Hindi Radharani’s Selfless Love Pune
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Lecture Summary
राधा तत्व और श्रीमती राधारानी की महिमा: प्रवचन का सारांश
यह प्रवचन राधाष्टमी के अवसर पर श्रीमती राधारानी की दिव्य भक्ति, उनके निस्वार्थ प्रेम (राधा भाव) और श्रील प्रभुपाद द्वारा उस भाव को पूरे विश्व में फैलाने पर केंद्रित है। प्रवचन को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा गया है:
- भगवान की युगल संकल्पना (Bi-monotheism): परम सत्य केवल एक नहीं, बल्कि एक दिव्य युगल (राधा-कृष्ण) के रूप में हैं। राधारानी केवल ‘सर्वश्रेष्ठ भक्त’ ही नहीं हैं, बल्कि वे सभी प्रकार की ‘भक्ति का मूल स्रोत’ (ह्लादिनी शक्ति) हैं। किसी भी भक्त के हृदय में जो भी भक्ति है, वह राधारानी की ही कृपा से आती है।
- परकीय रस और प्रेम का प्रकटीकरण: राधा और कृष्ण का संबंध ‘परकीय रस’ (विवाहित न होने का भाव) में है। यह कोई भौतिक या अनैतिक संबंध नहीं, बल्कि ‘दिव्य नैतिकता’ है। लीलाओं में जानबूझकर जो विरोध (Tension) लाया जाता है, उसका उद्देश्य प्रेम की शक्ति और गहराई का प्रदर्शन करना है, ठीक वैसे ही जैसे विरोध के समय हाथी की असली शक्ति का पता चलता है।
- निस्वार्थ प्रेम और सखियों की चिंता: राधारानी का प्रेम पूर्णतः निस्वार्थ है। वन विहार लीला में जब कृष्ण उन्हें अकेले ले जाते हैं, तब भी वे अपने अकेले के आनंद के बजाय अपनी सखियों (गोपियों) की चिंता करती हैं कि वे कृष्ण के विरह में कितनी दुखी होंगी। यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति अकेले नहीं, बल्कि सभी भक्तों के साथ मिलकर की जाती है।
- विरह की अग्नि (Love in Separation): प्रेम एक अग्नि के समान है और विरह (Separation) वायु के समान। जिस प्रकार वायु दावाग्नि (जंगल की आग) को और भड़का देती है, उसी प्रकार भगवान से सच्चा विरह राधारानी और गोपियों के प्रेम को और तीव्र कर देता है। (जबकि कमज़ोर भक्ति मोमबत्ती की तरह होती है, जो थोड़ी सी हवा से बुझ जाती है)।
- श्रील प्रभुपाद का ‘राधा भाव’: जिस तरह राधारानी ने अपनी सखियों के लिए कृष्ण के अकेले के संग का त्याग किया, उसी तरह श्रील प्रभुपाद ने पूरे विश्व के उद्धार के लिए वृन्दावन के अपने आरामदायक जीवन का त्याग किया। उन्होंने पाश्चात्य देशों में जाकर प्रचार किया ताकि जो लोग भगवान से दूर हैं, उन्हें भी कृष्ण भक्ति का आनंद मिल सके।
Full Transcription
राधारानी की महिमा और कुंजबिहारी का सौभाग्य
हरे कृष्णा! मैं बहुत कृतज्ञ हूँ कि आज यहाँ पे आप सब के बीच में आ पाया हूँ, और कुंजबिहारी से ही मेरा आध्यात्मिक सफर चालू हुआ था। अब ये मंदिर इतना सुन्दर रूप से भी रीक्रिएट हुआ है, आप सब का सेवा भाव का प्रतीक है, और आप सब का सौभाग्य भी है ये कि कुंजबिहारी की महिमा और फैल रही है और आप सब उसमें सहयोगी हैं।
तो आज हम राधाष्टमी के अवसर पर श्रीमती राधारानी की दिव्य भक्ति के बारे में हम चर्चा करेंगे। मैंने कुछ समय पहले राधा तत्व की महत्ता पर कुछ लिखा है, जो राधारानी के भाव के लिए है, उसका सार क्या है। उसमें अनेक एक चीज़ें हैं। पर उसमें उनका राधा भाव का अर्थ क्या है? और फिर आखिरी में हम कैसे श्रील प्रभुपाद जी जो हैं, वो किस तरह से राधारानी के भाव को सारे विश्व में खुद दर्शाया उन्होंने और कैसे उन्होंने उसको फैलाया। तो प्रभुपाद से राधा भाव। तो ये तीन विषयों पर हम चर्चा करेंगे।
भगवान की संकल्पना और राधा तत्व
अभी सारे विश्व भर में लोगों की भगवान के बारे में अलग-अलग संकल्पनाएं हैं। कुछ समय पहले, तीन-चार महीने पहले, तो वहाँ पर मुझे एक अमेरिकन विद्यार्थी दिखा रहा था, कि किस तरह से आजकल अभी भारतीय विश्व के बारे में अलग-अलग संकल्पनाएं हैं। तो लोग इतने भगवानों की पूजा, इतने देवों की पूजा क्यों करते हो तो? तो लोगों की पूजा के बारे में अलग-अलग संकल्पनाएं हैं।
पर पूजा के बारे में है कि लोगों के बारे में अलग-अलग, यह एक प्रतिबिंब (reflection) है, और जो आध्यात्मिक जगत है, वह सत्य है। जो यहां पर है, वो वहां पर भी है। और उल्टा यह कह सकते है, जो वहां पर है, वो यहां पर है। पर इस जगत में जो प्रतिबिंब होता है, तो वो प्रतिबिंब कभी-कभी विकृत हो जाता है। कोई बहुत आकर्षक व्यक्ति दिखने वाला होगा, वो उनका प्रतिबिंब अपने पानी में देख रहे हैं, और वो पानी में पत्थर डाल लेगा, तो प्रतिबिंब पूरा विकृत हो जाएगा। तो उस तरह से वो जो परम सत्य है, वही सत्य यहाँ पे आती है।
तो ऐसे बताया गया है कि अभी जो परम सत्य है, वो भगवान है, वो केवल एक नहीं है। भगवान जो हैं, वास्तव में हमेशा एक डिवाइन कपल (Divine Couple) के रूप में होते हैं। सीताराम, लक्ष्मीनारायण, वैसे ही राधाकृष्ण। तो भगवान जो हैं, इसको इंग्लिश में कहते हैं, एक भगवान हैं, उनको मोनोथीज़म (Monotheism) कहते हैं, एक भगवान को हम मानते हैं। इसके विपरीत देखे हैं, अनेक भगवान हैं, वो पॉलीथीज़म (Polytheism) कहते हैं। तो वैदिक शास्त्र है, वास्तव में कहा है, वो बाय-मोनोथीज़म (Bi-monotheism) है। एक भगवान है, पर उनके दो रूप हैं।
राधा कृष्ण एक आत्मा, दुइ देह धरि।
एक व्यक्ति हैं वो, उन्होंने देह अलग प्राप्त किये हैं। दो व्यक्ति में देह लिये हैं। वो एक ही तनु धरि वो हैं। तो भगवान और उनकी जो रानी है, उनकी जो भार्या है, उनमें दिव्य लीलाएं होती हैं। तो अब लक्ष्मी या सीता या राधा, ये एक अपने ही तत्व हैं। उनको शक्ति तत्व कहते हैं।
राधारानी: सर्वश्रेष्ठ भक्त और भक्ति का स्रोत
और अभी खास करके अभी राधारानी, दो प्रमुख भूमिकाएं हैं। एक है कि वो सर्वश्रेष्ठ भक्त हैं। और वो क्यों सर्वश्रेष्ठ भक्त हैं, उसके बारे में थोड़ी चर्चा करेंगे। तो वो सर्वश्रेष्ठ भक्त हैं, और उसके साथ-साथ, वो जो हैं, वो सारी भक्ति की स्रोत हैं। मतलब क्या है, कि वो केवल, अभी अनेक भक्त हो सकते हैं, उनमें से यह सर्वश्रेष्ठ भक्त हैं। और यह एक संकल्पना है। ठीक है वो संकल्पना, पर वो पूर्ण संकल्पना नहीं है। यह क्या है, she is not just the best devotee, she is the basis of all devotion. जिसमें भी जो भक्ति है, वो सब राधारानी से आती है।
मतलब अनेक भक्त हो सकते हैं, और सब महान भक्त हो सकते हैं। अभी कैसे टेनिस में टूर्नामेंट होता है, तो एक नंबर वन होता है, फिर नंबर टू, नंबर थ्री, नंबर फोर, ऐसे होता है। पर अभी जो नंबर वन है, ऐसे नहीं है कि वो नंबर वन प्लेयर, बाकी सारे टेनिस प्लेयर के टेनिस की शक्ति का स्रोत है वो। नहीं, वो दूसरा, तीसरा, चौथे नंबर का है, वो अगर अच्छा खेलेगा, तो वो कभी एक नंबर वन बन सकता है। तो अभी ये जो है, हाइरार्किकल (Hierarchical) विचार है। सर्वश्रेष्ठ भक्त है, पर ऐसे नहीं है वो। उसके साथ क्या है, जिसमें भी जो भक्ति है, वो सब राधारानी से आती है। यशोदा माई की भक्ति भी राधारानी से आती है। सब की भक्ति जो है, राधारानी से आती है।
तो मतलब, इसके बारे में बताया गया है कि, ह्लादिनी करावय कृष्णानन्द आस्वादन। जो ह्लादिनी शक्ति है, वो राधारानी है, वो कृष्ण को बड़ा संतुष्ट करती हैं। और ह्लादिनी करावय भक्त हृदय पोषण। क्या करती हैं उसके साथ-साथ? वो हृदय को पोषण करती हैं। तो ये कोई साधारण पुरुष और स्त्री का ऐसा संबंध नहीं है। दोनों दिव्य भगवान हैं।
परकीय रस और राधा-कृष्ण संबंध की दिव्यता
और अभी उनका जो संबंध है वो समझना इतना ज़रूरी है। कई बार लोग उसको गलत समझ जाते हैं। कभी-कभी लोग उसको गलत दर्शाते हैं। अभी कुछ समय पहले ही राधाष्टमी के अवसर पर किसी कैंपेन जिसमें उन्होंने राधारानी का जो डिपिक्शन (depiction) किया था वो थोड़ा अश्लील जैसे हो गया था। उसका काफी विरोध हुआ फिर। तो क्या है कि ये भौतिक धारणाएं जो हैं, हम उस दिव्य व्यक्तित्व पे हमें ये लाना अच्छा नहीं है, उचित नहीं है।
प्रभुपाद जी इसके बारे में बहुत चौकन्ने थे। मेरे एक मित्र हैं, वो हैं एक दक्षिण भारत के स्मार्त ब्राह्मण परिवार जैसे हैं, आये हैं वो तो, वो कह रहे हैं कि तुम हरे कृष्णा वाले तुम सब कुछ उल्टा करते हो। तुम कृष्णा को बुलाते हो, तो कृष्णा को कुछ आदर ही नहीं देते तुम। श्री कृष्णा, भगवान कृष्णा, कुछ नहीं बोलते तुम, कृष्णा ही बोलते हो उनको सिर्फ। और जो राधा को, उसके लिए डबल टाइटल डाल दिया आपने। श्रीमती भी है और रानी भी है। ऐसे क्यों है कि राधा को डबल आदर दे रहे हो, कृष्णा को कुछ आदर ही नहीं दे रहे हैं आप।
तो मैंने बताया, ऐसे नहीं है। सबसे पहले, प्रभुपाद जी ने कृष्णा के लिए एक पूरा टर्म (term) बनाया। कृष्णा या श्री राधा बोलके संबोधित करते थे। तो प्रभुपाद जी ने खास करके क्या किया, जो राधा को कई बार चीपली (cheaply) लिया जाता है कि उनका जो प्रेम है उसको समझना थोड़ा मुश्किल हो जाता है, तो वहाँ भौतिक प्रेम समझ लेते हैं कभी-कभी कुछ लोग, तो उसको अनैतिक प्रेम समझ लेते हैं। तो वह ऐसा न हो, हम याद रखें हमेशा कि ये एक बहुत दिव्य व्यक्ति हैं, इसलिए वो उनको श्रीमती राधारानी कहा करते हैं।
तो अभी राधारानी का जो कृष्ण से संबंध है वह एक तरह से वो माधुर्य रस में है। और जो माधुर्य रस में हैं कि न केवल माधुर्य रस में हैं, माधुर्य रस मतलब क्या है जो कृष्ण एक पुरुष के रूप में हैं, राधारानी एक स्त्री के रूप में, तो उनमें जो संबंध होता है उसको माधुर्य श्रृंगार कहते हैं। तो माधुर्य रस में वो परकीय भाव में हैं।
परकीय भाव: विरोध से प्रेम का प्रकटीकरण
अब यह परकीय भाव का मतलब क्या है कि जब यह संबंध होता है, मान लीजिये कोई नाटक चल रहा है अभी, उस नाटक में कोई हीरो है, कोई हीरोइन है, तो मान लीजिये, वो असली जीवन में विवाहित हैं, वह नाटक में अभिनय कर रहे हैं, पर वो जो नाटक में है कि उनका विवाह के रूप में संबंध नहीं है और फिर उनमें आकर्षण हुआ है, उनमें प्रेम हुआ है। तो अभी एक है वो नाटक का स्तर, एक है वास्तविक स्तर।
तो जो तत्व के स्तर पे, Krishna is the Lord of everyone. पतिं पतीनां परमं परस्तात्। कृष्णा सबके स्वामी हैं, तो कृष्णा राधारानी के भी स्वामी हैं। पर लीला के तत्व के स्तर पे उनका जो पूर्णतया सुप्रीमली मोरल (Supremely moral), पूर्णतया नैतिक संबंध है वो। पर लीला के स्तर पे अभी जो लीला में थोड़ा एक्साइटमेंट (excitement), थोड़ा टेंशन (tension), थोड़ा विरोध लाया जाता है।
मैं अमेरिका में कुछ साल पहले गया था, बहुत कॉलेज में लेक्चर हुए थे मेरे। तो मैं एक कॉलेज में जा रहा था, तो तभी कौनसे कॉलेज है यहाँ पर लेक्चर है वो देखा। इसका नाम है अमेरिकन इंस्टिट्यूट ऑफ इल्यूज़न (American Institute of Illusion)। क्या? अमेरिका की मोह की संस्था! उसका मतलब क्या है? कि वहाँ पर लोग कैसे मूवीज़ वगैरह बनाने हैं, कैसे इल्यूज़न क्रिएट करना है, उसका प्रशिक्षण देते हैं। तो यहाँ पर इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ इल्यूज़न नहीं कहते, फिल्म और ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट वगैरह कुछ कहते हैं, FTII होता है। तो मैं सोचा था कि यह अमेरिकन इंस्टिट्यूट ऑफ इल्यूज़न है। कि पूरा मोह माया बहुत है इसमें।
पर अभी जब मूवी बनाते हैं कोई, तो कभी सैकड़ों, हज़ारों मूवीज़ बनती हैं, पर अधिकांश मूवीज़ उसमें से फ्लॉप हो जाती हैं। क्यों फ्लॉप होती हैं वो? क्योंकि illusion is not good enough. कि जो मोह है, वो अच्छा नहीं है। कि जो किरदार का एक्टिंग अच्छा नहीं होता है, स्टोरी ऐसे होती है कि कोई बिलीव (believe) नहीं कर सकता है उसको, जो मोह क्रिएट कर रहे हैं वो अच्छे से नहीं क्रिएट किया है। बहुत बार कोई फिल्म, कोई स्टोरी है, उसमें एक प्रिंसिपल (principle) होता है, कि टेंशन (tension) बहुत ज़रूरी है।
अगर मान लीजिए कोई हीरो है, कोई हीरोइन है, दोनों मिलते हैं, दोनों में आकर्षण हो जाता है, तो दोनों का विवाह हो जाता है, कोई विरोध होगा ही नहीं, तो क्या होगा? उसमें कोई सस्पेंस (suspense) नहीं है, कुछ मज़ा नहीं आता है। तो क्या है, if there is no tension, then there is no attention. तो क्या है टेंशन एक तरह से ज़रूरी है। जब टेंशन होता है, तो उससे क्या होता है? सस्पेंस होता है, उससे एक्साइटमेंट होता है, उससे रोचकता बढ़ती है, क्या होने वाला है आगे? अभी कोई विरोध करने वाला कोई विलेन (villain) होता है, या विरोध करने वाली कोई परिस्थिति होती है, कोई जो हीरो-हीरोइन हैं, उनमें कोई कास्ट (caste) या कास्ट में ऐसे भेद होता है, कहीं न कहीं either some परिस्थिति or some situation, जो व्यक्ति या परिस्थिति, कोई न कोई तो विरोध होना चाहिए, तो उससे वास्तव में उसमें थोड़ा इंटरेस्ट (interest) होता है, रोचकता बढ़ती है।
तो उसी तरह से अभी राधा-कृष्ण में तो दिव्य रूप पे असीमित प्रेम है, पर अभी उनके प्रेम को विरोध करने के लिए वहाँ पे कौन है? कोई भी नहीं है! पर अगर विरोध करने वाला कोई नहीं होगा, तो क्या होता है? फिर उसमें कुछ एक्साइटमेंट नहीं होता है, उसमें इतनी रोचकता नहीं होती है।
तो अभी आचार्य उदाहरण देते हैं, अगर कोई हाथी है, उस हाथी को कोई बाँध दिया है, अभी हाथी बहुत शक्तिशाली हो सकता है, पर वो हाथी कितना शक्तिशाली है, वो अपने आप दिखता नहीं है, सिर्फ़ हाथी का शरीर होना चाहिए, बहुत बड़ा शरीर होता है, अच्छा है। पर अगर कोई हाथी आता है, मान लीजिए हाथी को इस खंभे से बांधा गया है, और वो हाथी खींचता है, और पूरा खंभा गिरने लगता है, वाह, इतना शक्तिशाली है हाथी! तो क्या है, ऐसे जो अपोज़िशन (opposition) होता है, opposition brings revelation, revelation of strength. जब विरोध होता है, तो उससे शक्ति कितनी है, उसका प्रदर्शन होता है, वो एक हाथी के रूप में।
तो उसी तरह से, जो राधा-कृष्ण की लीला है, उसमें, ऐसा परकीय भाव मतलब क्या होता है, यद्यपि तत्व के स्तर पर राधा-कृष्ण, ये हमेशा सदा से नैतिक, विवाहित, कृष्ण सब के स्वामी हैं, पर लीला के रूप में, वृन्दावन में, ऐसी योजना की जाती है, कि राधारानी कृष्ण से विवाहित नहीं हैं। तो फिर जब वो दोनों एक-दूसरे से मिलना चाहते हैं, तो तभी कुछ विरोध होता है, और जब विरोध होता है, तो उस विरोध का सामना करते हुए, उस विरोध के बावजूद, जब राधारानी कृष्ण से मिलने आती हैं:
पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवान् अतिविलङ्घ्य तेऽन्त्यच्युतागताः । गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः कितव योषितः कस्त्यजेन्निशि ॥
तो गोपीगीत में गोपियां बोल रही हैं कि सब हमको विरोध कर रहे थे, सारा समाज विरोध कर रहा था, उसके बावजूद हम यहाँ पे आये हैं। तो हम सब कुछ छोड़ के आपके पास आये हैं। कृष्णा तुम हमें छोड़ के कैसे जा सकते हो? कृपया लौट के आ जाओ। तो जब इतना सारा विरोध होता है, तो विरोध में जब राधारानी, गोपियां अपना प्रेम प्रदर्शित करती हैं, तो यह प्रकटीकरण है वो, उनके प्रेम का प्रदर्शन होता है, वो प्रेम का प्रकटीकरण होता है। तो यह परकीय रस का उद्देश्य ही यही है। वो अनैतिक नहीं है, इम्मोरल (immoral) नहीं है वो नैतिकता के परे है। मतलब इसके नीचे जो नैतिकता होता है, हम इम्मोरल कहेंगे, मोरल है वो। यह क्या है, ट्रांसेंडेंटल मोरल (Transcendental Moral), ये एक दिव्य नैतिकता है। जो नैतिकता ऐसा सेवा भाव है, वो केवल कृष्ण की प्रसन्नता के लिए है। और सब कुछ छोड़के राधारानी कृष्ण के पास आती हैं।
सर्वधर्मान्परित्यज्य: वास्तविक धर्म क्या है?
जो राधा तत्व का जो सार क्या है? कि कृष्ण के लिए सब कुछ छोड़ने को तैयार हैं।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
सर्वधर्मान परित्यज। मैं कनाडा में था, गीता जयंती का अवसर था तभी, तो तभी एक हिंदू कार्यक्रम था, वहाँ पर मुझे बुलाया था, गीता के प्रवचन देने के लिए। तो वहाँ पर कुछ लड़कों ने, कुछ छोटे लड़कों ने, कुछ गीता के श्लोक याद किये थे, और वो गा रहे थे तभी, रिसाइट (recite) कर रहे थे, तो तभी वो श्लोक पर आ गए, 18.66, वो सब ने रिसाइट किया: सर्व अधर्मान परित्यज्य, मामेकं शरणं व्रज। तो कुछ गलत लगा आपको? अधर्मान!
तो फिर मैंने उस ऑर्गनाइज़र (organizer) को पूछा, अरे श्लोक तो धर्मान है, आपने अधर्मान क्यों बोला? तो फिर, उसने बताया, कुछ… अभी प्रभुपाद जी की जो गीता है, भगवद गीता एज़ इट इज़ (Bhagavad Gita As It Is), वो बहुत विश्वविख्यात हो गई है, तो कई लोग हैं, उस पे पिगीबैक (piggyback) हो के, मतलब उसका श्रेय ले के, वो खुद अपनी गीता विश्वविख्यात करने का प्रयास करते हैं। तो किसी ने एक गीता लिखी है, भगवद गीता एज़ इट इज़, और उसने क्या किया है, उसकी गीता में उसने लिखा है, कि ये अभी कृष्ण धर्म संस्थापन करने के लिए आये हैं, तो कृष्ण कैसे कह सकते हैं कि आप धर्म को त्याग दो। तो जब गीता का पाठान्तर हो रहा था, लिखा जा रहा था, तो ओरिजिनली (originally) वहां पर ‘अ’ था, अब वो ओरिजिनली अ-धर्मान परित्यज्य था, तो कृष्णा कह रहे हैं अधर्म को त्याग दो। पर जब कोई लेखक लिख रहा था वापस, उसको तभी ‘अ’ डालने को भूल गए वो। तो जो वो भूल गए, मैं वापस डाल रहा हूँ!
तो इसलिए भगवद गीता एज़ इट वाज़ (As It Was)! और सोचा, ये क्या है? ये ऐसा मोह है, जैसे था, जैसे है, जैसे रहेगा। तो अलग-अलग लोग अलग-अलग भ्रांत धारणाएं लाएंगे। पर ये भगवद गीता में भाव क्या है? अभी अर्जुन को अधर्म त्यागने के लिए बोलने की ज़रूरत नहीं है। धर्म के ही गीता में लगभग सात अर्थ हैं। धर्म इस शब्द के संस्कृत में पांच सौ से अधिक अर्थ हैं। पर गीता में ही सात अर्थ हैं धर्म के। तो जब धर्म संस्थापनार्थाय बोल रहे हैं भगवान, समाज में नैतिक नियम लाने के उद्देश्य से बोल रहे हैं। पर जब यहां पे अर्जुन को बताया जा रहा है, तो अर्जुन का शुरुआत का सवाल ही यह है कि पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः। मैं जानना चाहता हूँ धर्म क्या है।
तो जो जानना चाहते हैं धर्म क्या है, उनको यह बताने की ज़रूरत नहीं कि अधर्म छोड़ दो आप। अगर कोई भारत से अमेरिका में जाता है, और वहाँ पे उनको कार का लाइसेंस मिल गया, कार ड्राइविंग करने वाले हो, तो वो पूछ रहे हैं, कहते हैं यहाँ पे ट्रैफिक (traffic) के रूल्स क्या हैं? अगर वो पूछ रहे हैं ट्रैफिक के रूल्स क्या हैं, तो उनको बताने की ज़रूरत है क्या कि ट्रैफिक के रूल्स मत तोड़ो आप? बताने की ज़रूरत नहीं है न। तो भगवान वहाँ पे सर्वधर्मान क्यों बता रहे हैं?
राधारानी का निस्वार्थ प्रेम और वन विहार लीला
क्योंकि भक्ति के अनेक स्तर होते हैं। तो प्रेम भक्ति सर्वोच्च स्तर है। तो राधारानी जो होती हैं, वो सोचती हैं कि मैं तो बड़ी आनंदित हूँ यहां पे, सिर्फ अकेले मुझे कृष्ण के साथ मौका मिल रहा है, पर सारी मेरी सखियां हैं उनकी क्या परिस्थिति हो गई होगी? वो कितना उनका हृदय टूट गया होगा, वो अकेले कैसे रह पाएंगी? तो वो बोलीं, I alone cannot enjoy Krishna. जब मेरी सारी सखियां इतने दुख में हैं, तो मैं कृष्ण के साथ कैसे भोग कर सकती हूँ? कैसे उनका संग सह सकती हूं?
तो अभी वो सोचती हैं मैं कृष्ण को तो रोक तो नहीं सकती, कृष्ण मुझे लेके जा रहे हैं अकेले। तो वो सोचती हैं क्या? I will slow Krishna down. मैं कुछ बहाना बनाऊंगी जिससे कि कृष्ण जब मुझे जंगल के अंदर ले जा रहे हैं, तो फिर अलग-अलग बहाने बनाने लगती हैं। “कृष्ण, ये फूल कितना सुन्दर है! क्या तुम मुझे ये फूल दे सकते हो?” कृष्ण तुरंत वो फूल निकालते हैं वृक्ष से और वो राधारानी को देते हैं। “ये भी फूल कितना अच्छा है, तो वो फूल ले सकते हैं।” तो अभी कई फूल राधारानी कृष्ण से मांग रही हैं, कृष्ण तुरंत उसको लाके दे रहे हैं। फिर बाद में राधारानी सोचती हैं और फिर वो फूल को नीचे लेके आती हैं।
और अभी राधारानी क्या विचार कर रही हैं, उनका दो विचार है इसमें। एक है कि ये ऐसे फूल मांग रही हैं तो उससे क्या होगा, वो धीरे-धीरे हो जाएंगे आगे जाना। पर दूसरा है जब कृष्ण ऊपर-नीचे कूदेंगे, तो भले ही वहाँ पर एक बारिश वगैरह आ गई, तो उनके सारे फुटप्रिंट्स (footprints) हैं, वो फुटप्रिंट्स अगर चले गए… अगर कोई कूदा है किसी जगह पे तो वहाँ पर फुटप्रिंट्स डीप (deep) हो जाते हैं। तो फिर क्या होगा वो जो गोपियां उनको ढूंढ रही होंगी अभी, वहाँ पर तो कोई उस समय मोबाइल विथ लाइव लोकेशन (mobile with live location) नहीं होता था। तो वहाँ पर उनको पता कैसे चलेगा? तो इसलिए वो राधारानी चाहती हैं कि पद चिह्न और डीप हो जाएं और फिर कृष्णा राधारानी के बालों में सारे कई फूल ले जाएं।
और फिर राधारानी सोचती हैं कि अभी क्या करें, कहती हैं कि “कृष्णा वो जो फूल है वो तो इतना सुन्दर है, देखा तुमने? वो फूल इतना ऊँचा है कि कृष्णा कूद भी नहीं सकते वहां तक।” तो राधारानी सोचती हैं कि शायद कृष्णा इससे रुक जाएंगे। राधारानी भी जानती हैं कि कृष्णा कुछ न कुछ तो योजना बना लेंगे, और उनको थोड़ा अंदाज़ा भी होता है कि क्या करने वाले हैं। तभी क्या होता है कि कृष्णा जा रहे हैं और जहां भी जा रहे हैं राधारानी चाहती हैं कि वहाँ पर कुछ पद चिह्न न आ जाएं। तो तभी कृष्णा देखते हैं क्या करना है कि वह तो बहुत ऊँचा है, तो फिर कृष्णा… राधारानी सोच रही हैं कि इससे रुक जाऊंगी, तो उनको पता है कृष्णा क्या करने वाले हैं।
तो फिर कृष्णा उनकी ओर देखते हैं। कृष्णा आके राधारानी को उठा लेते हैं और फिर उठा के उनको ऊपर ले लें उस फूल को भी। तो इससे क्या होता है पद चिह्न गहरे उधर चले जाते हैं। अभी जब गोपियां ढूंढने को आती हैं तो उनको वो पद चिह्न दिखते हैं। तो इस तरह से राधारानी धीरे-धीरे करके कृष्णा को धीरे-धीरे ले जा रही हैं आगे। पर अभी राधारानी के बाल हैं, पूरे फूलों से भर गए अभी और फूलों से भर गए, अभी क्या करें?
तो वो सोचती हैं कि हे कृष्णा हम पहले तेज़ी से चल रहे थे फिर अभी हम तेज़ चल रहे हैं और मैं थक गई हूँ। तो अभी राधारानी का विचार होता है कि मैं थक गई हूँ तो वो पर कहीं बैठ जाएंगे, तो वो अभी कृष्णा को बोलती हैं “तुम तो बहुत नखरे कर रही हो”, ऐसा वो बोलते नहीं हैं, ऐसे बोलते हैं, वो कहते हैं कि “क्योंकि ये जंगल है, तो मैं यहाँ पर तुम्हारे लिए कोई पालकी नहीं ला सकता, इसलिए तुम मेरे कंधों पर बैठ जाओ।” तो अभी ये बोल तो रहे हैं पर जो वचन होते हैं बड़े कठोर होते हैं।
दिव्य विरह और राधारानी का उन्माद
तो राधारानी तुरंत मुड़ती हैं, क्या हो गया अभी? मान लेंगे कोई पत्नी अपने पति से कहती है “तुम मुझसे प्रेम नहीं करते हो”, और पति कहता है “आई लव यू (I love you)”। अभी बोल तो एक शब्द रहे हैं पर क्या है, जो टोन (tone) है वो ऐसा है, जो ध्वनि है ऐसी है कि उससे जो वचन है उससे कोई अर्थ ही नहीं है। जैसे गोपियां कहती हैं कृष्ण के बारे में:
मधुरया गिरा वल्गुवाक्यया
कि आपकी जो वाणी है वो भी बहुत मधुर है और उससे आप जो वचन बोलते हैं वो भी बहुत मधुर हैं। तो कई कुछ ऐसे लोग होते हैं उनकी वाणी बहुत मधुर होती है, पर मधुर वाणी से वो गालियां देते हैं। तो क्या है, पूरा मधुर वाणी का सत्यानाश हो गया वैसे वो पर। तो अभी कृष्ण तो कह रहे हैं “मैं तुमको उठा लूँगा मेरी पीठ पर”, पर जिस तरह से बोल रहे हैं वो तो उसमें काफी क्रोध होता है। तो राधारानी मुड़ के देखती हैं क्या हो गया कृष्णा नाराज़ क्यों हो गए ऐसे? और जब देखती हैं तो कृष्णा हैं नहीं वहाँ पर और कृष्णा अदृश्य हो गए! और तभी राधारानी समझ जाती हैं कि कृष्णा मुझसे क्रोध हो गए।
“कृष्णा तुम कहाँ हो, कहाँ हो तुम कृष्णा?” वो इधर-उधर ढूंढने लगती हैं। कहीं भी उनको कृष्णा दिखते नहीं हैं। तो अभी उनको विश्वास है कि कृष्णा कहीं यहीं पर हैं। तो आनंदवृंदावनचंपू में कवि कर्णपूर बताते हैं कि राधारानी एक तरह से पागल हो जाती हैं। दिव्य उन्माद जो एक डिवाइन मैडनेस (Divine Madness) है, एक दैवी पागलपन जैसे है। तो अभी वो कहती हैं कि वो ऐसे कल्पना करती हैं कि कृष्णा यहां पे कहीं हैं, उनको दिख नहीं रहे हैं पर कृष्णा हैं और वो कृष्णा से बात कर रही हैं। पुकार रही हैं, “कृष्णा तुम पुनः वापस आ जाओ!” वो कहती हैं, “कृष्णा तुम मुझे छोड़ के मत जाओ!”
तो राधारानी कहती हैं “कृष्णा, मैं गर्वित नहीं हुई थी, कि जो मेरी इच्छा है तुमने उसका आदर नहीं किया, कि तुम्हें ये सज़ा है कि मैं तुम्हारे पास नहीं आऊंगी।” तो राधा रानी कहती हैं “कृष्णा कृपया तुम अगर नहीं आओगे तो मेरा जीवन नहीं रहेगा कृष्णा, कृपया तुम लौट के आ जाओ।” कृष्णा कहते हैं कि “सारी सखियां जो हैं, उनके साथ भी तो मैं नहीं हूँ, उनके तो जीवन को कुछ नहीं हुआ।” राधारानी कहती हैं “पर उन सबको एक दूसरे का सान्निध्य है, वो एक दूसरे को सांत्वना दे रही हैं पर मैं अकेली हूँ यहाँ पर। कृपया तुम मुझे छोड़ के मत जाओ।” तो कृष्णा कहते हैं “मैं तुम्हारे साथ अकेला समय बिताना चाहता था, पर तुमने जो मैंने मौका दिया उसका मूल्य नहीं समझा, इसलिए यही तुम्हारी सज़ा है।”
“कृष्णा कृपया मत जाओ,” ऐसे राधारानी बोलती हैं उनको। ऐसे हृदय से लगता है कि कृष्णा चले गए हैं और जब कृष्णा चले गए ऐसा लगता है तो तभी वो मूर्छित हो जाती हैं। कवि कर्णपूर यह बताते हैं कि वास्तव में कृष्णा के विरह में राधारानी अपना जीवन भी नहीं जी सकती हैं। तो अगर कृष्णा का विरह होता तो फिर उनका जीवन चला जाता।
विरह की अग्नि और प्रेम का रक्षण
कई बार किसी को अगर कोई बहुत बड़ा सदमा हो जाता है, कोई बहुत बड़ी बुरी खबर मिलती है तो लोग बेहोश हो जाते हैं। क्यों बेहोश हो जाते हैं? क्योंकि सचेत स्तर पे वो जो इतना दुख है वो सहन नहीं हो सकता है, बड़ा प्रहार हो जाता है। तो क्या होता है switching off the consciousness, इसे डिफेंस मैकेनिज़्म (defense mechanism) है। तो उसको बड़ी वेदना हो रही है तो चेतना वो अचेत हो जाता है, तो क्या होता है उससे उसको उतना दर्द नहीं होता है। तो कहते हैं कि योगमाया की योजना के द्वारा वहाँ पे मूर्छा देवी आती हैं, वो राधारानी को आश्रय देती हैं और राधारानी वहाँ पे बेहोश हो जाती हैं। कृष्ण के विरह को वो बिलकुल सहन नहीं कर पाती हैं।
तो अभी जब राधारानी निस्वार्थ भाव से कृष्ण की सेवा करना चाहती थीं, तो अभी कृष्ण उनको गलत कैसे समझ सकते हैं? अभी ये लीला आगे बढ़ती है, सारी सखियां वहाँ पे आती हैं और राधारानी को देखती हैं क्या हुआ राधारानी को? और फिर वो यमुना से कुछ जल लाते हैं, उनके मुंह पर रखते हैं। और फिर सारी गोपियां कृष्ण को ढूंढती हैं और फिर कृष्ण नहीं मिलते हैं। तो फिर वो सारे यमुना के तट पर वापस आते हैं और वहाँ पे एक जगह बैठकर… वो यमुना के तट पे जगह है जहाँ पे उनकी कृष्ण के साथ बहुत ही अंतरंग घनिष्ठ लीलाएं हुई हैं। वहाँ पे बहुत सी यादें जुड़ी हुई हैं।
हम कहते हैं कृष्ण को हमेशा याद करना है। अब याद करने के लिए यादें होनी चाहिए, यादें नहीं होंगी तो याद नहीं हो सकता है। तो जब ऐसे सत्संग में आते हैं, हम भगवान का दर्शन करते हैं, अभिषेक, कीर्तन, इन सब से क्या है? हमारे हृदय में स्मृतियां, यादें बननी चाहिए, फिर हम कृष्ण को याद कर पाएंगे। तो वो जो जगह है वहाँ पे यमुना के तट पे वहाँ पे गोपियों की कृष्ण के साथ अनेक यादें हैं, बहुत इंटिमेट (intimate), अंतरंग यादें हैं। तो वो याद करते हुए फिर वो गोपी गीत गाती हैं और फिर कृष्ण लौट के आते हैं तो वो आगे लीला चलती है।
पर यहां तक जो लीला चलती है क्या है, जो राधारानी का भाव है, यद्यपि कृष्ण के साथ हैं पर उनका क्या भाव है कि बाकी सब को भी कृष्ण का संग मिलना चाहिए, मुझे अकेले कृष्ण का संग नहीं चाहिए। तो यह निस्वार्थता का भाव है। जो भगवान की भक्ति होती है वह हम भक्तों के संग में करते हैं। भक्तों के संग में करते हैं मतलब क्या है कि एक दूसरे की हमको प्रेरणा मिलती है। राधारानी जो सबसे दिव्य लीला है उस स्तर में भी वो यही दिखा रही हैं।
ब्रजवासियों का निस्वार्थ प्रेम और दावानल का दृष्टांत
हम कह सकते हैं कि कृष्ण राधारानी को नहीं समझते हैं? वास्तव में कृष्णा राधारानी को ज़रूर समझते हैं पर कृष्ण यह दर्शा रहे हैं कि जब वो राधारानी को छोड़ के भी चले जाते हैं पर फिर भी राधारानी कृष्णा को कभी नहीं छोड़ती हैं। बाद में कृष्णा जब वृन्दावन से मथुरा चले जाते हैं, तो अभी कई बार लोग कहते हैं कि कृष्णा मथुरा चले गए तो क्यों चले गए मथुरा? वो तो कंस को मार दिए, तो वापस क्यों नहीं आए वहाँ से या ब्रजवासी उनसे क्यों नहीं मिलने गए?
तो परिस्थिति थी वहाँ पे, परिस्थिति क्या थी कि कृष्णा नंद महाराज से कहते हैं कि अभी सारे जो कंस के साथ मित्र हैं वो मेरे शत्रु बन गए हैं और ये सारे असुर हैं। तो ये मुझ पर आक्रमण करने के लिए आएंगे, पर वो मुझ पे आक्रमण करने से ज़्यादा क्या प्रयास करेंगे, जो मेरे प्रिय हैं उन पे आक्रमण करेंगे। जैसे रावण था, उसको राम से बदला लेना था कि तुमने खर-दूषण को मारा था, तो फिर वो किस पे आक्रमण किया उन्होंने? सीता पे आक्रमण किया। तो इसलिए कृष्ण कहते हैं कि ये जो हैं, सारे वो असुर जो हैं, अगर उनको पता चलेगा कि सारे ब्रजवासी मुझे कितने प्रिय हैं, फिर वो मुझसे बदला लेने के लिए वृन्दावन पे आक्रमण करेंगे।
और यद्यपि मथुरा और वृन्दावन यहाँ दूर नहीं हैं फिर भी अलग जगह है वो। तो अगर मैं मथुरा में होंगा तो मैं वृन्दावन का संरक्षण नहीं कर पाऊँगा। इसलिए वो कहते हैं कि हमें ऐसा दिखाना पड़ेगा कि वृन्दावन और मथुरा में कोई संबंध है ही नहीं। कि बचपन में जब कंस का राज्य था, अत्याचार था तो कहीं बचके रहना था इसलिए मैं वृन्दावन में रह रहा था पर अभी वहाँ से मैं राज्य में वापस आ गया मथुरा में, अभी वृन्दावन से कोई लेना-देना नहीं है। तो जब हमारा स्नेह कुछ दिखाएंगे नहीं हम, तो फिर कंस के शत्रु मित्र जो हैं वो वृन्दावन पे आक्रमण नहीं करेंगे।
तो इसलिए गोपियां और कृष्णा का सारा संबंध पूरी तरह ऐसे लगता है टूट गया है, पर फिर भी क्या है ऐसे होने के बावजूद जो राधारानी हैं वो कभी कृष्णा को नहीं भूलती हैं। वो कृष्णा ऐसे लगता है उनको त्याग के चले गए हैं कब वापस आएं ये पता नहीं है, पर फिर भी वो विरह में उनकी जो भक्ति है वो और बढ़ जाती है वो और दिव्य हो जाती है वो और तेज़ हो जाती है।
तो इसका उदाहरण दिया जाता है, कैसे होता है कि जो प्रेम है, जो लव (love) है वो क्या है? एक फायर (fire) के समान, वो एक अग्नि के समान है और जो सेपरेशन (separation) है, जो विरह है वो क्या है? एक वायु के समान है। अग्नि कोई दावाग्नि होती है। मेरे एक मित्र हैं अमेरिका में, कैलिफोर्निया में वो फायर फाइटर (firefighter) हैं तो कैलिफोर्निया में बहुत बड़ी फायर हो जाती है जो दावाग्नि ही होती है। तो वो बोलते हैं कि हमारा सबसे बड़ा नाइटमेयर (nightmare) तभी होता है कि कोई विंड (wind) ना आ जाए। अगर कोई दावाग्नि, अगर उसमें वायु आ जाता है, तो दावाग्नि और बढ़ जाती है। और यह उनके प्रेम का लक्षण है।
मैं न्यूज़ीलैंड में एक लेक्चर दे रहा था वहाँ पर उसके बाद में एक भक्त ने सवाल पूछा, एक उदाहरण दिया, मुझे बोल रहे थे कि “मैं कई बार भक्तों के संग में आता हूं तो कई बार अपराध हो जाता है। तो मुझे लगता है कि अगर मैं भक्तों से दूर चला जाऊंगा, विरह हो जाएगा तो मेरी भक्ति और बढ़ जाएगी।”
तो मैंने बोला हाँ यह संभव है पर दूसरी भी एक संभावना है। जो फायर है एक हो सकता है यह एक दावाग्नि है, फॉरेस्ट फायर (forest fire) है। दूसरी संभावना है कि यह एक कैंडल (candle) है। अगर यह छोटा सा कैंडल है और फिर वायु आएगा तो क्या हो जाएगा? वो बुझ जाएगा पूरा! तो हम सब की भक्ति है वो दावाग्नि जैसी नहीं है, वो क्या है कैंडल जैसी है। तो अगर भक्तों से दूर हो जाएंगे, हमारे जीवन में भक्तों से, भगवान से विरह हो जाएगा तो विरह से हमारी भक्ति बढ़ेगी नहीं, बुझ जाएगी। तो ये राधारानी का दिव्य स्तर है, गोपियों का दिव्य स्तर है।
श्रील प्रभुपाद और राधा भाव का प्रचार
तो ऐसे जो राधारानी हैं वहाँ उनसे हम क्या सीख सकते हैं जो आखिरी पॉइंट (point) है बोले थे, प्रभुपाद जी का जो सेवा भाव है। जब प्रभुपाद जी भारत में थे तो जैसे कृष्णा ने गोपियों को बांसुरी बजाई और उनको बुलाया उसी तरह से गोपियां सब कुछ छोड़ के चली गईं। तो ऐसे प्रभुपाद जी, अपने गुरुदेव का आदेश था कि आप पाश्चात्य देशों में जाकर प्रचार करो। तो प्रभुपाद जी वृन्दावन में थे और वृन्दावन को छोड़ के चले गए।
और उस समय काफी ऐसे लोग विरोध कर रहे थे, कहते थे कि सन्यासी हैं उनको परदेस नहीं जाना चाहिए, सागर के पार परदेस नहीं जाना चाहिए। तो और कुछ लोग कहते थे कि आप तो वृद्ध हो गए हो। बहुत से लोग वृन्दावन, जब वो थोड़े वृद्ध हो जाते हैं वो वृन्दावन में आते हैं और तो एक क्षेत्र सन्यास ले जाते हैं कि मैं वृन्दावन कभी छोड़ूंगा ही नहीं ताकि जब भी मेरा देहांत होगा वृन्दावन में होगा उससे मुझे दिव्यगति मिल जाएगी। तो कई ब्रजवासी भी कहते थे कि “स्वामी जी, ये तो उन्होंने सन्यास लिया है पर ये बार-बार वृन्दावन छोड़ के क्यों जा रहे हैं?”
पर प्रभुपाद जी का भाव क्या था कि उनको अपने जो गुरुदेव का आदेश था, जो भगवान चैतन्य महाप्रभु की भविष्यवाणी थी, वहाँ पूरा करना महत्वपूर्ण था। इसलिए वो अकेले सारा जो भारत में सब कुछ जानते थे वो सब छोड़ के अमेरिका चले गए। और जब अमेरिका गए वहाँ पे तो प्रभुपाद जी एक तरह से ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य’ कृष्ण की शरण दिखा रहे हैं। अब ये बाह्य दृष्टि है कि कृष्ण के महान भक्त प्रभुपाद जी वृन्दावन छोड़ के चले गए हैं। वास्तव में, we can take a devotee out of the dham, but we cannot take the dham out of the devotee. हम भक्त को धाम से दूर ले जा सकते हैं पर जो धाम है, वो भक्त के हृदय में हमेशा रहता है।
तो प्रभुपाद जी जहां पे भी गए वहाँ पे उन्होंने वृन्दावन की स्थापना की। और वही प्रभुपाद जी की कृपा से यहां पे कुंजबिहारी है। वही प्रभुपाद जी की कृपा है कि जिससे कि वृन्दावन की एक अतिसुन्दर प्रतिमूर्ति विश्व में अनेक जगहों पे हुई है। और प्रभुपाद जी कहा करते थे कि अगर हमें राधा-कृष्ण की लीला को समझना है, राधा भाव को समझना है तो उसके लिए क्या करना है, हमें सेवा भाव समझना है।
अनेक सेवाएं हैं पर खास करके जैसे राधारानी कृष्ण के साथ थीं पर उनकी चिंता क्या थी बाकी सखियों की क्या परिस्थिति है, वह कृष्ण के विरह में हैं। तो वैसे ही हम सबका भाव क्या होना चाहिए, हम सबको भक्ति मिल गई है हम भक्ति में प्रगति कर रहे हैं, पर लाखों करोड़ों में ऐसे लोग हैं जिनको भक्ति नहीं मिली है तो उनको भक्ति देना। हम यहाँ पे आ रहे हैं इससे हम हमारी भक्ति की पुष्टि करते हैं ऐसे उत्सव में आ कर, पर उसके बाद में यही भक्ति का संदेश है, भक्ति का मौका है हम दूसरों को देते हैं। तो प्रभुपाद जी कहा करते थे प्रचार करते हैं। प्रचार करते हैं तो एक तरह से प्रचार मतलब क्या है, किसी को हम बता रहे हैं कि आप शरीर नहीं हो, आत्मा हो। जब कृष्ण को प्रसन्न करते हैं जो राधा-कृष्ण की दिव्य लीला है हम समझ पाएंगे और उसकी ओर हम एक दिव्य स्तर पे आकर्षित हो जाएंगे और फिर राधा-कृष्ण जो हैं हमें उनके पास, हमारे जीवन के अंत में बुला लेंगे।
राधा कृष्ण प्राण मोर जुगल किशोर जीवने मरने गति आर नाहि मोर
तो जो राधा-कृष्ण ही हमारे प्राण हैं, वो ही हमें जीवन की गति हैं और उनकी प्राप्ति हम उनके जो महान भक्त जो राधा भाव दिखाया प्रभुपाद जी, उनकी सेवा करके, उनके आंदोलन में सहयोग करके हम सब उसमें सहभागी हो सकते हैं।
सारांश और आभार
सारांश में मैंने तीन चीज़ें आज चर्चा की राधारानी की महिमा के बाद। सबसे पहले जो राधा तत्व जो है उसके बारे में चर्चा की। किस तरह से जो राधा तत्व है, उसके बारे में कैसे हम देखा कि भगवान जो हैं, जो परम सत्य जो है, वो क्या है, एक नहीं है, वो दो हैं, वो मेल (male) भी हैं, और फीमेल (female) भी हैं, और उन दोनों में दिव्य प्रेम।
तो राधारानी जो हैं वो क्या हैं, सर्वश्रेष्ठ भक्त हैं, पर वह सारी भक्ति का स्रोत भी हैं। तो हम उसके बारे में चाहते हैं, दोनों चाहते हैं, हमसे भक्ति चाहते हैं, उनके बारे में चाहते हैं हमसे भक्ति भी चाहते हैं। और उनका जो भाव है, वो भाव क्या है कि वो कृष्ण को सब कुछ दे रही हैं यद्यपि उनको कृष्ण से कुछ भी नहीं मिलता है। जो परकीय रस है कैसे है, कोई व्यक्ति है वो पति-पत्नी हैं, सत्य में, पर नाटक में पति-पत्नी नहीं हैं, तो वो क्या है, उसके दो कारण होते हैं परकीय भाव के। परकीय भाव का एक कारण क्या है कि उससे टेंशन आता है, टेंशन से क्या होता है, अटेंशन आता है, कि उससे वो लीला है और रोचक बनती है। और यह परकीय भाव का दूसरा कारण कि इसके द्वारा जो राधारानी का जो निस्वार्थ प्रेम है वो दर्शाया जाता है कि कृष्ण से उनको कुछ भी नहीं मिल रहा है, कि कृष्ण के नाम का आदर नहीं मिल रहा है, कृष्ण की पत्नी होने का आदर नहीं मिलता है फिर भी वो कृष्ण के लिए सब कुछ त्याग रही हैं।
और रास लीला में भी तो क्या करती हैं राधारानी, विचार किसके बारे में है? उनका विचार है अपनी सखियों को भूल रही हैं? तो वो हम देखा कि उनको गर्व नहीं होता है पर वो निस्वार्थ भाव से भले ही कृष्णा उनको गलत समझ लें फिर भी वो अपनी सखियों को नहीं भूल रही हैं। वो दिखा रही हैं कि हमें भक्ति अकेले नहीं करनी है, सारे भक्तों के साथ करनी है, भक्तों की भी परवाह करनी है।
हमने प्रभुपाद जी के बारे में देखा है, प्रभुपाद जी राधा भाव के साथ दिखा रहे हैं। इसके बाद हमने देखा कि लव इन सेपरेशन (love in separation) क्या है, वो सबसे बड़ा प्रेम है। प्रेम जो है अग्नि के समान है और जो सेपरेशन है वो एक वायु के समान है। तो प्रभुपाद जी की भक्ति थी वो इतनी दिव्य थी कि सन्यासी को बताया जाता है कि आप परदेस मत जाओ क्योंकि वो वैदिक संस्कृति, भक्ति की संस्कृति, आप दूर चले जाओगे तो आपकी भक्ति बुझ जाएगी, पर प्रभुपाद जी की भक्ति जो राधारानी की भक्ति दावाग्नि के समान थी, तो वो दूर चले गए तो उससे उनकी भक्ति बुझी नहीं, बल्कि इसके विपरीत उन्होंने सारी भक्ति सारे विश्व में फैलाई। और जैसे राधारानी की परवाह थी कि मुझे खुद कृष्ण के साथ आनंद लेना है, बाकी सखियों के साथ आनंद लेना है, प्रभुपाद जी क्या कर रहे थे, वो प्रचार करना चाहते थे कि सबको कृष्ण भक्ति का आनंद मिल सके। वो कहते थे प्रीचिंग (preaching) से क्या होगा, हम प्रभुपाद जी का, राधारानी का आशीर्वाद आज के दिन चाहेंगे कि उन्होंने जो भक्ति का दिव्य स्तर दर्शाया है उससे हम प्रेरणा लें और उसका एक बूंद हम सबको मिले जिससे कि हम, हमारा कल्याण हो जाये और हम दूसरों का भी कल्याण कर सकें।
श्रील प्रभुपाद की जय! गौर भक्तवृंद की जय! निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!