Determining our dharma in brahmachari life – Hindi
[Brahmachari class at Nigdi, India]
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Lecture Summary
- बदलती दुनिया में ब्रह्मचर्य धर्म का निर्धारण: आधुनिक समाज और पारंपरिक साधु-जीवन की परिस्थितियों में बड़ा अंतर आया है। परिस्थितियों का प्रभाव मनःस्थिति पर पड़ता है, परंतु उद्देश्य स्थिर रहना चाहिए।
- तीन शास्त्रीय उदाहरणों से परिस्थितियों का प्रभाव:
- अजामिल (काल्पनिक विषयासक्ति/विचारधारा): अज्ञानवश मिली विपरीत परिस्थिति से अजामिल का मन विचलित हुआ और चिंतन करते-करते वह अपने उद्देश्य से पूरी तरह भटक गया।
- सुग्रीव (सुविधाओं का मोह): किष्किंधा का राजा बनने के बाद सुविधाओं और मोह में फँसकर सुग्रीव चार महीने तक अपना कर्तव्य भूल गया, परंतु लक्ष्मण की चेतावनी और श्रीराम के उद्देश्य का स्मरण होते ही वह पुनः धर्म-मार्ग पर आ गया।
- हनुमान जी (अविचल संकल्प): लंका में रावण के अंतःपुर में सीता जी की खोज करते हुए विपरीत दृश्य देखने पर भी हनुमान जी का उद्देश्य (राम-सेवा) तनिक भी नहीं डिगा।
- प्रभुपाद जी का सिद्धांत — उद्देश्य की सुदृढ़ता: प्रभुपाद जी के अनुसार हमारी शक्ति हमारे उद्देश्य की सुदृढ़ता में निहित है। जब उद्देश्य अटूट होता है, तो बाह्य परिस्थितियाँ या प्रलोभन हमें पथभ्रष्ट नहीं कर सकते।
- योग्यता (Competence) और स्वभाव (Comfort) के अनुसार सेवा:
- अपनी प्रकृति को पहचानना: अपनी क्षमता (Competence) और आंतरिक रुचि (Comfort) के अनुसार प्रधान सेवा चुननी चाहिए ताकि जीवन भर स्थिरता और आनंद के साथ सेवा की जा सके।
- ज़िम्मेदारी (Responsibility): केवल निर्देशों का पालन ही नहीं, बल्कि स्वयं पहल करके गुरु और कृष्ण की सेवा में अधिक से अधिक योगदान देने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
- संतुलन और नम्रता: जो काम पसंद नहीं है, उसे भी संस्थान की आवश्यकता और गुरु-आज्ञा मानकर करना शरणागति और नम्रता सिखाता है।
Full Transcription
हरे कृष्णा! तो आज पहली बार मैं यहाँ पर आया हूँ इस मंदिर में। बहुत सुंदर… जितना देखा है, तो आज मैं और देखूँगा। काफी बड़ा मंदिर है और आप सब जो हैं, इस मंदिर में प्रधान योद्धा हैं।
तो मैं इस विषय पर चर्चा करूँगा कि आजकल के जीवन में एक ब्रह्मचारी अपना धर्म कैसे समझे—How to determine Brahmachari Dharma in a changing world.
तो आजकल का हमारा जीवन है और जो पारंपरिक रूप में जो साधु-जीवन जिया करते थे, जो ब्रह्मचारी या वैरागी हैं, तो बहुत फर्क है उसमें। तो मैं तीन भागों में लूँगा:
- पहला पॉइंट: कैसे हमारा समाज बदल रहा है, उसकी थोड़ी चर्चा करेंगे।
- दूसरा: कैसे हमारा उद्देश्य फिर भी एक रहना चाहिए।
- और फिर उस उद्देश्य को हम आज के समाज में कैसे उसके प्रति प्रगति कर सकते हैं।
मैं अभी लगभग पिछले दो-तीन सालों से काफी समय पाश्चात्य देशों में गुजार रहा हूँ। कुछ वरिष्ठ भक्तों ने, गुरु महाराज ने बताया कि वहाँ पर वेस्टर्न प्रीचिंग में थोड़ा मदद कर सकें, थोड़ा कुछ योगदान कर सकें।
तो पाश्चात्य देशों में, मैं जब पहली बार अमेरिका में गया, तो मैंने बताया था कि मैं चौपाटी से आया हूँ, और लगभग वहाँ पर १००-१५० ब्रह्मचारी हैं। तो वे एक बात बता रहे थे कि पूरे अमेरिका और यूरोप में मिलाकर १५० ब्रह्मचारी नहीं हैं! तो वहाँ पर एक-दो ही जगह है—एक डेनवर नाम की छोटी-सी जगह है, छोटी नहीं है, कोलोराडो का कैपिटल है, वहाँ पर कुछ वेस्टर्न ब्रह्मचारियों का आश्रम है; और वैसे बाकी बहुत ही कम भक्त हैं जो ब्रह्मचारी बनते हैं। और इसके अनेक कारण हैं, पर एक मुख्य कारण यह है कि जो संस्कृति है वहाँ की, वह इतनी अलग है कि वहाँ पर ब्रह्मचारी रहना बड़ा मुश्किल है।
वहाँ एक कॉलेज प्रोग्राम में एक लड़की ने मुझसे सवाल पूछा… मेरा प्रवचन था कि किस तरह से, कैसे हम अंदर से संयम रखें। उसने कहा कि—”यह जो आपका जवाब था, यह सवाल मुझे कई सालों से परेशान कर रहा था। आपके जवाब ने मेरा सारा जो मन का बोझ था, वह निकाल दिया है, तो मैं बहुत कृतज्ञ हूँ। Can I give you a hug? (क्या मैं आपको आलिंगन कर सकती हूँ?)”
तभी वहाँ पर जो कॉलेज प्रोग्राम होता है, वहाँ पर जो गृहस्थ प्रचार करते हैं… तो मैंने आँखों से उनको देखा। अभी क्या होता है, उनके लिए एक स्वाभाविक चीज़ है—जैसे हम हैंड-शेक्स (handshake) करते हैं, वैसे हम हग (hug) करते हैं। तो अगर वह ना बोलते हैं, तो उनका वह बुरा लग सकता है, तो थोड़ा सेंसिटिव (sensitive) रहना पड़ता है। तो अभी क्या बोलते हैं उसके बारे में? तो उनको यह बोल नहीं सकते कि हम ब्रह्मचारी हैं, हम यहाँ गए… तो ब्रह्मचारी तो क्या हो गया?
तो फिर मैंने गृहस्थ जो थे, मैंने उनको आँखों से देखा, उनको बोला—”बचाओ मुझे, help me!” तो वे बचाने के लिए आगे आए, पर उन्होंने एक अप्रतिम तरीका ढूँढा! बोले कि—”ये मोंक (Monk) हैं (वहाँ पर हम ब्रह्मचारी इस्तेमाल नहीं करते हैं, ‘मोंक’ इस्तेमाल करते हैं, वह कहते हैं कि बौद्ध लोगों में काफी मोंक्स हैं और वह शब्द कूल है), तो ये मोंक हैं, तो इनके… on his behalf, you can hug me!“
तो मैं मन में सोचा था, मैं ऐसी मदद की अपेक्षा नहीं कर रहा था! तो फिर तभी उनकी पत्नी भी वहाँ पर थीं, तो फिर वे बोलीं कि—”मैं इनकी पत्नी हूँ, तो इनकी ओर से आप मुझे हग कर सकती हैं!”
तो फिर क्या है कि वह अभी वैसे इतनी संस्कृति भारत में नहीं आई है, पर फिर भी क्या है कि हम जिस परिस्थिति में जीवन जी रहे हैं, वह जो पारंपरिक पद्धति है, पारंपरिक पद्धति उससे काफी अलग है।
तो मैं जब ऑस्ट्रेलिया में, मेलबर्न में एक ब्रह्मचर्य आश्रम में वहाँ पर प्रसंग बता रहा था… तो यह भारत में बताता हूँ तो सब लोग हँसने लगते हैं। पर वह तो मैं जब ऑस्ट्रेलिया में, मेलबर्न में बताता हूँ… तो भारत में बता रहा था कि ऑस्ट्रेलिया में आप बहुत भाग्यवान हो। बोले—”इसमें भाग्य की क्या बात है?” जिसमें उसने मुझसे नहीं पूछा!
परिस्थिति बदल रही है। परिस्थिति एक है और मनःस्थिति दूसरी है। पर परिस्थिति और मनःस्थिति इन दोनों में काफी संबंध है। जिस प्रकार की परिस्थिति में हम रहते हैं, उससे हमारी मनःस्थिति पर काफी प्रभाव हो जाता है।
और इसमें अभी हम तीन उदाहरण ले सकते हैं शास्त्रों से:
- एक है कि हनुमान जी लंका में गए। और लंका में उनको बहुत ही मुश्किल काम था—हनुमान जी ब्रह्मचारी हैं, पर उनको एक स्त्री को खोजना है। और वे कहाँ गए? लंका में गए। वे रावण के अंतःपुर महलों में गए, क्योंकि स्त्रियाँ वहीं पर होती हैं। और वे रात को गए थे, क्योंकि गुप्त रूप से गए थे। वहाँ पर जिन स्त्रियों को ढूँढ रहे थे, वह उचित वस्त्रों में नहीं थीं, उनके वस्त्र इधर-उधर हो गए थे, तो उस परिस्थिति में रावण के महल में गए थे। वह एक एक्सट्रीम (extreme) है, एक कोना है।
- दूसरा है कि अजामिल गए थे जंगल में, और वहाँ पर उन्होंने एक शूद्र और शूद्राणी को देख लिया।
- और तीसरा है सुग्रीव, जो जैसे ही राजा बन गए, तो उसके बाद में ऐशो-आराम में खो गए।
तो अभी इन तीनों में हम देखते हैं फर्क है। तीनों जो थे, ऐसी परिस्थिति में थे जो अनुकूल नहीं है।
अभी एक तरफ से सुग्रीव के लिए जो परिस्थिति है, वह अनुकूल है—वह राजा था, वह राजकुमार ही थे, अभी राजा बन गए थे। पर कई सालों तक जंगल में तपस्या करने के बाद अचानक एक समय में जब ऐशो-आराम की परिस्थिति मिल जाती है, तो तभी क्या हो जाता है? एक स्वाभाविक भाव से… तभी जो-जो भी एक है आत्म-नियंत्रण जो हम स्वेच्छा से करते हैं, और दूसरा है आत्म-नियंत्रण जो हम स्वेच्छा से नहीं, जबरदस्ती हो जाता है।
एक है मान लीजिए जब एकादशी होती है, उसके बाद में हम प्रसाद ग्रहण करते हैं, तो इसके बाद भी कई बार हम थोड़े ज्यादा खा लेते हैं अगले दिन—”इतना ज्यादा मैंने उपवास किया है!” पर मान लीजिए अगर हम कहीं ट्रैवलिंग करने गए हैं और वहाँ पर कहीं प्रसाद मिल ही नहीं रहा है, और एक-दो दिन के लिए कुछ भी… लोगों को २४ घंटा, २५ घंटा लगता है, उसने अलग से प्रसाद न खाया हो। तो अभी वहाँ पर कुछ भी नहीं मिल रहा था, तो फिर कुछ फल वगैरह थोड़े-बहुत… क्या है, हम प्लेटफॉर्म से ज्यादा बाहर भी नहीं जा सकते हैं, क्योंकि गाड़ी कब छूटेगी कुछ पता नहीं था। तो फिर क्या होता है, ऐसे समय में अगर हम जबरदस्ती कुछ तपस्या करनी पड़ती है और उसके बाद में कुछ खाने को मिल जाता है, तो हम बहुत खा लेंगे! क्योंकि क्या है, क्योंकि तपस्या करने की इच्छा तो थी नहीं, पर अभी खाने को मिल जाता है तो खा लेते हैं।
तो परिस्थिति एक तरह से आराम की परिस्थिति, पर वह सुग्रीव के लिए अनुकूल नहीं थी, वह प्रतिकूल थी, क्योंकि उसने वह मोह में फँसकर…
अभी इसके विपरीत, अजामिल जंगल में गया था, वह लकड़ी लाने के लिए गया था, भोग करने की इच्छा से नहीं गया था। तो क्या था, सबकी मनःस्थिति तो उचित थी। हनुमान जी की मनःस्थिति थी कि सीता जी की खोज करनी है, राम की सेवा करनी है। वानर-दूत—श्रीराम ने बताया कि उन्होंने वानरों को अपने दूत के रूप में भेजा था, तो सेवा के भाव से गए थे। तीनों की मनःस्थिति पहले जो थी, वह उचित थी सबकी। पर तीनों की मनःस्थिति पर परिस्थिति से प्रभाव अलग-अलग हो गए।
अभी अजामिल के उदाहरण में हम देखते हैं, क्या हुआ अजामिल का? वह उस परिस्थिति में गया है और वहाँ पर कुछ देख लिया, और फिर वापस आ गया। जब वापस आता है, तो लकड़ी लेकर आ गया है और ऐसे लगता है कि सब कुछ ठीक चल रहा है। पर क्या है, जो देखा था अजामिल ने, वह मन में एक टाइम-बम के समान चल रहा था।
भगवद्गीता में कौन-सा श्लोक अजामिल के उदाहरण के लिए बहुत अच्छा है?
ध्यायतो विषयानपुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
तो यहाँ पर भगवान् यह नहीं बताते हैं कि दृश्यतो विषयानपुंसः, वे ध्यायतो बोलते हैं! देखना कभी-कभी अनिवार्य है, हम इस दुनिया में आँखें बंद करके नहीं चल सकते हैं। पर क्या है, जो देखते हैं उस पर हम कितना चिंतन करते हैं!
तो हम कह सकते हैं, कभी-कभी किसी के जीवन में दैव से विपरीत परिस्थितियाँ आ जाती हैं। अभी दैव से किसी को बीमारी हो जाती है, किसी का दैव से एक्सीडेंट हो जाता है, तो वह हमारे हाथ में नहीं है। और जब इस तरह की समस्या आती है—किसी का एक्सीडेंट हो गया, कोई बीमारी आ गई—तो उससे क्या होता है, उससे तो एक सहानुभूति आती है हमारे में। यह बुद्धि बहुत परेशान करने जा रही है, पर दैव से इस तरह की एक प्रकार की समस्या आ सकती है कि कोई विपरीत परिस्थिति आ जाती है, तो उसको इंग्लिश में ट्रिब्युलेशन (Tribulation) कह सकते हैं—ट्रिब्युलेशन मतलब परेशानी।
पर कभी-कभी किसी के जीवन में दैव से ही प्रलोभन भी आ सकता है। तो परेशानी के लिए हम क्या फैसला करते हैं, वह हमारे हाथ में है।
तो अभी उस परिस्थिति में अजामिल अपनी इच्छा के बिना वहाँ पर चला गया, पर जो उसके बाद में चिंतन हुआ बहुत… उसके बाद में चिंतन करते रहा उसके बारे में। इतना गुमराह हो गया कि उसने अपने माता-पिता को त्याग दिया, अपनी पत्नी को त्याग दिया, और फिर वह वेश्या के साथ रहने लग गया। कई सालों तक रहने लग गया। और बाद में, हम जानते हैं उस प्रसंग में, यमदूत और विष्णुदूत के संवाद के समय उसकी जागृति हुई, और फिर वह सही मार्ग पर आ गया।
तो अभी यहाँ पर क्या हो गया? परिस्थिति है, मनःस्थिति है, और फिर मनःस्थिति के परे हमारा उद्देश्य है। सबका उद्देश्य उस समय नेक था, पर क्या है? वह परिस्थिति, जब मन से काफी चिंतन हो गया, तो फिर वह मनःस्थिति उससे बदल गई, मनःस्थिति उससे काफी प्रभावित हो गई, और फिर उद्देश्य पूरा बदल गया! इस दिशा में जा रहा था, तो कहाँ दूसरी तरफ चला गया! काफी समय लगा, पर बाद में वापस सही मार्ग पर आ गया है।
अभी हम सुग्रीव का उदाहरण देखते हैं, तो सुग्रीव भी चार महीनों के लिए ऐशो-आराम में पूरा डूब गया है। अलग-अलग रामायण के अलग-अलग भारत के विभागों में उसके रामायण को उन भाषाओं में बताया गया है। तो जब बंगाल में रामायण बताया गया है, उसमें बड़े विस्तारित रूप से बताया गया है कि किस तरह से सुग्रीव किस तरह से भोग में खो गया। उसका वर्णन वाल्मीकि रामायण में इतना नहीं आता है, पर वहाँ पर आता है कि पूरा वह लीन हो गया, कुछ भूल गया है उसमें।
पर उसके बाद में जब लक्ष्मण वहाँ पर आ गया… लक्ष्मण जब आने वाला था, उसके पहले सुग्रीव ने और तारा ने… तारा कौन थी? बालि की पत्नी, और वह बड़ी बुद्धिमान थी। वह पहले से बालि को भी सदुपदेश देने का प्रयास कर रही थी। पर जब लक्ष्मण आया, लक्ष्मण ने थोड़ा उसको डाँटा, तो तभी सुग्रीव को समझ आ गया—”मैं गलती कर रहा हूँ”, और फिर तुरंत सही मार्ग पर आ गया।
और उसके बाद में हम देखते हैं कि सुग्रीव जब युद्ध करने गया, तो तभी क्या हुआ था? रावण बड़ा चालाक था, तो रावण ने विचार किया कि यह शत्रु को हराना है… पहले तो उसको बड़ा अहंकार था कि कोई मुझे हरा नहीं सकता है। पर जब राम ने अकेले ही सारे खर-दूषण का वध कर दिया, त्रिशिरा का वध कर दिया, सारे जो १४,००० सैनिक थे जनस्थान में उन सब का वध कर दिया, तो उससे वह थोड़ा चौकन्ना हो गया। और फिर उसने सोचा कि यह राम से युद्ध करना तो मुश्किल है, तो मैं राम की सेना में फूट डालता हूँ।
और फिर उसने सुग्रीव को प्रलोभन के साथ अपने कुछ दूतों को भेजा। उसने कहा कि “पहले तो मेरी और बालि की संधि थी, और अभी तुम राजा हो, तो मैंने तुम्हारा कभी कुछ नहीं बिगाड़ा है। और हमारे वानरों और राक्षसों का अच्छा संबंध रहेगा, मैं तुम्हारा संरक्षण करूँगा हमेशा।” और फिर इस तरह से उसने कहा कि “तुम्हें राम के साथ युद्ध करने की क्या ज़रूरत है?”
तो अभी रावण ने प्रलोभन भेजा, उस प्रलोभन से सुग्रीव बिल्कुल प्रभावित नहीं हुआ! तो उसने तुरंत उसको ठुकरा दिया। जो दूत थे, उल्टा उनको डाँटने लगा, उनको पीटने लगा। फिर राम आ गए, राम ने दूतों को छोड़ दिया—”इन दूतों को परेशान मत करो।”
पर वहाँ पर क्या है कि इस परिस्थिति में सुग्रीव प्रलोभित हो गया था जब वह किष्किंधा में था, पर जब लंका में आक्रमण करने आ रहा था, तब प्रलोभित नहीं हुआ। तो यह फर्क क्यों है? तीसरा पॉइंट जब आएगा, उसके बारे में तब बोलूँगा मैं।
तो अभी क्या है कि जब हम देखते हैं हनुमान जी का उत्तर… हनुमान जी जब वहाँ पर गए, तो वे खिड़कियों से झाँक रहे थे, देख रहे थे। और कुछ ऐसी चीज़ें देखीं जो फिर सोचने लगे वे—”मैं क्या कर रहा हूँ यह? यह उचित नहीं है जो देख रहा हूँ।” पर सोचा उन्होंने कि “मेरा उद्देश्य क्या है? मेरा उद्देश्य है राम की सेवा करना! और यह देखकर भी मेरा मन विचलित नहीं हो रहा है, मेरे मन में दूषण नहीं आ रहा है, मेरा उद्देश्य कम नहीं हो रहा है। अगर राम ने मुझे एक स्त्री को ढूँढने को बोला है, तो मैं कहाँ देखूँगा उसको?” तो जैसे ही उनको उद्देश्य याद आ गया और उस उद्देश्य के साथ अपने आपको लगा दिया उन्होंने, तो फिर क्या हो गया? वे विचलित नहीं हुए।
पर परिस्थिति उससे बहुत अलग है। वह संक्षेप में मैंने पहले बताया, दूसरे में बताया था कि परिस्थिति में भी हमें हमारे उद्देश्य को बरकरार रखना है।
तो अभी इन तीनों में फर्क क्या है? प्रभुपाद जी दूसरे प्रसंग में बोलते हैं कि:
Our strength is in the purity of our purpose.
कि हमारा उद्देश्य कितना सुदृढ़ है! जितना हमारा उद्देश्य सुदृढ़ है, उतना हम प्रगति कर पाएँगे।
तो अभी प्रभुपाद जी को एक बार २४ परगना में पूछा गया था कि “हम भक्ति करना चाहते हैं, फिर भी माया इतनी शक्तिशाली क्यों है?” तो प्रभुपाद जी ने तुरंत जवाब दिया—”क्योंकि तुम्हारा उद्देश्य शक्तिशाली नहीं है!” क्योंकि तुम्हारा उद्देश्य शक्तिशाली नहीं है, तो अपने आप हार जाओगे।
तो अभी हनुमान जी का उद्देश्य बहुत सुदृढ़ था—”मैं यहाँ पर राम की ही सेवा के लिए आया हूँ और वह राम की ही सेवा मुझे करनी है।”
अभी सुग्रीव का भी उद्देश्य अच्छा ही था, और दूसरी परिस्थिति में क्या हुआ? क्योंकि अभी युद्ध होने ही वाला था और बहुत-सा कार्य करने के लिए था वहाँ, तो फिर वह उद्देश्य से मोहित नहीं हुए, पदभ्रष्ट नहीं हुए। पर जब वे किष्किंधा राज्य में राज्य कर रहे थे, तभी क्या है? तभी तुरंत कोई खतरा नहीं था, तुरंत कोई काम नहीं था, चार महीने बारिश होने वाली है, और बारिश में भी करना क्या है, कुछ करने को है भी नहीं!
अजामिल का क्या हुआ? जो धार्मिक उद्देश्य था, वह पूरा भूल ही गया!
अभी हमारे मन में, हमारे जीवन में, हमारी परिस्थिति में क्या आएगा, इसकी हम भविष्यवाणी नहीं कर सकते हैं। कभी हमारे जीवन में प्रलोभन आ सकता है, और जो हम देखते हैं, वह हमारे मन पर कितना प्रभाव करेगा, उसकी भी हम भविष्यवाणी नहीं कर सकते हैं। कभी हम कुछ चीज़ देख लेते हैं और वह इतना प्रभाव नहीं करती है, क्योंकि पद्मपत्रमिवाम्भसा जैसा हो जाता है—आता है, स्मृति आती है, जैसे कमल-पुष्प पर पानी आता है, निकल जाता है। तो कुछ चीज़ें हम देखते हैं, सुनते हैं, वह उस पर ज्यादा हमारा प्रभाव नहीं होता, ज्यादा याद नहीं रहता हमको।
पर क्या है, कभी-कभी कुछ चीज़ें हम देखते हैं और वह याद रहती हैं—कुछ दृश्य देख लेते हैं, कुछ बातें सुन लेते हैं। तो अभी यह जो है, वह हमारे मन के… हमारे किस प्रकार का मन है, किस प्रकार की स्मृतियाँ हमारे में ज्यादा होती हैं, उस पर निर्भर है।
पर मनःस्थिति हम उसको निर्धारित नहीं कर सकते ज्यादा। ब्रह्मचारी आश्रम मतलब जो है, हम एक सुरक्षित वातावरण में हैं अधिकांश रूप से, पर फिर भी उसको हम इतना निर्धारित नहीं कर सकते हैं। हमारी मनःस्थिति जो है, उसको मन में क्या रहने वाला है, उसको हम ज्यादा निर्धारित नहीं कर सकते हैं।
पर क्या कर सकते हैं हम? हमारे उद्देश्य को सुदृढ़ रख सकते हैं! अगर उद्देश्य को सुदृढ़ रखेंगे, तो फिर क्या होगा? वह जो मन में आएगा भी, वह ज्यादा समय तक रहेगा नहीं। ठीक है रहेगा, पर हम उसको जाने देंगे, हम आगे बढ़ रहे हैं।
और दूसरा है कि अलग-अलग हमने तीन उदाहरण देखे—कौन-कौन? हनुमान, सुग्रीव और अजामिल। कैसे परिस्थिति के द्वारा मनःस्थिति बदल रही है, कोई उद्देश्य थोड़ा गुमराह हो गया है, काफी गुमराह हो गया है, या बिल्कुल गुमराह नहीं हुआ है।
तो क्योंकि सवाल है… इसकी अपनी वजह है कि अलग-अलग हो गया। जो कुछ चीज़ें पहले से आप देखें… और वैसे ही थोड़ा-बहुत कुछ फिल्मी साउंड थोड़ा-सा ही सुना, तो वह ज्यादा याद आ रहा है। वह थोड़ा-सा भी कुछ प्रलोभन आता है, थोड़ा साउंड सुनने से थोड़ा ज्यादा आता है वह। यह क्या है कि हर एक व्यक्ति का मन अलग-अलग है, और हमें क्या है? हमारे मन के साथ जीना है, हमारे मन के लिए नहीं जीना है!
हमारे मन के खिलाफ नहीं जीना है। ऐसा कि अगर हम हमेशा मन से युद्ध करते रहे तो जमेगा नहीं वह हमको। हमेशा मन के लिए नहीं जीना है, हमेशा मन के लिए नहीं जीना है।
हम उपवास इसलिए कर रहे हैं ताकि हम शारीरिक चेतना के परे चले जाएँ। पर उपवास करते-करते हम इतनी शारीरिक चेतना में आ जाएँ कि हम सो भी नहीं पा रहे हैं, इतना बार नहाते रहे हैं… तो फिर क्या फायदा है उसका? तो ठीक है, अब क्या है? कितना हम उपवास कर सकते हैं? कि जो अन्न है, वह हमारा कृष्ण-चेतना के लिए प्रतिस्पर्धी नहीं होना चाहिए!
अगर हम बहुत खाने में आसक्त हो जाते हैं, तो क्या होता है? जैसे अल्कोहलिक्स (Alcoholics) होते हैं जो शराबी होते हैं, तो वैसे ही एक संस्था है फूड-अल्कोहलिक्स (Food-aholics), जो खाने से इतने आसक्त हैं कि वे खाना रोक ही नहीं सकते हैं। तो अभी क्या है? अगर हम खाने से बहुत आसक्त हैं, तो हम हर समय—हम जप कर रहे हैं, कीर्तन कर रहे हैं, सेवा कर रहे हैं, श्रवण कर रहे हैं—”खाना, खाना, खाना, खाना” सोचते हैं। तो वह जो आसक्ति है, बहुत ज्यादा आसक्ति है।
पर मान लीजिए अगर हम इतना उपवास कर रहे हैं कि शरीर बहुत परेशान हो जाता है, हम बीमार पड़ रहे हैं, मन आसक्त है… यह दोनों परिस्थिति क्या है? एक है कि इतनी तो आसक्ति हो जाती है अगर मन उपवास कर रहा है… अगर दोनों blended हैं, कि मन उतावला हो जाता है उससे। मन इसलिए उतावला है क्योंकि शरीर उतावला हो रहा है।
तो क्या है कि वह जो बैलेंस (Balance) है… मतलब क्या है कि हम जब इतना खा लेते हैं, उचित खा लेते हैं, तो जो खाना है, वह कृष्ण का प्रतिस्पर्धी नहीं बनता है हमारी चेतना के लिए।
तो उसी तरह से, जब हम शरीर के लिए कार्य करने लगते हैं, तो हम हमेशा शरीर के बारे में विचार करते रहते हैं। पर जब हम शरीर के साथ कार्य करते हैं, तो शरीर की ज़रूरतें हमको समझ आ जाती हैं और ज़रूरतों का हम ध्यान देते हैं, और उसके बाद में हम शरीर के बारे में इतना विचार नहीं करते हैं।
कोई आखिरी सवाल है किसी का?
एक्चुअली मैं आखिरी पॉइंट जो बोलना चाहता था, वह सवाल-जवाब में ही आ गया था। आखिरी पॉइंट जो बोलना था—कैसे है कि हमारी परिस्थिति है, हमारी मनःस्थिति है, हमारा उद्देश्य है। तो आजकल समाज में हमारी परिस्थिति बदल गई है, हमारी मनःस्थिति पर अलग-अलग प्रभाव हो सकता है परिस्थिति के कारण। तो हमारा उद्देश्य कैसे पूरा करना है, उसकी जिम्मेदारी हमें खुद लेनी है!
मतलब क्या है? जैसे मैंने बताया कि हमारा खुद का उद्दीपन क्या है, वह हम ढूँढ सकते हैं। पर उसके बाद में, अगर हमें स्थायी रूप से भगवान की सेवा करनी है, तो हमें हमारे शरीर और मन के साथ सेवा करनी है। तो इसलिए हमें खुद को देखना है कि कौन-सी सेवा में मेरा मन अच्छी तरह से भगवान में लग जाता है, कौन-सी सेवा मैं अच्छी तरह से कर सकता हूँ।
- कर्म मतलब करने में मैं कॉम्पिटेंस (Competence/क्षमता) है, अच्छी तरह से कर सकता हूँ।
- गुण मतलब अंदर से करते समय मुझे अच्छा लगता है।
तो हमें देखना है कौन-सी सेवा अंदर से करते समय मुझे अच्छी लगती है और अच्छी मैं कर सकता हूँ। और वैसी सेवा धीरे-धीरे अगर हमारी मुख्य/प्रधान सेवा बन जाएगी, तो हम एक स्थायी रूप से, स्थिरता के साथ वह सेवा कर सकते हैं।
अगर हमारी कई ऐसी सेवाएँ हो सकती हैं जो हमें इतनी अच्छी नहीं लगती हैं, हम उतनी अच्छी सेवा नहीं कर सकते हैं, वह भी अगर ज़रूरत है आश्रम में, मंदिर में, तो हम कर सकते हैं और करना भी चाहिए हमको—वह शरणागति है हमारी। पर शरणागति के साथ-साथ हमारी भी… हमको भी भगवान ने बुद्धि दी है और हमारी अथॉरिटी भी है, वे भी क्या चाहते हैं? एक तरह से चाहते हैं कि जो सेवा की ज़रूरत है, वह पूरी करें। पर वे भी चाहते हैं कि हम स्थिरता से सेवा करते रहें।
तो इसलिए हमें खुद… हमें जो भी सेवा दी जाए, हम करना चाहते हैं, करनी चाहिए हमको। पर वह करते समय हमें खुद का एक आत्म-निरीक्षण करना है कि कौन-सी सेवा करते समय मुझे अच्छा लगता है, कौन-सी सेवा मैं अच्छी तरह से कर सकता हूँ। और इस तरह से हम खुद को समझ लेंगे, तो फिर क्या होगा? धीरे-धीरे हम वह सेवा और कर सकते हैं और वह सेवा करते समय हमको भी संतुष्टि मिलेगी, और हम अच्छे से योगदान भी कर पाएँगे।
जब कम्फर्ट (Comfort) और कॉम्पिटेंस (Competence) होता है, तो क्या होता है? हमको अंदर से सैatisफैक्शन (Satisfaction) मिलता है, और बाहर से कंट्रीब्यूशन (Contribution) भी हो जाता है!
तो यह जिम्मेदारी हमें खुद लेनी है। मान लीजिए… अंत करूँगा… मान लीजिए अगर आप कोई कंपनी में काम कर रहे होते हैं। तो कंपनी में काम करते हैं, एक तो ज़रूरी है कि हम जो भी बॉस बोले वह करेंगे। पर साथ-साथ अगर हमको कंपनी में प्रगति करनी है, तो हम खुद देखेंगे—”ठीक है, अगर मुझे एक प्रमोशन चाहिए, तो फिर मुझे यह सीखना चाहिए। अगर मैं यह चीज़ अच्छे से कर सकता हूँ…” तो हम खुद जिम्मेदारी लेते हैं कंपनी में कि मैं मेरे करियर में आगे कैसे बढ़ सकता हूँ।
तो वह एक तरह से भौतिक भाव हो सकता है, पर हमें एक तरह से करियर में बढ़ना नहीं है कि मुझे बड़ा पद चाहिए। पर हमें क्या देखना है? वह जो इनिशिएटिव (Initiative) लेते हैं, हम जो जिम्मेदारी लेते हैं—”ठीक है, मैं यह भी सेवा कर रहा हूँ, यह बताया जा रहा है यह करूँगा। पर मैं अभी इस संस्था में, इस आश्रम में कौन-सी सेवा मैं अच्छी कर सकता हूँ? क्या मैं यह भी सीख सकता हूँ, क्या मैं यह भी सीख सकता हूँ?”
इस तरह से जब हम खुद रिस्पॉन्सिबिलिटी लेते हैं—ऐसे नहीं है कि आदेश का… “तुमने यह बोला है पर मैं नहीं करूँगा, मैं यह करूँगा”—ऐसे नहीं है! हम जैसे ऑफिस में काम कर रहे होंगे, बॉस ने एक काम बोला है, दूसरा काम हम करेंगे तो चलेगा नहीं! बॉस ने जो बोला वह करते हैं, उसके साथ-साथ हम यह देखते हैं कैसे मैं करियर आगे बढ़ा सकता हूँ।
तो उसी तरह से हमें यह देखना है कि मैं गुरु और कृष्ण के हाथ में सबसे अच्छा इंस्ट्रूमेंट (उपकरण) कैसे बन सकता हूँ? तो एक है कि जो मुझे बताया गया वह मैं करूँगा। पर अगर मैं और कुछ स्किल्स सीख सकता हूँ, अगर मुझमें कुछ प्रतिभाएँ हैं पहले से, मैं कुछ योगदान और अच्छा कर सकता हूँ, तो क्या है? मैं यह जो भगवान का आंदोलन है, उसमें और योगदान कर सकता हूँ।
तो इसलिए, इस तरह से हम भी यह जिम्मेदारी लेते हैं कि मैं सबसे ज्यादा संतुष्ट कहाँ हो सकता हूँ, सबसे ज्यादा योगदान कहाँ कर सकता हूँ? तो फिर क्या होगा? धीरे-धीरे हम उस दिशा में जाएँगे जहाँ पर हम स्थिरता से सेवा कर सकते हैं। और अगर वह हमें मिल जाएगा, तो फिर क्या होता है?
कुछ-कुछ सेवा ऐसी होती है जो हमको इतनी अच्छी लगती नहीं है, तो हम करेंगे, पर हमको बार-बार बोलना पड़ता है—”यह किया क्या तुमने, यह किया क्या तुमने, यह किया क्या तुमने?” पर कुछ-कुछ सेवा ऐसी होती है, हमको इतनी अच्छी लगती है कि बिना बोले हम खुद करते हैं, क्योंकि हमको अच्छी लगती है! और अगर ऐसी सेवा हमको मिल जाती है, तो योगदान भी हो रहा है। तो ऐसी सेवा अगर हमको मिल गई, तो वह बहुत बड़ा भाग्य है! क्योंकि हम किसी पर निर्भर नहीं होंगे मुझे पुश करने के लिए—”यह करो, यह करो, यह करो!”
फिर क्या है? वह सेवा हमारा भगवान से स्थायी संबंध बन जाएगा, और स्थायी संबंध का अच्छा नींव बन जाएगा, फाउंडेशन बन जाएगा। और फिर उसके द्वारा भगवान की सेवा में लगके जीवन भर प्रगति कर सकते हैं।
तो सारांश में, आज चर्चा की किस तरह से हमें हमारे भक्तिमय जीवन में अलग-अलग परिस्थितियों में, अलग-अलग मनोस्थितियों में कैसे हमारे भक्ति के उद्देश्य में हम बरकरार रह सकते हैं।
परिस्थिति आजकल बहुत बदल रही है। पारंपरिक परिस्थिति में जैसे ब्रह्मचारी साधु रहते थे, उसके बहुत विपरीत है। और परिस्थिति से मनःस्थिति पर प्रभाव कैसे हो सकता है, इसके हमने तीन उदाहरण देखे—सुग्रीव, हनुमान और अजामिल।
तो अभी इन तीनों में फर्क यह था कि उद्देश्य बहुत सुदृढ़ था हनुमान जी का, सुग्रीव का था पर उतना नहीं था, और अजामिल का बहुत कमजोर था। तो हमारा उद्देश्य सुदृढ़ रखना यह हमारे हाथ में है; परिस्थिति और मनःस्थिति शायद हमारे हाथ में उतनी नहीं है।
और फिर उद्देश्य को सुदृढ़ रखने के लिए क्या करना है? हमें हमारे मन को और शरीर को समझना है। और जो हमारी कमजोरियाँ हैं—कमजोरियाँ नहीं, मर्यादाएँ (सीमाएँ) हैं—उनके अनुसार उनमें कार्य करना है। शरीर के और मन के खिलाफ कार्य नहीं करना है, शरीर और मन के लिए कार्य नहीं करना है।
जैसे हमारे शरीर की जो ज़रूरत है, वह पूरी करेंगे, तो फिर शरीर की ज़रूरत जो है, वह भगवान का प्रतिस्पर्धी नहीं बनेगी हमारी चेतना के लिए। तो उसी तरह से हम शरीर की ज़रूरत को समझ सकते हैं, मन के स्वभाव को समझ सकते हैं—जो हमें अच्छा लगता है और जो हम अच्छा कर सकते हैं, वैसी सेवा की हम खोज करेंगे आत्म-निरीक्षण करके। और ऐसी सेवा अगर हमें मिल जाती है, तो फिर हम स्थायी रूप से, स्थिरता से सेवा करके प्रगति कर सकते हैं।
बहुत-बहुत धन्यवाद! हरे कृष्णा!
प्रश्नोत्तर एवं पूरक चर्चा (Q&A Session)
प्रश्न: “आउटर कॉम्पिटेंस (Outer Competence) और आंतरिक रुचि को कैसे पहचानें?”
उत्तर:
आउटर कॉम्पिटेंस का मतलब क्या है? कि अगर हम कोई सेवा अच्छे से कर सकते हैं। मान लीजिए कोई संगीत, कोई करताल बजाना है… तो कुछ बच्चे होते हैं, पहली बार मंदिर में आते हैं माता-पिता के साथ, करताल उठाकर बजाने लगते हैं, बहुत अच्छे से बजाते हैं! यद्यपि कह सकते हैं कि पूर्व जन्म में उसने संगीत सीखा है, उसको इंग्लिश में प्राडिजी (Prodigy) कहते हैं—बचपन से ही बहुत टैलेंट/प्रतिभा होती है कुछ लोगों में।
कुछ लोगों में मैनेजमेंट करना होता है—”हाँ तुम यह करो, तुम यह करो, मैं यह करता हूँ”—बराबर कर लेते हैं! कुछ लोग मैनेजमेंट करते हैं, तो क्या होता है? वे ऐसा मैनेजमेंट करते हैं कि बाद में उनको मैनेज करने के लिए बंदा लग जाता है! ऐसे नहीं कि वह भक्त बुरा है, पर उसमें वह सक्षमता नहीं है।
तो क्या है, हम क्या अच्छा कर सकते हैं, वह भी हम देख सकते हैं। एक चीज़ है कि हम कुछ कार्य करते हैं, तो कुछ भक्त हमारी सराहना करते हैं—”वह बहुत अच्छा किया आपने!” तो हम समझ सकते हैं। वह हमारे अहंकार के लिए नहीं है, पर हम एक प्रोत्साहन के लिए देख सकते हैं।
भक्ति में प्रगति के लिए कुछ चीज़ें जो ज़रूरी हैं, वे हमारे नियंत्रण में हैं; कुछ चीज़ें हमारे नियंत्रण में नहीं हैं। अब कृपा कब आएगी, कैसे आएगी, कहाँ से आएगी—यह हमको पता नहीं है। ज़रूर हम तो कृपा चाहते हैं, पर जब तक कृपा नहीं आ रही है, तब तक भक्ति करनी है। और वह करने के लिए भी हमें कुछ चीज़ें सस्टेन (sustain) कर सकें।
मान लीजिए कभी-कभी हम दर्शन करने आते हैं भगवान का, और वह दर्शन इतना अच्छा लगता है हमको, भक्ति में भावुक लगता है, बहुत अच्छा लगता है। हम कह सकते हैं कि ऐसे जो प्रसंग हैं, हमको कुछ भगवान की कृपा मिल रही है, उससे हमें कुछ दिव्य अनुभव हो रहा है। अच्छा, यह एक भेंट है भगवान की!
पर उसके साथ-साथ, अभी जब उतना अच्छा नहीं लगता है, फिर भी हमें भगवान का दर्शन करना है, तो तभी हमें क्या करना चाहिए? “अगर मुझे अच्छा लगता है कि रोज-रोज वही दर्शन कर रहा हूँ, तो फिर शायद हमें यह देखना है कि मैं कुछ भगवान के श्लोक याद करूँगा और प्रार्थना अर्पण करूँगा, या मेरे जीवन में जो हो रहा है उसके बारे में कुछ प्रार्थना करूँगा।”
तो जब तक वे विशेष अनुभव नहीं आ रहे हैं, तब तक भी हमें आगे बढ़ने के लिए जो भी ज़रूरी है—वह जो फ्यूल (fuel) है, जो ज़रूरत है—वह हमें खुद कहीं-न-कहीं से प्राप्त करनी है। और वह भी हमको जो बुद्धि मिलती है—”ठीक है, यह मुझे अच्छा लगता है, यह मैं अच्छा कर सकता हूँ”—वह समझने के लिए बुद्धि लगती है, वह भी शायद भगवान की कृपा ही हो सकती है!
तो अभी यहाँ पर तीन चीज़ें हैं:
- बिल्कुल मनमानी करना: जो मुझे अच्छा लगता है, वही मैं करूँगा।
- पूर्ण शरणागत हो जाना: जो गुरु बोलते हैं, वही मैं करूँगा।
- समन्वय (Harmony): हम समझें कि हमको क्या अच्छा लगता है, हम क्या अच्छा कर सकते हैं; और हमारे गुरु का उद्देश्य क्या है, वह समझते हैं; और फिर इन दोनों का समन्वय करके कुछ कार्य करते हैं।
‘मनमानी’ शब्द नकारात्मक है। पर उसमें क्या है कि हमको कृपा की ज़रूरत है ज़रूर, पर क्या है कि हमारे मन और हमारे शरीर के साथ हमको रहना है। अगर किसी चीज़ में हमको बहुत परेशानी हो रही है, वह हो ही नहीं रहा है हमसे, तो फिर हमें हमारी ज़रूरत को पूरा करना है।
कोई कहता है कि—”मैं सुबह निर्जल एकादशी करूँगा, तो फिर मुझे कृपा मिलेगी।” ठीक है, तुम निर्जल एकादशी कर लेते हो, और उसके बाद एक महीने के लिए बीमार हो जाते हो! फिर ठीक है, तुमको कृपा मिल गई, पर सेवा कहाँ हुई उससे? उससे तो सेवा लेनी पड़ेगी!
इसलिए क्या है कि जो संस्था की शुरुआत है और जो व्यक्ति करना चाहता है… अभी व्यक्ति की दृष्टि से क्या है कि “जो मुझे बताया गया है वह करना चाहिए, बॉस जो बताते हैं वह करना ज़रूरी है।” पर उसके साथ-साथ व्यक्ति देखता है कि “मुझे क्या अच्छा लगता है?” और संस्था की दृष्टि क्या है? एक तरह से कि जो ज़रूरत है वह पूरा करना है, पर एक और ज़रूरत है कि हम चाहते हैं कि जो भक्त हैं, वे सुख से सेवा करते रहें और स्थायी रूप से सेवा करते रहें।
तो हमारी संस्था भी इतनी बड़ी हो रही है कि गुरु या वरिष्ठ भक्त हर बार हर एक भक्त को मॉनिटर नहीं कर सकते—”तुम क्या कर रहे हो, तुम क्या कर रहे हो?” तो अगर कोई भक्त अपनी प्रेरणा से अच्छी तरह से सेवा कर रहा है, तो वह अच्छा ही है!
तो फिर क्या है कि दोनों में कोऑपरेटिव एटीट्यूड (Cooperative attitude) होना चाहिए। भक्त की भावना होनी चाहिए—”जो अथॉरिटी बताती है मैं करूँगा।” पर जो अथॉरिटी हैं, उनको देखना है—जो गुरु और उनके प्रतिनिधि हैं—कि इस भक्त को कैसे हम सेवा में लगाएँ कि वह खुशी से, आनंद से, अपनी प्रेरणा से सेवा करता रहे। तो यह धीरे-धीरे हो जाता है।
ऐसे नहीं है कि एक दिन अचानक पता चल जाएगा मुझे—”यह मेरा स्वभाव है, मैं यह करूँगा।” क्या होता है कि अगर हम अपने मन से पूछते हैं कि “मेरा स्वभाव क्या है?”, तो मन वह बोलेगा—”जो तुम अभी कर रहे हो, वह तुम्हारा स्वभाव नहीं है!” मतलब “यह सेवा मत करो, बस!” तो इसलिए हमें मन के स्वभाव के नाम पर गैर-जिम्मेदार नहीं बनना है हमको! हमें जो भी सेवा दी गई है, वह करनी है, पर साथ-साथ यह भी जिम्मेदारी लेनी है कि मैं खुद को समझ सकूँ। और धीरे-धीरे यह हो जाएगा कि हम अपनी प्रवृत्ति के अनुसार, अपने स्वभाव के अनुसार सेवा में निरत हो जाएँगे।
और अगर स्थायी भाव से हम कोई सेवा कर पा रहे हैं, तो उसमें भी कृपा है! वह स्थायी भाव से, स्थिरता से कोई सेवा कर पा रहे हैं, तो वह भी एक प्रकार की कृपा ही है।
अंत में एक पॉइंट बोलूँगा: क्या है कि अगर सिर्फ हम जो अच्छा लगता है वही करते हैं, तो फिर क्या होगा? उससे हम बिल्कुल मनमानी करने लग जाएँगे। पर अगर सिर्फ हमको जो बिल्कुल अच्छा नहीं लगता है वही करते रहेंगे, तो हमारा मन हमको पागल बना देगा!
तो क्या है, अगर हमको कोई चीज़ अच्छी भी लगती है, तो वह करने के लिए भी इस भौतिक जगत में ऐसा है कि जो अच्छा नहीं लगता है, वह भी करना पड़ता है!
जैसे मैं थोड़ा कैलकुलेट किया कि जो ट्रैवलिंग का सारा अरेंजमेंट करना था—यह टिकट लेना है कि नहीं, यहाँ पर जाना है, यह गाइड यहाँ पर आया है कि नहीं… तो वह सारा लॉजिस्टिक्स के लिए… अब क्या होता है, जब ट्रैवलिंग करना इतना आसान नहीं है, क्योंकि बड़े-बड़े मंदिरों में जाते हैं, तो वहाँ पर कोई और गेस्ट आने वाला है—”यह गेस्ट आ गया, तो फिर आप यहाँ पर जाओ, यहाँ पर पुजारी से बात करो।” तो मैंने काउंट किया वास्तव में, उसमें भी मुझे १५० घंटा लगाना पड़ता है! तो १५० घंटा ट्रैवलिंग के लिए नहीं, ट्रैवलिंग का टाइम अलग ही है, ट्रैवलिंग का प्लानिंग करने के लिए! यह फोन करो, यहाँ पर पहुँच रहे हैं कि नहीं, यह फ्लाइट लेट हो गया है, यह फ्लाइट में यह नहीं हुआ है, वह नहीं हुआ है… कई जगह प्रसाद भूल जाते हैं, कई जगह यह हो जाता है। एक बार मेरा लैपटॉप चोरी हो गया, तो फिर बाद में लैपटॉप ढूँढ के मिला वापस।
तो जब ट्रैवल करते हैं, तो बहुत कुछ होता है। तो अभी यह मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता है! अगर मुझे बोलेंगे तो मैं बोलूँगा—”आप १५० घंटे एक जगह बैठकर लेक्चर दो, वह दिव्य आनंद की बात है मेरे लिए!” पर वह संभव नहीं है।
तो फिर क्या है? जो भी हमको अच्छा भी लगता है करने के लिए, तो वह करने के लिए भी जो हमको अच्छा नहीं लगता है, वह करना ही पड़ेगा! और इस तरह से कोई भी पूरा अपने मन के अनुसार कार्य नहीं कर सकता है।
तो इसलिए हमें जो प्रेरणा मिलती है वह करते समय, जो हमें प्रेरणा नहीं मिलती है वह भी करना ज़रूरी है। तो उससे थोड़े सेफ (safe) हो जाते हैं, उससे नम्रता आती है।
अगर मैं प्रवचन दे रहा हूँ, अगर अच्छा प्रवचन देते हैं, तो उससे कर्ता का भाव आता है, उससे नियंत्रक का भाव आता है। पर उसके प्रवचन देने के बाद फ्लाइट कैच करनी है, और जाते हैं, वहाँ बैठते हैं, और दो घंटा फ्लाइट लेट है! क्या होता है? “मैं नियंत्रक नहीं हूँ, मैं कर्ता नहीं हूँ”—यह समझ में आ जाता है!
तो क्या है? हमको नम्रता आनी चाहिए। और कभी-कभी नम्रता अथॉरिटी जो बोलते हैं वह करने से आती है, और कभी-कभी हम जो सेवा करना चाहते हैं, वह सेवा करने में भी जिम्मेदारी अगर हम लेते हैं, तो फिर उससे भी नम्रता आती है—क्या है, समझ आ गया कि मेरे नियंत्रण में नहीं है!
पर मनमानी करने से क्या समस्या आ जाती है कि “जब मुझे यह सेवा चाहिए तो मैं करूँगा”, पर हम एक दिन के लिए, एक हफ्ते के लिए सेवा करते हैं—”अरे इसमें बहुत समस्या आ गई”, दूसरी सेवा करने लगते हैं, फिर तीसरी सेवा, फिर चौथी सेवा… ऐसा करते हैं तो क्या है? फिर मतलब जो मन को अच्छा लगता है वही कर रहे हैं, मन के खिलाफ जैसे जाना पड़ता है हम उसको छोड़ देते हैं, तो फिर वैसा अच्छा नहीं है।
और मान लीजिए हमको कुछ अच्छा लगता है वह करना है, पर वह करने में पूरी जिम्मेदारी चाहिए, उसमें शिकायत नहीं करनी चाहिए—”यह मदद नहीं कर रहा है, यह नहीं कर रहा है, यह नहीं कर रहा है।” हमें पूरी जिम्मेदारी के साथ सेवा करनी चाहिए, फिर उससे भी हमारा शुद्धिकरण हो जाएगा, उसके द्वारा भी हमको सेवा-भाव आ जाएगा, उसके द्वारा भी कृपा मिल सकती है।
बहुत-बहुत धन्यवाद! श्रील प्रभुपाद की जय! गौर-भक्तवृंद की जय!