Nityananda Trayodashi Festival – Hindi
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Lecture Summary
यहाँ श्रीमान चैतन्य चरण प्रभु द्वारा दी गई नित्यानंद त्रयोदशी की कथा का मुख्य सारांश दिया गया है:
1. बाह्य परिवर्तन बनाम अंतरंग परिवर्तन (Internal Transformation): बाहरी बदलाव अस्थायी होते हैं, जबकि सच्चा सुख और शांति हृदय के आंतरिक (अंतरंग) परिवर्तन से ही संभव है। हमारी अशुद्ध दृष्टि हमें भौतिक चीज़ों (धन, पद, सुख) में ख़ुशी ढूँढने पर मजबूर करती है। यह समझ बदलने के लिए ही भगवान (चैतन्य महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु) अवतार लेते हैं।
2. प्रचार के दो भिन्न दृष्टिकोण (न्याय और करुणा): भले ही चैतन्य महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु का उद्देश्य एक ही था (लोगों का उद्धार), लेकिन उनके तरीके अलग थे:
- चैतन्य महाप्रभु (न्याय एवं नियम के प्रतीक): वे सन्यास के नियमों का कठोरता से पालन करते थे (जैसे राजा प्रतापरुद्र से सीधे न मिलना) ताकि वैदिक संस्कृति का सम्मान करने वाले लोग उनसे जुड़ सकें।
- नित्यानंद प्रभु (असीम करुणा के प्रतीक): वे राजसी वस्त्र पहनते थे और नियमों से परे जाकर उन लोगों (जैसे चोर-डाकुओं) तक भी पहुँचते थे, जो सामान्यतः संन्यासियों से दूर रहते हैं।
3. चोरों के उद्धार की कथा: नित्यानंद प्रभु के राजसी रूप और आभूषणों को देखकर कुछ चोरों ने उन्हें लूटने की योजना बनाई। लेकिन जब वे चोरी करने गए, तो दैवीय तूफान, बारिश और अंधेपन जैसी विपत्ति में फँस गए। हताश होकर जब चोरों के नेता ने नित्यानंद प्रभु को भगवान मानकर मदद की पुकार लगाई, तो प्रभु ने उन्हें दंड देने के बजाय गले लगा लिया। वे भौतिक धन चुराने आए थे, लेकिन प्रभु ने उन्हें ‘कृष्ण प्रेम’ का सर्वोच्च धन दे दिया।
4. नियम और करुणा का समन्वय (बलभद्र भट्टाचार्य का प्रसंग): प्रभुपाद जी के अनुयायियों के समाज में नियम (अनुशासन) और करुणा दोनों आवश्यक हैं। जब चैतन्य महाप्रभु के सेवक बलभद्र भट्टाचार्य ने मोह में पड़कर गलती की, तो महाप्रभु ने नियमों के तहत उसे त्याग दिया। लेकिन नित्यानंद प्रभु ने करुणा दिखाते हुए उसे नवद्वीप जाकर शची माता को महाप्रभु की लीलाएँ सुनाने की सेवा दे दी, ताकि वह भक्ति से जुड़ा रहे।
5. विपत्ति से साक्षात्कार (Tribulation to Realization): जीवन की विपत्तियाँ अक्सर हमारे सैद्धांतिक ज्ञान को ‘साक्षात्कार’ (Realization) में बदल देती हैं। श्रील प्रभुपाद (जिनका व्यापार बार-बार विफल हुआ) और परीक्षित महाराज का उदाहरण देकर बताया गया कि अगर हमारे पास ‘भक्तों का संग’ है, तो हम विपत्तियों में भी भगवान की कृपा और उनकी योजना को देख सकते हैं।
6. निष्कर्ष और प्रार्थना: कथा का समापन इस प्रार्थना के साथ होता है कि नित्यानंद प्रभु हम पर अपनी कृपा करें, हमारे हृदय को शुद्ध करें ताकि हम समझ सकें कि ‘कृष्ण भक्ति ही सबसे बड़ा शाश्वत धन है’। साथ ही, वे हमें अपनी करुणा का पात्र बनाने के साथ-साथ दूसरों तक इस करुणा को पहुँचाने का माध्यम (Instrument) भी बनाएँ।
Full Transcription
मंगलाचरण एवं स्वागत
हरे कृष्ण प्रभुजी। हरे कृष्ण प्रणाम। हमारे सभी नासिक के भक्तों का सौभाग्य है कि आज नित्यानंद त्रयोदशी के इस महोत्सव के शुभ अवसर पर हमें श्रीमान चैतन्य चरण प्रभु जी का संग मिल रहा है। हरे कृष्ण प्रभुजी। इसको हमने यूट्यूब लाइव किया है प्रभुजी।
वाञ्छा कल्पतरुभ्यश्च कृपा सिन्धुभ्य एव च।
पतितानां पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नमः॥
नमो महा-वदान्याय कृष्ण-प्रेम-प्रदाय ते।
कृष्णाय कृष्ण-चैतन्य-नाम्ने गौर-त्विषे नमः॥
गौरवाणी प्रचारिणे निर्विशेष शून्यवादी पाश्चात्य देश तारिणे। जय श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानंद श्री अद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौर भक्त वृन्द।
बाह्य परिवर्तन बनाम अंतरंग परिवर्तन
आज मैं इस विषय पर चर्चा करूँगा कि इसके लिए हमें बाह्य परिवर्तन से ज़्यादा अंतरंग परिवर्तन ज़रूरी है। क्योंकि बाह्य स्तर पर हमेशा चीज़ें बदलती रहेंगी, भले आज हम एक चीज़ ठीक कर देंगे, कल दूसरी चीज़ पुनः खराब हो जाएगी। जो अंतरंग परिवर्तन है, वह करने के लिए बहुत शक्ति लगती है और यह बहुत से लोग टाल देते हैं। सोचते हैं, “मैं बाह्य परिवर्तन करूँगा और उससे ठीक हो जाएगा।”
कुछ समय के लिए कुछ ठीक हो जाती है, पर जो अंतरंग परिवर्तन करना होता है, क्योंकि यह इतना मुश्किल होता है और हम कर नहीं पाते हैं, तो इसलिए भगवान स्वयं अवतरते हैं। और वो कहते हैं कि किस तरह से हम अंतरंग परिवर्तन करके परम शान्ति और परम सुख प्राप्त कर सकते हैं।
तो यह अंतरंग परिवर्तन का मतलब क्या है? मान लीजिये किसी को वारिस में एक घर मिला है, किसी दादा ने किसी को दिया है और उनके घर में एक कोने में सोना है। बहुत सारे सोने, जेवर आदि चीजे हैं, वो जमीन के अंदर हैं। पर वहां जाये बिना वो हर जगह पर ढूंढ़ते हैं। यहाँ पर खन-चन करते हैं, वहाँ पर खोज-बीन करते हैं, यहाँ पर तोड़-फोड़ करते हैं। और कितना भी वो ढूंढेंगे जेवर, सोना… पर उनको लगता है कि यह वहाँ ही है, वहां ही है।
हृदय की अशुद्धता और भ्रांत दृष्टि
जब हमारे हृदय में अशुद्धता होती है, तो अशुद्धता क्या करती है? वो हमारी दृष्टि को भ्रांत कर देती है और उससे कृष्ण के अलावा दूसरी जो चीजें हैं, उनका हम मूल्य और अधिक देने लगते हैं। तो अगर लोभ है, तो उससे हम सोचते हैं, ‘पैसा ही भगवान है, पैसा मिल जाएगा तो सारी समस्या चली जाएगी।’
अगर हममें क्रोध है, तो हम सोचते हैं कि ‘अगर मुझमें शक्ति आ जाएगी तो मैं शत्रुओं को निकाल दूँगा और प्रतिस्पर्धियों को निकाल दूँगा और मैं यशस्वी हो जाऊँगा।’ अगर हमें शारीरिक सुख मिल जाएगा, तो सारा जीवन सफल हो जाएगा। हमारी आंकड़े की पद्धति है, जो वैल्यू सिस्टम (Value System) है, वो बदल जाती है और यह परिवर्तन करना बहुत मुश्किल है।
जो चीज़ें हमको लगती हैं कि कीमती हैं, वो प्राप्त करना आसान है, पर क्या वास्तव में कीमती है, यह समझ को बदलना बहुत मुश्किल है। और वह समझ को बदलने के लिए भगवान अवतार लेते हैं।
चैतन्य महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु का अवतार
भगवान अलग-अलग अवतार लेते हैं, और उनमें से जो महा-वदान्य कहलाते हैं, उनको बताया गया है चैतन्य महाप्रभु। और चैतन्य महाप्रभु के जो भी महा करुणा में उनके पार्षद हैं, वो भी भगवान के ही एक अलग रूप हैं, वो हैं नित्यानंद प्रभु।
चैतन्य महाप्रभु अवतरते हैं इस जगत में, वो श्री धाम मायापुर में अवतरते हैं। और जब वहाँ पे आते हैं, तो उस समय क्या होता है कि जो समाज की परिस्थिति है… भगवान जो अवतरते हैं, वो एक समय पे अवतरते हैं तभी वो वहाँ पे आकर उद्धार करते हैं। पर साथ-साथ उस समय वो ऐसी भी लीला करते हैं, ऐसे भी उपदेश देते हैं, ऐसे उदाहरण प्रस्थापित करते हैं, जिससे कि उत्तर काल में, उसके पश्चात् भी लोगों का उद्धार हो सके। उद्धार मतलब क्या? कि शुद्धि करना।
नवद्वीप की स्थिति और अद्वैत आचार्य की पुकार
वो अभी ऐसी संस्कृति में आते हैं कि यहाँ पे अभी तक तो पुण्याई है पर भक्ति नहीं है। पुण्याई मतलब क्या है? नवद्वीप जो है वो एक तरह से धार्मिक जगह है। वहाँ पे शची देवी की पूजा होती है, वहाँ पे बहुत से ब्राह्मण हैं जो वेदों का पठन कर रहे हैं, वो वहाँ पे शास्त्रों का अध्ययन भी कर रहे हैं। ये सब कर रहे हैं, पर भगवान कृष्ण की भक्ति बहुत कम है।
यह देखते हैं अद्वैत आचार्य और इससे बड़े उदास हो जाते हैं। और उदास होकर वे करुणा से पुकारते हैं। तो तभी उनके पास चैतन्य महाप्रभु आते हैं। चैतन्य महाप्रभु से पहले ही नित्यानंद प्रभु प्रकट होते हैं। और जब पंडित होने की लीला खत्म होती है, तो वो अपनी भक्ति की लीला चालू करते हैं। और जब वो भक्ति की लीला चालू करते हैं, तो तभी नित्यानंद प्रभु वहाँ पे आ जाते हैं।
प्रचार के दो अलग-अलग दृष्टिकोण
नित्यानंद प्रभु और चैतन्य महाप्रभु क्या हैं? दोनों साथ में जो भगवान की करुणा है, जो हृदय को परिवर्तन करने की पद्धति है, हृदय को शुद्ध करने की पद्धति है, वो प्रदान करते हैं। तो अब ये किस तरह से प्रदान करते हैं? वो ख़ास करके हरि नाम का प्रचार करके।
पर अभी जब भी हम इस भौतिक जगत में होते हैं, तो अलग-अलग प्रकार के लोग होते हैं और सब अपने लिए अपनी-अपनी चीजों का महत्व मानते हैं। तो इसलिए अगर हमें भगवान की भक्ति का संदेश देना है, तो कोई गांव में जाएंगे तो हम जो चीज़ बताएंगे, वो शहर में जाके किसी को बताएंगे तो अलग बताना पड़ेगा। अगर हम कोई इंजीनियरिंग कॉलेज में जाके कुछ बता रहे हैं, तो वो मंदिर में किसी को बताएंगे तो अलग होगा।
चैतन्य महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु, वो दो अलग-अलग प्रकार के लोगों को वही भगवान का संदेश, भगवान की भक्ति प्रदान करते हैं। हम दो लीलाओं की चर्चा करेंगे कि किस तरह से चैतन्य महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु का मिशन एक है, पर उनका मूड अलग है। उनका उद्देश्य एक है, पर जो भाव है, वो अलग है।
चैतन्य महाप्रभु का वैराग्य और राजा प्रतापरुद्र से भेंट
चैतन्य महाप्रभु को सन्यास वैराग्य शिरोमणि बताया गया है कि वे सन्यासियों में सर्वश्रेष्ठ थे, और वो बड़ी गंभीरता से सन्यास के नियमों का पालन करते थे। इसलिए जब वे नवद्वीप मायापुर से जगन्नाथ पुरी गए, वहाँ पर जगन्नाथ पुरी के राजा प्रतापरुद्र उनसे मिलना चाहते थे और बार-बार प्रयास कर रहे थे।
किन्तु चैतन्य महाप्रभु उनसे मिलने के लिए तैयार नहीं थे और अंत में चैतन्य महाप्रभु उनसे एक ही शर्त पर मिले कि जब वे एक साधारण वैष्णव का वस्त्र धारण करके आएं। उनका भाव क्या था? कि लोग क्या विचार करेंगे अगर सन्यासी एक राजा से मिल रहा है। राजा तो भौतिकवादी होता है, सन्यासी तो महान है, सन्यासी तो वैरागी होना चाहिए, तो यह ऐसे भौतिकवादी से मिल रहा है? अगर लोग ऐसी बात करेंगे, तो वो सन्यासी का अनादर करेंगे। सन्यासी का अनादर करेंगे तो वो सन्यासी से भगवत कथा, भगवत संदेश या भगवत नाम ग्रहण नहीं कर पाएंगे। इसलिए चैतन्य महाप्रभु सन्यास के नियमों के बारे में काफी गंभीर थे।
नित्यानंद प्रभु का राजसी रूप और चोरों की कथा
पर वहीं चैतन्य महाप्रभु के सर्वोच्च पार्षद गौर-निताई, यानी नित्यानंद प्रभु क्या करते थे? राजा से मिलने की बात तो दूर, वो खुद राजा जैसे वस्त्र पहनते थे। जब नित्यानंद प्रभु प्रवास करते थे, तो कभी-कभी वो ऐसे वस्त्र और आभूषण पहनते थे, जिससे कि किसी लोकल व्यक्ति को लगेगा भी नहीं कि ये साधु हैं।
चैतन्य महाप्रभु एक प्रकार के लोगों को प्रचार कर रहे थे (जो वैदिक संस्कृति को मानते थे, उसको आदर देते थे), और नित्यानंद प्रभु दूसरे प्रकार के लोगों को प्रचार करते थे।
अगर हम नित्यानंद प्रभु के बारे में सोचें कि कोई चोर उन्हें देखे तो क्या होगा? चोरों ने सोचा, “अगर हम इनकी चोरी कर लेंगे, तो फिर हमको जिंदगी भर कोई चोरी करने की नौबत नहीं पड़ेगी! क्या इतनी धनसंपत्ति है इनके पास!” तो यह सोचकर वो बड़े उत्साह से नित्यानंद प्रभु के बारे में वार्तालाप करने लगे, “कौन है यह व्यक्ति? कहां से आया है? क्या करते हैं वो?” यह सब सोचकर वो नित्यानंद प्रभु के आस-पास उत्साह से टहलने लगे।
किसी भी भाव से भगवान का स्मरण (श्रीमद्भागवतम् श्लोक)
यदि हम उनके प्रति आकर्षित हो जाएं, तो फिर किसी भी कारण से हम उनका स्मरण करें, उससे हमारा उद्धार हो सकता है। वास्तव में श्रीमद्भागवतम् (7.1.30) में श्लोक आता है:
गोप्यः कामाद् भयात् कंसो द्वेषाच्चैद्यादयो नृपाः।
जो गोपियां थीं, वो भगवान कृष्ण के सुंदर रूप को देखकर आकर्षित हो गई थीं, और वो काम भाव से भगवान का स्मरण करती थीं। कंस जो था, वो भय से स्मरण करता था कि कृष्ण आकर मुझे मार देगा। शिशुपाल ईर्ष्या (द्वेष) से भगवान का स्मरण कर रहा था। किसी भी तरह से स्मरण करें, वास्तव में जो भगवान का स्मरण करता है, उसका उद्धार हो जाता है।
हरिनाम का प्रभाव
पर उसमें हम नित्यानंद प्रभु की लीला से क्या जोड़ सकते हैं? ‘स्तेन लोभात्’ – कि ये लोभ से जो चोर थे, वो नित्यानंद प्रभु का स्मरण करने लगते हैं। वास्तव में क्या होता है कि चोरों को भी उन्होंने आकर्षित कर लिया। चोर बार-बार नित्यानंद प्रभु का स्मरण करते हैं कि “ये ले लूंगा, वो ले लूंगा।” एक सन्यासी के पास क्या अर्थ (धन) है? इसलिए वो चैतन्य महाप्रभु में कभी रुचि नहीं रखेंगे, पर नित्यानंद प्रभु में उनको रुचि हो गई।
फिर वो योजना बनाने लगे, “चलिए हम जाते हैं।” तो एक दिन गए तो उन्होंने देखा कि अरे! वहाँ इतने बलशाली और विशाल पहरेदार थे। वो देखकर सोचने लगे कि “अरे, ऐसे पहरेदार अगर होंगे तो एक पहरेदार हमारे आधा दर्जन लोगों को मार सकता है। हम यहाँ पर कुछ नहीं कर सकते हैं।”
तो वापस चले गए और सोचने लगे कि “यह कौन है? यह शक्तिशाली और विशाल पहरेदार कहां से आ गया है? पहले तो कभी ऐसे लोगों को देखा नहीं है हमने।” सोचने लगे कि “शायद यह बड़े धनवान व्यक्ति हैं, तो शायद राजा के पहरेदार होंगे। कुछ दिनों में राजा चला जाएगा और फिर हम क्या करेंगे? फिर हम वापस जाके चोरी करेंगे।”
तो वो नित्यानंद प्रभु के बारे में विचार कर रहे थे। येन-केन-प्रकारेण, किसी न किसी पद्धति से भगवान का स्मरण हो रहा था। वो वापस एक और बार गए। और जब वहाँ पर गए तो उन्होंने देखा कि ये भक्त जोर-जोर से हरि नाम कर रहे हैं। पहले तो उनको हरि नाम में कुछ रुचि नहीं थी, पर अभी वो भगवान का स्मरण कर रहे हैं।
कीर्तन का प्रभाव और चोरों का इंतज़ार
अभी भगवान का नाम उनका भी स्मरण कर रहे हैं और स्मरण करते गए, करते गए और रुक रहे थे। थोड़ा उनको रुचि आ रहा था कीर्तन में, पर कितना कीर्तन कर रहे हैं? भक्तों का इतना स्टैमिना होता है कीर्तन करने का, उतनी शक्ति इनमें नहीं होती है। तो फिर वो थोड़ा थक गए और फिर वहीं पर इंतज़ार करते हुए वो सो गए। वहीं थे और घंटों तक कीर्तन चलता रहा, कीर्तन की ध्वनि उनके कानों में जाती रही।
और फिर अगले दिन सुबह हो गया। और जब सुबह के साथ आवाज़ आने लगी, जो जानवर सारे अपनी आवाज़ करने लग गए, तो उठ गए। “अरे! क्या हो गया?” वो सारे अस्त्र-शस्त्र लेके आ गए थे और दोनों अस्त्र-शस्त्र छुपाने लग गए। और फिर एक दूसरे को दोष देने लग गए, “तुम क्यों सो गए? तुम क्यों सो गए?” क्योंकि शायद हमने कुछ गलती की है। “क्या गलती की है हमने? जो देवी हैं उनकी पूजा नहीं की है। क्योंकि हमने देवी की पूजा नहीं की है, इसलिए हमें बार-बार अपयश मिल रहा है। तो अभी हम देवी की अच्छे से पूजा करेंगे, फिर जाएंगे।” और ये जो मिशन था उनका, उसमें पूर्णतः आ गए।
विपत्ति और साक्षात्कार का संबंध
तब क्या हुआ, जब वहाँ पर पहुँच गए, तो पूरे संकल्प से हैं कि हम चोरी करेंगे। तब अचानक आसमान में तूफान आ गया, आंधी आ गई, बिजली कड़कने लग गई। और इस तरह से बारिश और तूफान हो रहे थे कि उनको समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। जिस घर में नित्यानंद प्रभु रह रहे थे, वहाँ पर जा रहे थे, तो बीच में एक बड़ा गड्ढा आ गया और उसमें वह गिर गए। और वहाँ पर गिर गए और अचानक ऐसा हो गया कि वो अंधे हो गए, कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। क्या हो गया उनको?
और कई दिनों से जो चोर थे, ख़ासतौर पर जो चोरों का नेता था, वह नित्यानंद प्रभु का स्मरण कर रहा था, विचार कर रहा था। कि जब हमारे जीवन में विपत्ति आती है, तो जो जानकारी होती है वो साक्षात्कार में परिवर्तित होती है। हमारे पास बहुत सी जानकारी हो सकती है कि हमें भगवान का आश्रय लेना चाहिए, भगवान के आश्रय में हमको बहुत शांति और सुरक्षितता महसूस हो सकती है। पर यह केवल एक तत्त्व रहता है, एक थ्योरी के रूप में रहता है, जानकारी के रूप में रहता है। पर जब हमारे जीवन में विपत्ति आती है और तभी अगर हम इस ज्ञान पर अमल करने का प्रयास करते हैं, तो क्या होता है? वह जानकारी एक साक्षात्कार में परिवर्तित हो जाती है।
तो यही वहाँ पर हो गया। थोड़ा सुना था नित्यानंद प्रभु के बारे में, श्रद्धा तो नहीं थी, पर यहाँ पर ऐसी विपत्ति में आ गए, क्या करें अभी? वो तो देवी की पूजा करके आये थे, तो क्या करें? वास्तव में उन्होंने कहा था कि “कृपया हमें आज यशस्वी होने दीजिये, कृपया आज हमें धन प्राप्त होने दीजिये।” अभी देवी ने उनको आशीर्वाद दिया था कि आपको धन मिलेगा, आप यशस्वी होंगे। पर किस तरह यशस्वी होंगे? किस प्रकार का धन मिलेगा? वहाँ उनकी कल्पना में भी नहीं था कि उन्हें आध्यात्मिक धन प्राप्त होने वाला था। तो क्या हुआ, इस तरह उस विपत्ति में थे, पता नहीं कैसे बाहर आएं।
चोरों का समर्पण और भगवान की कृपा
तो प्रमुख चोर के मन में विचार आया कि शायद नित्यानंद भगवान हैं। और ऐसा सोच के वो बड़ी तीव्रता से, प्रामाणिकता से, पूरे हृदय के साथ प्रार्थना करने लगा, “हे नित्यानंद! कृपया आप मुझे बचाओ। मैं इस बड़ी विपत्ति में फंसा हूँ। मैं आपसे चोरी करने के लिए आया, मुझे माफ़ कर दो आप। मैंने आप पर अपराध किया है।”
ऐसा वो करने लग गए, तो क्या हुआ? तो अचानक सारी जो विपत्ति थी वो चली गई, क्योंकि आँखें वापस आ गईं। आसमान से बादल चले गए, बिजली रुक गई, तूफान चला गया, बारिश रुक गई। और गड्ढे से, जिसमें वो गिर गए थे, वहाँ से उनको बाहर आने का रास्ता भी मिल गया। वहाँ से उनको रास्ता नहीं मिल रहा था, और फिर उन्होंने देखा ये क्या चमत्कार हो गया!
“मुझे नित्यानंद प्रभु के पास जाना चाहिए।” तो उन्होंने देखा, “अरे! मैं तो यहाँ पे इतना गंदा हूँ, क्या करूँ?” तो आस-पास देखा, थोड़ा सा, तो सीधा नित्यानंद प्रभु के पास जाना चाहिए सोचकर जिस घर में थे वहाँ पे चले गए। तो जब वहाँ पे चले गए, तो वहाँ पे सब वैष्णवगण थे। वो थोड़े भयभीत हो गए कि, “अरे! ये तो इतना बड़ा हट्टा-कट्टा व्यक्ति है, ये तो एक गुंडे जैसा लग रहा है, यहाँ पे क्यों आ गया? ये कुछ परेशानी करेगा, तो हम कैसे रोकेंगे इसको?”
और सीधा वह नित्यानंद प्रभु के पास जाने लग गया और सब भक्त आश्चर्य से देख रहे थे और कहा, “नित्यानंद प्रभु पर ये आक्रमण करेगा क्या?” नित्यानंद प्रभु आगे आए और न केवल आलिंगन किया, आलिंगन करके उनको बड़ा आशीर्वाद दे दिया। क्या आशीर्वाद दे दिया? वो धन प्राप्त करने के लिए आए थे, उन्होंने दिव्य कृष्ण-प्रेम का धन प्राप्त कर लिया।
न्याय और करुणा का समन्वय (चैतन्य महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु)
“तो मैंने कोई आपकी सेवा की है तो उसके बदले में मुझे आप एक दान दीजिये और वो दान क्या है? मुझे इन दोनों का शरीर दे दीजिये।” तो अभी यहाँ नित्यानंद प्रभु की महान करुणा है कि भले ही जिस व्यक्ति ने आक्रमण किया है, उसके प्रति प्रतिकार नहीं कर रहे हैं। जो उसका प्रतिकार कर रहे हैं, उनको रोक रहे हैं, और उनको रोकने के लिए वो खुद के पुण्य दाँव पे लगा रहे हैं। तो ऐसी करुणा कौन दिखा सकता है?
पर न केवल वो ऐसी करुणा दिखा रहे हैं, पर उसमें एक और महत्वपूर्ण भाव है। कि कैसे अब चैतन्य महाप्रभु एक चीज़ करना चाहते हैं और नित्यानंद प्रभु वो करने से रोक रहे हैं। नित्यानंद प्रभु इतने अंतरंग, इतने निजी पार्षद हैं, कि वो चैतन्य महाप्रभु का जो अंतरंग उद्देश्य है, वो भी जानते हैं। चैतन्य महाप्रभु अपने कार्यों का परिणाम दर्शा रहे हैं – “अगर आप भक्त पे आक्रमण करते हैं, तो उसका परिणाम बहुत उग्र कर्म है और उसका फल बहुत ही भयावह होगा”, यह दर्शा रहे हैं। पर वहीं चैतन्य महाप्रभु के अंदर के हृदय की जो इच्छा है, उसे नित्यानंद प्रभु दर्शा रहे हैं। और वो क्या है? वो कभी कोई नियमों का पालन नहीं करते हैं। पर वो नियमों का पालन नहीं करते हैं, वो खुद के स्वार्थ के लिए नहीं है, वो दूसरों के उद्धार के लिए, दूसरों के कल्याण के लिए है।
तो कई बार ऐसे होता है कि जब कोई व्यक्ति किसी नियम का पालन नहीं करता है, कर्म के नियम का हो या किसी प्रकार के नियम का हो, तो उसको सज़ा मिलती है। और एक तरह से यह न्याय (Justice) है। पर न्याय है एक तरफ सृष्टि में, और दूसरी तरफ है करुणा। तो क्या है? अभी इसमें करुणा महत्वपूर्ण है। जो भगवान हैं, एक तरफ न्याय देते हैं, एक तरफ करुणा देते हैं। और न्याय का उदाहरण जो है, इस लीला में चैतन्य महाप्रभु दर्शा रहे हैं। करुणा का उदाहरण जो है, नित्यानंद प्रभु दर्शा रहे हैं।
भक्तों के बीच अनुशासन और क्षमा
तो कभी-कभी क्या होता है? हमारे जीवन में हम देखते हैं, हमारे भक्तों के समाज में कोई भक्त कुछ गलती कर देता है। अगर कोई भक्त गलती करता है, उस समय तो शायद उस भक्त को उसका दंड मिल सकता है। कोई नया व्यक्ति भी हो, कुछ गलत करते हैं और कुछ दंड मिलता है, तो एक तरह से उचित है। पर क्या है, वही भगवान की कृपा अलग-अलग पद्धति से है। नित्यानंद प्रभु एक तरह से कृपा दर्शा रहे हैं।
तो ख़ासतौर पर किसी भक्त ने कुछ गलती की है, और अगर गलती हुई है, तो फिर वह भक्त को एक व्यक्ति अनुशासित कर सकता है, पर दूसरे भक्त उसको संभालते हैं। ऐसा नहीं कि “तुमने गलती कर दी, हम तुमको हमेशा ठुकरा के दूर कर देंगे।” एक तरफ नियम है और एक तरफ करुणा है। अभी जो नियम है, वह भी एक प्रकार की करुणा है, क्योंकि जो नियम का पालन कर रहे हैं, उनका उद्धार उस नियम से हो रहा है। और अगर किसी कारण से कोई नियम का पालन नहीं कर रहा है, तो वो ऐसा नहीं कि करुणा का पात्र नहीं है। भले ही वो कुछ नहीं कर पाते उचित पद्धति से, फिर भी किसी पद्धति से उनको भी करुणा देनी चाहिए। और वह जो भाव है, वो नित्यानंद प्रभु दर्शाते हैं। नित्यानंद प्रभु क्या हैं? जो भगवान का ही भाव है, भगवान की करुणा है, वह भगवान का अंतरंग उद्देश्य जानकर उचित पद्धति से दर्शाते हैं।
बलभद्र भट्टाचार्य का प्रसंग
और यही भाव हम कई बार देखते हैं नित्यानंद और चैतन्य महाप्रभु की लीला में। चैतन्य महाप्रभु जब बलभद्र भट्टाचार्य के साथ (उनका सेवक के रूप में जाते हैं), वो दक्षिण प्रवास करते हैं। जब वापस आते हैं तो क्या होता है? वो बलभद्र भट्टाचार्य से बहुत नाराज़ हैं। क्या होता है, वो मोहित होके चैतन्य महाप्रभु को छोड़कर चला जाता है और चैतन्य महाप्रभु उसका उद्धार करके उसको वापस लेके आते हैं। उसको वापस बचा के लेके आते हैं। पर वो बाद में आते हैं और भक्तों के पास उनको दे देते हैं।
और कहते हैं कि, “देखो, यह व्यक्ति क्या है! आपने इस व्यक्ति को मेरे साथ भेजा था, पर यह तो मुझ पर बोझ बन गया। यह अपनी इंद्रियों को नियंत्रित नहीं कर सकता है, मोह में पड़ जाता है।” और चैतन्य महाप्रभु एक तरह से उसको ठुकरा देते हैं। नित्यानंद प्रभु इससे क्या कर रहे हैं? वो उनको सेवा देते हैं कि “आप मायापुर जाओ और मायापुर में जाकर आप शची माता को और भक्तों को बताओ कि चैतन्य महाप्रभु ने प्रवास में क्या-क्या किया।”
तो इससे क्या होता है? यहाँ पर उनको बड़ा बुरा लग रहा था कि उनको प्रवास में जाने नहीं मिल रहा था। जब वो मायापुर जाते हैं तो सब भक्त बड़े उत्साहित हैं कि “बताओ क्या हुआ? चैतन्य महाप्रभु ने क्या-क्या किया?” इस तरह से उनको भी वो सेवा देते हैं। तो यह करुणा का भाव है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी स्तर पे हो, उसको अगर हम कृष्ण तक पूर्णता से पहुँचा सकते हैं तो बहुत अच्छा है, पर अगर वो नहीं कर सकते हैं तो एक कदम उसको आगे कृष्ण की ओर बढ़ाएं।
नित्यानंद प्रभु से प्रार्थना
यहाँ भी एक बहुत बड़ा… और नित्यानंद प्रभु का जो भाव है, वही श्रील प्रभुपाद ने अलग-अलग पद्धति से दर्शाया है। और आज हम नित्यानंद प्रभु से प्रार्थना कर सकते हैं कि वो उनकी करुणा हमें दें, जिससे कि हमारे हृदय का शुद्धिकरण हो। जिससे कि हम भी स्वयं समझ सकें कि कृष्ण भक्ति ही केवल एक शाश्वत धन है, वही ऐसा धन है जो हमें परमानन्द प्रदान कर सकता है।
और साथ-साथ वो हमें उनकी करुणा का पात्र बनाएं, पर करुणा का एक निमित्त भी बनाएं। इसलिए कि हमारे द्वारा, हमारे आस-पास में, हमारे संपर्क में जो भी लोग हैं, जिस पद्धति से उचित है, उस पद्धति से हम उनको भगवान की करुणा देकर उनको उनके आध्यात्मिक प्रवास में आगे बढ़ने में मदद कर सकें। अगर यह भाव हममें आ जाता है, तो उस आविर्भाव का जो भाव है, उसकी पूर्ति होती है।
प्रश्नोत्तर: विपत्ति और साक्षात्कार
तो इसमें एक बारीकी का प्रश्न आता है: क्या फिर साक्षात्कार के लिए विपत्ति (Tribulation) आना आवश्यक है? या दूसरा यह भी उसके साथ-साथ जुड़ा हुआ यह प्रश्न है कि कभी-कभी विपत्तियां (Tribulations) आती हैं, तो हमारा भगवान का स्मरण करना भी मुश्किल हो जाता है, तो कैसे फिर साक्षात्कार प्राप्त करें? यह बात सही है।
तो अभी क्या हमारे जीवन में दुःख आता है, तो दुःख में जो हमारा साक्षात्कार आता है, क्या वो ज़रूरी है? नहीं। अभी उसमें क्या है कि एक तरह से थोड़ा भक्ति भाव, थोड़ा सेवा भाव, थोड़ी कृपा, अभी वहाँ सब साथ में आता है। हम सबके जीवन में अलग-अलग दुःख आते हैं। कौन से दुखों से व्यक्ति भगवान के करीब जाता है, कौन से दुखों से व्यक्ति भगवान के दूर जाता है, यह एक तरह से कोई फ़ॉर्मूला नहीं है कि हर बार हम अमल कर सकें।
एक तरह से क्या है कि यह भगवान की लीला है। वास्तव में यह भगवान की लीला नहीं है, यह हृदय का मामला है। तो हर व्यक्ति का हृदय किस तरह से भगवान की ओर मुड़े, वो हर व्यक्ति स्वयं ज़िम्मेदार है। तो अभी अगर एक तरह से हमारे साथ में उचित, अच्छे भक्तों का संग है, तो फिर क्या होता है? जो हमारे जीवन में विपत्ति आती है, उसको एक भक्ति के दृष्टिकोण से कैसे देखना है, वह हम समझते हैं। और जब हम समझते हैं, तो फिर उसके द्वारा हम उस परिस्थिति में भगवान का हाथ देख के आगे बढ़ सकते हैं।
श्रील प्रभुपाद जी का उदाहरण और भगवान की कृपा
तो हम प्रभुपाद जी की… प्रभुपाद जी तो महान भक्त थे, पर एक तरह से उनकी प्रकट लीला में हम देखते हैं कि प्रभुपाद जी बहुत प्रयास कर रहे थे कि अपने गुरुदेव के मिशन में वे मदद करें, सहयोग करें। कैसे? कि बहुत धन कमा के, बहुत डोनेशन दे के। और उनका जो बिज़नेस था, बार-बार उसमें परेशानियां आ रही थीं। ऐसा लगता था कि वो बड़ा होने वाला था, तो अचानक बंद पड़ जाता था। वो सोचते थे, “क्या हो रहा है, क्या हो रहा है?”
जब बार-बार बंद पड़ने लग गया, तो फिर क्या हुआ? उनके गुरुभाई ने उनको एक श्लोक बताया – यस्याहम अनुगृह्णामि हरिष्ये तद्-धनं शनैः। कि कैसे भगवान अपनी कृपा अलग-अलग पद्धति से देते हैं, और जब विपत्ति आती है, वो भगवान की कृपा है। तो अभी क्या है कि प्रभुपाद जी को श्लोक पता था, और उस समय जब उन्होंने श्लोक सुना तो उनको बड़ी सांत्वना मिली कि “अच्छा, ये हो रहा है मेरे जीवन में।”
तो हमें भक्तों का संग महत्वपूर्ण है। जब हमारे जीवन में कुछ होता है, ख़ासतौर पर विपत्ति आती है, तो स्वयं भगवान का हाथ कैसे हम देखें उस विपत्ति में, यह इतना आसान नहीं है। हम देखते हैं कि परीक्षित महाराज को जब शाप मिलता है, तब वो तुरंत सोचते हैं कि शायद ये भगवान की योजना है, और इसलिए वो अपना राज्य छोड़ के गंगा के तट पे जाते हैं। कि ये भगवान की योजना है। पर अभी भगवान की योजना है, तो मुझे क्या करना चाहिए उसके लिए?
भगवद्गीता का श्लोक और सेवा की तपस्या
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥
भगवान बुद्धि देते हैं। विपत्ति बिना मांगे, बिना चाहे आती है। पर दूसरा है कि विपत्ति के जैसा, पर उतनी मात्रा में नहीं है, वो है तपस्या। कि एक तरह से अगर हम भगवान की सेवा के लिए कुछ ज़िम्मेदारी लेते हैं, उसमें कुछ हम तपस्या करते हैं, तो उस सेवा के माध्यम से, उस ज़िम्मेदारी के माध्यम से भी हमें बहुत साक्षात्कार आते हैं। अगर हम ज़िम्मेदारी लेकर प्रचार करते हैं, अगर हम भगवान के संदेश का प्रचार करने की ज़िम्मेदारी स्वीकार करते हैं, तो हम उसको साक्षात्कार कर सकते हैं।
आभार एवं समापन
बहुत-बहुत धन्यवाद प्रभुजी। आपने इस नित्यानंद त्रयोदशी के इस शुभ अवसर पर हमारी क्या प्रार्थना होनी चाहिए, वो भी हमें बताया। और आपके उदाहरण से भी हम लोग देख सकते हैं, आपने जो बताया है कम्पैशन (Compassion) की डेफिनेशन कि ‘बीइंग क्रिएटिव’ (Being Creative), तो आपके भी कई सारे वेज़ एंड मीन्स (Ways and Means) हैं। आप लेखक भी हैं और उसके साथ-साथ मॉन्क्स पॉडकास्ट (Monk’s Podcast) और अन्यान्य उपक्रमों के माध्यम से कृष्ण भावना का आप प्रचार कर रहे हैं। तो नित्यानंद महाप्रभु आपके ऊपर भी इसी प्रकार से कृपा बनाए रखें, और आपके माध्यम से हमारे ऊपर भी बनाए रखें, यही हम लोग प्रार्थना करते हैं।
(प्रभुजी का संदेश) “नासिक के भक्त-वृन्दों को मेरा प्रणाम। और इस तरह से जब भी मैं नासिक में आया हूँ, हर बार आता हूँ, देखता हूँ तो भक्तों की संख्या बढ़ रही है, भक्तों का उत्साह बढ़ रहा है, तो यह भी नित्यानंद प्रभु की एक महान कृपा है।”
आप सबका भी वास्तव में… श्रीमान चैतन्य चरण प्रभु की जय! धन्यवाद प्रभुजी, पुनः कभी मौका मिला तो हम आपको ज़रूर आमंत्रित करेंगे। धन्यवाद। हरे कृष्ण।