Hindi Krishna Charitra 5 | Krishna in Kurukshetra | Govinda Damodara Stotra 1 | Nashik
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Lecture Summary
कृष्णा चरित्र का सारांश: कुरुक्षेत्र में कृष्ण
1. कृष्ण की विनम्रता और राजसूय यज्ञ
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साझा जीवन यात्रा: कृष्ण और पांडवों के जीवन की दिशा समान रही है—दोनों ने ही जंगल और साधारण शुरुआत से लेकर राजमहलों तक का सफर तय किया।
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महानता में विनम्रता: युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में, कृष्ण स्वेच्छा से अतिथियों के चरण धोने का कार्य स्वीकार करते हैं, जो पांडवों के प्रति उनके गहरे स्नेह और अथाह विनम्रता को दर्शाता है।
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ईश्वरीय शक्ति: इसी आयोजन में, यज्ञ की पवित्रता बनाए रखते हुए, कृष्ण बिना खून बहाए सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध करते हैं, जो उनकी दिव्य क्षमता का प्रमाण है।
2. द्यूत क्रीड़ा (जुआ) और अंधानुकरण के नुकसान
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अच्छे इरादे बनाम अच्छी बुद्धि: युधिष्ठिर मतभेदों को सुलझाने और युद्ध को टालने की उम्मीद में, अपने वरिष्ठों (धृतराष्ट्र) की आज्ञा का आँख बंद करके पालन करने के प्रण के कारण जुआ खेलने के लिए सहमत होते हैं। वक्ता ज़ोर देते हैं कि “अच्छे इरादे अच्छी बुद्धि का विकल्प नहीं हो सकते” (Good intention is not a substitute for good intelligence)।
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गलत निर्णय: युधिष्ठिर का यह कदम किसी लालच या जुए की लत के कारण नहीं था, बल्कि धर्म का पालन कैसे किया जाए, इसके भारी गलत आकलन (misjudgment) का परिणाम था। आध्यात्मिक इरादे चाहे कितने भी अच्छे हों, भौतिक कार्यों के भौतिक परिणाम ही होते हैं।
3. द्रौपदी की शरणागति (महाभारत बनाम भागवतम्)
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दृष्टिकोण का अंतर: महाभारत द्रौपदी के अपमान को मुख्य रूप से धर्म (नैतिक रूप से क्या सही या गलत है) की दृष्टि से देखता है, जबकि श्रीमद्भागवतम् इसे भक्ति (भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण) की दृष्टि से देखता है।
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समर्पण से पहले कर्म: कृष्ण की पूर्ण शरण में जाने से पहले, द्रौपदी उचित ही अपनी बुद्धि और वाणी का उपयोग करके सभा को उनके ‘धर्म’ की याद दिलाने का प्रयास करती है। शरणागति का अर्थ समय से पहले अपने कर्तव्यों या बुद्धि का त्याग करना नहीं है।
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भक्ति ही समर्पण है: सच्चा समर्पण चमत्कार का निष्क्रिय रूप से इंतज़ार करना नहीं है। इसके बजाय, भगवान मनुष्यों को दुनिया में सामान्य रूप से कार्य करने के लिए बुद्धि और शक्ति प्रदान करते हैं। भक्ति का अर्थ है अपने कार्यों को भगवान की इच्छा के प्रति समर्पित करना (जैसे, अर्जुन का अपना धनुष उठाकर युद्ध करने का निर्णय)।
4. कर्म, स्वतंत्र इच्छा और ‘क्षेत्र’ की अवधारणा
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कर्म के तीन कारण: इस जगत की हर घटना तीन कारणों के संयोजन से होती है: ईश्वर की इच्छा (God’s Will), जीव की स्वतंत्र इच्छा (Free Will), और भौतिक प्रकृति/बुराई (Prakriti)।
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कर्म का क्षेत्र (क्षेत्र): भगवान सीधे तौर पर (दुशासन के दुर्व्यवहार जैसे) बुरे कार्यों का कारण नहीं बनते। इसके बजाय, व्यक्तियों को उनके पूर्व कर्मों के आधार पर एक ‘क्षेत्र’ (प्रभाव, शक्ति या पद का दायरा) दिया जाता है।
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प्रेरित, बाध्य नहीं: पिछले कर्म किसी व्यक्ति को कुछ इच्छाओं या प्रवृत्तियों की ओर धकेल (impel) सकते हैं, लेकिन वे उसे कार्य करने के लिए मजबूर (compel) नहीं करते। मनुष्यों के पास हमेशा अपने कार्यों को चुनने की स्वतंत्र इच्छा होती है, और आध्यात्मिक संगति (सत्संग) नकारात्मक पूर्व कर्मों के प्रभाव को कम करने में मदद करती है।
5. संस्थागत तटस्थता और व्यक्तिगत प्रयास
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संगठनात्मक बनाम व्यक्तिगत कार्य: जहाँ इस्कॉन (ISKCON) जैसे आध्यात्मिक संगठन अपने वैश्विक मिशन की रक्षा के लिए राजनीतिक रूप से तटस्थ रहते हैं, वहीं व्यक्तिगत भक्तों को कृष्णभावनामृत के सिद्धांतों के आधार पर कार्रवाई करने, अपने मूल्यों की वकालत करने और संस्थाएं (जैसे स्कूल या गौशाला) बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
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समान विचारधारा वालों का संग: आध्यात्मिक विकास के लिए न केवल सामान्य संगति की आवश्यकता होती है, बल्कि जटिल आध्यात्मिक दर्शन को ठीक से समझने और लागू करने के लिए सजातीय (समान विचारधारा वाले) व्यक्तियों से जुड़ना भी ज़रूरी है।
Full Transcription
कृष्ण और पांडवों के जीवन में समानताएं
द्रौपदी स्वयंवर और कृष्ण से पहली मुलाकात
खांडवप्रस्थ से इंद्रप्रस्थ का निर्माण
राजसूय यज्ञ में कृष्ण की भूमिका और शिशुपाल वध
अतिथियों का प्रस्थान और द्वारका पर आक्रमण
द्यूत सभा की पृष्ठभूमि और शकुनी का छल
महाभारत और भागवतम् का दृष्टिकोण
भक्ति और धर्म के भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण
भागवतम् में भक्ति का विश्लेषण होता है, महाभारत में भक्ति का भाव होता है। पर वो उतना नहीं है। इसलिए क्या होता है कि जो समय का प्रभाव होता है, उसके अनुसार भी जो वही ग्रंथ है, उसको अलग-अलग पद्धति से बताया जाता है।
जो रामायण है, वाल्मीकि का रामायण जो है, उसमें धर्म का जो भाव है अधिक है, वाल्मीकि का रामायण जो है, जीविया, बेजा घंग बहुंमायण जो है पंडित नरसान में आता सपन है।
यार का पूमार संहार से फस्पनलाने प toolkit और प्राएकुंर में इसीजे रा splash करता है यार पनामले इसीजे का तुमबोरत पंदि भी। तब जीवित होने याजर पोल दिल तुम शान्ति और समृद्धि से राज्य कर पाओगे।
मतभेद और युद्ध टालने के लिए युधिष्ठिर का विचार
अभी जब ये सुनते हैं, युधिष्ठिर सोचते हैं कि मैं तो नहीं चाहता युद्ध हो, युद्धों को कैसे टाल सकते हैं? अभी महाभारत में क्या है? जो दैव है, दैव किस तरह से कार्य करता है, और कुछ चीज़ें हमारे जीवन में एक तरह से अनिवार्य होने वाली हैं, उस पर कुछ हद तक जोर दिया है। तो युधिष्ठिर सोचते हैं कि मैं तो युद्ध नहीं चाहता, और फिर वो अपना तर्क करते हैं, कि अभी conflict, वार (war) क्यों होता है?
वार इसलिए होता है क्योंकि जो conflicts होते हैं, जो मतभेद होते हैं, झगड़े होते हैं, वो unresolved रहते हैं। जो अभी यूक्रेन और रशिया में काफी समय से मतभेद था, यूक्रेन NATO में जाना चाह रहा था, रशिया में तो नहीं जा सकते हैं, तो वो काफी समय चाह रहा था, वो जब नहीं resolve हुआ, तो फिर युद्ध हो गया। तो unresolved conflicts होते हैं, अब जो unresolved conflicts, unresolved क्यों होते हैं?
क्योंकि वो युधिष्ठिर विचार करते हैं, disobedience to authority। क्यों क्या होता है, कि जब मतभेद होते हैं, कि अगर दोनों व्यक्ति, किसी एक authority के पास जाते हैं, और जो authority बोलता है, वो दोनों स्वीकार कर लेते हैं, तो फिर क्या होता है, जो conflict का हल हो सकता है। तो disobedience to authority is, युधिष्ठिर महाराज सोचते हैं, is the cause of conflicts and wars।
तो इसी लिए, ये sequence को टालने के लिए, युधिष्ठिर महाराज, राजसूय के बाद में, एक वचन लेते हैं, “I will always obey my elders.” In this way, मैं मेरे वरिष्ठों के आदेश का पालन करूँगा, और इसके द्वारा, मैं जो है, मतभेद को और बढ़ना, झगड़ा और युद्ध को टालूँगा।
नैतिकता के तीन आधार: इंटेंट, कंटेंट और कॉन्सिक्वेंस
अभी ये एक तरह से, उनका इरादा अच्छा होता है, उनका उद्देश्य अच्छा होता है, पर दुर्भाग्यवश जो होते हैं, उनके एल्डर जो होते हैं, सही कार्य क्या है, उसका वर्णन करना है, उसका कैसे फैसला करना है, तो क्या कार्य कर रहे हैं, उसका content क्या है, वो क्यों कर रहे हैं, और उसका परिणाम क्या है—intent, content, और consequence, ये तीनों को देखा जाता है।
और अभी अलग-अलग नैतिक पद्धतियां हैं, और कुछ-कुछ पद्धतियां ऐसे कहती हैं, कि content ही सबसे महत्वपूर्ण है, कुछ-कुछ नैतिक पद्धतियां ऐसे कहते हैं, intent महत्वपूर्ण है। “पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः” तो अलग-अलग लोग, अलग-अलग समय पर, इन तीनों में से किसी एक चीज़ को प्रधानता देते हैं, कि मैं क्या कार्य कर रहा हूँ, वो महत्वपूर्ण है, मैं क्यों कर रहा हूँ, ये महत्वपूर्ण है, और इससे क्या परिणाम होने वाला है, वो महत्वपूर्ण है।
तो एक तरह से, जो भीष्म हैं, वो हमेशा कंटेंट पर सेंटर्ड रहते हैं, कि ये मैंने वचन लिया है, मैं ऐसे ही करूँगा, जो वचन लिया है, उसका पालन करना ज़रूरी ही है। अभी, जो युधिष्ठिर होते हैं, युधिष्ठिर एक तरह से वो भी, प्रधान रूप से तो, उनको धर्मराज बताया जाता है, कि वो भी सही कार्य करना चाहते हैं। पर जो होता है, शुरुआत में, वो इंटेंट पर जोर देते हैं, स्टार्ट में।
द्रोणाचार्य का युद्ध में पतन और कृष्ण का मार्गदर्शन
पर अंत में, वो जो है, महाभारत युद्ध में, जब कृष्ण उनसे बोलते हैं, कि द्रोण को बताओ, तुम्हारे पुत्र का वध हो गया है, तो कृष्ण क्या कहते हैं उनसे, तुम अगर ऐसे नहीं बताओगे, तो आज, द्रोण जो हैं, तुम्हारी सारी सेना का विनाश कर देंगे। उस समय क्या होता है, कि जो द्रोणाचार्य हैं, उनको बार-बार दुर्योधन, कम दिखा रहा होता है, डांट रहा होता है।
जब भीष्म गिर जाते हैं, तो फिर सब की अपेक्षा होती है, कि कर्ण आएगा, और कर्ण को सेनापति बनाया जाएगा। तो जब द्रोणाचार्य को सेनापति बनाते हैं, तो वह बड़े प्रसन्न हो जाते हैं, क्योंकि उनको लग रहा होता है, कि मुझे कर्ण के अधीन सेवा करनी पड़ेगी अभी। तो द्रोण कहते हैं, कि मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, मैं तुम्हें कोई वर देना चाहता हूँ कुछ। तो वह कहते हैं, कि मुझे युधिष्ठिर को आप जिन्दा गिरफ्तार करके ले आ जाओ।
तो तभी, दुर्योधन बड़े आश्चर्य… चाहिए, पूरी लंबी कहानी है, पर मैं यहाँ पर जोड़ता हूँ, कि जो वचन द्रोण देते हैं, वो पूरा नहीं कर पाते हैं, अलग-अलग कारणों से। और उसके लिए द्रोण, दुर्योधन को बार-बार, उनकी भर्त्सना कर रहा होता है। दैवी अस्त्र साधारण सेनाओं के कारण, इस्तेमाल करने लगते हैं। अभी ये बुरी तरह से, जो युद्ध की नीति है, उसके खिलाफ है।
युद्ध के नियम और परिणामों पर विचार
आज के उदाहरण लें तो क्या है, कोई न्यूक्लियर वेपन्स, अचानक, किसी शत्रु के खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है। अभी कितना भी लोगों को, राजनीति को बुरा बोल सकते हैं, जितना भी युद्ध हुआ है उसमें, एक साल, एक-डेढ़ साल से युद्ध चल रहा है, एक साल आएगा, पर जिनके पास भी न्यूक्लियर वेपन है, उन्होंने तब भी यूज़ नहीं किया है। तो अगर कोई हेड ऑफ स्टेट है, वो न्यूक्लियर वेपन यूज़ करने लगेगा, तो तभी ऐसे आ जाएगा कि, किसी भी तरह से इसका वध कर दो, इसको अभी एसासिनेट करना ही पड़ेगा।
तो अभी अमेरिका में जो मूवीज़ बनते हैं, उसमें हिटलर को कई बार, सेकंड वर्ल्ड वॉर में, उसके ही लोगों ने मारने का प्रयास किया, कि स्पष्ट हो गया था कि जर्मनी हारने वाली है, तो अभी रोक दो। पर हिटलर रोकने को तैयार नहीं था, तो जो लोग उसको मारने का प्रयास करते हैं, उनको पकड़ा जाता है, उनको बड़ी बेरहमी से मारा जाता है। हिटलर अपनी तरह से बड़ा बेरहम था, उसने क्या किया, मारने का प्रयास किया, उनको ऐसे नायलॉन की रस्सी से बांध के उनको लटका दिया। तो एक व्यक्ति था, तेरह दिनों तक उसको लटकाए रखा, उसको गला घोंटते रहा, करते रहा, करते रहा, फिर उसकी मृत्यु हो गई।
तो एनीवे, मैं पॉइंट ये बता रहा था कि, ऐसे व्यक्ति को किसी भी तरह से मार सकते हैं। यह एक तरह से हम कहते हैं, कॉन्सिक्वेंस है। जो हज़ारों-लाखों को मार रहा है, उनको रोकना ज़रूरी है, किसी भी तरह से क्यों न हो जाए। तो जब द्रोण इस तरह से साधारण सैनिकों पर अस्त्र इस्तेमाल करते हैं, तो कृष्ण कहते हैं, अभी युधिष्ठिर, तुम्हें अपनी सेना को बचाना, यह तुम्हारा प्रधान कर्तव्य है। सारे तुम्हारे लिए युद्ध कर रहे हैं, तुम्हारे लिए जान न्योछावर करने को तैयार हैं, क्या तुम उनके लिए एक झूठ नहीं बोल सकते हो?
तो अभी युधिष्ठिर इसे स्वीकार करते हैं। तो क्या है, अभी इसका यह मतलब नहीं है कि हर बार अच्छा फल आएगा, इसलिए हम कुछ भी कर सकते हैं, कुछ भी बोल सकते हैं। ऐसे नहीं है वो। इसको इंग्लिश में कहते हैं that the ends justify the means, कि हमारा उद्देश्य अच्छा है, इसलिए हम कुछ भी कर सकते हैं उद्देश्य के लिए। ये सही नहीं है, पर कुछ-कुछ परिस्थितियों में इसे करना पड़ता है।
ब्लाइंड ओबेइंग और गुड इंटेंशन
तो अभी युधिष्ठिर महाराज जो होते हैं, मैं यहाँ पर कृष्ण कुरुक्षेत्र में कैसे भूमिका कर रहे हैं, मैं कैसे कृष्ण ने, किसके वध में कैसे मदद की, मैं उस पर जोर नहीं देने वाला हूँ। How Krishna guided the decision making of the Pandavas, उस पर मैं जोर दे रहा हूँ। अभी युधिष्ठिर महाराज जो फैसला करते हैं, मेरे वरिष्ठों का मैं आदेश का पालन करूँगा। तो इसलिए वो जुआ खेलने आते हैं।
और इसलिए जब ये बिल्कुल एक तरह से अनैतिक है, कि ये जुए के खिलाफ है, कि कोई एमेच्योर किसी प्रोफेशनल के साथ खेले, शकुनी दुर्योधन के पक्ष से खेले, तो क्योंकि धृतराष्ट्र कुछ नहीं बोलते हैं, इसलिए धृतराष्ट्र के कहने से खेल लग जाते हैं। तो ऐसे ही सब आगे बढ़ते जाता है, बढ़ जाता है, और फिर बहुत कुछ भयानक वहाँ पर हो जाता है।
तो अभी मैं अमेरिका में एक क्लास दे रहा था, तो कांग्रेगेशन के डिवोटीज़ थे, और फिर उनके कुछ बच्चे भी थे, बाद में हम थोड़ा रिव्यू कर रहे थे, कि तो एक लड़का बता रहा था, “Obeying our elders is very dangerous.” तो यह इसका निष्कर्ष नहीं है, यहाँ पर यह ओबेइंग प्रॉब्लम नहीं है। कैसे है कि ओबेइंग एल्डर्स बहुत वर्च्यू (virtue) है, पर ब्लाइंड ओबेइंग जो है, कोई भी कुछ बता रहा है, क्या उसकी विचारधारा है, यह नहीं देखना यह उचित नहीं है।
युधिष्ठिर का मिसजजमेंट और अच्छी बुद्धि की आवश्यकता
तो अभी युधिष्ठिर महाराज, इसके कारण मैंने व्रत लिया है, मेरे वरिष्ठों के आदेश का मैं हमेशा पालन करूँगा। उस भाव से वो क्या करते हैं, वो जो भी वहाँ पर घटता है, वो घट जाता है, उसे रोकते नहीं हैं वो। अभी एक दिव्य दृष्टि से देखें तो, युधिष्ठिर महाराज शुद्ध भक्त हैं, जो भी कर रहे हैं, वो कृष्ण की योजना के अनुसार ही कर रहे हैं। पर यहाँ पर, बाद में, जब ऐसे होता है, जब सारे वो वनवास में चले जाते हैं, तभी द्रौपदी गुस्सा हो जाती हैं युधिष्ठिर पर तो, इतना जुआ तुम खेले, क्यों खेले, तुम सब कुछ कैसे दांव पर लगा दिए?
तभी युधिष्ठिर महाराज कहते हैं, कि मेरा शुरुआत में तो उद्देश्य था, कि मैं, केवल धृतराष्ट्र के आदेश पालन से मैं जुआ खेल रहा था। पर अभी आदेश था, वो कभी भी रुक सकते थे, वो रुक भी सकते थे एक तरह से, कि जब तक वो उनके आदेश के लिए जुआ खेल रहे हैं, तो जब तक खेलना है, वो बोले खेलते रहो, खेलते रह सकते थे। पर वो कह सकते थे कि, अभी मेरे पास, मैं अभी कुछ दांव पर नहीं लगाने वाला हूँ, मेरे पास कुछ दांव पर लगाने के लिए, कुछ है ही नहीं।
पर उनका भाव क्या था, कि एक तरह से, वो सोच रहे थे, मुझे तो कृष्ण की सेवा करनी है, मुझे धर्म की सेवा करनी है, मुझे ब्राह्मणों की सेवा करनी है, कुछ ना कुछ तो मेरे पास होना चाहिए। तो वो सोच रहे थे, कि मैं एक और बार खेलूँगा, तो जो कुछ गँवाया है, मुझे वापस मिल जाएगा, या कुछ तो मिल जाएगा। और कुछ तो मिल जाएगा, उससे, कुछ तो मैं, एक तरह से कर्तव्य कर पाऊँगा।
तो युधिष्ठिर खेलते गए, युधिष्ठिर में ग्रीड (greed) नहीं था। कुछ लोग कहते हैं, युधिष्ठिर गैंबलिंग एडिक्ट था। बिल्कुल नहीं। वो ऐसे नहीं था, कि उन पर नियंत्रण नहीं था। वो ग्रीड नहीं था, वो एडिक्शन नहीं था। वो एक तरह से बेसिकली मिसजजमेंट (misjudgment) था। तो धर्मराज हैं, पर जगत में धर्म इतना गुह्य होता है कि धर्मराज भी कभी-कभी एक तरह से मोहित हो जाते हैं।
उनका मिसजजमेंट क्या था? मैं तो सेवा करना चाहता हूँ, मैं तो युद्ध टालना चाहता हूँ। मैं तो, मेरा उद्देश्य अच्छा है। पर क्या है, ये जगत जो है, गुड इंटेंशन इज़ नॉट अ सब्स्टिट्यूट फॉर गुड इंटेलिजेंस। हमारा उद्देश्य अच्छा हो सकता है, पर उद्देश्य अच्छा होने से, हमारी बुद्धि अच्छी होना, उसकी जगह नहीं ले सकता है। भगवान को प्रसन्न करने के लिए गुड इंटेंशन अच्छा है। पर्याप्त है, भगवान भावग्राही हैं। पर इस जगत में कुछ कार्य करना है, तो केवल अच्छा उद्देश्य होना पर्याप्त नहीं है। अच्छी बुद्धि भी होनी चाहिए।
अगर सही बुद्धि नहीं है, तो फिर अच्छा उद्देश्य होते हुए भी, व्यक्ति को समस्याएँ महसूस करनी पड़ सकती हैं। जगत है, एक तरह से भौतिक। जो भक्ति है, भगवान का आदान-प्रदान है, वो हमारे हृदय की भावनाओं के आधार पर चलता है। पर ये जगत जो है, वह किस तरह से चलता है, वो जगत का ही नियम है, उसके… उससे चलता है। तो जगत उसके नियम के साथ चलता है।
भौतिक स्तर पर नियमों का परिणाम
मतलब क्या है, अभी मान लीजिए, किसी को डायबिटीज है, और कहीं से, तिरुपति से एक बड़ा लड्डू आता है। और कहते हैं कि, यह तो तिरुपति जी का बालाजी का प्रसाद है, यह प्रसाद के भाव में लूँगा, और कोई व्यक्ति वो एक पूरा लड्डू खा लेता है, तो अभी क्या होगा, उसके बाद में? वो लड्डू से जो था, उनको दवाइयाँ ज़िंदगी में खानी पड़ेंगी शायद, कई महीनों तक खानी पड़ेंगी। वो कहते हैं कि, यह प्रसाद है, हाँ, यह प्रसाद है। तो सही है वो प्रसाद है, यह प्रसाद दिव्य है।
पर जब कि यह स्पिरिचुअल है, यह दिव्य है, एक दिव्य स्तर पर उसका परिणाम होगा, पर भौतिक स्तर पर भौतिक परिणाम होने वाला है उसका। तो अगर कोई तिरुपति का लड्डू खा लेता है, तो उनका जो डायबिटीज से डाइ (die) हो जाएगा, कई… कभी। तो कहा, यह प्रसाद खा के ऐसे कैसे हो सकता है? हाँ, प्रसाद है वो, पर भगवान का प्रसाद तो अलग पद्धति से आता है।
आपको वो भगवान का प्रसाद उसी रूप में क्यों ग्रहण करने की ज़रूरत थी? तो गुड इंटेंशन इज़ नॉट अ सब्स्टिट्यूट फॉर गुड इंटेलिजेंस। अब कोई तो लोभ के कारण खाएगा प्रसाद, उसको इंद्रियभोग की इच्छा है। पर किसी का सेवा भाव भी होगा, कि यह भगवान का प्रसाद है, मुझे लेना है, पर फिर भी परिणाम तो भौतिक स्तर पर होने वाला है। गुड इंटेंशन इज़ नॉट अ सब्स्टिट्यूट फॉर गुड इंटेलिजेंस।
द्रौपदी चीरहरण और धर्म का प्रश्न
और एक तरह से यही दर्शाया जाता है शास्त्रों में, कि अभी जो द्रौपदी है, थोड़ा आगे जाऊँगा मैं, कि जब द्रौपदी के साथ दुर्व्यवहार होता है, अभी महाभारत में जो वर्णन है, उसमें कृष्ण के हस्तक्षेप को स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया है। वहाँ पर ऐसे बताया जाता है, इतना ही बताया जाता है, कि वो द्रौपदी का वस्त्रहरण करने का प्रयास करते हैं, और वो करते जाते हैं, करते जाते हैं, पर उसका वस्त्र जो है असीमित होता है।
जब हम महाभारत को टीवी में या मूवीज़ में देखते हैं, तो क्या है, महाभारत में ऐसा कोई वर्णन नहीं है। महाभारत में लोग समझते हैं, क्योंकि ये इतनी चेस्ट (chaste) है, ये इतनी पतिव्रता है, ये इतनी पवित्र है, कि उनकी पवित्रता के कारण ही, एक कुछ दिव्य शक्ति के कारण, उनका वस्त्र असीमित हो गया, और फिर दुशासन खींचते-खींचते थक जाता है, और गिर जाता है।
अभी इसमें जो होता है, यह बहुत ही अधार्मिक होता है। अभी कुछ-कुछ लोग ऐसी कहानी बताते हैं, कि जब तक द्रौपदी अपने वस्त्रों को पकड़ के रखी थी, तब तक कृष्ण नहीं आये। जब उसने अपने वस्त्रों को छोड़ दिया, और सिर्फ कृष्ण की शरण ले ली, तभी वो कृष्ण वहाँ पर आ गए। तो उस तरह से हमें एक पूर्णतया कृष्ण पर निर्भर होना चाहिए। अभी एक तरह से वो जो लेसन है, वो जो शिक्षा है, वो सही है।
पर कभी क्या कहा, भक्ति की शिक्षा जो होती है, वो उसको दिखाने के लिए कभी-कभी क्या है, अगेन, गुड इंटेंशन इज़ नॉट… होते हैं, अभी ये महाभारत के कुछ खिलाफ है। कृष्णा वहीं पर होते हैं, जब युधिष्ठिर जुआ खेल रहे हैं। पर युधिष्ठिर कभी कृष्णा को पूछते नहीं हैं, “क्या करूँ मैं?” इसलिए कृष्णा हस्तक्षेप नहीं करते हैं। तो अगर हम कृष्णा की ओर नहीं मुड़ेंगे, तो हम गलत कार्य कर लेंगे, ऐसा निष्कर्ष निकालते हैं।
अभी निष्कर्ष सही है, पर वो प्रसंग से वो निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है, क्योंकि वैसा प्रसंग हुआ ही नहीं था वहाँ पर। तो यहाँ पर भी, ऐसे निष्कर्ष कि हमें कृष्णा पर निर्भर होना है, यह ज़रूरी है। पर इसका मतलब क्या है, कि पहले जो द्रौपदी कर रही थी, क्या वो गलत थी? द्रौपदी जब वहाँ पर आती है, तो अभी एक बड़ा अधर्म हो रहा है, उसको अब खींच के लाया जा रहा है।
तो द्रौपदी अभी क्या करती है, वो धर्म की याद दिलाने का प्रयास करती है। वो कहती है, कि जब युधिष्ठिर ने मुझे जुए पर लगाया, तो उसने खुद को पहले दांव पर लगा दिया था। तो फिर वो मुझे दांव पर कैसे लगा सकता था, कि जो खुद का ही स्वामी नहीं है, किसी और का कैसे हो सकता होगा? तो फिर वो पूछती है सवाल, एक… कोई जवाब नहीं देता है, सब शांत रहते हैं।
तो फिर भीष्म कहते हैं, कोई… सब जानते थे, बार-बार याचना न करें। तो भीष्म कहते हैं कि जो ये जो है, मैं धर्म-सम्मूढ में हूँ। दोनों जो सत्य हैं, उनमें से कौन सत्य महत्वपूर्ण है? वो मैं बता नहीं सकता। और फिर तभी दुर्योधन जो है, वो पति-पत्नी में झगड़ा लगाने का प्रयास करता है। कहता है कि द्रौपदी, तुम अगर ये कह देती हो, कि युधिष्ठिर ने तुम्हें दांव पर लगाकर अधर्म कर दिया है, तो मैं ये सारा कैंसल कर दूँगा, और तुम्हें तुम्हारा राज्य मैं तुम्हें वापस दे दूँगा।
तो अभी द्रौपदी कहती है तभी, कि युधिष्ठिर की बिल्कुल इच्छा नहीं थी ये जुआ खेलने की। तो उनका जुआ खेलने का फैसला भी था, वो उन वरिष्ठों ने किया है। उनके आदेश का पालन करते हुए युधिष्ठिर ने जुआ खेला हुआ है। तो वही वरिष्ठों को ये फैसला करना चाहिए, ये धर्म था या अधर्म था। तो क्या है कि वो देख रही है कि दुर्योधन क्या करने का प्रयास कर रहा है, और वो होने नहीं देती है।
बाद में अकेले में जंगल में होती है तो युधिष्ठिर पर गुस्सा होती है, पर यहां पर नहीं होती है। तो अभी जो अलग-अलग से प्रयास कर रही है वो, ये क्या है? वो सभा को धर्म की याद दिलाने का प्रयास कर रही है। और ये उचित है, ये अच्छा है। जब तक हमारी शक्ति में कुछ है अनर्थ टालने का, वो टालना ये हमारी ज़िम्मेदारी है। और तो ये कुछ गलत नहीं है।
धर्म का जटिल होना और शरणागति
जब अर्जुन को भगवान बोलते हैं, “सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज”, इसका अर्थ ये नहीं कि सारा धर्म छोड़ दो और अधर्मी बन जाओ। कि, हमें साधारणतया, धर्म के अनुसार कार्य करना है। पर जब धर्म क्या है, यह समझ में नहीं आता है, जब धर्म इतना जटिल हो जाता है, तब हमें विचार करना है कि “मामेकं शरणं व्रज”, मैं कृष्ण की शरण जाता हूँ, और जो भी होने वाला है स्वीकार करता हूँ।
तो ये जो भगवद गीता’s conclusion is not its sole instruction। भगवद गीता का जो अंतिम निष्कर्ष है, वो उसका इकलौता instruction नहीं है, वो अंतिम instruction है, most important है, पर वो इकलौता instruction नहीं है। अगर वो इकलौता instruction होता था, तो 2.7 में अर्जुन पूछते हैं, “पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः”, 2.8 में भगवान बोल देते, “सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज”, भगवद गीता संपूर्ण!
ऐसे नहीं कर रहे हैं कृष्णा। क्या बता रहे हैं कृष्णा? हमें हमारी बुद्धि से सही कार्य क्या है, वह समझने का प्रयास करना चाहिए, और वह सही कार्य करना चाहिए। पर जब यह हमारी शक्ति के परे जाएगा, हमें कुछ करने का रहता ही नहीं है, तभी हम जो भगवान की शरण जाकर, जो भी हो रहा है, वह स्वीकार करते हैं।
अपमान और धृतराष्ट्र का अपशकुन
तो अभी नैतिक स्तर पर जो हो रहा है यहाँ पर, वह बहुत बुरा हो जाता है। तो उसके बाद में, जब कुछ कर नहीं पाता है, इससे भी दुर्योधन का परिवर्तन नहीं होता है। मैं पिछले दिनों बता रहा था कि, दुर्योधन कृष्ण का विराट रूप भी देखते हैं, तो भी उनका हृदय परिवर्तित नहीं होता है। तो यहाँ पर दुर्योधन का… विराट रूप दिखाने का प्रयास करते हैं, विचार से भी नहीं होता है, उससे भी उसका हृदय परिवर्तित नहीं होता है।
वो उस समय क्या होता है, तो ठीक है, इस तरह से उसका अपमान नहीं कर पाए, तो अभी द्रौपदी का अपमान किसी और पद्धति से करें, कि द्रौपदी के हाथ में झाड़ू लगा दो। और तो अभी नौकरानी है, अभी उसको हम सब के सामने जो है राजमहल का झाड़ू लगाना चाहिए। तो जब वो ऐसे करते हैं, द्रौपदी के हाथ में झाड़ू दे देते हैं, तो द्रौपदी झाड़ू उठा लेती है। और अभी रो रही है, वो बहुत ही दयनीय अवस्था में है।
और तभी जो धृतराष्ट्र होता है, उसको विदुर बोलते हैं, अभी तो तुम रोको, ये बहुत हो गया। वो बोलता है कि तुम्हारा यज्ञ का कुंड था, उसमें जो अग्नि होती है, वो हमेशा जली रहती थी, कभी उसको तुम बुझने नहीं देते हो, और ये अचानक बुझ गई है, ये बड़ा ही अपशकुन है। अभी ये देखकर धृतराष्ट्र जो है… तो अभी बहुत हो गया। तो क्या है, ये महाभारत का भाव है। भगवान के हस्तक्षेप से कुछ उसको परिवर्तन नहीं होता है। क्यों हो गया पता नहीं, पर ये रीति-रिवाज़ हैं, ये रीति-रिवाज़ हैं, तो लोग अलग-अलग तरह से, अलग-अलग विचारधाराओं से कार्य करते हैं। तो वहाँ पर रुक जाता है।
भगवान से अपेक्षा और उनका वास्तविक हस्तक्षेप
पर उसके बाद में जो घटनाएँ बढ़ती जाती हैं, और पांडवों को वनवास भी हो जाता है। पर यहां पर, I’ll come back to two points, and then we’ll stop and we’ll have question-answers. कि अभी देखते हैं हम कि द्रौपदी के साथ दुर्व्यवहार होता है, उनका वस्त्रहरण होता नहीं है, वस्त्रहरण का प्रयास होता है। अभी कृष्ण वहाँ पर हस्तक्षेप करते हैं, और उनको मदद करते हैं।
पर ऐसे नहीं है कि द्रौपदी, अभी द्रौपदी कृष्ण को… पर वहाँ पर क्या हुआ, उसको बताने चलता है। तो इसलिए बाद में जब कृष्ण से मिलती है वो, कृष्ण उनसे मिलने आते हैं जंगल में, तो कृष्ण से कहती है, कि मैंने तुम्हें पुकारा, तुम वहाँ पर क्यों नहीं आये उस समय? मैं तुम्हारी… तुम्हारी त… में श्रद्धा नहीं है, कि मेरी योजना के बिना कुछ नहीं होता है, ऐसे नहीं कृष्ण कहते हैं।
कैसे होते हैं, उस समय वह क्या कहते हैं, कि शाल्व ने आक्रमण किया था, और मैं द्वारका में वहाँ पर कार्यरत था। जैसे ही मुझे पता चला, मैं यहाँ पर कार्य… आ गया हूँ। और कहते हैं कि, मुझे बताया गया कि कैसे सारी जो सभा थी अधर्म की ओर जा रही थी, पर तभी तुम सबको धर्म की याद दिला रहे थे। बताते हैं कि, कि यद्यपि तुम्हारा अपमान करने का प्रयास किया गया, आपका अपमान किया गया, पर आपका जो बर्ताव था, सबसे आदर-योग्य, आदरस्पद बर्ताव था आपका।
और कृष्ण सांत्वना कर रहे हैं, द्रौपदी की। पर उस समय कृष्णा, द्रौपदी की व्यथा देखकर क्रोधित हो जाते हैं, और वो इतना क्रोधित हो जाते हैं, कहते हैं कि मैं अभी पांडों का विनाश कर दूँगा, और तभी अर्जुन कृष्ण को शांत करते हैं। अर्जुन कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए कुछ प्रार्थनाएँ बोलते हैं, उनका गुणगान करते हैं, उनको शांत करते हैं। मझे कमकbuds के लिए कृष्ण को ख़ोसानों के लिए अच्छी, नहीं चून्गा, जाते हैं, चाहित तोड़ी, आपके मिक्ञातों के कोशों के लिए प्रबे करते हैं, एक नज़ जो है, भगवान का कारण नहीं है।
भगवान हमारे साथ हैं और कोई अत्याचार होता है, अन्याय होता है तो God is concerned, God may also be angry about it. तो ऐसे नहीं है कि जो भी हो रहा है, जिसके साथ भी हो रहा है वो भगवान की इच्छा है।
सीता हरण प्रसंग और भगवान की मानव लीला
तो अभी सीता का अपहरण होता है। दूसरा प्रसंग हम देखें। तो सीता के अपहरण में जो है, प्रभु श्री राम हस्तक्षेप क्यों नहीं करते? राम वहीं थे एक तरह से। तो मैं मैनचेस्टर में था, जब मारीच चिल्ला के कहा, “लक्ष्मण, सीता!”, तो राम चिल्ला के कहा, “वो मैं नहीं हूँ, वो मारीच है!” तो अभी वास्तव में, जो प्रभु श्री रामचन्द्र हैं, वो एक मानव लीला कर रहे हैं।
और कैसे है कि, अगर हम यूनिवर्स की हाइरार्की (hierarchy) देखते हैं, हाइरार्की मतलब तारतम्य, और तारतम्य का मतलब, मुझे पता नहीं क्या हिंदी में कहते हैं, यह ऊपर से नीचे की शृंखला है। तो देव ऊपर होते हैं, मानव बीच में होते हैं, और जो राक्षस होते हैं, असुर होते हैं, नीचे होते हैं। यह नैतिकता के स्वरूप अर्थ में हैं म downtimeआयन के स्वरूप हैं। पर स्ट्रेंथ, बल के स्वरूप, स्वरूप में देखेंगे तो देवता ऊपर हैं, असुर भी लगभग उतने शक्ति चाहते हैं, थोड़ा सा कम हैं, और मानव काफी नीचे होते हैं।
तो प्रभु श्री राम मानव के रूप में आये हैं। तो मारीच जो है असुर है। तो असुरों की शारीरिक शक्ति, बोलने की आवाज़ ये सब मानव से ज़्यादा होता है। तो इसलिए प्रभु श्री राम जो हैं वो दौड़ते हुए वापस आने लगते हैं। वो देखते हैं कि मारीच तो मर तो गया है, नाटक तो नहीं कर रहा है, वो मर गया है। इसके बाद में तुरंत वो दौड़ते हुए आ जाते हैं, सीता का अपहरण होता है।
भगवान की शरण और ट्रांसफॉर्मेशन
तो तभी भगवान एक तरह से वहीं पर हैं पर हस्तक्षेप नहीं करते हैं। तो कहते हैं कि इस जगत में जब हम भगवान की भक्ति करते हैं, भक्ति से हमारी यह अपेक्षा नहीं होनी चाहिए कि भगवान का इंटरवीन करने के लिए, होने के लिए, पहले हमने… पहले केवल करते हैं, क्या होता है। ज़रकति के… भक्ति के दो दिशाएँ पढ़ी जा सकती हैं।
एक है एक्सपेक्टेशन (Expectation) और दूसरा है ट्रांसफॉर्मेशन (Transformation) या वाला… इतनी भक्ति कर रहा हूँ, तो आपको यह करना चाहिए। मैंने आपके लिए इतना किया, तो आपको यह करना चाहिए। यह एक direction में जा सकता है भक्ति। और एक Tool से ज़ेशक हाना है, हम किसी के लिए कुछ करते हैं और वो अपेक्षा करते हैं कि वो हमारे लिए कुछ करना चाहिए।
पर दूसरा है, प्रभुपाद जी कुछ करते हैं, हम जप करते हैं, जप के लिए क्या फल होता है, जप के लिए और बुद्धि बढ़ जाती है अभ्यास करने से। खास करके एक्सपेक्टेशन क्या है, कि भगवान हस्तक्षेप करेंगे, कि भगवान हस्तक्षेप करेंगे। न क्यों हस्तक्षेप करेंगे? वो अपना ऑम्निपोटेंस (Omnipotence), अपनी सर्वशक्ति इस्तेमाल करके ऑम्निपोटेंस हस्तक्षेप करेंगे। ये अगर ऐसे करेंगे तो हमारी जो भक्ति है वो काफी अनस्टेडी (unsteady) रहेगी।
कभी-कभी हमारी भक्ति हम छोड़ भी देंगे। क्या होता है कि जब हम अपेक्षा करते हैं, अगर हमारे पास पैसा नहीं है और किसी रिश्तेदार के पास जाते हैं, उससे कुछ पैसा मांगते हैं, उनके पास भी ज़्यादा पैसा नहीं है, तो हम जाएंगे उनके पास थोड़ा सा तो मदद कर लें, ऐसे अपेक्षा करेंगे। तो अगर हम किसी बहुत ही रिश्तेदार के पास आते हैं, हमारा कोई रिश्तेदार है, बहुत अमीर है। तो भगवान कभी-कभी हस्तक्षेप करते हैं।
महाभारत में भगवान हस्तक्षेप अपने ऑम्निपोटेंस के साथ नहीं कर रहे हैं। वो क्या कर रहे हैं? करते हैं वो हस्तक्षेप, पर यहाँ पर दिखाते क्या हैं? ऐसे नहीं करते हैं, “मैं तभी था, तुम्हें याद नहीं क्या, मैं वहाँ पर था इसलिए यहाँ पर नहीं आ पाया।” पर तुम्हारे जो आँसू हैं, जो तुम्हारा अपमान किया है, जो तुम आँसू अभी बहा रहे हो, उनको सज़ा ज़रूर मिलेगी। अभी भगवान इस तरह से आश्वासन देते हैं। अभी जो राम हैं, वो सीता से ज़्यादा दूर नहीं हैं, पर वहाँ पर वह पहुँच नहीं पाते हैं। क्योंकि भगवान हमेशा अपनी असीमितता को वो प्रदर्शित नहीं करते हैं।
भगवद गीता का उद्देश्य – संरक्षण के लिए निपुण बनाना
अभी कल ही दोपहर को मेरा एक पॉडकास्ट था। वो प्रदर्शित था कि कलकत्ता में भयावह गुनाह हुआ, किसी के प्रति उसके बारे में था। तो वो पूछ रहे थे कि अगर ऐसा होता है, कुछ लोगों के, बांग्लादेश में भी कुछ हिंदुओं के साथ हुआ, तो अभी ऐसे अत्याचार होते हैं। पूरा भगवद गीता का उद्देश्य ये नहीं है कि “मेरी भक्ति करो, मेरी शरण में आ जाओ और मैं तुम्हारा प्रोटेक्शन करूँगा।” नहीं, भगवद गीता का उद्देश्य क्या है? “तुम मेरी शरण में आ जाओ और मैं तुम्हें निपुण बनाऊंगा। मैं तुम्हें मार्गदर्शन दूँगा कि तुम संरक्षण कर सको, तुम धर्म का संरक्षण कर सको।”
अभी एक तरह से कहते हैं, कृष्णा कहते हैं, “तुम मेरी शरण में आ जाओ।” पर अभी कृष्णा कहते हैं जब मेरी शरण में आ जाओ, तो अर्जुन किस तरह से शरण में आते हैं? क्या अर्जुन दोनों हाथ उठा लेते हैं ऊपर? नहीं, अर्जुन अपना हाथ उठा लेते हैं ऊपर, मतलब क्या करते हैं वो? धनुष उठा लेते हैं। क्योंकि कैसे कि, जो भगवान की इच्छा है, जो कृष्णा, कृष्णा’s अगर विल (will) कहते हैं। अगर हम यहां पर हैं तो एक है “It happens to us”, जो हमारे साथ हो रहा है वो भगवान की इच्छा है।
पर इससे महत्वपूर्ण है कि “God’s will happens through us”, कि हमारे माध्यम से भगवान की जो इच्छा है वो पूरी होनी चाहिए। तो अभी द्रौपदी का जो प्रसंग है, खास करके अंतिम जो प्रसंग यहां पर बताया जा रहा है, वो जब हाथ उठा रही हैं “कृष्ण तदाक्रोशदनन्यनाथा”, वो क्या है? अभी कृष्ण जो होगा मैं स्वीकार कर लेती हूँ। पर जो अर्जुन की शरणागति है वो क्या है? भगवान “करिष्ये वचनं तव”। तो एक है नॉर्मल (normal) और एक है पैरानॉर्मल (paranormal)।
तो कृष्णा’s role in the world, भगवान किस तरह से हस्तक्षेप करते हैं? तो अभी कृष्णा किस तरह से हस्तक्षेप करते हैं? वह अधिकांश रूप से नॉर्मल, मतलब क्या? वो He empowers us, हमें empowers human beings। उनको बुद्धि देते हैं, उनको शक्ति देते हैं, उनको टैलेंट देते हैं, जो भी ज़रूरी है उसके द्वारा वो अपना कार्य करते हैं।
कुरुक्षेत्र में कृष्ण का हस्तक्षेप और ऐतिहासिक प्रमाण
अभी यह महाभारत और भागवतम् का भेद है। हम जानते हैं कि जब जयद्रथ तक कृष्णा पहुँच नहीं पाते हैं, तो कृष्णा क्या करते हैं? अपना सुदर्शन लेते हैं। महाभारत के थोड़े अलग-अलग वर्णन हैं, पर महाभारत में ऐसे वर्णन आता है कि उस समय सूर्य ग्रहण हो जाता है। तो अभी कृष्णा का हस्तक्षेप है, यह सत्य है। पर सारे लोग तो देखते नहीं हैं, अंधकार हो गया, वापस सूर्य रोशनी कैसे आ गई? तो अभी वो उस समय मेरे एक मित्र भक्त हैं, वो महाभारत का हिस्टोरिकल डेटिंग एविडेंस (historical dating evidence) दे रहे थे।
कैसे वो एविडेंस हम बता सकते हैं कि महाभारत ऐक्चुअली हुआ है, और ऐक्चुअली 5000 साल पहले हुआ है। तो एक फील्ड है आर्कियो-एस्ट्रोनॉमी (Archaeoastronomy)। आर्कियोलॉजी मतलब क्या है कि जो भूतकाल का हम अध्ययन करते हैं, तो हम जमीन को खोदते हैं, वहाँ पर कुछ फॉसिल्स (fossils) वगैरह मिलते हैं। पर आर्कियो-एस्ट्रोनॉमी मतलब क्या है, कि वो जो अभी हम आसमान में जो कहाँ तारे हैं, कहाँ ग्रह हैं, उनकी पोज़ीशन (position) को देखते हैं।
और अभी हम गणित के द्वारा, मैथमेटिक्स (mathematics) के द्वारा, कंप्यूटर मॉडल्स से जो पीछे जा सकते हैं, और पीछे जाकर हज़ारों साल तक भी जा सकते हैं, यह ग्रह कहाँ होगा, वो ग्रह कहाँ होगा, वो हम प्रेडिक्ट (predict) कर सकते हैं। तो भक्त मुझे बता रहे थे कि क्या हम अगर स्वीकार करते हैं, अगर एक साउथ इंडिया में एक श्री वैष्णव वैज्ञानिक हैं। उन्होंने क्या किया है कि वो जो चौदहवें दिन, जो चौदहवें दिन की शाम को जो हुआ, उसको सूर्य ग्रहण माना है। और उसको सूर्य ग्रहण मान कर क्या किया है उन्होंने?
उन्होंने कैलकुलेट किया है, कि अभी महाभारत में वर्णन आता है कि इस समय यह चंद्र ग्रहण हुआ था, इसके बाद सूर्य ग्रहण हुआ था, यह हुआ था, वो हुआ था। तो अभी चंद्र ग्रहण के बाद सूर्य ग्रहण कितने समय… इतने समय में अगर हुआ है तो यह कब हुआ है, तो वो हम कैलकुलेट कर सकते हैं। तो बराबर वो कहते हैं, अगर वो स्वीकार करते हैं वो सूर्य ग्रहण है, तो हम लगभग 3000 साल पहले, 500… 3000 साल बीसी लगभग, हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं, कि महाभारत तभी हुआ है।
शरणागति और समर्पण का अंतर
तो अभी महाभारत में यह जोर नहीं दिया गया है, हमें बताये गए हैं पर वो जोर नहीं दिया गया है। क्या है कि भगवान जब इंटरवीन भी करते हैं, तो हर बार वो पैरानॉर्मल पद्धति से करना ज़रूरी नहीं है। तो जो अगर हम अपेक्षा रखते हैं, कि भगवान कोई चमत्कारिक रूप से हस्तक्षेप करेंगे, वह अपेक्षा से कभी-कभी हम हताश हो जाएंगे। पर उसके विपरीत क्या है? हम… डिवोशन का मतलब है समर्पण।
समर्पण, अभी समर्पण, I’ll conclude this point कि समर्पण और शरणागति, यह दोनों शब्द हैं, यह एक नहीं हैं। शरणागति – सरेंडर (surrender), समर्पण इज़ डेडिकेशन (dedication)। सरेंडर और डेडिकेशन एक हो सकता है, पर कई बार लोगों को सरेंडर होता है, मतलब क्या, हाथ ऊपर कर लो, मैं भगवान को सरेंडर हो गया। पर सरेंडर का एक मतलब है जिससे भक्ति क्षीण हो गई, सरेंडर का मतलब है कि डेडिकेशन करना।
अर्जुन… प्रभुपाद जी एक लेक्चर में कहते हैं कि अर्जुन कृष्ण से नहीं कहते हैं जब कृष्ण उनको विराट रूप दिखा देते हैं, “कृष्ण, तुमने तो दिखा दिया मुझे कि सब की मृत्यु होने वाली है, तो जो होने वाला है अभी तुम्हीं कर दो, मैं बैठ के आराम से देखता हूँ।” नहीं, अर्जुन कहते हैं, “मैं ये करूँगा।” तो इसलिए जो भी इस जगत में हमें बहुत कुछ गलत हो रहा है, हमारे आजू-बाजू की परिस्थिति में भी, हमारे परिवार में कुछ गलत हो सकता है, हमारी कम्युनिटी में कुछ गलत हो रहा हो सकता है, हमें बहुत कुछ गलत हो रहा है, ऐसे दिख सकता है। तो ये अपेक्षा रखना… प्रधान उसे दिखती हो, डिवोशन मीन्स डेडिकेशन (Devotion means dedication)।
कुरुक्षेत्र में कृष्ण का मार्गदर्शन और पांडवों का समर्पण
तो अंत में, अभी कृष्ण जो हैं, कृष्णा’s inspiration, कृष्णा’s guidance, कृष्णा’s presence, उससे होता क्या है? उससे अर्जुना’s dedication, पांडवा’s dedication। कृष्णा, अभी डेडिकेट कैसे करना है? वो युद्ध करना है। तो द्रोण का सामना कैसे करना है, भीष्म का सामना कैसे करना है, दुर्योधन का सामना कैसे करना है, कर्ण का सामना कैसे करना है, इसके लिए मार्गदर्शन कृष्ण देते हैं। पर, जो समर्पण है, वह पांडव ही करते हैं।
तो हम जब कृष्ण लीला जो वृन्दावन, मथुरा में देखते हैं, द्वारका में भी, वहाँ पर कृष्ण कंस को मारते हैं। पर जब भागवतम् के आठवें… “स्वैर्दोर्भिरस्यन् अधर्मम्”, कभी कृष्ण स्वयं लोगों को मारते हैं, कभी कृष्ण वो दूसरों को शक्ति दिलाते हैं जिससे कि वो असुरों का वध कर सकें। तो यहाँ पर जो वर्णन है कि कुरुक्षेत्र में कृष्ण क्या करते हैं? कृष्ण स्वयं शस्त्र नहीं उठाते हैं।
एक बार वह व्हील (wheel) उठा लेते हैं, चक्र उठा लेते हैं, पर अधिकांश रूप से वो शस्त्र नहीं उठाते हैं। और चक्र क्या शस्त्र है, उसके बारे में चर्चा हो सकती है। सुदर्शन चक्र शस्त्र है, पर हर चक्र शस्त्र है? क्यों नहीं? उसके बारे में थोड़ा तर्क किया जा सकता है। पर अधिकांश रूप से क्यों नहीं उठाते हैं, पर हर चक्र शस्त्र है उसके बारे में तर्क किया जा सकता है।
कृष्णभावनामृत आंदोलन का व्यापक उद्देश्य
अभी महत्वपूर्ण सवाल है, और अभी एक जर्नी है, तमो गुण से रजो गुण, सत्व गुण, फिर उसके बाद में भक्ति, उसके बाद में शुद्ध भक्ति। इसके ऊपर हम कह सकते हैं बाद में गौड़ीय वैष्णव भाव में शुद्ध भक्ति, राधारानी के भाव में शुद्ध भक्ति, अगर जा सकते रहते हैं। तो अभी कृष्णभावनामृत आंदोलन का उद्देश्य क्या है? अभी कुछ भक्तों में भी अलग-अलग विचार हैं।
अगर हम देखेंगे प्रभुपाद जी ने एम्फेसिस किया है कि अगर मैं एक शुद्ध भक्त भी बना सकूँ, तो मैं गीता लिखने को यशस्वी मान लूँगा। और उसके लिए, तो वो एक तरह से प्रभुपाद जी का उद्देश्य था। तो हमें सबको वहां तक पहुंचाना, यह एक तरह से उद्देश्य कह सकते हैं। तो अगर कहीं भी हों, उनको हमें यहां तक पहुंचाना, यह डेस्टिनेशन महत्वपूर्ण है, कोई कह सकता है। पर अगर हम एक पर्सपेक्टिव से देख सकते हैं, पर दूसरा पर्सपेक्टिव उसे दूसरे छाता से देख सकते हैं।
तो प्रभुपाद जी का उद्देश्य बताया है, उसमें पहला उद्देश्य क्या बताया है कि “to correct the imbalance of material and spiritual values by systematic education”। तो अभी यह बहुत जनरल (general) है। भौतिकवाद बढ़ गया है, तो आध्यात्मिक ज्ञान देकर जो भौतिकवाद का थोड़ा प्रतिकार किया जाए। तो यह एक तरह से कह सकते हैं यह बहुत जनरल है।
कोई अभी यहां से तमस से सत्व तक लाना किसी को, यह भी एक तरह से… तमो गुण में लोग भौतिकवादी भी नहीं होते, वो भौतिकवादी मनो-कल्पना में रहते हैं। इंद्रियतृप्ति में, लोग कुछ भोग करेंगे, लोग इंद्रियतृप्ति… रजो गुण में शायद कुछ डेटिंग (dating) करेंगे किसी से, संबंध लेंगे, रोमांटिक एन्जॉयमेंट (romantic enjoyment) लेंगे। तमो गुण में लोग टीवी के सामने बैठकर देखेंगे, कोई और एन्जॉयमेंट कर रहा है, उसका सेकंड हैंड (second-hand) कल्पना से एन्जॉयमेंट करेंगे।
तो वो तमो गुण में भौतिक स्तर पर लोग कार्य नहीं कर रहे हैं। तो कोई कहेगा कि मैं रजो गुण, तमो गुण से… इस्कॉन के द्वारा जो प्रेरित लोग हैं, और प्रेरणा लेकर जो कर रहा है, उसको हम कह सकते हैं This is the Krishna Consciousness Movement. The Krishna Consciousness Movement जो है, यह इस्कॉन से और बहुत बड़ी है। इस्कॉन एक संस्था है, और संस्था से लोग प्रेरित होते हैं, पर प्रेरित होकर भक्त भाव बहुत कुछ कर सकते हैं।
अगर मान लीजिए भक्तों के सत्संग में आकर कोई प्रेरित हो जाता है, और फिर कोई गोशाला चालू करता है, कोई भक्त चालू करता है, तो वो शायद इस्कॉन के नाम नहीं होगी, उनकी गोशाला होगी। पर वो कृष्ण भावना के प्रिंसिपल से प्रेरित होकर की गई है।
इस्कॉन संस्था की भूमिका और राजनीति में तटस्थता
तो अभी जो इस्कॉन है? It’s an international organization. अंतरराष्ट्रीय में तो अलग-अलग कंसीडरेशंस (considerations) रखने पड़ते हैं, कि हम भारत में मेजॉरिटी (majority) में हैं, पर कहीं और देशों में हम माइनॉरिटी (minority) में हैं। तो if we identify say too much, किसी एक पोलिटिकल मूवमेंट के साथ हम बहुत ज़्यादा आइडेंटिफाई करते हैं, तो भारत में शायद उसके लिए अच्छा होगा हमारे लिए, पर उसके कारण दूसरे देशों में हमें प्रतिकूल परिणाम हो सकता है।
तो इसलिए कई ऐसी चीज़ें हैं जो इस्कॉन शायद नहीं कर सकती है, पर इसका मतलब यह नहीं कि इस्कॉन के भक्त नहीं कर सकते हैं, जो डिफरेंस (difference) है, समझना ज़रूरी है। तो क्या इस्कॉन डायरेक्टली शायद पॉलिटिक्स (politics) में नहीं जाएगा, इस्कॉन डायरेक्टली पॉलिटिक्स में नहीं, पर इस्कॉन के भक्त अगर कोई पॉलिटिक्स में एंटर करना चाहता है, तो कोई उन्हें रोक नहीं रहा है, वो करना चाहते हैं, ज़रूर कर सकते हैं।
पाश्चात्य देशों में, इंग्लैंड में इस्कॉन का काफी प्रभाव है। बाकी अमेरिका बहुत बड़ा देश है, भक्त हैं पर इतनी मात्रा में नहीं हैं। तो अभी जब भी इंग्लैंड में इलेक्शंस (elections) होते हैं, तो इंग्लैंड में दो पार्टीज़ हैं, एक लिबरल है, एक टोरी पार्टी है, दूसरी लेबर पार्टी है। तो वो दोनों पार्टी के लोग जो हैं, हमारे मंदिर में आते हैं। और दोनों मंदिर में आके भी, वहाँ पर जो पॉलिटिशियन थोड़े रिफाइंड (refined) होते हैं, “मैं आपकी कम्युनिटी के लिए, आपकी कम्युनिटी के लिए क्या करूँगा, क्या किया है, क्या करने वाला हूँ।”
तो वह क्या करते हैं, हमारा संडे प्रोग्राम होता है, एक हफ्ते में वह एक पॉलिटिकल पार्टी को आने को बोलते हैं, और अगले हफ्ते दूसरी पॉलिटिकल पार्टी को। और अगले इलेक्शन में, वह दूसरी पार्टी जो पहले आयी थी, वह पहली बार आयी थी। तो मतलब, वह उस तरह से, we are neutral, but that does not mean we are indifferent। यह डिफरेंस अलग है। न्यूट्रल मतलब हम किसी एक पार्टी को सपोर्ट नहीं कर रहे हैं, पर इसका मतलब नहीं है कि हमें उस पॉलिटिशियन से कुछ लेना-देना ही नहीं है।
तो अभी इंडिया में ऐसे कर सकते हैं, नहीं कर सकते हैं, वह बात अलग है। आपको पॉलिटिशियन से कुछ लेना देना है, आपको पॉलिटिशियन से कुछ लेना है, आपको पॉलिटिशियन से कुछ लेना है, आपको पॉलिटिशियन से कुछ लेना है, आपको पॉलिटिशियन से कुछ लेना है, आपको पॉलिटिशियन से कुछ लेना है, आपको पॉलिटिशियन करते हैं।
श्रोताओं के अनुसार प्रचार और समान विचारधारा वाले भक्तों का संग
ऐसे नहीं है कि भक्ति के दृश्य से भी देखेंगे हम, हम जानते हैं “आदौ श्रद्धा, साधु संग, भजनक्रिया”, ऐसे करते हैं भजनक्रिया, अनर्थनिवृत्ति, ऐसे करके वो भाव, प्रेम तक जाते हैं। तो अभी हम भी देखते हैं हमारे मंदिरों में, हमारी संस्था पिवोट (pivot), हमारी संस्था में, अलग-अलग प्रचारक हैं। कुछ प्रचारक हैं, वो अधिकांश निवृत्त करून Myanmar क्या वारे मьюल हुईüs्य पिस энनरेतठे वाले लेगी। तो नए लोग पहुँच जाएंगे, तो तभी श्रद्धा जागृत करना है एक तरह से।
तभी जब मैं भक्ति के बारे में नहीं बोलने वाला हूँ। पहले अध्यात्म में श्रद्धा जागृत करनी है। और फिर वो क्यूरियोसिटी (curiosity) से आगे बढ़ सकते हैं। प्रभुपाद जी ने एक बड़ा छाता बनाया है एक तरह से। और उसमें अलग-अलग छोटे छाते हम उठा सकते हैं। तो भक्त इंडिविजुअली बहुत कुछ कर सकते हैं। हम कुछ करना चाहते हैं। यह पहला पॉइंट है। कृष्णा और कृष्णा कॉन्शसनेस बहुत अलग हैं।
दूसरा पॉइंट है कि हम सबको लाइक-माइंडेड (like-minded) एसोसिएशन ज़रूरी है। न केवल भक्तों का संग चाहिए, पर जो समान विचारधारा वाले हैं। संस्कृत में क्या बात है? सजातीय। सजातीय भक्तों का हमें संग ज़रूरी है। एसोसिएशन मतलब हमें एक लाइक-माइंड ज़रूरी है। तो मैं ये लाइक-माइंड के तीन क्राइटेरिया बोलता हूँ।
पहले, हमें एसोसिएशन ज़रूरी है। कि वो अगर कुछ बोलते हैं, कुछ समझाते हैं तो हम समझते हैं वो। कुछ-कुछ लोग ऐसा लेक्चर देते हैं, हमको शास्त्रों के बारे में कुछ सवाल है और एक शास्त्र का एक पॉइंट समझाने के लिए और शास्त्र का एक दूसरा कोट (quote) दे देते थे। पर मैं लॉजिकली कैसे समझ सकता हूँ?
शास्त्रों में बताया है, स्वीकार करो, हमको कभी जमता नहीं है। हम उनकी मदद के लिए अतीकता होते हैं और अगर वे अतीकता होते हैं कि हम जिस पर विचार कर रहे हैं… कभी-कभी हम किसी को सवाल पूछते हैं, “तुम इतने भावुक क्यों हो गए हो? तुम इतने ज्ञानी क्यों हो गए हो? तुम ऐसे क्यों हो गए, तुम ऐसे क्यों हो?” हम कहते हैं “सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं”, पर हम सबको उपाधि दे… सबको उपाधि दे hacemos
इस्कॉन और विचारधारा का संरक्षण
तुमने… व्यक्ति करते हैं। इस्कॉन कोई स्कूल नहीं खोलते हैं। इस्कॉन के भक्त जो हैं, वह स्कूल बनाते हैं, शायद इस्कॉन का नाम है, इस्कॉन का नाम नहीं है, पर वही एक तरह से मिशन हैं। तो ऐसे नहीं खोलते हैं। क्षत्रिय एरिया, क्षत्रिय एरिया मतलब कि नहीं है, क्षत्रिय के पर… दूसरा है एडवोकेसी (advocacy)। एडवोकेसी का मतलब क्या है? एक तरह से सिक्योरिटी इन टर्म्स ऑफ नैरेटिव्स (security in terms of narratives), कि हमारे क्या कंसर्न्स (concerns) हैं, हमारी क्या विचारधारा है, हमारी दृष्टि से ये कैसे हो रहा है, वह हमें बताना ज़रूरी है।
अगर हम नहीं बताएंगे हमारी कहानी, तो कोई और बताने वाला है, और वो शायद हमारी परिस्थिति अपनी पद्धति से बताएंगे। तो इसलिए अभी क्या है कि हमारा कर्तव्य क्या है? न केवल हमारा संरक्षण करना, पर हमारी जो विचारधारा है, उसको भी बताना। अभी पांडव जब वनवास में चले जाते हैं, तो क्या होता है? वो 14-13 साल तक वनवास में रहते हैं, और उस समय में दुर्योधन अपनी कहानी बता रहा है, और उसके कारण दुर्योधन अपनी कहानी बता रहा है, पांडव वनवास में रहते हैं, दुर्योधन अपनी कहानी बता रहा है, पांडव वनवास में रहते हैं, दुर्योधन अपनी कहानी बता रहा है, दुर्योधन अपनी कहानी बता रहा है।
पहले जब कृष्ण के कारण बलराम जी मिलने आते हैं, तो “सब कुछ जो हुआ वो तुम्हारी तो गलती थी, तुम्हें किसी ने जुआ खेलने को बोला नहीं, तुम्हें किसी ने द्रौपदी को दांव पे लगाने को बोला नहीं, तुम्हें किसी ने तुम्हारा राज्य पूरा दांव पे लगाने को बोला नहीं।”
तीन कारण: ईश्वर, जीव, और प्रकृति
पर अगर हम देखते हैं, भगवद गीता में क्या बताया जा रहा है? “उपद्रष्टानुमन्ता च” (Upadrashta Anumanta Cha)। अनुमन्ता मतलब परमिटर (Permitter), भगवान इजाजत दे रहे हैं। क्या भगवान हर कार्य कर रहे हैं? कैसे इस जगत में जो कार्य होते हैं, actions in this world, उनके तीन कारण होते हैं— God’s will, free will, और evil। मतलब क्या? ईश्वर, जीव, और प्रकृति।
मतलब क्या है यहां पे, कि भगवान की इच्छा सर्वश्रेष्ठ है, पर भगवान ने सबको स्वेच्छा दी है, और हर जीव अपनी स्वेच्छा के अनुसार कार्य करता है। और फिर कुछ जीव ऐसे होते हैं, अभी हमारे शास्त्रों में कोई शैतान जैसा कोई ईविल (evil) व्यक्ति नहीं है, पर जो व्यक्ति के हृदय में ही ऐसे बहुत बुरे संस्कार हो जाते हैं, ऐसे इम्प्रेशंस (impressions) हो जाते हैं, कि व्यक्ति एक तरह से पत्थर दिल जैसा बन जाता है।
ऐसे आजकल की भाषा में इनको साइकोपैथ (psychopath), सोशियोपैथ (sociopath) कहते हैं, कि उनमें कुछ कॉन्शियंस (conscience) है ही नहीं, कुछ व्यक्ति… बुद्धि है ही नहीं। साधारणतया हम कुछ करते हैं, किसी को दर्द होता है उससे, तो हमें पता चलता है कि उनको दर्द हो तो हम माफ़ी माँगते हैं, “मेरा उद्देश्य नहीं था वो,” ऐसे। पर कुछ लोग दूसरों को दर्द देने में, उनको कभी कुछ हिचकिचाहट नहीं होती है, तो वो क्या है, वो ईविल (evil) संस्कार हो गया है उनमें।
भगवान परम कारण हैं, एकमात्र कारण नहीं
तो बेसिकली (basically) जब इस जगत में कोई एक्शन (action) होता है, किसी के साथ कोई इवेंट (event) हो रहा है, कोई प्रसंग हो रहा है, तो अभी ऐसे नहीं है कि वो होना भगवान की इच्छा थी। अभी, let’s take it… थोड़ा एक्सट्रीम (extreme) से लेते हैं हम। अभी कुछ लोग कहते हैं, जो भी करते हैं, भगवान ही परम कर्ता है। ठीक है, हम कह सकते हैं ऐसे, कि भगवान कर्ता है, तो क्या इसका मतलब है कि भगवान दुशासन के माध्यम से, द्रौपदी का वस्त्रहरण कर रहे थे?
तो बेवकूफी ही हो जाएगी, यह एक पूरी… दुशासन है, वो दुशासन कर रहा था, अभी भगवान नहीं कर रहे थे, भगवान उसको बचा रहे थे। तो कृष्णा’s विल (Krishna’s will), कृष्णा जो हैं, He is the ultimate cause। और अगर… यथार्थ है, He is not the sole cause। तो सोल (sole) मतलब अकेले कारण हैं। तो यथार्थ मतलब क्या है, वेदांत सूत्र में उदाहरण दिया गया है, कि अगर बारिश नहीं होगी, तो इस जगत पे कुछ भी नहीं उगेगा। तो जो भी उग रहा है, उसका परम कारण जो है बारिश है। पर इसका मतलब यह नहीं कि क्या कहाँ उग रहा है, वो बारिश उसके लिए ज़िम्मेदार है।
यह भगवद गीता के नौवें अध्याय के छटे श्लोक में बताया गया है: “यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्। तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥”
कर्म, क्षेत्र और स्वेच्छा
तो मान लीजिये कि अभी यह जो आसमान है, आसमान में एक हवा जाती है, आगे जाती है, पीछे जाती है… हाँ। ऊपर जाती है, नीचे जाती है, आगे जाती है, पीछे जाती है, यह आसमान के दायरे में रहकर ही। यह समझो एक आसमान है, यह जीवात्मा का खेल है। और यहाँ जैसे जीवों को है, हालांकि… पर अंदर जीव इधर जा सकता है। वैसे ही जीव अभी, एक तरह, कभी-कभी, जीव अपनी स्वेच्छा का सदुपयोग… दुरुपयोग करके कुछ कार्य करता है। और जब वो कार्य करता है, तो वो भगवान नहीं कर रहे हैं, वो जीव कर रहा है। भगवान उसको वो कार्य करने का मौका दे रहे हैं। ये भगवान क्यों मौका दे रहे हैं?
तो अभी इसका कारण क्या है? इसके लिए एक संकल्पना आती है उसको कहते हैं एक क्षेत्र। क्षेत्र मतलब क्या? कि हर जीव का प्रभाव की शक्ति। छोटा नवजात शिशु है, क्या है तो थोड़ा गुस्सा हो जाता है, तो वो क्या करेगा? या तो अपने हाथ पैर हिलाएगा, वो अपनी मां को, किसी को लात भी मारेगा। तो उसकी शक्ति क्या है? लात मारने की। पर कोई एक हट्टा-कट्टा युवक है, वो गुस्सा हो जाएगा, वो किसी को लात मारेगा, किसी को पीटेगा, तो उससे बहुत कुछ प्रभाव हो जाएगा।
अगर कोई पुलिस में है, उसके पास मशीन गन है, वो गुस्सा हो जाएगा तो किसी को गोली मार सकता है। अगर अमेरिका या रशिया के अध्यक्ष जो हैं, वो गुस्सा हो जाएंगे, एक न्यूक्लियर बटन दबा देंगे, एक पूरे राष्ट्र का विनाश हो जाएगा। तो हर एक व्यक्ति का अलग-अलग क्षेत्र होता है। और वो क्षेत्र कैसे आता है? उनके पूर्व कर्म से आता है। तो हर एक व्यक्ति को अपने पूर्व कर्मों से अपना क्षेत्र मिला है, और उस क्षेत्र में वो जो करना चाहते हैं वो कर सकते हैं, उतनी जगह भगवान उन्हें देते हैं। आकाश बताया था, तो वो क्या है? हम सबका क्षेत्र है। अलग-अलग लोगों का अलग क्षेत्र है।
अच्छे और बुरे कर्मों का प्रभाव
अभी मान लीजिए किसी को पता चलता है कि यहाँ पर एक बैंक है, और बैंक में बहुत पैसा आ गया है। तो दस चोर हैं, योजना करते हैं, अलग-अलग दस चोर हैं, योजना करते हैं कि हम चोरी करें। उनमें से एक चोर यशस्वी (सफल) होता है, बाकी सब होता है यह कुछ हो गया, वो हो गया, यशस्वी नहीं होते। तो अभी वो एक चोर यशस्वी क्यों हुआ है? अभी रॉबिंग (robbing), ये जो है, ये बैड कर्मा (bad karma) है। पर सक्सेस इन रॉबिंग (success in robbing), ये रॉबिंग, चोरी करना ये बुरा कर्मा है, पर बुरे कर्मा में भी यश प्राप्त करने के लिए गुड कर्मा चाहिए।
तो साधारणतया हम प्राप्त कर्मा के लिए गुड कर्मा करते हैं, और सक्सेसफुल… पर पाप कर्मा करना… यह कोई कुछ कार्य करना चाहता है, कुछ आतंकवादी कुछ बिल्डिंग को उड़ाना चाहते हैं, यह बुरा कार्य है। पूरे कार्य के लिए बहुत योजना करना पड़ता है, बहुत प्लानिंग (planning) करना पड़ता है, ये वो सब करना पड़ता है, उसके बाद में भी यशस्वी कब होता है? जब उस व्यक्ति का पूर्व कुछ बुरा… अच्छा कर्म हो। अभी वो अच्छे कर्म से अगर कुछ अच्छा प्रोजेक्ट कर देते थे, उसमें भी यशस्वी हो जाता था वो। पर उसने वो अपने अच्छे कर्म को बुरी दिशा में इस्तेमाल किया।
तो भगवान हमारे पूर्व कर्म के अनुसार हमें कुछ क्षेत्र देते हैं। तो जब क्षेत्र दिया है, उसमें हमें क्या करना है, वो हम पे निर्भर है। अगर हम कुछ बुरा करना चाहेंगे, तो जितना क्षेत्र है और जितने समय तक वो क्षेत्र है, उस समय तक हम कुछ कर सकते हैं। अभी कोई अमेरिका का राष्ट्रपति है, आज राष्ट्रपति है, तो वो बहुत कुछ कर सकता है। पर वो कल राष्ट्रपति नहीं होगा, तो उसका क्षेत्र बहुत कम हो जाएगा। अभी अमेरिका जो राष्ट्रपति है, वो राष्ट्रपति है, पर राष्ट्रपति नहीं है, कुछ शक्ति है या नहीं उसके पास, तो एक तरह से क्षेत्र होते हुए भी क्षेत्र नहीं है।
तो जब हमारे पास कुछ क्षेत्र नहीं है, तो दुशासन को अपने पूर्व कुछ क्षेत्र मिला था, क्षेत्र के रूप में शक्ति थी, क्षेत्र के रूप में एक पद था। अभी उसका वो सदुपयोग कर सकता था, दुरुपयोग… उसने बड़े ही घृणित स्तर पर दुरुपयोग किया।
“क्षेत्र जो मिला है, उसमें भी वो अच्छा कर्म करना है या बुरा कर्म करना है? तो वो भी उसका पास्ट कर्म ही डिसाइड करेगा न फिर?” (प्रश्न)
क्या आपका प्रश्न है, तो एक प्रारब्ध कर्म ने… ऐसे कहें, हमारे पूर्व कर्मा… केवल… कुछ पूर्व ये कर्म जो हैं हमें विवश करते नहीं हैं। तो We are impelled but we are not compelled.
कर्म की प्रवृत्ति और हमारा चुनाव
कि मान लीजिए किसी ने शराब पी है, बहुत शराब पी है। तो अभी शराब की दुकान के सामने जाएगा वो, तो उसे शराब पीने की इच्छा आ जाएगी। पर ऐसे नहीं है कि कोई आ रहा है, तो तुम्हें शराब पीने की ज़बरदस्ती है। वो ज़बरदस्ती नहीं है। तो वो इम्पेल्ड (impelled), तो क्या होते हैं? इम्पेल्ड मतलब पुश्ड (pushed)। हमें एक इंक्लिनेशन (inclination) होता है कि ऐसे कार्य करो। पर वी आर नॉट कम्पेल्ड (compelled)। कम्पेल्ड मतलब ज़बरदस्ती।
तो हमारे पूर्व कर्मों से हमें कुछ प्रवृत्तियां आती हैं, पर वो प्रवृत्ति के अनुसार कार्य करना है या नहीं करना है, वो हमें फैसला करना है। “प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये,” भगवान कहते हैं कि जो बुद्धिमान व्यक्ति है वो समझता है, सात्विक बुद्धि समझता है कौन सी प्रवृत्ति से कार्य करना है, कौन सी प्रवृत्ति से कार्य नहीं करना है। पर सिर्फ मुझमें प्रवृत्ति है, इसका मतलब मुझे कार्य करना है, ऐसे नहीं है।
पूर्व कर्म से हम प्रभावित होते हैं, पर अभी हमारी स्वेच्छा है, और स्वेच्छा से हम प्रभावित कर सकते हैं: “हाँ मुझे ऐसे करने की इच्छा आ रही है, पर मैं ऐसे नहीं करूँगा।” और अगर अच्छे वातावरण में होता है, अच्छे लोगों के साथ रहता है, सत्संग में आता है, भक्ति करता है, तो फिर पूर्व कर्मों का जो प्रभाव होता है वो और कम हो जाता है। पर ऐसे नहीं है कि क्योंकि दुर्योधन का एक परिवार में जन्म हुआ था, यहाँ पर उसको आसुरी कार्य करने वाला था, वो नहीं कर सकता था, पर उसने चुना करने के लिए। यहाँ पर दुर्योधन का एक परिवार में जन्म हुआ था।
बहुत बहुत धन्यवाद! श्री कृष्ण भगवान की जय! श्रील प्रभुपाद की जय! गौर भक्त वृंद की जय! निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!