Hindi Krishna Charitra 3 | Krishna in Vrindavan 3 | Madhurya-rasa lila – HG Chaitanya Charan Das
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Lecture Summary
यह प्रवचन भगवान कृष्ण और उनकी परम भक्ता गोपियों के निस्वार्थ प्रेम और भक्ति के सर्वोच्च स्तर (माधुर्य रस) पर गहराई से केंद्रित है। इसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित आध्यात्मिक बिंदुओं पर चर्चा की गई है:
- भक्ति और भक्तों का महत्व: भगवान की भक्ति हमारे प्रयास और भगवान की कृपा दोनों से जागृत होती है। भगवान स्वयं के स्मरण से अधिक इस बात से प्रसन्न होते हैं कि हम उनके शुद्ध भक्तों (जैसे गुरु, बिल्वमंगल ठाकुर या गोपियों) का स्मरण करें, क्योंकि वे हमें भक्ति का सही और व्यावहारिक मार्ग दिखाते हैं।
- चित्त वृत्ति और स्वाभाविक चेतना: हमारा मन एक ढलान की तरह है; जहाँ हमारी आसक्ति होती है, हमारे विचार स्वाभाविक रूप से उसी ओर बहते हैं (जैसे पानी ढलान की ओर जाता है)। योग में जहाँ मन को शून्य (चित्त वृत्ति निरोध) करने का प्रयास होता है, वहीं भक्ति का सिद्धांत है मन की चेतना को पूरी तरह से भगवान की ओर मोड़ देना।
- उद्दीपन (Spiritual Stimulus): उद्दीपन वे चीजें हैं जो हमें भगवान की याद दिलाती हैं और मन को आध्यात्मिक रूप से उत्तेजित करती हैं (जैसे संगीत, चित्र, या शब्द)। गोपियों के लिए दूध, दही और मक्खन बेचना भी कृष्ण का उद्दीपन था, जिन्हें देखकर उन्हें कृष्ण के आनंद की याद आती थी।
- गोपियों का निस्वार्थ प्रेम और त्याग: गोपियों की भक्ति ‘अहैतुकी’ (बिना किसी स्वार्थ के) है। जब कृष्ण को सिरदर्द हुआ, तो उन्होंने हमेशा के लिए नरक जाने का डर छोड़कर भी अपने चरणों की धूलि कृष्ण को देने में संकोच नहीं किया। वे कृष्ण के लिए अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा, लज्जा, आदर और बदनामी—सब कुछ त्यागने को तैयार थीं।
- विरह में भगवान की दिव्य उपस्थिति (विप्रलम्भ भाव): जब कृष्ण गोपियों को छोड़कर मथुरा चले जाते हैं, तो गोपियों को जो असीम दुख होता है, वह वास्तव में भक्ति की सर्वोच्च अवस्था है। इस ‘विरह’ में उन्हें कृष्ण की ‘स्फूर्ति’ (अत्यंत सजीव और तीव्र स्मृति) प्राप्त होती है। यह विरह का दुख शुरुआत में गर्म गन्ने के रस जैसा कष्टदायक लगता है, लेकिन गहराई में यह एक अद्वितीय दिव्य आनंद (Ecstasy) है, जो भगवान की प्रत्यक्ष उपस्थिति से भी कहीं अधिक गहरा और मधुर है।
Full Transcription
भक्ति के दो प्रधान मार्ग: प्रयास और कृपा
तो जब हम कृष्णलीला के बारे में चर्चा करते हैं, हम भगवान कृष्ण के बारे में स्मरण करना चाहते हैं। तो उस समय अभी भगवान की भक्ति दो तरह से होती है। अनेक तरह से कह रहते हैं और भगवान के प्रति जो भक्ति है वो जो जाग्रत होती है वो प्रधान दो पद्धति से होती है: एक है हमारे खुद के प्रयास से और दूसरी है भगवान की कृपा से। तो जब वो हमारे खुद के प्रयास से जाग्रत होती है, हम एक तरह से कह सकते हैं कि हमारे प्रयास से इतना कुछ होता नहीं है, पर ऐसा नहीं है, हमारा प्रयास भी महत्वपूर्ण है। जैसे दामोदर लीला में दो उंगलियाँ होती हैं, तो हमारा प्रयास एक है और भगवान की कृपा है। तो जो भक्ति, जो जाग्रत होती है, अभी वो किस तरह से होती है यह हम प्रयास करते हैं और जो भगवान की कृपा होती है तो भी एक तरह से यह दोनों जो हैं, हाँ हो जाता है।
भगवान और उनके भक्तों का स्मरण
जब हम भगवान के भक्तों का स्मरण करते हैं, जब हम भगवान के भागवत का स्मरण कर रहे हैं तो क्या हो रहा है? एक तरह से हम प्रयास कर रहे हैं। हम प्रयास कर रहे हैं हमारा चित्त एकाग्र करने के लिए, पर भगवान यह देखकर प्रसन्न होते हैं कि हम उनका स्मरण कर रहे हैं। पर भगवान उससे अधिक प्रसन्न होते हैं यह देखकर कि हम उनके भक्तों का स्मरण करते हैं। और जैसे कोई माता-पिता होते हैं, बस बच्चे माता-पिता की आराधना करें अच्छा होता है, पर बच्चे एक साथ में रहें और छोटा बच्चा अपने बड़े भाई को आदर दे रहा है, तो उससे माता-पिता को और प्रसन्नता होती है।
तो अभी इसलिए जब मैं अभी UK में था तो वहाँ पे एक ब्रिटिश भक्त ने बोला था, नए भक्त थे, बोले कि “आप कहते हैं, आप कृष्ण कॉन्शसनेस (Krishna Consciousness) हैं पर आप पूरे गुरु कॉन्शसनेस ही हैं।” वो कह रहे थे कि आपके मॉर्निंग प्रोग्राम में कृष्ण की प्रार्थना है ही नहीं। जो है, गुरु पूजा ‘संसार दावानल’ है, वो गुरु की पूजा है। गुरु वंदना, गुरु की पूजा है, पर नृसिंह आरती सबसे छोटी सी प्रार्थना है वो ही भगवान की होती है। तो मैं उनको बता रहा था कि हाँ एक तरह से सही है, पर अगर हम देखेंगे कि हम गुरु का स्मरण किस तरह से कर रहे हैं, कैसे गुरु भगवान की भक्ति करते हैं, कैसे गुरु भगवान की भक्ति को प्रदान करते हैं, उस पे हमारा केंद्र है।
अभी जो हम देख रहे हैं गुरु की वंदना हो रही है उसमें क्या है? कैसे गुरु भगवान की पूजा कर रहे हैं, भगवान की लीलाओं का स्मरण कर रहे हैं। तो हमारे लिए क्या है? हम एक तरह से भगवान का स्मरण कर सकते हैं, पर जो भगवान का स्मरण करने में हमें मार्गदर्शन दे रहे हैं, जो हमारे एक तरह से आदर्श हैं, तो उनका स्मरण करने से एक तरह से और प्रेरणा मिलती है। तो हाँ अगर सिर्फ गुरु का स्मरण कर रहे हैं और उनका कृष्ण का स्मरण आ ही नहीं रहा है तो वो बात अलग है।
बिल्वमंगल ठाकुर और गोविन्द दामोदर स्तोत्र
तो उसी तरह से अगर हम यहाँ पर देखते हैं यह बिल्वमंगल ठाकुर के ‘गोविन्द दामोदर स्तोत्र’ में, जो अधिकांश स्मरण है वो भक्तों का स्मरण है। इसमें एक भी जगह एक तरह से कृष्ण क्या कर रहे हैं यह नहीं बताया जा रहा है। बताया जा रहा है जरूर, पर वहाँ फोकस नहीं है। फोकस क्या है? अभी कृष्ण कालिय मर्दन कर रहे थे कि कैसे कृष्ण कूद गए कालिय पर, इसमें महत्वपूर्ण क्या है कि भक्तों ने क्या किया? “गोपांगनाश्चक्रुरुपृत्य…” एक जगह सारे गोप दौड़ते हुए आए। तो यहां पे एक तरह से यह गोविन्द दामोदर स्तोत्र को एक प्रार्थना कह सकते हैं, उसका स्मरण बिल्वमंगल ठाकुर कर रहे हैं और उनके गीत गा कर हम कर रहे हैं।
तो अभी हम स्वयं भगवान का स्मरण कर सकते हैं जरूर, पर जब हम देखते हैं कि भक्त किस तरह से स्मरण कर रहे हैं, उससे हमें प्रेरणा मिलती है। तो अभी हम माधुर्य रस के बारे में चर्चा कर रहे हैं, उसके पहले ये पृष्ठभूमि (background) जरूरी थी, क्योंकि क्या है जब हम गोपियों के बारे में चर्चा करते हैं वो बहुत महान भक्त हैं, और उनकी जो भक्ति है वह समझना कभी-कभी ज़्यादा महत्वपूर्ण है। और वो कौन से रस में भक्ति है वह समझना बाद में आता है। तो कैसे है कि पहले ‘Understand devotion’ और फिर ‘Understand rasa devotion’, यह एक तरह से सत्य है, पर यह एक पार्शियल (partial) सत्य है।
हर कार्य में भगवान की चेतना
एक तरह से हमारा घर है, हमारा ऑफिस है, भगवान हर जगह पे हैं, भगवान केवल मंदिर में नहीं हैं। तो हम एक तरह से यहाँ पर इस जगत में काम कर सकते हैं और जगत से कुछ हम प्राप्त कर सकते हैं। हम नौकरी करते हैं, उससे हमें कुछ पैसा मिलता है वो सत्य है। पर अगर हमारी चेतना हो सकती है कि हम जगत में काम कर रहे हैं पर वो काम करने का भाव है, “यह मैं भगवान की सेवा करता हूँ” और जो भी हमको जगत से मिल रहा है वो हम देखते हैं, “यह वास्तव में मुझे जगत के माध्यम से भगवान ही दे रहे हैं।” तो जब हम इस तरह से समझते हैं तो यह और कम्पलीट विजन (complete vision) है और पूर्ण दृष्टिकोण है। तो प्रभुपाद जी कहते हैं कि हम नौकरी करते हैं, हमें पैसा मिलता है तो पैसा कहां से आ रहा है, अपनी चेतना किस तरह से भगवान में लीन है वह बताया जा रहा है।
वो दूध, दही, मक्खन को बेचने जाती हैं। जब बेचना होता है तो वो बेचने के लिए गई हैं, तो एक तरह से कह सकते हैं यहाँ पे दूध, दही, मक्खन को बेचना होता है वो उनकी एक नौकरी थी, उनका एक काम था और वो काम करने जाया करते थे। वहाँ पर जो फल बेचने वाली आती थी वो भी उसका भी काम था, वो काम करती थी। तो भक्ति जो है यह बाह्य रूप से किसी चीज़ से सीमित नहीं होती है। और जब गोपियां बाहर जा रही हैं तो क्या है? उनका स्मरण क्या हो रहा है? वो स्मरण भगवान का ही कर रही हैं। “मुरारि पादार्पित चित्त वृत्ति”।
चित्त वृत्ति और मन का स्वभाव
तो अभी ‘चित्त’ और ‘वृत्ति’ यह दोनों शब्दों का तत्त्वज्ञान के साथ में काफी कॉम्प्लिकेटेड अर्थ आते हैं तो मैं उसमें नहीं जाऊँगा, पर चित्त को हम सिम्पली मन समझ लेते हैं और वृत्ति को हम उसके इंक्लिनेशन (inclination) समझते हैं। तो हमारे मन की वृत्ति होती है, चित्त की वृत्ति होती है। तो हमारा चित्त किस दिशा में जाता है? एक तरह से हमारी आसक्ति क्या है? हम सबकी कुछ न कुछ आसक्ति है। हमारी आसक्ति क्या है वो अगर समझना है तो क्या है? हमारा अटैचमेंट, हम क्या देखते हैं जब हमें कुछ नहीं देखते हैं? जब हमें कुछ सोचने के लिए नहीं है तो हम क्या सोचते हैं? हमारे विचार कहां जाते हैं वह हमारी चित्त वृत्ति का लक्षण है।
तो शायद ऐसे हो सकता है कि हम हमारे बैंक अकाउंट के बारे में सोचते हैं, हम हमारे बच्चों के बारे में सोचते हैं, आजकल के लिए हम सोशल मीडिया फॉलोइंग के बारे में सोचते हैं, कुछ लोग हैं जो क्रिकेट के बारे में सोचते हैं, कुछ फॉलोइंग के बारे में सोचते हैं। तो एक साथ कहा जा सकता है “या मेरा विचार उधर जा रहा है”, पर ऐसे नहीं है, विचार नहीं जा रहा है। यह क्या है कि अगर हमारा जो मन है उसका माइंड जो है, हमारा उसको हम एक फ्लोर (floor) के समान देखते हैं, उसको एक जमीन है। अभी हम जमीन के बैठे हैं समान देखते हैं तो क्या होता है यह एक तरह से फ्लैट (flat) नहीं होता है, यह इंक्लाइंड (inclined) होता है, यह टिल्टेड (tilted) होता है। तो जब हमारी इसमें पानी गिरेगा तो क्या होगा? पानी स्वाभाविक रूप से इधर चला जाएगा। तो उसी तरह से यह जो चेतना है हमारी चेतना जिस दिशा में हमारी मनोगति है उसी दिशा में अपने आप चली जाएगी।
मन को भगवान की ओर मोड़ना
तो अगर यह जो फर्श है इस तरह से हो चुकी है, तो फिर उसको पानी उधर नहीं जाने देना है तो बहुत प्रयास करना पड़ेगा। स्वाभाविक रूप से वो पानी उधर नहीं जाएगा। तो इसके लिए अगर परिवर्तन करना है तो क्या है? सब कई चीज़ें करनी पड़ेगी, पर सबसे पहले क्या है शायद यहां पे कुछ बंद कर दो ताकि वो पानी उधर नहीं जाएगा। पर उतना करने से काफी नहीं है, अगर वो बंद करके पानी आते रहेगा, पानी आते रहेगा तो क्या होगा? उसको, वो पानी को जो हमने बंद कर लिया है उसको तोड़ देगा, उसको खराब लाएगा। तो हमें क्या करना है? उसके बाद में ये पानी को कहीं और जाने का मौका देना है और धीरे धीरे मान लीजिये हम यहां से कोई एक मार्ग क्रिएट कर रहे हैं।
तो अच्छा हम दूसरा कोई मार्ग क्रिएट कर रहे हैं, तो शायद वो ऊपर है। तो अगर उसी पानी को इधर धकेलना है तो उसको काफी एफर्ट लगेगा, इसको काफी प्रयास करना पड़ेगा। पर जितना हम प्रयास करेंगे, जिस चीज के बारे में हम विचार करते हैं, तो धीरे धीरे क्या होगा? अब मान लीजिये मैंने बताया आपको लगता है कि वो अलग जगह में हैं, बहुत कोई आसक्ति है और इस साइड में कृष्ण हैं, तो अगर बार-बार हम हमारे मन को, हमारे विचारों को भगवान की ओर ले जाएंगे तो क्या होगा? जो इंक्लिनेशन है इधर नहीं जाएगा पानी, तो यह जो इंक्लिनेशन है धीरे धीरे यह फ्लैट हो जाएगा, और इस साइड में जो इंक्लिनेशन है, कृष्ण की ओर ले जाएंगे वो स्वाभाविक हो जाएगा। तो फिर जितना हमारा मन कृष्ण में आसक्त हो जाएगा स्वाभाविक रूप से हमारे विचार कृष्ण की ओर ले जाएंगे, और जितना हम शुद्धि करते जाएंगे यह जो है यह और वर्टिकल हो जाएगा तो और तेज़ी से विचार कृष्ण की ओर ले जाएंगे।
तो गोपियों का जब वर्णन आता है कि जब कृष्ण उनको छोड़ के चले जाते हैं तो गोपियां सोचती हैं “कृष्ण तो हमें भूल गए हैं, तो कृष्ण अगर हमें भूल सकते हैं तो हम भी कृष्ण को भूल जाएंगे।” तो हम सोचते हैं कैसे कृष्ण को भूल जाएंगे? तो हम कृष्ण से बड़े आसक्त हो गए, तो हम सोचते हैं कि हमें क्या करना है कि हमने सुना है कि जो आसक्ति से मुक्त होने के लिए योगी तपस्या करते हैं तो सारी गोपियां ध्यान में बैठ जाती हैं किसके लिए? कृष्ण को भूलने के लिए। “हम सब कृष्ण को भूल चुके हैं, कृष्ण को याद करने के लिए हम ध्यान करने के लिए प्रयास करते हैं,” पर गोपियों का उल्टा है। वह ध्यान करने में बैठ जाती हैं, अचानक कृष्ण को भूल जाती हैं और सब वह बात करने में मगन हो जाती हैं। “हम तो कृष्ण को भूलने वाले थे क्या हो गया?” तो वह है “मुरारि पादार्पित चित्त वृत्ति”। चेतना जो है भगवान की ओर एक स्वाभाविक रूप से जाती है।
भक्ति और अद्वैतवाद का अंतर
अभी जो योग मार्ग है उसमें बताते हैं “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः”। उसमें कहा है चित्त कहीं भी नहीं जाना चाहता है। चित्त, वह कहते हैं कि वैसे के वैसा रहना चाहता है। कैसे रहता है? वह कहते हैं कि “ऐसा ध्यान करूँ कि कौन ध्यान कर रहा है, कैसे ध्यान कर रहा है, किसका ध्यान कर रहा है, इसका भी ध्यान नहीं रहे।” अभी ये सुनने को अच्छा लगता है पर जो योग, जो खास कर के निर्विशेषवादी योग मार्ग है उसमें क्या है कि मान लीजिए ये हम हैं और ये अगर भगवान हैं तो हम कहते हैं कि हमारी चेतना में भगवान की कुछ नहीं जानी है।
पर अभी हम कहते हैं कि इसलिए अच्छा लगता है कि जो अद्वैतवादी सोच रहे हैं कि हम भगवान बन जाएं, पर वास्तव में ये जो अद्वैतवाद है, ये शंकराचार्य का अद्वैतवाद नहीं है, ये जो मॉडर्न अद्वैतवाद है। शंकराचार्य का अद्वैतवाद क्या है? कि वास्तव में मैं ब्रह्म हूँ और भगवान भी ब्रह्म हैं। तो बचता क्या है? सिर्फ चेतना बचती है। तो इस सिर्फ चेतना रहती है और चेतना के लिए कहीं जाने के लिए है नहीं, क्योंकि चेतना कहां से आ रही है वो असत्य है, चेतना के लिए जाना है वो भी असत्य है। तो “चित्त वृत्ति निरोधः” पूरी चित्त केवल चेतना ही है और कुछ अस्तित्व में ही नहीं है और ऐसे कहते हैं, वो उसको प्योर कॉन्शसनेस (pure consciousness) कहते हैं और वो है ब्रह्मन।
तो ये जो है, ये अद्वैतवाद है, ये भक्ति का सिद्धांत नहीं है। भक्ति का सिद्धांत क्या है? कि हमारी चेतना स्वाभाविक रूप से भगवान की हो जाए। और यहाँ पर बता रहे हैं, “मोहवशाद् अमुच्यत चेतने…” तो अभी उनका मोह है। वो बोलना चाहती हैं “दही लो ये दूध लो” और उनके मुख से क्या आ रहा है? “गोविन्द दामोदर माधवेति…” तो अभी जो मोह है, मोह भी दो प्रकार का होता है। एक है जो मोह हमें कृष्ण से दूर ले जाता है, पर दूसरे प्रकार का भी मोह होता है जो हमें कृष्ण के करीब ले जाता है। तो अभी गोपियों का मोह कौन सा मोह है? कृष्ण के करीब ले जाता है मोह।
चैतन्य महाप्रभु जब वृन्दावन में जाया करते थे, जा रहे थे तो हर जो जंगल देखते थे वो सोचते थे कि “ये जंगल क्या है? वृन्दावन है।” हर नदी जो देखते थे “ये कौन सी नदी है? यमुना है।” हर अगर पहाड़ देखते थे तो क्या सोचते थे? “गोवर्धन है।” अभी क्या वो पहाड़ गोवर्धन था? तो क्या चैतन्य महाप्रभु मोह में हैं? वो तो मायाधीश हैं, क्या वे मोह में हैं? वो हैं मोह में, पर वो मोह ऐसा है, वो योगमाया का मोह है। जो मोह जो भगवान का स्मरण और बढ़ाता है, वो मोह प्रतिकूल नहीं है। पर वो पूर्णतया मोह नहीं था, क्योंकि महाप्रभु जो थे सोच रहे थे कि ये गोवर्धन है पर ऐसे नहीं कि वहीं पर रुक गए, वो कहता है उनकी चेतना कितनी कृष्ण में एकाग्र है इसका वर्णन इससे तैयार हो रहा है।
उद्दीपन: भगवान की स्मृति जगाने वाले तत्व
तो अभी जो इसको कहते हैं ‘उद्दीपन’। उद्दीपन मतलब क्या है? Spiritual stimulus. जो चीज हमें आध्यात्म और भगवान का स्मरण दिलाती है। न केवल स्मरण दिलाती है, स्मरण परिवर्तित कराती है। बहुत सी चीजें हैं… इससे हमें भगवान का स्मरण चित्त हो रहा था कि हम हमारे घर में भगवान का चित्र लगाते हैं। पर क्या होता है वो चित्र हमेशा हमारे घर में होते हैं, तो कुछ समय के साथ वो रहते हैं और उससे कुछ भगवान का स्मरण नहीं होता है। तो जो उद्दीपन होता है उसका मतलब है कि न केवल क्षमता है कि स्मरण जाग्रत करती है, पर जो प्रेरित करता है, जो विचलित करता है। एक तरह से और एक तरह से भगवान का स्मरण करने के लिए हमें न केवल प्रेरित करता है पर उत्तेजित करता है। It doesn’t mean inspire but it agitates.
जो भागवत में वर्णन आता है कि जब कुमार जो थे वो सबसे पहले भगवान नारायण से उनका संपर्क हुआ तो “तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्दकिञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः… संक्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः”, वो भगवान नारायण के चरण कमलों से तुलसी आ रही थी उसका जो सुगंध था उसके द्वारा विचलित हो गए। पर ये जो एजिटेशन (agitation) था, उसके द्वारा एजिटेशन तुलसी आ रही थी। तो उस तरह से जो उद्दीपन है, हमारे जीवन में जितने उद्दीपन हम रख सकते हैं उतने अच्छे हैं।
तो गोपियों के लिए दूध है, दही है, मक्खन है वो है। उससे क्या होता है, ये तो उनको बेचना है, ये बड़ा है, पर जब वो देखते हैं, “अरे ये बेचेंगे जितने पैसे मिलेंगे वो याद नहीं होता है, अरे ये कृष्ण को कितना अच्छा लगता है! कृष्ण जब ये खाते हैं, तो कृष्ण को कितना आनंद लगता है, और कृष्ण को जब आनंद लगता है, वो देख हमें कितना आनंद लगता है।” तो इसलिए, वो क्या है, उनके लिए उद्दीपन है। और हर एक भक्त के लिए, जितने ज़्यादा उद्दीपन हमारे जीवन में मिलते हैं उतना हमारी भक्ति में प्रगति होगी।
अभी प्रभुपाद जी जब वृन्दावन में मंदिर बना रहे थे तो उस समय कुछ ऐसी परिस्थिति थी कि वहाँ पर सीमेंट मिलना बड़ा मुश्किल था। तो बड़े मेहनत से, बड़े प्रयास करके, बहुत कुछ करके जब सीमेंट लाया है तो प्रभुपाद जी भक्तों को बोले थे कि आप खुद प्रॉपर्ली काउंट करोगे। और फिर काउंट करते हैं तो प्रभुपाद जी कितने-कितने सीमेंट के बैग गए, कहां रखे, कैसे लॉक किया है, तो तभी प्रभुपाद जी एक तरह से सीमेंट जैसे मान लीजिये कुछ सोना है उसके तरह से उसको गिन रहे थे। तो अभी ये भगवद्गीता बताती है कि जो सिद्ध लोग होते हैं “समलोष्टाश्मकाञ्चनः” कि वो पत्थर और सोने को एक समान देखते हैं। तो एक तरह से उसका क्या होता है, जो निर्विशेषवादी होते हैं तो देखते हैं, पत्थर और सोना हो, दोनों भी उनका कुछ मूल्य नहीं है, दोनों ही माया ही है। पर भक्त के लिए पत्थर और सोना एक हो जाता है, क्यों? सीमेंट और सोना है, सीमेंट सोने जैसे हो जाता है, क्यों? तो सीमेंट में वो क्षमता है कि भगवान की सेवा करती है।
तो इसका मतलब क्या है? कि जो उद्दीपन है हमारे लिए, तो प्रभुपाद जी के लिए केवल सीमेंट नहीं था, वो क्या था? इससे कृष्ण का मंदिर बनने वाला है। तो इसलिए हर एक भक्त को हमारे लिए, मेरे लिए क्या उद्दीपन है, वो देखना है और वैसे उद्दीपनों जितना हम रख सके हमारे जीवन के लिए, इतना रखना है। अभी कुछ लोगों के लिए म्यूजिक (music) ये उद्दीपन होगा, कुछ लोगों के लिए पिक्चर्स (pictures) ये चित्र होते हैं वो उद्दीपन होते हैं। कुछ लोगों के लिए किसी को सेवा है गारलैंड बनाना, तो जब भी कोई फूल देखेंगे वो, “अरे इससे भगवान का गारलैंड बनाएंगे तो इतना अच्छा होगा।” किसी कुछ लोगों के लिए चित्र होगा, तो हर एक के लिए अपना उद्दीपन क्या है ये ढूंढना है।
तो मेरे लिए जो उद्दीपन है वो है शब्द। शब्द जो है, कहीं भी… मेरी एक सेवा है लिखना, तो कहीं भी कोई शब्द मिल जाते हैं तो मैं ओम्निवोरस (omnivorous) हूँ। मेरे लिए उद्दीपन हैं, कहीं भी शब्द आएं उनको खा लो, उनको ग्रहण करो, उनको कैसे भगवान की सेवा में इस्तेमाल करना है यह भी चाहता हूँ। तो अभी कोई मुझे बड़ा मैगज़ीन दे देगा, उसमें पूरा पेज भर के चित्र है, तो चित्र के ऊपर ध्यान जाता ही नहीं है, पहले उसमें क्या कैप्शन देखता हूँ, कैप्शन इंट्रेस्टिंग हो तभी चित्र के ऊपर देखता हूँ। कई बार मैंने ऐसी किताब पढ़ी है, पूरी किताब पढ़ी है पर उसका कवर पेज क्या है मैं याद भी नहीं हूँ।
तो अभी एक स्वाभाविक आकर्षण एक तरह से अपने आप व्यक्ति के वर्णन से आता है। तो जो हमें उद्दीपन हमारा क्या है ये ढूंढना है। तो कैसे ढूंढते हैं कि notice and rather note it… consciously. कोई व्यक्ति घर में जाता है और वो घर में देखता है कहता है कि “आप इस सोफा यहां पर रखा है, इस सोफा को इधर कर दोगे, इस चित्र को इधर कर दोगे तो ये घर बहुत अच्छा दिखेगा।” और जो व्यक्ति घर में है पहले से भी तो नहीं सोचता है। तो उस व्यक्ति में जो है वो इंटीरियर डेकोरेशन का टैलेंट है। तो हमारा किस चीज़ की ओर भी चित्त वृत्ति है वो देखना है। और ऐसे नहीं है कि सारी चित्त वृत्ति जो हमारी अभी की है कुछ माया में जा सकती हैं, पर कुछ चित्त वृत्ति ऐसी है जो हमें किसी चीज़ का स्वभाव निकाल सकती हैं।
चेतना को कृष्णभावनामृत में लाना
तो इस तरह से जो भक्त हैं उनके लिए गोपियां जो हैं वो एक आदर्श हैं, उनकी “मुरारि पादार्पित चित्त वृत्ति”। तो हम भी चाहते हैं कि हमारी चित्त वृत्ति जो है भगवान की ओर जाए। और वो दो, मैं संक्षेप में जो बता रहा था, दो पद्धतियों से हम चित्त वृत्ति जो है भगवान की ओर ला सकते हैं: एक है कि direct attraction. भगवान का स्मरण करें, भगवान का दर्शन करें, भगवान का जप करें, वो direct है कि भगवान को हम स्मरण करें। और दूसरा है indirect, indirect क्या है? attraction है, यह redirection है। जिसको शब्दों में रूचि है, जिसको रंगों में रूचि है, जिसको फूलों में रूचि है, जिसको designing में रूचि है, तो वो रूचि कैसे भगवान में ले सकते हैं?
तो एक तरह से कह सकते हैं कृष्ण भावना में आने की दो पद्धतियां हैं। एक है bring Krishna into our consciousness कि हमारी चेतना में कृष्ण लाएं, कृष्ण के बारे में स्मरण करें। कृष्ण के बारे में पहले से हमारी चेतना में है, वो रूचि हम भगवान की ओर ले जाएं। तो पहला एक तरह से यह जो करना है यह सब इसमें, यह जो है यह हमारी साधना है कि हम जप करते हैं श्रवण करते हैं। और यह जो है इससे हमारी सेवा हो सकती है, कि जिसमें हमारी पहले से जो हमारी वृत्ति है, वो वृत्ति को हम भगवान की सेवा में लगाते हैं। तो जब अगर हम दोनों कर पाएंगे तो आध्यात्मिक दिशा में प्रगति हम काफी तेज़ी से कर सकते हैं।
तो अभी गोपियां वो इतने उच्च स्तर पर हैं कि उनको साधना करने की ज़रुरत ही नहीं है। पहले से उनकी चेतना भगवान की ओर जा रही है, जो भी सेवा कर रही हैं उससे उनको भगवान का ही स्मरण हो रहा है। “बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं…” भगवान को उन्होंने अपना सारा जीवन अर्पण कर दिया है।
गोपियों का विरह और लज्जा का त्याग
और अभी जब प्रसंग बताया जा रहा है कि गोपियां कृष्ण से विरह अनुभव कर रही थीं, यहाँ पहले वृन्दावन में, “वृन्दावने गोप गणाश्च गोप्यो, एवं ब्रुवाणा विरहातुर भृशाम्” कि विरहातुर, विरह के भाव में सारी गोपियां जो हैं बड़ी व्यथित हो गई। भृशाम्, भृशाम् मतलब बड़ा भीषण, असह्य भाव है। “विसृज्य लज्जां रुरुदुः सुस्वरम्”, तो रुरुदुः वो रोने लग गई हैं, वो बड़ी विचलित हो गई हैं, रो रही हैं जोर से सुस्वरम्। क्यों? अभी कृष्ण वृन्दावन छोड़ के मथुरा जा रहे हैं।
और लज्जा का दो अर्थ हो सकते हैं: एक है shame, दूसरा है modesty. तो यहां पर लज्जा का अर्थ है कि जो गोपियां, उनका कृष्ण से विवाह नहीं हुआ था, तो वो कृष्ण के प्रति अपना जो स्नेह है साधारण रूप से दिखाया नहीं करती थीं। पर इस समय जब कृष्ण छोड़ के जा रहे हैं तो गोपियां अभी कुछ परवाह नहीं कर रही हैं, समाज की कोई परवाह नहीं कर रही हैं। और विसृज्य लज्जा, छोड़ के अभी सीधा कृष्ण के रथ के सामने जा रही हैं। और वो कहती हैं “कृष्ण अगर आप जाओगे तो आप हमारे प्राण साथ में ले जाओगे, तो बेहतर है कि हम यहीं पर आपके रथ के सामने लेट जाते हैं और आप पूरी तरह से ही हमारे प्राण ले जाओगे।” तो उसमें यह जो है, गोपियों की जो भक्ति की पराकाष्ठा है वो आप यहां पर दर्शायी जाती है।
तो “एवं ब्रुवाणा विरहातुर भृशाम्… कृष्ण विषक्त मानसाः।” जो पहले “मुरारि पादार्पित चित्त वृत्ति” कही है, “कृष्ण विषक्त मानसाः।” तो आसक्त है, विषक्त मतलब बहुत ही पूर्णतया आसक्त, विशेष रूप में आसक्त। विषक्त मानसाः, इसलिए वह कृष्ण के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकतीं। और इसलिए वो अभी कृष्ण को रोकते हुए कह रही हैं, वो वृन्दावन पर आसक्त करते हैं। उसके साथ साथ, जिस व्यक्ति से हम प्रेम करते हैं उनके लिए हम क्या छोड़ने के लिए तैयार हैं? तो मान लीजिये हम कहीं जाते हैं और दूसरा व्यक्ति कहीं जाते हैं, तो जो हमारे लिए महत्वपूर्ण है अगर हम छोड़ने के लिए तैयार हैं तो वो भी प्रेम का लक्षण है। माता-पिता बहुत चाहते हैं कि बच्चा बहुत अच्छे स्कूल में जाए, अच्छे कॉलेज में जाए। तो उसके लिए शायद माता-पिता बहुत चाहते हैं कि वो अपने लिए बड़ा घर बना सकते हैं, उसके लिए बड़ा घर नहीं बनाते हैं। वो क्या करते हैं? कुछ छोटे घर में रहेंगे पर “मेरा बच्चा अच्छे बड़े कॉलेज में जाए।” तो वो अपने लिए जो है कि, दोनों से जो प्रेम का लक्षण है वह अच्छे से देखा जाता है।
गोपियों का सर्वोच्च प्रेम और निस्वार्थ भाव
तो गोपियां जो हैं, ये सर्वोच्च भक्त क्यों मानी जाती हैं? तो यह जो है कि अभी इतने सारे अलग-अलग भक्त हैं, ऋषि-मुनि भक्त हैं, महान संत हैं, तो उनमें से गोपियों को सर्वश्रेष्ठ भक्त क्यों माना जाता है? इसके कई कारण हैं। पर अगर हम इन दो पहलुओं से देखते हैं, तो जो गोपियां हैं… अभी सारे भक्त हैं, वह कृष्ण को प्रेम करते हैं, कृष्ण को अपना जीवन देने के लिए तैयार होते हैं। पर अभी जो गोपियों का प्रेम जो है, वह हम सब जानते हैं, वह एक बहुत सुंदर लीला में आता है। कि जब गोपियां कृष्ण के लिए नरक जाने के लिए तैयार होती हैं।
साधारणतः अभी इस जगत में कृष्ण के द्वारा ऐसे नहीं कि गोपियां कृष्ण की इतनी भक्ति की हैं और कृष्ण ने उनको ऐश्वर्य दिए। गोपियां एक साधारण गोपी जैसे जब छोटे से गांव में रह रही हैं। ऐसे नहीं कि उनके घरों में ऐश्वर्य नहीं है। तो एक तरह से भगवान ने उनको बाह्यतः कुछ नहीं दिया है। बहुत कुछ दिया है पर वह भौतिक स्तर पर नहीं दिया है। पर जो भी है, वह त्यागने के लिए गोपियां तैयार हैं।
तो जब एक बार कृष्ण को सिरदर्द होने लगता है। तो जब कृष्ण को सिरदर्द होने लगता है, तो नारद मुनि आते हैं, देखते हैं। नारद मुनि कहते हैं भगवान अपना सिर पकड़ के बैठे हुए हैं। “तो क्या हो रहा है?” “तो कोई दवाई काम नहीं कर रही है, कोई भी दवाई काम नहीं कर रही है।” “कुछ तो होगा, कुछ तो काम करेगा?” “पर एक दवाई है वह कहीं मिलती नहीं।” “आप तो भगवान हैं, आपको यह चाहिए और कहीं से नहीं मिल सकता है?” “नहीं पर यह दवाई कहीं से नहीं मिल रही है।” “क्या है वह?” “मेरे भक्तों के चरण की जो धूलि है, वह धूलि से मेरा सिरदर्द ठीक हो जाएगा।”
अभी देवता देखते हैं अपने पैरों को, बोले “कैसे दें हम जो हैं जो विग्रहों का बड़ा आदर करते हैं, भगवान का आदर करते हैं, तो जो चरण से कभी स्पर्श नहीं करते, देखें उसको।” जब प्रभुपाद जी अमेरिका में गए थे, तो अमेरिका में पहली बार जब गए थे खास करके, तो वहाँ की संस्कृति बहुत ही अलग प्रकार की है। तो प्रभुपाद जी जब कमरे में आ रहे थे तो भक्तों को प्रणाम करते थे, उनके एक शिष्य थे, तो वो बैठे थे उनका प्रभुपाद जी आदर से। तो प्रभुपाद जी ने कहा, “आप पहले पवित्र हैं।” पर पवित्र चीजों को किस तरह से हम आदर देते हैं उसकी एक पद्धति है। तो जो पवित्र चीज है उसको हम पैरों से स्पर्श नहीं करते हैं। मान लीजिये किसी आदरणीय व्यक्ति से मिलेंगे हम, तो उसके लिए हम हैंडशेक करेंगे, उनको हमारे किक से शेक नहीं करेंगे। तो पैरों से हम करते हैं वह एक आदर का लक्षण नहीं होता है। पर अगर हमारे पैरों की जो धूलि स्पर्श की है वह भगवान को, वह न केवल अपवित्र है अपराध है।
तो नारद मुनि अलग-अलग भक्तों के पास जाते हैं और कोई भी यह करने को तैयार नहीं होता है कि “यह नहीं कर सकते हैं।” तभी अंत में गोपियों के पास जाते हैं। जब गोपियों के पास जाते हैं, तो तभी क्या होता है? गोपियां भी होती हैं नारद मुनि आते हैं, देखते हैं कि कृष्ण को सिरदर्द हुआ है। तो जब गोपियां सुनती हैं कृष्ण को सिरदर्द हुआ है। “कैसे हुआ है? क्या हुआ है? क्या करना चाहिए?” तो सुनके यह विचलित हो जाती हैं। “हमें कहीं भी नहीं मिलना है, इस वक्त कृष्ण के भक्तों के जो चरण कमल हैं उनकी धूलि चाहिए होगी।” तो नारद मुनि इस बात को पूरी ही कर रहे हैं, गोपियां बन जाती हैं। गोपियां तेज़ दौड़ती हैं यमुना के तट पर आती हैं, यमुना में जाके पैर डालती हैं और पैर निकालती हैं। और वहाँ पर जो धूलि होती है यमुना में, उसमें अपना पैर पूरा अगेन्ट देती हैं। फिर अपने वस्त्र निकालती हैं और उसमें एक पूरी झोली भरके धूलि बना रही हैं। “जितना ज़रूरत हो लेके जाओ।”
अभी जब वे वापस आ रहे होंगे वो दवाई ले जाएँ। तो तभी कृष्ण कहते हैं… नारद मुनि कहते हैं कि “क्या? आप सोचती हैं शायद यह बुद्धि नहीं है क्या कर रही हैं समझ में ही आ रहा है?” तो कहते हैं, “तुम्हें पता है अगर ये धूलि कृष्ण के चरण की माथे को स्पर्श करेगी तो तुम नरक में जाओगी।” तो गोपियां कहती हैं, “तुम्हें पता नहीं है, अभी हम नरक में हैं। यह विचार करके कि कृष्ण को सिरदर्द हो रहा है, हमें इतनी वेदना हो रही है कि यह एक नरक के समान है।”
“चलसि यद् व्रजाच्चारयन् पशून् नलिनसुन्दरं नाथ ते पदम्। शिलतृणाङ्कुरैः सीदतीति नः कलिलतां मनः कान्त गच्छति।”
गोपियां कहती हैं गोपीगीत में कि “अगर वृन्दावन में कोई कांटे हैं या कोई पत्थर हैं, वह कृष्ण के चरण कमलों को चुभ रहा है, वह सोच कर मान लीजिये हमारा हृदय फट रहा है। कलिलतां मनः, बड़ी व्यथा हो रही है।” तो ये गोपियों का यही नरक कहते हैं। “नरक, तुम रुकते क्यों हो? तुम जाओ, जल्दी जाओ! तुम नरक में जाओ, नरक में जाने वाले हैं? कृष्ण को एक पल इस दर्द से राहत दिलाने के लिए हमें हमेशा के लिए नरक जाना पड़ा है तो हम तैयार हैं!” ये है गोपियों का निस्वार्थ भाव।
जब हम भगवान के लिए क्या त्यागने के लिए तैयार होते हैं वह महत्वपूर्ण है। जब उससे हमारे एक तरह से क्या हम भगवान को देते हैं, वह उससे भक्ति ज़ाहिर रूप से प्राकृत होती है दिखती है। “पर क्या त्यागने के लिए तैयार हैं?” ये महत्वपूर्ण है। तो इसलिए यहां बताया क्या हो रहा है, “विसृज्य लज्जां रुरुदुः सुस्वरम्”। तो गोपियां जो हैं, जो उनकी लज्जा है वह त्यागने के लिए तैयार हैं।
भगवान की भक्ति में सामाजिक अपमान और दुख
भगवान, अब एक लज्जा का मतलब यहां पर क्या है कि एक तरह से जब हम भगवान की भक्ति करते हैं, डिवोशन के लिए क्या बनता है कि जो भौतिक कुछ बुरा है, कोई शराब पी रहा है, मांस खा रहा है, तो बुरा है, वह हम छोड़ते हैं। पर भगवान के लिए जो अच्छा है वह भी उनको छोड़ना पड़ता है। “उनको अच्छा को छोड़ना है? नहीं, साधारणतः छोड़ना नहीं है, हमको बुरा छोड़के अच्छा बनना है। लेकिन आपके अच्छा के लिए, जो भगवान के लिए आपके अच्छा के लिए बनना है बहुत एक ज़रूरी है।” तो जो अच्छा भी है वह कभी-कभी हमें छोड़ना पड़ता है भगवान के लिए।
इसका मतलब क्या है? कि कभी-कभी भगवान की सेवा ज़्यादा हैं, मान लीजिये अगर सुसंस्कृत समाज है उसमें अगर कोई भगवान की भक्ति कर रहा है तो ऐसे व्यक्ति को बड़ा आदर मिलता है, उसका सम्मान होता है कि “ये भी अच्छा व्यक्ति है, अच्छा कार्य कर रहा है।” पर कई बार ऐसा होता है कि भगवान की भक्ति करने से ही व्यक्ति तिरस्कृत हो जाता है, व्यक्ति की निंदा होती है। व्यक्ति को भक्ति के कारण अपमान होता है। भक्ति के कारण उस व्यक्ति का जो सामाजिक वर्तमान है उच्च अगर लगता है तो। अभी कैसे है जब ऐसे होता है तो “मैं अच्छा कर रहा हूँ और मैं जब अच्छा कर रहा हूँ उसके लिए मुझे लोग बुरा मान रहे हैं,” वह सहन करना बड़ा मुश्किल होता है। वो क्या कर रहे हैं, उनको जो आदर मिलता है अभी साधारण समाज जो आदर मिलता है वो अगर कोई स्त्री है उसको जो धर्मनिष्ठा जो है उसके आदर पर वो आदर मिलता है। तो अभी जब गोपियां इस तरह से कृष्ण के प्रति अपनी जो भक्ति है अपने आखर हैं सब के सामने व्यक्त कर रही हैं तो उससे लोग सोचते हैं कि ये कैसी बहुत बहुत हैं। तो उससे उनकी बदनामी हो सकती है पर वह उसकी परवाह नहीं कर रही हैं।
एक तरह से शास्त्रों में सब जानते हैं कि ये महान भक्त हैं पर, और कृष्ण भगवान हैं एक तरह से जानते हैं सब। पर फिर भी जब इस तरह से करते हैं तो जो निंदा होती है, वो निंदा भी अलग-अलग कारणों से हो सकती है। पर जब वो निंदा किसी की होनी है, कोई अच्छा कार्य कर रहा है और उसके लिए उसकी निंदा होनी है, क्योंकि “अच्छा कार्य क्यों कर रहे हो?” तो कैसे होता है कि हमारे जीवन में जब दुख आता है, अलग-अलग कारणों से दुख आ सकता है। तो जब दुख आता है हमारे जीवन में तो हम कह सकते हैं, जब दुख आता है तो भगवान की क्या भूमिका है दुख में? तो एक तरह से भगवान हैं कि वो अच्छा कारणों से दुख आ सकता है, ऐसे हम कहते हैं भगवान का एक नाम है ‘हरि’, वो दुख का हरण कर लेते हैं।
पर अभी कभी-कभी क्या होता है, भगवान हैं पर फिर भी क्या होता है? अगर वो नहीं दुख, हमारे जीवन में दुख है वो नहीं निकाल रहा है तो हम सोचते हैं कि भगवान की भक्ति क्यों करें? पर अगर इसके जगह में एक तरह से हम देखें कि हमारे जीवन में भक्ति के कारण ही दुख आ रहा है। Bhakti becomes the cause of our distress. तो ये सहन करना बड़ा मुश्किल हो जाता है। प्रह्लाद महाराज के लिए उनकी भक्ति के कारण ही दुख आ रहे थे। अगर भक्ति छोड़ देंगे तो कोई दुख नहीं है। तो अगर भक्ति से दुख आता है तो ये सहन करना बड़ा मुश्किल होता है।
अगर जब हम भक्ति कर रहे हों, जगत से भी दुख आता है तो वो सहन करना मुश्किल होता है। “पर मैं भक्ति कर रहा हूँ तो ये दुख नहीं आना चाहिए, मेरे जीवन में अच्छा चाहिए, पर भक्ति से ही दुख आ रहा है।” तो वो कैसे सहन कर रहा है ये मुश्किल है। पर फिर भी हम कह सकते हैं “मैं भक्ति कर रहा हूँ पर ये शायद हिरण्यकशिपु को इतना आसक्ति है वह भक्ति के खिलाफ है इसके कारण वो दुख दे रहा है।”
जब भगवान ही दुख का कारण प्रतीत हों
पर इससे ज़्यादा मुश्किल क्या है कि अगर भगवान से ही दुख आ रहा है। तो भगवान से ही दुख आ रहा है, मतलब भगवान के कार्य से, भगवान जो कार्य कर रहे हैं उससे ही दुख आ रहा है। तो ये सहन करना तो बड़ा है मुश्किल। पर अभी गोपियों के लिए इस तरह से हो रहा है। ये एक तरह से न केवल बदनामी, पर जब कृष्ण छोड़ के जा रहे हैं, तो जिस कृष्ण के लिए वो सब को छोड़ने के लिए तैयार हैं, वही कृष्ण जा रहे हैं। अभी ऐसा नहीं है कि कृष्ण को कंस अरेस्ट (arrest) गिरफ्तार करने के लिए कोई सैनिक भेज रहे हैं और बांध कर वो खींच के लेके जा रहे हैं। नहीं, कृष्ण अपनी स्वेच्छा के लिए जा रहे हैं। वो गोपियां उनको रोकने के लिए दुख रही हैं, नहीं, छोड़ के जा रहे हैं।
तो जब भगवान ही हमारे दुख का कारण बनते हैं। अभी ऐसे लग रहा है भगवान ही हमारे दुख का कारण हैं। तो उस समय कोई बोलेगा, बोलेगा “मैं भगवान की भक्ति क्यों करती हूँ?” और ये तो भी खुद स्वाभाविक कारण है, स्वाभाविक विचार आ रहा है, पर तो जस्टिफाइड (justified) है। पर क्या है? ऐसी परिस्थिति में भी वो गोपियां भगवान की भक्ति नहीं छोड़ती हैं। भगवान जब उनको छोड़के चले जाते हैं, तो भगवान ही उनके दुख का कारण बन जाते हैं, पर उसके बावजूद वो गोपियां भगवान की भक्ति नहीं छोड़ती हैं। तो वो न केवल भगवान के लिए सब कुछ छोड़ती हैं, पर जब भगवान उनको छोड़के चले जाते हैं…
अभी अलग-अलग तरह से ज़िक्र होता है कि कोई संबंध टूटता है, तो अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग कारण होते हैं संबंध टूटने के लिए। मैं कैनेडा (Canada) में गया था, कैनेडा में एक भक्त के घर में आता हूँ तो उन में जो हैं वो जो भक्त हैं, जो पति हैं, वो बड़ी कंपनी में हैं, फैक्ट्री मैनेजर हैं। वो पूरा समय देते हैं पति के पास शादी करने के लिए आओ, पति के पास शादी अटेंड करने के लिए आओ। तो वो माता जी बता रही थीं मुझे कि अभी कैसे है अमेरिका में सब कुछ, बहुत कैनेडा में है पाश्चात्य देशों में, सब कुछ बहुत compartmentalized हो गया है। मतलब अगर कोई divorce चाहता है, तो अगर कोई lawyer के पास जाता है तो वो lawyer के लिए गैर कानूनी है ये बताना “तुम ये divorce मत करो।” अगर वो व्यक्ति को divorce नहीं करना है तो उसके लिए marriage council होते हैं। तो marriage council के पास जाएँ वो कोई बोलेगा। अगर आप कहते हैं “तुम divorce नहीं करना चाहते हैं तो ऐसे ऐसे करो।” पर अगर वो attorney बोलता है, तो उसके लिए lawyer के लिए गैर कानूनी है तुम ये बात चले जाएँगी, तो इसके लिए बड़ी बात नहीं है। तो क्या है “आप divorce मत करो।” तो actually क्या होता है अगर ऐसे कोई करेगा तो वो जो client है वो attorney के लिए case कर सकता है कि “तुम मेरी इच्छा को पूरी करने के लिए, मेरी इच्छा में बाधा ला रहे हो।”
तो वो बता रही थीं कि अगर वे ऐसे आते हैं कि वो उसको सहन ही नहीं कर पाते हैं। कोई बोलने ही लगते हैं, कोई बोलता है कि “एक बात मुझे एक डिवोर्स चाहिए।” “क्यों? अब हो सकता है इसके पीछे और कोई कारण हो सकते हैं, पर फिर भी जब कारण बता रही हैं कि जब टूथपेस्ट (toothpaste) करते हैं, तो जब टूथपेस्ट होता है तो टूथपेस्ट को मैं रोल करती हूँ।” तो यह प्रकार के लोग दो होते हैं: टूथपेस्ट रोलर और टूथपेस्ट स्क्वीज़र। तो टूथपेस्ट रोलर क्या होते हैं? वो पीछे से आहिस्ता धीरे-धीरे दबाकर निकालते हैं। जो स्क्वीज़ करते हैं, कहीं भी दबाओ और वहाँ से स्क्वीज़ हो जाए, अपना काम हो जाए आगे जाएँ। तो बोलीं कि, “I am a toothpaste roller, my husband is a toothpaste squeezer. We have irreconcilable differences.” कि हम दोनों में ऐसा भेद है, कि ये कभी हल नहीं हो सकता है। तो बोलीं कि, वो लिख रहे हैं, फॉर्म भरना होता है। “Do you really want to give this answer easily?” ये जो है, ये मेंटालिटी का लक्षण है। कि जो रोल करते हैं, टूथपेस्ट को, उनकी जो मेंटालिटी होती है, बहुत जेंटल होती है, आर्टिस्टिक होती है। जो स्क्वीज़ करते हैं टूथपेस्ट को, उनकी मेंटालिटी पावर हंगरी होती है। तो, वो बहुत आगरी करते हैं, ज़बरदस्ती करते हैं। अभी मन कहां से कहां तक मुश्किल निकाल सकता है। वो बोलीं, “This toothpaste is just a symbol of the mentality.”
तो ठीक है, हो सकता है। किसी ने तो सोचा भी नहीं होगा कभी क्योंकि टूथपेस्ट के बारे में। पर यह होता है कभी कभी लोग, जहाँ पर कहने के बारे में छोटी-छोटी बातें, छोटी-छोटी चीजों को बहुत बड़ा बनाते हैं। इतनी-इतनी-इतनी रिश्ते को तोड़ने के लिए काफी हो जाती हैं। यह टूटने के लिए काफी हो जाती हैं रिश्ते के टूटने के लिए।
गोपियों की अहैतुकी भक्ति और भौतिक दृष्टि का भ्रम
पर गोपियों की भक्ति ऐसी है कि भगवान स्वयं उनको छोड़के जाते हैं। और न केवल छोड़के जाते हैं, भगवान छोड़के जाते हैं और फिर क्या होता है? भगवान बोलते हैं “मैं कुछ दिनों में आ जाऊँगा।” और कुछ दिन क्या? कई साल हो गए आते ही नहीं हैं। और न केवल आते नहीं हैं क्या होता है? वो वृन्दावन से मथुरा चले जाते हैं, फिर मथुरा से वो द्वारका चले जाते हैं और दूर चले जाते हैं। और यहां तक भी गोपियों को कुछ बोलने को नहीं आते हैं, कुछ संदेश नहीं देते हैं। और फिर उतना ही नहीं वहीं पर कृष्ण विवाह ही कर लेते हैं। जैसे गोपियों को पूरी तरह से भूल ही गए हैं। तो ऐसी परिस्थिति में गोपियों को कृष्ण को त्यागना ही पूरी तरह से स्वाभाविक है, पर फिर भी वो नहीं त्यागती हैं। क्यों? क्योंकि उनकी जो भक्ति है वो अहैतुकी अप्रतिहता है।
“आदर्शानान् मर्महतां करोतु वा…” कि आप मेरा हृदय तोड़ भी दो फिर भी “मत्प्राणनाथस्तु स एव नापरः”, आप ही मेरे प्राण के नाथ हो। तो अभी कोई कह सकता है कि मैं अमेरिका में यह गोपियों की भक्ति की महिमा है वह बहुत दिव्य है। तो हमारी दृष्टि से हमें क्या मौन रखता है कि गोपियों के संबंध को हम भौतिक समझते हैं क्या है कि केवल एक पुरुष-स्त्री का संबंध है। पर हर एक व्यक्ति को अपने बैकग्राउंड के अनुसार अलग अलग प्रकार के मोह आते हैं, अलग अलग प्रकार की धारणाएं आती हैं।
तो एक मैं अमेरिका में लेक्चर दे रहा था वहाँ पर एक बता रहा था, भक्त थे पर एक नए, एक नए अमेरिकन गेस्ट आये थे वहाँ पर। और क्योंकि वह ज़्यादा अमेरिकन नहीं थे, वैसे तो ज़्यादा पाश्चात्य देशों में भी ज़्यादा अमेरिकन लोग भक्त बन रहे हैं, पर इतने लिए भारतीय लोग, हम आ रहे हैं भारतीय लोग काफी भक्ति में आ रहे हैं वहाँ पर भी पाश्चात्य देशों में। तो ज़्यादा अमेरिकन लोग नहीं थे तो मैं देख रहा था कि वो थोड़ी… मैं गोपियों और कृष्ण के संबंध के लिए बता रहा था। क्योंकि आप ज़्यादा कर रहे हैं ज़्यादा अमेरिकन लोगों में भारतीय लोग भक्त बन रहे हैं, “ये क्या है, ये अब्यूसिव (abusive) संबंध जो है, जो दुर्व्यवहार का जो संबंध है इसकी परिभाषा है बिल्कुल। मतलब कृष्ण हर तरह से गोपियों को ठुकरा रहे हैं और फिर भी गोपियां उनसे आसक्त रह रही हैं। तो ये कृष्ण गोपियों का शोषण कर रहे हैं, कृष्ण गोपियों को अब्यूज़ कर रहे हैं। इतने निष्ठुर हो गए हैं, उनका हृदय इतना पत्थर दिल हो गया है कि जिन गोपियों ने सब कुछ उनको दे दिया है वह उनको छोड़के चले गए हैं।”
तो वास्तव में अभी जो गोपियां हैं वह एक तरह से कृष्ण की भक्ति कैसे करनी है उसका एक आदर्श हैं। अभी इसका आदर्श मतलब ये नहीं है कि भगवान सबके साथ जैसा बर्ताव गोपियों के साथ किया वैसा करें, और गोपियों के साथ जैसा बर्ताव किया उसका भी कारण है। तो वह कारण होंगे पर जब मथुरा में चले जाते हैं तो वहाँ पे क्यों जाते हैं और जब जाते हैं तो क्या कारण होते हैं, किस तरह से कृष्ण वृन्दावन से बाहर वृन्दावन का ही स्मरण कर रहे हैं उसकी चर्चा हम कल करेंगे।
विरह में भगवान की दिव्य उपस्थिति (विप्रलम्भ)
पर जो गोपियों के प्रेम हैं… यहाँ भी डिवोशनल रिमेंबरंस (devotional remembrance) की बात करते हैं तो प्रेजेंस और रिमेंबरंस एक है। यह है both together इसके समझे आगे सकते हैं। Is he present but no remembrance? यह क्या है? भगवान विश्वरूप नहीं हैं। इसलिए क्या हो रहा है बहुत दुख है दुख है। तो गोपियां वेदना में हैं, बहुत दुख में हैं गोपियां। पर क्या अच्छा बताया, शास्त्रों में बताया है कि भगवान कभी वृन्दावन छोड़के नहीं जाते हैं। “वृन्दावनं परित्यज्य पादमेकं न गच्छति।” तो कभी भगवान वृन्दावन छोड़के जाते ही नहीं हैं। तो ये कैसे संभव है?
तो हम उसमें थोड़ा चर्चा करेंगे, पर संक्षेप में यहाँ भी, भगवान जो अपनी स्मृति के रूप में हैं, वो गोपियों के हृदय में और वृद्धि मांग जाते हैं। इसे बताते हैं तड़प जो होती है, तो भगवान का जो remembrance है, उसके दो स्तर हैं, उसको एक कहते हैं स्मृति और दूसरा है स्फूर्ति। तो स्मृति मतलब क्या है, this is conscientious या effortful जब हम प्रयास करके भगवान का स्मरण कर रहे हैं। हमारा मन इधर जा रहा है उधर जा रहा है पर हम मन भगवान के स्मरण में लगाते हैं। पर स्फूर्ति क्या है? स्फूर्ति मतलब spontaneous, वो अपने आप आ जाती है।
तो भगवान गोपियों के हृदय में इस प्रकार से प्रकट होते हैं कि वो जो प्रकट होना है, वो इतना सजीव होता है, इतना जीवंत होता है कि वो साक्षात भगवान के होने से भी अधिक जीवंत होता है। तो एक तरह से भगवान वहाँ पर हैं और भगवान की जो स्फूर्ति हो रही है, वो स्फूर्ति उनके लिए इतना दिव्य स्तर पर ले जाती है, कि वो भगवान का स्मरण जो है वो एक तरह से, जो भगवान की मौजूदगी नहीं है, ये एक ज़हर के समान है, पर भगवान के लिए नहीं। विरह का भाव है जो बहुत नेक्टर (nectar) से ज़्यादा है, एक कड़वा अमृत है। अब ये अमृत कड़वा कैसे हो सकता है? ये अमृत तो मीठा होता है। पर ये एक शुरुआत में वो एक तरह से दुख का कारण लगता है, पर एक गहन स्तर पे वो बहुत ही मधुर है।
वो गोपियां इस तरह से भगवान का स्मरण कर रही हैं जो कभी और नहीं होता है। उस स्मरण में जो एकाग्रता है, जो आनंद है वो अब अद्वितीय ही होता है। और इसका चैतन्य चरितामृत में बताया गया है: हॉट शुगरकेन जूस (hot sugarcane juice), गरम गन्ने का जूस होता है। गन्ने का रस, अब वो गरम है इसलिए पीते हैं तो जिह्वा पर दर्द होता है, पर वो इतना स्वादिष्ट है कि वो पीना नहीं छोड़ सकता है। नहीं पीना संभव नहीं है। तो वो गोपियों के लिए जो एक तरह से वो दुख में हैं इसलिए भगवान हैं, तो शुरुआत में भगवान नहीं हैं तो ये एगनी (agony) नहीं है। एगनी मतलब बहुत बड़ा दुख है, पर भगवान का स्मरण इतना है कि वो एक्स्टसी (ecstasy) है, वो दिव्य आनंद है।
तो इस तरह से ऐसे नहीं है कि भगवान वो गोपियों का शोषण कर रहे हैं, भगवान गोपियों को अपना स्मरण इस प्रकार से दिलाते हैं जितना किसी और को नहीं होता है। और यह देखकर किस तरह से गोपियां कृष्ण का स्मरण कर रही हैं, यह देखकर उद्धव भी आश्चर्यचकित होते हैं। वो कैसे होता है उसकी चर्चा हम कल करेंगे।
सारांश में… भगवान को छोड़ के चले गए और फिर अभी ऐसी परिस्थिति में कुछ भी भगवान से नहीं लग रहा है, तो क्यों भगवान की भक्ति करें? फिर ही sorted करते हैं तो यह वह पूरी तरह से स्वीकार करती हैं। और भगवान क्या देते हैं उनको? भगवान ज़रूर कुछ दे रहे हैं, उनको स्फूर्ति दे रहे हैं। इस स्फूर्ति से क्या होता है? हमने देखा अगर वो एक मीठे नेक्टर जैसे है जो उनको भगवान का प्रेजेंस है। प्रेजेंस नहीं है फिर भी तो यह वह प्रेजेंस और जब मिलता है तो इस तरह गोपियों की भक्ति है जो बहुत दिव्य स्तर की भक्ति है। बहुत बहुत धन्यवाद। हरे कृष्णा।