Hindi 3 Reasons Conflicts Worsen 3 Ways To Prevent Bhagavad – Gita 12.15 Middle East
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Lecture Summary
संघर्ष क्यों बढ़ते हैं और उन्हें कैसे रोकें (भगवद्गीता १२.१५ के आधार पर)
आज हम भगवद्गीता के बारहवें अध्याय के पंद्रहवें श्लोक के आधार पर चर्चा करेंगे, कि जीवन में मतभेद और संघर्ष क्यों बढ़ते हैं और उन्हें कैसे टाला जा सकता है।
यस्मानो द्विजते लोको लोकानो द्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैमुक्तो यः स च मे प्रियः॥
इस श्लोक में भगवान बताते हैं कि जो व्यक्ति दूसरों को विचलित नहीं करता और दूसरों द्वारा विचलित नहीं होता, वह भगवान को प्रिय है।
संघर्ष बढ़ने के 3 मुख्य कारण (3 Reasons Conflicts Worsen)
- जगत में अपरिहार्य डिस्टर्बेंस (Unavoidable Disturbances): जगत का स्वभाव ही ऐसा है कि यहाँ परिस्थितियाँ और मतभेद हमेशा बने रहते हैं। कभी ट्रैफिक जाम, कभी काम में तकनीकी बाधा, तो कभी किसी व्यक्ति के भूल जाने या अनजाने में हुई गलती के कारण डिस्टर्बेंस उत्पन्न हो जाते हैं।
- गलत इंटरप्रिटेशन और धारणा (Faulty Interpretation): जब कोई घटना घटती है, तो हम अपने मन में उसका गलत अर्थ निकाल लेते हैं (जैसे कि सामने वाले ने जानबूझकर ऐसा किया)। यह नकारात्मक सोच छोटी सी बात को बहुत बड़ा बना देती है, ठीक जैसे महाभारत के प्रसंग में अश्वत्थामा ने द्रोणाचार्य के वध को पूरी पांडव सेना का षड्यंत्र मानकर अत्यधिक विनाशकारी कदम उठाया।
- कटु वचन और प्रतिक्रिया (Harsh Words and Retaliation): जब कोई व्यक्ति कटु वचनों का प्रयोग करता है, तो वे शब्द शस्त्रों के समान हृदय को तोड़ देते हैं। एक व्यक्ति के गुस्से से शुरू हुआ असंतोष प्रतिक्रियास्वरूप पूरी दुनिया को डिस्टर्बेंस से भर देता है।
संघर्ष रोकने के 3 उपाय (3 Ways To Prevent)
गलतफहमी को दूर करें (Communication): स्थिति का गलत अर्थ निकालकर बड़ा षड्यंत्र या प्रतिशोध की भावना पालने के बजाय, सही तथ्य जानें और संवाद स्थापित करें ताकि छोटे मतभेद बड़े संघर्ष या आतंकवाद जैसे घृणित कृत्यों में न बदल सकें।
पॉज़ (Pause) लें: जब भी जीवन में कोई डिस्टर्बेंस या अप्रिय घटना घटे, तो तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय थोड़ा रुकें। तीन प्रतिक्रिया गुणों को समझें और ठंडे दिमाग से सोचें।
डैमेज को आगे न बढ़ाएं: भगवान के वचनों के अनुसार, दूसरों के कार्यों से खुद को विचलित न होने दें और जो हानि या समस्या उत्पन्न हुई है, उसे अपनी तरफ से और अधिक न बढ़ाएं।
Full Transcription
जीवन में डिस्टरबेंस और महाभारत के प्रसंग से सीख
आज हम भगवद्गीता के आधार पर चर्चा करेंगे। इस तरह से जो मतभेद होते हैं, वो मतभेद क्यों होते हैं, और उसको कैसे हम कम कर सकते हैं? भगवद्गीता के बारहवें, पंद्रहवें श्लोक में भगवान बोलते हैं, कि—
यस्मानो द्विजते लोको लोकानो द्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैमुक्तो यः स च मे प्रियः॥
वहाँ पर भगवान बताते हैं, कि ऐसा व्यक्ति जो दूसरों को विचलित नहीं करता है, और जो दूसरों के द्वारा विचलित नहीं होता है, जो दूसरों को डिस्टर्ब नहीं करता है, जो दूसरों के द्वारा डिस्टर्ब नहीं होता है, ऐसा व्यक्ति मुझे प्रिय है, ऐसा भक्त मुझे प्रिय है। तो साधारणतया ये जगत का स्वभाव है कि यहाँ कोई भी दो व्यक्ति कुछ कार्य करते हैं, पति-पत्नी हो सकते हैं, माता-बच्चे हो सकते हैं, ऑफिस में कलीग्स हो सकते हैं, बॉस और सबऑर्डिनेट होता है।
तो क्या होता है साधारणतया, पहला व्यक्ति ऐसे कुछ कार्य करता है, जिससे दूसरा डिस्टर्ब हो जाता है, और जो दूसरा डिस्टर्ब हो जाता है, तो दूसरा व्यक्ति ऐसे कार्य करता है, जिससे पहला और डिस्टर्ब हो जाता है, और फिर जो पहला व्यक्ति ऐसे कार्य करता है, तो… डिस्टर्ब ऑफिस, डिस्टर्ब वर्ल्ड, तो पूरी दुनिया डिस्टर्बेंस से भर जाती है। तभी सारे दुनिया का डिस्टर्बेंस तो हम रिमूव नहीं कर सकते हैं, हम उसको टाल नहीं सकते हैं, हटा नहीं सकते हैं, पर जो हमारे व्यक्तिगत स्तर पर हो रहा है, उसको हम कम करने का प्रयास कर सकते हैं।
जगत में डिस्टर्बेंस और वास्तविकता
जगत में कुछ परिस्थिति हो जाती है, मान लीजिए कि आप सब ये सत्संग के लिए आए हैं, मैं यहाँ पर कुछ बोलने के लिए आया हूँ, यहाँ पर तकनीकी काम नहीं करना है, तो उससे शायद आप डिस्टर्ब हो जाते हैं, मैं डिस्टर्ब हो जाता हूँ। तो यह जगत ऐसी जगह है कि यहाँ पे डिस्टर्बेंस होते हैं।
कुछ डिस्टर्बेंस किसी व्यक्ति के कारण होते हैं, कुछ डिस्टर्बेंस होते हैं वो किसी व्यक्ति का कोई दोष नहीं होता है, उसके बावजूद हो जाते हैं। तो कोई व्यक्ति कुछ भूल जाता है और हमारे लिए महत्वपूर्ण है वो चीज़, तो हम उससे डिस्टर्ब हो जाते हैं। तो कोई व्यक्ति… उससे होता है कि वो आने वाले समय पर ट्रैफिक जाम हो जाता है, रास्ते में कोई एक्सीडेंट हो जाता है, तो उनकी नियंत्रण में नहीं हो। तो प्रस्तुतिकली जगत में डिस्टर्बेंस होने ही वाले हैं, उसके बारे में हम कुछ नहीं कर सकते हैं।
महाभारत का प्रसंग: छोटी बात से बड़ा डिस्टर्बेंस
पर कभी-कभी क्या होता है कि जब कुछ डिस्टर्बिंग चीज़ हो जाती है तो वो घटना घटती है उसका हम हमारे मन में कुछ इंटरप्रेट करते हैं, कुछ विचार करते हैं कि व्यक्ति ने ऐसे क्यों किया और व्यक्ति ने ऐसे क्यों किया कि उसके बारे में सोचते हैं हम। और एक तरह से सोचना स्वाभाविक है, व्यक्ति ने बोला था कि मैं ऐसे करूँगा पर नहीं किया है तो क्यों नहीं किया है यह सोचना स्वाभाविक है। पर जब हम सोचते हैं तो हम किसी कुछ कारण पर जाते हैं कि व्यक्ति ने इस कारण ऐसे किया, इस व्यक्ति ने इस कारण ऐसे किया। तो अब यहाँ कौन सा कारण लेते हैं, वह समझना महत्वपूर्ण है।
और कभी-कभी तो वो ऐसा कारण लेते हैं कि जिस से छोटी चीज़ बहुत बड़ी बच जाती है। तो महाभारत में एक प्रसंग का वर्णन आता है, जिस से ये कैसे छोटी चीज़ से डिस्टर्बेंस बड़ा हो जाता है या बड़े डिस्टर्बेंस से व्यक्ति बहुत उस से और बड़ा डिस्टर्बेंस करता है।
तो भी महाभारत में अनेक कैरेक्टर होते हैं, वो बुरा कार्य करते हैं, तो उनमें से सबसे जो गुणास्पद कार्य है वो कौन सा है? किसी को लगता है द्रौपदी का वस्त्रहरण बहुत बुरा कार्य है। ज़रूर, पर अगर हम देखते हैं कि जो महाभारत का युद्ध है उसमें सबसे बुरा कार्य कौन सा था? किसका था? अभिमन्यु का वध था, वो छह लोग साथ में आके वो मारते हैं अभिमन्यु को, तो वो सबसे बुरा कार्य था।
अश्वत्थामा का घृणित कृत्य
पर एक ऐसा व्यक्ति है, हम दुर्योधन कह सकते हैं कि दुर्योधन बुरा ही है, दुशासन बुरा है, पर एक ऐसा व्यक्ति है जिसने उस युद्ध के पहले कोई बुरा कार्य नहीं किया है पर सबसे गुणास्पद कार्य करता है अश्वत्थामा। और वो कार्य कब करता है? वो… पांडव के बच्चों को मार देता है, अना कि वो उनको मारता है, उसके साथ-साथ वो सारी सेना के लोगों को मार डालता है, सैनिकों को मार डालता है।
तो भी हम कह सकते हैं वो ऐसे क्यों करता है? क्या विचार आता है उसके मन में जिसके कारण वो ऐसा कार्य करता है? एक तरह से वो कोई बुरा व्यक्ति नहीं होता है, अभी अभिमन्यु, अश्वत्थामा और अर्जुन में थोड़ा है, प्रतियोगिता होती है, दोनों कौन धनुर्विद्या में और अच्छा है, पर वो जो होते हैं वो कॉम्पिटिटर्स होते हैं, वो एनिमीज नहीं होते हैं, वो प्रतिस्पर्धी होते हैं, वो शत्रु नहीं होते हैं। तो वर्ल्ड कप होगा तो सब कंट्रीज जो है क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीतने जाते हैं, उसके लिए वो राइवल्स हैं, पर एनिमीज मतलब क्या है? वो कोई दूसरी चीज़ चाहते हैं, उनका उद्देश्य है दूसरे का विनाश करना।
तो अश्वत्थामा का एक तरह से वैसे उद्देश्य नहीं होता है, पर पंद्रवे दिन एक बहुत बुरी घटना घटती है, पर उससे और बुरा अश्वत्थामा के मन में उसका प्रभाव होता है। पंद्रवे दिन क्या होता है? प्रधान रूप से किसको पता है? द्रोणाचार्य का वध होता है। अभी उस दिन द्रोणाचार्य बहुत फ्रस्ट्रेट हो जाते हैं, क्या होता है कि द्रोणाचार्य ने व्रत लिया होता है कि मैं युधिष्ठिर को गिरफ्तार करके जिंदा तुम्हारे पास लेकर आऊंगा, क्योंकि दुर्योधन ने उनको यह वर मांगा होता है और वो वादा करते हैं। पर चार दिन तक वो यशस्वी नहीं होते हैं, ग्यारवे और बारहवें दिन में पास आते हैं, पर आखिरी मूवमेंट में अर्जुन आ जाते हैं और युधिष्ठिर को बचाते हैं।
द्रोणाचार्य का वध और षड्यंत्र
तो तेरहवें दिन वो चक्रव्यूह बनाते हैं और चक्रव्यूह में युधिष्ठिर को फंसाना होता है, पर अभिमन्यु आ जाता है, तो अभिमन्यु भी फंस जाते हैं, तो वो एक तरह से बहुत अच्छा विजय होता है उनके लिए। पर अंततः अभिमन्यु का वध हो जाता है, दुर्योधन प्रसन्न हो जाता है उससे। पर चौदवे दिन जो होता है, इतना बड़ा यश मिला होता है अभिमन्यु के वध से, उससे और कई गुना बुरा अपयश हो जाता है चौदवे दिन। चौदवे दिन क्या होता है? जयद्रथ का वध होता है।
अभी उसमें क्या होता है कि अभी पूरे सेना को इसी एक जयद्रथ के संरक्षण के लिए लगाया जा रहा है और पूरी सेना अर्जुन को रोक नहीं पाती है, तो वो उससे दुर्योधन बड़े गुस्सा हो जाते हैं, द्रोण को डाँटते हैं, द्रोण फ्रस्ट्रेट हो जाते हैं। और अगले दिन क्या होता है? जब द्रोण युद्ध कर रहे होते हैं, तो द्रोण दिव्यास्त्र इस्तेमाल करने लगते हैं, पर दिव्यास्त्र जो होते हैं वो साधारण योद्धाओं के साथ मारने लगते हैं।
तो अभी जो युद्ध के अलग-अलग प्रकार के नियम होते हैं, और कई बार युद्धों के नियमों का उल्लंघन होता है। युद्ध का दुर्भाग्य विश्व सत्य होता है, पर जो उल्लंघन भी होता है किस हद तक हो रहा है? तो अभी विश्व में दो युद्ध चल रहे हैं, इजराइल और हमास चल रहा है, पेलस्टीन के लोगों साथ चल रहा है, पर जो भी हो रहा है उसमें अभी तक तो किसी लेवल पर न्यूक्लियर वेपन्स यूज़ नहीं किया है, उतनी तो दुर्बुद्धि नहीं हो रहा है किसी भी देश के द्वारा, पर युद्ध नहीं किया है।
पर मान लीजिए साधारण युद्ध चल रहा है, अचानक कोई न्यूक्लियर वेपन्स यूज़ करता है, तो फिर क्या होगा? तो बहुत ही गुणास्पद कार्य होता है। और अगर ऐसा कार्य होता है, तो फिर ऐसा करने वाला जो भी योद्धा है, किसी ना किसी पद्धति से उसको रोकना होगा, क्योंकि वो जो कर रहा है बहुत बुरा है। तो कभी-कभी ऐसे लोगों को रोकने के लिए उनको एसासिनेट कर देते हैं।
तो जब द्रोण ऐसा करते हैं, अब इस साधारणतया कैसे होता है कि दो बड़े योद्धा हैं, दोनों के पास दिव्यास्त्र है, तो जब एक योद्धा दिव्यास्त्र इस्तेमाल करता है, तो फिर उसके कारण उसके आजू-बाजू दूसरे योद्धा हैं, वो उनको भी कुछ चोट हो सकती है और के बाद के लिए हो सकती है, दैट्स ओके। पर साधारण लोग हैं और उनके साथ में उनके ओर में दिव्यास्त्र इस्तेमाल करना यह कुकृत्य है या गलत है।
तो जब ऐसे होता है, तो आकाश में तभी ऋषि मुनि आते हैं, वो द्रोण से कहते हैं कि तुम क्या कर रहे हो? तुम रुक जाओ, तुम बहुत बुरा कार्य कर रहे हो। द्रोण विचार में पड़ जाते हैं, पर फिर भी उनको तुम युद्ध के वचन जो होते हैं कि तुम पार्शियलिटी कर रहे हो, तुम क्योंकि पांडवों से स्नेह करते हो, इसलिए तुम मेरे पक्ष से पूर्ण क्षमता के साथ युद्ध ही नहीं कर रहे हो। अगर ऐसे ही करने वाले थे तुम, तुम सेनापति बने क्यों? तुम अभी सेनापति के पद से उतर जाओ और कर्ण सेनापति बन जाएगा और कर्ण ने मुझे वादा किया है कि वो पांडवों का विनाश कर देगा।
अभी ये जो वचन थे बहुत कटु थे, मान लीजिए कोई बड़ा विख्यात प्लेयर है जो भारत टीम में कैप्टन है और भारत हार रही है, तो भी यह दुर्भाग्यवश हार रहे हैं, पर अगर उससे बात हो कि क्यों है कि तुम कुछ पाकिस्तान के प्रति हो, इसलिए तुम अच्छी तरह खेल नहीं रहे हो, यह जो आरोप है, वो बहुत दर्द करेगा। अगर वो पैट्रियोटिक है, वो भारत के लिए खेलना चाहता है, तो फिर उनके वचन जो इतने कटु होते हैं, तो पुनः जो द्रोण है धनुष उठा लेते हैं और तभी कृष्ण पांडवों से कहते हैं—”अगर आज अभी तुम द्रोण को नहीं रोकोगे तो द्रोण तुम्हारे पूरे सेना का विनाश कर देगा।”
तभी युधिष्ठिर कहते हैं—”कैसे रोकना है हमको?”
जो युद्ध शुरू होता है उसके पहले युधिष्ठिर कौरवों के पक्ष जाते हैं, अपने, बड़ों का आशीर्वाद लेने के लिए, और जब वो आशीर्वाद देते हैं, तभी वो कहते हैं—”कि मैं आप पर विजय कैसे प्राप्त कर सकता हूँ या मुझे बताओ।” तभी द्रोण बताते हैं कि “किसी विश्वास पात्र व्यक्ति से कुछ दुर्भाग्यवश, कुछ आपत्ति, कुछ मिसफॉर्च्यून, कुछ बैड न्यूज, कुछ दुखदायक समाचार सुनते हैं, मैं स्वयं अप्रस्त्र त्याग कर दूंगा, तभी तुम मुझे में जीत सकते हैं।”
तभी कृष्ण को याद दिलाते हैं, कहते हैं कि तुम उनको बताओ कि अश्वत्थामा का वध हो गया है। युधिष्ठिर दुखी आते हैं—”कैसे मैं बोल सकता हूँ ऐसे?” तो फिर भीम जाके एक हाथी होते हैं, अश्वत्थामा नाम का, उसका वध कर देते हैं और फिर युधिष्ठिर जा रहे होते हैं बोलने को।
तो जब युधिष्ठिर जैसे बोलने वाले होते हैं, तो अर्जुन की योजना क्या होती है कि जैसे ही द्रोण आचार्य अपना धनुष नीचे कर देंगे, तो हम उनको गिरफ्तार कर लेंगे और फिर हमें उनको आदरणीय गुरु हैं, वो तो उनकी मृत्यु नहीं चाहते थे, पर उनके कारण हमारा पराजय नहीं होना चाहिए और युद्ध के अंतर उनको गिरफ्तार कर लेंगे।
तो जैसे ही युधिष्ठिर बताते हैं, तो द्रोण एक तरह से त्रस्त हो जाते हैं, वो सोच नहीं पाते कुछ और युधिष्ठिर से थोड़ा चल जाते हैं और फिर विचार में पड़ जाते हैं, अपना धनुष नीचे कर देते हैं। और तभी उनके पास में धृष्टद्युम्न होता है, अभी धृष्टद्युम्न का जन्म एक उद्देश्य से हुआ था, क्या उद्देश्य था? द्रोणाचार्य का वध कर और बहुत बार उसने प्रयास किया होता है, पर वो उनके वध करने के पास में भी नहीं आता है, क्योंकि द्रोणाचार्य की क्षमता इतनी ज्यादा होती है, उससे तो उससे वो भी फ्रस्ट्रेट हो गया होता है।
द्रोणाचार्य का वध और अश्वत्थामा का प्रतिशोध
तो क्या होता है कि जगत में ऐसी समस्या अगर भी आ जाते हैं, निर्णय ही बहुत मुश्किल चीज़ है, पर एक तरफ द्रोण फ्रस्ट्रेट हो गया है, यहाँ द्रोण फ्रस्ट्रेट हो गया है और उस दिन जो होता है द्रोण का फ्रस्ट्रेशन पूरे 15 दिनों में सबसे ज्यादा होता है। क्यों? उस पिता ने यज्ञ किया था जिसके लिए धृष्टद्युम्न का जन्म हो ताकि वो धृष्टद्युम्न के पिता कौन है? द्रुपद, कि द्रुपद अपना अपमान का बदला द्रोण आचार्य से ले सके। पर धृष्टद्युम्न के आँखों के सामने उसी दिन पंद्रहवें दिन ही द्रोण ने द्रुपद का वध किया था, तो इससे वो और संत्रस्त हो जाता है।
तो जैसे ही द्रोण अपना शस्त्र नीचे रख देते हैं, तो तुरंत धृष्टद्युम्न के आँखों के सामने… द्रोण अपना शस्त्र नीचे रख देते हैं। तो जैसे ही सारे योद्धा देखते हैं, पांडव के पक्ष से, कौरवों के पक्ष से कि धृष्टद्युम्न क्या कर रहा है? तो दोनों पक्ष से योद्धा चिल्लाते हैं। तो धृष्टद्युम्न के आँखों के सामने… तो अर्जुन बहुत क्रोधित जाते हैं—”वो तुम्हारे गुरु थे, इस तरह से कैसे तुमने उनका वध किया?”
जब वो अभी गुस्से में क्या होता है, द्रोण हताहत होकर वो अपनी आँखें बंद कर लेते हैं, ध्यान में चले जाते हैं। तो जब वो युद्ध नहीं कर रहे थे, जब वो सचेत नहीं थे, कैसे तुमने उनका वध किया? और यहाँ बोलकर वो धृष्टद्युम्न आक्रमण करने होता है, तभी भी वो उनको रोकते हैं और काफी बड़ा झगड़ा हो जाता है उनको के बीच में।
तभी तो यह कहने का उद्देश्य क्या है कि जो धृष्टद्युम्न का जो वध था, वो पूरे पांडवों के सहयोग से बनाया हुआ षड्यंत्र नहीं था, यह पूरा पत्थर का दिल बना के, एक तरह से ठंडे दिमाग से नफरत के साथ कुछ षड्यंत्र बनाना है, तो कोल्ड ब्लडेड कहते हैं। और जो हॉट-हेडेड मतलब गुस्से में आके व्यक्ति को पता भी नहीं क्या कर रहा हूँ मैं और उस समय कुछ कर देते हैं।
तो अभी जब ऐसा हो जाता है, तो कौरवों में… तो उस समय कुछ युद्ध के पहले अश्वत्थामा घायल हो गया होता है, तो इसलिए अश्वत्थामा रणभूमि पर नहीं होता है। तो अश्वत्थामा थोड़ा ठीक होके, अपने घावों को ठीक करके वैद्य से वापस आ रहा होता है। पर, तो इसलिए सारे जो कौरव होते हैं, वो दूसरी ओर रणभूमि पर दौड़ रहे होते हैं, तो अश्वत्थामा कहता है—”क्या हो गया है तुम सब क्यों अश्वत्थामा दौड़ रहे हो?”
तभी दुर्योधन जो होता है, वो बताता है कि सारे पांडवों ने एक षड्यंत्र करके तुम्हारे पिता, हमारे गुरु, हमारे सेनापति का बड़े बेरहमी से, जब वो सचेत नहीं थे, जब वो ध्यान में थे, झूठ बता कर कि तुम्हारे नित्य हो गई है, उनको फिर बड़े बेरहमी से, जैसे जानवर को मारते हैं, जैसे मार दिया।
यह जब अश्वत्थामा सुनता है, बहुत कुंठित हो जाता है, वो सहन नहीं कर पाता है और तुरंत वो अपने पास जितने भी शक्तिशाली अस्त्र हैं, जिसके लिए एक नारायणास्त्र होगा, एक भार्गवास्त्र होगा है, दोनों इस्तेमाल करता है। पर दोनों से कुछ… तभी वो पांडवों को… वो सोचता है, पांडवों को मार रहा हूँ, पर पांडवों के पुत्रों को मार रहा हूँ और उसका विचार होता है कि जैसे उन्होंने, मेरे पिता सचेत नहीं थे, उनको मारा, वैसे ही, अभी वो सचेत नहीं है, तो मैं उनको मार दूंगा।
जैसे उन क्या होता है, जो, सॉरी, नहीं, वो बाद में आता है, पर इसके पहले जो, जो दुर्योधन जो उसको बताता है, उस पे वो विश्वास कर देता है। क्या होता है कि अभी ही, जब दुर्योधन बताता है, कि सारे पांडवों ने खाली अंदर किया, तो वो सोचता है कि पांडव ऐसे कैसे कर सकते हैं, वो तो दुर्योधन का बड़ा आदर करते हैं, अर्जुन ने ऐसे कैसे किया? अर्जुन तो अपने गुरु के लिए जीवन देने के तैयार होता है, यह देवियों जो प्रतिस्पर्धा होती थी, वो प्रतिस्पर्धा होती थी उनमें।
पर अभीमन्यु रिस्पेक्टेड बोथ अर्जुनस कॉम्पिटेंस और कैरेक्टर कि वास्तव में वो एक नीतिवान व्यक्ति है, तो तभी अगर अश्वत्थामा जाके अर्जुन को पूछता था कि इस तरह से तुमने अपने गुरु का वध कैसे किया? तो अभी जो हुआ ऐसे कुछ बुरा हुआ, बहुत बुरा हुआ, पर उसके लिए जिम्मेदार धृष्टद्युम्न था, सारे पांडवों का षड्यंत्र नहीं था। तो उसने बेरहमी से धृष्टद्युम्न को मारा, वो जस्टिस कहते हैं, उसकी प्रतिक्रिया में हजारों गुना ज्यादा बुरा कार्य उसने कर दिया।
अभी यहाँ पे जो हम छोड़ रहे थे कि दुनिया में हम ऐसा कार्य करते हैं, जिससे लोग डिस्टर्ब होते हैं, लोग ऐसा कार्य करते हैं, जिससे हम डिस्टर्ब होते हैं, तो यह स्वभाव होता है, भगवान कहते हैं कि इसे टालना जरूरी नहीं है।
निष्कर्ष और समाधान
तो इसको हम कैसे टाल सकते हैं? तो यहाँ पे अश्वत्थामा क्या कर सकता था? जिससे कि वो ऐसा दुर्भाग्यवश, ऐसा गुणास्पद कार्य किया होता है उसने। तो सारे कुरुक्षेत्र युद्ध में जरूर अश्वत्थामा करता है, वो अच्छा करता है कि आज आतंकवाद कहते हैं। आतंकवाद, उससे क्या कहते हैं कि युद्धों को नहीं, जो सैनिकों को नहीं मार रहे हैं, जो सिविलियंस हैं, उनको ही उनको मार रहे हैं।
और सिविलियंस से कलता ही बात हो जाता है, जब हम सैनिकों को मारने का प्रयास कर रहे हैं, पर जब सिविलियंस, जो बिल्कुल युद्ध करने के तैयार नहीं हैं, उनको ही मारना उद्देश्य होता है, तो उसको पूरी तरह से आतंकवाद कहते हैं। तो अभी ये सिविलियंस नहीं थे, पर वो युद्ध करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे, वो सोए हुए थे, वो असक्षम थे युद्ध के लिए, उनको मारना ये लगभग आतंकवाद के समान नहीं होता है।
तो ऐसा, जो इतना बुरा कार्य कर देता है, ये कैसे हो जाता है? वो एक बुरी घटना होती है, पर ये फ्री स्टेप्स होती है, एक बुरी घटना होती है, पर ये फ्री स्टेप्स होती है… क्या? उन्होंने ऐसे किया, तो उनके साथ मैं भी ऐसे कर सकता हूँ।
तो ये जो होता है, जगत में बुरी घटनाएं हो जाती हैं, और कभी किसी कारण से होते हैं, किसी कारण से होते हैं, कभी किसी कारण के, किसी के उद्देश्य के बिना में होती हैं, पर जब ऐसे घटनाएं होती हैं, तो उसका हम क्या इंटरप्रिटेशन लेते हैं, उसका हम क्या अर्थ देखते हैं, ये महत्वपूर्ण हैं, और वो अर्थ हमें कौन दे रहा है? और फिर उसके कारण, फिर हम क्या कर रहे हैं, उसके लिए हम जस्टिफाय करते हैं।
कहीं बार क्या होता है कि दो लोग तो झगड़ा हो जाता है, एक व्यक्ति किसी को बुरा-भला बोलता है, और फिर दूसरा व्यक्ति उसके, उसके, उसके… होती है, वो शायद हम शस्त्र इस्तेमाल के लिए नहीं करेंगे, पर जो वचन होते हैं, वो शस्त्रों के समान ही होते हैं, जब कटु वचन कोई बोलता है, तो उससे काफी इतनी के हृदय टूट सकते हैं।
अभी मैं बचपन में ग्रो हो रहा था, मेरा इंग्लिश लैंग्वेज मुझे बहुत अच्छा लगता था, तो मेरा इंग्लिश वोकैबलरी तो काफी अच्छा था। और क्या, मैं व्यक्ति में आने के पहले मुझे गुस्सा काफी आसानी से आ जाता था, तो क्या है, अब बैड वोकैबलरी, अब बैड टेम्पर्ड और अब गुड वोकैबलरी… अच्छा लगता था, तो क्या है, गुस्सा जल्दी आना और किसी को शब्दों में अच्छे प्रमेंडा है, कुछ लोग गुस्सा आ जाता है, तो इतना गुस्सा कुछ बोल ही पाता है गुस्से में, या वो आग बबुले हो जाते हैं, वो क्या बोलते हैं किसी को समझ में नहीं आता है।
पर अगर कोई व्यक्ति शब्दों के बोलने में निपुण हो, तो फिर वो ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर सकता है, कि वो दूसरे व्यक्ति के हृदय को काट सकता है। तो ऐसे व्यक्ति से, तो हम सब को डिस्टर्ब करने वाली समस्या, परिस्थितियाँ आते हैं जीवन में, तो उसको हम कैसे, क्या कर सकते हैं? उसको हम ऐसे छोटी डिस्टर्बेंस, छोटे डिस्टर्बेंस को बड़ा नहीं होने लगे, कैसे जो भगवान बोलते हैं, कि दूसरे जो कार्य करते हैं, उसे डिस्टर्ब नहीं हो, उसको, उससे जो डैमेज होने वाला है, कम से कम डैमेज हो, जो हानि होने वाली है, जो एक समस्या होने वाली है, उसको मैं और बढ़ाऊँ नहीं।
तो उसके लिए मैं तुम्हारे प्रिंसिपल्स के लिए बात करूँगा, कैसे हम कह सकते हैं सबसे पहले है जब कुछ हो जाता है… तुम्हारे प्रिंसिपल्स के लिए बात करूँगा, पहले है पॉज। पॉज क्या है कि तीन प्रतिक्रिया गुण होते हैं।