Hindi Krishna Charitra 2 | Krishna in Vrindavan 2 | Sakhya-rasa lila – HG Chaitanya Charan Prabhu
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Lecture Summary
कृष्ण चरित्र प्रवचन – मुख्य सारांश
इस प्रवचन में भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, विशेषकर उनके वन गमन और कालिया दमन प्रसंग का अत्यंत सुंदर और आध्यात्मिक वर्णन किया गया है। इसे निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं में समझा जा सकता है:
१. गोकुल से वृंदावन प्रस्थान और वन जाने की उत्सुकता
- असुरों का भय: गोकुल में पूतना, शकटासुर और तृणावर्त जैसे असुरों के लगातार आक्रमणों से चिंतित होकर, नंद बाबा और सभी व्रजवासी सुरक्षा की दृष्टि से वृंदावन चले जाते हैं।
- जंगल जाने की जिद: बड़े होने पर कृष्ण की वन जाने और बछड़े चराने की इच्छा होती है। माता यशोदा सुरक्षा के डर से मना कर देती हैं, लेकिन कृष्ण नंद बाबा से अनुमति मांगते हैं।
- लव (प्रेम) और ट्रस्ट (विश्वास): यशोदा माता कृष्ण से अत्यधिक प्रेम करती हैं, लेकिन उन्हें बलराम जी पर पूरा ‘विश्वास’ (Trust) है। इसलिए, बलराम जी के आश्वासन पर वे कृष्ण को वन जाने की अनुमति देती हैं।
२. माता का वात्सल्य और ग्वालों का आह्वान
- यशोदा माई का विलंब: माता यशोदा कृष्ण के साथ अधिक से अधिक समय बिताने के लिए जानबूझकर उन्हें तैयार करने में बहुत समय लगाती हैं।
- ग्वालों का बुलावा: बाहर खड़े ग्वाले उत्सुकता से आवाज़ लगाते हैं (श्लोक: ‘आकारयामासुरनन्तमाद्यम्’), जिससे पूरे वृंदावन में कृष्ण के बाहर आने का उत्सव शुरू हो जाता है। व्रजवासी और गोपियाँ उन्हें जी भरकर निहारते हैं।
३. असुरों का अहंकार और कालिया नाग प्रसंग
- कंस और रावण का अहंकार: प्रवचन में बताया गया है कि रावण और कंस में बहुत अहंकार था, जिसके कारण उन्होंने अपनी पूरी सेना एक साथ भेजने के बजाय असुरों/महारथियों को एक-एक करके भेजा।
- कालियादह की घटना: माता-पिता और ग्वालों की चेतावनियों के बावजूद (बच्चों के स्वभाव और ‘थॉटलेसनेस/फियरलेसनेस’ के कारण), ग्वाले कालियादह पहुँच जाते हैं और जहरीला पानी पीकर मूर्छित हो जाते हैं।
- कृष्ण की संजीवनी: कृष्ण अपनी कृपामयी दृष्टि से ही सभी ग्वालों को पुनः जीवित कर देते हैं और फिर स्वयं कालियादह में कूद जाते हैं।
४. आध्यात्मिक और दार्शनिक संदेश (Allegorical Meaning)
- हृदय के अनर्थ: कालिया नाग को मानव हृदय में छिपे अनर्थों और आसुरी प्रवृत्तियों का प्रतीक बताया गया है।
- सहनशीलता (Tolerance): जिस तरह वृंदावन जैसी दिव्य जगह में भी कालिया था, उसी तरह हमारे हृदय में भी अच्छाई के साथ कुछ बुराइयां होती हैं। हमें उन्हें उत्तेजित करने के बजाय, भगवान की कृपा और प्रसाद से उन्हें नष्ट होने का इंतज़ार करना चाहिए।
५. कालिया के फनों पर नृत्य और रासलीला का बीज
- लीला का सस्पेंस: कृष्ण जानबूझकर ऐसा दिखाते हैं कि वे कालिया के फनों में फंस गए हैं, जिससे व्रजवासी अत्यंत व्याकुल हो जाते हैं।
- नृत्य का अद्भुत दृश्य: अचानक कृष्ण उठते हैं और कालिया के अत्यंत चिकने और हिलते हुए फनों पर अद्भुत नृत्य करने लगते हैं। यह कालिया के लिए युद्ध (वीर रस) था, लेकिन व्रजवासियों के लिए एक अत्यंत मनमोहक दृश्य।
- रासलीला का आरंभ: इस दिव्य और अद्भुत नृत्य को देखकर श्री राधारानी के हृदय में भी कृष्ण के साथ नृत्य करने की तीव्र इच्छा जाग्रत होती है, जिसे रासलीला के उद्भव का मूल ‘बीज’ (Seed) माना गया है।
Full Transcription
श्लोक पठन और उसका अर्थ
हरे कृष्णा! आप सबका स्वागत है आज के इस कृष्ण चरित्र के दूसरे प्रवचन में। तो आज हम इस श्लोक पर चर्चा करेंगे। यह जो श्लोक है, उन्तीसवाँ श्लोक, आपको पीछे से दिखाई दे रहा है, “प्रभात काले वरवल्लवौघा”। प्रभात काले का मतलब है सुबह। वरवल्लवौघा, तो जो गोपकुमार हैं, सारे गोप हैं वृंदावन के, वरवल्लवौघा। “गोरक्षणार्थं धृतवेत्रदण्डाः”, तो वो सब गोरक्षण के लिए बाहर निकल रहे हैं। और कैसे निकले हैं? तो धृतवेत्रदण्डाः, उन्होंने एक दण्ड, एक लकड़ी ली है। “आकारयामासुर अनन्तमाद्यम”, और वो कह रहे हैं कृष्ण से, आकारयम, हे कृष्ण उठ जाओ! अभी आप उठो और चलो हमें बाहर जाना है। आसुर अनन्तमाद्यम, जो कृष्ण, जिनका कोई अंत नहीं है, जिनका कोई शुरुआत नहीं है, वो कृष्ण को उठा रहे हैं और कह रहे हैं, चलें चलते हैं। वही गोविंद, दामोदर, माधवेति, ऐसे भगवान का हम स्मरण कर रहे हैं। इसे आप सिंग (sing) कर सकते हैं। वरवल्लवौघा प्रभात काले वरवल्लवौघा। हरे कृष्णा।
इस श्लोक में यह चर्चा हो रही है कि किस तरह से जब कृष्ण, जब कृष्ण बाललीला में होते हैं, तभी क्या हो रहा है। यहाँ पर क्या हो रहा है कि सुबह जब कृष्ण निकल रहे हैं, तो तभी कृष्ण के उनके ग्वालों के साथ जो आदान-प्रदान है, उसका वर्णन हो रहा है।
गोकुल और वृंदावन का प्रसंग
अभी हम देखते हैं कि जब कृष्ण वृंदावन में थे, तो भी वृंदावन में दो जगहों में थे। एक है गोकुल और दूसरा है वृंदावन। अभी वृंदावन ये नाम है, ये अलग-अलग चीजों को दर्शाता है। वृंदावन ये एक वन का नाम है, वृंदावन ये एक पूरे इलाके का भी नाम है। तो जो बारह वनों से बनता है उसको भी वृंदावन कहते हैं। अभी तो एक तरह से कृष्ण मथुरा से वृंदावन गए थे। मतलब उनको लेके गए उनके पिताजी वसुदेव, तो वृंदावन सीधे वो नहीं गए थे, वो गोकुल में थे। तो वहाँ से फिर कृष्ण को उनके माता-पिता वहाँ से ले कर गए। जंगल को माता-पिता वहाँ से लेकर गए। गोकुल में हैं, तो क्या है कि कृष्ण के जीवन में बहुत खतरे हैं। तो क्या होता है, कभी-कभी कृष्ण के पास खतरे आते हैं, कभी-कभी कृष्ण खतरों के पास आते हैं। तो जो असुर आते हैं, तीन असुरों का वर्णन है प्रधान रूप से, जो हैं पूतना, शकटासुर, और तृणावर्त।
खतरों से बचाव और स्थान परिवर्तन
तो ये जो तीन हैं, एक दिन असुर आये थे और फिर कृष्ण जो हैं, वो दामोदर लीला में वो खुद उन वृक्षों के पास चले गये थे। तो अभी वो सोचते हैं, ऐसे क्यों हो रहा है? अभी हमारा कोई छोटा बच्चा होगा, और बार-बार कुछ हादसे हो रहे हैं, कुछ खतरा आ रहा है, वो बच रहा है, कृष्ण को एक बार भी कुछ खरोंच नहीं आती है, पर बहुत बड़े खतरे होते हैं ये। तो अभी अगर हमारे बच्चे के पास ऐसे हो रहा है, तो हम चिंता करेंगे, क्या हो रहा है ये, क्या कारण हो सकता है? तो जब हम कुछ देखते हैं, कुछ घटना होती है, हम उसको समझने का प्रयास करते हैं, और जब समझ में नहीं आती है, अच्छा इसने कुछ किया, उसने कुछ किया, नहीं समझ में आते हैं, तो फिर हम कुछ बड़े स्तर पर सोचते हैं।
तो व्रजवासी ऐसा सोचते हैं हमेशा कि शायद ये जगह में कुछ समस्या है, शायद ये जगह के कारण कुछ खतरा आ रहा है। तो फिर हमें क्या करना चाहिए? इस जगह से दूर जाना चाहिए। और फिर वहाँ से वृंदावन जाते हैं। अभी ये भी कृष्ण के माता, पिता का, उनके प्रति प्रेम का लक्षण है और सारे व्रजवासियों का। अभी कल्पना कीजिये कि कोई परिवार है वो अपने बच्चे के लिए शायद घर एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट कर सकते हैं। पर यहाँ पे जब कृष्ण को शिफ्ट करना है, तो कृष्ण नंद महाराज और यशोदा के पुत्र हैं, वो गोकुल के राजा हैं। तो फिर वो अगर हिलने वाले हैं तो सारे व्रजवासी जो हैं वो एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं। मान लीजिए पूरा शहर ही है, पूरा गाँव ही है वो, पूरा एक जगह से दूसरी जगह जा रहा है। तो यह बहुत बड़ा एक तरह से इसके लिए योजना बनानी पड़ती है।
जंगल जाने की उत्सुकता और माता-पिता का प्रेम
और फिर, जब कृष्ण जाते हैं तो वो पहली बार है कि वो वास्तव में घर से बाहर जंगल में आये हैं और जंगल में आते हैं। उसके बराबर बीच में नंद महाराज का घर है। तो वो राजा हैं, तो बीच में उनका घर है। तो कृष्ण वहाँ पे खेलते हैं, पर कृष्ण को जो पहली बार जंगल दिखता है, एक तरह से वृंदावन तो गाँव ही है, वहाँ पे पंछी होते हैं, जानवर होते हैं, बंदर होते हैं, पर गाँव में थोड़ी हरियाली होती है, पर जो जंगल में हरियाली होती है, वो और बहुत ज़्यादा होती है। तो जब कृष्ण वो देखते हैं, तो उनका मन उससे आकर्षित हो जाता है। तो मुझे जंगल जाना है। अभी वो कैसे जाएंगे जंगल? छोटे बालक हैं, माँ तो जाने नहीं देगी, कि माँ को पहले से बच्चे का खतरा है, तो जाने ही नहीं देगी। तो अभी सोचते हैं क्या करें? तो वो देखते हैं कि क्या है? बाकी सब ग्वाले तो जा रहे हैं। और वो ग्वाले क्यों जा रहे हैं? वो बछड़ों को चराने के लिए।
तो अभी छोटे बच्चे एक तरह से मासूम होते हैं, पर वो एक तरह से चालाक भी होते हैं। तो अभी किसी बच्चे को कुछ चाहिए है, तो कौन सी चीज़ माँ को पूछनी है, कौन सी चीज़ पिताजी को पूछनी है, वो बच्चों को पता होता है। यह मैं माँ को पूछूँगा, तो माँ हाँ बोलेगी, पिताजी को पूछते हैं, नहीं बोलेंगे तो। तो माँ को पूछते हैं, माँ ना बोलती है, तो पिताजी को बोलते हैं, माँ से बात करो आप। तो अभी कृष्ण जानते हैं, कि यशोदा माई तो उनको जाने नहीं देगी। तो एक दिन, जब नंद बाबा आते हैं घर में, तो वो गायों के बारे में, गायों को कैसे चराते हैं, उसके बारे में बड़े उत्साह से सवाल पूछने लगते हैं।
तो अभी कृष्ण जिज्ञासु होते हैं, वैसे जिज्ञासु होते हैं, पर इस दिन बहुत जिज्ञासा दिखा रहे हैं। और फिर एक दिन, दो दिन, तीन दिन ऐसा होता है, कई दिन तो चलता है, नंद महाराज बड़े प्रसन्न हो जाते हैं। कृष्ण अभी, कृष्ण थोड़ा नटखट हैं, अभी कृष्ण जिम्मेदार बन रहे हैं। कि जो हमारा पेशा है, जो हमारे वर्ण का धर्म है, वह जिम्मेदारी स्वीकार करने के लिए, कृष्ण भी तैयार हो रहे हैं। तो नंद महाराज कुछ सोच रहे हैं, कृष्ण कुछ और ही सोच रहे हैं। कृष्ण क्या कर रहे हैं, इस तरह से रुचि दिखा कर, वो सोच रहे हैं कि, मुझे घर से बाहर जाना है, मुझे जंगल जाना है।
और फिर कुछ दिन बात करने के बाद, वो नंद बाबा से कहते हैं कि, क्या मैं बछड़ों को चरा सकता हूँ? तो जब, ये कहते हैं, तो बाकी सब मेरे मित्र जा रहे हैं, और मैं भी जाना चाहता हूँ, जो आपने सिखाया है, मैं उसको अमल करना चाहता हूँ, मैं भी गायों की देख, बछड़ों की देखभाल करना चाहता हूँ। तो “तृणचरानुगं” जो गोपी गीत में बताया गया है कि, जो तृणचर हैं, जो गाय हैं, जो तृण खाते हैं, उनके पीछे कृष्ण जाते हैं। तो कृष्ण जाने की इच्छा व्यक्त करते हैं, और तभी वो यशोदा माई को बोलते हैं। यशोदा माई कहती है, नहीं! कृष्ण को हम घर में रखते हैं, और घर में खतरे आते हैं, बाहर जाएगा तो बाहर कितने खतरे आएंगे, तो मैं कृष्ण को नहीं जाने दूँगी।
बलराम जी की भूमिका
तो वो अभी यह सुनके, कृष्ण बड़े नाराज़ हो जाते हैं, रूठ जाते हैं, और फिर नंद महाराज कहते हैं, कि तुम कब तक इसको घर में रखने वाले हो, उसको बड़ा तो होना है, उसको जिम्मेदार बनना है। तो वो बोलते हैं, नहीं पर उसकी ही सुरक्षा के लिए हम, गोकुल से यहाँ पर आये हैं, अभी उसकी सुरक्षा करने की जगह, हम ही उसको खतरे में भेज रहे हैं, ऐसे कैसे कर सकते हैं? फिर भी, अभी कृष्ण सोचते हैं, क्या करना है। तो कृष्ण, जाते हैं नंद बाबा के पास, कृष्ण से बड़े होते हैं, दाऊजी। तो, अभी जो दाऊजी होते हैं, अभी यशोदा माई, कृष्ण पर ज़्यादा विश्वास नहीं करती हैं, पर वो, बलराम जी पर विश्वास करती हैं।
कैसे कि दो चीज़ें जो हैं, यह एक नहीं हैं, एक है लव (Love), और दूसरा है ट्रस्ट (Trust)। तो, प्रेम करना, और विश्वास करना, यह अलग-अलग चीजें हैं। हम कुछ लोगों पर विश्वास कर सकते हैं, पर उनसे प्रेम नहीं करते हैं। कोई हमारी सर्जरी करने वाला है हमें, तो, डॉक्टर के पास, सर्जन के पास, हम अपना शरीर दे रहे हैं, मेरा पेट काटो, आप सर काटो, हमें श्रद्धा-विश्वास है, पर उनसे प्रेम नहीं करते हैं। अगर यह हमारे माता-पिता हैं, बच्चे हैं, बच्चों पर बहुत प्रेम है, पर बच्चों पर श्रद्धा नहीं होगी, यह तो नटखट है, अभी तो जिम्मेदार नहीं है। तो लव और ट्रस्ट यह दोनों अलग चीज़ें हैं। तो अभी मदर यशोदा लव्स कृष्णा, पर शी ट्रस्ट्स बलराम (Mother Yashoda loves Krishna, but she trusts Balarama)। तो उनका कृष्ण के प्रति प्रेम है, पर बलराम जी के प्रति श्रद्धा है उनकी।
तो नंद बाबा कहते हैं कि, बलराम कृष्ण को संभाल लेंगे। तो अभी कृष्ण बलराम की ओर देखते हैं, और वो बलराम से याचना करते हैं, तो तुम मान लो। तो बलराम सोच रहे हैं कि, कृष्ण तो बड़ा नटखट करता है, कैसे संभालेंगे इसको? तो कृष्ण जानते हैं, पर वो क्या करते हैं, ठीक है, तो बोलते हैं कि प्लीज, प्लीज, कृष्ण कहते हैं। तो बलराम जी कहते हैं, ठीक है। तो फिर कृष्ण बड़े आनंदित हो गए, बलराम को जाके आलिंगन कर लेते हैं। और फिर कहते हैं, यशोदा माई ऐसे कहती हैं, कि अभी मुझे आप जाने दो। यशोदा माई कहती हैं, तुम बलराम जी की बात मानोगे हमेशा, बलराम जी को बोले बिना कहीं नहीं जाओगे तुम।
घर से आज़ादी और ग्वालों का बुलाना
अभी कृष्ण हाँ बोल रहे हैं बाहर से, अंदर से बोल रहे हैं, मैं जो करने वाला हूँ, करने वाला हूँ। तो कृष्ण को अभी घर से आज़ादी चाहिए, उसको घर से बाहर जाना है, कृष्ण को जंगल में खेल-कूद करनी है, जंगल को एक्सप्लोर (explore) करना है, वहाँ पे बड़े-बड़े एडवेंचर्स (adventures) करने हैं। तो अभी फिर कृष्ण और बलराम, दोनों बाकी ग्वालों के साथ जाने लगते हैं।
और जब वह जाते हैं, तो रोज़ सुबह, जब क्या हो रहा है, अभी कृष्ण तो बड़े उत्साही हैं, तो अभी ये प्रसंग ऐसे क्यों हो रहा है, कि बाकी सारे ग्वाले आ गए हैं, और वह कृष्ण से कह रहे हैं, “आकारयामासुरनन्तमाद्यम्” – कृष्ण जल्दी करो, तुम्हें उठना है, तुम्हें चलना है, हम सब तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं। तो क्या कृष्ण उत्साही नहीं हैं? क्या कृष्ण आलसी हैं? बाकी ग्वालों को क्यों बोलना पड़ रहा है? अगर हम किसी चीज़ के लिए उत्साही होते हैं, तो हम पहले आ जाते हैं, और फिर, बाद में देखते हैं, और कौन नहीं आया है, कौन नहीं आया है। तो कृष्ण तो इतने उत्साही होते हैं, तो यहाँ पर क्या हो रहा है?
यशोदा माई चाहती नहीं कि कृष्ण जाएँ बाहर, तो इसलिए, जब रोज़ सुबह यशोदा माई कृष्ण को नहलाती हैं, कृष्ण को वस्त्र पहनाती हैं, तो जान-बूझकर वो ज़्यादा समय लगाती हैं। जितना ज़्यादा समय लगाती हैं वो, ताकि कृष्ण उनके करीब रहें, कृष्ण का सानिध्य उनको रहे। तो वृंदावन में एक तरह से, एक लविंग कॉम्पिटिशन (loving competition) होता है, कि हू विल गेट द मैक्सिमम टाइम विथ कृष्णा (Who will get the maximum time with Krishna), कि सबसे ज़्यादा समय किसको, किसके हाथ मिलेगा। तो यशोदा माई जान-बूझकर, वो धीरे-धीरे काम करती हैं, तो कृष्ण कहते हैं जल्दी करो, नहीं, वो कहती हैं रुक जाओ, अभी तक साफ-सफाई नहीं हुई है। तो फिर इसलिए बाकी सारे ग्वाले तैयार हो गए हैं, और फिर कृष्ण जो हैं, वो अभी तक वहाँ पर रुके हैं।
मैं जब पुणे में था, तो मैं एक कांग्रिगेशन प्रोग्राम (congregation program) को लेता था, तो मैं मंदिर में रहता था, मैं था दस साल पुणे में, तो ज़्यादा मुझे घूमने का प्रोग्राम नहीं होता था, मैं ट्रेवल (travel) भी करता हूँ, मंदिर में जाता हूँ, देशभर में जाता हूँ, वहाँ पर प्रवचन करता हूँ। मैं पुणे के बारे में उतना पता नहीं था मुझे। तो एक भक्त मुझे कार्यक्रम पर ले जाते थे, बोलते हैं हमको लगभग एक घंटा लगता है इस कार्यक्रम जाने के लिए। तो फिर मैं बराबर एक घंटा पहले रेडी रहता हूँ, मुझे था दूर है। तो फिर 3-4 महीने तक वह भक्त लेकर गए मुझे, और फिर, वो भक्त एक बार अवेलेबल नहीं थे, तो दूसरे भक्त भी लेकर जाने वाले थे उनके कार में। तो मैं उनको बोला कि, आप कितने बजे निकलेंगे, वो साढ़े सात बजे बोल रहे हैं। हाँ बिल्कुल, पंद्रह मिनट में? मुझे तो हम पंद्रह मिनट में ही पहुँच गए। तो फिर वो, उस बाद में मैंने उस भक्त को कॉल किया, पूछा ये पंद्रह मिनट में भी जा सकते थे, एक घंटा कैसे लग रहा था आपको? वो बोले कि मुझे आपसे सवाल पूछने थे इसलिए मैं जान-बूझकर आपको पुणे घुमाता था।
तो ये प्रसंग तो काफ़ी पहले हो गया था, पर जब मैं ये श्लोक सुना तो फिर ये, हमें थोड़ा बहुत आकर्षण होगा किसी व्यक्ति से जिससे हम प्रेम करते हैं उनके साथ हमें समय बिताना है। पर अभी जब एक बार राधानाथ महाराज हमको बता रहे थे कि वो एक भक्त की कार में जा रहे थे, तो वो भक्त बहुत धीरे से कार चला रहे थे। तो महाराज उनको बता रहे थे, “Why are you going slowly?” महाराज, you are there I want to drive very safely, मुझे बहुत सुरक्षा के साथ ड्राइव करना है। तो महाराज बोलते हैं हाँ वो ठीक है, पर हम इतना धीरे जाएंगे तो कार्यक्रम खत्म होने के बाद हम वहाँ पहुँचेंगे।
कृष्ण का दर्शन और गोपियों का प्रेम
तो अभी कृष्ण के प्रति कितना आकर्षण होगा और यशोदा माई जो हैं वो कृष्ण से दूर जाना ही नहीं चाहती हैं। इसलिए वो कृष्ण को तैयार होने में और समय लगा देती हैं। पर अंत में कृष्ण कहते हैं नहीं चलो अभी निकलना है हमको, तो फिर कृष्ण निकलते हैं।
और जब कृष्ण निकलते हैं बाहर अपने घर से, तो वो कृष्ण का घर से बाहर आना, यही एक वृंदावन में उत्सव हो जाता है। अगर यह वृंदावन है, यह उनका गाँव है, यहाँ पर नंद महाराज का घर है, और यहाँ से रास्ता है जहाँ से जंगल में जा रहे हैं, तो क्या होता है आजू-बाजू में छोटे-छोटे घर हैं। तो यह सारे घरों के बाहर रस्ते पर सारे व्रजवासी आ जाते हैं। तो जो-जो व्रजवासी बाहर आते हैं, बाहर से वो कृष्ण को निहारते हैं, देखते हैं, कृष्ण का दर्शन करते हैं। जो थोड़ी तरुण गोपियां होती हैं, वो अभी अपने घर के जो टेरेस (terrace) हैं वहां पर जाती हैं और वहां से कृष्ण को देखती हैं। और धीरे-धीरे कृष्ण जाते हैं, तो सब उनको देखते हैं। और इस तरह से कृष्ण का घर से बाहर निकलना भी एक बहुत प्रेम के आदान-प्रदान का लक्षण है।
और फिर अंत में जब कृष्ण वृंदावन से बाहर निकलते हैं, सारे व्रजवासी देख रहे होते हैं कृष्ण को, कब तक कृष्ण हैं। तो अभी साधारणतः जो क्षत्रिय और वैश्य हैं वो जिस तरह से कार्य करते हैं उसमें फर्क होता है। क्षत्रिय जो हैं वो लोगों को लीड करते हैं, लोगों की देखभाल करते हैं। वो जो ब्राह्मण होते हैं, ब्राह्मणास आर कंसर्नड विथ आइडियाज (Brahmanas are concerned with ideas)। क्षत्रिय और वैश्य और देखभाल करते हैं। वैश्य और देखभाल करते हैं। क्षत्रिय जो युद्ध करने जाते हैं, तो क्षत्रिय की अपेक्षा ऐसी होती है कि वो सेना में सबसे आगे हों, वो सबको एक उदाहरण दें, वो सबसे आगे। नहीं, वैश्य सबसे पीछे होते हैं। सारी गायां आगे होती हैं, और वो सबसे पीछे रहते हैं कि कोई गायां पीछे नहीं रह जाये, कोई इधर-उधर नहीं चली जाये, तो पीछे से सारी गायों को देख रहे हैं।
तो अगर कोई राजा है, कोई सैनिक, भाग तो नहीं जाएगा रणभूमि से? तो अगर ऐसे हो रहा है तो उसको सैनिक नहीं होना चाहिए, कभी पीछे से निहारना पड़ रहा है कौन भाग रहा है यहाँ से। दुर्भाग्य से जब ये रशिया और यूक्रेन में युद्ध चल रहा है, मैं कुछ दिन पहले देख रहा था, जब जनसाधारण लोग हैं, उन सब को अभी ज़बरदस्ती सेना में भर्ती किया जा रहा है। और अभी उनके सारे जो युवा हैं वो मारे गए, तो अभी जो 15 साल के छोटे बच्चे हैं उनको भी कॉन्स्क्रिप्ट (conscript) कर रहे हैं, जो 45-50 साल से ऊपर बूढ़े हैं उनको भी अभी ज़बरदस्ती मिलिट्री में डाल रहे हैं। तो अभी ये बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति है। अभी तक वहाँ पे पाश्चात्य देशों में फेमिनिज्म (feminism) है, यहाँ पे नहीं है, तो यहाँ पे कभी स्त्रियों के साथ ज़बरदस्ती नहीं कर रहे हैं, पर फिर भी ये मुश्किल जगह है। तो कभी ज़बरदस्ती उनको सेना में डाल लेते हैं और जिनको प्रशिक्षण नहीं है, उनकी वैसी वृत्ति नहीं है, तो कभी कोई लोग वहाँ से भाग जाते हैं। तो वो क्षत्रियों का अलग लक्ष्य है।
पर वैश्य जो हैं वो जानवरों के पीछे होते हैं। तो कृष्ण आखिरी में जाते हैं, तो इसका एक फायदा होता है कि जब कृष्ण बाहर जा रहे हैं, तो फिर वो सब कृष्ण को देख सकते हैं, अंत तक कृष्ण को देख सकते हैं। पर जब कृष्ण वापस आते हैं, तो अंत तक कृष्ण दिखाई नहीं देते हैं। क्योंकि पहले क्या होता है जब गायां आ रही हैं, तो वृंदावन की धूल उड़ जाती है, तो धूल उड़ जाती है तो उससे बादल जैसा हो जाता है। तो बादल के बीच में से क्या आ रहे हैं, कौन आ रहे हैं, उसको देखना मुश्किल होता है। सारी गायां हैं, सारे ग्वाले हैं, और उनके पीछे कृष्ण हैं। तो जब व्रजवासी देख रहे हैं कृष्ण को सुबह जाते हुए, वो जानते हैं कि अभी शाम तक हम कृष्ण को पुनः देख नहीं पाएंगे।
ग्वालों का आह्वान और भगवान की सनातनता
तो इस तरह से ये जो ग्वाले जब कृष्ण से कह रहे हैं, “आकारयामासुरनन्तमाद्यम्” हे कृष्ण अभी उठो जल्दी हमको बाहर जाना है। तो ये केवल कृष्ण को बुलाया नहीं जा रहा है, ये आवाज़ सुनकर सारे व्रजवासियों को बुलाया जा रहा है। सारे व्रजवासी समझ रहे हैं कि अभी कृष्ण निकल रहे हैं बाहर, अभी हमें बाहर आना है। तो अभी इसमें जो “आकारयामासुर अनन्तमाद्यम्” जल्दी आ जाओ, आप अनन्तमाद्यम्। तो अनन्तमाद्यम् मतलब जो भगवान की कोई शुरुआत नहीं है, जिनका कोई अंत नहीं है। तो जो भगवान सनातन हैं, अभी सनातन का मतलब क्या है कि उनको कुछ कमी नहीं है, कुछ करने की कुछ ज़रूरत नहीं है, पर वो जो भगवान हैं हमेशा शाश्वत हैं, वो अभी गायों को चराने को जा रहे हैं, चराने को जा रहे हैं वो।
तो यह जो वर्णन है, कैसे कल चर्चा कर रहे थे कि यह हर एक श्लोक हमारे लिए स्मृति के लिए एक ऐड (aid) है। तो एक और बार हम दोहराते हैं इसको श्लोक को:
गोविन्द दामोदर माधवेति।
असुरों का आना और कालियादह की घटना
तो अभी जैसे ही कृष्ण बाहर जाते हैं, तो जो असुर होते हैं, वो कृष्ण के पीछे आते हैं, क्योंकि कृष्ण तो घर में ही होते हैं। जब कृष्ण वृंदावन जाते हैं, तो सारे जो असुर होते हैं, वह बाहर आते हैं। अभी उसकी बातें हैं, जो भी असुर हैं, धेनुकासुर है, अघासुर है, बकासुर है, ये सारे जो असुर हैं, वह कृष्ण को जंगल में मिलते हैं।
अब इसका कारण यह होता है कि जो असुर होते हैं, वह चाहते हैं कि हमें कृष्ण को मारना है और अभी असुरों को एक तरह से बड़ा आत्मविश्वास होता है, कि हम कृष्ण को आसानी से मार डालेंगे। पर फिर भी उनको कुछ संशय होता है कि हर असुर आता है वृंदावन में और असुरों के लिए क्या होता है? वो भगवद्गीता का श्लोक हो जाता है, “यद्गत्वा न निवर्तन्ते”, वो वहाँ पर जाते हैं और वहां से वापस ही नहीं आते हैं। तो अभी जो पूतना के साथ क्या हुआ, तृणावर्त के साथ क्या हुआ, वहां पर जो है कृष्ण, कृष्ण ने क्या किया कुछ तो किया, वो पता होता है क्योंकि वो वहाँ पे किसी ने देखा होता है। पर बाद में जो असुर होते हैं उनका कैसे एक्जेक्टली (exactly) वध होता है वो कंस को पता नहीं चलता है।
अभी कंस और रावण जो हैं, वो दोनों एक तरह से, एक गलती करते हैं। या वो गलती करते हैं, जो उनके असुर हैं, उनके साथ में वो गलती करते हैं। पर कोई भी हो, क्या होता है कि, वो अभी रावण, जो राम जाते हैं लंका में आक्रमण करने के लिए, वो आक्रमण नहीं करने जाते वो सीता को पुनः प्राप्त करने जाते हैं और रावण, उनको युद्ध करने की कोई ज़रूरत नहीं है, पर स्वीकार नहीं करते हैं। तो उस समय क्या होता है कि जब उन्हें युद्ध करना होता है, तो रावण का और रावण के योद्धाओं का ऐसा अहंकार होता है, वो सोचते हैं कि हमारे लिए ये, हम में से एक अकेला ही काफी है। तो इसलिए रावण ने अपने महारथियों को रावण के साथ, वो सारे लोगों को एक-एक करके भेजते हैं। रावण ने मूलतः अपने महारथियों, इंद्रजीत, रावण और बहुतों को एक-एक करके भेजा।
जैसे क्रिकेट मैच होती है, तो क्या होता है कि अगर फॉरेन सॉइल (foreign soil) पर हो रहा है, दूसरे के देश में भी अगर मैच हो रहे हैं, तो क्या होता है कि वो थोड़ा मुश्किल होता है जीतना। भारत को भारत में जीतना आसान है काफी, भारत को परदेश में जाके जीतना थोड़ा मुश्किल होता है। तो क्या है अभी रावण जो होम टेरिटरी (home territory) पर होता है, पर फिर भी वो उसका होम एडवांटेज (home advantage) इस्तेमाल नहीं करता है, वो उसका अहंकार होता है। अभी कंस का भी उसका अहंकार होता है, उसके पास असुर होते हैं, पर सारे असुर को साथ में नहीं भेजता है, वो एक-एक असुर को भेजता है। और सारे असुर कहते हैं कि पता नहीं पूतना को क्या हो गया, पर तृणावर्त कहता है, मैं संभाल लूंगा उसको, कृष्ण को, हर एक असुर ऐसे ही कहता है।
तो अभी कुछ क्या होते हैं, वृंदावन में, कुछ विजिटिंग डीमन्स (visiting demons) होते हैं, और कुछ रेजिडेंट डीमन्स (resident demons) होते हैं। कुछ आने वाले असुर और कुछ रहने वाले असुर होते हैं। इन रहने वाले असुरों में कालिया है, तो अभी ये हमें पता रहता है कभी खतरा कृष्ण के पास आता है, कभी कृष्ण खतरे के पास आते हैं। तो जो विजिटिंग डीमन्स (Visiting Demons) होते हैं, जो बाहर से आते हैं, वो कृष्ण के पास आते हैं। पर जब कालिया होता है, कृष्ण कालिया के पास जाते हैं।
कालियादह में कृष्ण का कूदना
तो जो कृष्ण कालिया के पास जाते हैं, तो ये सुनके अभी क्या होता है, उसका वर्णन श्लोक में कि सारे व्रजवासी जानते हैं कि जो कालिया दह है वो बहुत खतरनाक है। पर अभी कृष्ण उस दह के पास आते हैं, कृष्ण उसमें कूद जाते हैं, तो यह क्या कर दिया कृष्ण ने, यह सोच के सारे व्रजवासी चिंतित हो गए।
“जलाशये कालियमर्दनायः यदा कदम्बादपतन्मुरारिः”
कल भी मुरारी शब्द आया था कि “कुवाच सत्यम् भुदहे मुरारे” ये यशोदा माई कह रही हैं। तो यहाँ पे क्या हो रहा है, “कदम्बादपतन्मुरारिः”, जो मुरारी हैं कूद जाते हैं।
“गोपाङ्गनाश्चुक्रुशुरेत्य गोपाः”
तो सारे गोपियाँ, सारे ग्वाले दौड़ते हैं, वो वहां पर चले जाते हैं क्योंकि ये क्या हो गया है, कृष्ण ने ऐसे क्यों किया है, अभी क्या होने वाला है। जो बूढ़े जो चल नहीं सकते हैं और एक साल के बच्चे जो चल नहीं सकते वो सब दौड़ने लगते हैं। सारे वृंदावन के वासी दौड़ने लगते हैं।
अभी जो अलग-अलग असुर होते हैं वृंदावन में आते हैं, एक तरह से जो वृंदावन में आते हैं कृष्ण उनका वध कर देते हैं। पर कालिया वृंदावन में होते हैं, कालिया का वध वृंदावन में नहीं करते हैं, कृष्ण उसको वृंदावन से बाहर भेज देते हैं। पर वो अंत में हो रहा है। यहाँ पर जो इस प्रसंग में हो रहा है, कल हमने चार स्तर पर चर्चा की, लिटरल (Literal), एथिकल (Ethical), एलिगोरिकल (Allegorical) और डिवोशनल (Devotional), कि अलग-अलग स्तर पे हम कृष्ण लीला को समझ सकते हैं।
तो अभी यहाँ पर ऐसे बताया गया है कि जो कालिया होता है, वृंदावन ये एक बहुत ही सुन्दर दिव्य जगह है। पर ऐसे दिव्य जगह में भी क्या एक असुर है और ना केवल वो रह रहा है, वो रह रहा है और उसका इतना प्रभाव है कि ऐसे बताया जाता है कि ऊपर से कोई पंछी भी आते हैं तो कालिया का जो जहर है वो इतना खतरनाक होता है, इतना भयावह होता है कि पंछियों को उसका जो वाष्प है उसके जो धुएं हैं, स्पर्श कर देता है उससे वो गिर जाते हैं, उनकी मृत्यु हो जाती है। तो ये ऐसे वास्तव में वृंदावन जैसी दिव्य जगह में कैसे इस तरह से कालिया जैसे कोई असुर, इतना भयानक व्यक्ति रह सकता है।
दैवी और आसुरी प्रवृत्तियाँ
ये जो है अगर हम जो एलिगोरिकल (Allegorical) स्तर पे देखते हैं तो क्या होता है कि जो मानव हृदय होता है वो दो प्रकार के होते हैं। भगवद्गीता में बताते हैं कि “द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च”। तो दो प्रकार के लोग होते हैं। कुछ होते हैं दैवी प्रकृति, कुछ होते हैं आसुरी। कुछ बुद्धिमान होते हैं, कुछ बुद्धिहीन होते हैं। तो अभी जो इस प्रकार के लोग होते हैं, जो दैवी प्रकृति के लोग होते हैं, उनका एक स्वभाव होता है। और जो आसुरी प्रकृति के लोग होते हैं, उनका अलग स्वभाव होता है। पर ऐसे बताया जाता है कि जो आसुरी प्रकृति के लोग हैं, उनका अधिकांश जो हृदय होता है, वो काला होता है। यहाँ पर लाल है, काला दिखा नहीं सकता मैं। पर उसमें भी थोड़ा सा कुछ अच्छा होता है। और कृष्ण जो होते हैं, वो थोड़ा सा अच्छाई को देखते हैं।
पूतना जब उनका वध करने आती है, तो कृष्ण देखते हैं कि यह मुझे अपना दूध दे रही है। तो उसके विपरीत, जो दैवी प्रकृति के लोग होते हैं, उनका हृदय जो होता है, वो अधिकांश अच्छा होता है, पर उसमें भी कभी कुछ बुराई होती है। तो एक तरह से इस जगत में कोई भी पूर्णतया शुद्ध नहीं होता है। यह जगत का ही प्रभाव है कि कुछ हद तक जो अशुद्धता आ जाती है। भगवद्गीता के पांचवें अध्याय के 23वें श्लोक में भगवान कहते हैं कि:
“शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥”
वो कहते हैं कि काम और क्रोध का जो वेग है, जो व्यक्ति का शरीर है, शरीर के साथ ये वेग आ ही जाएगा तो उसको हमें सहन करना सीखना है। और बहुत शुद्धिकरण होने के बाद “कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्”, उसको बहुत समय लगता है। पर भगवान अर्जुन से कहते हैं, ऐसी अपेक्षा हमें करनी है कि इसको सहन करना है।
तो जो टॉलरेंस (tolerance) होता है, सहन करना उसका अर्थ क्या है? जो टॉलरेंस है उसका अर्थ है, एक्सेप्ट प्रेजेंस बट डोंट एक्सेप्ट इन्फ्लुएंस (accept presence but don’t accept influence)। कि वो चीज तो होगी पर उसका प्रभाव नहीं होना चाहिए। तो अब हम सबके हृदय में जो होता है, जो कुछ अनर्थ हो गए, जैसे कालिया वृंदावन में था वैसे हम सबके हृदय में भी कुछ अनर्थ होते हैं और जब अनर्थ होते हैं तो उनको तुरंत हम निकाल नहीं सकते हैं। “जीव जागो! जीव जागो! गोराचाँद बोले… अनर्थ जागो, अनर्थ जागो!” ऐसा नहीं करना है।
बच्चों का स्वभाव और ग्वालों की कालियादह यात्रा
अब जो ये व्रजवासी होते हैं, उनको शुरुआत में बताया जाता है कि बच्चों की क्या होती है? कि जो उनको बोल रहा है नहीं करना है, कभी-कभी वो ही करते हैं। तो अभी किस तरह से हम बाउंड्रीज (boundaries) देते हैं, एक माता-पिता की एक तरह से ज़िम्मेदारी है कि बच्चों को बाउंड्रीज सिखाना, सीमाएं सिखाना। यह कोई छोटा बच्चा है जब वो बड़ा हो रहा है, तो उसको एक अपनी ज़िम्मेदारी का बोध होना चाहिए। उसको एक शब्द हमेशा सुनना चाहिए ‘नहीं’। तो उसको प्रेम देना चीज़ अलग है, छोटे बच्चे को समझ भी नहीं आता है क्या खतरा है क्या अच्छा नहीं है। मान लीजिए किसी के क्लासरूम (classrooms) में, नर्सरी स्कूल में, कोई माँ कहे कि उसको कुछ और चाहिए तो मैं तुमको और देती हूँ, उसके प्लेट से मत खाओ, क्या प्रॉब्लम है? मैं तो यह मेरी बहन ही है, हम घर में ही हैं। पर क्या होता है जब वो कार्य करता है वो आदत हो जाती है। मान लीजिए 15 साल के बाद वो अभी युवक बन गया है, कंपनी में कॉर्पोरेट डिनर चल रहा है और उसके प्लेट से खाना खत्म हो गया और किसी और के प्लेट से खाने लग गया तो? अगर बचपन में boundaries नहीं सिखाएंगे, सीमाएं नहीं सिखाएंगे तो भविष्य में बहुत problem आ जाएगी।
तो अभी तो basically point क्या है कि एक तरह से छोटे बच्चों को क्या नहीं करना है ये बताना ज़रूरी है, सीमाएं देना ज़रूरी है। पर जो छोटे बच्चों की जो बुद्धि होती है कि अगर कुछ बोलते हैं ये नहीं करना है तो फिर वो करना चाहते हैं। तो अभी जब ऐसी प्रवृत्ति होती है तो कभी डांटना पड़ता है, कभी उनको संभालना पड़ता है।
तो अभी जब बच्चों को बताया जाता है कि तुम कालियादह के पास में मत जाओ, तो यहाँ पर सवाल आता है कि जो उनको बताया गया, तो कालियादह के पास में क्यों जाते हैं? तो इसके अलग-अलग तरह से बताये गए हैं कारण पर इसका प्रधान रूप से क्या बताते हैं कि दो हैं कि एक है फियरलेसनेस (fearlessness) और दूसरा है थॉटलेसनेस (thoughtlessness)। वो सोचते हैं कि कृष्ण हमारे साथ हैं, कृष्ण ज़रूर हमारा संरक्षण करेंगे। पर दूसरा वो सोचते हैं कि हम अभी जो अलग-अलग आचार्य हैं, अलग-अलग आचार्यों का अलग-अलग भाव होता है। तो जो वृंदावन में वही लीलाएं होती हैं, अलग-अलग आचार्य कहते हैं कि ये लीला इसके कारण हो रही है। तो कभी जब तालवन में धेनुकासुर जहां पे होता है वहां पे ताल वृक्ष के फल खाने होते हैं तो ग्वाले कहते हैं कि हमको खाना है। तो उनको खाना होता है पर कुछ आचार्य कहते हैं कि वास्तव में उनको खाना नहीं होता है, वह देखते हैं कि कुछ आचार्य कहते हैं कि ग्वाले एक तरह से कृष्ण की शक्ति देखना चाहते थे और दिखाना चाहते थे सबको, क्योंकि जब कालिया का वध हुआ तब तक काफी असुरों का कृष्ण ने वध कर चुका था। कालिया का दमन किया कृष्ण ने, उसके पहले कृष्ण ने काफी असुरों का वध किया था।
तो जो ग्वाले हैं वो कालिया दह के पास में आते हैं और न केवल कालिया दह के पास में आते हैं, ऐसे बताते हैं कि वो जाके वहाँ पे उसका पानी पी लेते हैं और जब पानी पी लेते हैं तो उससे उन सब की मृत्यु हो जाती है। और तब कृष्ण आते हैं, कृष्ण देखते हैं, कृष्ण अपनी दृष्टि से सारे ग्वालों को पुनः जगा देते हैं, पुनः जीवन दे देते हैं। तो प्रभु श्रीराम चंद्र को जब लक्ष्मण को पुनः जीवन देना होता है, तो हनुमान जी संजीवनी ला जाते हैं। कृष्ण जो होते हैं वो अपनी आँखों में ही संजीवनी देते हैं, अपनी दृष्टि से ही वो जो सारे ग्वालों को पुनः जीवित कर देते हैं।
कृष्ण का कालियादह में कूदना
तो अभी ये हो गया तो ग्वाले तो जीवित हो गए, फिर अभी कृष्ण चले जाते हैं वहाँ से। तो अभी ग्वाले खतरे में गए हैं तो कृष्ण जो सोचते हैं कि मैं और खतरे में जाऊंगा अभी। तो ग्वाले तो कालियादह के बाजे में जाकर पानी पी रहे थे पर कृष्ण उस कालियादह में ही कूद जाते हैं। तो क्या होता है यहां पे, जब ग्वाले ये थोड़ा केयरलेसनेस (carelessness) है, जो कुछ भी हो, उसके कारण जब उनको खतरा होता है, जब उनको खतरा होता है तभी कृष्ण फैसला करते हैं अभी कालिया को यहां पे मैं नहीं रखने वाला हूँ। तभी वो कालिया का दमन करने का फैसला करते हैं।
तो उसी तरह से हमारे हृदय में अनर्थ होते हैं। तो भागवत बताता है कि जब भागवत का श्रवण करते हैं, भगवान का कीर्तन करते हैं तो “नष्टप्रायेष्वभद्रेषु”, अधिकांश अभद्र होते हैं नष्ट हो जाते हैं पर कुछ होते हैं, वह नष्ट नहीं होते हैं उसके लिए भगवान का प्रसाद लगता है। उसके लिए “प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते”। यह भगवद्गीता में आता है, पर वही भाव, भागवत में भी आता है। तो यह कालिया जैसे अनर्थ हैं, हमारा हृदय वृंदावन जैसे हो सकता है, पर फिर भी हमारे हृदय में भी कालिया जैसी कुछ चीजें हैं, उनको भी उत्तेजित नहीं करना है। जब भगवान अपनी इच्छा के अनुसार, अपनी योजना के अनुसार जब चाहेंगे, तभी वो कालिया को वृंदावन से बाहर भेज लेंगे।
तो अभी जब यहाँ पर होता है, कृष्ण वृंदावन में कूद जाते हैं, वृंदावन में कालिया के दह में कूद जाते हैं, तो सारे व्रजवासी बड़े ही विचलित हो जाते हैं, क्या करना है, हम कृष्ण को कैसे बचाएं, हम क्या करें कृष्ण को बचाने के लिए, सब दौड़ते हुए वहाँ जाते हैं, सब देख रहे हैं।
और कृष्ण जो हैं, जब लीला करते हैं, तो वो ऐसी लीला करते हैं, कि कभी-कभी, वो ऐसे दिखाते हैं, कि वो हार रहे हैं, तो थोड़ा सस्पेंस (suspense) होता है। तो सस्पेंस जब होता है, तो कई बार क्या होता है, कोई कहानी होती है, मैं अमेरिका में गया था, कई कॉलेज में लेक्चर थे। तो एक कॉलेज में लेक्चर था, जो जा रहा था, कॉलेज में लेक्चर है, तो उसका नाम था, अमेरिकन इंस्टिट्यूट ऑफ़ इलूज़न (American Institute of Illusion), अमेरिकन इंस्टिट्यूट ऑफ़ इलूज़न, वो क्या था, कि वहाँ पर लोगों को मूवीज कैसे बनाना है, तो इसलिए इंस्टिट्यूट ऑफ़ इलूज़न, तो वहाँ पर गया था।
तो अभी जो कोई मूवी बनाता है, तो अभी बहुत सी मूवी बनती हैं, तो हज़ारों में शायद मूवी बनती हैं, पर अधिकांश मूवी जो होती हैं, वो फ्लॉप हो जाती हैं। अभी फ्लॉप क्यों होती हैं वो, क्योंकि the illusion is not good enough (कि जो मोह है वो इतना अच्छा नहीं है) क्योंकि शायद वो एक्टर एक्टिंग नहीं कर रहे हैं, वो scenes अच्छे नहीं हैं, सेटिंग बराबर नहीं है, आजकल CGI होता है। जब कृष्ण योग माया की योजना के अनुसार जब लीला कर रहे होते हैं, तो सबकुछ जो होता है वो बिल्कुल सत्य लगता है। वो मोह भी बिल्कुल सत्य जैसे लगता है। तो कृष्ण कभी किसी के द्वारा परेशान नहीं हो सकते हैं, पर यहाँ पर कृष्ण ऐसी परिस्थिति में आते हैं, ऐसे लगता है कि वो बेहोश हो गए। कालिया ने उनको काटा है, कालिया के जहर से उनको प्रभाव हो गया है। और क्या हुआ है कुछ पता नहीं है, सारे व्रजवासी भी देख रहे हैं।
कालिया के फनों पर नृत्य और रासलीला का बीज
अभी जो कालिया होता है वो कृष्ण, वो अपने फनों में कृष्ण को पकड़ लिया है और कभी क्या होता है कि जो कोई असुर होते हैं वो कभी कुछ अपना काम करना होता है किसी को मार डालना है पर असुर जो होते हैं उनको वो नहीं है Just to kill वो पकड़ने के लिए होता है केवल मारना नहीं है उनको आतंक पैदा करना है। तो इससे जो तुम कालिया वो कृष्ण को पकड़ रहते हैं, कृष्ण को पूरी तरह से मार नहीं देता है कृष्ण को कुछ-कुछ उसने शायद क्या किया है पता नहीं चलता किसी को। जब व्रजवासी वहाँ पर दौड़ के आते हैं तो वह देखते हैं कि कृष्ण कालिया के फनों में फंसा हुआ है।
तो अभी उनको कुछ घाव तो दिखते नहीं हैं कृष्ण पे पर कृष्ण पूरी तरह से निष्क्रिय हो गए हैं। और जब वो इस तरह से देखते हैं, तो अभी क्या करना है। यशोदा माई कहती है, मैं कालिया दह में कूद जाऊंगी। तो बाकि सारे गोपियां उनको रोकते हैं, नहीं, नहीं। और वो उसके लिए कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं। तो उससे जो एक तरह से वेदना होती है, वो बिलकुल सहन नहीं होती है। तो अभी कृष्ण इस तरह से क्यूं कर रहे हैं। कृष्ण ये इस तरह से निष्क्रिय हो जाते हैं, वो इस तरह से, वो ऐसे कार्य क्यूं कर रहे हैं, इससे अटेंशन क्यूं कर रहे हैं।
तो अभी जो कालिया दह की लीला होती है, उसके पहले, उसके आजूबाजू में तो भागवत इस पद बता रहा है, कि जो गोपियों का जो पूर्व भाव, पूर्व राग है, वो जाग्रत हो रहा है। तो अभी जो गोपियां होती हैं, जब पहले छोटे होते हैं, तो क्या होता है कि बच्चे, लड़के-लड़के एक साथ खेलते हैं, पर जब बड़े होने लगते हैं, तो फिर वो एहसास और जाग्रत होता है। तो अभी जब गोपियां बड़ी हो रही हैं, तो उनको अभी कृष्ण के प्रति आकर्षण जाग्रत हो रहे हैं, माधुर्य भाव में, धीरे-धीरे हो रहा है। तो जब ये आकर्षण जाग्रत हो रहा है, तो अभी कृष्ण, एक तरह से गोपियां कृष्ण के प्रति आकर्षण हो रहे हैं, कृष्ण भी किशोर के भाव के करीब हैं, काफी जवान हैं वो, छोटे हैं, पर वो भाव जाग्रत हो रहा है।
तो कृष्ण हैं, अभी राधारानी का इंतज़ार कर रहे हैं। वो कृष्ण भी अपने जीवन का बेस्ट डांस परफॉर्मेंस (best dance performance) करने वाले हैं। तो वो क्या चाहते हैं? कि राधारानी आयें, राधारानी देखें उनको, कैसे वो डांस करने वाले हैं। तो इसलिए कृष्ण रुके रहते हैं। और अभी राधारानी बरसाना में हैं। वृंदावन से बरसाना थोड़ा दूर है। तो जब कृष्ण फंसे हुए हैं, इस तरह से पता चलता है। तो सारा खबर है, सब जगह फैलने लगती है। और जब वृंदावन से बरसाना फैल जाती है, तो वृषभानु, कीर्तिदा, राधारानी सब दौड़ के आते हैं। और दौड़ के दौड़ के आते हैं।
और जब राधारानी देखती हैं कृष्ण को क्या हो गया है। और जब वो देख रही होती हैं, तभी एकाएक, बिना कुछ किये कृष्ण एकदम उड़ जाते हैं। और कहने हैं, अरे, क्या हो गया है यह। एक तरह से कोई हीरो और विलेन में फाइटिंग चल रहा है, विलेन को लगता है, मैंने हीरो को मार दिया है। और हीरो हतप्रभ होके, बेहोश होके गिरा हुआ है, ऐसे लग रहा है। और अचानक वो हीरो उड़ जाता है, विलेन को फेंक देता है। यह क्या हो गया है, कहां से इसमें शक्ति आ गई है ऐसे।
तो अभी यह कृष्ण की तरह से बताया जा रहा है, कि कृष्ण की शक्ति पता जा रहा है, कि कृष्ण राधारानी का… पर अभी कुछ वृंदावन में जानने को बरसाना में से होते हैं। बरसाना में कुछ लोग ऐसे होते हैं, कहते हैं कि वास्तव में राधारानी परम भगवान हैं। और हम पूजा करते हैं कृष्ण के आड़ में क्योंकि जो राधारानी है वो पसंद करती हैं। तो वह ये बात करती हैं, कृष्ण की शक्ति, intelligence, विसांसा की सुमस nectar, विजदियी परि अपने नहीं है, कुछ गौड़ीय वैष्णवों का भाव ऐसे होता है।
कृष्ण उड़ जाते हैं और फिर कृष्ण नृत्य करने लगते हैं। और अभी ऐसा नृत्य करते हैं। अभी कल कथक का नृत्य हुआ था, बहुत सुन्दर था। पर अगर मान लिजिये अगर यहाँ पे जो फ्लोर है उसपे सारा पानी गिरा हुआ है और वहाँ पे नृत्य करना है, वो तो कितना मुश्किल होगा। तो जो कालिया के फनों पे कृष्ण नृत्य करते हैं, तो जो सर्प होता है, उनकी स्किन जो होती है, वह बहुत स्लिपरी (slippery) होती है। इतना ही नहीं, वह स्लिपरी होती है, ऊपर से वहाँ पानी है। न केवल वह पानी है, उससे और स्लिपरी होता है, उसके ऊपर से वह हिल रहा है। बार-बार, वह एक जगह पर स्थिर नहीं है। और न केवल हिल रहा है, वह एक तरह से कृष्ण को डसने का प्रयास कर रहा है, कृष्ण पर आक्रमण करने का प्रयास कर रहा है।
तो कृष्ण का क्या कर रहे हैं, एक तरह से वह दो रस हैं यहाँ पर। एक रस है कि वह प्रयास कर रहा है, और वह प्रयास कर रहा है। वह क्या कर रहे हैं, वह फाइटिंग कर रहे हैं। तो कालिया के लिए, वह ऐसा वीर रस है, क्या हो रहा है, कहां से ऐसे, वह जैसे कहते हैं, थंडर बोल्ट (thunderbolt) से होता है, वह जैसे बिजली कड़क रही है, बिजली गिर रही है, उसमें से लग रहा होता है। और सारी व्रजवासियों के लिए, कृष्ण बड़ा ही सुन्दर नृत्य कर रहे हैं।
तो जो कृष्ण नृत्य करते हैं, ऐसा नृत्य हो जाता है, कि उससे, उसको देखके, राधारानी के हृदय में और इच्छा हो जाती है, कि ऐसे कृष्ण के साथ मैं कब नृत्य कर पाऊँगी। तो तभी जो रास लीला का जो सीड (seed) है, जो उद्भव है, उसका बीज है, वो कृष्ण का कालिया के ऊपर नृत्य करते हुए देखके, राधारानी के हृदय में जाग्रत हो जाता है।
जलाशये कालियमर्दनाय…
जलाशये कालियमर्दनाय यदा कदम्बादपतन्मुरारिः
जलाशये कालियमर्दनाय यदा कदम्बादपतन्मुरारिः