If we are working wholeheartedly in our material life but can’t work similarly in our spiritual life what can we do–Hindi
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संक्षिप्त सारांश
तो अगर हम अमारी शम्ता के लिए भगवान की सेवार नहीं कर रहे हैं पर वो शम्ता से पूरा हमारी भावतिक जगन लगे गए हैं वहाँ पर खत्रा लेकर प्रगती करेंगा प्यास कर रहे हैं तो इससे हम कैसे निकलें? एक चीज़ है कि हमें भगवादिता बताती है कि स्वकर्मनात्मप्यहर्चे सिद्धनिन्दनिमानवा आप अपने कर्म के द्वारा में भगवान की पूजा कर सकते हैं कर्म ही पूजा नहीं कहते हैं भगवान कर्म के द्वारा भगवान की पूजा कर सकते हैं तो मतलब क्या है? एक तरह से हमारे भौतिक जीवन और अध्यात्मिक जीवन को हमें विभाजन करना है ताकि हम अध्यात्मिक जीवन।
मुख्य ट्रांसक्रिप्शन
तो अगर हम अमारी शम्ता के लिए भगवान की सेवार नहीं कर रहे हैं पर वो शम्ता से पूरा हमारी भावतिक जगन लगे गए हैं वहाँ पर खत्रा लेकर प्रगती करेंगा प्यास कर रहे हैं तो इससे हम कैसे निकलें? एक चीज़ है कि हमें भगवादिता बताती है कि स्वकर्मनात्मप्यहर्चे सिद्धनिन्दनिमानवा आप अपने कर्म के द्वारा में भगवान की पूजा कर सकते हैं कर्म ही पूजा नहीं कहते हैं भगवान कर्म के द्वारा भगवान की पूजा कर सकते हैं तो मतलब क्या है? एक तरह से हमारे भौतिक जीवन और अध्यात्मिक जीवन को हमें विभाजन करना है ताकि हम अध्यात्मिक जीवन के लिए भी समय दे सकें पर वो विभाजन करने के बाद हमें हर कार्य में ऐसे सोचना है यह तो भौतिक ही है वो सोचके क्या होगा?
हम हतोत्साहित हो जाएगे हमें सोचना है कि वास्तव में भौतिक और अध्यात्मिक जीवन में यह क्या है? वास्तव में एक भावना है अगर मैं सेवा भाव का अनुशिनन कर रहा हूँ सेवा भाव से मैं कारे कर रहा हूँ मैं सोचता हूँ कि यह परस्तिती में मुझे भगवान की योजना से इस परस्तिती में हूँ और इस परस्तिती में मैं नौकरी कर सकता हूँ मैं इस छेतर में अपनी शम्ता दिखा सकता हूँ तो मैं वो भी एक सेवा भाव में कर सकता हूँ तो ऐसे नहीं है कि मुझे हर चीज कारे करते से मैं यह सोचता हूँ अरे यह तो भावतिक है क्योंं करूँ यह नहीं है मैं सोचता हूँ कि इसमें मैं सेवा भाव कैसे बड़ा सकता हूँ उससे क्या होगा हम जो भावतिक कारे हैं और सकारात्मक पत्तिसे करेंगे अभी सकारात्मक पत्तिसे करना मतलब क्या कि कई बार हमको भावतिक जीवन में जंबिदारिया होती है कई बार हमको भावतिक जीवन में महत्वा कांक्षा है तो कुछ लोग अध्यात्मिक जीवन में इतनी रुची प्राप्त कर लेते हैं कि वो उनकी भावतिक महत्वा कांक्षा है वो अध्यात्मिक दुश्चे में परिवर्चत कर लेते हैं कुछ ऐसी महत्वा कांक्षा हो सकती है वो व्यक्ति तुरंद छोड़ नहीं सकता है तो व्यक्ति उसको पूरी करके फिर उसको पढ़ा जाता है कि अच्छा ठीक आभी कर लिया अभी व्यक्ति कर लेता हूँ ऐसे भी हो सकता है तो हमें क्या करना है जो भी हम कर रहे हैं उसको whole heartedly करना है उसको पूरा उत्सास जात करना है अगर हमारे परिवार के समय में कुछ जिम्मदारी है अगर हम उसको अच्छी तरह से नहीं करते हैं तो उसका क्या होता है परिणाम कई बार वही काम हमको दुबारा करना पड़ता है तो इसलिए जब भी हम कुछ जिम्मदारी स्विकार करते हैं तो हमको जरूर इतना जिम्मदार होना चाहिए यह विभाजन करना चाहिए कि यह समय मेरे भकती के लिए है यह समय में काल करता हूँ उसके लिए मैं विभाजन करता हूँ कि ऐसे नहीं है कि मैं दिन बर चौब जीवन ही मैं बगवान की सेवा में लगा जाता हूँ तो हमारे भौतिक कारे को भी हम इचार धारा ला सकते हैं कि कैसे मैं यह बगवान की सेवा कर सकता हूँ तो उस तरह से हम करेगे तो फिर धीरे धीरे उसके द्वारे में हम अध्यात्मी प्रगति कर सकते हैं और जो ख्षमता का सवाल है कि हमारे जीवन में अलग अलग स्टेजिस होते हैं अलग अलग स्टेजिस से गुधरते हैं तो कभी जैसे अगर आप रस्ते में जा रहे हैं तो कभी कभी क्या होता है ट्राफिक बहुत जादा होता है तो हम चाहे तो भी ज़्यादा तेज़ जा नहीं सकते हैं धिल्डर जाना पड़ता है और कभी कोई रस्ता साफ जादा है तो हम तेज़ी से जा सकते हैं तो वैसे ही कैसे है हमको भगवान के पास जाना है पर हमारे जीवन के रस्ते में कभी कभी भौतिक जिम्मेदारियों का ट्राफिक बहुत बढ़ सकता है तो तभी हम बहाये रूप से जो अध्यात्मिक कारें उत्मा नहीं कर पाएगे उसका मतलब यह नहीं है कि हम अध्यात्मिक जीवन चोड़ दें हम फिर भी आगे जा रहे हैं पर तब धीरे धीरे जा रहे हैं पर बाद में क्या होगा जब रस्ता साफ हो जाएगा तभी भी धीरे धीरे नहीं जाना है तभी हमको तक देर जाना है तो हम दिशा एक रख सकते हैं और अलग-अलग समय पे रफ्तार अलग-अलग हो सकते हैं तो इसलिए कभी-कभी बातिर समय देना पड़ता है तो उसका मतलब यह नहीं है कि हम अध्यात्मिक नहीं हैं पिछले प्रभुपाज जी, प्रभुपाज जी तो महा भागवत परंबक्त है वो जब अलावाल में थे, वो अपने प्रयाद फार्नस चला रहे थे तभी लीलामृत में एक वर्णन आता है कि वे उनके पड़ोसी थे, दुसरा दुकान था जो था कौर भक्त रिंदकी, पाई गौर प्रिमाण देखते हैं।