Hindi Is youth meant for enjoyment or enlightenment? Gaziabad – Chaitanya Charan
- Home
- Audio Icon
- Hindi Is youth meant for enjoyment or enlightenment? Gaziabad – Chaitanya Charan
Disclaimer: This transcript was generated using AI and may contain occasional errors or inaccuracies.
Lecture Summary
यह व्याख्यान चैतन्य दास (चैतन्य चरण) द्वारा युवाओं के जीवन, आनंद (Enjoyment), और आध्यात्मिक ज्ञान (Enlightenment) के बीच के अंतर को समझाने के लिए दिया गया है। इस पूरी चर्चा का मुख्य सार निम्नलिखित बिंदुओं में समाहित है:
- राजसिक सुख का स्वरूप (पहले अमृत, बाद में जहर): भगवद्गीता के अनुसार, इंद्रियों के विषयों से मिलने वाला सुख शुरुआत में बहुत आकर्षक और अमृत जैसा लगता है (जैसे स्वादिष्ट भोजन या अन्य भोग), लेकिन परिणाम में वह जहर के समान कष्टदायक (पेट खराब होना, स्वास्थ्य बिगड़ना या मानसिक अशांति) साबित होता है।
- इंद्रियों और भोग की सीमा (Limitation): दुनिया हमें यह भ्रमित संदेश देती है कि अधिक पैसे और भोग-विलास से असीम सुख मिल जाएगा। परंतु वास्तविकता यह है कि हमारे शरीर और इंद्रियों की भोग करने की क्षमता (Capacity) सीमित है। हम अपनी सहनशक्ति या पाचन क्षमता को एक सीमा से आगे नहीं बढ़ा सकते।
- डिजिटल और आधुनिक प्रलोभन: आज के इंटरनेट और डिजिटल युग (विशेषकर पोर्नोग्राफी और अत्यधिक स्क्रीन टाइम) ने युवाओं की कल्पना को अत्यधिक उत्तेजित कर दिया है, जिससे वे वास्तविक जीवन में गहरे संबंध और स्थिरता नहीं बना पा रहे हैं। इसके परिणाम स्वरूप अकेलापन, मानसिक तनाव और सामाजिक विघटन (Social Breakdown) बढ़ रहा है।
- क्षणिक सुख बनाम स्थायी आध्यात्मिक आनंद: भौतिक भोग एक अस्थायी डेस्टिनेशन (Temporary Destination) की तरह हैं। इसके विपरीत, आत्मा और भगवान (कृष्ण) के संबंध का सुख शाश्वत और वास्तविक है। जब मनुष्य समझ जाता है कि भौतिक जगत के सुख ‘क्षुद्र सुख’ हैं, तो उसकी दृष्टि बदल जाती है।
- जीवन का सही दृष्टिकोण: हमें यह स्वीकार करना होगा कि भौतिक इच्छाओं के पीछे भागना अंततः दुख देता है। जिस प्रकार कड़वी दवा या कठिन अभ्यास (जैसे पढ़ाई या व्यायाम) शुरू में कठिन लगते हैं पर बाद में जीवन को संवारते हैं, उसी तरह आध्यात्मिक मार्ग (भक्ति और संयम) शुरुआत में कठिन लग सकता है, लेकिन अंत में यह असीम आनंद (परम अमृत) प्रदान करता है।
Full Transcription
इसके बाद आपका स्वागत है। एनलाइटनमेंट (Enlightenment) और एन्जॉयमेंट (Enjoyment) के लिए आपका स्वागत है।
राजसिक सुख की प्रकृति
विषयेन्द्रियसंयोगाद् यत्तदग्रेऽमृतोपमम्। परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥
ऐसे सुख को राजसिक बताया जाता है। तो हम इसको देखते हैं, बड़ा बच्चा को देखिए, इसको बचाना है। अगर आप रैपर्स (wrappers) पढ़ते हैं, क्या है? यहाँ डाइट (diet) होते हैं। पर यहाँ भी कहा है, यह जो है, वह भी अमृत है। पहले अमृत जैसे है, परिणाम में वह जहर बन जाता है। यदि कोई बहुत खाता है, तो खाते समय स्वाद तो बहुत अच्छा लगता है, पर बाद में क्या? पेट खराब हो जाता है, क्या स्वास्थ्य खराब हो जाता है? तो फिर वह जो इतना अच्छा है, वह जहर है। सुख तो पहले अमृत, बाद में जहर, इसको भगवान कह रहे हैं, यह राजसिक सुख है। और फिर इसके बाद में, इसके पहले अमृत, भगवान साथ में, सुख के बाद में जहर।
विषयेन्द्रिय संयोग
विषयेन्द्रियसंयोगाद् यत्तदग्रेऽमृतोपमम्। परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥ आप सब पढ़ सकते हैं।
तो अभी साधारण जन क्या होता है, इस जगत में दो लोग थे, कुछ लोग थे वाइज (wise), अभी जो लोग थे अगर वाइज, जो अगर वाइज थे, वह वाइज नहीं होता है। ऐसे दो लोग थे, पर क्या होता है, क्योंकि हम ही ऐसे होते हैं, कभी-कभी हमें किसी को उपदेश देना होता है, तो ऐसे वचन आते हैं हमारे मन से, मुँह से लगता है, क्योंकि हिदायत देना सही है, किसे प्रकट करना सही है, किसे उपदेश देना होता है। पर जब हम लोग जो जाते हैं, गुस्सा आ जाता है, तो फिर वैसे करते हैं, कि हमने इन्हें ऐसे कैसे किया? क्यों किया ऐसे? क्या हमारे अंदर है, हम ऊपर-नीचे होने देते हैं? तो जो कभी वाइज (wise) होते हैं, कभी अदरवाइज (otherwise) होते हैं, ऐसे हम उपदेश देते हैं।
सुख और इन्द्रियों की सीमाएँ
तो अभी क्या है, कि हमारा जो जीवन है, इसमें अलग-अलग प्रकार से हमको सुख मिल सकते हैं। जो अलग है कि सारे जो द्वंद्व हैं, वह द्वंद्व हमें राजसिक सुख दिखाते हैं। कैसे हम इसे देखते हैं? दुनिया में देखते हैं, उसमें सारे आकर्षक लोग देखते हैं, वह भोग कर रहे हैं, और उससे लगता है कि यहाँ पर इतना सारा सुख है। पर उसमें एक समस्या यह है कि जो सुख है, विषयी इन्द्रिय से प्राप्त है।
जो इन्द्रिय विषय से सुख आता है, तो बात हो रही है यहाँ पर सूत्र, विषयेन्द्रिय, यह हमारे सेंस (sense) हैं और यह कोई सेंस ऑब्जेक्ट (sense object) है। जो इन्द्रियां हैं, इन्द्रियों का विषय है, तो इन्द्रियों का संयोग जो होता है, इंद्रिय कांटेक्ट (contact) होता है, तो क्या आता है? सुख रहता है। अगर स्वादिष्ट भोजन के लिए आते हैं, तो क्या सुख रहता है? कोई सुंदर चीज़ को देखते हैं, तो उससे कोई सुख रहता है। और जब सब लोग सुख चाह रहे हैं, प्रयास कर रहे हैं, तो उसमें अधिकांश लोग सोच रहे हैं कि मैं सुखी क्यों नहीं हूँ? अगर मुझे सुख चाहिए, तो क्या चाहिए होगा? तो क्या होगा कि मेरे पास यह सेंस ऑब्जेक्ट जो है, वह मेरे पास आ जाए, तो क्या होगा? मैं सुखी हो जाऊँगा।
अभी बस यह जो इन्द्रियां हैं, मेरी खाने की इच्छा है, पर स्वादिष्ट व्यंजन नहीं मिल रहा है। यहाँ मेरे पास इतना पैसा नहीं है कि स्वादिष्ट व्यंजन ला सकूँ। मैंने कहा था, कई बार लोग अपने मन से सोचते हैं। एक लड़का आया था प्रोग्राम के लिए, तो उसमें उसकी टी-शर्ट पर कोट (quote) लिखा था। कई बार लोग टी-शर्ट पर कुछ लिखते हैं क्योंकि अच्छा लगता है। कोट क्या है, देखते हैं। तो कोट क्या था? “90% of the world’s girls are beautiful, the remaining 10% are in my college.” तो दुनिया की 90% लड़कियां सुंदर हैं, बाकी 10% मेरे कॉलेज में हैं। तो एक तरह से अपने कॉलेज की लड़कियों का अपमान करता है।
पर दूसरा भाव क्या है कि अभी कौन सुंदर है? वह सुंदरता कैसे देखते हैं? वह टीवी पर देखते हैं, वह मूवीस पर देखते हैं, इंटरनेट पर देखते हैं। तो क्या होता है? वहाँ पर सारे और इन्फ्लुएंस होते हैं। सुंदर दिखने के लिए बहुत मेकअप (makeup) होता है। पहले एक फिजिकल (physical) मेकअप होता है, फिर बाद में डिजिटल (digital) मेकअप होता है। तो पहले क्या है? चारों तरफ से लोग सुंदर बनते हैं, और फोटोशॉप (photoshop) से फोटोशॉप करके और सुंदर बनते हैं। तो इसलिए क्या होता है, हम लोगों को लगता है कि वास्तव में जो सुंदर हैं, जो मैं टीवी में देखता हूँ, वह सुंदर है। अगर आज वास्तव में देखते हैं, तो लोग उतने आकर्षक नहीं रहते हैं। तो मुझे ऐसे कोई उतना सुंदर व्यक्ति मिल जाएगा, तो मैं सुखी हो जाऊँगा।
इन्द्रिय भोग की क्षमता (Capacity)
तो अधिकांश लोग सोचते हैं कि मेरे पास इन्द्रिय विषय नहीं हैं, इसलिए मैं सुखी नहीं हूँ। और इसलिए पैसे के पीछे हम बहुत भागते हैं कि मुझे इन्द्रिय विषय मिल जाएँगे, मैं पैसे से इन्द्रिय विषय प्राप्त कर लूँगा और फिर इन्द्रिय विषयों से मैं सुख प्राप्त करूँगा। तो यह अधिकांश लोग सोचते हैं कि मुझे यह अवेलेबिलिटी (availability) नहीं है। पर क्या है, अगर अवेलेबिलिटी होगी भी, तो भी उसके साथ एक समस्या है। और वह क्या है? हमारे सेंसेस (senses) के पास जो इन्द्रिय विषय जो हैं, यह अधिकांश अग्रे अमृतोपमम् परिणामे विषमिव, यह परिणाम में विष के समान है।
इसके लिए एक और बाधा है, अवेलेबिलिटी। एक तो सिंपल है कि यह जब समझेंगे, तो हम जो हैं, हमें यह इन्द्रिय विषय चाहिए, तो इसकी समस्या क्या है कि इसके लिए क्या विषय है? मैं खाऊँगा, आनंद आएगा मुझे। मैं गाऊँगा, आनंद आएगा मुझे। मैं डांस करूँगा। तो जो पहला है, अवेलेबिलिटी, और दूसरा है कैपेसिटी (capacity)। अगर हमें कितनी भी बहुत आकर्षक चीज़ें मिलती जाएँ, तो हमारी इन्द्रियों की जो भोग करने की क्षमता है, वह सीमित है। और कितना भी करेंगे, क्या वह उस सीमा को बढ़ा सकता है?
मान लीजिए कोई फाइव स्टार होटल का ही खुद मालिक है, कोई मिठाई की दुकान का मालिक है। जितना चाहता है, और धनवान भी है, उसको बेचने की ज़रूरत भी नहीं है, जितना खाना चाह सकता है, खाता है। तो फिर क्या वह जितना खा सकता है, चौबीस घंटे खा सकता है? नहीं, हमारे एन्जॉयमेंट की क्षमता जो है, वह सीमित है। इजिप्ट में जो राजा थे, प्राचीन काल में जिनको फराओ (Pharaohs) कहते थे। वह बहुत ऐशो-आराम की चीज़ें करते थे। तो उनमें से कुछ ऐसे फराओ थे, उन्होंने सोचा कि हम इस सारे लोगों के लिए क्या करेंगे? क्योंकि वह क्या करते थे, अपने जो वैद्य होते थे, उनको कहते थे कि ऐसी दवाई बनाओ जिससे कि मेरा खाया हुआ सारा उल्टी हो जाए, और बिना किसी दर्द के उल्टी हो जाए। क्योंकि वह क्या करते थे कि ऐसे बड़े सोने-चांदी के प्लेट में स्वादिष्ट व्यंजन खाते थे, और सारा खाके अगर पेट भर जाएगा, तो फिर एक उल्टी की दवाई पी लेंगे। फिर उल्टी कर लो और वापस खाओ। और ऐसे बार-बार खाते थे।
तो क्या होगा? वह सिर्फ पेट के फैलाव को बढ़ा सकते हैं। जो अंदर जाता है, जो बाहर आता है, वह भी एक अननेचुरली (unnaturally) बाहर आता है। उससे शरीर बहुत अस्वस्थ होता है। और जिन्होंने यह ट्राई (try) किया, फराओस ने, तो वह जवानी में ही मर गए। तो क्या है कि हमें भले ही कितने भी आकर्षक इन्द्रिय विषय मिल जाएँ, हमारी जो इन्द्रियों की क्षमता है, वह ही सीमित है। और क्षमता को हम बढ़ा नहीं सकते।
कुछ भी हो जाए, कितना भी किसी को इन्द्रिय भोग करना है, सेक्सुअल (sexual) वासनाओं के लिए, तो जो सेक्स की हमारी क्षमता है, वह बहुत सीमित है। और उसके बाद में कुछ भी करने से उस क्षमता को हम बढ़ा नहीं सकते। तो इसलिए जो क्षमता है, वह सारी दुनिया आपको बताती है, यह भ्रम है। अरे यह मिल जाएगा, यह मिल जाएगा, यह मिल जाएगा, आपको सुख मिलेगा। आप वह करवाओ, वह मिल जाएगा। वह कितने समय के लिए है? कैपेसिटी के लिए है। और यह कैसे है, यह कैपेसिटी जो है, शुरुआत से ही वह डिक्रीजिंग (decreasing) मिलने लगती है। जैसे व्यक्ति बड़ा होता रहता है, तो फिर एक समय के लिए क्षमता होती है। बुढ़ापा आने के पहले की क्षमता समाप्त हो जाती है।
पाश्चात्य देशों में इन्द्रिय भोग और मानसिक परिणाम
और कैपेसिटी, पाश्चात्य देशों में अभी जो इंटरनेट है, उससे जो पोर्नोंग्राफी (pornography) है, सब बड़े आसानी से सुलभ हो गया है। और उससे क्या हो गया है कि बहुत से लोग, टाइम वेस्ट बहुत हो गया है। और उससे भौतिक कारण, आध्यात्मिक, नैतिक कारण नहीं, भौतिक कारण से सब कह रहे हैं कि भाई हमें यह पोर्नोंग्राफी छोड़ना है। क्यों? क्या हो गया है कि वह सारे चित्र देखकर, कल्पना, वीडियो देखकर, कल्पना ऐसे हो गई है कि व्यक्ति, जो उसकी कल्पना बहुत स्टिमुलेट (stimulate) हो गई है, इमेजिनेशन (imagination) बहुत स्टिमुलेट हो गया है। और फिर रियल लाइफ (real life) में उसके लिए जो मौका भी मिलता है, वह एक्साइटिंग (exciting) नहीं होता है। तो फिर वह कहते हैं कि रियल लाइफ में संबंध नहीं जोड़ पा रहे हैं, बच्चे उत्पन्न नहीं कर पा रहे हैं, कुछ नहीं कर पा रहे हैं।
तो अगले दिन क्या होते हैं? उसको हैंगओवर (hangover) होता है। दो दिन पहले वह शराब पीने गए थे, तो शराब पीनी थी। जो अंदर से टॉर्चर (torture) हो रहा है, उससे चिड़चिड़ कर रहा है। तो इसमें क्या है, यह बाद में एक पूरी तरह से विषैला हो जाता है। जो सुख है, वह पहले सुख होता है, पर बाद में केवल यह पूरी तरह से विषैला हो जाता है। मैं तो पाश्चात्य देशों से जुड़ा था, तो वहाँ कौन से मान्यता से होते हैं? मुझे इनवाइट (invite) करते हैं एक सुख के लिए। कई बार मुझसे बात करना अच्छा लगता है। और एक बार शराबी ऐसे होते हैं, कि रस्ते पर पड़े होते हैं, और नशे में मदहोश होते हैं, इतने विषैले होते हैं।
कई बार ऐसे होते हैं कि बहुत सक्सेसफुल (successful) होते हैं जीवन में। पर जब शराब सामने आती है, तो स्नायुमंडल (nervous system) में होते हैं। माया वेलकम। कुछ करने की बात है। एक व्यक्ति बता रहा था मुझे, पाश्चात्य देशों में एक सेना भर्ती होती है। उनका फिलॉसफी (philosophy) है, ‘ड्रिंक लाइक ए ट्रंक’ (Drink like a trunk)। शराब पियो और सेना में लड़ो। वह कैसे है? कि सारी मंजिलें हैं, उसके आस-पास जाओ, उधर से नीचे झुक के देखो और गिरो। तो अभी कभी हवा का झोंका आ जाएगा, कभी पहले कुछ समझाएगा, कभी कोई धकेल देगा, क्या होता है? तो मैं कुछ कर नहीं पाया, तब मुझे लगा कि यह जो है, यह जो आदत है, इसमें मैं कुछ कर नहीं पाया।
कई बार आर्टिकल आया था, कि अमेरिका में ऐसा चल रहा था 1940’s, 50’s, 60’s में। एक बार इसे कहते हैं सेक्सुअल रेवोलुशन (Sexual Revolution)। सेक्सुअल रेवोल्यूशन मतलब कहते हैं कि यह पुरुष-स्त्री को वश में करने के लिए, विवाह करने के जो नियम हो रहे हैं, यह सब आउटडेटेड (outdated) हैं। इसे छोड़ देते हैं, जिसे जहाँ जो करना है, वह कर सकता है। तो उसका जो प्रभाव हुआ, उसकी स्टडी (study) हुई, तो 1980, 1990 से बढ़ गया है और आगे बढ़ते जा रहे हैं। तो जो लोग ऐसे करते हैं, उससे इन्फ्लुएंस (influence) हुए, तो ऐसे क्या है कि जो लोग ऐसे उनको जोक (joke) करते रहते हैं, वह उनका बुद्धि बिल्कुल अकेला रहता है। वह क्या है, वह सब समझते हैं कि नहीं, कुछ भी है, उसको रिझाने के लिए मैं किसी का इस्तेमाल कर रहा हूँ, और कोई व्यक्ति मेरा इस्तेमाल कर रहा है। तो “I am using and I am being used”, तो उससे बहुत अकेलापन होता है।
अध्यात्म और असली आनंद
यह सारा विषय है, जो विषय है, यह केवल किसी कल्पना नहीं है। यहाँ पे पहले जो अमृत है, पर उसके बाद में क्या है? वह हमको अवेलेबल (available) नहीं है। अवेलेबिलिटी (availability) नहीं है, कैपेसिटी (capacity) नहीं है। यह जो तृष्णा है, उच्च पर जाती है, बाद में क्या है? यह जहर है, यह बहुत बड़ा जहर है। और यह सारा समाज आज सिर्फ सिकुड़ता जाता है। अभी मैं 10 सालों से लगभग, हर साल मैं 8-9 महीने भारत से बाहर होता हूँ। बाहर जाता हूँ, यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, जो वेस्टर्न कंट्रीज (Western countries) कहते हैं, वहाँ जाता हूँ।
तो वहाँ बहुत लोग हैं, वह इस स्पिरिचुअलिटी (spirituality) के लिए आ रहे हैं। अभी उनको भारत में, भारतीय संस्कृति में आना है। भारतीय संस्कृति ऐसे है कि कोई ऐसे विवाह के लोग रुकते नहीं हैं, पर क्या है, उसको कोई सुखी नहीं है, अकेलापन होता है। और फिर उससे भयंकर बीमारी, उससे लोग मर जाते हैं। पर दुख क्या है? जो मन के स्तर पर टेंपरेरी (temporary) जहर है, जो जहर है, यह बहुत समय तक रहता है।
एक बार लगा जहर नहीं है, पर कुछ चीजें टेंपरेरी नहीं रहती हैं। जो अपनी इच्छाओं को नियंत्रण नहीं कर पाएगा, वह विश्वासपात्र नहीं रहता है। उसके कारण क्या होता है? जो विवाह होता है, वह टिकते ही नहीं। जो विवाह करते भी हैं, तो फिर विश्वासघात करते हैं। अपनी बात नहीं मानता है, तो विश्वासघात करता है। उसके कारण क्या होता है? कि बहुत अच्छा विश्वास प्राप्त नहीं करता है। तो क्या होता है? नहीं, वह बात नहीं है। क्या है, यहाँ पर लोग विश्वास प्राप्त नहीं करते हैं।
तो अभी ऐसा नहीं कि भोग नहीं कर रहे हैं, विवाह के बिना भोग कर रहे हैं। उससे क्या होता है, उसके टुकड़े होने लगते हैं, बच्चे नहीं हैं, परिवार नहीं हैं। एकदम अकेलापन आ जाता है, बोलते नहीं हैं। वह जीवित हैं, पर उनके जीवन के लिए कुछ नहीं होता है। तो यह जीवन के लिए कुछ नहीं होता है। अकेलापन आता है, बोलते नहीं बनता है। वह बहुत बड़ा दुख है। तो यह एक तरह से सोशल ब्रेकडाउन (social breakdown) के लिए है।
और वे हैं, करते हैं। अभी करना है, मतलब क्या है कि मुझे यह देखना है कि इसके बाद यह जहर आ रहा है, तो यह अमृत है। इसका क्या हम एनालिसिस (analysis) करेंगे? तो इसको समझेंगे, नहीं, मुझे इसके पीछे नहीं जाना है। और फिर उसके बाद में क्या है? यहाँ पे कमिटमेंट (commitment) है कि यहाँ पे जहर होगा पहले, वह जहर के बाद अमृत आने वाला है। वह जहर के बाद जो अमृत है, वह ज़रूर होगा। इसका क्या होता है कि यह पहले जहर, पहले अमृत है। यह बात नहीं है, हम कुछ सीख रहे हैं। थोड़ा बच्चा होता है, वह कहता है, मुझे सब खेलना है, मुझे स्कूल नहीं जाना। तो वह कहता है कि भाषा सीखने के लिए तुम सीखो। इसे सीखो, मुझे सिखाओ। क्या सीखने में आनंद है? सीखने में यही है कि सीखने में उसको समय लगता है, उसको एफर्ट (effort) लगता है। वह शुरुआत में जहर जैसा लगता है, मुझे सीखने में कष्ट लगता है।
उसके बाद में एक पूरा विश्व खुलता है उसके लिए। तो पहले जहर है, उसके बाद में क्या है? अमृत है। उसके बाद नया जीवन खुलता है। कोई बहुत अनफिट (unfit) है, वह थोड़ा एक्सरसाइज (exercise) करता है, उससे फिट (fit) हो जाता है। तो एक्सरसाइज करना आसान नहीं है, पर उसके बाद में एक पूरा विश्व खुलता है, कोई नया जीवन खुलता है, उससे फिट हो जाता है। वह एक अमृत है। तो एजुकेशन (education) जो है, पहले जहर हो सकता है, पर बाद में उससे अच्छा करियर बन सकता है।
तो यह जो है, यही प्रिंसिपल (principle) है, यह आध्यात्मिक मार्ग है कि हम आत्मा हैं। और जो आत्मा का सुख है, वह अनंत है। जो भी इन्द्रियां हैं, आत्मा है और भगवान हैं। सोल (soul) और कृष्णा (Krishna)। तब इसमें क्या है, सोल जो है, इटर्नल (eternal) है, शाश्वत है। भगवान हैं, वह भी शाश्वत हैं। पर अभी क्या है, इन दोनों का जो संग है, वह संग की दूरी वह डिज़ायर्ड (desired) नहीं है। अगर हम आत्मा के लिए शाश्वत हैं, भगवान शाश्वत हैं, अगर दोनों साथ में आ जाएँगे, तो सुख है, वह भी सनातन है। पर अभी क्या है, वह डिज़ायर्ड नहीं है।
एक कारण है कि यह डिज़ायर्ड नहीं है। दूसरा कारण क्या है कि इन दोनों में एक बहुत बड़ी दीवार है। वह दीवार क्या है? यह अविद्या है। यह हमारी इगोइज़्म (egoism) है। इसके कारण क्या है कि हम भगवान को जान नहीं पाते हैं। हम असीमित नारायण को जान नहीं पाते हैं। तो अब यह दीवार जो है, एक बैठ गया है। जो लोग कहते हैं कि मुझे गुरु का सान्निध्य मिल जाए, तो एनलाइटनमेंट (enlightenment) की क्या है? कि हम समझें कि भगवान वह सुख के सागर हैं, सबसे बड़े सुख हैं कृष्ण। सुख के सागर, सबसे बड़े सुख हैं वह। अगर हम समझते हैं, तो पहले हमको लगता है कि जरा भगवान के पास जाना है, मैं जरा भगवान के पास जाता हूँ। तो थोड़ी भक्ति में आ गए, तो सबको बता दिया था, मैं चाचा को बता आया था, मैं भगवान को मानता हूँ। वह पहले सुख है। और यहाँ पहले सुख है, तो भगवान की ज़रूरत क्या है? उनको लगता है कि जिस दिन मुझे इच्छा है, वह करने लगती, मुझे इच्छा लगती, मैं कहता हूँ, क्या आ गए? भक्ति में क्या सुख है? मुझे अच्छी लगती।
पर जैसे हम यह कंटेंप्लेट (contemplate) करते हैं, जो जगत छोटा लगता है। भगवान, भगवान मतलब क्या? हम सभी समझते हैं कि जो जगत से सुख मिलने वाला है, वह छोटा सा सुख, क्षुद्र सुख है। क्षुद्र सुख है, तो पूर्ति की इच्छा है, इच्छा बहुत ज्यादा है। सुख बहुत करना है, जगत छोटा लगता है। जगत छोटा लगता है, तो फिर जब यह हो जाएगा, तो यह स्टेट (state) ट्रांसफॉर्म (transform) हो जाएगा।
मन का ट्रांसफॉर्मेशन और आध्यात्मिक आनंद
ट्रांसफॉर्म मतलब क्या? कि तभी हमें एक स्वाभाविक रूप से दिव्य आनंद बहुत होगा। ट्रांसफॉर्म स्टेट मतलब क्या हो जाएगा? जो हमारी दृष्टि है, वह बदल जाएगी। उसमें क्या हो जाएगा? जो शुरुआत में जो अमृत है, वह इतना छोटा हो जाएगा, अमृत ही अमृतुच्छ है, यह पूरा जहर है। और इधर जो आध्यात्मिक चीज़ में जो शुरुआत में जहर है, वह इतना कम हो जाएगा, तो नाम के बराबर, पूरा अमृत है। चैतन्य महाप्रभु कहते हैं – “आनंदाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनम्।” यह पूरा अमृत है, पूरा अमृत है। तो वह क्या होगा? मुझे आकर्षण होगा। तो जब ट्रांसफॉर्म हो जाएँगे, तो फिर इधर जाने की इच्छा नहीं होगी, इधर ही पूरी-पूरी इच्छा होगी। इस तरह हम बड़े आनंद से भक्ति कर पाएँगे।
जो एन्जॉयमेंट (enjoyment) है, वह हमें एनलाइटनमेंट (enlightenment) से प्राप्त होगी। सबसे जो विशाल आनंद है, वह हमको मिल जाएगा। तो यह दो पॉइंट में हमें जाना है, हमें कमिट (commit) करना है। यह कमिट को कैसे करते हैं? जो हमें परिवर्तन करना है कि अभी हम जो रास्ता है दुनिया से, जो सुख मिल रहा है, और इस जगत से जो सुख है, वह प्राप्त करना है।
तो मैं पॉइंट पे आता हूँ, तो बहुत छोटी सी चीज़ है, इसको पता नहीं है। तो मैं सरेंडर (surrender) करने के लिए, वहाँ भी लोगों को बॉलीवुड (Bollywood) भाता है। तो मैं एक से खुले प्ले फ़ोन पे, वेब ब्राउज़र (web browser) पे वह bollywood.com नाम की वेबसाइट ले रहा हूँ। दस बार ले रहा हूँ, पचास बार ले रहा हूँ। फिर बाद में वह ऐसे जो कार्यक्रम है, एक संसार के लिए आता है। और जब आता है, तो सुख मैं वहीं तक पाता हूँ। तो क्या होता है, उधर वहीं तक जानने चाहता है, पास्ट (past) ने वहीं सेट (set) किया है। तो क्या है, वह ब्राउज़र हिस्ट्री (browser history) में स्टोर हो गया है। तो वह ऑटो-कम्प्लीट (auto-complete) के लिए आता है।
तो अभी क्या है, यहाँ से तो यहाँ bollywood.com जाना है, तो बड़ा आसान है। किसी को यहाँ से bollywood.com जाना है, तो क्या है, उसको बस बी-ओ-एल-एल (b-o-l-l) टाइप करना है। यह तो क्या है, हिस्ट्री नाम तो सजेस्ट करता है, बड़ी मेहनत कम करनी पड़ती है। यह जो है, अभी जो हमारा मन है, यह ब्राउज़र की हिस्ट्री के समान है। तो मन में क्या हिस्ट्री है, जैसे मेरा ब्राउज़र में आ गया तो अपने आप ही बॉलीवुड है। वैसे ही हमारा मन, मन के ब्राउज़र की हिस्ट्री में है। और मन में हैप्पीनेस (happiness), यह विचार आता है, जो सुख चाहिए, तो तुरंत ऑटो-कम्प्लीट क्या होता है? मतलब क्या है – कुछ खाओ, कुछ देखो, कुछ स्पर्श करो, कुछ भोग, इन्द्रिय भोग। यह जो है, एक अपने ब्राउज़र की हिस्ट्री में आता है।
हम मन पर संस्कार डालते हैं। मन के संस्कार हैं। हम सबको अनंत सुख अनुभव करने का मौका है। तो हम सुख अनुभव कर सकते हैं। पर तो जब इस हिस्ट्री में आ जाएँगे, तो हमको क्या है कि नो-फ़ेल ज़ोन (no-fail zone) है। यहाँ पर एनलाइटनमेंट (enlightenment) है कि हम जो सुख हैं, असीमित मात्रा में ऐसा सुख चाहते हैं, तो हमेशा-हमेशा करते हैं। बहुत धन्यवाद। हरे कृष्णा।
मन का स्वभाव और वासनाओं से मुक्ति
कुछ बहुत सवाल हैं। मैं तुम्हारे पास चला जाऊँगा, अध्यात्म के लिए करते हैं। मैं तुम्हारे पास चला जाऊँगा।
हमेशा के लिए ज़हन में आ सकते हैं। तो क्या है? हमारा मन ऐसा है, पहले वही हमको चोरी करने पर लगाता है, बाद में वही मन हमको डांटता है। मूर्ख, बेवकूफ! तो पहले क्या है? प्रोवोकर (provoker) है। तो वह शांत नहीं होता है। तो क्या होता है? तो कितने मूर्ख, कितने बेवकूफ हो! तो क्या है, कभी ऐसा हो भी जाए कि जब यह परिस्थिति आ रही है, यह हमारे अर्जेस (urges) होते हैं, और यह अर्जेस के सर्जेस (surges) होते हैं।
तो इसमें यहाँ लगा है, यह ऐसा है क्योंकि मान लीजिए कोई अंग्रेजी मैच है, पंगा लगा था। तो अभी कोई हमसे बहुत चाहता है, उसने यहाँ पूरा भी वह जो ज़मीन तक आ गया है, पूरा प्रयास कर लेता है, नहीं कर पाते हैं, खट-खट करते हैं। छोड़ते हैं। वैसे जाया हो गई है, इतना ज़मीन तक आ गया है, तो छोड़ते हो उसको। और उसमें क्या है, जो अंग्रेजी मैच है, एक टाइम का अंग्रेजी मैच है। मान लीजिए तीन मिनट का एक राउंड है। तो अगर आप तीन मिनट का अंग्रेजी मैच लड़ते हैं, उसके लिए दांतों का अंग्रेजी मैच लड़ते हैं, उसके बाद में जो अगला राउंड चालू होना होगा, वह यहाँ से चालू नहीं होगा। तो क्या है कि अगला इसमें जो पीक (peak) आ रहा है, उसको हम टॉलरेट (tolerate) कर लेते हैं।
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥
आप सहन कर लेंगे। अगला टॉलरेट (tolerate) करने के लिए।
तो मैं सही में, फॉर अ ह्वाइल (for a while) यह भी एक टेम्परेरी डेसिग्नेशन (temporary designation) है, काफी समय तक रहेगा, अगले कई जन्मों तक भी रहेगा, क्योंकि आत्मा की कुछ स्थिति भी टेम्परेरी के लिए है। तो जब हमारा मन हमको पीट रहा है, तो फॉर अ ह्वाइल मैं इतना सोचता हूँ कि बुरा लग रहा है, पर बुद्धि से देखें तो क्या है? मैं आत्मा हूँ, और इस शरीर से नहीं, हम नहीं रहेंगे, सोल (soul) अलग रहेंगे। यहाँ से वह चाहूँ इतना सोचता है, करना चाहते हैं। कैसे नुकसान हो जाता है, तो कैसे उससे निकल सकते हैं?
कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं कि जो इंटेलिजेंस (intelligence) है, किसी का इंटेलिजेंस स्ट्रांग (strong) होता है, मतलब क्या है कि उनको इंटेलिजेंस का एक्सप्लेनेशन (explanation) ज़रूरी है, उसके बिना वह नहीं मानते हैं। यह एक पॉसिबिलिटी (possibility) है, कुछ लोग हैं, इंटेलिजेंस को एक एक्सप्लेनेशन ज़रूरी है। क्या है यह? कारण निकालो, कारण निकालो, कारण निकालो। कुछ ना कुछ कारण, कुछ ना कुछ निकालते हैं। तो यह नहीं करते हैं। यह दो स्वभाव हैं। तो जब कोई सवाल पूछ रहा है, तो यह फर्स्ट (first) है।
तो यह क्यों कर रहा है? तो कैसे हो रहा है? कभी कोई इस पॉइंट पे आना है, तो यह एक आंसर (answer) है। तो शायद यह आंसर आपको समझ आता है, पर मैं यहाँ पर हूँ और यहाँ से मुझे यह आंसर समझ आता है। अगर कोई यहाँ पर है, तो क्या है, उसको वहाँ समझ नहीं आती है। क्या है कि शायद थोड़ा ऐसे पढ़ना जानती है, कि शायद मैं ऐसे संस्कृति जानती हूँ। तो थोड़े पर जब आप मिलें, पर समझ आती है, तो उसको थोड़ा और एविडेंस (evidence) दो। तो उसके पर शिवाजी मैं यहाँ से आज देखा, कोई ऑटो को लगी थी, नहीं दो।
तो क्या है, यह तकलीफ पहचानते हैं कि जब इसलिए नहीं करते, जनरली पर्सपेक्टिव्स (generally perspectives) वहीं जाऊंगा। कोई अलग-अलग पर्सपेक्टिव्स देख सकते हैं, ताकि वर्थ (worth) सभी को होगा। और अभी हमें कुछ ऐसा करना है कि कितना उसको समझाना है। अगर परिपूर्ण रूप से समझाने का प्रयास करते हैं, विकास करने के लिए, वह विकास नहीं करता है, तो यह नहीं केवल मन से, तो है ना एक ही मन्त्र है, “भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्।” तो शायद हम कहते हैं।
मन की बुद्धि है, वह महान है। जिसके लिए अब वह कारण, वह बहाना लेकर वह कमान चढ़ती है। But don’t jump to that conclusion. क्या है कि वह बहाना ही कर रहे हैं। शायद उनकी ज़रूरत है मुझे। मैं पाश्चात्य विश्व में जाता हूँ, तो उनको संस्कृति के बारे में कुछ पता ही नहीं है। तो हर चीज़ के बारे में समझती हूँ। मैं ऑस्ट्रेलिया में करती हूँ। अगर मंगलाचरण करते हैं, तो क्या होता है? जब शंख बज रहा होता है, तो सब दंडवत प्रणाम करते हैं। तो आरती के बारे में करते हैं। तो एक अमेरिकन क्रिश्चियन माता गिरती हैं, 55-60 की ऐज (age) में हो रही थीं। कि क्या मैं एक क्रॉसिंग (crossing) कर सकता हूँ? यह बहुत है। नहीं कि जब आप क्रॉसिंग के बारे में करते हैं। क्या वर्ल्ड में क्रॉसिंग करता हूँ? नहीं क्रॉसिंग करता हूँ। क्या लग रहे हैं? यह सब क्या चुंबन कर रहे हैं? शंख को जब यह चुंबन कर रहे हैं, अब हमको यह क्रॉसिंग रिडिकुलस (ridiculous) लगेगी।