What cricket can teach you about life – Hindi
[Prerana youth festival talk at ISKCON, Nigdi, India]
Video:
Disclaimer: This transcript was generated using AI and may contain occasional errors or inaccuracies.
Lecture Summary
सारांश (सार)
यह प्रवचन जीवन, खेल, और अनुशासन के गहरे दार्शनिक और व्यावहारिक संबंधों को स्पष्ट करता है। मुख्य बिंदुओं का सारांश इस प्रकार है:
- जीवन और खेल (Life as a Game):
- क्रिकेट या अन्य खेल केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि ये हमारे वास्तविक जीवन का एक लघु रूप (Reflection) हैं।
- जिस प्रकार खेल में हमारे नियंत्रण से परे की चीजें (जैसे बारिश या अनिश्चितताएं) होती हैं, उसी प्रकार जीवन में भी सब कुछ हमारे नियंत्रण में नहीं होता। हमें यश-अपयश और अनिश्चितताओं को स्वीकार करना सीखना चाहिए।
- टैलेंट बनाम टेंपरमेंट (Talent vs. Temperment):
- केवल जन्मजात प्रतिभा (टैलेंट) से सफलता नहीं मिलती। इसके साथ मानसिक स्थिरता और परिपक्वता यानी टेंपरमेंट का होना अति आवश्यक है (टैलेंट + टेंपरमेंट = अचीवमेंट)।
- सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली के उदाहरण से यह समझाया गया है कि उत्कृष्ट प्रतिभा होने के बावजूद सही टेंपरमेंट के बिना व्यक्ति जीवन या करियर में पिछड़ सकता है।
- नियम और अनुशासन का महत्व:
- खेल हों या समाज, हर जगह नियम एक आवश्यक ‘फ्रेमवर्क’ प्रदान करते हैं ताकि हम अपनी प्रतिभा को सही दिशा में दिखा सकें।
- नियमों का पालन करने से भले ही शुरुआती दौर में थोड़ी कठिनाई या अनुशासन की आवश्यकता लगती है (विषवत्), परंतु परिणाम हमेशा अमृत के समान सुखद होते हैं।
- सोशलाइजेशन और टीम स्पिरिट (Team Spirit):
- जीवन एक ‘टीम स्पोर्ट्स’ की तरह है, जहाँ हमें अकेले नहीं बल्कि दूसरों को साथ लेकर चलना होता है।
- अत्यधिक स्वार्थी या ‘आई-स्पेशलिस्ट’ (केवल ‘मैं’ पर ध्यान देने वाले) बनने से परिवार और समाज के रिश्ते कमजोर हो जाते हैं।
- व्यावहारिक समाधान (नियम पालन के उपाय):
- पर्पस याद रखें: नियमों का पालन करने के पीछे के उद्देश्य को हमेशा याद रखें।
- सत्संग करें: सही और अनुशासित लोगों की संगति में रहें।
- स्मॉल सिंपल स्टेप्स (Small Simple Steps): बहुत बड़े लक्ष्य एक बार में तय करने के बजाय छोटे-छोटे और व्यावहारिक कदम उठाकर आगे बढ़ें।
Full Transcriptions
श्रीमद्भागवत कथा: क्रिकेट, जीवन और हमारे भीतर का संतुलन
हरे कृष्णा! आप सबका स्वागत है इस आज के सत्र में।
अभी कुछ समय पहले मैं अमेरिका में था। जब मैं वहाँ था, तब क्रिकेट वर्ल्ड कप चालू होने वाला था। अमेरिका में बहुत से भारतीय रहते हैं और उन्हें क्रिकेट का बहुत शौक है। जब मैं कई बार कुछ प्रोग्राम लेता हूँ या भारत से बाहर जाते हैं, तो हम देखते हैं कि क्रिकेट के प्रति लोगों में काफी रुचि होती है।
पर जब अमेरिकन लोग होते हैं, और वे जब क्रिकेट सुनते हैं, तो उनको सबसे पहले एक कीड़ा याद आता है—क्रिकेट एक खेल, उसके पहले सूझती नहीं होती है। उनको क्रिकेट का कीड़ा सबसे पहले याद आता है! पर वहाँ पर भी स्पोर्ट्स बहुत प्रिय हैं। वहाँ बेसबॉल बड़ा है, बास्केटबॉल बड़ा है। अमेरिकन लोग भी यहाँ तक कि कई ऐसे यूनिवर्सिटीज होते हैं, वहाँ विद्यार्थी उन यूनिवर्सिटीज में एडमिशन लेते हैं ताकि उस यूनिवर्सिटी की बास्केटबॉल टीम में जा सकें।
पर अभी हम देखेंगे कि हम सब इतना स्पोर्ट्स से आकर्षित होते हैं, तो उसका कारण क्या है?
जीवन में क्रिकेट और खेल के प्रति आकर्षण क्यों?
आप में से कितने लोग क्रिकेट मैच देखते हैं या क्रिकेट मैच सुनते हैं? कम से कम… अच्छा, इतना सुनना तो… नाम तो उनकी नहीं है, हमको रुचि नहीं होगी तो वे दूसरी लोग बात करने होंगे।
जैसा कि मैंने परिचय में दिया था, काफी समय तक पहले क्रिकेट सबकी रुचि थी। जब मैं बाद में ब्रह्मचारी बन गया, तो क्रिकेट में कुछ ज्यादा रुचि नहीं रहा। पर एक बार मैं मुंबई में ऐसे तरह का लेक्चर दिया था, जैसे जहाँ था आप और उसके बाद में काफी अच्छा प्रश्न-उत्तर हुआ। और फिर प्रश्न का जवाब हो गया था, उसके बाद में एक दूसरे ब्रह्मचारी थे, वो भी प्रचारक थे, वो मुझे मिले आए और वो सराहना कर रहे थे।
लेकिन वो जो प्रश्न का जवाब तुमने ऐसे दिया, जैसे एक गुगली पर सिक्सर मार दिया!
तभी मैं सोचने लग गया कि क्रिकेट हमारे जीवन में, हमारे भारत में कितना प्रसिद्ध हो गया है कि एक ब्रह्मचारी दूसरे ब्रह्मचारी की सराहना कर रहा है क्रिकेट का उदाहरण देकर! तो वास्तव में, हम सब अभी एक तरह से क्रिकेट हो या कोई और स्पोर्ट्स, उसमें काफी रुचि रखते हैं। तो आपको क्या लगता है? क्रिकेट में इतनी रुचि क्यों है लोगों की? आपकी खुद की इतनी रुचि क्यों है क्रिकेट में? क्यों देखते हैं आप लोग क्रिकेट मैचेस?
- बहुत सारी शक्ति इस्तेमाल होती है। हाँ, आजकल टी-20 तो आ गया है, पावर ही होता है सब कुछ—कौन कितना जोर से बॉल मारता है, कौन बॉलिंग कर सकता है, बैटिंग कर सकता है और कुछ?
- कांस्टेंटली अनसर्टेन्टी बहुत रहती है!
तो उससे क्या होता है? बराबर है? उससे दिल आता है, उससे कुछ एक्साइटमेंट आती है। तो हम एक तरह से कहते हैं, मनोरंजन चाहते हैं और यही उससे एक्साइटमेंट होता है। इसलिए अगर एक टीम बहुत अच्छी है, दूसरी टीम बहुत निकम्मी है तो वो मैच देखने में ज़्यादा मज़ा नहीं आता है, क्योंकि इसमें कुछ एक… इतने वाले क्या? कुछ मैच है यहाँ को?
मनोरंजन और नीरस जीवन का यथार्थ
तो बेसिकली, हम सब स्पोर्ट्स देखते हैं और यह मनोरंजन के लिए क्यों देखते हैं? क्योंकि हमारा असली जीवन जो होता है, वो इतना मनोरंजक नहीं होता है। असली जीवन जो होता है, काफी समय बोरिंग हो जाता है।
अमेरिका में एक सोशल रिसर्च हुआ था, उसमें देखा उन लोगों ने कि लोगों की मनःस्थिति क्या होती है, इनकी कैसे-कैसे भावनाएं होती हैं? तो अस्पताल खाता के जो लोग अच्छे-अच्छे स्वास्थ्य में हैं, अच्छे आर्थिक परिस्थिति में हैं, तो वो 5% समय अपने जीवन में सुखी रहते हैं, 5% समय दुखी रहते हैं, और 90% समय बोर रहते हैं!
तो ये जो बोरिंग है, ये सबको आता है कभी न कभी। और जब बोर मन होता है, तो उससे हम राहत चाहते हैं। अभी उसके लिए हम अलग-अलग कार्य कर सकते हैं और एक बहुत लोकप्रिय कार्य है—मनोरंजन, कार्य है स्पोर्ट्स, जैसे भारत में है क्रिकेट।
अभी मनोरंजन तो प्राचीन काल से हर संस्कृति में रहा है, पर आज कल समय में जो मनोरंजन है, वहाँ बहुत तीव्र बन गया है। अगर आज से एक हजार साल बाद कोई आर्कियोलॉजिस्ट हो गए, जो आज की किसी शताब्दी की संस्कृति के बारे में संशोधन कर रहे हैं, तो वो देखेंगे कि ऐसी क्या चीज़ है जिस पे लोग बहुत सारा… इस शताब्दी की सबसे विशेष चीज़ क्या है अगर देखें ये तो? अगर प्राचीन समय से कोई मटका मिल जाता है, कोई लकड़ी मिल जाती है, इस समय के लोग ऐसी चीज़ें बनाया करते थे, उससे हम जानते हैं।
तो आज के समाज में एक ऐसी चीज़ है जो बहुत हम सब बनाते हैं, उसके लिए बहुत पैसा भी खर्च करते हैं, और वो क्या है? मूवी! एक-एक मूवी पर करोड़ों रुपए खर्च होते हैं। और यह क्यों बना रहा है? क्योंकि मनोरंजन के लिए इतनी ज़रूरत है लोगों के लिए कि करोड़ों की मात्रा में हम पैसे खर्च करते हैं।
आत्ममीयता, अंधश्रद्धा और नियंत्रण की चाह
पर केवल लोग क्रिकेट देखते हैं मनोरंजन के लिए नहीं देखते हैं, उसके साथ-साथ क्या होता है? भारत की टीम के साथ एक हमारी आमीयता होती है, प्रास्तव होता है।
मैं ऑस्ट्रेलिया में था जब क्रिकेट वर्ल्ड कप चालू हो गया था, तभी ऑस्ट्रेलिया की जो टीम थी, वो कुछ साल पहले तक तो क्या? बहुत ऑस्ट्रेलियन लोग जो हैं, वो पूरा स्लेजिंग करती है, वो बहुत आक्रामक होती है। तभी ऑस्ट्रेलियन टीम जो है, उसमें भी यद्यपि वो ऐसे हैं, उनमें से अलग-अलग लोगों के, अलग-अलग प्लेयर्स के अलग-अलग सुपरस्टिशन्स होते हैं, अंधश्रद्धा होती है।
एक ऑस्ट्रेलियन टीम का बड़ा बैट्समैन था, वो जब भी बैटिंग करने जाता था, तो वो बैटिंग करने के जाने के पहले सबसे पहले पवेलियन के जो रेस्टरूम होते हैं… आपको पता है रेस्टरूम क्या है?
मैं कनाडा में गया था, वहाँ पर एक भारतीय विद्यार्थी आया था, वहाँ पर आया था मेरा लेक्चर। लेक्चर के हॉल में वो कोई ऐसे छोटे गाँव से आया था। तो वहाँ पर अभी कनाडा में विद्यार्थी आ गया था, मैं बस कोई बहुत है… तो उसको मेरे वो देखा… तो उसको लगा रेस्ट करने के लिए रूम चाहिए, आपको यहीं पर आप रेस्ट कर सकते हैं। समझाया नहीं वो, पर वह रेस्टरूम जो है, वो क्या करता है? बैटिंग करने के पहले वो रेस्टरूम में आ रहा था और वहाँ पर जो भी कमोड है, वो कमोड का लिड होता है, ढक्कन होता है, वो बंद कर रहा था!
और अगर बैटिंग करने में कभी जल्दी आउट होता है—अच्छा बैट्समैन था, कभी जल्दी आउट होता था—तो पहले वो पवेलियन में नहीं आ रहा था, वो रेस्ट में नहीं आ रहा था और कोई भी कमोड खुला होता है, कमोड का ढक्कन खुला होता है, तो फिर अपने बाकी के टीम प्लेयर को जाकर डाँटता था—”नहीं खुला, क्यों नहीं खुला? उसके लिड में आउट होता है अभी!”
अभी वो कमोड के लिड का ढक्कन खुले होना और उसके आउट होना का कुछ संबंध नहीं है, पर ऐसा के लिए विचार कर रहा है वो?
मैं ऑस्ट्रेलिया के उदाहरण से यह समझा रहा हूँ कि ऑस्ट्रेलिया की जो टीम है, वो 10-15 साल पहले वो बहुत ही टफ टीम है, जी प्लेयर बड़े एग्रेसिव थे। उनका एक कैप्टन था, वो हमेशा अपने पॉकेट में एक रुमाल रखता था और वो आधा अंदर-आधा बाहर था, और बहुत अच्छा फील्डर था। पर कभी कैच ड्रॉप कर देखा था, तो पहले बॉल क्यों देखने के लिए रुमाल क्यों देता था? रुमाल गिर गया था, कैच ड्रॉप कर देखा था!
तो अभी यह लोगों में ऐसे अंधश्रद्धा क्यों है? तो क्या है? यह अंधश्रद्धा नहीं है, वास्तव में एक तरह से अंधश्रद्धा है, पर इसके पीछे कुछ कारण है। सबके जीवन में, कोई भी जब हम कार्य करते हैं, कुछ चीज़ें हमारे नियंत्रण में नहीं होती हैं। तो स्पोर्ट्स में भी परफॉर्मेंस मैटर्स! परफॉर्मेंस इज नॉट ऑल। आप कितना भी अच्छा खेलो, अगर मैच के दौरान में बारिश आ गया, तो फिर आपके अच्छे खेलने का कुछ नहीं होने वाला है!
जीवन भी एक गेम है: नियंत्रण और स्वीकृति
जब मैं ऑस्ट्रेलिया में था, तो अभी मेरा एक मित्र है लंदन में, भक्त। उनका एक मित्र था जो भक्त नहीं था, वो भारत से आया था। वहाँ पे इंडिया-पाकिस्तान का जो मैच होने वाला था, उसके पहले वो आया था मैच देखने के लिए।
पर क्या हुआ था? अभी बारिश कब आया था, कितना आया था? तो कई मैच, दो-तीन मैच वाइप आउट हो गए थे। और अभी उस समय भारत-पाकिस्तान के मैच के लिए उसमें जो टिकट खरीद रहा था, वो दो हजार पाउंड्स का टिकट था! दो हजार पाउंड्स मतलब लगभग दो लाख रुपए! एक मैच के लिए दो लाख रुपए का टिकट खरीद रहा था। और तो क्या हो गया था? वो ICC का पॉलिसी है कि अगर कोई मैच वाइप हो गया बारिश से, तो वो टिकट का पैसा वापस करते हैं—एक भी बॉल होगा तो एक भी पैसा नहीं देगा! पर… पर बिल्कुल एक भी बॉल नहीं होगा, तो फिर क्या होगा? तो सारा पैसा वापस करते हैं।
पर क्या हो गया? जिसने वो टिकट खरीदा है, उसको उसी जगह पे उतना ही उसको पैसा देगा, पर इसने ये टिकट तो ब्लैक में खरीदा था, तो भी कुछ भी मिलना नहीं था!
तो इसलिए ये वेरे विदर के… नहीं, इसको वक्त… इसको फोन किया, बोला—”तुम तो भक्त हो नहीं, तुम तुम्हारे भगवान से प्रार्थना करो कि बारिश ना हो!”
तो कहने का तात्पर्य यह है कि स्पोर्ट में भले ही प्लेयर को अच्छा प्रैक्टिस करना पड़ता है, अच्छा परफॉर्मेंस करना पड़ता है—परफॉर्मेंस मैटर्स, बट परफॉर्मेंस इज नॉट ऑल दैट मैटर्स! परफॉर्मेंस के परे भी कोई चीज़ है, जो बड़ी महत्वपूर्ण होगी और वो क्या है? यह एक तरह से कह सकते हैं… वो है जो भी है, उसको संतुष्ट करने का प्रयास करते हैं। कोई ऐसे कमोड का लिड बंद करने का प्रयास करता है, कोई करचीफ रखता है, कोई बैट्समैन है वो पवेलियन में आते हैं, जो फील्ड में आते हैं, सबसे पहले वो जो बाउंड्री लाइन के ऊपर आकर अपना राइट पैर आगे नहीं, लेफ्ट पैर आगे… कोई आएगा, सबसे पहले वो पिच पर आने के पहले ऊपर सूर्य देव की ओर देखकर, जय श्री राम… तो अलग-अलग लोग जो हैं, अलग-अलग तरह से जो अननोन हैं, जो अनकंट्रोलेबल है, जिसका हम जानते नहीं हैं, उस पर नियंत्रण करने का प्रयास करते हैं।
तो एक तरह से जो हम स्पोर्ट्स में देखते हैं, वो वास्तव में हमारे जीवन में भी करते हैं कि लाइफ इज लाइक गेम! हमारे जीवन में भी कुछ चीज़ें हमारे नियंत्रण में हैं और कुछ चीज़ें हमारे नियंत्रण में नहीं हैं। तो जो हमारे नियंत्रण में नहीं है, वो क्या है? वास्तव में अभी जो क्रिकेटर लोग हैं, वो पता नहीं है इसका है क्या है, पर वो जो दूसरी चीज़ें जो मेरे नियंत्रण में नहीं है, उसको मैं नियंत्रित कैसे कर सकता हूँ? उसको नियंत्रित नहीं कर सकता हूँ, तो कम से कम उसको संतुष्ट कैसे कर सकता हूँ जिसके द्वारा जो मेरी इच्छा है, उसके लिए कार्य हो, मेरे कार्य में कुछ व्यत्यय ना आए?
हम सब जब जीवन जी रहे होते हैं, तो हम सब के जीवन में कुछ चीज़ें हमारे नियंत्रण में हैं, कुछ चीज़ें हमारे नहीं हैं। और कभी-कभी ऐसे होता है कि हम हमारे तौर से पूरा प्रयास कर लेते हैं, पर फिर भी अगर हमारी क्षमता, हमारी शक्ति के परे कोई चीज़ आ जाती है, जिससे हमें कोई यश नहीं मिलता है, तो हमने बैट्समैन ने कितना भी अच्छा प्रयास किया है, तैयारी की है, कितने अच्छे फॉर्म में हैं, पर अगर बारिश आ गई तो कुछ नहीं कर सकते हैं!
तो हमें हमारे आज अगर हम देखते हैं, आजकल बहुत से लोगों को डिप्रेशन होता है। वो डिप्रेशन का क्या कारण हो सकता है? पर एक कारण यह होता है उसमें कि जो हमारे मन के अनुसार नहीं हो रहा है, उसको हम स्वीकार नहीं कर पाते हैं!
अरे! इसने ऐसे क्यों किया? मुझे इतने मार्क्स क्यों नहीं मिले? मैंने ऐसे किया, उसका मुझे फल क्यों नहीं मिला?
तो कुछ चीज़ें हमारे नियंत्रण में नहीं हैं। जब भगवद्गीता हमें बताते हैं—सुख-दुःख समे कृत्वा—कि जो आपके नियंत्रण में नहीं है, तो तभी आपको यशो देते हैं, तभी आपको आप यशो देते हैं।
जो अच्छे स्पोर्ट्स प्लेयर होते हैं, ना केवल वो अच्छा स्पोर्ट्स खेल सकते हैं, पर वो जानते हैं कि कितना भी अच्छा मैं खेलूँ, कभी मैं जीतूँगा, कभी मैं हारूँगा। उसके बावजूद वो खेलते रहते हैं। इसे अभी कहते हैं—जीतेंगे तो दुखी होंगे, हारेंगे तो दुखी होंगे, पर उसके बावजूद आगे बढ़ता है।
जो अच्छे स्पोर्ट्स प्लेयर होते हैं, वो जानते हैं कि द गेम इज बिगर दैन विनिंग ऑर लूजिंग! जो क्रिकेट है, वो खेलना जीत-हार से ज्यादा महत्वपूर्ण है। हार के जितना तो चाहते हैं, हारना कोई नहीं चाहता है, पर क्रिकेट खेलना और महत्वपूर्ण है, हार भी है तो कल जीत सकते हैं।
तो इस तरह से हमारे जीवन में यश आएगा, अपयश आएगा, हमें समझना है। कभी-कभी मेरी क्षमता के परे ऐसे परिस्थितियाँ आ जाएगी जिसके कारण मुझे यश नहीं मिलेगा और अगर वैसे हो गया, तो मुझे हताश नहीं होना है, मुझे आगे बढ़ते रहना है।
प्रश्न और उत्तर सत्र
चार चीज़ें अच्छे क्रिकेट से हम चार चीज़ें सीख सकते हैं, उसको अच्छा कर रहे हैं। तो यह पहला चीज़ था कि जैसे क्रिकेट में भी अपने प्रयास के परे कुछ होते हैं, जिसे पर नियंत्रण नहीं होता है और इस पर तो उसे हमें स्वीकार करना चाहिए। कभी हमें जीवन में यश-अपयश रहे हैं, तो उसे स्वीकार करना चाहिए।
हर एक पॉइंट से, हर पॉइंट के बारे में थोड़ा विराम लेके, बड़ा पॉज लेके हम कुछ पॉइंट आंसर करेंगे और फिर आगे बढ़ेंगे। किसी को कोई सवाल है? अपने तक…
टैलेंट बनाम टेंपरमेंट: सचिन और विनोद कांबली की कहानी
दुनिया में दो प्रकार के लोग होते हैं—कुछ लोग बुद्धिवान होते हैं और कुछ उसके विपरीत होते हैं। उसके विपरीत क्या है? उसके विपरीत कौन है? बुद्धि जो है, ऐसे लोग होते हैं… डम जो होते हैं!
तो अभी जब जो स्पोर्ट्स प्लेयर्स खेलते होते हैं, तो कभी क्या होता है? कुछ ऐसे स्पोर्ट्स प्लेयर्स होते हैं, बहुत इंपल्सिव होते हैं। इंपल्सिव होते हैं मतलब क्या है? अभी आपके टीम के माध्यम से अच्छा चल रहा है, पर वो एक-एक रन खेल के लिए जीत सकते हैं, पर क्या होता है तभी? “मैं दुनिया को दिखाऊँ!” उनके साथ चर्चा मानना चाहते हैं और वो चर्चा मान जाते हैं और आउट होते हैं। तो क्या होता है? इसको कहते हैं—प्लेइंग फॉर द टीम, नॉट फॉर द गैलरी!
प्लेइंग फॉर द गैलरी मतलब क्या? कि गैलरी में सब लोग बैठे हुए हैं, देख रहे हैं, वो वाह-वाह करेंगे और आपने कितना सिक्सर मारा, मान लो। पर वही लोग क्या है? अगर आप आउट हो जाओगे, तो कोई सपोर्ट नहीं है!
तो स्पोर्ट्स में भी क्या लगता है? बुद्धि को एक सेल्फ कंट्रोल लगता है। अभी कोई क्रिकेटर प्ले करता है, तो चाहता है कि मैं बहुत अच्छा खेलूँ और सब मेरी वाह-वाह करेंगे, सब मेरा गुणगान करेंगे। कोई स्वाभाविक है, हर प्लेयर चाहता है। पर तभी अगर वो एक कोई इरेस्पॉन्सिबल शॉट खेल देता है और आउट भी होता है, तो फिर कई बार ऐसे होता है कि कोई मैच जीत रहा होता है और एक बुरा शॉट खेलता है, कोई उससे जीतती बाजी है तो उसको क्या कहते हैं? इंपल्स कंट्रोल!
कि हम सब में ऐसे इंपल्स आते हैं। तो क्रिकेट में भी… क्रिकेट यह एक खेल है, पर खेल में भी किसी वाच्छा मानना है, आपको देखना है परिस्थिति क्या है? उसके लिए ठीक है? तो उसके लिए क्या है? अगर मैं ये शॉट मारूँगा तो मुझे इतना अच्छा होगा, सब लोग वाह-वाह करेंगे, पर मैं एक-एक खेलूँगा तो बिना के लिए उसके हम जीत जाएंगे।
तो एक छक्का मारना महत्वपूर्ण है? जीतना महत्वपूर्ण है? कौन सा महत्वपूर्ण है? जीतना महत्वपूर्ण है!
तो ये है शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म—जो तुरंत मुझे प्राप्त हो सकता है या मुझे धीरे-धीरे कुछ प्राप्त हो सकता है। और यह जो भेद है, यह वास्तव में कोई भी प्लेयर हो, उसको बहुत ज़रूरी होता है। क्योंकि क्या है? एक चीज़ है टैलेंट और दूसरा है टेंपरमेंट!
टैलेंट मतलब प्रतिभा। तो किसी में बहुत टैलेंट है, बहुत अच्छी बैटिंग कर लेता है, पर जो उस किसी भी श्रेष्ठ प्राप्त करता है, वो केवल टैलेंट से नहीं होता है। इसके लिए क्या हम इक्वेशन बोल सकते हैं? टैलेंट + टेंपरमेंट = अचीवमेंट (Achievement)!
हम कुछ प्राप्त करना चाहते हैं, तो केवल टैलेंट से नहीं होता है। इसके लिए क्या हम प्राप्त करते हैं? टैलेंट प्लस टेंपरमेंट लीज टू अचीवमेंट! हम कुछ प्राप्त करना चाहते हैं, तो केवल टैलेंट प्लस टेंपरमेंट लीज पर बेस… अगर वैसे सच्चे शादी हो जाते हैं, तो फिर वो प्रजाइल हो जाते हैं।
तो अभी क्या है कि हम सब में कितना टैलेंट है, वहाँ हम बदल नहीं सकते हैं। अभी बचपन से ही कोई जन्म से कुछ टैलेंट मिल गया है, उसको हम थोड़ा बढ़ा सकते हैं, पर वह टैलेंट को हम ज़्यादा बदल नहीं सकते हैं, जो है, वो है।
पर हम क्या बदल सकते हैं? किस चीज़ को हम इंप्रूव कर सकते हैं? अगर किसी पर बहुत टैलेंट है, तो भाग्यशाली रखते हैं। पर कई ऐसे प्लेयर होते हैं जिनका टैलेंट ज़्यादा नहीं होता है, पर टेंपरमेंट बहुत होता है! शांति से सोच, अच्छा कार्य करते हैं। जब ऐसे खेलते हैं, ऐसे लगते होते हैं, तो वो कई बहुत बड़ा शानदार चीज़ भी कर पाएंगे, पर वो जिम्मेदार चीज़ कर पाएंगे।
जिसका टैलेंट है, वो शानदार कार्य कर सकते हैं। शानदार कार्य करना सबको अच्छा लगता है, पर सब में वो टैलेंट नहीं होता कि वो शानदार कार्य कर सकते हैं, पर जिम्मेदार कार्य हर कोई कर सकते हैं!
कई ऐसे प्लेयर होते हैं, वो एक मैच में जबरदस्त खेलेंगे और फिर अगले 15 मैच कुछ खेल नहीं पाएंगे। और फिर वो सारे टीम, सारे प्रेक्षक, सारे फैंस चाहते हैं कि कब खेले, कब खेले, कब खेले। फिर क्या है? सब वो अगर उनको इंपल्स कंट्रोल नहीं है, तो अब एक अच्छे फॉर्म में लगते हैं, एक मूर्ख जैसे शॉट कर दिया और सब कुछ तो बोलते हैं।
तो हम सब को, हम सब चाहते हैं कि एक अच्छे अचीवमेंट कर पाए।
एक प्लेयर थे जिसको गॉड ऑफ़ इंडियन क्रिकेट कहा जाता है, कौन थे वो? तेंदुलकर जी!
तो जब तेंदुलकर जी, जब वो क्रिकेट कॉलेज लेवल या क्लब लेवल पर खेल रहे थे या महाराष्ट्र रंजी ट्रॉफी के लिए थे लेवल, एक अनदर क्रिकेटर, वो दोनों ने मिलकर लगभग कुछ बहुत बड़ा—600-700 रन की पार्टनरशिप की थी! वो दोनों बड़े स्टार्स बन जाने वाले थे। किसे को नाम पता है उसका?
हाँ, ये—विनोद कांबली! वो अपने बारे में क्रिश्चियन बन जा रहे थे… तो ऐसा लगा था कि ये दोनों, वो इंडियन क्रिकेट पर स्टोन के लिए खेल रहे थे, कि भविष्य में दोनों हमारे देश के बहुत अच्छे बैट्समैन बन जा रहे थे।
तो क्या हुआ? विनोद कांबली भी कुछ समय तक खेल रहे थे इंडिया के लिए, पर वो जितना टैलेंट था, उतना वो शाइन नहीं कर पाए! तो दोनों में टैलेंट था और कुछ-कुछ तभी तो कमेंटेटर बोल रहे थे कि एक कांबली में टेंपरमेंटल से ज्यादा टैलेंट थे।
पर क्या था? क्योंकि अगर कोई टेंपरमेंटल है, तो टैलेंट जो है, वो चलता नहीं है!
और कई बार क्या होता है हमारे जीवन में, हम देखते हैं—अरे, इसके पास अच्छी अच्छा टैलेंट है! कभी कुछ-कुछ ऐसे होते हैं, अगर आप पढ़ाई कर रहे हैं, कुछ-कुछ विद्यार्थी ऐसे होते हैं, एक-दो बार पढ़ लेते हैं, तो याद जाते हैं उनको, जैसे तो पाद… छह बार पढ़ना पढ़ना पढ़ते हैं, दस बार पढ़ते हैं, फिर भी याद नहीं जाते हैं। अब ये टैलेंट अगर किसी के पास नहीं है, तो है। और अगर हम अच्छा करते हैं, इसके भी इतना टैलेंट है, मेरे पास टैलेंट नहीं है, अभी उसको हम पढ़ नहीं सकते हैं। और कई बार हम टैलेंट पर ही आते हैं—मेरे पास टैलेंट है या नहीं है—और उससे हम सोचते हैं कि मेरा भी जीवन ऐसे हुआ है या ऐसे नहीं हुआ है।
पर टैलेंट को भले ही हम बदल नहीं सकते हैं, पर टैलेंट से ही अच्छा जीवन नहीं बनता है, टेंपरामेंट से बनता है! टेंपरामेंट से बनता है मतलब क्या है? हम कितना परिपक्वता से आप रहते हैं, कितना हम शांतता से विचार करके कार्य करते हैं।
मन में, मेरे एक मित्र हैं, वो क्रिकेट कोच हैं, तो बता रहा था कि जब वो ऐसे कई बार होते हैं, टैलेंट स्काउट होते हैं—कौन अच्छा प्लेयर, कौन अच्छा बैटिंग करता है, कौन अच्छा खेलता है—वो टैलेंट स्काउट को देखते हैं। वास्तव में हम टैलेंट स्काउट नहीं करते हैं, टैलेंट स्काउट और टेंपरमेंट स्काउट करते हैं! हम देखते हैं कि इसके पास कितना टेंपरमेंट है। और जो टेंपरमेंट है, उसका हम विकास कर सकते हैं और कैसे कर सकते हैं? हमारे टेंपरमेंट का विकास है कि जिंदगी बहुत बड़ी है।
मानने दो दृष्टिकोण हो सकते हैं कि जिंदगी एक सौ मीटर के एथलेटिक स्प्रिंट के समान है। सौ मीटर आप दौड़ो, एक सिटी बजते हैं और 2-3 सेकंड में सब कुछ खत्म जो जाते हैं, 5-10 सेकंड में, जो भी है। और मानने दिए कोई 10 मील का मैराथन है। तो भी हमारी जिंदगी कैसे है? एक स्प्रिंट है या मैराथन है? मैराथन है!
क्या है? जब आप सोचते हैं कि स्प्रिंट के समान में जिंदगी है, तो तो ये एक चीज़ हो गया, तो हमारा जीवन ऐसे से हो गया और एक चीज़ नहीं हुआ तो भी सारा जीवन ऐसे नहीं है, एक चीज़ में यश नहीं मिला तो भी ठीक है, इतना भी एक्साइटेड होंगे जो तुम्हें आगे बढ़ो।
जो शांति से हम कार्य करते हैं, जो टेंपरामेंट होता है, उससे व्यक्ति बहुत आगे बढ़ सकता है। और ये जो हमारा जिंदगी बहुत बड़ी है और आध्यात्मिक विश्व से हम जो भी पढ़ गए, तो जब कोई व्यक्ति ध्यान करता है, जब करता है, आध्यात्मिक ज्ञान का चिंतन करता है, तो जितना भी टैलेंट कम हो, उनका टेंपरामेंट अच्छा हो जाता है।
खेल की शुचिता और नियमों का महत्व
और अब, जब भी अगर कोई क्रिकेट मैच, कोई अच्छी टीमें एकाएक बुरा खेलने लगते हैं, हारने लगते हैं, तो हारने लगते हैं, तो लोग क्या कहते हैं? “इसने ये क्या है? मैच फिक्सिंग क्या है?”
अभी मैच फिक्सिंग जब होता है, तो अगर क्यों को पता जाता है मैच फिक्सिंग हुआ, तो लोगों को बहुत गुस्सा आते हैं। मैच फिक्सिंग मतलब क्या हो रहा है? कि जब भी कोई स्पोर्ट्स खेलता है, तो उसमें क्या होता है? अगर कोई रूल्स के अनुसार नहीं खेलता है, तो क्यों को खेल का आनंद देने के लिए, सबको रूल्स के अनुसार खेलने के लिए… खेलने के लिए… खेलने के लिए… खेलने के लिए… तो क्या होता है? तो फिर वो खेलने के लिए आनंद देने नहीं आता है।
मान लीजिए बैट्समैन है, वो चौके पर छक्के मारते जा रहा है और बॉलर बॉलिंग कर रहा है और बैट्समैन मारते जा रहा है, तो बॉलर को गुस्सा आता है, और बॉलर यहाँ पिच पर आता है और यहाँ पर रुक्के बॉल नहीं करता है, यहाँ पर भागते आता है, भागते आता है, बैट्समैन को बाजू कर खेल लेता है और स्टंप को उड़ा लेता है!
स्वीकार्यता: जीवन में अनिश्चितताओं (जैसे खेल में बारिश) को स्वीकार करना और हताश हुए बिना आगे बढ़ते रहना ही सच्चा दृष्टिकोण है।
जीवन और खेल: क्रिकेट या कोई भी खेल सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि हमारे वास्तविक जीवन का एक लघु रूप (Reflection) है जहाँ प्रयास और अनियंत्रित परिस्थितियों के बीच संतुलन जरूरी है।
टैलेंट बनाम टेंपरमेंट: जन्मजात प्रतिभा (टैलेंट) से अधिक महत्वपूर्ण मानसिक स्थिरता और परिपक्वता (टेंपरमेंट) है, जो दीर्घकालिक सफलता तय करती है।
जीवन के खेल में नियम और सामाजिक व्यवस्था
अभी आप सब यहाँ पर बैठे हो, आप सबको काफी हद तक यह विश्वास है कि आपके बाजू में जो व्यक्ति बैठा हुआ है, वो अचानक आपको मुड़कर थप्पड़ मारने वाला नहीं है। अब यह संभावना है कि वो मार सकता है, पर आप सब इतने सोशलाइज्ड हो कि ऐसा कार्य नहीं करोगे। तो यहाँ पर ‘सोशलाइज्ड होना’ मतलब क्या? एक तरह से कि सोसाइटी में किस तरह से बर्ताव करना चाहिए, किस तरह से बर्ताव नहीं करना चाहिए, यह समझना चाहिए।
तो यह अलग-अलग जगह पर थोड़ा बहुत अलग-अलग होता रहता है, पर हर सोसाइटी में हमको सोशलाइज्ड होना पड़ता है। तो अब यह चूहे भी होते हैं, वो जब खेल रहे हैं, तो क्या होता है? छोटा चूहा बार-बार हार जाता है जो खेल रहे हैं, तो इसलिए एक अनस्पोकन रूल जैसे होता है चूहों में भी—कि मैं भले ही हमेशा जीत सकता हूँगा, पर मैं जीतूंगा नहीं! क्योंकि मैं जीतूंगा बार-बार, तो फिर ही खेलेंगे दूसरे से।
दूसरे से क्या है? थोड़े बच्चे जो होते हैं, जो बड़े होते हैं, अगर बच्चे नहीं खेलते हैं, तो जीतना चाहते हैं। पर अगर वो कोई, वो बहुत ज्यादा जिद्द करते हैं, बहुत जोर करते हैं, दूसरे को इंजर कर लेते हैं, गिरा देते हैं, अगर उससे जीतते हैं, तो बाद में क्या होता है? बाद में बच्चे उससे नहीं खेलना चाहते हैं।
और ऐसे जो बच्चे होते हैं, जिससे कोई दूसरे बच्चे खेलना नहीं चाहते हैं, फिर वो बच जाते हैं, और लगभग चार-पाँच साल में ये बच्चे होते हैं… लगभग अगर तभी वो सोशलाइजेशन स्टेज नहीं आ गई है, तो फिर वो पंद्रह-सोलह साल के जब वो हो जाएंगे, तब तक वो… उससे कहते हैं—जुवेनाइल डेलिंक्वेंसी (Juvenile Delinquency)! मतलब वो… वो गलत कार्य पर चल जाएंगे, वो नशा करने लग जाएंगे, गुनाह भी करने लग जाएंगे, वो क्रिमिनल प्रेडिक्टर हैं।
नियमों का महत्व और जीवन का अनुशासन
तो क्या जब नहीं खेलने… मैं उदाहरण क्यों दे रहा था यह सब? इससे विशेष प्ले कर रहा था कि जब हम खेल रहे होते हैं, हर एक चीज़ में अच्छी तरह से कार्य करने के लिए कुछ नियम होते हैं, और जो उन नियमों का पालन करता है, वो नियमों के पालन में ही आपको संख्या…
बॉलर को यहीं से बॉल करना है, एक कदम भी आगे अगर जाता है, तो वो बॉल का नो-बॉल बन जाता है! वो बॉल है, बॉल यहाँ पर गया भी है, फिर भी नो-बॉल है। तो क्या है कि नियम का पालन करना बड़ा ज़रूरी होता है, और नियम क्या करते हैं? हमको एक फ्रेमवर्क देते हैं, एक ऐसी रचना देते हैं, जिसमें हम हमारी प्रतिभा दिखा सकते हैं। अगर नियम ही नहीं है, तो फिर क्या होता है? जो ज्यादा दादागिरी कर सकता है, ज्यादा जो दिखाता है, वो अपनी बात लगा जाएगा। पर ऐसा होगा तो उसमें कोई मज़ा नहीं है!
तो उसी तरह से हमारा जीवन होता है, क्योंकि बहुत से लोग कहते हैं कि हमको कोई नियम नहीं चाहिए। पर शास्त्र में हमें नियम यही है—जो आप यह कार्य करो, यह कार्य मत करो। और यह नियम है, इसलिए नहीं है कि हमें सुख से दूर रखना है। वास्तव में नियम हमें अभी सुख देते हैं, पर बाद में वो परेशानी नहीं लाते हैं।
गीता में बताते हैं भगवान—यत् तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्—कि जो पहले विष जैसे लगते हैं, पर बाद में अमृत के समान होते हैं। तो ऐसे नियमों से भले ही अच्छा है चाहे कि आप दूर… यह दूर रहना जो है, यह नियम है। वास्तव में उसके द्वारा व्यक्ति अच्छी तरह से सक्रिय रह सकता है।
बिना नियमों की आज़ादी और आधुनिक समाज के दुष्परिणाम
मैं भी कुछ समय पहले न्यूज़ीलैंड में था। तो मैं तभी मैं जो लेक्चर दिया था, वो था—अच्छी न्यूज़ीलैंड में डाइवोर्स रेट्स नहीं बढ़ रहे हैं, क्यों? लेकिन मैरिज रेट्स गिर रहे हैं! वो लोग शादी नहीं करते हैं वहाँ।
तो अभी शादी नहीं करते हैं, तो फिर परिवार साथ में नहीं होता है, पर जो बच्चे होते हैं, बच्चों को कोई पालन करने वाला नहीं होता है। और तो जो होता है, ऐसे पूरा जनरेशन है, जो अमेरिका में 1930 चालू हो गया था, पर 1960 के लिए ज्यादा हो गया है, उसको बोलते हैं—सेक्सुअल रेवोल्यूशन (Sexual Revolution)!
सेक्सुअल रेवोल्यूशन मतलब क्या है? कि ये लोग बिना किसी नियम के किसी का भी कभी भी संबंध करेंगे और तभी उनका ऐसे भाव था कि इससे जो पहले हमको धर्म ने नियंत्रित किया था, हमको संकुचित करेंगे, तो हमसे सब छुटकारा पाके हम भोग करेंगे, आज़ादी प्राप्त करेंगे, सुख प्राप्त करेंगे। पर जो 1960 से जनरेशन है, जो पीढ़ी है, उसको अगर हम 1980, 1990, 2000, 2010 में अगर देखते हैं, तो क्या होगा? वो ही लोग ऐसे हैं, सबसे ज्यादा डिप्रेस्ड, सबसे ज्यादा रोगी हैं!
और उस… अभी इसका वीडियो, अभी दुनिया में लोग परिवार बनाकर, परिवार चलाना… उत्तमत के आगे तो सदियों से बढ़ा रहे हैं, पर ये 1960 से जनरेशन के जो बच्चे हैं, उनमें भी क्रिमिनलिटी, ड्रग एडिक्शन यहाँ…
अगर क्रिकेट में भी नियम ही नहीं है, तो फिर क्रिकेट में एक अच्छा बैट्समैन, एक अच्छा बॉलर दिखाएगा कैसे है? सब नियम के साथ खेलते हैं! तो अरे, मैं नियम के साथ बॉल कर रहा हूँ, वो ऐसे बॉल कर रहा है और वो इतना अच्छा बॉल दिखा रहा हूँ, या मैं उससे अच्छा बॉल कर रहा हूँ… तो हमें नियम नहीं है, तो फिर क्या बताए? हम खुद को फंसा लेते हैं, फंस जाते हैं! नियम नहीं है, तो हमारे जीवन को एक रचना नहीं है, और अगर रचना नहीं है, तो फिर हम इतने सारे परेशानियों सामने आ जाते हैं, उससे फंस जाते हैं।
ऑर्डर और फ्रीडम: भारत और पश्चिमी देशों का दृष्टिकोण
मैं ऑस्ट्रेलिया में था, तो एक भक्त है, वो डॉक्टर है, उसके घर में रहा था मैं। तो वो बता रहे थे कि पाश्चात्य देश के जो डॉक्टर होते हैं, उनको बहुत भय होता है कि उनका पेशेंट खिलाफ कोई केस करते हैं। अगर डॉक्टर भाग्यवान है, तो उसको तीन साल में एक केस होता है; अगर भाग्यवान होता है, अगर दुर्भाग्य है, तो तीन महीने में एक केस हो जाएगा, और बहुत परेशानी होती है!
यहाँ पे डॉक्टर को ऑप्शन नहीं देना है, डॉक्टर को प्रिसक्रिप्शन देना है। अगर डॉक्टर अगर इस पेशेंट को बोलता है, तो तुम चुनाव… तो तुम पेशेंट करने के लिए चुनेगा… चुनाव नहीं करता है… तो क्या है? पेशेंट कंफ्यूज हो जाता है, पेशेंट ओवरवेल्मड हो जाता है!
हाँ, मैं कभी एक जनवरी में हम अमेरिका से लगभग 25-30 लोगों को लेकर गए थे, जो बिल्कुल वो इंडिया की परिस्थिति नहीं थे और वो दिल्ली में आए, एयरपोर्ट से बाहर निकले और परिस्थिति नहीं थे वहाँ पे।
अमेरिका में जो ड्राइविंग करते हैं, एक चीज़ है—अगर 5-6 महीने मैं अमेरिका में रहता हूँ, मैं साल में लगभग 8-10 महीने भारत से बाहर रहता हूँ—तो जब पाश्चात्य देश से भारत में आता हूँ, तो एक चीज़ होता है कि यहाँ पे हमको पाश्चात्य देश में कोई हॉर्न में जाना है… कोई भी साउंड पॉल्यूशन करते हैं, इसको आप धुनको बुशित मत करो। और जब कोई हॉर्न बजाता है, इसका मतलब क्या है? दूसरी व्यक्ति ने इतनी बड़ी गलती की है! तो अगर कोई व्यक्ति आपके ओर हॉर्न बजाता है, मतलब उसने आपका अपमान किया है कि मुझे ड्राइविंग आता है तो मुझे हॉर्न बजा रहे हैं। तो कोई हॉर्न में भी आता है, तो क्या है? सब बहुत ही जो लोग कहते हैं, हमको सारा फ्रीडम चाहिए, हमको ये जैसे करना है, ये कार्य करना है, वैसे कार्य करना है, वैसे कार्य करना है। पर वहाँ लोग भी वो रोड पर बिल्कुल नियमों के साथ कार्य करते हैं!
अगर इतने अच्छे साथ ड्राइविंग करते हैं कि हॉर्न भी बजाने की जरूरत नहीं होती है। पर भारत में ना केवल हॉर्न बजाते हैं, पर हर गाड़ी पर लिखते हैं—‘हॉर्न प्लीज’! मतलब क्या है? “तुम मुझे टक्कर मत दो, पहले हॉर्न तो बजाओ, मैं बाजू में कौन दूँ?”
तो क्या है कि यहाँ पर भी ऑर्डर है, पर यह क्या है? इंडिया में ऑर्डर पे ऑर्डर होता है, वो ऑर्डर है, पर कैसा ऑर्डर है? वो सादर समझी नहीं है, सब लोग चलते हैं बदपात सही। अगर नियम पालन नहीं करेंगे, तो हम रोड पर चल नहीं पाएंगे!
अगर नियमों के पालन से हमको सुख मिलता है, तो सभाई तोड़ती हमारे नियमों के पालन ना करना क्यों होते हैं? क्योंकि नियमों के पालन करने से सुख मिलता है, उसको प्राप्त करने के लिए कुछ समय लगता है।
अगर नियमों के पालन करने से सुख मिलता है, तो उसको प्राप्त करने के लिए कुछ समय लगता है… उसके बाद में उसको प्राप्त करते हैं, तुम्हारा नाम क्या है? और फिर वो अपना नाम लिखता है और जब अच्छा मेरा नाम ऐसे लिखते हैं, बड़ा कुछ होते हैं, सब हो जाते हैं, तो पता है मेरा नाम ऐसे लिखते हैं और दिखते हैं। तो जब वो सीख जाता है, तो उसमें एक आनंद है, पर वो सीखने के लिए उसको प्राप्त करना होता है।
मॉल दाई छोड़ो, मैं मेरे खिलौने खेलते रहूंगा, मेरे गन के साथ, मेरे ट्रक के साथ खेलते रहूंगा, तो वो आसान है। तो क्या है कि नियमों के पढ़ाई करने में एक नियम लगता है—तो हाथ ऐसा हिलाओ, ऐसे मत हिलाओ, यह लिखना है, तो यह ऐसे लिखना है, यह ऐसे नहीं लिखना है—तो नियम है एक दर्शन। तो नियमों से यह सुख मिलता है, उसको थोड़ा सब्र लगता है, उसको थोड़ा अनुशीलन लगता है, उसको जाने के लिए। पर उसके विपरीत हमको लगता है कुछ शॉर्टकट में सुख मिल जाएगा, उसको, तो इसलिए हम उसके लिए जाने के प्रयास करते हैं, फंस जाते हैं।
कोई और सवाल नहीं किसी का? तो यहाँ और पॉइंट होगा, इसके बारे में हम और कोई सवाल के प्रश्न से आंसर करेंगे।
इंडिविजुअल स्पोर्ट्स बनाम टीम स्पोर्ट्स
जब कोई भी हम कोई भी स्पोर्ट्स… जब हम खेल रहे होते हैं, तो उसमें क्या आता है? कि अभी दो प्रकार के स्पोर्ट्स होते हैं—एक है इंडिविजुअल स्पोर्ट्स (Individual Sports) और दूसरा है टीम स्पोर्ट्स (Team Sports)।
तो कोई इंडिविजुअल स्पोर्ट्स का उदाहरण दे सकता है?
- एथलेटिक्स!
- टेनिस! (टेनिस में भी डबल्स होता है, पर सही नॉर्मल टेनिस सिंगल होता है)
- टेबल टेनिस हो सकता है!
- चेस हो सकता है!
तो ऐसे जो हैं, इंडिविजुअल स्पोर्ट्स हैं। तो क्रिकेट क्या है? क्रिकेट कि एक… आपको दौड़ना क्या है? जितना का… उपयुक्त टीम… क्रिकेट कि ओपुल… एक जो है, टीम स्पोर्ट्स है!
अगर हम तुलना… हाँ, कि क्रिकेट की तुलना जीवन से कर रहे हैं, तो हमारे जीवन क्या है? ये इंडिविजुअल स्पोर्ट्स हैं या टीम स्पोर्ट्स हैं? कई लोग सोचते हैं कि नहीं, किशोम्बी समझ आइजिनल्स पार्ट हैं। इंडिविजुअल स्पोर्ट्स कैसे हैं? हर किसी को अपना परफॉर्मेंस करना है। पर हम सबको जो परफॉर्मेंस करना है, वो दूसरे लोगों के साथ करना है।
नो पर्सन इज एन आइलैंड (No person is an island).
एक बार एक नास्तिक था, बड़ा विचारवान, एक तत्वज्ञानी था, उसको पूछा गया—”क्या आप नर्क में विश्वास करते हो?” अल्बर्ट कामू, स्राम पोर, तो वो रहे हैं? “हाँ, बिल्कुल।”
आप नास्तिक था, तो नर्क में कैसे था? नर्क क्या संकल्पना है? Hell means other people. नर्क मतलब क्या? दूसरे लोग!
तो क्या होता है? जो लोग, जो दूसरे से अच्छा संबंध नहीं रख सकते हैं, दूसरे से मैं झगड़ा करते रहते हैं, तो क्या होता है? दूसरे लोग नर्क के समान हैं।
मैं एक प्रोग्राम पर जा रहा था, मैं जिस कार में भक्त में लेकर जा रहा था, उसके आगे दूसरे एक कार था, उसके बम्पर में एक स्टीकर था—“जितना मैं लोगों को जानता हूँ, उतना मुझे अपना कुत्ता और प्रिय लगने लगता है!”
मतलब क्या है? लोग इतने बुरे हैं और मेरा कुत्ता इतना अच्छा! क्या होता है? कई बार लोगों को संबंध रखना बड़ा मिस्टेक नहीं होता है, और हाँ, कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो बहुत घनिष्ठ संबंध चाहते हैं, कुछ लोग ऐसे चाहते हैं, तो दूसरे संबंध रखते हैं—इंट्रोवर्ट, एक्सट्रोवर्ट, ऐसा कहते हैं इंग्लिश में।
पर क्या है कि जीवन में हमको यश चाहिए, पर हमें ऐसा यश चाहिए, कि दूसरों को भी हम साथ ला सकते हैं। मान लीजिए कि अगर आपको दुनिया की सारी संपत्ति मिल जाए, पर दुनिया में आप अकेले ही हो और कोई भी नहीं हो, तो संपत्ति के लिए करेंगे क्या आप?
तो क्या हो जाएंगे? आपकी सेंट्री हो जाएगी, पर क्या हो जाएंगे? सारा टीम आपसे नाखुश हो जाएगी, सारा देश आपसे नाखुश हो जाएगी! तो क्या है कि जो हमको इनमें टीम स्पिरिट होता है, मतलब क्या? हर प्लेयर अच्छा खेलता है और जो टीम के लिए खेलता है, वैसे जो टीम होती है, वो टीम बड़ी यशस्वी होती है और वो प्लेयर भी यशस्वी होते हैं।
तो हमारे जीवन में भी क्या है कि हम सब इंडिविजुअल हैं, तो जो एक तरह से हम कहते थे आध्यात्मिक संस्कृति है और इंसेंटिव प्राचीन संस्कृति है—तो यह भारत हो, कभी तो कभी हम कुछ होते हैं भारतीय संस्कृति और पाश्चात्य संस्कृति। पर पाश्चात्य संस्कृति भी ऐसे नहीं है कि सब भौतिकवादी है और बुरी है, पाश्चात्य देश में तो प्राचीन संस्कृति जो थी, वो काफी आध्यात्मिक थी। तो तुम्हारा यह भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति में नहीं कर रहा हूँ, आध्यात्मिक संस्कृति और प्राचीन संस्कृति—तो प्राचीन संस्कृति जो थी, वो अधिक टीम-सेंटर्ड थी!
जीवन में खेल, नियम और अनुशासन का महत्व
अभी आप सब यहाँ पर बैठे हो, आप सबको काफी हद तक यह विश्वास है कि आपके बाजू में जो व्यक्ति बैठा हुआ है, वो अचानक आपको मुड़कर थप्पड़ मारने वाला नहीं है। अब यह संभावना है कि वो मार सकता है, पर आप सब इतने सोशलाइज्ड हो कि ऐसा कार्य नहीं करोगे। तो यहाँ पर ‘सोशलाइज्ड होना’ मतलब क्या? एक तरह से कि सोसाइटी में किस तरह से बर्ताव करना चाहिए, किस तरह से बर्ताव नहीं करना चाहिए, यह समझना चाहिए।
तो यह अलग-अलग जगह पर थोड़ा बहुत अलग-अलग होता रहता है, पर हर सोसाइटी में हमको सोशलाइज्ड होना पड़ता है। तो अब यह चूहे भी होते हैं, वो जब खेल रहे हैं, तो क्या होता है? छोटा चूहा बार-बार हार जाता है जो खेल रहे हैं, तो इसलिए एक अनस्पोकन रूल जैसे होता है चूहों में भी—कि मैं भले ही हमेशा जीत सकता हूँगा, पर मैं जीतूंगा नहीं! क्योंकि मैं जीतूंगा बार-बार, तो फिर ही खेलेंगे दूसरे से।
दूसरे से क्या है? थोड़े बच्चे जो होते हैं, जो बड़े होते हैं, अगर बच्चे नहीं खेलते हैं, तो जीतना चाहते हैं। पर अगर वो कोई, वो बहुत ज्यादा जिद्द करते हैं, बहुत जोर करते हैं, दूसरे को इंजर कर लेते हैं, गिरा देते हैं, अगर उससे जीतते हैं, तो बाद में क्या होता है? बाद में बच्चे उससे नहीं खेलना चाहते हैं।
और ऐसे जो बच्चे होते हैं, जिससे कोई दूसरे बच्चे खेलना नहीं चाहते हैं, फिर वो बच जाते हैं, और लगभग चार-पाँच साल में ये बच्चे होते हैं… लगभग अगर तभी वो सोशलाइजेशन स्टेज नहीं आ गई है, तो फिर वो पंद्रह-सोलह साल के जब वो हो जाएंगे, तब तक वो… उससे कहते हैं—जुवेनाइल डेलिंक्वेंसी (Juvenile Delinquency)! मतलब वो… वो गलत कार्य पर चल जाएंगे, वो नशा करने लग जाएंगे, गुनाह भी करने लग जाएंगे, वो क्रिमिनल प्रेडिक्टर हैं।
खेल के नियम और जीवन का फ्रेमवर्क
तो क्या जब नहीं खेलने… मैं उदाहरण क्यों दे रहा था यह सब? इससे विशेष प्ले कर रहा था कि जब हम खेल रहे होते हैं, हर एक चीज़ में अच्छी तरह से कार्य करने के लिए कुछ नियम होते हैं, और जो उन नियमों का पालन करता है, वो नियमों के पालन में ही आपको संख्या…
बॉलर को यहीं से बॉल करना है, एक कदम भी आगे अगर जाता है, तो वो बॉल का नो-बॉल बन जाता है! वो बॉल है, बॉल यहाँ पर गया भी है, फिर भी नो-बॉल है। तो क्या है कि नियम का पालन करना बड़ा ज़रूरी होता है, और नियम क्या करते हैं? हमको एक फ्रेमवर्क देते हैं, एक ऐसी रचना देते हैं, जिसमें हम हमारी प्रतिभा दिखा सकते हैं। अगर नियम ही नहीं है, तो फिर क्या होता है? जो ज्यादा दादागिरी कर सकता है, ज्यादा जो दिखाता है, वो अपनी बात लगा जाएगा। पर ऐसा होगा तो उसमें कोई मज़ा नहीं है!
तो उसी तरह से हमारा जीवन होता है, क्योंकि बहुत से लोग कहते हैं कि हमको कोई नियम नहीं चाहिए। पर शास्त्र में हमें नियम यही है—जो आप यह कार्य करो, यह कार्य मत करो। और यह नियम है, इसलिए नहीं है कि हमें सुख से दूर रखना है। वास्तव में नियम हमें अभी सुख देते हैं, पर बाद में वो परेशानी नहीं लाते हैं।
गीता में बताते हैं भगवान—यत् तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्—कि जो पहले विष जैसे लगते हैं, पर बाद में अमृत के समान होते हैं। तो ऐसे नियमों से भले ही अच्छा है चाहे कि आप दूर… यह दूर रहना जो है, यह नियम है। वास्तव में उसके द्वारा व्यक्ति अच्छी तरह से सक्रिय रह सकता है।
आधुनिक समाज में नियमों की उपेक्षा और उसके परिणाम
मैं भी कुछ समय पहले न्यूज़ीलैंड में था। तो मैं तभी मैं जो लेक्चर दिया था, वो था—अच्छा न्यूज़ीलैंड में डाइवोर्स रेट्स नहीं बढ़ रहे हैं, क्यों? लेकिन मैरिज रेट्स गिर रहे हैं! वो लोग शादी नहीं करते हैं वहाँ।
तो अभी शादी नहीं करते हैं, तो फिर परिवार साथ में नहीं होता है, पर जो बच्चे होते हैं, बच्चों को कोई पालन करने वाला नहीं होता है। और तो जो होता है, ऐसे पूरा जनरेशन है, जो अमेरिका में 1930 चालू हो गया था, पर 1960 के लिए ज्यादा हो गया है, उसको बोलते हैं—सेक्सुअल रेवोल्यूशन (Sexual Revolution)!
सेक्सुअल रेवोल्यूशन मतलब क्या है? कि ये लोग बिना किसी नियम के किसी का भी कभी भी संबंध करेंगे और तभी उनका ऐसे भाव था कि इससे जो पहले हमको धर्म ने नियंत्रित किया था, हमको संकुचित करेंगे, तो हमसे सब छुटकारा पाके हम भोग करेंगे, आज़ादी प्राप्त करेंगे, सुख प्राप्त करेंगे। पर जो 1960 से जनरेशन है, जो पीढ़ी है, उसको अगर हम 1980, 1990, 2000, 2010 में अगर देखते हैं, तो क्या होगा? वो ही लोग ऐसे हैं, सबसे ज्यादा डिप्रेस्ड, सबसे ज्यादा रोगी हैं!
और उस… अभी इसका वीडियो, अभी दुनिया में लोग परिवार बनाकर, परिवार चलाना… उत्तमत के आगे तो सदियों से बढ़ा रहे हैं, पर ये 1960 से जनरेशन के जो बच्चे हैं, उनमें भी क्रिमिनलिटी, ड्रग एडिक्शन यहाँ…
अगर क्रिकेट में भी नियम ही नहीं है, तो फिर क्रिकेट में एक अच्छा बैट्समैन, एक अच्छा बॉलर दिखाएगा कैसे है? सब नियम के साथ खेलते हैं! तो अरे, मैं नियम के साथ बॉल कर रहा हूँ, वो ऐसे बॉल कर रहा है और वो इतना अच्छा बॉल दिखा रहा हूँ, या मैं उससे अच्छा बॉल कर रहा हूँ… तो हमें नियम नहीं है, तो फिर क्या बताए? हम खुद को फंसा लेते हैं, फंस जाते हैं! नियम नहीं है, तो हमारे जीवन को एक रचना नहीं है, और अगर रचना नहीं है, तो फिर हम इतने सारे परेशानियों सामने आ जाते हैं, उससे फंस जाते हैं।
अनुशासन, व्यवस्था और सड़क के नियम: भारत और पश्चिम की तुलना
मैं ऑस्ट्रेलिया में था, तो एक भक्त है, वो डॉक्टर है, उसके घर में रहा था मैं। तो वो बता रहे थे कि पाश्चात्य देश के जो डॉक्टर होते हैं, उनको बहुत भय होता है कि उनका पेशेंट खिलाफ कोई केस करते हैं। अगर डॉक्टर भाग्यवान है, तो उसको तीन साल में एक केस होता है; अगर भाग्यवान होता है, अगर दुर्भाग्य है, तो तीन महीने में एक केस हो जाएगा, और बहुत परेशानी होती है!
यहाँ पे डॉक्टर को ऑप्शन नहीं देना है, डॉक्टर को प्रिसक्रिप्शन देना है। अगर डॉक्टर अगर इस पेशेंट को बोलता है, तो तुम चुनाव… तो तुम पेशेंट करने के लिए चुनेगा… चुनाव नहीं करता है… तो क्या है? पेशेंट कंफ्यूज हो जाता है, पेशेंट ओवरवेल्मड हो जाता है!
हाँ, मैं कभी एक जनवरी में हम अमेरिका से लगभग 25-30 लोगों को लेकर गए थे, जो बिल्कुल वो इंडिया की परिस्थिति नहीं थे और वो दिल्ली में आए, एयरपोर्ट से बाहर निकले और परिस्थिति नहीं थे वहाँ पे।
अमेरिका में जो ड्राइविंग करते हैं, एक चीज़ है—अगर 5-6 महीने मैं अमेरिका में रहता हूँ, मैं साल में लगभग 8-10 महीने भारत से बाहर रहता हूँ—तो जब पाश्चात्य देश से भारत में आता हूँ, तो एक चीज़ होता है कि यहाँ पे हमको पाश्चात्य देश में कोई हॉर्न में जाना है… कोई भी साउंड पॉल्यूशन करते हैं, इसको आप धुनको बुशित मत करो। और जब कोई हॉर्न बजाता है, इसका मतलब क्या है? दूसरी व्यक्ति ने इतनी बड़ी गलती की है! तो अगर कोई व्यक्ति आपके ओर हॉर्न बजाता है, मतलब उसने आपका अपमान किया है कि मुझे ड्राइविंग आता है तो मुझे हॉर्न बजा रहे हैं। तो कोई हॉर्न में भी आता है, तो क्या है? सब बहुत ही जो लोग कहते हैं, हमको सारा फ्रीडम चाहिए, हमको ये जैसे करना है, ये कार्य करना है, वैसे कार्य करना है, वैसे कार्य करना है। पर वहाँ लोग भी वो रोड पर बिल्कुल नियमों के साथ कार्य करते हैं!
अगर इतने अच्छे साथ ड्राइविंग करते हैं कि हॉर्न भी बजाने की जरूरत नहीं होती है। पर भारत में ना केवल हॉर्न बजाते हैं, पर हर गाड़ी पर लिखते हैं—‘हॉर्न प्लीज’! मतलब क्या है? “तुम मुझे टक्कर मत दो, पहले हॉर्न तो बजाओ, मैं बाजू में कौन दूँ?”
तो क्या है कि यहाँ पर भी ऑर्डर है, पर यह क्या है? इंडिया में ऑर्डर पे ऑर्डर होता है, वो ऑर्डर है, पर कैसा ऑर्डर है? वो सादर समझी नहीं है, सब लोग चलते हैं बदपात सही। अगर नियम पालन नहीं करेंगे, तो हम रोड पर चल नहीं पाएंगे!
अगर नियमों के पालन से हमको सुख मिलता है, तो सभाई तोड़ती हमारे नियमों के पालन ना करना क्यों होते हैं? क्योंकि नियमों के पालन करने से सुख मिलता है, उसको प्राप्त करने के लिए कुछ समय लगता है।
अगर नियमों के पालन करने से सुख मिलता है, तो उसको प्राप्त करने के लिए कुछ समय लगता है… उसके बाद में उसको प्राप्त करते हैं, तुम्हारा नाम क्या है? और फिर वो अपना नाम लिखता है और जब अच्छा मेरा नाम ऐसे लिखते हैं, बड़ा कुछ होते हैं, सब हो जाते हैं, तो पता है मेरा नाम ऐसे लिखते हैं और दिखते हैं। तो जब वो सीख जाता है, तो उसमें एक आनंद है, पर वो सीखने के लिए उसको प्राप्त करना होता है।
मॉल दाई छोड़ो, मैं मेरे खिलौने खेलते रहूंगा, मेरे गन के साथ, मेरे ट्रक के साथ खेलते रहूंगा, तो वो आसान है। तो क्या है कि नियमों के पढ़ाई करने में एक नियम लगता है—तो हाथ ऐसा हिलाओ, ऐसे मत हिलाओ, यह लिखना है, तो यह ऐसे लिखना है, यह ऐसे नहीं लिखना है—तो नियम है एक दर्शन। तो नियमों से यह सुख मिलता है, उसको थोड़ा सब्र लगता है, उसको थोड़ा अनुशीलन लगता है, उसको जाने के लिए। पर उसके विपरीत हमको लगता है कुछ शॉर्टकट में सुख मिल जाएगा, उसको, तो इसलिए हम उसके लिए जाने के प्रयास करते हैं, फंस जाते हैं।
कोई और सवाल नहीं किसी का? तो यहाँ और पॉइंट होगा, इसके बारे में हम और कोई सवाल के प्रश्न से आंसर करेंगे।
व्यक्तिगत खेल बनाम टीम स्पोर्ट्स (Individual vs Team Sports)
जब कोई भी हम कोई भी स्पोर्ट्स… जब हम खेल रहे होते हैं, तो उसमें क्या आता है? कि अभी दो प्रकार के स्पोर्ट्स होते हैं—एक है इंडिविजुअल स्पोर्ट्स (Individual Sports) और दूसरा है टीम स्पोर्ट्स (Team Sports)।
तो कोई इंडिविजुअल स्पोर्ट्स का उदाहरण दे सकता है?
- एथलेटिक्स!
- टेनिस! (टेनिस में भी डबल्स होता है, पर सही नॉर्मल टेनिस सिंगल होता है)
- टेबल टेनिस हो सकता है!
- चेस हो सकता है!
तो ऐसे जो हैं, इंडिविजुअल स्पोर्ट्स हैं। तो क्रिकेट क्या है? क्रिकेट कि एक… आपको दौड़ना क्या है? जितना का… उपयुक्त टीम… क्रिकेट कि ओपुल… एक जो है, टीम स्पोर्ट्स है!
अगर हम तुलना… हाँ, कि क्रिकेट की तुलना जीवन से कर रहे हैं, तो हमारे जीवन क्या है? ये इंडिविजुअल स्पोर्ट्स हैं या टीम स्पोर्ट्स हैं? कई लोग सोचते हैं कि नहीं, किशोम्बी समझ आइजिनल्स पार्ट हैं। इंडिविजुअल स्पोर्ट्स कैसे हैं? हर किसी को अपना परफॉर्मेंस करना है। पर हम सबको जो परफॉर्मेंस करना है, वो दूसरे लोगों के साथ करना है।
नो पर्सन इज एन आइलैंड (No person is an island).
एक बार एक नास्तिक था, बड़ा विचारवान, एक तत्वज्ञानी था, उसको पूछा गया—”क्या आप नर्क में विश्वास करते हो?” अल्बर्ट कामू, स्राम पोर, तो वो रहे हैं? “हाँ, बिल्कुल।”
आप नास्तिक था, तो नर्क में कैसे था? नर्क क्या संकल्पना है? Hell means other people. नर्क मतलब क्या? दूसरे लोग!
तो क्या होता है? जो लोग, जो दूसरे से अच्छा संबंध नहीं रख सकते हैं, दूसरे से मैं झगड़ा करते रहते हैं, तो क्या होता है? दूसरे लोग नर्क के समान हैं।
मैं एक प्रोग्राम पर जा रहा था, मैं जिस कार में भक्त में लेकर जा रहा था, उसके आगे दूसरे एक कार था, उसके बम्पर में एक स्टीकर था—“जितना मैं लोगों को जानता हूँ, उतना मुझे अपना कुत्ता और प्रिय लगने लगता है!”
मतलब क्या है? लोग इतने बुरे हैं और मेरा कुत्ता इतना अच्छा! क्या होता है? कई बार लोगों को संबंध रखना बड़ा मिस्टेक नहीं होता है, और हाँ, कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो बहुत घनिष्ठ संबंध चाहते हैं, कुछ लोग ऐसे चाहते हैं, तो दूसरे संबंध रखते हैं—इंट्रोवर्ट, एक्सट्रोवर्ट, ऐसा कहते हैं इंग्लिश में।
पर क्या है कि जीवन में हमको यश चाहिए, पर हमें ऐसा यश चाहिए, कि दूसरों को भी हम साथ ला सकते हैं। मान लीजिए कि अगर आपको दुनिया की सारी संपत्ति मिल जाए, पर दुनिया में आप अकेले ही हो और कोई भी नहीं हो, तो संपत्ति के लिए करेंगे क्या आप?
तो क्या हो जाएंगे? आपकी सेंट्री हो जाएगी, पर क्या हो जाएंगे? सारा टीम आपसे नाखुश हो जाएगी, सारा देश आपसे नाखुश हो जाएगी! तो क्या है कि जो हमको इनमें टीम स्पिरिट होता है, मतलब क्या? हर प्लेयर अच्छा खेलता है और जो टीम के लिए खेलता है, वैसे जो टीम होती है, वो टीम बड़ी यशस्वी होती है और वो प्लेयर भी यशस्वी होते हैं।
पारिवारिक रिश्ते और समाज का एकांतवाद (Individualism)
फैमिली हो सकती है, आपका गाँव हो सकता है, आपका राज्य हो सकता है। पर आजकल की संस्कृति है, वो क्या है? वो बहुत इंडिविजुअलिस्ट है! इंडिविजुअलिस्ट मतलब—”मैं!” आजकल की समाज में सब लोग क्या है? वो आई-स्पेशलिस्ट हैं! और यह आई-स्पेशलिस्ट बनने के लिए उनको कोई मेडिकल कॉलेज नहीं जाना ही पड़ता है… क्या है? वो आई-स्पेशलिस्ट नहीं है, ‘आई’ स्पेशलिस्ट (I-specialist, I-focused) हैं!
और यह ऐसे होता है, तो क्या होता है? तो अगर बहुत लोग, जैसे कोई क्रिकेट में, कोई खुद के लिए खेलने लगता है, तो वो टीम में अच्छे से रन नहीं करते हैं, वो भी उसका अच्छा नहीं होता है। जो लोग बहुत ‘आई’ स्पेशलिस्ट बन जाते हैं, तो वो खुद के बारे में अच्छा करते हैं, तो वो कुछ भी कार्य नहीं कर पाते हैं।
जब मैं कॉलेज में, अमेरिका के कॉलेज में लेक्चर दे रहा था, तो वहाँ पे मैं एक सीरीज़ वो लेक्चर दे रहा था, पाँच-छह लेक्चर दे रहा था—ओवरकमिंग नेगेटिव इमोशंस (Overcoming Negative Emotions)। तो जब कोई विद्यार्थी बाहर आ रहे थे, हर लेक्चर के आ रहे थे, तो उससे थोड़ा भेंट भी हो गई। तो फिर एक विद्यार्थी सब पूछते हैं, साधारणतया हम भारत में इससे मिलते हैं, तो हम सब अक्सर, “आप कहां से हो? आपके माता-पिता क्या करते हैं?” हम साधारणतया सवाल पूछते हैं।
पर बाद में, जैसे भक्तों में बता रहा है, कि आप अमेरिका में इसलिए पूछो मत कि आपके माता-पिता क्या करते हैं। क्यों? क्योंकि एक टेचिस… जो सोर है, किसी बच्चे होते हैं, उनकी माता-पिता सेपरेट हो चुके हैं, किसी के एक-दो माता, तीन पिता है! तो वो बहुत कॉम्प्लिकेटेड होता है।
तो क्या हुआ? तो मैं एक विद्यार्थी से मिला, तो बाद में कोई संबंध हो गया था, तो फिर वो बता रहा था कि मैं—“I grew up in a foster home.”
Foster home मतलब क्या है? अनाथालय या ऑर्फ़नेज जैसे। पर वो अनाथालय से बाहर धर्म में होता है। तो विद्यार्थी ने पढ़ा है कि मैं foster home में बड़ा हुआ।
तो फिर मैं पूछा, तो क्या हुआ? कि आपके माता-पिता का कोई एक्सीडेंट हो गया था?
तो बोला, “नहीं, मेरे माता-पिता दोनों जीवित हैं।”
“तो फिर आप, अनाथालय में… आप foster home में क्यों बड़े हो रहे हैं?”
तो विद्यार्थी ने कहा, “मैं पाँच साल का था, तो मेरे माता-पिता का सेपरेट हो गया। अभी ये ‘डाइवोर्स’ शब्द है, ये बड़ा… मेरे माता-पिता का सेपरेट हैं, साथी भी अलग हो गए, सेपरेट हो गए। पोलाइट शब्द बनाते हैं उसको… विद्यार्थी नहीं पोलाइट है!”
तो फिर आप, अनाथालय… पाँच साल के थे, सेपरेट हो गए। और तभी क्या हुआ? मेरे माता और दोनों मुझे कहा कि—”ये शादी ये हमने की थी, ये हमारे जीवन की सबसे बड़ी गलती थी, और तुम हमको उस गलती की याद देते हो!” इसलिए माता और पिता दोनों ने कहा कि हम कुछ नहीं करना चाहते हैं। हम तुमसे कुछ नहीं करना चाहते हैं…
दोनों माता-पिता होते हुए ये बच्चा क्या हो गया? कोई अपने बच्चे के साथ कैसे कर सकता है? पर यह क्या है? इतना लोग सेल्फ-सेंटर हो जाते हैं, इतना इंडिविजुअलिस्ट हो जाते हैं कि खुद से बढ़कर कुछ और विचार ही नहीं कर पाते हैं! और जब ऐसा हो जाता है, तो व्यक्ति समाज का जो फाउंडेशन है, वो भी नहीं करता है। जो सेल्फ-सेंटर नहीं है, वो बहुत लग जाता है। और इसके कारण कोई भी रिलेशनशिप स्टेबल नहीं होता है—माता-पिता-बच्चों का हो, या पति-पत्नी का हो, या भाई-बहन का हो, कोई भी रिलेशनशिप स्टेबल नहीं होता है!
टीम स्पोर्ट्स के रूप में जीवन और एकांत का छलावा
तो हमारा जीवन यह टीम स्पोर्ट्स है। और टीम स्पोर्ट्स मतलब हमें खुद को एक्सल करना है, हम खुद को अच्छा यशस्वी बनाना है, पर हमको दूसरे को साथ लेकर आगे बढ़ना है!
अगर हम सिर्फ अकेले बढ़ेंगे, तो कई लोग ऐसे होते हैं, वो बहुत इगोइस्टिक हो जाते हैं, बहुत धन संपन्न में हो जाते हैं, पर उनको धन प्राप्त होता है और बड़ा घर होता है उनका। कई बार ऐसे लोगों के घर में गया हुआ हूँ, क्योंकि कभी-कभी उनको काउंसलिंग वगैरह चाहिए होता है। पर उनको बड़ा घर है, पर बड़े घर से उनको एक ही सुविधा मिलती है कि बहुत बड़ी जगह मिलती है, जिसमें वो अकेलेपन को महसूस करते हैं!
The large house only gives them the privilege of a lot of space in which to feel lonely! उससे और कुछ नहीं है।
हम सबको यश चाहिए, हम सबको सुख चाहिए। पर अगर हम सबको यश चाहिए, सुख चाहिए, तो भगवान श्रीहरि… हरे कृष्णा!
नियमों का उद्देश्य और अपवाद
क्या हमेशा रूल्स फॉलो करना ज़रूरी है?
देखें, एक है रूल्स और दूसरा है—पर्पस ऑफ़ द रूल्स (Purpose of the rules)! तो क्या है? साधारणतया, रूल्स फॉलो करने से जो पर्पस है, जो उद्देश्य है, उसकी प्राप्ति होता है।
मान लीजिए कि अगर अभी हम भारत में left side से drive करते हैं या right side से, तो अभी भारत और अमेरिका में रूल्स बिल्कुल ऑपोज़िट हैं, पर दोनों रूल्स का पर्पस एक है! तो क्या है? रूल्स महत्वपूर्ण है, पर उसका पर्पस महत्वपूर्ण है।
साधारणतया, अगर रूल्स फॉलो करते हैं, तो उसका पर्पस, उसका उद्देश्य है कि लोग अच्छे से ट्रैवल करके अपनी जगह पर जा सकें, वो पूरा होता है। पर कभी-कभी, rarely, कभी-कभी परिस्थिति आ सकती है कि वो रूल्स का उद्देश्य पूर्ति करने के लिए रूल्स का आपको उल्लंघन करना पड़े!
मान लीजिए, अभी किसी को हार्ट अटैक है, वो सिम्पटम होने वाली है, तो तभी एम्बुलेंस जानी है। तो एम्बुलेंस अपने जब हॉर्न बजाती है, बाकी सब लोग बाजू में हो जाते हैं। तो कई बार एम्बुलेंस सारे रूल्स फॉलो नहीं करती है जो नॉर्मली फॉलो करते हैं—वो रेड सिग्नल से चले जाएगी और बाकी सब रूल्स… जस्ट बिकॉज़ देयर आर एक्सेप्शंस टू अ रूल, डज़ नॉट मीन दैट द रूल इज़ नॉट नेसेसरी!
साधारणतः रूल, नियम बहुत ज़रूरी होते हैं, पर उसका अपवाद हो सकता है। शास्त्र में ही बताया गया है कि अगर कोई नियमों का उद्देश्य भूल जाता है और सिर्फ नियमों का पालन करते रहता है, सिर्फ नियम पालन कर रहे हैं, पर नियम का उद्देश्य भूल जाएंगे, तो वैसा उचित नहीं है!
हमें और खासकर आज के समाज में, बहुत से लोगों को नियमों का उद्देश्य क्या है, यह पता ही नहीं है। और अगर उद्देश्य पता नहीं होता है, तो फिर जो नियम है, वो बहुत ही रिस्ट्रिक्टिव लगने लगते हैं, बहुत ही बंधन में डालने वाले लगने लगते हैं—”क्यों पालन करो सिर्फ नियम का?”
तो हमें सिर्फ लोगों को नियम नहीं बताने हैं—”ये नियम है, ऐसे करो, ऐसे मत करो।” अपितु इसके पड़े हमें नियमों का उद्देश्य बताना है! जब हम समझाएंगे कि ये नियम पालन करने से क्या होगा और नियम का पालन न करने से क्या होगा, तो लोग अपनी बुद्धि से नियम का पालन करेंगे। और जब नियम का उद्देश्य बताने के लिए, कभी नियम का त्यागना भी पड़े, तो वो भी वो कर पाएंगे।
अपनों से दुर्व्यवहार और इमोशनल गार्ड (Emotional Guard)
यहाँ सवाल है? “हम बाहर वालों से अच्छा बर्ताव करते हैं, घर में जाकर झगड़ा करते हैं।”
हाँ, यह बड़ा ही विचित्र होता है कि जो लोग हमारे सबसे मुरी होते हैं, कभी-कभी उनसे ही हम सबसे बुरा बर्ताव कर लेते हैं! यह क्यों होता है? कि लोग अहंकार हैं कि हम सब जब दुनिया के सामने होते हैं, तो खुद को थोड़ा डिसिप्लिन करते हैं, खुद को थोड़ा नियमित रखते हैं। पर जब घर में आते हैं, तो सोचते हैं—”यहाँ मुझे कोई नियम नहीं चाहिए, मैं अपने… मुझे कुछ नहीं चाहिए।”
एक तरह से, हम सबको ऐसे लोग चाहिए जिनके सामने हमारे भावनाओं को दबाना न पड़े! मान लीजिए, मैं बहुत चिंतित हूँ, पर दुनिया के सामने मैं यह दिखाता हूँ तो चिंता नहीं है। पर अगर चिंता सही में है मुझे, तो कोई तो है व्यक्ति जिसके आगे मैं चिंता व्यक्त कर सकता हूँ। अगर कोई भी नहीं होगा, तो यह चलेगा नहीं।
तो एक तरह से—We lower our emotional guard when we are with the people whom we love. जिन लोगों के साथ हमारे बहुत घनिष्ठ संबंध हैं, उनके सामने हमारे भावनाओं को नियंत्रित करना जो होता है, उसको हम कम करते हैं।
“मैं बहुत थक गया हूँ, मैं बहुत दुखी हूँ, मैं बहुत चिंतित हूँ”—तो यह सब भावनाएँ हैं, यह सब हम दुनिया के सामने व्यक्त नहीं कर सकते हैं, कुछ-कुछ लोग के सामने व्यक्त कर सकते हैं। तो साधारणतया, जिन से हमें स्नेह होता है, प्रेम होता है, उनके सामने हमारी भावनाओं को हम व्यक्त करते हैं, दबाते नहीं हैं। पर फिर भी इसका मतलब नहीं है, कोई भावना कैसे भी हम व्यक्त कर सकते हैं! एक स्वाभाविक रूप से, हम साधारणतया उनके सामने व्यक्त करते हैं। लेकिन इसका साधारणतया उनके सामने व्यक्त करते हैं, पूरा ही हम बिना विचार के व्यक्त करते हैं, तो फिर वो उचित नहीं है।
फिर क्या हो जाएगा उससे? हम बहुत सारे ऐसे चीज़ें बोल देंगे, जो हमें नहीं बोलनी चाहिए, जो हमें नहीं करनी चाहिए, वो कर देंगे!
कैसे होता है कि हम किसी के मन को नहीं देख सकते हैं? हम किसी के मन में क्या विचार है, क्या भावना है, यह नहीं देख सकते हैं। और यह एक बहुत बड़ा वरदान है! क्यों? क्योंकि अगर हम एक विचार, भावना, इच्छाएं देखने लगेंगे, तो एक भी संबंध टिक नहीं पाएगा! “तुम मेरे बारे में ऐसा सोचते हो, तुम ऐसी इच्छाएं करते हो, तुम इस तरह के लगते हो…” कोई भी संबंध नहीं देख पाएगा।
तो निसर्ग ने हमको एक प्रोटेक्टिव मैकेनिज्म दिया है, एक प्रिजर्वेशन का माध्यम दिया है कि हमारे मन में विचार आते हैं, इच्छाएं आती हैं, भावना आती है, पर वो अपने आप शारीरिक स्तर पर रखनी ही होती है, वचनों में रखनी होती है। एक ऐसे बफर है उनके लिए, एक फिल्टर है। तो वो फिल्टर रखना महत्वपूर्ण है!
कुछ लोग के साथ वो फिल्टर बहुत टाइट होता है, तो तो भी सवाल होता है, पर फिल्टर हमें ज़रूर नहीं है? अगर फिल्टर नहीं होगा, तो फिर हम कोई भी संबंध बरक़रार नहीं रख पाएंगे! इसलिए, हमारे परिवार वाले के संबंध चाहिए कि हमें इनके साथ मेरा इमोशनल गार्ड पुरानी चीज़ ना सकता है, थोड़ा-सा तो रेजुनेट करना चाहिए है, तो उससे हम उनसे बुरा बर्ताव नहीं करेंगे।
नियमों के पालन के लिए तीन व्यावहारिक उपाय
अच्छा, तो हम नियम पालन करना चाहते हैं, पर बार-बार व्यवधान उससे आहत हो जाते हैं, तो क्या करेंगे उसके बारे में?
यह एक तरह से स्वाभाविक मानव की समझ है, हम सबके साथ होता है। तो इसके लिए हम तीन चीज़ें कर सकते हैं:
- पर्पस याद रखो: सबसे पहले, कि नियमों का पालन करने से महत्वपूर्ण है नियमों का उद्देश्य हमें जानत रखना चाहिए! क्योंकि क्या होता है कि जब भी कोई भी नियम बोलते हैं, तो वो नियम का मतलब होता है कि कुछ चीज़ हमको नहीं मिलने वाला है। मतलब “ऐसे करो, मतलब ऐसा, ऐसा, ऐसा नहीं करो।” और ऐसे-ऐसे करने से, जो भी मुझे मिलने वाला है—अगर मैं नियम करता हूँ कि मैं रोज एक घंटा पढ़ाई करने वाला हूँ, तो मतलब, वो एक घंटा मैं मेरे फोन नहीं देख सकता, मैं टीवी नहीं देखता, मैं किसी से गपशप नहीं कर सकता—तो क्या होता है, हमारा मन तुरंत जो नियम के कारण हमको नहीं मिलने वाला है, उसकी ओर हो जाता है। इसलिए, हमारे बुद्धि का इस्तेमाल करके, हमें हमेशा खुद को उसके उद्देश्य की याद दिलाना चाहिए। क्योंकि ये नियम का पालन करने से क्या होने वाला है? नियम के कारण क्या नहीं मिलने वाला है, उसका यदि विचार करेंगे, तो नियम का पालन करने की इच्छा चल जाएगी, इच्छा शक्ति हमारी कम हो जाएगी और हमारा मन हमेशा वही चीज़ों को याद दिलाता है।
- सत्संग करो: सबसे पहले, नियम का उद्देश्य क्या है, उसको बार-बार कुछ तो याद दिलाना चाहिए जो भी वो नियम पालन कर रहे हैं। तो अगर हम सुबह जल्दी उठना चाहते हैं और मान लेंगे हम कहीं डॉरमेट्री में, हॉस्टल में, ऐसे रूम में रह रहे हैं, जहाँ भी सब लेट उठते हैं। तो मान लेंगे आप सुबह उठ भी जाते हैं, देखते हैं सब सो रहे हैं, तो सो जाओ! तो क्या होता है, अगर हम जल्दी उठना चाहते हैं, तो हमें एक तरह से अपने जल्दी उठते हैं, उनका संग करना चाहिए। अगर वो साथ में नहीं है, तो भी कहते हैं कि उठने के बाद तुम्हें एक मैसेज करो, तुम्हें एक फोन कर दो—”मैं उठ गया, तुम्हें मैं उठ जाता हूँ!” तो क्या है, हमें सत्संग बहुत ज़रूरी है। अकेला अगर हम पालन करना चाहेंगे, तो मुश्किल होता है।
- सेट फाइनाइट गोल्स (Set Finite Goals): तीसरा है कि सेट फाइनाइट गोल्स। अगर नियम ऐसे रखते हैं कि “मैं आज से रोज सुबह इतने बजे उठूंगा, मैं रोज ये करने वाला हूँ”, तो अगर ऐसा आज से हमेशा के लिए मैं रोज ये करने वाला हूँ, अगर ऐसा नियम रखते हैं, तो क्या होता है? कई बार उस नियम में यश है नहीं, सिर्फ अपयश होना होता है—”मैं तीस दिन के रोज उठूंगा, पर 31वें दिन अगर नहीं उठ पाया, अरे मेरा पराजय है!” ऐसे लगते हैं उनको। तो क्या होता है, बहुत बड़ा गोल बन जाता है, जिंदगी में मुझे करना है। तो अगर आप छोटा गोल बनाओ… नहीं छोटा, नहीं एक बड़ा गोल, पर एक बड़ा-बड़ा बन जाता है, कि मुझे ये कार्य करना है, तो मैं कैसे कर सकता हूँ? इतना नहीं कर सकता, शायद इतना कर सकता हूँ, पर इतना तो मैं ज़रूर कर सकता हूँ! पर इतने से शुरुआत करता हूँ, मैं इतना कर दूंगा। मतलब क्या है? कि मान लीजिए मुझे भगवद्गीता पढ़नी है, मुझे भगवद्गीता तो पढ़नी है, पर मुझे बहुत बड़ी किताब कैसे पढूँगा मैं? समय नहीं मिलते हैं। क्या मैं एक श्लोक रोज़ पढ़ सकता हूँ? उसके पाँच मिनट नहीं लगते हैं। पाँच मिनट नहीं तो मैं निकल सकता हूँ। तो इससे मुझे देखिए—स्मॉल सिंपल स्टेप्स (Small simple steps)! कि कोई बहुत बड़ी चीज़ करने का विचार मत करो, स्मॉल सिंपल स्टेप्स की रचना करो, भगवान को कुछ अर्पणित करो, मैं इसे कर पाया। अगर मैं आज नहीं पढ़ा, तो अगर मैं आज धूम देखना चाहता हूँ, मैंने स्मॉल सिंपल स्टेप्स करना चाहता हूँ, तो कभी तो क्या रहते हैं, हम शुरुआत ही बहुत बड़ा—”मैं रोज 3 घंटे, 6 घंटे पढ़ाई करनी है, मैं रोज 10 घंटे पढ़ाई करूँगा”, 10 दिन तक हम किताबें नहीं खोलते हैं, 10 घंटे बहुत लगता है! तो फिर स्मॉल सिंपल स्टेप्स… तो ये तीन चीज़ें अगर हम करेंगे, तो जो हम नियमों का पालन—पर्पस याद रखो, सत्संग करो और छोटे-छोटे कदम आगे बढ़ाओ—तो हम पालन अच्छा कर सकते हैं।
हरे कृष्ण! बहुत-बहुत धन्यवाद! श्री प्रभुपाद की जय! गौर भक्त वृंद की जय! गौर प्रेमानंदे!