्तर पे जो धर्म की स्थापना है, वह शायद मुश्किल है और कलयुग में उतनी नहीं होगी। पर जो एक व्यक्तिगत स्तर है, वहाँ ज़रूर हम सब कर सकते हैं।
तो भले हम बारिश को रोक नहीं सकते हैं, हम खुद छाता तान सकते हैं। तो हम सब खुद भक्ति कर सकते हैं, भगवद्भावना में रहेंगे, हम खुद को अधर्म से बचा सकते हैं। और ऐसा नहीं है कि हम केवल खुद अकेले को बचाएँगे, हम दूसरों को भी प्रभावित कर सकते हैं।
हम प्रभुपाद जी का एक उदाहरण देख सकते हैं। 50-60 साल पहले कोई सोच भी नहीं सकता था कि सारे विश्व भर में भगवान की भक्ति होगी, पर आज हो रही है! हर देश में लगभग भगवान के भक्त हैं। अगर हम देखते हैं—डरबन, डब्लिन, दुबई—हर जगह पे रथयात्रा निकल रही है, सारे दुनिया भर में लोग धीरे-धीरे भक्ति कर रहे हैं। तो 50 साल में ही काफी बढ़ गया है, आगे और चलेगा। अगर भक्त अपनी भक्ति करते रहें, तो वह बढ़ भी सकता है।
इसलिए क्या है कि जो बारिश है, वह एक तरह से अनिवार्य है, पर बारिश से राहत प्राप्त करने की सुविधा भगवान ने हमें दी है। और हम खुद उसका इस्तेमाल कर सकते हैं और दूसरों को दिला सकते हैं। और जिस हद तक यह फैलाया जाएगा, उस हद तक समाज में भी परिवर्तन आ सकता है।
प्रश्न: भक्ति और कर्तव्य में से क्या चुनना चाहिए?
उत्तर: इंग्लिश में मैं कहता हूँ: Inclusive Devotion और Exclusive Devotion।
मतलब कुछ लोग बोल सकते हैं भक्ति का मतलब क्या है कि मंदिर में आओ, सत्संग करो, जप करो, शास्त्रों का अध्ययन करो, सेवा करो—यह भक्ति है। हाँ, ज़रूर यह भक्ति है! पर भक्ति केवल यही नहीं है। हमारे… अगर हम किसी परिवार में हैं तो हमारे परिवार का जो कर्तव्य है, हम किसी नौकरी में हैं तो वहाँ पर जो हमारी ज़िम्मेदारियाँ हैं, वह सब भी हम भक्ति भाव में कर सकते हैं।
तो क्या है, भक्ति यह एक तरह से केवल मंदिर के कार्य नहीं, ज़िम्मेदारियों के लिए भी है। भक्ति जो है, यह भाव है जो हमारे सब कार्यों में आना चाहिए।
तो उसके लिए ज़रूर हमें समय चाहिए। अगर कोई कहता है कि “मैं सिर्फ मेरे कर्तव्य करूँगा और हमें भक्ति करने, मंदिर में आने के लिए, जप करने के लिए समय नहीं निकालना चाहिए”, यह सही नहीं है। कोई कहता है कि “जप करने की ज़रूरत क्या है? भगवान का नाम तो हमेशा हृदय में चलते रहता है।” तो ठीक है, अगर भगवान का नाम हृदय में हमेशा चलते रहता है, तो एक पल भी जिह्वा पे क्यों नहीं आता है?
अगर कोई कहता है कि भक्ति में बेगरज़ हो जाएँगे, सही है, पर वह भाव का ही तो अभाव है!
तो क्या है कि हमें कर्तव्य भी करने हैं और भक्ति भी करनी है। अगर सिर्फ हम हमारे कर्तव्य करते रहेंगे, तो क्या है कि हम एक दिव्य चेतना में, भगवच्चेतना में नहीं करेंगे। कर्तव्य महत्त्वपूर्ण हैं और कर्तव्य न करना यह गैर-ज़िम्मेदारी है।
तो कैसे है? यह तीन चीज़ें कह सकते हैं:
- Being irresponsible (गैर-ज़िम्मेदार होना)
- Being materially responsible (भौतिक रूप से ज़िम्मेदार होना)
- Being spiritually responsible (आध्यात्मिक रूप से ज़िम्मेदार होना)
तो भौतिक ज़िम्मेदारियाँ पूरा करना यह महत्त्वपूर्ण है, पर भौतिक ज़िम्मेदारियाँ पूरा करना यह अपने आप में अध्यात्म नहीं है। यह अपने आप से ज़रूर ऐसा नहीं कि मोक्ष की ओर ले जाएगा, धीरे-धीरे उसके ऊपर अग्रसर हो सकता है, पर वह ज़रूरी नहीं है।
प्रभुपाद जी बताते हैं कि जो भौतिक ज़िम्मेदारियाँ हैं—कोई माता-पिता हैं, अपने बच्चों का पालन-देखभाल करते हैं, यह बहुत ज़रूरी है। पर यह स्वाभाविक है, यह नैसर्गिक है और यह ज़रूरी है, पर यह अपने आप में आध्यात्मिक नहीं है।
अगर कोई कुत्ता अपने छोटे कुत्ते के पिल्लों का पालन करता है या कोई बंदर अपने छोटे पिल्लों का पालन करता है, तो वे बड़े ध्यानपूर्वक संरक्षण करते हैं। पर उसमें अध्यात्म कुछ नहीं है। क्या कोई बंदर अपने बंदरों के पिल्लों का अच्छी तरह पालन करके मोक्ष प्राप्त करने वाला है? नहीं! क्योंकि बंदर में कुछ आध्यात्मिक चेतना नहीं है।
मोक्ष प्राप्त करने का मतलब क्या है कि हमारी आध्यात्मिक चेतना इतनी जाग्रत हो जाती है कि हमें भौतिक आसक्तियाँ नहीं रहतीं। जब हम इस भौतिक जगत से बढ़कर कुछ चाहते हैं, तभी हम इस भौतिक जगत के पार जाएँगे।
पर अगर हमारी सारी इच्छाएँ, हमारी सारी चेतना भौतिक जगत में ही है—”हाँ, मुझे यह ज़िम्मेदारी का कर्तव्य करना है, वह कर्तव्य करना है, वह कर्तव्य करना है”—अगर वही हम सोच रहे हैं, तो फिर हम मोक्ष कैसे प्राप्त करेंगे? क्योंकि हमारी सारी इच्छाएँ जो हैं, वह यहीं पर रह रही हैं।
क्योंकि मोक्ष यह केवल एक जगह नहीं है, वह एक चेतना सबसे पहले है। अगर हमें अध्यात्म, भगवान इनसे आकर्षण नहीं है, तो भले ही हम मोक्ष प्राप्त कर लेंगे, भले ही कोई भगवद्धाम चले भी जाएगा मान लीजिए, तो वह चले भी जाएगा मोक्ष प्राप्त करके और फिर वहाँ भी पूछेगा, “आज क्रिकेट मैच का स्कोर क्या है?” क्योंकि आसक्ति यहाँ पर रह गई है!
तो क्या है कि हमें आसक्ति से मुक्ति प्राप्त करनी है। तो इसलिए क्या है कि हम जब भक्ति करते हैं (Exclusive Devotion), मतलब हम कुछ समय निकालकर मंदिर में आके सीधा भगवान पर केंद्रित करते हैं। और वहाँ करने से क्या होता है? हमारा भगवान से संबंध जुड़ता है, हमारी आध्यात्मिक चेतना मजबूत होती है, हममें सेवा भाव जाग्रत होता है।
और फिर वह सेवा भाव के साथ हम जब हमारे कर्तव्य करते हैं, तो वह कर्तव्य हम केवल भौतिक चेतना में नहीं करेंगे। मतलब: “यह मेरा बच्चा है, इसलिए मैं इसका देखभाल करूँ”, “यह मेरा परिवार है, इसलिए मैं इसका देखभाल करूँ” — नहीं! “यह सब जो परिवार वाले हैं, यह मेरे बच्चे हैं, यह मेरे माता-पिता हैं, यह सब कौन हैं? यह भगवान के अंश हैं! और भगवान की योजना के द्वारा यह मेरे जीवन में हैं, तो मैं न केवल उनकी सेवा कर रहा हूँ, उनकी देखभाल कर रहा हूँ, पर मैं इसके द्वारा भगवान की भी सेवा कर रहा हूँ।”
तो जब यह हमारी चेतना में रहेगा, तभी वह जो कर्तव्य है, हमें आध्यात्मिक प्रगति के मार्ग पर ले जाएगा। अगर वह चेतना नहीं है हमारी, तो कर्तव्य करेंगे हम, अच्छा है, पर उससे आध्यात्मिक प्रगति नहीं हो पाएगी।
तो इसलिए ऐसा नहीं है कि यह भक्ति है और यह कर्तव्य है। यह भक्ति है, और जब कर्तव्य कर रहे हैं, वह भी भक्ति भाव से हमें करना है। और जब इस तरह से हम करते हैं, तो वास्तव में जब भक्ति भाव होता है तो कर्तव्य भी हम वास्तव में और ज़िम्मेदार होकर निभा सकते हैं।
क्योंकि क्या होता है कि जब हम भक्ति करते हैं तो हमें थोड़ी अनासक्ति भी होती है। और जब हम बहुत आसक्त होते हैं तो हम हमारी ज़िम्मेदारियाँ भी अच्छी तरह नहीं निभा पाते, क्योंकि उस व्यक्ति पे हम बहुत केंद्रित होते हैं। जब हम भक्ति करके थोड़े अनासक्त होते हैं… तो अनासक्ति का मतलब यह नहीं है कि हम गैर-ज़िम्मेदार होते हैं। अनासक्त होते हैं तो हम भावनात्मक स्तर पे दूसरे पर निर्भर नहीं रहते, और उसी समय में वास्तव में हमारी ज़िम्मेदारियों को पूरा कर सकते हैं।
तो क्या होता है कि जब हम दूसरे पर बहुत भावनात्मक रूप से निर्भर रहते हैं, तो फिर “अरे, उसने ऐसा बोला”, “उसने ऐसा क्यों किया”, “उसने ऐसा क्यों किया”… उसमें हमारी सारी भावनाएँ उलझ जाती हैं और हम कुछ स्थिरता से कार्य नहीं कर पाते। पर थोड़ी अनासक्ति होती है, तो हम इस ज़िम्मेदारी को अच्छी तरह से कर सकते हैं।
तो इसलिए यह ऐसा नहीं है कि कर्तव्य और भक्ति अलग-अलग हैं। भक्ति के कुछ कार्य हैं, और भक्ति के कार्य के द्वारा एक भक्ति की चेतना है, और वह हमारे कर्तव्य में भी आती है। और हम कर्तव्य में ज़िम्मेदारी से कार्य कर सकते हैं भक्ति के द्वारा।
और कभी-कभी ऐसा हो सकता है परिस्थिति में कि हमारा कर्तव्य हमें यह करने को बोल रहा है और भक्ति में हमें यह करना है। हमें घर में कुछ काम यह है, हमको मंदिर में कार्यक्रम है—तो यह करें या वह करें?
कोई विद्यार्थी है, उसकी एक परीक्षा है। परीक्षा की पढ़ाई करे या अभी मंदिर में सत्संग कार्यक्रमों के लिए आए? तो भी क्या है, यह एक व्यावहारिक चीज़ है।
मान लीजिए अगर हम ट्रैफिक में चल रहे हैं, गाड़ी चला रहे हैं, तो अगर रास्ता क्लियर होगा तो हम फास्ट जाएँगे। अगर रास्ते में बहुत ट्रैफिक हो तो हम धीरे-धीरे जाएँगे। पर चाहे धीरे जा रहे हैं या फास्ट जा रहे हैं, हम उसी दिशा में जा रहे हैं!
तो उसी तरह से कभी-कभी ऐसा हो सकता है कि हमारे भौतिक जीवन में ट्रैफिक बढ़ जाता है। तो कभी घर में यह ज़िम्मेदारियाँ हैं, यह व्यक्ति बीमार हो गया है, यह प्रोजेक्ट में बहुत सारा काम आ गया है, यह कुछ हो गया है… तो उस समय में थोड़ा धीरे जा रहे हैं। पर बाद में जब वह समस्या खत्म हो जाएगी, तो वापस स्पीड पकड़ लेंगे।
तो प्रभुपाद जी जब इलाहाबाद में थे, वहाँ प्रभुपाद जी का फार्मेसी का दुकान था…