Appreciating Rath Yatra – RATH acronym – Hindi
[Rath Yatra class at Punjabi Bagh, Delhi, India]
Video:
https://www.youtube.com/watch?v=NDZTZxq0wEc&feature=youtu.be
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Lecture Summary
यह व्याख्यान श्री जगन्नाथ रथयात्रा उत्सव के आध्यात्मिक महत्त्व और जीवन दर्शन पर आधारित है। वक्ता ने अंग्रेजी शब्द R-A-T-H (रथ) के चार अक्षरों के माध्यम से इस पावन उत्सव के गभीर अर्थ को स्पष्ट किया है:
- R – Resourcefulness (साधन सक्षमता एवं भाव):
- उदासी और ऊब (Boredom) से मुक्ति: आधुनिक जीवन में लोग 5% सुखी, 5% दुखी और 90% समय ‘ऊब’ (Bored) महसूस करते हैं। उत्सव हमारे दैनिक जीवन के ऊब को मिटाकर चेतना को ऊँचा उठाते हैं।
- ऐश्वर्य से माधुर्य की ओर: द्वारका में कृष्ण राजा (ऐश्वर्य रूप) हैं, परंतु गोपियाँ और व्रजवासी उन्हें अपने हाथों से खींचकर वृंदावन (माधुर्य भाव) ले जाना चाहते हैं। रथयात्रा भक्तों के इसी अनन्य प्रेम का प्रतीक है जहाँ भक्त अपने हाथों से खींचे गए रथ के माध्यम से भगवान को वृंदावन ले आते हैं।
- A – Attractiveness (विलक्षण आकर्षण):
- भगवान श्री जगन्नाथ का रूप: राजा इंद्रद्युम्न और विश्वकर्मा (कारीगर) के प्रसंग के माध्यम से बताया गया कि भगवान का यह रूप कोई अधूरा रूप नहीं, बल्कि भक्तों के भाव के अनुसार प्रकट हुआ एक अत्यंत विलक्षण और अलौकिक रूप है।
- अनिमिष दृष्टि: भगवान ‘अनिमिष’ (बिना पलक झपकाए) अपनी विशाल आँखों से भक्तों द्वारा की गई छोटी से छोटी सेवा को भी देखते हैं और स्वीकार करते हैं।
- T – Timelessness (कालजयी एवं शाश्वतता):
- भगवान की लीलाएँ केवल इतिहास (History) का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे काल से परे (Timeless) हैं।
- श्रील प्रभुपाद की अनुकंपा से आज 24 घंटे पूरी दुनिया में (अलग-अलग समय क्षेत्रों में) भगवान का नाम-संकीर्तन और रथयात्रा उत्सव आयोजित हो रहे हैं, जो हमें भौतिक काल चक्र से उठाकर आध्यात्मिक चेतना प्रदान करते हैं।
- H – Happiness (अर्थपूर्ण आनंद/सच्चा सुख):
- केवल मनोरंजन नहीं, अर्थपूर्ण सुख: मनुष्य को केवल क्षणिक हँसी या मनोरंजन (जैसे कॉमेडी देखना) नहीं चाहिए, बल्कि एक अर्थपूर्ण (Meaningful) सुख चाहिए।
- सेवा भाव से आनंद: सच्चा सुख और आनंद वस्तुओं को भोगने से नहीं, बल्कि भगवान की सेवा करने और उनसे अपना संबंध जोड़ने से प्राप्त होता है।
Full Transcription
हरे कृष्णा। आज श्रीमद् जगन्नाथ रथयात्रा का जो उत्सव प्राचीन काल से जगन्नाथ पुरी में हो रहा है, वह आज दिल्ली में भी हो रहा है। हम सब, हम सबका यह सौभाग्य है कि हम इसमें सहभागी हो पा रहे हैं। तो यह जो उत्सव है, इसका महत्त्व क्या है, हमारे जीवन में क्या संदर्भ है, इसकी चर्चा मैं आज करूँगा। चार पहलुओं से करूँगा मैं इसके बारे में। इंग्लिश में एक्रोनिम कहते हैं। तो आज उत्सव का, रथयात्रा उत्सव है, तो मैं चार विषयों पर चर्चा करूँगा: R, A, T, H — RATH (रथ)।
तो यह जो उत्सव है:
R – Resourcefulness (साधन सक्षमता एवं भाव)
‘R’ है Resourcefulness — साधन सक्षमता। इसका भाषांतर है Resourcefulness अथवा बुद्धि, बुद्धिमत्ता, भावना… इस तरह से हमें ढूँढना है इस चीज़ को। तो अभी क्या है, साधन से हमारे जीवन में जो रोज़ जीवनचर्या होती है उसमें, कुछ ही समय के बाद हम थोड़े बोर हो जाते हैं। मैं अभी ऑस्ट्रेलिया में था, उसके पहले अमेरिका में था। तो वहाँ पर एक वैज्ञानिक बता रहे थे जो अधिकांश लोग होते हैं, उनकी पाश्चात्य देशों में हालत बहुत ही बुरी हो चुकी है। तो जो मानसिक स्थिति होती है उनकी, कैसी होती है? जीवन में 5% समय वे खुश रहते हैं, 5% समय वे दुखी रहते हैं और 90% समय वे बोर रहते हैं! बोरियत होती है। और पूरा जो मनोरंजन का इंडस्ट्री है, उसका कारण है कि लोग बोर होते हैं।
तो क्या है, जो उत्सव होते हैं प्राचीन समय से, एक ऐसा धार्मिक और दिव्य प्रसंग होता है जिसमें हमारी रोज़ की दिनचर्या में जो थोड़ा-बहुत बोरडम, थकावट, आलस आ जाता है, उसके लिए एक ब्रेक आता है। पर यह ऐसा ब्रेक है जो हमारी चेतना को ऊपर उठाता है। अलग-अलग प्रकार से हम ब्रेक प्राप्त कर सकते हैं, पर जो उत्सव होते हैं प्राचीन समय से आ रहे हैं जो भारत भूमि के हैं, उसमें अनेक उत्सव हैं जिसमें हम भगवान को केंद्र रखते हुए हमारी सांस्कृतिक, हमारी सारी जो पहलू हैं, वे सब हम उसको पूरा कर सकते हैं।
तो जगन्नाथ रथयात्रा जो उत्सव है, उसका उद्गम है हज़ारों साल पहले, और यह भगवान कृष्ण और गोपियों से संबंधित है। तो भगवान कृष्ण वृंदावन में सारे व्रजवासियों के साथ बहुत आनंद से रह रहे थे। पर जीवन का यही नियम है कि हर चीज़ बदलती रहती है। अगर एक चीज़ जो नहीं बदलती है, वह क्या है? बदलाव! एक ही चीज़ जो नहीं बदलती है, वह क्या है? बदलाव!
तो वृंदावन में सारे बड़े आनंद से रह रहे थे, पर कृष्ण को वृंदावन छोड़के जाना पड़ा था। क्योंकि बड़े-बड़े असुर थे और बड़ा विध्वंस कर रहे थे, तो छोड़के चले गए मथुरा, मथुरा से द्वारका चले गए। और व्रजवासी बड़े-बड़े विरह में थे, वे विचार कर रहे थे, चिंतन कर रहे थे कि कृष्ण कब वापस आएँगे। तो फिर कुरुक्षेत्र में ग्रहण का समय था, और उस समय में द्वारका से कृष्ण और द्वारकावासी आ गए, वृंदावन से गोपियाँ और व्रजवासी आ गए। और जब उन्होंने कृष्ण को देखा, तो बड़ा आनंद उनको हुआ। पर फिर भी वह आनंद की पराकाष्ठा नहीं हुई, क्योंकि जो वृंदावन का भाव है, वह ऐसा भाव है जिसमें भगवान अपना भगवत्ता नहीं दर्शाते हैं, भगवान अपना ऐश्वर्य नहीं दर्शाते हैं।
जब 200-250 साल पहले पाश्चात्य देश से यूरोपियन लोग आए थे और वे भारत के बारे में जानकारी कर रहे थे, तो वे विल्किंसन नाम के एक विद्वान थे, और उन्होंने कई मंदिरों के मूर्तियों के चित्र देखे। तो उनको दिख रहा था कि एक बड़ा ही नटखट बालक है, और उन्होंने चित्र कई जगह देखे। उन्होंने पूछा कि “यह कौन है?” उनको बताया गया कि “यह भगवान हैं!”
अभी पाश्चात्य देश में भगवान की संकल्पना होती है कोई बहुत ही वृद्ध व्यक्ति है, लंबी दाढ़ी है, आसमान में बादलों पे बैठा है, और जो भी पाप करते हैं, उनको वज्र मार के दंड देने के लिए देखता है। अभी वह संकल्पना है कि यह भगवान हैं, और यह एक छोटा बालक… यह भगवान हैं? यह क्या कर रहा है? “यह माखन चोरी करता है!” भगवान चोरी करते हैं? और चोरी करनी भी है, तो माखन के लिए करते हैं! तो उनका जो दिमाग था, वह शॉर्ट-सर्किट हो गया! तो समझे नहीं कि क्या हो रहा है।
तो कृष्ण की जो भक्ति है, भक्ति परंपरा में जो भगवान का दर्शन किया गया है—भगवान कृष्ण वृंदावन में अपना भगवत्ता नहीं दिखाते हैं, वे अपना ऐश्वर्य नहीं दिखाते हैं। जो भी अपने भक्तों से प्रेम का आदान-प्रदान करने के लिए ज़रूरी है, वही भाव दिखाते हैं। जब ही ज़रूरी है, वे इतनी शक्ति दिखा देंगे कि वे बड़े पहाड़ को उठा देंगे। कौन सा पहाड़ है वह? गोवर्धन! पर जब उनकी माँ बताती है उनको कि “आप अपने पिताजी के चप्पल ले आओ”, तो वे ले आने का प्रयास करते हैं और उनके हाथ काँपते हैं! मान लीजिए वे बहुत भारी उठा नहीं सकते! तो भक्तों से प्रेम करने के लिए, क्या आदान-प्रदान करने के लिए अनुकूल है, जब शक्ति चाहिए तो शक्ति दिखा देंगे; जब अशक्त भाव दिखाना है, जिस तरह कोई बच्चा मासूम है, कमज़ोर है, उससे क्या होता है? स्नेह बढ़ जाता है! तो फिर भगवान वह दिखाते हैं।
तो गोपियाँ वृंदावन में कृष्ण को एक ग्वाले, एक गोपाल के रूप में उनसे उनका प्रेम था। और यहाँ पर कृष्ण द्वारका के कुमार, द्वारका के एक बड़े नेता के रूप में आए थे। तो उनको वह भाव के कृष्ण चाहिए। तो उनके मन में था कि “हम कृष्ण को वृंदावन ले जाएँगे। हम कृष्ण को वृंदावन ले जाएँगे।” तो कैसे ले जाएँगे? तो वह ऐश्वर्य और वैभव, वह रथ के ऊपर से कुरुक्षेत्र से वे वृंदावन ले जाएँगे। तो उनमें क्या साधन सक्षमता (Resourcefulness) थी कि भगवान को हम रथ में खींचेंगे। साधारण रथ जो होता है, वह घोड़ों से खींचा जाता है या हाथियों से खींचा जाता है। पर रथ होना अपने ऐश्वर्य का भाव है। पर गोपियों का भाव था कि “हम ऐश्वर्य से माधुर्य की ओर भगवान को ले जा रहे हैं।” तो इसलिए उन्होंने संकल्प बनाया कि “हम यह रथ को खींच लेंगे अपने खुद के हाथों से।”
तो वास्तव में उन्होंने संकल्प बनाया कि “वृंदावन को हम ले जाएँगे कृष्ण को वापस, हमारे हाथों की ताकत से और हमारे हृदय के प्रेम से हम खींच लेंगे।” तो यह जो रथयात्रा उत्सव है, उसमें भक्त भगवान के रथ को खींच रहा है। क्योंकि गोपियों ने वृंदावन में भगवान को ले आने के लिए खुद खींचने का संकल्प बनाया था। तो जब भक्त भगवान को ले आना चाहते हैं, व्रजवासी ले आना चाहते हैं कृष्ण को, तो व्रजवासी साधारण हैं, उन लोगों के पास घोड़े नहीं हैं बड़े।
A – Attractiveness (विलक्षण आकर्षण)
अब यह भगवान कृष्ण हैं, पर उनका रूप जो है, वह बड़ा विलक्षण है।
$$मेघश्यामं\ पीतकौशेयवासं\ श्रीवत्सांकं\ कौस्तुभोद्भासितांगम्\।$$
भगवान जो हैं, वे श्यामवर्ण के हैं, उनकी आँखें कमल के दल के समान हैं, वे जहाँ खड़े होते हैं त्रिभंग होते हैं, उनके सिर पे मोरपंख है, पीतांबर है, सुंदर हैं।
जगन्नाथ जी का रूप भगवान कृष्ण से काफी अलग है। तो यहाँ जो है, वह साधन सक्षमता (Resourcefulness) है। किस तरह से वे कृष्ण को ले जाते हैं दूसरे रूप में। भगवान Attractiveness हैं। तो भगवान जो हैं, वह अपना सौंदर्य अलग-अलग प्रकार से दिखाते हैं।
जगन्नाथ जी का रूप भगवान कृष्ण से काफी अलग है। तो यहाँ जो है… जब राजा इंद्रद्युम्न को लकड़ी मिली थी नदी में (साधन मिले थे), तो उन्होंने वह लकड़ी से भगवान के विग्रहों का निर्माण करने की आज्ञा दी। इच्छा की और प्रार्थना से वहाँ पे एक वृद्ध शिल्पकार आ गए, जो वास्तव में देवताओं के शिल्पकार थे, देवताओं के शिल्पकार विश्वकर्मा आ गए। तो वे आ गए वहाँ पे। तो उन्होंने कहा कि “तुम मेरे काम में दखल मत देना। मेरे जितना समय लगता है, उतने समय में तुम बिल्कुल अंदर नहीं आओगे कि मुझे काम पूरा करना है।”
तो जब इस तरह से वे काम करने लगते हैं, तो उनका भाव था कि भगवान में पूरा ध्यान देकर भगवान के इस सुंदर रूप को, जो विग्रहों को वहाँ पर बनाते हैं, इस भाव से वे कार्य करने लगे। तो कुछ समय के बाद, कुछ दिनों के बाद… और सहने के दिन नहीं हुए, कुछ कोई काम का आवाज़ नहीं आ रहा था, तो उत्सुकता के कारण राजा इंद्रद्युम्न से रहा नहीं गया। वे कमरे के अंदर चले गए। और उन्होंने देखा कि विग्रहों के चित्र ऐसे बने हैं जो मानो आधे बने हुए हों! तो ऐसे विग्रह दिख रहे हैं जिनके कान नहीं हैं, जिनके हाथ आधे लग रहे हैं, और बड़ा विकट रूप प्रकट होने वाला था। और उसके पहले ही इंद्रद्युम्न ने दरवाजा खोल दिया।
पर उसके पहले नहीं दिखने लगा… कहाँ गए विश्वकर्मा? पता नहीं। और फिर राजा को ग्लानि होने लगी, “क्या किया मैंने! मेरा धैर्य अधूरा रह गया, वह अदृश्य हो गया!” और फिर बहुत ग्लानि करने लगे, “क्या किया मैंने!” पर उस समय उनको ब्रह्मा जी के द्वारा पता चलता है कि यही दिव्य रूप है, यही श्रेष्ठ रूप है!
तो कभी-कभी जो हम भगवान की सेवा करना चाहते हैं, जो हम कुछ अच्छा काम करना चाहते हैं, तो कभी-कभी उत्साह में हम कुछ गलती करते हैं। बड़ा उत्साह होता है, और उत्साह के कारण हमारा उद्देश्य गलत नहीं होता है, पर भूल हो जाती है।
जब भक्तों ने, सबसे पहले प्रभुपाद जी के शिष्यों ने… उन्होंने रथयात्रा की 1968 में। इसके बाद में लंदन में भी भक्तों को सफलता मिली थी। पर जब इसके बाद में भक्तों ने लंदन में… लंदन में रथयात्रा करना चाहते थे। तो लंदन में रथयात्रा कर रहे थे, तो उन्होंने सोचा—अभी अमेरिका में प्रभुपाद जी की रथयात्रा बनी है, उससे और बड़ी रथयात्रा मैं बनाऊँगा! और उससे और बड़े हम विग्रह लाएँगे! तो और बड़े विग्रह लाए और बड़ा रथ बनाना चाहा। पर क्या हुआ, उनका उत्साह इतना था कि उन्होंने रथ के जो पहिये थे, वे पतली लकड़ी के लाए। तो अभी रथ चालू हो गया, बड़ा उन्होंने उसका प्रतिपादन किया था, पब्लिसिटी की थी। पर जैसे ही रथ चालू हो गया, अचानक रथ के जो पहिये थे, वे टूट गए! बहुत बड़ा समस्या आ गया कि उन्होंने सब कुछ मैनेज कर लिया, पर बाद में जब भक्तों ने देखा, प्रभुपाद जी को दिखाया कि जो आ गया, उसके पहिये टूट गए हैं, तो सब भक्तों को लगा कि “हाँ, हम इतने बुरे भक्त हैं, हमारी भक्ति कम है, इसलिए ऐसे पहिये टूट गए हैं।”
तो उसी तरह से जो भगवान हैं, भले ही हम कभी गलती कर बैठते हैं, भगवान की योजना जो है… भले ही यह एक पहली दृष्टि से इंद्रद्युम्न महाराज का उतावला भाव था, पर जो भगवान का रूप प्रकट हुआ, वह अधूरा या गलत नहीं है, वह भगवान की योजना के अनुसार ही प्रकट हुआ।
और जगन्नाथ जी का जो आकर्षण है, जो Attractiveness है, वह दिव्य है। कि भगवान के अलग-अलग रूप हैं, उनको हम अलग-अलग दृष्टि से देख सकते हैं। और भगवान जो प्रकट होते हैं, अलग-अलग प्रकार के भक्तों को अलग-अलग रूपों से दर्शन देते हैं।
$$यं\ यं\ भावं\ स्मरन्\ भावं\ त्यजत्यन्ते\ कलेवरम्\।$$
प्रह्लाद महाराज प्रार्थना में बताते हैं कि जिस-जिस भावना से भगवान की पूजा करना चाहते हैं, उन भावनाओं का स्वीकार करते हुए भगवान उसी प्रकार के रूप में प्रकट होते हैं।
तो यहाँ पर जगन्नाथ जी का जो रूप है, वह एक विलक्षण रूप है। उससे भगवान अपने सौंदर्य का एक अद्भुत प्रदर्शन करना चाहते हैं। इसका भाव क्या है? मैं आपके सामने देख रहा हूँ। विष्णु सहस्रनाम जो है, उसमें दो भगवान के नाम आते हैं: ‘अनिमिष’ और ‘निमिष’। ‘अनिमिष’ — अनिमिष मतलब जो भगवान कभी ब्लिंक (blink) नहीं करते हैं, भगवान पलकें नहीं झपकाते हैं। ‘निमिष’ मतलब जो भगवान पलकें झपकाते हैं।
विष्णु सहस्रनाम में ये नाम क्यों हैं? इसका भाव यही है कि मैंने विष्णु सहस्रनाम के टीका में देखा है, इसमें बताते हैं वे कि जब भक्त अपने अज्ञान में कोई गलती करता है, तो भगवान अपनी आँखें बंद कर लेते हैं और वह गलती को देखते नहीं हैं! इसका उदाहरण है कि जैसे पूतना आई थी, वह आई थी विष पिलाने भगवान को, पर भगवान ने उसकी वह जो नकारात्मक भावना थी, वह नहीं देखी, तो भगवान ने आँखें बंद कर लीं, उसका दोष देखा नहीं। और जो भगवान की आँखें हैं जो अनिमिष हैं (जो पलकें नहीं झपकाती हैं), उसका मतलब क्या है? कि अगर कोई भक्त भगवान की सेवा कर रहा है, तो फिर भगवान अपनी आँखों से छोटी से छोटी सेवा जो होती है, उसको भी देखते हैं, उसको भी नोट करते हैं, और हरेक सेवा का भगवान फल देते हैं!
जब कृष्ण और अर्जुन हस्तिनापुर में थे, तो भी वे बहुत बातें कर रहे थे, और उस समय द्रौपदी वहाँ पे आ गई। वे बातें कर रहे थे, तो फिर वहाँ पे कुछ फल रखे हुए थे। द्रौपदी जब जा रही थी, तो कृष्ण ने फल उठाया और वे चाकू से काट रहे थे। जब काट रहे थे तो चाकू उनके हाथ पे लग गया और वहाँ पे बहुत खून बहने लगा। तो द्रौपदी ने देखा तो दौड़ते हुए आईं और…
तो जगन्नाथ जो हैं, वहाँ अनिमिष भाव में हैं। वे जब रथ पे आते हैं, तो उनकी बड़ी आँखें खुली होती हैं, और कोई भक्त उनकी छोटी सी सेवा कर रहा है, वे उस सब को देखते हैं। और हमें जब हम रथयात्रा में सहभाग करते हैं, जिस तरह से गोपियाँ भगवान को वृंदावन ले जा रही हैं, हम सब उसमें सहभाग कर रहे हैं। और जगन्नाथ जी का जो प्रेम है, जो उनका सबसे बड़ा सौंदर्य है, भगवान की विशाल आँखों से अपने भक्तों को देखना है।
T – Timelessness (कालजयी एवं शाश्वतता)
तीसरा ‘T’ है Timelessness. Timelessness मतलब क्या कि यह भगवान का जो प्रेम है, भगवान की जो लीला है, वह इतिहास काल से परे है। वह 5000 साल पहले भगवान केवल उस समय थे, ऐसा नहीं था। भगवान हमेशा हमारे हृदय में रहते हैं। पर जो भगवान की लीला है, वह exists beyond history (इतिहास के परे अस्तित्व रखती है)। वह इतिहास में प्रकट होती है और वह हमेशा प्रकट रहती है। भगवान की लीला के अलग-अलग क्षेत्र होते हैं, और उनके धाम में हमेशा वह लीला चलती रहती है।
तो वह जो लीला है, वह Timeless है। उसका उद्देश्य क्या है कि भगवान ऊपर से नीचे आते हैं ताकि हम नीचे से ऊपर जाएँ! तो भगवान की लीला काल के परे है, वे इस काल के जगत में आते हैं और उनका उद्देश्य होता है कि हम काल से ऊपर जाएँ।
तो Timelessness का मतलब है कि जब हम भगवान का स्मरण करते हैं, तो हम इस भौतिक जगत के परे होते हैं। और यह जो भगवान की लीला में प्रवेश होता है, वह हमारी चेतना से होता है। तो जब प्रभुपाद जी थे, वे कहा करते थे कि “अगर हमारी सुविधा होती तो हम हर जगह…” प्रभुपाद जी को देखिए, आध्यात्मिक जीवन में हर एक जीवन ऊँचा होता है।
मैं ऑस्ट्रेलिया से इंडिया आ रहा था, तो वहाँ पे प्लेन के टीवी पर मैप दिखता है। तो मैप पर मैं थोड़ा रिसर्च कर रहा था कि हमारे कृष्ण भावना के केंद्र कहाँ-कहाँ हैं। तो अगर हम ऐसे पूरे पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं—न्यूज़ीलैंड में, फिर ऑस्ट्रेलिया, फिर जापान, फिर इंडोनेशिया, मलेशिया, रशिया, भारत… तो अभी ऐसा है कि लगभग हर लैटिट्यूड, हर जगह पे भगवान कृष्ण का मंदिर है! प्रभुपाद जी की कृपा से कृष्ण का मंदिर होता है।
तो जो अभी रथयात्रा हमने देखी, जैसे वह Timeless है। जब अगर हम मँगला आरती देखते हैं, अगर हम एक मैप से देखते हैं… जब न्यूज़ीलैंड में साढ़े चार बज जाते हैं, वहाँ पर मँगला आरती देखते हैं। वहाँ पर जब मँगला आरती खत्म हो जाती है, तभी मेलबर्न में मँगला आरती शुरू हो जाती है। जब मेलबर्न में मँगला आरती खत्म हो जाती है, तभी एडिलेड में मँगला आरती शुरू हो जाती है। एडिलेड में मँगला आरती खत्म हो जाती है, पर्थ में मँगला आरती शुरू हो जाती है। पर्थ में मँगला आरती खत्म हो जाती है, जापान में शुरू हो जाती है। जापान में खत्म हो जाती है, सिंगापुर में शुरू हो जाती है। सिंगापुर में खत्म हो जाती है, पूर्वी दिशा में शुरू हो जाती है… ऐसे 24 घंटे भगवान का गुणगान चलता रहता है! यह प्रभुपाद जी की असीम कृपा है।
उसी तरह से अगर हम रथयात्रा देखते हैं, तो ऑस्ट्रेलिया में हो, अफ्रीका में हो, अमेरिका में हो… हरेक महत्त्वपूर्ण शहर में रथयात्रा हो जाती है। और रथयात्रा जो है, यह कोई व्यक्ति कहीं भी हो, उन सब को एक दिव्यानंद का अनुभव कराती है। हम इस भौतिक जगत में फँसे हुए हैं, और हमारी चेतना भगवान को प्राप्त कर सकती है। जो भगवान की लीला एक समय पर हुई थी, पर उस एक समय में सीमित नहीं हुई। वह क्या है, अनंत काल में, हर समय में वह दोहराई जा सकती है।
तो रथयात्रा होती है जब हमारी आँखों के सामने भगवान आ जाएँ और उसके द्वारा हमारे बुद्धि में आ जाएँ, यही बात है। तो जब बुद्धि में आ जाते हैं, तो फिर भगवान की स्मृति हमें हमेशा होती है। यह ‘T’ — Timelessness है।
H – Happiness (अर्थपूर्ण आनंद/सच्चा सुख)
और आखरी ‘H’ है Happiness (सुख)। हम सब सुख की खोज में हैं। और भगवान भी आते हैं हम सबको सुखी बनाने। कभी-कभी हम कहते हैं शास्त्रों में बताया है कि जगत ‘दुःखालयम्’ है, वह सही है। पर ऐसा नहीं है कि भगवद्गीता की शुरुआत में अर्जुन हैं और दुखी हैं, अर्जुन की आँखों से आँसू आ रहे हैं:
$$कृपया\ परयाविष्टो\ विषीदन्निदमब्रवीत्\।$$
आँखों से आँसू आ रहे हैं। भगवान भगवद्गीता में… “जगत दुखों से भरा हुआ है”, भगवान यह नहीं कहते कि “अर्जुन! तुम दुखी हो, यह जगत दुखालय है, तुम दुखी रहो।” ऐसा भाव नहीं है। भगवद्गीता के अंत में भी क्या हो जाता है? अर्जुन शांत हो रहे हैं, प्रसन्न हो रहे हैं।
तो भगवान जो आते हैं, वे हमें सुख प्रदान करने के लिए आते हैं। रथयात्रा का एक उत्सव यह है कि वही भगवान जो उत्सव हैं, हम सबको सुख प्रदान करने के लिए हैं। पर जो सुख है, वह एक बड़ा रहस्य भी छिपा हुआ है।
मान लीजिए अगर कल हमें कोई बोल देगा कि “आज से तुम्हें कोई आर्थिक ज़िम्मेदारी नहीं है, कोई पारिवारिक ज़िम्मेदारी नहीं है, आज से तुम ज़िंदगी भर सुबह से रात तक कॉमेडी सीरियल देखो!” और ज़िंदगी भर कुछ नहीं करना है, तो क्या हमें आनंद होगा? आज एक घंटा, दो घंटा ठीक होगा, इसके लिए कुछ करना नहीं चाहिए। पर केवल कॉमेडी से हम हँसेंगे, आज कॉमेडी नहीं चाहिए हमें… केवल सुख नहीं चाहिए, हमें अर्थपूर्ण सुख (Meaningful Happiness) चाहिए!
जैसे मान लीजिए छोटा बच्चा होता है, तो बच्चे के जीवन में… अभी वैज्ञानिक चाहें तो ऐसी मशीन बना सकते हैं जो हमेशा गुदगुदी करती रहे और बच्चा हमेशा ज़िंदगी में हँसता रहे। क्या वह सुख होता है? नहीं!
तो क्या है, हमें हमेशा सुख चाहिए, पर ऐसा नहीं कि केवल हँसना ही सुख है। वह कैसे मिलता है? हम सब सुख की खोज में हैं। पर श्रीमद्भागवतम् में बताते हैं कि सुख कैसे मिलता है—जब हम भगवान की भक्ति करते हैं! क्यों? क्योंकि भगवान की भक्ति में… हम सबके पास हमारे जीवन में अगर हम देखेंगे, तो कुछ दुख है, कुछ सुख है। अगर हम तुलना करेंगे, तो हमें लगेगा कि सुख तो काफी ज़्यादा है।
तो जब हम भगवान का सेवा भाव अपने जीवन में स्वीकार करते हैं, तो फिर उससे आनंद अपने आप होगा। अगर हम आनंद खोजने जाएँगे, तो जो भी चीज़ों में आनंद दिखेगा, कुछ चीज़ों में कुछ आनंद मिलेगा, पर बाद में दुख मिलेगा। पर अगर हम सेवा का भाव रखते हैं, तो फिर उस सेवा से हमारे और भगवान में एक संबंध जुड़ जाता है। और उस संबंध से, भगवान की स्वीकृति से, भगवान के संबंध से एक आनंद हमें प्राप्त हो जाता है।
और वही जो रथयात्रा के उत्सव का सबसे महत्त्वपूर्ण जो संदेश है कि हमें वह सेवा भाव स्वीकार करना चाहिए, जिस तरह से गोपियों ने रथ को खींचा था, जिस तरह से श्रील प्रभुपाद जी ने सारे विश्व भर में रथयात्रा के उत्सव को स्थापित किया। उसी तरह से उसी सेवा भाव से हम सब भगवान से संबंध जोड़ सकते हैं। और जब इस तरह से संबंध जोड़ जाता है, तो फिर हमारा जीवन अर्थपूर्ण हो जाता है। हम जो भी कर रहे हैं, वह हमें परमार्थ से मिलाता है, और उसी में जीवन का सर्वोच्च आनंद हो जाता है।
आज हमने चर्चा की कि किस तरह से रथयात्रा का यह उत्सव हमारे जीवन में कार्य करता है। जीवन में जो रोज़ का कार्य होता है, उससे कुछ ब्रेक के लिए उत्सव होते हैं। जो भारतीय संस्कृति में उत्सव हैं, वे भगवान से जुड़े होते हैं।
‘RATH’ क्या व्यक्त करता है?
- R (Resourcefulness): रथयात्रा के उत्सव में भगवान ऐश्वर्य भाव से द्वारकाधीश के रूप में होते हैं, पर भक्त उन्हें माधुर्य भाव से खींचकर वृंदावन ले जाते हैं। प्रभुपाद जी की कृपा से रथयात्रा साल के हर समय, हर जगह में कहीं न कहीं होती है।
- A (Attractiveness): भगवान जगन्नाथ का रूप अत्यंत आकर्षक और दिव्य है। वे अपनी अनिमिष (विशाल) आँखों से भक्तों की छोटी से छोटी सेवा को भी स्वीकार करते हैं।
- T (Timelessness): भगवान की लीला कालजयी है। 24 घंटे दुनिया भर में भगवान का संकीर्तन और उत्सव चल रहा है।
- H (Happiness): हम सब सुख चाहते हैं, पर केवल मनोरंजन वाला सुख नहीं, अर्थपूर्ण आध्यात्मिक सुख चाहते हैं। और वह सुख कैसे आता है? जब हम अपने जीवन को परमार्थ से, भगवान की सेवा भाव से जोड़ लेते हैं।
तो जिस परिस्थिति में हम हैं, कुछ अच्छा होगा, कुछ बुरा होगा, पर हम इस परिस्थिति में भगवान की सेवा कैसे करते हैं—यह देखना है। “मेरे साथ बुरा क्यों हुआ, वह ऐसा क्यों हुआ…” वह सब छोड़ें। परिस्थिति में जो भी मेरे पास है, उसके साथ मैं भगवान की सेवा कैसे करूँ, वह भाव रखते हैं। तो ऐसा भाव रखते हैं तो हम भगवान के साथ जुड़े रहते हैं और एक दिव्य सुख का अनुभव करते हैं।
- श्री जगन्नाथ भगवान की जय!
- श्री जगन्नाथ-बलदेव-सुभद्रा महारानी की जय!
- श्री जगन्नाथ रथयात्रा महा महोत्सव की जय!
- श्रील प्रभुपाद की जय!
- गौर भक्तवृंद की जय!
- निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!