✦Truth without compassion often becomes cruelty. Truth without context often becomes distortion. Truth without relevance often becomes gossip. Inspired by Bhagavad Gita 18.22✦When we no longer find the shocking shocking, we should at least find our own loss of conscience shocking. Inspired by Bhagavad Gita 18.32✦The mind may not light the fire of destructive desire, but it often deludes us into pouring the gasoline of obsessive imagination onto that fire. Inspired by Bhagavad Gita 6.34
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✦Truth without compassion often becomes cruelty. Truth without context often becomes distortion. Truth without relevance often becomes gossip. Inspired by Bhagavad Gita 18.22✦When we no longer find the shocking shocking, we should at least find our own loss of conscience shocking. Inspired by Bhagavad Gita 18.32✦The mind may not light the fire of destructive desire, but it often deludes us into pouring the gasoline of obsessive imagination onto that fire. Inspired by Bhagavad Gita 6.34
Hindi Krishna Charitra 4 | Krishna in Mathura & Dwarka | Govinda Damodara Stotra 32 & 27 | Nashik
Disclaimer: This transcript was generated using AI and may contain occasional errors or inaccuracies.
Lecture Summary
इस व्याख्यान का विस्तृत सारांश निम्नलिखित है:
1. वृंदावन वासियों का विरह और पीड़ा
यशोदा माता (वात्सल्य रस): कृष्ण के जाने पर यशोदा माता एक जिम्मेदार रानी होने के कारण सबके सामने नहीं रोतीं, बल्कि अपने भवन में जाकर अकेले फूट-फूट कर रोती हैं। उन्हें चिंता है कि उनके बच्चे की देखभाल कौन करेगा।
गोपियाँ (माधुर्य रस): गोपियाँ अपनी लज्जा छोड़कर खुलेआम विलाप करती हैं। उन्हें भय है कि शहर (मथुरा) की चकाचौंध में कृष्ण उन्हें भूल जाएंगे। विरह में वे इतनी व्याकुल हैं कि एक पिंजरे में बंद तोते को भी कृष्ण का नाम (आनंद कंद व्रजचंद्र) लेना सिखा रही हैं।
2. मथुरा में कृष्ण की नम्रता मथुरा पहुँचकर कंस का वध करने के बाद कृष्ण स्वयं राजा नहीं बनते, बल्कि वह मुकुट उग्रसेन महाराज को सौंप देते हैं। कृष्ण का यह निस्वार्थ और नम्र व्यवहार सभी मथुरावासियों का हृदय जीत लेता है, क्योंकि केवल क्षमता (ability) से मन आकर्षित होता है, लेकिन अच्छे चरित्र से हृदय आकर्षित होता है।
3. प्रेम और कर्तव्य (Love vs Duty) का संघर्ष कृष्ण वापस वृंदावन जाना चाहते हैं, लेकिन यदुवंशी उन्हें रोकते हैं। वे तर्क देते हैं कि कंस के वध के कारण जरासंध और अन्य शक्तिशाली असुर मथुरा पर आक्रमण कर सकते हैं। इसलिए मथुरा की रक्षा के लिए कृष्ण का रुकना आवश्यक है। यहाँ कृष्ण के जीवन में प्रेम (वृंदावन जाने की इच्छा) और कर्तव्य (मथुरा की रक्षा) के बीच का तनाव दिखाई देता है, जिसमें वे कर्तव्य को चुनते हैं।
4. कृष्ण द्वारा जिम्मेदारी (Responsibility) लेना जब यह तय हो जाता है कि कृष्ण वापस नहीं जाएंगे, तो वे यह कठिन संदेश किसी और के माध्यम से भिजवाने के बजाय, स्वयं नंद महाराज को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ बताते हैं। वे समझाते हैं कि यदि वे वृंदावन गए, तो उनके शत्रु वृंदावन पर भी आक्रमण कर देंगे, जिससे सभी खतरे में पड़ जाएंगे। नंद महाराज इस बात को समझते हैं और भारी मन से अकेले लौट जाते हैं।
5. वसुदेव और देवकी के साथ मिलन बरसों बाद अपने असली माता-पिता से मिलने पर, कृष्ण किसी आम बच्चे की तरह उन्हें छोड़ने के लिए ताना नहीं मारते। इसके विपरीत, वे अत्यंत विनम्रता से क्षमा मांगते हैं कि उनके कारण वसुदेव-देवकी को इतने कष्ट सहने पड़े और वे उनकी सेवा नहीं कर सके। अपनी दिव्य शक्ति से कृष्ण देवकी को वात्सल्य का वह सुख भी प्रदान करते हैं, जिससे वे वंचित थीं।
6. विरह में प्रेम की वृद्धि आचार्य समझाते हैं कि गोपियों का प्रेम एक दावानल (forest fire) के समान है। जिस प्रकार हवा से छोटी मोमबत्ती बुझ जाती है लेकिन जंगल की आग और भड़क उठती है, उसी प्रकार कृष्ण के विरह (हवा) से गोपियों का प्रेम और स्मरण (आग) कम होने के बजाय अत्यधिक बढ़ जाता है।
7. श्रील प्रभुपाद का उदाहरण अंत में, कृष्ण के ‘कर्तव्य पालन’ की तुलना इस्कॉन के संस्थापक श्रील प्रभुपाद से की गई है। जिस प्रकार प्रभुपाद जी अमेरिका में अकेले और एकाकी महसूस करते हुए भी अपने गुरु के आदेश (कर्तव्य) का पालन कर रहे थे, उसी प्रकार जीवन में कई बार हमें अपनी भावनाओं से ऊपर उठकर अपनी जिम्मेदारियों और कर्तव्यों को निभाना पड़ता है।
निष्कर्ष: यह कथा सिखाती है कि कृष्ण केवल शक्तिशाली भगवान नहीं हैं, बल्कि वे एक आदर्श पुत्र, एक जिम्मेदार रक्षक और कर्तव्य-परायण व्यक्तित्व का सर्वोच्च उदाहरण हैं।
Full Transcriptions
हरे कृष्णा तो आज हम अभी आपका आज स्वागत है। यह आज ये चोथा दिन है मारा और तीन दिन हमने कृष्णा विंदावन में अलग-अलग रसों के बारे में चर्चा की है। तो अभी हम कृष्णा विंदावन के बाहर मत्थुरा और किस तरह से जब कृष्णा विंदावन से बाहर जाते हैं मत्थुरा में और फिर द्वारका में उसकी बारे में हम चर्चा करेंगे आज। यह शलोक है यह व्रजवासियों की जब बहुत ही पीडा पूर्ण वस्ता हो जाती है कृष्ण जा रहे हैं यदुवों के बीच में कृष्ण को ले जा जा रहा है तो कृष्ण तो जा रहे है वृंदावन के अंदर ये जानते हुए, ये विचार करते हुए कि जिस कृष्ण को मैं मेरा सोच रही थी, क्या ये कृष्ण मेरा था ही नहीं कभी? क्या वसुदेव सूनु, क्या ये वसुदेव का पुत्र था? रूरोध गोपी भवनस्यमद्धे अभी एशुदा माई जो है, वो बृंदावन की राणी है, एक जिम्मेदार पद है उनके लिए, तो उनकी जो भावराओं से विभोर हो रही है, तो दुनिया के सामने नहीं रो सकती है, जब कोई लीडरशिप की पुजिशन में होता है, तो उनको थोड़ा टॉफ कमपोस रहना पड़ता है, दुक भी होता है, तो वो प्राइबेट रहना पड़ता है, तो रूध गोपी भवनस्यमद्धे, अपने भवन में जाकर एशुदा माई फूट फूट के रो रही है, गोविंद दामोदर माधवेदी, वो कृष्ण का नाम ले रही है, कृष्ण का स्मर्ण कर रही है। विरंदावनांतात्वसुदेवसुणव, विरंदावनांतात्वसुदेवसुणव, गुविन्द दामोदर माढवेती, गुविन्द दाமोदर माढवेति, गुविन्द दामोदर माढवेति, तो अभी कृष्ण जब भृणदावन में होते हैं, तो उनके जीवन में अनेक विचित्र और विकड़ घटनाएं होती हैं. पर ये सारे जो विपत्तियां हैं, वो छोटी पढ़ जाती हैं वरजवासियों के लिए जब अभी कृष्ण भृणदावन छोड़ के जा रहे हैं. एक तरह से ये बिल्कुल अकसमात होता है.
इसके पहले वरजवासियों को पता नहीं होता है कि कमस का कृष्ण में कोई इंटरेस्ट है, कोई रुची है. अभी वरजवासियों जानते हैं कि वहाँ पे भृणदावन में ये आ रहे हैं, असुर आ रहे हैं पर कहां से आ रहे हैं वो पता नहीं है. कोई असुर ये कहता नहीं कि कमस ते भेजाए मुझे.
तो असुर आ रहे हैं कहीं से और कृष्ण उनसे बच रहे हैं, वो असुरो के बारे में एक कमस की ओर से अकरू आते हैं और अकरू कहते हैं कि कृष्ण को कमस ने बुलाया है और कमस वहाँ पे बहाना देता है क्या कि मुझे, मैंने सुना है कि कृष्ण बहुत बड़ा पहल्वान है, कि कृष्णने बड़े असूरों का वद किया है, कृष्णन को यहां पे मैंने एक मल्ल युद्ध आयोज़ किया है, तो कृष्णन वो देखने को आ सकता है. अभी कमस जो है, वो राजा है, और न केवल राजा है, वहाँ बहुत खुरूर राजा है। तो ऐसे राजा के खिलाव जाना वो बिल्कुल उचीत नहीं है। दो चीज़े हैं कि कृष्णे को बुलाया है, विजवासे सोचते हैं कि यादा कुछ खत्रा नहीं होगा कृष्णे को. और दूसरा सोचते है कि अगर नहीं जाएगे तो क्या है कि कभी कोई कोई अथॉरिटी में होता है, वहाँ अधिकालता है। वो कहते हैं कि मैं तुम्हारे इंविटेशन दे रहा हूँ, पर वो इंविटेशन नहीं है, वो Instruction है, वो command हुता है, वो order हुता है, तो अभी उसको टालने के लिए क्योंकि कारण नहीं हुँ था। तो इसलिए कृष्ण जाते हैं। अभी जब कृष्ण जाते है तो अलग अलग लोगों को अलग अलग भावुनाय थे ये विन्डावन माझे आप कि ये विंडावन है ये मथुरा है तो कृष्ण जाढरीथ है कि अभी कृष्ण के सथ्े सखते होगे शुरूरता पीछर रहती है। अभी दोनों जो वादसले रस में हैं और जो माधुर्य रस में हैं.
दोनों को एक तरसे चिन्ता हैं, पर चिन्ता के कारण अलग हैं. यशुदा माई को लग रहा है कि मेरा बच्चा पहली बार घर से दूर जा रहा है, और क्या होगा, कैसे कौन देखबाल करेगा उसको, कैसे रहेगा वो। तो यहां सोच के यशुदमाई उसको सहन नहीं हो रहा है। इस समय यशुदमाई को थोड़ा लगता है कि क्या होगा वहाँ पे। पर वो जो चिंता है यशुदमाई की एक वात्सले भाव में कृष्ण के देखबाल कौन करेगा, वो चिंता है। गोपियों की जो चिंता है, वो दूसरी चिंता है। तो अभी देखें यहां पे, जो वात्सले भाव में यशुदमाई है, वो भवनस्य मध्धे, वो अपने घर में जाकर रो रही है। पर जो गोपिया है, विशुरुज्य लज्जाम रुदूस्मसुस्वरम् वो घर से बाहर आकर विरोध कर रही है। तो अभी गोपियों को यह भै होता है, कि कृष्ण अगर गए हैं, तो वापस नहीं आएगे। तो गोपियों को लगता है, शहर इतना आकरशक है, शहर में इतने सारे आनंद के स्ट्रोत है, और कृष्ण विंदावन को हमें भूल जाएगे, और कृष्ण वापस नहीं आएगे। तो दोनों उत्तेजित हुए हैं, पर दोनों अलग अलग तरसे उत्तेजित हुए हैं। अभी जब कृष्ण गोपियों को वादा करते हैं, कि मैं कुछी दिनों में वापस आजाओंगा, कृष्ण का पूरा इरादा होता है वहाँ पूरा करने का। भी कृष्ण जो कमस का वद करते हैं मथुरा में, उसकी चर्चा हम जनमाश्टमी के दिन सुभे करेंगे, कैसे कृष्ण मथुरा चोड़के विंदावन में आते हैं, और फिर विंदावन से मथुरा वापस जाते हैं। तो अभी हम कृष्ण कमस का वद करते हैं, मल युद्ध में वद होने के बाद, फिर सारे यदु प्रसन हो जाते हैं, छुटकारा मिलते हैं उनको, कि कृष्ण ने कमस के आतंग से हमें छुड़ा दिया है, और फिर यदु आते हैं कृष्ण के पास, और कमस का मुकुट होता है, वो कृष्ण को देते हैं, और कृष्ण वो मुकुट को लेते हैं, पर अपने सिर पर बहरने के जगह पर, वो मुकुट ले जाते हैं महराज उगरसेन के पास, और कहते हैं, यह मुकुट आपका है, कमस ने जबर्दस्ति आपसे यह छीन लिया था, अभी मैं आपको यह आपस अर्पित करता हूं, और यह नमरता देखकर, यह सेवा भाव देखकर, यह आदर देखकर, सारे मतुरावासी यदू हैं बड़े प्रसन हो जाते हैं, अभी कभी क्या होता है, कुछ-कुछ से बच्चे होते हैं, युवक होते हैं, उनमें बहुत टालेंट होता है, बहुत शम्ता होती है, तो ज� आश्चर यदा कारे कर देते हैं, तो अबिलिटी एट्रेक्ट्स दा हार्ड, और आप कर सकते हैं, अबिलिटी जो है एट्रेक्ट्स दा माइंड, अरे कितना आश्चर जे कारे कर रहा है, पर क्या है, अब मानलीजी कोई क्रिकेटर है, अबिलिटी क्या करता है, एट मैच, दो मैच, दस मैच, पंधरा मैच, और फिर थोड़ी अच्छी बैटिंग कर लेता है, फिर कहता है, कि ये पहले के सारी बैटस्मन थे, वो सब बखवास थे, उनको कुछ बैटिंग आती ही नहीं थी, वो सचिन तैनल को मान नहीं देगा, सुलगासकर को मान नहीं देगा, तो फिर क्या होता है, आप खुद को क्या समझते हो, तो हमारे पहले जो आये हैं, इसे क्या होता है, कि हम लोगों के मन को आकरचित कर सकते हैं, पर किसी का रुदय को आकरचित करना है, तो ये एक चीज़ है, उसके अबिलिटी है, पर ये बहुत अच्छा खिलाड़ी है, ये बहुत अच्छा व्यक्ति है, ये दो अलग चीज़े हैं, तो किर्षन की नमरता देख कर सारे यदों बहुत पसंद हो जाते हैं, तो उगरसेन महाराज कहते हैं कि नहीं, तो तुम्हारा मुकुट है, तुम्हारे लिए उचित है ये, तुमने कमस को मारा, नहीं, मैं तो ये केवल आपके लिए ही मुकुट लाया हूँ, आप ही स्व कका है तुम तो उतनास्य की किसम्मा महताoo कर देता है there too listening who’d become the तुम रिन्दावन कसी आसखते हैं, वो अलग अलग next to कारण देते है to be known as karen एक करण देते हैं बोमिश के आधार पर, वो कहेथ है, तुम रिन्दावन के दही हो तुम तुम रज्वासी नहीं हो, तुम मथुरावासी हो, तुम यद्दू हो। नहीं, मैं तो नंदा महराज यशोदा का पुत्र हूँ। कहते हैं, नहीं। कहते हैं कि अभी वसुदेव ने कम्स को कम्स से बचाने के लिए कृष्ण को रात में ही उन्दावन ले के गए थे वो अभी यह सब को पता नहीं है पर यदू कहते है कि दिखो वो आकाशवाणी थी वो भविश्यवाणी थी कि जो वसुदेव का आठवा संतान है जो आठवी गर्भ है वह कम्स का वत करेगा अभी तुम ने कम्स का वत किया है इसका मतलब है तुम वसुदेव के पुतर हो तभी कृष्ण इसको स्विकार करने को तयार ही नहीं है नहीं मैं तो नंद महारा येशुदा का पुतर हूँ मैं व्रजवासी हूँ तो जब कृष्ण को परस्वेर करते हैं जो मथुरावासी दो तरह के आर्गिमें जगते हैं एक है बेस्ट ओन डाइनेस्टी और इस से क कृष्ण को परभाव नहीं होता है कृष्ण का रुदे व्रजवासी के पास इतना है उनके साथ इतना है कि वो स्विकारी नहीं करने का तयार है कि मैं किसी और का पुतर हूँ अब इसके बाद जो होता है मथुरावासी जो यदू है वो आर्गिमें बदल देते ह हम एक तरह से कुछ समझा रहे हैं और अगर हम देखते हैं कि उसके हाव-भाव से, उसके चेहरे से उसको कुछ इस्विकार नहीं हो रहा है तो फिर वही आर्गुमेंट करते रहे हैं तो क्या है? वह एक दिवार पर सिर मारने के समान है तो हमें तोड़ा बैकस्टेप नज़ेगा कि कोई और तरक है कि कोई और विचार धारा है कि तो फिर ये दूसरी विचार धारा करते हैं वो क्या है? डिउटी वो कहते है तुमने कम्स को मार कर हमारे पर बड़ा उपकार किया है पर उसे के दौरा हम खंठरे में भी आ गये हैं। आस्तो में हम दो प्रकार के खंठरे में आ गए हैं। एक है, जूर कम्स के मित्र थे। वोने कहाँ के लिए आज कम्स के वद कै Batman के बुला लेनेज। और कम्स के अनेक शक्तिशाली मित्र है। और यह जो उनकी चेतावनी होती है, चिंता होती है, वो सत्य होती है। कौन आता है बार-बार? जरासन आता है। तो यह है, पर वो कहते है, एक और चीज़ है, कि कम्स के अनेक शत्रू भी है, और कम्स ने उनके प्रति उनके प्लंडर किया है, उनके राजय को उद्धवस्थ किया है, तो वो मथुरा की संपत्ति को अभी मधला के रूप में उसको उद्धवस्थ करने के लिए आ जाएगी। यद्यपी हमने कमस का सहयोग नहीं किया था। पर वो मतुरा से हुआ था। इसलिए उनके द्वारा भी मतुरा पर आक्रमन हो सकता है। तो इसलिए तुम्हें हमारे सवरक्षन के लिए यहाँ पर रुखना पड़ेगा। तुम्हें एक फैन नहीं हो। तो अभी यहां सुनकर कृष्णा पेंसिव हो जाते हैं। विचार में पड़ जाते हैं। कृष्णा कहते हैं कि मैंने तो इनका सवरक्षन किया है अभी। कमस से मुझे सवरक्षन करना जुरूरी है। तो इसलिए वे अभी उनको वापस जाकर बोलना पड़ता है नंद महराज को। यश्वदमाई तो नहीं आयी है नंद महराज आये है। कृष्णा को जाकर बोलना पड़ता है नंद महराज को कि मैं आपके साथ वापस नहीं आने वाला हूँ। तो अभी यह सारा प्रसंग है, इसमें एक महतपूर्ण प्रिंसिपल है। कि यह प्रिंसिपल क्या है? कि अच्छा है कि वापस नहीं होते हैं। जो सत्य है, जैसे दिखता है, वैसे नहीं है। हम क्या करते हैं? लोगों का एक्शन देखते हैं। और मैं यहां हों, मैं किसी का एक्शन देखता हूं। और एक्शन एक्षन में उनका कापी होती है. कि spoonful जानता होगा, यहां ना यारकता की चेहरछा करते हैं.
हम एक्शन देखते हैं, सल है शिरूंर। शिरूंर कापिया करते हैं। किसी का क्या उद्देश है यहाँ हमने देख नहीं पाते हैं। तो अभी जो साधारन तया, जब कृष्ण व्रजवासियों को छोड़के जाते हैं, तो व्रजवासियों को कितना दुख होता है, इसे काफी जोर दे जाता है। पर गुपाल चंपु में दोनों को, कैसे कृष्ण को भी बहुत दुख हो रहा है, वह भी दर्शा जाता है। और यह जो है, अभी एक तरह से, कृष्ण केवल एक दस साल के बालक है। वह भगवान है, सर्वशक्तिशाली है, पर जो लीला कर रहे हैं, उसमें कृष्ण केवल दस साल के बालक है। और अभी कृष्णा को, उनको एक टेंशन है। टेंशन क्या है? एक है लाव, और दूसरा है डूटी, जो प्रेम और कर्टव है, प्रेम से चाहते हैं कि वो व्रज में जाए, कर्टविक कारण को मतुरा में रहना है। और यहाँ जो एक पुल है, एक टेंशन है, और यहां हम सब को हमारे जीवन में, अलग अलग स्थर पर, अलग अलग परस्थितियों में अनुभो करना पड़ता है। और जो कृष्ण व्रिणामन में होते हैं, वहाँ केवल एक बालक रीड न कम इवा, वह केवल लीला कर रहे हैं, कोई बालक के समान खेल रहे हैं। असुर भे आते हैं, तो असुरों को मारना कृष्ण के लिए एक खेल के समान होता है। प्रवापाजी कहते हैं कि असुरों को मारना ये व्रजवासियों के लिए एक लंच के पहले अपटाइजर होता है। वो थोड़ा एकसाइटमंड आता है, थोड़ा एक्शन होता है, उससे उनको फिर बात में भूक लग जाती है, फिर खाना खाते हैं वो। तो वो काफ़ी खेल-कूद में हो जाता है, पर जब कृष्ण वृण्डावन छोड़की मतुराय आते हैं, तो कृष्णों पे जिम्मेदारी आती है। जब जिम्मेदारी आती है, तो ये आसान नहीं होता है। कई बार ऐसे होता है कि कोई परिवार में पती-पत्नी का अगर जम्ता नहीं है, तो वो डिवोस कर लेते हैं। जब उगर सेपरिट हो जाते हैं, तो फिर तभी कई बार कस्टडी के लिए बैटल होता है। कस्टडी के लिए मतलब कि बच्चे जो हो गए, किसके पास रहे गए। अब इस आधारन्ट है, अभी पारत में कोई बच्चे स्कूल में आते हैं, तो दुसरे मित्र उनको पूछते है, कि तुम कहां रहते हो, तुम्हारे माता पिता कहां पर रहते हैं, तुम कहां से आये हो। तो अमेरिका में, अमेरिका में नहीं, पासचात देशों में जन्दरली, बच्चे एक दुसरे को यह नहीं पूछते हैं, तुम कहां रहते हो। वो बते हैं, तुम किस के साथ रहते हो, तुम्हारे मा के साथ या पिता के साथ। अधिकांश जो बच्चे हैं, वो अधिकांश जो बच्चे हैं, वो अधिकांश जो बच्चे हैं, वो अधिकांश जो बच्चे हैं, वो अधिकांश जो बच्चे हैं, वो अधिकांश जो बच्चे हैं, वो अधिकांश जो बच्चे हैं, वो अधिकांश जो बच्चे हैं, उगर बच्चे की भाज सकते हैं, पर यह सोचल में बहुत क्राज़ेडी होता है, फिर भी, अभी जब कस्टडी बाटल होता है, तो माँना चाहती है कि बच्चे मेरे पास रहें, बच्चे मेरे साथ से रहे। तो फिर उसको कुछ रिजॉल करना पड़ता है। पर अभी ये कृष्ण के बीच में, कृष्ण एक तरह से नन्दमहाज यशोदा एक फैमिली है और वसुदेवदेव की दूसरी फैमिली है। कृष्ण के बीच में, कृष्ण के बीच में, कृष्ण के बीच में, कृष्ण के बीच में, कृष्ण के बीच में, कृष्ण के बीच में, कृष्ण के बीच में, कृष्ण के बीच में, कृष्ण के बीच में, कृष्ण के बीच में, कृष्ण के बीच में, कृष्ण के बी� कि अडेनकाना ंट्ते पर, कृष्ण के बीच में, कृष्ण के बीच में, कृष्ण के बीच में, पर जो इसके विपरीद और जो एजी है वो आउट सोर्स पर जो इरस्पॉंसिबल होते हैं वो क्या करते हैं जो एजी है जो अभी कोई बड़ा ब्रिज़ कोई बड़ा प्रकल्प हो जाएगा तो मंत्री वहाँ पे फोटो लेने के आ जाएगे उसका पूरा प्लानिंग उसक इतना जो है शुरुवाद से ही वो दिखा रहे है कि कैसे वो ज़िम्मेदार है वो चाहते है कि ये जो यूज है कि मैं यहाँ पे नहीं रहने वाला हूँ ये मैं खुद दू न केवल कोई और दे क्यों लोगि इससे क्या होता है कि इससे एक तरह से वो नन्ड महाराज को सांतोना भी देना चाहते है अभी कैसे है कि कोई बुरी खबर देनी है तो कौनसा वेक्ति कैसे खबर देगा यह महतुपूर नहीं समझता है अभी कोई वेक्ति है जो वो भावनाई समझता है वहाँ पे तो वो समझता के साथ वो खबर देगा वो जानकारी देगा जो नूस है वो देगा पर कोई अगर समझता नहीं है तो जो चीज़ बता नहीं बता देगा ऐस तरह से बता देगा कि वो जो जानकारी है उससे वेक्ति को वेदना होती है उससे ज़्यादा क्या होता है कि जिस तरह से बता या गया है मान लिए जो कोई पेशन बहुत क्रिटिकल है और डॉक्टर सरजरी करने जाते है और सरजरी से सारे रिष्टिदार है बड़े चिंता में बाहर बैठे हुए और सरजरी से डॉक्टर बाहर आते है यह बाहर बैठे है और बड़े चिंता में बाहर बैठे हुए अच्छा बोल के चले जाते हैं तो यह सुनके जो पेशन के रिष्टिदार है उन पे कितना सद्मा होगा अभी उससी तरह से कृष्णे बोलते है कि तो यह आसान नहीं है कि जो डिफिकल्ट है वो सम्वेधन शिल्टा से करना चाहिए आजकल जो लोग हैं बहुत सेल्फी लिया करते हैं तो अभी एक तरह से सेल्फी लेना ओके है तो अभी कैसे थोड़ा मंदिर में आना भी यूगो के लिए एक तरह से कूल हो गया है तो लोग मंदिर में आते हैं, मंदिर में भी सेल्फी लेना चाहते हैं तो अभी मंदिर में भगवान के साथ, भगवान के लिए पीछे पीछे गुड़े करके सेल्फी लेना यह उचित नहीं है, भगवान के लिए पीछे का नाउचित नहीं है तो कुछ बक्तन रादा गोपिनाद मंदिर में रादाहात महराज से पूछा कि अभी कुछ यूग आते हैं, वो सेल्फी लेते हैं तो क्या करना चाहिए, नहीं रोकना चाहिए, यह तो अपराद है तो महराज बोले कि हाँ, यह अच्छा नहीं है और सेल्फी लेना, पर महराज बोले कि जब हम लोगों को बताएगे, खास करके यूगों को बताएगे कि आप सेल्फी मत लो, तो यह कौन बताएगा और कैसे बताएगा अगर कोई बुरी तरह से बताएगा तो उसके बाद में तो यूग सेल्फी नहीं लेगा, पर मंदिर में भी वापस नहीं आएगा कई बार क्या होता है कि बेहतर है कि आप नोटिस लिग दो पर उसको इंपोज मत करो क्योंकि वो इंपोज करेगे, तो फिर उससे कौन कैसे करेगा कई बार क्या होता है, रूल्स बिकम दे राइचियस एक्सक्यूज फ़ूर पीपल तो अब्यूस पावर कि जब कोई नियम होता है, कुछ लोगों में अपना शक्ती दिखाने का प्रवुत्ति होता है और ये नियम है, तुम नियम नहीं पालन कर रहे हो, मैं तुमको दिखाता हूँ अभी, क्या सजा मिल लिए तुमको तो ऐसे हैं कि रूल्स हैं पर रूल्स को कैसे समझाना है, वह महत्वपूर्ण है तो ये पॉंट है कि कृष्णा खुद सम्वेदन शीलता के साथ नन्द महराज को बताते हैं तो कृष्णा जाते हैं और नन्द महराज तो बहुत प्रसंद है, नन्द महराज पूर्ण अपेख्षा कर रहे है कि कृष्णा वापस आएगी अभी और कृष्णा वापस आकर हमारे साथ कहां जाएगे, बृंदावन जाएगे और कृष्णा आते हैं, अभी कोई व्यक्ति अगर हम किसी को बहुत अच्छी से जानते हैं तो उनके छेहरे के हाव-भाव से उनकी क्या भावना हैं हम समझ जाते हैं बलेही वो व्यक्ति अपनी भावना न दिखाने का प्रयास कर रहा हो पर वो अगर चिंतित है, वो विचलित है, वो मायूस है, तो हमें समझ जाता है खास करके अगर किसी व्यक्ति को हम जानते हैं तो तो अभी कृष्णा ने बड़ा पराकरम किया है कृष्णा ने कमस का वद किया है कृष्णा ने बड़ी निस्वार्थ नमर्ता के भाव से नमर्ता के साथ जो मुकुट उगरसन को दिया है ये बड़े आनन्द का प्रसंग होना चाहिए पर जब कृष्णा आते है नन्दा महाराज के पास तो उनको देखके ही नन्दा महाराज सहं जाती है कृष्णा क्या हो गया कृष्णा कहते है कि यदू कह रहे है कि वसुदेव का आठवा संतान कमस का वत करने वाला है इसके आधार पर वो कह रहे है कि मैं उनका पुत्र हूं अभी ये सुनकर नन्दा महाराज हसने लगते हैं कहते है ,अचर में आधार पहला सुनका करने का सुत्रह्म साउनने के लिए कि ननदा में इतना दुख आता है कि ऐगर रोना नहीं है तो वह हसने लगते हैं और हमें खेलना खिलN कहते हैं हमारा क्याका भाग गया है देखो कि जो हमारा है उसपर बड़े-बड़े लोग उसपर दावा कर रहे हैं। और फिर कृष्ण कहते हैं कि वो ऐसे बता रहे है कि वो खत्रे में है और मुझे यहाँ पर रहना चाहिए उनके सरक्षन के लिए। यह सुनकर नंदा महाराज भी गंभीर हो जाते हैं। तो कहते हैं कि तुम यहीं पर रहो और वसुदेव के आदिश का पालन करो। जिस तुम मेरा पालन करते थे वैसे। तुम मेरा आदर करते थे। और फिर नंदा महाराज कहते है कि तुम यहाँ पर रहोगे तो मैं भी यहाँ पर जाओंगा मैं भी मठूरा के बाहर यहाँ पर रह लूँगा। तो कृष्ण कहते है नहीं, यह संभव नहीं है। तो क्यों, क्या तुम नहीं चाहते हैं हम यहाँ पर आए। कहते हैं नहीं, यह बात नहीं है। कहते हैं कि अगर मैं, अगर आप यहाँ पर रहेगे, हमारे बास इतने सारे गाए हैं, और हम तो गौले हैं। और गायों की देखबाल करना, यह हमारा करतव्य है। गोरक्षन अर्थम, गोरक्षन जो है, यह हमारा करतव्य है। तो मठूरा में इतने घास नहीं है कि हमारे गायों, गायों को अन्न मिल सके। उनके लिए आपको बुरिंदा हुए में रहना पड़ेगा। तो अभी, कृष्ण न केवल कृद करतव्य कर रहे हैं, पर कृष्ण जो करतव्य है, वो अपने बिताजी को भी याद दिला रहे हैं। तो ये एक तरह से ज़िम्मेदारी का कितना बड़ा लक्षण है। और उनको किसी अपमान नहीं कर रहे हैं, तुम अपना करतव्य भूल जा रहे हो। तो फिर वसुदे दन्दा महाराज कहते हैं कि, हर हफ्ते में मैं तुमसे मिलने आ जाओगा, येशुदा को भी लेकर आ जाओगा। और तुम भी बीच-बीच में आते रहना विंदावन में। अभी कृष्ण बहुत गंभीर हो जाते है। कृष्ण कहते है कि, न तो आप मुझे मिलने आ सकते हैं, और नहीं मैं आपसे मिलने आ सकता हूँ। क्यों, ऐसे क्यों? कृष्ण कहते है कि, अभी मैंने कम्स को मारा है, तो जो कम्स के मित्र है, वो मेरे शत्रु बन जाएगे। और वह मुझे आकरमन करेगे, और जो मेरे लिए प्रिय है, उन पर भी आकरमन करेगे। जैसे रावन को जब बदला लेना था, कि राम ने उनके खरदूशन को माड़ा डाला, उनके जनस्थान में सेना को माड़ा डाला, ने शुर्पनका का नाग काट दिया, तो बदला लेना था, तो क्या किया? सीता का अपरण किया। तो असुर होते हैं, जो साधारन ते जो शत्रिय होते हैं, वो दूसरे शत्रियों से युद्ध करते हैं, बर जो शत्रिय के नकाब में होते हैं, जो शत्रिय के नाम पे कलंक होते हैं, वो क्या करते हैं? वो दूसरे शत्रियों पे आकरमन नहीं करते हैं, वो शत्रियों के परिवार पे आकरमन करते हैं। तो यह आतंकवाद का यही लक्षन है एक तरह से, कि वो केवल सिविलियन्स को टार्गेट करेंगे। तो अभी कृष्णी कहते है, अभी अगर मेरे शत्रियों को ऐसे लगेगा कि हम में बहुत घनिष्ट सम्मंद है, तो फिर वो जरूर आप पे आकरमन करने के लिए आजाएगे। उनको ऐसे लगना चाहिए, कि मैं सिर्फ रिंदावन में रह रहा था क्योंकि मतुरा में खतरा था। अभी मतुरा में खतरा नहीं है, तो मैं सिर्फ रिंदावन से मतुरा वापस आ गया हूँ, अब मैं व्रिंदावन को भूल गया हूँ। तो अभी यह सुनके रिंदाव महाराज रहता है, क्या तुम सभी में भूल जाओगे हमको। पर क्रिश्ण कहते हैं, नहीं नहीं पर ही है, हमको ऐसे दिखाना पड़ेगा। तो नंदा महाराज बोलते हैं, मैं संदेश बहुज़ूगा तुम्हारे देखबाल पूछने के लिए एशोदा माई तुम्हारे लिए स्वाधिष्ट वेंजन बनायेगी, भैजेगे। पहले कि उनको डिसगाईज में आना पड़ेगा, उनको प्रज्वासियों के रूप में नहीं आ सकते हैं। तो ठीक है। ऐसे बोलके फिर नंदा महाराज विंदावन से चले जाते हैं। अभी जो क्रिश्णा का ड्यूटीफुलनस है, कितना एक है, कि सबसे पहले, एक से, यह जो क्रिश्णा मतुरा में आते हैं, तो क्रिश्णा का responsibility यह पहले क्या है? He first staying in Mathura, यही एक जंबिदारी का लक्षा है। फिर दूसरा explaining to नंदा महाराज। यह सारी, एक तरह से, एक तरह से ड्यूटी और responsibility, कभी कभी एक समान शब्द लेते हैं वो, और समान है एक तरह से, पर वो समान नहीं है, जब ड्यूटी होता है, वो एक तरह से compulsory माँ जाता है, यह तुम्हारा करतव है, तुम्हें करना ही पड़ेगा, पर जो responsibility जो होता है, वो एक तरह से voluntary होता है, I take responsibility for this, मैं स्वयम यह जिम्मेदारी स्विकार करता हूं, कोई मुझे पर यह लाद नहीं रहा है, पर यह मैं स्विकार करता हूं, प्रवापाजी कहा करते हैं, कि हमारी जो भक्ति में प्रगति होती है, वो हम कितनी कृष्ण के लिए जिम्मेदारी लेते हैं, उसके आधार पर होता है, तो अभी कृष्ण कह सकते थे, कि मैं तो मतुरा का नाथ, मतुरा का रक्षिक बनने के लिए नहीं आया था, मुझे यहाँ पर बुलाया था, मैं इसलिए आ गए यहाँ पर, और कमसे ने, मेरे कमसे ने व्रेसलर्स, मलल युद्ध मिच पर आकरमन किया, तो मैंने उनको मार डाला, कमसे ने धंकी दी, कि वो वरजवासियो को मारेगा, इसलिए मैंने उसको मारा, मैं, मेरी यहाँ पर क करते हैं क्रिशन, वो वस्सुदेव और देवकी से मिलते हैं, और यह जो अपने क्रिशन करते हैं, वो बहुत ही एक्स्ट्रोड़डरी है, अभी साधारन्ट वैश्णाव साहित्य में ऐसा शिष्टाचार होता है कि अगर कोई कुछ, कोई जो आदरनी विक्ति है, वो कोई गलत कारे कर रहा है, और वो कोई गलत बात कर रहा है, तो फिर उनका नाम नहीं लेते हैं. कुछ लोग ऐसे बोलते हैं. विजीवगोष्वामी जब श्रिदर्श्वामी की जो टिका है, यह थोड़ा complicated है, पर मैं simple करने का प्रयास करता हूँ, श्रिदर्श्वामी की जो टिका है, वो वेदान सुत्र पे, भागवतम पे, उसमें कहीं जब श्रिदर्श्वामी ने निर्विशेष्वादी commentary दिया है, तो श्रिदर्श्वामी का चेतने महापुरो बड़ा आदर करते हैं.
जिवगोष्वामी, वो श्रिदर्श्वामी का आदर तो करते हैं, पर उनकी जो निर्विशेष्वादी टिका है, उसको सिकार नहीं कर तो जब श्रिदर्श्वामी भकति में टिका देते हैं तो कहते हैं तुम तकार �ν है। पर जब वो निर्विशेष्वादी टिका देते हैं कयंते हैं, तो कुछ खलपनिक तरकवादी, अइसा कहते हैं अब वहीं शुरृतर स्वांमी कह रहे हैं, पर जब उनका खंडण कर रहा हैं तो शुरृतर स्वांमी का नाम नहीं लेते हैं। तो असी तरफ saह, जब जीववश्वामी स्बाल कौन को बता रहे, कि यदू ऐसे कहते है कृशन से, कि तुम याब रहो। तुम यहाँ से नहीं जा सकते। तो कौन यदू कहते हों हों बदाते। यदू है्से कहते हैं एक तरह से क्या हो गया यदू को यहां पे विलन जैसे दिखा रहा है। विलन नहीं पर विलन जैसे। क्योंकि उनके कारण क्रिष्णा और जो वजवासियों में विरह आने वाला है। पर अभी तो वसुदेव के पास क्रिष्णा जाते हैं, तो अभी वसुदेव की मन में क्या विचार होगा? कि ये मेरा बच्चा है, वो कितने सालों के बाद देखा है उन्होंने. थोड़ी-थोड़ी उनको जानकारी बता होते हैं कि कृष्ण क्या कर रहे है, पर वो कभी वृन्दावन जा नहीं सकते हैं. क्योंकि वो जाएगे वृन्दावन, बलेकि कमसे ने उनको आजात कर दिया है कुछ समय के लिए, पर संशे जगए, वृन्दावन क्यों गए हैं वो? तो कई सालों के बाद वो कृष्ण को देख रहे हैं.
और जबीकि ऐसे होता है, कोई बच्चा होता है, उसको माता-पिता छोड़ देते हैं और कहीं-कहीं से फॉस्टर केर में रख देते हैं. तो अगर बच्चा, ऐसे एक-दो भकता हैं, जो मैं अमेरिका में जानता हूं उनको, कि कुसी कारण से वो फॉस्टर केर में थे. और बाद में जब बड़े हो गए वो, तो फिर वो अपने माता-पिता से पहले बार मिलें। अभी उस समय, वो बच्चों का साधारता है माता-पिता के परती क्रोध होता है, कि तुमने ऐसे कैसे किया, तुम्हें कहा, क्यों त्याग दिया मुझे, क्यों छोड़ दिया मुझे। तो ये जो भाव होता है, उसको, उससे क्या है, एक चाइब। अगर कुछ बच्चों को लगता है, कि मैं अन्वान्टेड हूं। मैं हूं औना ही नहीं जैसे माता, पिता दिखाते हैं। माता, पिता डाटेगे तो भी ठीक है, डाटना भी एक तरसे प्रेम का लक्षन है। पर अन्वान्टेड किसी बच्चों को लगता है, तो वो सेहन करना बड़ा मुझ्किल होता है। मैं अमेरिका में था, तो एक भक्त मेरे पास आये, वो बता रहे थे कि मैं एक बच्चों को लगता हूं। तो वो बता रहे थे कि मैं बच्चों को लगता हूं, क्योंकि मेरी पत्णी बच्चों को लगता हूं। तो आप दोनों आ जाओ। तो माता जी बता रहे थे कि उनको अभी पता चला कि शी वोज हर मादर ट्राइट टू अबॉर्ट हर। और अबॉर्शिन फेल्ड। और शी वोज अबॉर्शिन फेल्ड का प्रवाइवर है। तो अभी अच्छा जानता है ये तो कितना वो खुद को दुख होगा माता पिता के परती क्रोध होगा। जो भावना है बहुत कॉंप्लिकेटर होती है तभी वो और स्वाभाविक है इस तरह से होना। तो अभी जब कृष्ण जा रहे हैं, सत्य है कि वसुदेव को खत्रा था, इसलिए उन्हें कृष्ण को बंदावन भेज दिया है। पर कृष्ण जो है, वो कह सकते है, कि तुमने ऐसे क्यों छोड़ दिया मुझे, मैं अकेला था, यहाँ पर इतने सारे खत्रे आ रहे हैं, इतने सारे आसुरों को मुझे मारना पड़ा। अभी कृष्ण जो वसुदेव के पार जाते हैं, देवकी के पार जाते हैं, क्या कहते हैं सबसे पहले वो, कि मेरे कारण आपको कितना दुख सहना पड़ा, मेरे जन्म से पहले ही, मेरे कारण तुमें दुख सहना पड़ा। देवकी के पार जाते हैं, क्या कहते हैं, कि छे पुत्रों के वद को अपनी आँको के सामथ मेरे कारण देखना पड़ा। एक बच्चे का करतव यह है, कि अपने माता पिता की सेवा करना, अपने माता पिता के दुखों को कम करना, पर मैं इतना दुरभाग्यशाली हूं, कि मेरे जन्म से पहले से मैंने आपको दुख दिया है, और जन्म के बाद भी, मैं आपके पास नहीं रह पाया। कृष्णा यह विल्कुल नहीं कहते हैं, कि तुमने मुझे छोड़ दिया, मैं अपने पास नहीं रह पाया। मैं तुम्हारी कोई सेवा नहीं कर पाया। कृपया, तुम मुझे एक शमा कर दिजी। और अभी मैं आपकी सेवा करने के तत्पर हूं। और फिर, तभी कृष्णा क्या करते हैं? अभी कृष्णा इस समय 10-11 साल के हैं। अलग बात चाहते हैं, थोड़ अलग अलग उब्र बताते हैं। पर कृष्णा 10 साल के हैं। तभी, अभी हर मां की इच्छा होती हैं, कि अपने बच्चे को प्रेम करें। और जो प्रेम का एक बहुती इंटिमेट लक्षन होता है, कि जो मां अपने ही स्थनों से अपने बच्चे को स्थनपान कराती हैं, दूद पिलाती हैं। तभी कृष्णा 10 साल के हो गए, देवकी को गर्भवती होके 10 साल हो गए। पर कृष्णा अपनी दिववी शक्ती से तभी क्या करते हैं, देवकी के स्थनों में दूद उत्पन कराते हैं। और कृष्णा देवकी को वो सुख प्रदान करते हैं। न केवल वो सुख प्रदान करते हैं, पर कृष्णा अपनी दिववी शक्ती के द्वारा देवकी के पिछले संतान हैं, जोंकी मत्य हो गये हैं, उनको भी पुना प्रकट करते हैं। और देवकी उनके परती भी प्रेम दिखाती है, और फिर वो सबको भगवत धाम भी आजाता है। तो यहां पर, जो कृष्णा क्या कर रहे हैं, कृष्णा अपने माता-पिता की सेवा करने का जो भाव दिखा रहे हैं। अभी कृष्णा ने जो किया, वो हम नहीं कर सकते ह हमने वो शम्ता नहीं, वो कृष्णा भगवान है, पर वो जो भाव है, सेवा का भाव है, कृष्णा जब responsibility लेते हैं, तो इस हद तक responsibility लेते हैं, अपने माता-पिता को दोश देने के जगबें, वो कहते हैं, मैं ही दोशी हूँ, और मैं इस दोश से, मैं भी इसका कुछ हल करने का प्रयास कर रहा हूँ.
So such is the love of कृष्णा. अभी एक तरह से कृष्णा ज़िम्मेदारी ले रहे हैं, जो जिम्मेदारी ले रहे हैं, यहाँ बहुत लोड़ेबल है, यह बहुत उसका प्रशंद सुनिया है, पर फिर भी साथ साथ, जो कृष्णा है, और यह उनके माता पिता है, यह उनका जगत है, और एका एक उनको जगत से निकाल के कहीं और भेज दिया है, और भी कह रहे है कि यह तुमारे मा है, यह तुमारे पिता है, और यह तुमारे दुनिया है. अभी यह कृष्णा के लिए बड़ा मुश्किल होता है, भी कभी कभी होता है, अगर चोटे बच्चों के जीवन में बहुत समस्य आ जाती है, तो छोटे बच्चों को बच्चपन में ही बड़ा होना पड़ता है, बच्चपन में ही उनको जिम्मदारी नहीं पड़ती है, एक तरह से उनकी जिम्मदारी लेना यह प्रशंस नहीं है, पर कोई भी माता पिता होते है, कोई भी उनके माता पिता के उम्र के होते है, वो चाहते है कि बच्चों को बच्चे जीवन जेने का मौका मिले, कि उनको सारे दुनिया की जिम्मदारी जो है, वहाँ पहले ही आने के जुरूत नहीं है, तो अभी वसुदेव देखते हैं, कि इतने भी कृष्णा यह बड़े ही पॉलाइट है, रिस्पेक्टफूल है, कृर्टियस है देवकी के साथ, पर वो देवकी को अपनी मा के समान, जो एक सवभाविक एक बच्ची का प्रेम मा के साथ होता है, वह अभी तक सम्मन नहीं जुढ रहा है, तो यह दोनों में कृष्णा जिम्मदारी ले रहे हैं, पर वसुदेव भी जिम्मदारी ले का प्रयास करते हैं, तो वसुदेव क्या करें, वसुदेव समझते हैं, कृष्णा भी बड़ी विकट परिस्थिती में है, तो वो कहते हैं कि तुरंद हम रोहीनी को बुला लेते हैं, और रोहीनी को बुलाते हैं, वो कहते है कि, कैसे है कि चिल्डरं नीड सम्थिंग कॉंस्टन्ट इन देर लाइफ, अईडियली स्पीकिंग जो बच्चे हैं, जितने चीज़ें उनके के लिए कॉंस्टन्ट होगी, उतना अच्छा है उनके लिए, वो स्टेडिनस आता है, सिक्यूरिटी आता है, दुनिया में चेंजिस तो हमेशे आते ही रहेगे, पर जितना कॉंस्टन्ट रहेगा, उतना वो बच्चों का जगत है, सिक्यूर रहता है, अभी कृष्ण के लिए सारा परिवर्थन आ गया है, तो कृष्ण के लिए, जब रोहिणी वापस आती है, तो नंदम हाराज सोचते है, कि ये एक कॉंस्टन्ट रहेगा, तो कृष्ण के लिए वास्तव में तभी दो चीज़े होते हैं कॉंस्टन्ट, एक है रोहिणी, और दूसरे है बलराम जी, तो अभी इनके द्वारा कृष्ण जो है, अपनी जिम्मेदारिया विंदावन में, मथुरा में स्विकार कर रहे हैं, और सारे जिम्मेदारियों के अनुकार कारे कर रहे हैं, तो हमारे सब के जीवन में भी ऐसे परसनती आती है, कभी हमारा रुदय कुछ एक चाहता है, जो हमारे जिम्मेदारी हैं, कुछ और चाहती है, प्रभुपाजी जब अमेरिका में जाते हैं, तो तभी वो पहली जन्माश्टमी के, तो पहली जन्माश्टमी तो जल्दूत भोट पही होती है, और पहली जो गौर पुर्णी महा होती है, वह अमेरिका में प्रभुपाज बिल्कुल अकेले है, वहाँ पे किसी को कृष्ण के बारे में बतानी है, महाप्रो के बारे में बात पता हो, छोड़ो ही दो, और ये लोग इतने नए हैं, कि उनको कृष्ण के बारे में बताना भी मुश्किल है, प्रभुपाज जी पहले, सिर्फ हरे कृष्ण महा मंतर शुरू करते हैं, आत्म ग्यान देते हैं, अमेरिका में एक कॉमेडियन था, उसने ऐसे एक लोगों को सवाल पूछा, कि सबसे पादल जैसे चीज तुमने अपने जीवन में क्या सुनी हुई है, तो लगबग 10% लोगों ने बताया था, ये लगबग 20-25 साल के पहली की बात है, कि कोई हरे कृष्णा भक्त हमारे बास रस्ते में मिलता है, और हमें कहता है कि एक काले वर्ण का बासुरी बजाने वाला युवक भगवान है, तो इसे जगह में प्रभुपाजी थे, प्रभुपाजी अपने डायरी लिखते है, तो उसमें कहता है कि आज गौर पूर्णिमा है, और आज सारे मेरे गुरुभाई वो गौर कथा कर रहे हैं, गौर किर्थन कर रहे हैं, मायापूर में, ब्रंधावन में, और प्रभुपाजी कहता है कि, आज मैं एक बहुत पोयेटिक शब्द है, वो कहते है कि बहुत अकेलापन नहीं पहसुस करना, I am alone.
All alone. प्रहुपाजी के इच्छा है कि महाप्रभू का कीर्टन करे, महाप्रभू की कथा सुने, महाप्रभू की कथा बोले. पर कुई है नहीं.
पर प्रभुपाजी के सुने लिखते है But I am fulfilling the instruction of my spiritual master. मैं मेरे गुरुदेव के आदेश का पालंग कर रहा हूँ और उनकी सेवा के लिए मैं यहाँ पर हूँ। तो जो कर्तविय और प्रेम है, यह अटेंशन हर एक के जीवन में आता है। भगवान भी यहाँ पर आते है, भगवान को भी यहाँ पर आते है। और भगवान यहाँ कितने आदेश पद्धिस विकार करते हैं। यहाँ उनकी मतुरा के आने के प्रसंग से हमें दिखता है। हम यहाँ पर करते हैं, और तो महीं करते हैं, कमसस्य दूते रदाईव दीता। रुरोद गोपीन भवनस्य मत्ये। गोभं ददामो धर्माद्यविति। वाचेतुं प्ररुत्ता। आनन्द कन्द प्रजचंदर कृष्ण। कृष्ण जो है वो आनन्द के सागर है। वो व्रिंदावन के चंदर है। वो कृष्ण है। गोपिया बोलने को बोल रही है। गोभं ददामो धर्माद्यविति। आनन्द कन्द प्रजचंदर कृष्ण। गोपिये कदाचेन मनिभिञ्जरस्थम। शुकं वचूवाचेतुं प्रवृत्ता। शुकं वचूवाचेतुं प्रवृत्ता। गोविंद दामोदर माधविति। गोविंद दामोदर माधविति। गोपियां कृष्णा के अपेक्षा कर रहे हैं। गोपियां कृष्णा के अपेक्षा कर रहे हैं। आनन्द कन्द वरजचंदर कृष्णा के अपेक्षा कर रहे हैं। पौधों के मृत्यों हो गई। हाम कृष्ण तुमारे लिए अभी पौधे भी लगाने के काबिल नहीं रहे हैं। क्योंकि हमारे आशू रुख ही नहीं रहे हैं। तो इस तरह से जो गोपियां हैं, वो कृष्णा के विराह में बहुत दुखी है। पर वो इतना से चाहती है कि हम कृष्णा का स्मर्ण करें, कृष्णा का स्मर्ण दूसरे हमें कराएं। तो इसलिए वो क्या करती है, वो यहाँ पे बता जा रहा है, वो एक तोटे को सिखा रहे है, मनिपिंजरस्तम् वो तोता एक पिंजर में, एक पिजरे में फसा हुआ है, तो कह रहे है कि तुम कृष्ण का नाम लो। आनन्द कंड़ व्रजचंद्र कृष्ण। कोपियां कहते हैं कृष्ण तो आनन्द के सागर है, आनन्द कंड़ है वो. उनके लिए कृष्ण के कारण दुख ही दुख आ रहा है एक तरह से.
व्रजचंद्र, अभी कृष्ण छोड के चले गए है, फिर भी उनके रुदे की अभिलाशा है, का विश्वास है कृष्ण, ये व्रजचंद्र है. और वहाँ अभी दूसरों को, एक पोते को बता रहे है, अभी कृष्ण के नाम लो, कृष्ण का नाम लो, और इससे क्या है कि, कल हम बता रहे थे कि जब कोई प्रेजेंस नहीं है, तो तभी रेमेंब्रेंस मुश्किल हो जाता है. तो एक तरह से, कई जो कहावते होती हैं, वो अलग-अलग पद्धति से होती हैं, अब इंग्लिश में कहावत होती है कि, आउट ओफ साइट, उससे क्या होता है, आउट ओफ मैंड.
कुछ चीज़ को हम देखते नहीं हैं, वो अगर दूसरे चल जाएगी, तो हमारे मन से भी चल जाएगे, कुछ हमारा, कुछ temptation है, कुछ प्रलोब है, वो आँखो से दूर कर देगे, तो आउट ओफ साइट is आउट ओफ मैंड, वो चल जाएगा दूर, यह एक कहावत है, दूसरे एक कहावत है, सेपरेशन, जो है, विरह है, makes the heart grow fonder है कि जब किसे दूर चल जाते हैं, तो उसके प्रतीः शनेह और बढ़ जाता है, तो मिं कह क्या आयत है कि दूर चल जाये गयेगे, तो उसको बुल जाएगे यहाँ दूर चल जायेगा कोई, तो उसकी याद और आजाएगे। बेकतसे दोनों हो सकता है। दोनों हो सकता है, वह किस पे निर्भर है? वह हमारी चेतना पे निर्भर है वह। अभी गोड़ी वैश्ण आचारे बताते है, कि जो प्रेम है, वो एक अगनी के समान है, और वीरह जो है, वो एक वायुके समान है। वायू के समान है। अभी जो है, अगनी है और वआयू है। अभी कैस आजाएगा था? अगर इस अगनी जो हैं, यह फायर दो प्रकार का हो सकता है। फायर एक हो सकता है, एक candle हो सकता है, छोड़ा सा दीप हो सकता है और दूसरा है वो दावागनी हो सकता है, forest fire. तो अगर ये जो wind candle को लगता है तो क्या होता है? वो extinguish हो जाएगा, उसका fire जो है चला जाएगा. पर अगर वो forest fire को लगेगा तो क्या होगा? वो दावागनी है तो उसका fire बढ़ जाएगा.
तो उसी तरह से वो क्या कहते हैं? कि अभी जो गोपियों का जो प्रेम है, वो किस के समान है? वो forest fire के समान है, दावागनी के समान है वो. इसलिए जो विरह होता है गोपियों का, उससे कृष्ण का उनका स्मर्ण और बढ़ जाता है. और बढ़ जाता है, इतना विरह होता है, उतना उतना स्मर्ण बढ़ जाता है.
और ये एक तरह से एकायक होता है, अपने आप होता है, कल जिसे बता था, कृष्णें उनको स्पूर्थी देते हैं, spontaneouslyally. अपने आप कृष्ण का स्मर्ण आता है, पर उसके साथ साथ, वो गोपियां भी उद्धीपन बना रहे हैं. गोपियां भी क्या कर रहे हैं, जो पंची है, पंची को भी वो बगवान का नाम लेने को सिखा रहे हैं.
उसके दोरा क्या होता है, कि ये भी हमको कृष्णे की आत दिला है. अब मैं एक बार प्रवाचन दे रहा था, कि कैसे separation जो है, कि विरह क्या है, विरह ये, विरह ये, ये ही उधारन दे रहा था. तो उसके बार में एक भक्ता है, वो बोला कि, मैं भक्तों के संग में रहता हूँ, तो उनका बड़ा अपराद करता हूँ.
मुझे लगता है, कि मैं भक्तों से दूर चला जाओंगा, तो separation से क्या होगा, मेरे भक्तों के पति आदर बढ़ जाएगा. सेपरेशन से क्या होगा, दूर चला जाओंगा, तो मेरी भक्ती और बढ़ जाएगी. वो संभाव है, मैं बोला, कि पर दूसरी भी संभावना है.
अगर आपकी भक्ती, अगर एक छोटी से दिय की जोती के समान है, तब ही आयू आएगा, तो क्या हो गया, वो बंद हो जाएगी. तो हमें यह assume नहीं करना है कभी. हमें यह ऐसे सोचते हैं, कि मेरी भक्ती इतनी विशाल है, कि भक्तों से विरह हो जाएगा, तो मेरी भक्ती बढ़ जाएगी.
हो सकता है, पर यह मुश्किल है, मुश्किल है. अगर कोई भक्त बाखी भक्तों से दूर चले जाते हैं, तो फिर उन्हें, यहाँ पर जो गोपियां कर रही है, बाचे तुम प्रवृत्ता. भक्तों को वहाँ पर प्रचार करना चाहिए.
और वहाँ पर भक्तों, और भक्तों को बनाना चाहिए. और फिर क्या होगा, उन भक्तों के संपर्क में, कृष्ण की स्मृति आयेगी. और फिर उससे कृष्ण का स्मर्ण रहेगा.
तो अभी गोपियां कृष्ण से विराह में बड़े दुखी हैं. अभी उसके साथ साथ, जो कृष्ण की क्या परिस्थती है? अभी जब कृष्ण वरिंदावन से मथुरा जाते हैं, तो तभी उनकी मैत्री उद्धव से हो जाती है. और उद्धव के लिला है, उद्धव के प्रसंग है, काफी दिल्चस्प है, उसका पूरा प्रसंग मैं जाधा नहीं बताऊंगा भी, पर जो कृष्ण बाद में क्या होता है, कि उद्धव को वरिंदावन देजते हैं, कि तुम मेरी ओर से संदेश लेकर जाओ, अभी वरिंदावन से तो संदेश आ रहे हैं कृष्ण के पास, तुम कैसे हो बताने के लिए, पर अभी यहाँ पर, कृष्ण उद्धव को बेशते हैं, और जब उद्धव जाते हैं, तब भी व्रजवासियों के बारे में, कृष्ण से थोड़ा बहुत सुना है, बाकियों से सुना हो है, भी सोचते हैं, हाँ ठीक है, कृष्ण वहाँ पर रहे थे, कृष्ण के पति कोई थोड़ा स्नेह होगा, पर मैं उनको तत्तव ज्ञान के द्वारा सांतुना दूंगा, वो सोचते हैं, वो तो वो जाते हैं व्रजवासियों के पास, और जब व्रजवासियों के पास जाते हैं, तभी क्या होता है, कि वो अभी बता जाते है कि, हे गोपिया, तुम कृष्ण से विरह का अनुभव कर रहे हो, पर वास्तों में कृष्ण से विरह इंपॉसिबल है, क्योंकि कृष्ण सर्वयापी है, कृष्ण तुम्हारे रुदय में है, क्या है कि, जो योगियों का जो दृश्टी है, योगिक विजन, बगविता में बहुत सुन्दर वर्णान आता है, क्या विजन है ये, कृष्णा इस इन एवरिथिंग, और, एवरिथिंग इस इन कृष्णा, योमां पश्चति सर्वत्र, सर्वं चमई पश्चति, कि कृष्ण में सब कुछ है, और सब कुछ में कृष्ण है, यह महान योगि का दृश्टी होती है, और भगवान कृष्ण कहते है, कि जो इस तरह से देख पाएगे, उनका क्या होगा, तस्या हम न प्रणश्यामी, सचमे नप्रणश्यती, वो कभी मुझ्से दूर नहीं जाएगे, और मैं कभी हुँनसे दूर नआ जाऊगा, वो कभी म कृष्ण से विरह असंभाव है। तो अभी ये देख कि वो गोपियों को समझाने का प्रयास कर रहे हैं पर जब वो गोपियों को समझाने का प्रयास कर रहे हैं गोपियों के भाव होते हैं, हाँ वो सब ठीक हैं पर कृष्णे कबाने वाले हैं वो कृष्णे कबाने वाले है, वही उनका भाव होता है पहले तो गुंदवों को लगता है कि गोपिया मेरी तत्वग्यान समझा नहीं रही है पर जब गोपियों को समझते हैं कि गोपिया सारा तत्वज्ञान जानती है, पर वो उसके परे है। वो दिव्य स्थर पर है। कि एक लोग करते हैं कि आपको खुश करने के लिए फिलॉसौफी है। मतलब क्या है? तत्वज्ञान के स्थर पर हम समझते हैं कि भगवान सर्व सृष्ट है, भगवान सर्वयापी है। वासुदेवस सर्वमिती है। कि कृष्ण इतने महान है, इसी लिए मुझे कृष्ण से प्रेम करना चेये। तो अब हम जब भक्ती करते हैं तो क्या है? हमारा प्रेम है, हम लाव बखति कर रहे हैं, दिवोशन है, वो क्या है? एक तत्वज्ञान के द्वारा हम उसको डाइरेक कर रहे हैं.
हमारे लिए जो लाव है, ये एक तरह से प्रयास है, एक तरह से एंडेवर है. पर गोपियों को तत्वज्ञान की ज़रूरत नहीं है, तत्वज्ञान के परे उनका प्रेम है, तत्वज्ञान उनको पता है, पर उसकी उनको ज़रूरत बिल्कुल नहीं है, वो पहले से कृष्णु के पास है, और जब उद्धव ये देखते हैं, तो तभी वो अभी रा� अधरारी दूर से कढि रहती है, और वो मान लीजे एक ब्रमर है, एक ब्रमर, एक बी, बी जो ब्रमर है, उससे बात कर रही हो, कहती है, तुम जिनका पर दिसृ पातर विक्ति नहीं हो, ऐसे विश्वास नहीं कर सकते, इसे सेवक हो तुम्हारा स्वामी भी अभी विश्वास करने के परूगे नहीं है। तो अभी यह जो है, आच्चारे इसका अलगला अर्था बदाते है। कोई कहते है कि जो भ्रमर है, वो क्या है, उसको ही वो राधराने जो है, उसको कृष्ण का संदेश भाग मान रही है। यह एक अर्था है। दूसरा है कि वो जो भ्रमर है, वो उसको बोल रही है प्रवास में, उद्धव को बोल रही है। तुम कह रहे हैं, हम सांत्मा दे रहे हैं, हम सुकार नहीं करें। कृष्ण तुम सेवक के रूप में है, पर तुमको सुकार नहीं करने वाली है। यह कृष्ण का संदेश भाग मान रही है, उसको कृष्ण का संदेश भाग मान रही है। यह कृष्ण का संदेश भाग मान रही है, उसको कृष्ण का संदेश भाग मान रही है।.
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हरे कृष्णा तो आज हम अभी आपका आज स्वागत है। यह आज चौथा दिन है मारा और दीन दिन हमने कृष्णा विंदावन में अलग अलग रसो के बारे में चर्चा की है तो अभी हम कृष्णा विंदावन के बाहर मत्थुरा और किस तरह से जब कृष्ण प्रिंदावन से बाहर जाते हैं, मतुरा में और फिर द्वारका में, उसकी वारे में हम अज चर्चा करेंगे. यह शलोक है, यह व्रजवासियों की जब बहुती पीडा पूर्णा वस्ता हो जाती है जब कृष्ण चल जाते है, उसका वर्णम यहां पे हो रहा है, जब कृष्ण जा रहे है, कमसस्यदूतेन यदैवनीतव, जब कमस का दूत है, कौन है कमस का दूत? अकरूर, यदैवनीतव, तो यदूव के बीच में कृष्ण को लेया जा रहा है, व्रिंदावन आंताद वसुदेव सूनू, तो कृष्ण तो जा रहे है, व्रिंदावन के अंदर यह जानते हुए, यह विचार करते हुए, कि जिस कृष्ण को मैरा सोच रही थी, क्या यह कृष्ण मेरा था ही नहीं कभी? क्या वसुदेव सूनू, क्या यह वसुदेव का पुतर था? रूरोध गोपी भवनस्यमधे अभी एशोदामाई जो है, वो व्रिंदावन की राणी है, एक जिम्मेदार पद है उनके लिए, तो उनकी जब भावराओं से विभोर हो रही है, तो दुनिया के सामने नहीं रो सकती है, भवन में जाकर एशोदामाई फूट फूट के रो रही है, वो कृष्ण का नाम ले रही है, कृष्ण का समरन कर रही है, तभी कृष्ण जब विन्दावन में होते हैं, तो उनके जीवन में अनेक विचित्र और विकट घटनाएं होती हैं, पर ये सारे जो विपत्या हैं, वो छोटी बढ़ जाती है प्रज्वासियों के लिए, जब अभी कृष्ण विन्दावन छोड के जा रहे हैं, एक तरह से ये बिल्कुल अकसमात होता है, इसके पहले प्रज्वासियों को पता नहीं होता है कि कमस का कृष्णमे कोई एंटिरस्ट है, कोई रुची है,। अभि फ्रज्वासियों जानते हैं कि वहाा Saple vishwaasiyon can’t know, वो असुरों का वध हो रहा है। यह एक तरह से चमतकार होता है, पर उसके पीछे क्या रहस्य है, यह रजवासी को पता नहीं है। तो एकाएक कम्स की ओर से अक्रूर आते हैं। और अक्रूर कहते हैं कि कृष्ण को कम्स ने बुलाया है। पर कम्स वहाँ पैहाना देता है मैंने सुना है कि कृष्ण में बहुत बड़ा पहलकार है कि कृष्ण कृष्ण ने बेड़े आसुरों का वध की आए है. कृष्ण को यहाँ पाई मैंने एक मल्ले युद्ध यो आयोजित किया है। तो कृष्णे वो देखने को आ सकता है। अभी कमस जो है, वो राजा है। और न थेवल राजा है, वहाँ बहुत खुरूर राजा है। तो ऐसे राजा के खिलाव जाना वो बिलकुल उचीत नहीं है। कृष्णे को बुलाया है। विजवासे सोचते हैं कि यादा कुछ खत्रा नहीं होगा कृष्णे को। और दूसरा सोचते हैं कि अगर नहीं जाएगे, तो क्या है कि कभी कोई-कोई अथौरिटी में होता है। वरे सोचे जाना है एक पुराश्मन। वर कहते हैं कि मैं तुम्हारा एक लेंगा कर रहा हूं। पर वो एक लेंगा नहीं है, वो पुराश्मन, वो ज़ाना होता है। वो एक नहीं है। तो अभी उसको टालने के लिए कोई कारण नहीं होता है। तो इसलिए कृष्ण जाते हैं। अभी जब कृष्ण जाते हैं, तो अलग-अलग लोगों की अलग-अलग भावनाएं होती हैं। अभी जब कृष्ण विंदावन से जाते हैं, मानले जब यह विंदावन हैं, यह मतुरा हैं। तो कृष्ण छोड़के जा रहे हैं यहां से। तो अभी कृष्ण के साथ जो सखा होते हैं, सखा उनके साथ जाते हैं। जो वाद्सले रस में माता होती हैं उनकी, वो पीछे रह दिया है। यश्वदा पीछे रह दिया है। अभी दोनों जो युआत्सले रसमे हैं और जो माधुर्य रसमे हैं.
दोनों को एक तरह से चिंता है, पर चिंता के कारण अलग है. यश्वदा माई को लग रहा है कि मेरा बच्चा पहली बार घर से दूर जा रहा है। और क्या होगा, कैसे, कौन देखबाल करेगा उसको, कैसे रहेगा उसको? तो… यहां सोच के एशुदा माई उसको सहन नहीं हो रहा है। इस समय, एशुदा माई को थोड़ा लगता है कि क्या होगा वहाँ पे, पर वह जो है, वह जो चिंता है एशुदा माई की, वह एक वाथसले भाव में, कृष्ण का देखबाल कौन करेगा, वह चिंता है। गोपियों की जो चिंता है, वह दूसरी चिंता है। तो, अभी देखें यहां पे, जो वाथसले भाव में एशुदा माई है, वह भवनस्य मध्धे, वह अपने घर में जाकर रो रही है, पर जो गोपिया है, विसुरुज्य लज्जां रुदूस्वसुस्वरम् वह घर से बाहर आकर निरोध कर रही है। तो अभी गोपियों को यह बाह होता है, कि कृष्णा अगर गए है, तो वापस नहीं आएगे। गोपियों को लगता है, शहर इतना आकरशक है, शहर में इतने सारे आनंद के स्ट्रोत है, और कृष्णा, भूल जाएगे, हमें भूल जाएगे, कि मैं कुछी दिनों में वापस आजाओंगा। कृष्णा का पूरा इरादा होता है, वहाँ पूरा करने का। भी कृष्णा जो कमस का वद करते हैं, मथुरा में, उसकी चर्चा हम जन्माश्टमी के दिन सुभह करेंगे, कैसे कृष्णा विंदावन में, मथुरा चोड़के विंदावन में आते हैं, और फिर विंदावन से मथुरा वापस जाते हैं। तो अभी हम जो हैं, कृष्णा कमस का वद करते हैं। मल युद्ध में, वद होने के बाद, फिर सारे यदु प्रसन हो जाते हैं। छुटकारा मिलता है उनको, कि कृष्णा ने कमस के आतंग से हमें छुड़ा दिया है। और फिर यदु आते हैं कृष्णा के पास, और कमस का मुकुत होता है, वो कृष्णा को देते हैं। और कृष्णा वो मुकुत को लेते हैं, पर अपने सिर पर पहरने के जगह पे वो मुकुत ले जाते हैं महराज उगरसेन के पास। और कहते हैं ये मुकुत आपका है। कमस ने जबर्दस्ति आप से ये छीन लिया था। अभी मैं आप को ये आपस अर्पित करता हूँ। और यह नमरता देखकर, यह सेवा भाव देखकर, यह आदर देखकर जो है सारे मतुरावासी यदू हैं बड़े प्रसन हो जाते हैं। भी कभी क्या होता है, कुछ-कुछ से बच्चे होते हैं, युवक होते हैं, उन में बहुत टालेंट होता है, बहुत शम्ता होती है, तो जब शम्ता होती है, तो उससे वो आश्चर यदा कारे कर देते हैं। तो अबिलिटी एट्रैक्स दा हार्ड, और आप सकते हैं अबिलिटी जो है, एट्रैक्स कितना आश्चर यदा कारे कर रहा है, पर क्या है, अब मान लिजी कोई क्रिकेटर है, अबिलिटी क्या करता है, एट्रैक्स दा माइंड, मन को आकर कोई बड़ा, बड़ेया सिक्सर मार लेता है, कोई बहुत अच्छी बैटिंग करता है, तो उस से आकरची जा जाता है, कोई ब्योक्ति, पर मान लिजी कोई नाय बैट्समन आता है, बहुत अच्छी बैटिंग करता है, एक मैच, दो मैच, दस मैच, पंधरा मैच, और फिर थोड़ी अच्छी बैटिंग कर लेता है, और फिर कहता है, कि ये पहले के सारी बैट्समन थे, वो सब बखवास थे, उनको कुछ बैटिंग आती ही नहीं थी, वो सचिन तेनलुर को मान नहीं देगा, सुलिल गासकर को मान नहीं देगा, तो फिर क्या होता है, तुम खुद को क्या समझते हो, तो हमारे पहले क्या होता है, कि हम लोगे मन को आकरचित कर सकते हैं, पर किसी का रुदय को आकरचित करना है, तो ये एक चीज है, उसके अबिलिटी है, पर ये बहुत अच्छा खिलाड़ी है, ये बहुत अच्छा व्यक्ति है, ये दो अलग चीज़े हैं, तो किष्णा की नमरता देखकर, सारे यदू बहुत प्रसंद हो जाते हैं, तो उगरसेन महाराज कहते हैं, कि नहीं, तो तुम्हारा सियासन, तुम्हारा मुकुट है, तुम्हारे लिए उचित है यह, तुम ने कमस को मारा, नहीं, मैं तो यह, केवल आप के लिए ही यह मुकुट लाया हूँ, आप ही स्विकार किजी इसे, तो उगरसेन महाराज स्विकार करते हैं, और फिर किष्णा कहते है, अभी आप मुझे इजादत दीजिये, मैं बृंदावन जाना जाता हूँ आपस, और यदू विच्छित हो जाते हैं, तुम बृंदावन कसी आ सकते हो, कहते हैं, तो वो अलग-अलग था कारण देते हैं, एक कारण देते हैं, वमिश के आधार पर, वो कहते हैं, तुम बृंदावन के नहीं हो, तुम रजवासी नहीं हो, तुम मथुरावासी हो, तुम यदू हो, कहते हैं, नहीं, मैं तो नंदा महराज यशोदा का पुत्र हूँ, कहते हैं, नहीं, कहते हैं, कि अभी, वसुदेव ने कमस को, कमस से बचाने के लिए, कहते हैं, नहीं, मैं तो नंदा महराज यशोदा का पुत्र हूँ, मैं व्रजवासी हूँ, तो जब कृष्ण को परसुएड करते हैं, जो मथुरावासी, दो तरह के आर्गेमें जगते हैं, एक है, बेस्ट ओन डाइनेस्टी, और इस से कुछ प्रभाव नहीं होता है कृष्ण पे, कृष्ण का रुदे व्रजवासियों के पास, इतना है, उनके साथ इतना है, कि वो सुखारी नहीं करने का तयार है, कि मैं, किसी और का पुत्र हूँ, अभी, इसके बाद जो होता है, मतुरा जो यदू है, वो आर्ग्यूमन बदल देते हैं, कभी-कभी हम किसी को कुछ समझाना चाहते हैं, हम एक तरह से कुछ समझा रहे हैं, और अगर हम देखते हैं, कि उसके हाव-भाव से, उसके चेहरे से, उसको कुछ इस्विकार नहीं हो रहा है, तो फिर वही आर्ग्यूमन करते रहे हैं, तो क्या है, वो एक दिवार पर सिर मारने के समान है, तो हमें तोड़ा बैक-स्टेप लजे, कोई और तरक है, कोई और भिचार धारा है, तो फिर एक दूसरी भिचार धारा करते हैं, वो क्या है, दूसरी भिचार धारा करते हैं, और कम्स के अनेक शक्तिशाली मित्र है, और यह जो उनकी चेतावनी होती है, चिंता होती है, वो सत्य होती है, कौन आता है बार-बार, जरासन लाता है, तो यह है, पर वो कहते है, एक और चीज़ है, कि कम्स के अनेक शत्रू भी है, और कम्स ने उनके प्रती, उनके प्लंडर किया है, उनके राज्य को उध्वस्थ किया है, तो वे मतुरा की संपत्ती को, अभी बदला के रूप में, उसको उध्वस्थ करने के लिए आजाएं, यद्यपी हमने कम्स का सहयोग नहीं किया था, पर वो मतुरा से हुआ था, इसलिए उनके द्वारा भी मतुरा पर आक्रमन हो सकता है, तो इसलिए, तुम्हें हमारे सवरक्षन के लिए यहां पर रुकना पड़ेगा, तो अभी यहां सुनकर, कृष्ण पेंसिव हो जाते हैं, विचार में पड़ जाते हैं, कृष्ण कहते है कि, मैंने तो इनका सवरक्षन किया है अभी, कम्स से मुझे सवरक्षन करना जुरूरी है, तो इसलिए, अभी उनको वापस जाकर, बोलना पड़ता है, नंद महराज को, येशोदमाई तो नहीं आई है, नंद महराज आए है, कृष्ण को जाकर बोलना पड़ता है, नंद महराज को, कि मैं आपके साथ वापस नहीं आने वाला हूँ, तो अभी ये जो है, ये सारा प्रसंग है, इसमें एक महतपूर्ण प्रिंसिपल है, कृष्ण मिरे इसको ग़री करगरने है, एक कृष्ण मिरे वावस ना एक संकीलन समय कर सकते हैं, क्रिassen में, मौंत दानीच आएं दुई ब हो सकती है, हम क्या करते हैं, हम में लोगों का एक्शन, कृष्ण आखे पर, मैं यहां पह हुँ ख़ुशा कि अगर मैं किसी का आक्शन देखता हूं। और फिर आक्शन से मैं उनका मोटिवेशन, वो क्यों आएँ से कर रहे हैं, इसके बारे में मैं अनदाजा लगाता हूं। तो हम एकशन देखो और तो पुरीस्व्प नहीं किछोते हैं। पुरीस्वफ मतलब अन्दाज लगाते हैं, अनुमाल लगाते हैं, कुछ निष्कर्ष निकालने परेस करते हैं। किसी का क्या उद्देश है यहाँ हमने देखनही पाते हैं. तो अभी जो साधारन तया, जब कृष्ण व्रज्वासियों को छोड़ के आते हैं, तो व्रज्वासियों को कितना दुख होता है, इसे काफी जोर दियाता है.
पर गुपाल चंपू में, दोनों को, कैसे कृष्णों को भी बहुत दुख हो रहा है, वो भी दर्शा जाता है। और यह जो है अभी एक तरह से कृष्णा केवल एक दस साल के बालक है। वह भगवान है, सर-सर शक्तिशाली है, पर जो लीला कर रहे है उसमें केवल दस साल के बालक है। और अभी कृष्णा को एक उनको एक टेंशन है। टेंशन क्या है? एक है लाव और दूसरा है डूटी। जो प्रेम और कर्तव है। प्रेम जो चाहते हैं कि वो व्रज में जाए। कर्तविक कारण को मथुरा में रहना है। और यहां जो है एक पुल है, एक टेंशन है। और यहां हम सब को हमारे जीवन में अलग-अलग स्थर्व, अलग-अलग परस्थितियों में अनुभो करना वरता है। और जो कृष्ण व्रिणामन में होते हैं, वहाँ केवल एक बालक रीड न कम इवा। वो केवल लीला कर रहे हैं कि बालक के समाथ खेल रहे हैं। असुरो को मारना के लिए एक खेल के समान होता है। प्रवपाजी कहते हैं कि असुरो को मारना ये व्रजवासियों के लिए एक लंच के पहले एपटाइजर होता है। वो थोड़ा एक्साइटमेंड आता है, थोड़ा एक्शन होता है, उससे उनको बात में भुख लग जाती है, फिर खाना खाते हैं। तो वो काफ़ी खेल कूज में हो जाता है। पर जब कृष्णवं वृन्दावन्चोड की मतुराय आते हैं, तो उसके लिए पर जब कृष्णव में जम्मदारी आती हैं। जब जम्मदारी आती हैं, तो यह आसान नहीं होता है। कई बार ऐसे होता है कोई परिवार में पती पत्नी का जम्ता नहीं है, तो वो दिवोस कर लेते हैं। जो अगर सेपरिट हो जाते हैं, तो फिर तभी कहीं बार कस्टडी के लिए बैटल होता है। कस्टडी के लिए मतलब, कि बच्चे जो हो गए, किसके पास रहे हैं। अभी साधार हैं ते, अभी पारत में कोई बच्चे स्कूल में आते हैं, तो दुसरे में के मिठरें� को पूछते हैं, कि तुम कहा है रहते हो, तुम्हारे मातह, पिता कहा प रहते रहते, तुम कहाँ से आये हो । तो अमेरिका में… अमेरिऎं में नहीं, फास्चटा स्थ्यों में जान्दरली, बच्चे एक दुसरे को यह नहीं पूछते हैं, तुम कहाँ रहते हो। वो बोलते हैं, तुम किसके साथ रहते हो, तुम्हारे मा के साथ या पिता के साथ। अधिकाश्च जो बच्चे हैं, वो देखे हैं सेपरेटे फैमिली से। तो मैंने कार्टून देखा, एक पुरुष पती अपने पत्नी से कह रहे है, जब आपके चिल्डरें, मुझे चिल्डरें और आपके चिल्डरें प्लेंग रहे हैं। अभी हम आश्च सकते हैं, पर यह सोशल लेवल पर बहुत त्राज़ेडी होता है। और फिर भी अभी जो कस्टेडी बैटल होता है तो मा चाहते हैं कि बच्चे मेरे पास रहें पिता चाहते हैं कि बच्चे मेरे साथ बस रहें तो फिर उसको कुछ रिजॉल करना पड़ता है पर अभी ये कृष्ण के बीच में कृष्ण एक तरह से नन्दा महाई यशोदा एक फैमिली है और वसुदेव देव की दुसरी फैमिली है और साधार अंटे इसमें क्या होता है कस्टेडी बैटल होते हैं तो माता पिता जगड़ा करते है और बच्चे भी जो माता पिता छोटा होता है बच्चे को बोलते है तुम यहाँ रहना है तुमको यहाँ पर रहना है पर यहाँ पर कृष्ण इतने छोटे कृष्ण पर जिम्मेदारी आती है कि उनको बताना है अगर बच्चा बोलता है कि मैं माँ के साथ रहने वाला तो मैं पिता के साथ रहने वाला हूँ जो भी है तो दूसरे अपने मां को या अपने पिता को बताना कि मैं तुम्हारे साथ नहीं रहने वाला हूँ यह छोटे बच्चे के लिए कितना मुश्किल होगा अभी कृष्ण यह जिम्मेदारी कुछ नहीं दे कृष्ण कह सकते थे कि वो अभी यदू को बोल सकते थे कृष्ण कि तुम चाहते हैं वो यहाँ पर रहूं तो तुम बोलो वनन्ड महराज को पर कृष्ण ऐसे नहीं करते हैं जो responsibility का एक लक्षन होता है कि जो है responsibility जो होते है जो difficult duty है वो do yourself पर जो इसके विपरीद और जो easy है वो outsource पर जो irresponsible होते है वो क्या करते है जो easy है जो अभी कोई बड़ा bridge कोई बड़ा प्रकल्प हो जाएगा तो मंत्री वहाँ पे फोटो लेने के आ जाएगे उसका पूरा planning उसका पूरा महना किसी और ने किया हुआ है तो अभी कृष्ण जो है शुरुवाद से ही वो दिखा रहे है कि कैसे वो जिम्मेदार है वो चाहते है कि ये जो news है कि मैं यहाँ पे नहीं रहने वाला हूँ ये मैं खुद दू ना केवल कोई और दे क्यों? क्योंकि इससे क्या होता है कि इससे एक तरह से वो नन्ड महाराज को सांतोना भी देना चाहते है अभी कैसे है कि कोई बुरी खबर देनी है तो कौंसा वेक्ति कैसे खबर देगा यह महतुपूर्ण है समझता है जो वो भावनाई समझता है वहाँ पे तो वो समझता के साथ वो खबर देगा वो जानकारी देगा जो निउस है वो देगा पर कोई अगर समझता नहीं है तो जो चीज बता नहीं बता देगा ऐसे तरह से बता देगा कि वो जो जानकारी उससे व्यक्ति को वेदना होती है उससे उससे ज़्यादा क्या होता है कि जिस तरह से बता या गया है मानली जो कोई पेशेंट बहुत क्रिटिकल है और डॉक्टर सरजरी करने जाते है और सरजरी से सारे सारे रिष्टिदार है बड़े चिन्ता में बाहर बैठे हुए है और सरजरी रूम से डॉक्टर बाहर आते है और वो अपनी पेशेंट बहुत क्रिटिकल है और बर गया वो अच्छा बोलके चले आते है तो ये सुनके जो पेशेंट की रिष्टिदार है तो लोग मंदिर में आते हैं मंदिर में भी सेलफी लेना चाहते हैं तो अभी मंदिर में भगवान के साथ भगवान के और पीछे पीछे बुड़े करके सेलफी लेना यह उच्छित नहीं है भगवान के और पीछे का नऊचित नहीं है तो कुछ बक्तन रादा गोपिनात मंदिर में रादाहात महराज से पूछा की अभी कुछ योग आते हैं वो सेलफी लेते हैं तो उन्हें मैं क्या करना चाहिए, उन्हें रोकना चाहिए क्या यह तो अपराद है तो महराज बोले की हाँ यह अच्छा नहीं है तो अगर कोई बुरी तरह से बताएगा तो उसके बाद में तो योग सेलफी नहीं लेगा पर मंदिर में भी वापस नहीं आएगा होले की कई बार क्या होता है की बहतर है कि आप नोटिस लिग दो पर उसको इंपोज मत करो क्योंकि वो इंपोज करेगे तो फिर उससे कौन कैसे करेंगा कई बार क्या होता है कि जब कोई नियम होता है कुछ लोगों में अपना शक्ती दिखाने का प्रवुत्ति होता है और यह नियम है तुम नियम नहीं पालन कर रहे हो मैं तुमको दिखाता हूँ अभी क्या सज़ा मिल नियजी है तुमको तो ऐसे है कि रूल्स है पर रूल्स थो कैसे समझाणा है वह महैंत पूर्न है प्।ि यह है कि किर्षिणा खुद संवेतन शीलता के साथ नांदन महराज को बता थे तो किर्षिणा जाते है और नन्दमहराज तो बहुत प्रसन है, नन्दमहराज पूई अपेख्षा कर रहे हैं कि कृष्णवापस आयेगी अभी और कृष्णवापस आकर हमारे साथ कहां जायेगे विंदावन जायेगे और कृष्णवापस आते हैं अभी कोई व्यक्ति अगर हम किसी को बहुत अच्छी से जानते हैं तो उनके छेहरे के हाव-भाव से उनकी क्या भावना है हम समझ जाते हैं बले ही वो व्यक्ति अपनी भावना न दिखाने का परियास कर रहा हो पर वो कर चिंतित है, वो विचलित है, वो मायूस है, तो हमें समझ जाता है खास करके अगर किसी व्यक्ति को हम जानते हैं तो तो अभी कृष्णने तो बड़ा पराक्रम किया है कृष्णने कमस का वद किया है कृष्णने बड़े निस्वार्थ नमर्ता के भाव से नमर्ता के साथ जो मुकुट उगरसन को दिया है ये बड़े आनन्द का प्रसंग होना चाहिए पर जब कृष्णना आते है नन्दा महाराज के पास तो उनको देखके ही नन्दा महाराज सहम जाती थी कृष्णन क्या हो गया और कृष्णन कहते है कि यदू कह रहे है कि वसुदेव का अथ्वा संथान कमसे का वत करने वाला है इसके आधार पर वो कह रहे है कि मैं उनका पुत्र हूं अभी ये सुनकर नन्दा महाराज हसने लगते है कहते है कि सम्प्टाइम्स वो अच्छी पास कृष्णन के पास होना चाहिए कि यदू में इतना दुख होता है कि अगर रोना नहीं है तो वो हसने लगते हैं और वो कहते है कि हमारा कितना भाग गए है देखो कि जो हमारा है उस पर बड़े बड़े लोग उस पर दावा कर रहे है और फिर कृष्ण कहते है कि वो ऐसे बता रहे है कि वो खत्रे में है और मुझे यहां पर रहना चाहिए उनके सरक्षन के लिए ये सुनकर नंदा महाराज भी गंभीर हो जाते है वो कहते है कि तुम यहीं पर रहो और वसुदेव के आदिश का पालन करो जिसे तुम मेरा पादश पालंग करते थे, वैसे। जिसे मेरा आदर करते थे। और फिर, नन्दा महाराज कहते है कि तुम यहाँ पर रहोगे, तो मैं भी यहाँ पर जाओंगा, मैं भी बृंदावन जाओंगा, यश्योदा माई और वजवासियों को लेके, मैं भी यहाँ पर आजाओंगा, गोरक्षन आर्थम। गोरक्षन जो है, यह हमारा करतव्य है। तो मतुरा में इतने घास नहीं है कि हमारे गायों, गायों को अन्न मिल सके। उनके लिए आपको बृंदावें में रहना पड़ेगा। तो अभी कृष्ण न केवल कृष्ण करतव्य कर रहे है, पर कृष्ण जो करतव्य है, वो अपने बिताजी को भी याद दिला रहे हैं। तो यह एक तरह से जिम्मेदारी का कितना बड़ा लक्षन है। और अनको किसे अपमान नहीं कर रहे है, तो आप कृष्ण करतव्य को भूल जा रहे हो गया। तो वसुदे दन्दा महराज कहते है, कि ठीक है, हर हफ्ते में मैं तुम से मिलने आ जाओगा, येशुदा को भी लेकर आ जाओगा। और तुम भी मीझ मीझ में आते रहना विंदावन में। अभी कृष्ण बहुत गंभीर हो जाते है। और कृष्ण कहते है, कि न तो आप मुझे मिलने आ सकते हैं, और नहीं मैं आप से मिलने आ सकता हूँ। क्यों, ऐसे क्यों? कृष्ण कहते है, कि अभी मैंने कमस को मारा है, तो जो कमस के मित्र है, वो मेरे शत्रु बन जाएगे। और वह मुझे आकरमन करेगे, और जो मेरे लिए प्रिय है, उन पर भी आकरमन करेगे। जिसे रावन को जब बदला लेना था, कि राम ने उनके खरदूशन को माड़ा डाला, उनके जनस्थान में सेना को माड़ा डाला, ने शुर्पनका का नाग काट दिया, तो बदला लेना था, तो क्या किया? सीता का अपरण किया। तो असुर होते हैं, जो साधारन तो जो शत्रिय होते हैं, वो दूसरे शत्रियों से युद्ध करते हैं, बर जो शत्रिय के नकाब में होते हैं, जो शत्रिय के नाम पे कलंक होते हैं, वो क्या करते हैं? वो दूसरे शत्रियों पे आकरमन नहीं करते हैं, वो शत्रियों के परिवार पे आकरमन करते हैं। तो यह आतंकवाद का यही लक्षन है एक तरह से, कि वो केवल सिविलियन्स को टार्गेट करेंगे। तो अभी कृष्णी कहते है, अभी अगर मेरे शत्रियों को ऐसे लगेगा, कि हम में बहुत घनिष्ट संबंद है, तो फिर वो जरूर आप पे आकरमन करने के लिए आजाएगे। उनको ऐसे लगना चाहिए, कि मैं सिर्फ रिंदावन में रह रहा था, क्योंकि मतुरा में खत्रा था। अभी मतुरा में खत्रा नहीं है, तो मैं विंदावन से मतुरा वापस आ गया हूँ, अब मैं विंदावन को भूल गया हूँ। तो अभी यह सुनके रंदा महाराज रहता है, क्या तुम सभी में भूल जाओगे हमको। पक्रिश्ट कहते हैं, नहीं नहीं परिया है, हमको ऐसे दिखाना पड़ेगा। तो रंदा महाराज बोलता है, ठीक है, मैं संदेशवा भेगोजुगा, तुमारे देखबाल पूछ में आ सकते हैं। तो ठीक है। ऐसे बोलके फिर, रंदा महाराज, विंदाओं से चले जाते हैं। अभी जो क्रिश्णा का ड्यूटी फुल्नस है, कितना एक है, कि सबसे पहले, एक से, यह जो क्रिश्णा मतुरा में आते है, तो क्रिश्णा का responsibility यह पहले क्या है? विंदाओं से, मतुरा में आते हैं। यही एक जिम्मेदारी का लक्षा है। फिर दूसरा, नंदा महाराज के लिए क्रिश्णा मतुरा में आते हैं। यह सारी एक तरह से, एक तरह से duty और responsibility, कभी-कभी एक समान शब्द लेते हैं वो, और समान है एक तरह से, पर वो समान नहीं है। जब duty होता है, वो एक तरह से compulsory मान जाता है। यह तुम्हारा कर्तव है, तुम्हें करना ही पड़ेगा। पर जो responsibility जो होता है, वो एक तरह से voluntary होता है। I take responsibility for this. मैं स्वयम यह जिम्मेदारी स्विकार करता हूं। कोई मुझे पर यह लाद नहीं रहा है, पर यह मैं स्विकार करता हूं। प्रोपा जी कहा करते है, कि हमारी जो भक्ति में प्रगति होती है, वो हम कितनी कृष्णा के लिए जिम्मेदारी लेते हैं। उसके आधार पर होता है। अभी कृष्णा कह सकते थे, कि मैं तो मतुरा का नाथ, मतुरा का रक्षिक बनने के लिए नहीं आया था। मुझे यहां पर बुलाया था, मैं इसलिए आ गए यहां पर। पर कमसे ने मेरे कमसे ने वरेसलर्स, मल्ला युद्न मिच पर आकरमन किया, तो मैंने उनको मार डाला। कमसे ने धंकी दी कि वो वर्जवासियो को मारेगा, इसलिए मैंने उसको मारा। मैं, मेरी यहां पर कोई जिम्मेदारी नहीं है। कृष्णा ने इसे नहीं किया। पर इसके बाद में, तीसरा जो है, वो क्या करते है कृष्णा? वो वस्वदेव और देवकी से मिलते हैं। और यह जो अपने कृष्णा करते है, वो बहुत ही एक्स्ट्रोडडरी है। अभी साधारन द्या वैश्णाव साहित्य में ऐसा शिष्टाचार होता है कि अगर कोई कुछ, कोई जो आदर्निय वेक्ति है, वो कोई गलत कारे कर रहा है, और वो कोई गलत बात कर रहा है, तो फिर उनका नाम नहीं लेते हैं। कुछ लोग ऐसे बोलते हैं। जिव गो स्वामी, जब श्रिदर स्वामी की जो टिका है, यह थोड़ा कंप्लिकेटेट है, पर वो सिंपल करने का प्रयास करता है, श्रिदर स्वामी की जो टिका है, वो बेदान सुत्र पे, भागवतम पे, उसमें कहीं जगव पे श्रिदर स्वामी ने निर्विशेष्वादी इंटरप्रिटेशन, कॉमेंट्री दिया है, तो श्रिदर स्वामी का चेतने महापुर बड़ा आदर करते हैं। जिव वो स्वामी, वो श्रिदर स्वामी का आदर तो करते हैं, पर उनकी जो निर्विशेष्वादी टिका है, उसको सुकार नहीं कर सकते हैं। पर जब उनका खंडन कर रहे हैं, तो श्रिदर स्वामी का नाम नहीं लेते हैं। तो उसी तरह से, जब जिव वो स्वामी, गोपाल चेंग में बता रहे है, कि यदू ऐसे कहते हैं कृष्ण से, तुम यहां पर रहो, तुम यहां से नहीं जा सकते हैं। तो कौन यदू कहते हैं, वो बताते नहीं हैं। यदू ऐसे कहते हैं। कि एक तरह से क्या हो गया, यदू को यहां पर विलन जैसे दिका रहा हैं। विलन नहीं, पर विलन जैसे। क्योंकि उनके कारण, कृष्ण और जो वजवासियों में विरह आने वाला है। पर अभी वसुदेव के पास कृष्ण जाते हैं, अभी वसुदेव की मन में क्या विचार होगा, कि यह मेरा बच्चा है, वो कितने सालों के बाद देखा है उनने। थोड़ी बहुत उनको जानकारी बताते है, कृष्ण क्या कर रहे है। पर वो कभी वृन्दावन जा नहीं सकते हैं, क्योंकि वो जाएगे वृन्दावन, भले कमसे ने उनको आजात कर दिया है कुछ समय के लिए, पर संशय जाएगा, वृन्दावन क्यों गए है वो। तो कई सालों के बाद वो कृष्ण को देख रहे हैं। और जबी कोई ऐसे होता है, कोई बच्चा होता है, उसको माता-पिता छोड़ देते हैं, और कहीं-कहीं से फॉस्टर केर में रख देते हैं। तो अगर ऐसे एक-दो भक्ता हैं, जो मैं अमेरिका में जानता हूं उनको, कि कुछ कारण से वो फॉस्टर केर में थी। और बाद में जो बड़े हो गए वो, तो फिर वो अपने माता-पिता से पहले बार मिलें। अब उस समय, वो बच्चों का साधारता है, माता-पिता के प्रति क्रोध होता है, कि तुमने ऐसे-कैसे किया? तुम्हें कहा, क्यों त्याग दिया मुझे? क्यों छोड़ दिया मुझे? तो यह जो भाव होता है, उसको, उससे क्या चाहिए? कुछ अच्छा का बात होते हैं, अगर बच्चों को साथता है, ध्यान करकते होता है. कि अगर कुछ बच्चों को लगता हे, कि मैं अनवन्टर हूँ, मैं हूं होना ही नहीं जैसे माता-पिता दिखाते हैं? माता पिता डाटेगे तो भी थीके, डाटना भी एक तरसे प्रीम का लक्षण है। पर अन्वान्टेड किती बच्चे को लगता है, तो वो सेहन करना बड़ा मुश्किल होता है। मैं अमेरिका में था, तो एक भक्त मेरे पास आये। वो बता रहे थे कि I am going through a big trauma.
तो वो बता रहे थी कि मैं ट्राउमा में हूँ क्योंकि मेरी पत्नी ट्राउमा में है। क्या हो गए? उनकी माता पिता दोगा है, वो उठी करना है कि आप दोना आज़ाओ. और वो अदर एक प्रावान पर बच्चा के लिए जो जाएगा था। कि तुमने ऐसे क्यों छोड़ दिया मुझे? मैं अखेला था, यहाँ पर इतने सारे खतरे आए, इतने सारे आशुरों को मुझे मारना पड़ा। अभी क्रिष्ण, जाओ वसुदेव के पाई जाते हैं, देवकी के पाई जाते हैं, या पहले क्या कहते हैं, एक बच्ची का कर्तव है कि कि अपने माथा पिता की सेवा करना अपने माथा पिता के दुखों को कम करना पर मैं इतना दुर्भाग्गेशाली हों कि मेरे जन्मग से पहले से मैंने आप को दुख दिया है और जन्मग के बाद भी मैं आपके पास नहीं रह पाया कृष्णा यह विल्कुल नहीं कहते है कि तुमने मुझे छोड़ दिया। करते हैं, मैं हमारे पास नहीं रह पाया। मैं तुम्हारी कोई सेवा नहीं कर पाया। कृपया, तुम मुझे ख्शमा कर दीजी। और अभी मैं आपकी सेवा करने के तत्पर हूँ। और फिर तभी कृष्णा क्या करते हैं? अभी कृष्णा इस समय 10-11 साल के हैं। अलग आचा है थोड़ा अलग अलग उम्र बताते हैं। पर कृष्णा 10 साल के हैं। तभी अभी हर मां की इच्छा होती है कि अपने बच्चे को प्रेम करें। और यो प्रेम का एक बहुती इंटिमेट लक्षन होता है कि जो मां अपने ही स्थनों से अपने बच्चे को स्थन पान कराती, दूद पिलाती है। तभी कृष्णा 10 साल के हो गए, देवकी को गर्भवती होके 10 साल हो गए। न केवल वो सुख परदान करते हैं, पर कृष्णा अपनी दिववि शक्ती के द्वारा, जो देवकी के पिछले संतान हैं, जिनकी मृत्य हो गए, उनको भी पुना प्रकट करते हैं। और देवकी उनके परती भी प्रेम दिखाती है। और फिर वो सबको भगवत धाम भी आ जाता है। तो यहाँ पर, जो कृष्णा क्या कर रहे हैं, कृष्णा अपने माता-पिता की सेवा करने का जो भाव दिखा रहे हैं। कृष्णा ने जो किया, वो हम नहीं कर सकते हैं। हमें वो शम्ता नहीं है, वो कृष्णा भगवान है। पर वो जो भाव है, सेवा का भाव है, कृष्णा जब responsibility लेते हैं, तो इस हद तक responsibility लेते हैं। अपने माता-पिता को दोश्च देने के जगपे, वो कहते हैं, मैं ही दोशी हूँ। और मैं इस दोश से, मैं अभी, इसका कुछ हल करने का प्रयास कर रहा हूँ। So, सच is the love of Krishna. अभी एक तरह से, कृष्णा जब्मिदारी ले रहे हैं, और जो जब्मिदारी ले रहे हैं, यहाँ बहुत लोड़ेबल है, यह बहुत उसका प्रशंद सुनिय है। पर फिर भी साथ साथ, जो कृष्णा है तो, एक दस साल के बच्चे हैं। और अगर उनकी दुरिश्टी से देखेंगे, क्या है, वो बच्चपन से एक चोटे गाउं में बड़े हुए है, और यह उनके माता पिता है, यह उनका जगत है, और एकाएक उनको जगत से निकाल के कहीं और भेज दिया है, और भी कह रहे है, कि यह तुम्हारे मा है, यह तुम्हारे पिता है, और यह तुम्हारे दुनिया है। अब यह क्रिष्ण के लिए बड़ा मुश्किल होता है। अब कभी कभी होता है, यहने कि चोटे बच्चों के जीवन में बहुत समसे आ जाती है, तो चोटे बच्चों को बच्चपन में ही बड़ा होना पड़ता है, बच्चपन में ही उनको जिम्मिदारी नहीं पड़ती है। एक तरह से उनकी जिम्मिदारी लेना यह प्रशंस नहीं है, पर कोई भी माता पिता होते है, कोई भी उनके माता पिता के उम्र के होते है, वो चाहते है कि बच्चों को, बच्चे जीवन जेने का मौका मिले, कि उनको सारे दुनिया की जिम्मिदारी जो है, वहाँ पहले ही आने के जुरूत नहीं है। तो अभी वसुदेव देखते हैं, कि एदेपी कृष्णा, यह बड़े ही पुलाइट है, रिस्पेक्टफुल है, कृर्टियस है देवकी के साथ, पर वो देवकी को, अपनी मा के समान, जो एक सौभाविक एक बच्चे का प्रेम, मा के साथ होता है, वह अभी तक सम्मन नहीं जुड़ रहा है। तो यह दोनों में कृष्णा जिम्मिदारी ले रहे है, पर वसुदे भी जिम्मिदारी लेने का प्रयास करें। वसुदे क्या करें? वसुदे समझते है, कृष्णा भी बड़ी विकट परिस्थिती में है। तो कहते हैं, कि तुरंत हम रोहीनी को बुला लेते हैं। और रोहीनी को बुला लेते हैं, वो कहते है, कि कहते हैं, कि चिल्डरं नीड सम्थिंग कॉंस्टन्ट इन देर लाइफ। आईडियली स्पीकिंग, जो बच्चे हैं, जितने चीज़ें उनके के लिए कॉंस्टन्ट होगी, उतना अच्छा है उनके लिए। कृष्ण के लिए वास्तव में तभी दो चीज़े होते हैं कॉंस्टन्ट, एक है रोहीनी और दूसरे है बलराम जी, अभी इनके द्वारा कृष्ण जो है, अपनी जिम्मेदारिया रिंदावन में, मथुरा में स्विकार कर रहे हैं, और सारे जिम्मेदारियों के अनुका कारे कर रहे हैं, तो हमारे सबके जीवन में भी ऐसे परसनती आती है, कभी हमारा रुदे कुछ एक चाहता है, जो हमारे जुम्मेदारी हैं, कुछ और चाहती है, प्रभुपाजी जब अमेरिका में जाते हैं, तो तभी वो पहली जनमाश्टमी के बारे में जल दूत भोट पर होती है, और पहली जो गौर पुर्णी में होती है, वह अमेरिका में प्रभुपाज बिल्कुल अकेले है, वहाँ पे किसी को क्रिष्ण के बारे में बतानी है, महाप्रो के आत्म ग्यान देते हैं। अमेरिका में एक कॉमेडियन था, उसने ऐसे एक लोगों को सवाल पूछा, की वोड़ इस दमोस रिडिकूलस थिंग यू आवेवर हर्ड इन जो लाइफ। सबसे पागल जैसे चीज तुमने अपने जीवन में क्या सुनी हुई है। तो कुछ लगबग 10% लोगों ने बताया था, ये लगबग 20-25 साल कल की बात है ये, की कोई हरे कृष्णा भक्त हमारे बास रस्ते में मिलता है, और हमें कहता है, की एक काले वर्ण का बासुरी बजाने वाला युवक भगवान है। यह अपने प्रभुपाजी जगा में है। प्रभुपाजी अपने डाइरी लिखते है, तो उसमें कहता है कि आज गौर पुर्णिमा है, और आज सारे मेरे गुरुभाई, वो गौर कथा कर रहे हैं, गौर किर्तन कर रहे हैं, मायापूर में, ब्रंदावन में। और प्रभुपाजी कहता है कि, मैं अपने प्रभुपाजी जगा में है। अब प्रभुपाजी जगा में है, यह एक बहुत पोईटिक शब्त है, बहुती अकेलापन मैसुस करना। मैं अलोन हूँ, अल, अल, अलोन हूँ। मैं मेरे गुरुदेव के आदीश का पालंग कर रहा हूँ, और उनकी सेवा के लिए मैं यहां पर हूँ। तो जो कर्तविय और प्रेम है, यह अटेंशन हर एक के जीवन में आता है। भगवान भी यहां पर आते है, भगवान को भी अटेंशन स्विकार करना पड़ता है। और भगवान यहां कितने आदर्श पढ़ता है। यहां उनकी मतुरा के आने के प्रसंग से हमें दिखता है। हम इसे एक लिए करते हैं, और अगर यहां करते हैं, हम प्रसंग के लिए करते हैं। रुरोद गोपी भवनस्यमत्य गोभिन्द डामोदर माधवति अभी यहां पे जो गोपियों की व्यथा है, कृष्ट के विरह में, वो बताय जा रहा है। गोपी कदाचिन मनिपिञ्जरस्थम गोपी कदाचिन मनिपिञ्जरस्थम पिंजर मतलब एक केज है, एक पिंजडा है, उसमें वो जूल, वो मनियों से बना है। शुक मतलब, जो पैरट होता है, जो पट होता है, उसको वाचई तुम प्ररुत्ता है। उसको बोले, तुम बोलो, क्या बोलो? आनन्द कंद प्रजचंडर कृष्ण कृष्ण जो है, वो आनन्द की सागर है, वो बृंदावन की चंदर है, वो कृष्ण है। उनके नाम, गोपिया, जो पोपट है, उसको बोलने को बोल रही है। गोबिंद दामोदर माधवेति आज तुम बोल सकते हैं शुकं वचूवाचे तुम प्रवृत्ताः शुकं वचूवाचे तुम प्रवृत्ताः आनन्द कन्द वरजचंद्र कृष्णा आनन्द कन्द वरजचंद्र कृष्णा.