Hindi – How Mahaprabhu frees from the illusions of the mind and the intelligence- Chaitanya Charan
- Home
- Audio Lectures
- Hindi – How Mahaprabhu frees from the illusions of the mind and the intelligence- Chaitanya Charan
Disclaimer: This transcript was generated using AI and may contain occasional errors or inaccuracies.
Lecture Summary
इस प्रवचन में चैतन्य महाप्रभु की अहितुकी कृपा, भक्ति के मार्ग में आने वाली बाधाओं और उनके समाधान पर विस्तार से चर्चा की गई है:
- दार्शनिक मतभेद और सांस्कृतिक आदर: प्रवचन का मुख्य संदेश यह है कि भले ही तत्वज्ञान (फिलॉसफी) के स्तर पर मतभेद या भिन्नता हो सकती है, परंतु हमें सांस्कृतिक रूप से किसी भी व्यक्ति या संन्यासी का अनादर नहीं करना चाहिए। हर व्यक्ति के गुणों का सम्मान करना चाहिए।
- अहितुकी कृपा और ‘पुश व पुल’ सिद्धांत: भगवान की कृपा ‘कॉजलेस मर्सी’ (अहितुकी कृपा) कहलाती है, जिसका अर्थ है कि हम जितना प्रयास करते हैं, भगवान उससे कहीं अधिक फल और कृपा प्रदान करते हैं। आध्यात्मिक प्रगति में दो मुख्य बल काम करते हैं—पुश (हमारा व्यक्तिगत प्रयास और साधना) और पुल (भगवान का दिव्य आकर्षण और कृपा)।
- अहंकार और हताश न होना: कभी-कभी बार-बार प्रलोभन या वासनाएँ आने पर भक्त हताश हो जाते हैं। वक्ता समझाते हैं कि यह इस बात का अहसास कराने के लिए भी हो सकता है कि हम केवल अपने बल पर शुद्ध नहीं हो सकते। हमें हताश होने के बजाय ‘डेडीकेटेड’ (समर्पित) रहकर निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए।
- मायावादी संन्यासियों के साथ लीला: जब महाप्रभु वाराणसी गए, तो वहाँ के मायावादी संन्यासी और उनके नेता प्रकाशानंद सरस्वती उनके संकीर्तन और नृत्य को देखकर उनकी निंदा करने लगे और नाराज़ हुए। महाप्रभु ने अपने ज्ञान के साथ-साथ अपनी अत्यंत नम्रता से उनके हृदय को परिवर्तित कर दिया।
Full Transcription
भगवान की अहितुकी कृपा और शरणागति का सिद्धांत
हरे कृष्णा! तो आज बहुत कृतज्ञ हूँ मैं आप सबके बीच में यहाँ पर आया हूँ और कई सालों के बाद पंजाबी बाग में आया हूँ मैं और यह आपका जो मंदिर परिवर्तित हो रहा है, हो गया है इसको देख के एक एंटीसिपेेशन, एक्साइटमेंट है कि किस तरह से भगवान की जो लीला है, यह चैतन्य लीला की आज हम चर्चा कर रहे हैं, वास्तव में अभी भी वो चल रही है। महाप्रभु अपनी कृपा से अनेक जगह पे परिवर्तन ला रहे हैं, तो आज हम इस श्लोक पर चर्चा करेंगे और महाप्रभु की कुछ लीलाओं से कैसे उनकी कृपा की शक्ति है, कैसे वो देते हैं और कैसे हम प्राप्त कर सकते हैं, इसके बारे में हम चर्चा करेंगे।
तो यहाँ पर भगवान बता रहे हैं, यहाँ पर कृष्णदास पर बता रहे हैं, मैं श्लोक का अर्थ बोलता हूँ, फिर हम उसको रिसाइट करेंगे। यहाँ पर कुछ दिख रहा है:
यस्य प्रसादाद अज्ञोऽपि सद्यः सर्वज्ञतां व्रजेत्।
स श्रीचैतन्यदेवो मे भगवान् संप्रसीदतु॥
अज्ञोऽपि सद्यः सर्वज्ञतां व्रजेत्—इसके प्रसाद के द्वारा क्या होते हैं? अज्ञोऽपि, कोई व्यक्ति अज्ञानी भी होता है, यस्य प्रसादाद अज्ञोऽपि सद्यः, सद्यः मतलब जल्दी ही सर्वज्ञतां व्रजेत्, उसको सारा जो ज्ञान है वो मिल जाएगा। स श्रीचैतन्यदेवो में भगवान् संप्रसीदतु—मैं प्रार्थना करता हूँ कि वो मुझ पर प्रसन्न हो जाए और मुझे भी कृपा करे भगवान् संप्रसीदतु।
यस्य प्रसादाद अज्ञोऽपि सद्यः सर्वज्ञतां व्रजेत् स श्रीचैतन्यदेवो मे भगवान् संप्रसीदतु।
यस्य प्रसादाद अज्ञोऽपि सद्यः सर्वज्ञतां व्रजेत् स श्रीचैतन्यदेवो मे भगवान् संप्रसीदतु।
यस्य प्रसादाद अज्ञोऽपि सद्यः सर्वज्ञतां व्रजेत् स श्रीचैतन्यदेवो मे भगवान् संप्रसीदतु।
अभी हम साथ में दोहराएँगे, रिस्पांसिबिलिटी नहीं, हम साथ में बोलेंगे।
यस्य प्रसादाद अज्ञोऽपि सद्यः सर्वज्ञतां व्रजेत् स श्रीचैतन्यदेवो मे भगवान् संप्रसीदतु।
यस्य प्रसादाद अज्ञोऽपि सद्यः सर्वज्ञतां व्रजेत् स श्रीचैतन्यदेवो मे भगवान् संप्रसीदतु।
यस्य प्रसादाद अज्ञोऽपि सद्यः सर्वज्ञतां व्रजेत् स श्रीचैतन्यदेवो मे भगवान् संप्रसीदतु।
चैतन्य महाप्रभु की अहितुकी कृपा
तो आज हम चैतन्य महाप्रभु की जो कृपा है, उसके बारे में चर्चा करेंगे और जो उनकी कृपा है, इसको हम चार पद्धतियों से कैसे वो कृपा उन्होंने अपनी लीलाओं से दर्शाई, यह समझने का प्रयास करेंगे। तो यहाँ पर बताया जा रहा है कि उनकी कृपा क्या है कि कोई अज्ञानी व्यक्ति भी क्यों न हो, वह सद्यः सर्वज्ञतां भजे, क्या वह अज्ञान से पूरा मुक्त हो जाएगा?
तो अभी यह सबसे पहले कृपा, इसका अर्थ क्या है कि जो कृपा होती है, एक तरह से भगवान बताते हैं भगवद्गीता के चौथे अध्याय में, 4.11 में: ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। तो यहाँ पर क्या है? भगवान बोल रहे हैं प्रिंसिपल है रेसिप्रोसिटी का। रेसिप्रोसिटी मतलब क्या कि आप जैसे करोगे, उसके अनुसार मैं पश्चात करूँगा। आप अगर मुझे निर्विशेष ब्रह्म के रूप में परम सत्य को जानना चाहते हो, तो मैं उस शाय, वैसे भगवान देते हैं। पर फिर भी हम देखते हैं अन्त में 18.66 में भगवान क्या बोलते हैं: सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ यहाँ पर भगवान ऐसे नहीं बोलते हैं कि जिस भाव से तुम मेरे पास आ जाओ, मैं सारे पापों से तुम्हें मुक्त कर कर दूंगा।
तो क्या होता है? एक रेसिप्रोसिटी, यहाँ पर भी एक तरह से रेसिप्रोसिटी ही है। तो क्या है? वो बोल रहे हैं कि आप मेरी, जब भगवान कृपा देते हैं तो क्या है? यहाँ पर हम कुछ भगवान के लिए करते हैं और जब भगवान देते हैं वो बहुत विशाल मात्रा में होता है। हम जब कहते हैं, इंग्लिश में शब्द आता है ‘कॉजलेस मर्सी’। तो कॉजलेस का अर्थ क्या है? कई बार कुछ संस्कृत शब्द होते हैं, उनको जब किसी और भाषा में ट्रांसलेट करते हैं, तो वो एक ‘अहितुकी’ बोलते हैं, अहितुकी भक्ति होती है, अहितुकी कृपा होती है।
तो कॉजलेस का मतलब ये नहीं कि कॉज है नहीं है, कॉज है, पर जब कॉजलेस मर्सी कहते हैं उसका मतलब है कॉज बहुत, मर्सी के लिए कि जितनी कृपा मिल रही है, जितना हमने कुछ किया है, उससे भगवान बहुत ज्यादा देते हैं हमें। प्रयास करना चाहिए, हमें प्रयास क्यों करना है? क्योंकि भगवान कभी किसी की स्वेच्छा पर वो जबर्दस्ती नहीं करते हैं। अगर हम प्रयास नहीं कर रहे हैं, इसका मतलब है कि हमें इच्छा नहीं है उनके पास आने की। अगर हमसे इच्छा नहीं है, तो भगवान जबर्दस्ती नहीं करेंगे, पर हमें थोड़ी इच्छा होगी तो भगवान बहुत कुछ कर देंगे।
इसे कृष्ण के बारे में बोलते हैं: अहो बकीयं स्तनकालकूटं… कि जो पूतना आई थी वो इसलिए आई थी कि वो भगवान को जहर देना चाहती थी, पर जहर देते हुए उसने क्या, पहले दूध दे दिया अपने स्तनों से और भगवान ने बस वो देखा और कहा कि ये मेरी धात्री बन जाएगी। तो अभी जो उसने किया बहुत कम था, पर सनातन काल के लिए भगवान ने उनको धात्री बना दिया। तो ये है भगवान जब कृपा करते हैं, तो जो हमारी कृपा जो हमें मिलती है, हम जो करते हैं वो बहुत कम है और जो भगवान देते हैं वो बहुत ज्यादा है। तो जो भगवान की कृपा कैसे होती है, ये हम समझने का प्रयास करेंगे।
कलियुग और महाप्रभु की करुणा
तो सबसे पहले जो है कि शास्त्रों में कई जगह पर बताया गया है कि भगवान त्रियुगी है। त्रियुगी है मतलब क्या? वो तीन युगों में आते हैं: सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग में वो आते ही नहीं है। तो अभी इसका मतलब क्या है कि भगवान आते ही नहीं है?
तो मैं शिकागो में प्रचार के लिए गया था। तो जब वहाँ पर गया था, हम जब जा रहे थे, एक जगह से शिकागो काफ़ी बड़ा सिटी है, अच्छा सिटी है, पर उसमें काफ़ी अंडरवर्ल्ड भी है, वहाँ पर क्राइम्स काफ़ी है, कभी उसको अमेरिका क्राइम कैपिटल कहते हैं। ऐसे नहीं है, चैतन्य महाप्रभु को बोलते हैं कि सबसे करुणापूर्ण अवतार है। तो कलियुग जो है, ये एक नैसर्गिक विपत्ति के समान है। साधन तो एक नैसर्गिक विपत्ति होती है, वो एक महीने, दो महीने के लिए रहती है, एक घंटे के लिए रहती है, एक दिन के बार-बार वीव्स आते रहते हैं।
मैं ऑकलैंड में था, वहाँ पर एक लेक्चर दे रहा था और एक चेयर दे रहा था, मंदिर में और अचानक सब लोग हिलने लगे, मेरा चेयर भी हिलने लगा। वो प्लेन में बैठेगा, व्यक्ति करेगा तो भगवद्धाम जाएगा, पर वो एयरपोर्ट में ही संतुष्ट हो जाता है। तो यह ऐसी प्लस सत्त्वगुण में थी, तो मायापुर में बहुत पंडित लोग थे उस समय और वहाँ पर शास्त्रों के तर्क पर बहुत सारे डिबेट्स हुआ करते थे और फिर वहाँ पर पूजा हुआ, गंगा की पूजा हुआ करती थी।
वहाँ पर ऐसे अधिकांश लोग थे जो धर्म का कुछ न कुछ तर्क के अनुशीलन करते थे। पर अभी ऐसे वातावरण में जो था, एक व्यक्ति था और दो व्यक्ति थे, वो बहुत तामसिक बन गए थे, ये थे जगाई और मदाई। अभी कई लोग ऐसे होते हैं कि उनका बुरे संग के कारण, उनका बचपन ही कोई बुरे परिवार में हुआ है, बुरी लोकेलिटी में हुआ है तो वो बचपन से ही बुरी आदतों में फँस जाते हैं। कुछ ऐसे होते हैं कि वो अच्छे परिवार में जन्म हुआ है उनका, पर बाद में क्या होता है? किसी कुसंग के कारण वो बुरे हो जाते हैं, वो बुरी आदतों में फँस जाते हैं।
अभी कई भारतीय लोग यहाँ से अभी अमेरिका में गए हैं, कई परदेश में गए हैं, वहाँ पर सेटल हो गए हैं, तो बच्चों को जो इंडियंस जो अमेरिका में गए हैं, उनको हम उनको एबीसीडी कहते हैं। किसी को पता है एबीसीडी क्या है? एबीसीडी है अमेरिकन बॉन्ड कन्फ्यूज्ड देशी कि वो क्या लोग होते हैं? एक तरह से वो अमेरिका की संस्कृति में बड़े हो रहे हैं, वो बाक़ी बच्चे जो उनके साथ स्कूल में जा रहे हैं, तो वो अमेरिकन बनना चाहते हैं, पर क्या है वो शरीर से इंडियन है। तो उनको कभी-कभी कहते हैं कि वो नारियल जैसे हैं। नारियल कहा, बाहर से ब्राउन है, अंदर से सफेद है, मतलब क्या है कि स्किन उनका ब्राउन है, पर वो कल्चरली कई बार वेस्टर्न बन जाते हैं।
तो अभी क्या है, ऐसे जब होता है तो कोई अच्छे परिवार में जन्म लिया है तो अगर वो भौतिकवाद में चल जाता है तो कभी-कभी बाक़ी लोगों से ज़्यादा भौतिकवाद में चल जाता है। क्या है कि उसको लगता है कि बचपन मुझे कुछ भोग करने को मिला नहीं तो अभी जवानी में मिलेगा तो बाक़ी सब से और ज़्यादा करूँगा। तो ऐसे लोग कभी-कभी ज़्यादा ही पतित हो जाते हैं।
पर जब ऐसे होता है कि उनको सिर्फ एंजॉयमेंट नहीं करना है, तेरे एंजॉयमेंट इज़ नॉट जस्ट फॉर प्लेजर, तेरे एंजॉयमेंट इज़ फ़ॉर रिबेलियन कि वो भौतिक भोग इसलिए नहीं कर रहे हैं कि मुझे आनंद चाहिए, वो भौतिक भोग इसलिए कर रहे हैं कि जो मुझे सिखाया था, उसके ख़िलाफ़ मुझे जाना है। तो इसलिए वो ज़्यादा करते हैं वैसे।
तो अभी क्या होता है, जब जगाई-मदाई ये पतित हो जाते हैं, जगाई-मदाई, जगदानंद, माधवानंद होते हैं, वो ब्राह्मण होते हैं, पर वो दुस्संग से पतित हो जाते हैं और इतना पतित हो जाते हैं कि ऐसे बजाता है वहाँ पर बाक़ी लोग तो शुद्ध होते हैं, काफ़ी हद तक शुद्ध होते हैं तो वो सोचते हैं कि इनकी छाया भी हम पर पड़ जाएगी तो क्या होगा? हम दूषित हो जाएँगे। छाया भी पड़ जाएगी तो हमें गंगा में जाके स्नान करना पड़ेगा।
तो अभी ऐसे परिस्थिति में, ऐसे माहौल में जो नित्यानंद प्रभु ये प्रचार करने जा रहे हैं। नित्यानंद प्रभु जब प्रचार करने जाते हैं, तो उनको सुनते जगाई-मदाई के बारे में चैतन्य भागवत में वर्णन आता है कि वो जब सुनते हैं ऐसे तो उनको प्रचार करने जगाई-मदाई के बारे में। यह कृपा होती कैसे है वास्तव में?
अभी जगाई-मदाई के बारे में कृपा कहते हैं, कृपा में जगाई-मदाई के बारे में कृपा में क्या है? कि जो हम कर रहे हैं उससे बहुत ज़्यादा हमें कुछ मिल रहा है। हमें भी कुछ करना पड़ता है, पर करने से हमें बहुत ज़्यादा मिलता है। तो जो स्पिरिचुअल प्रोग्रेस होता है, आध्यात्मिक प्रगति होती है, उसमें दो प्रिंसिपल्स होते हैं: एक पुश प्रिंसिपल और दूसरा पुल प्रिंसिपल।
अभी पुश और पुल मतलब क्या है कि जो पुश है, ये ह्यूमन एफ़र्ट है। हम ख़ुद को पुश करते हैं, हम ख़ुद प्रयास करते हैं कि मैं शुद्ध होने का प्रयास करूँ, मैं यह बुरी आदत छोड़ूँ, मैं रोज़ साधना करने के लिए सुबह जल्दी उठ जाऊँ। यह पुश का प्रिंसिपल है और जो पुल का प्रिंसिपल है, वो क्या है? वो भगवान की कृपा है, वो कृष्णाज़ अट्रैक्टिवनेस, कृष्णा अपना जो आकर्षण है, वो दिखा देते हैं जिससे कि हम उनकी ओर खिंच जाते हैं।
पुश और पुल का सिद्धांत (Push and Pull Principle)
तो अभी इससे चार पॉसिबिलिटीज हो सकती हैं कि अगर कुछ पुश भी नहीं है और पुल भी नहीं है तो क्या होगा? वो ख़ुद प्रयास कर नहीं रहा है, उसको भगवान की कृपा भी नहीं है तो क्या होगा? तो इट इज़ एक्सप्रेस वे है, वो पर एक्सप्रेस वे वैकुंठ है? नहीं है, वो एक्सप्रेस वे टू हेल है वो। तो व्यक्ति ख़ुद भी सुधरने का प्रयास कर रहा नहीं कर रहा है, भगवान की कोई कृपा भी नहीं है उसमें।
भगवान मतलब पुश मतलब क्या? हम ख़ुद को प्रयास करके हम भगवान की भक्ति में आने का प्रयास कर रहे हैं। अभी पुश है, तो ये जो है तो पूरा विनाश का मार्ग है। तो अधिकांश जगत जो है, दुर्भाग्यवश से वो ऐसे है कि नहीं तो वो भगवान की कृपा के छाया में आए हैं, नहीं कुछ अध्यात्म की कुछ प्रयास कर रहे हैं। वो स्वयं ह्यूमिलिटी दिखा रहे हैं। ह्यूमिलिटी मतलब नो लस्ट, ऐंगर, ग्रीड, पर ह्यूमिलिटी मतलब नो प्राइड, नो एगो, नो एरोगेंस।
जो अभी एगो कहते हैं, एगो का फुल फ़ॉर्म क्या है? एगो इज़ गॉड एजिस्ट, एज इगो! डिम्ड… ये भी जाए सुनव रांथति साल्डरतो्म में, मुरे लाथ रांथि। कोई बहुत लोभी बन जाता है, बहुत एकावादी बन जाता है तो दिखता है कि ये तो भगवान से दूर चला गया है। ये तो इतना भौतिकवादी बनना है, इतना इंद्रिय भोग में चला गया है।
पर जब गर्व आता है, तो एक तरह से गर्व में पर क्या है? जब हम जप कर रहे हैं, ये भाव नहीं है हृदय में अरे भगवान कितने महान हैं, मुझे भगवान का स्मरण करना है, यह भाव है। सबको पता चलना चाहिए मैं कितना महान भक्त हूँ, सबने देखना चाहिए मैं कितना स्ट्रिक्टली नियम पालन करता हूँ, मैं कितना सीरियस भक्त हूँ। तो क्या होता है? इगो के कारण भगवान का स्मरण नहीं हो रहा है।
जो मदाई थे, वो क्या कर रहे थे? ना केवल काम, क्रोध, लोभ चला गया, पर जो अहंकार था, वो भी चला गया। इतना परिवर्तित हो गए वो उससे साधारण था, आसानी से अहंकार हो सकता था, पर वो अहंकार भी नहीं रहा। तो जो महाप्रभु की कृपा है, उससे एक पुल हो गए वो। काम, क्रोध, लोभ से परे, पर उन्होंने कुछ प्रयास किया, पुश किया कि मैं अहंकार में नहीं फँसूँगा। तो ये महाप्रभु की कृपा है।
तो अभी दादा की दो प्रकार से कृपा हो सकती है कि कोई मन के स्तर पे जो है, बहुत पतित है, बहुत सी अवस्था है तो हमें जो जगाई-मदाई एक तरह से क्या है? हम सब के लिए एक आदर्श है कि हमें भगवान की कृपा से हमें, भगवान हमें शुद्ध कर दें।
पर कभी-कभी जैसे होता है कि हम जप कर रहे हैं, साधना कर रहे हैं, पर फिर भी शुद्ध नहीं हो रहे हैं, फिर भी काम, क्रोध, लोभ जो जा नहीं रहा है, तो कभी उससे हताश हो जाएँगे क्या? शायद भगवान कृपा दे ही नहीं रहे हैं, क्या भगवान चाहते नहीं मैं शुद्ध हो जाऊँ? ऐसे नहीं है। क्या है? कई बार ऐसे हो सकता है कि अगर भगवान बड़ी आसानी से हमें काम, क्रोध, लोभ से मुक्त कर देंगे तो उससे हमें गर्व आ जाएगा और जब गर्व आ जाएगा, वो उससे बड़ी समस्या है।
तो अभी देखें तृणादपि सुनीचेन पहले बताया महाप्रभु ने, उसके बाद में न धनं न जनं सुंदरीं… तो जब हम प्रयास करते हैं शुद्धिकरण का और शुद्धिकरण नहीं होता है, तो उससे धीरे-धीरे हमें समझ में आता है कि हे प्रभो, यह मैं खुद नहीं कर सकता। तो हम पुश कर रहे हैं और पुश करना ज़रूरी है, पर अगर हमारे पुश से ही परिवर्तन हो गया, मैं कुछ इतने स्ट्रिक्टली नियम पालूँगा, कुरा और सारे अनर्थ छोड़ जाऊँगा, अगर उससे पुश से ही ट्रांसफॉर्मेशन, परिवर्तन हो गया तो क्या होगा? हमको भगवान के पुल की ज़रूरत महसूस नहीं होगी। और फिर अगर मुझे लगता है कि मेरे प्रयास से मैं परिवर्तन हो गया हूँ, मेरे प्रयास से मैं शुद्ध हो गया हूँ तो उससे ज़रूर गर्व आ जाएगा।
पर जब हम प्रयास करते हैं, प्रयास करते हैं, गिरते हैं, पुनः उठते हैं, पुनः गिरते हैं, पुनः उठते हैं, पुनः गिरते हैं, उससे हम हताश हो सकते हैं। पर हताश होने की जगह पे अगर हम यह देखते हैं कि भगवान मुझे दिखाना चाहते हैं कि यह मैं खुद नहीं कर सकता, मैं अलोन नहीं, मैं अलोन नहीं कर सकता। जब यह हम स्वीकार करते हैं, बोलने के लिए आसान है, जब हम हृदय में स्वीकार कर लेते हैं, तो फिर क्या है? उसके बाद में जब हमें पुल करेंगे भगवान तो हमें कभी गर्व नहीं होगा। पता है कि यह मैंने परिवर्तन नहीं किया है, यह भगवान की कृपा से ही परिवर्तन हुआ है।
इसलिए हमें कभी भी हताश नहीं होना है। हम, हम ट्राय कर रहे हैं, यह ट्राइंग, पर जो प्यूरिफिकेशन, जो अगर नहीं हो रहा है, तो अगर नहीं हो रहा है तो इससे क्या एक है कि हम हताश हो जाएँगे? कहा रहा है, यह तो कभी होने वाला नहीं है, छोड़ दो इसको। कुछ भक्त होते हैं, वो भक्ति करते हैं, मैं एक भक्त से मिला आज मैं इंग्लैंड में था, कुछ समय पहले न्यू ईयर के समय में पहला कि आज मैं करता हूँ, मैंने छोड़ दिया है। क्या छोड़ दिया है? मैं अगर नहीं हो रहा है तो पहले मैंने त्याग करने की इच्छा को ही त्याग कर दिया है।
क्योंकि क्या होता है? हम छोड़ नहीं पाते हैं तो वो बहुत प्रयास करते हैं। हरे कृष्ण, यह ट्राई किया, वो ट्राई किया, कुछ उनका छूट ही जा रहा था तो फिर वो बोले, तो हर बार मिलते हैं, बोले कि अच्छे भक्त हैं, उनको शास्त्र में बहुत रुचि है, कुछ कंडीशनिंग उधरते हैं, वो जाते ही नहीं है। चाय क्या इतनी बड़ी बात है? छूट सकते हैं आराम से, पर नहीं छूट रहा है उनको।
तो फिर ओवरऑल से बात कर रहा था, मैंने फैसला कर लिया है, क्या? कि चाय छोड़ना मेरा नेक्स्ट लाइफटाइम का प्रोजेक्ट है। इस जीवन में उससे होने वाला नहीं है। तो मैं बोले कि नहीं, पर परिस्थिति कि नेक्स्ट लाइफटाइम में भी होगा? नेक्स्ट लाइफटाइम में बोलेंगे, नेक्स्ट लाइफटाइम में भी होगा? तो क्या है कि अगर इस जीवन में नहीं होने वाला है तो इसका क्या गारंटी है अगले जीवन में हो पाएगा?
तो इसे बोला कि नहीं, एबंडन उस पर फ़िक्सेट मत करो, तुम किस-किस को छोड़ नहीं पा रहे हो। तो इससे इतना हताश में तुम्हें पतित मत हो जाओ, मैं इतना पतित हूँ कि परिवर्तन होगा है नहीं। तो क्या है? हमें डिजेक्टेड नहीं होना है, हमें डेडीकेटेड होना है। डेडीकेटेड मतलब क्या है? कि मुझे प्रयास करते रहना है, भले ही परिवर्तन न हो, पर मैं प्रयास करते रहूँगा।
उससे क्या होगा? जब परिवर्तन होगा, हमें पूरा विश्वास रहेगा कि मेरे प्रयास से नहीं हुआ है, तो उससे वास्तव में नम्रता आ जाएगी। तो हमें हम नहीं प्रयास करने के लिए, प्रयास करने के लिए कि हम प्रयास करने के लिए, कृष्णा के लिए नहीं प्रयास करने के लिए कि भले ही मैं यह आसक्ति छोड़ न पाऊँ, फिर भी मैं भगवान की भक्ति करते रहूँगा। यह आसक्ति छोड़ना अच्छी बात है, पर नहीं छोड़ पाई तो भी मैं भगवान की भक्ति करते रहूँगा।
इसका भाव क्या है? भाव यह है कि अगर आसक्ति छोड़ दी जाएगी तो शायद मुझे और आदर मिलेगा, मेरा और सम्मान होगा। भी अगर आसक्ति है भी, अगर लोग बोलेंगे कि यह क्या, तो इतना आसक्त भक्त है तो उससे थोड़ा मेरा अहंकार को थोड़ा चोट पहुँच रही है, पर शायद उससे मैं गर्व से जो है, सुरक्षित रह रहा हूँ।
तो यह भगवान की कृपा अलग-अलग पद्धति से आती है। जब महाप्रभु इतने कृपालु हैं, बोलते हैं महाप्रभु इतने कृपालु हैं और मेरी आसक्ति नहीं छूट रही है, कहाँ है कृपा? वो कृपा है, पर कृपा अलग रूपों में आती है कभी-कभी। तो कभी कृपा ऐसे मर्सी जो है, कृपा हो सकती है, पर कभी-कभी द रिकरेंस ऑफ़ टेम्पटेशन, वो मोह आ रहा है, वो प्रलोभन आ रहा है, वो भी कृपा हो सकती है। ऐसे नहीं है कि जब हमें वही वासना आ रही है, मोह आ रहा है, कहाँ है कृपा? ऐसे नहीं कि भगवान कृपा नहीं कर रहे हैं, पर भगवान की कृपा किसी और भाव में है। वो क्या है? भगवान ये कृपा हमें लगा जाते हैं कि तुम स्पष्ट रूप से समझो कि तुम कर्ता नहीं हो, तुम खुद का शुद्धिकरण नहीं ला रहे हो।
तो अब इसका मतलब ये नहीं है कि अगर हम बार-बार प्रलोभित हो रहे हैं, उससे पतित हो रहे हैं तो अरे, यह भगवान की कृपा है? नहीं, ऐसे नहीं है, हमें प्रयास करना है। ऐसे नहीं है कि हम जो भी नहीं कर पाते हैं, वो करने का प्रयास भी नहीं करते हैं, यही भगवान की कृपा है। मुझे नहीं, नहीं, वो भगवान की कृपा नहीं, उसमें हमें अभी तक पुल नहीं आया है, पर हमें पुश करते रहना है।
जो पुश और पुल का प्रिंसिपल है, वो क्या है? जो दामोदर लीला में दो उँगलियाँ हमेशा बाँधने का प्रयास कर रही थीं, पर रस्सी हमेशा कम पड़ रही थी। तो यशोदा मई का बाँधने का प्रयास है, वो क्या है? वो पुश प्रिंसिपल है और जो रस्सी कम पड़ रही है, मतलब क्या है? अभी तक वो पुल प्रिंसिपल नहीं आया है। तो पुल प्रिंसिपल नहीं आया है तो मैं जहाँ पे हूँ, थोड़ी प्रगद्दी करता हूँ, तो थोड़ी प्रगद्दी करता हूँ तो अधिकृति हो जाती है। कभी हम थोड़ा आगे जाते हैं, फिर यू-टर्न ले लेते हैं, फिर एल-टर्न ले लेते हैं, क्या फ़ायदा है?
पर डेडीकेटेड मतलब क्या है? इवन इफ़ नो पुल, मुझे कुछ आकर्षण एक दिव्य महसूस नहीं हो रहा है, स्टिल मैं पुश करते रहूँगा। अभी मदाई को ये सब करना कि वो खुद एक घाट बनाए, सब लोगों से जाके एक क्षमा में याचना करे, ये करने की कुछ ज़रूरत नहीं थी। महाप्रभु उन्हें बताया नहीं था तुम ऐसे करो, पर ये था खुद ही वो कर रहा था, ये कहा था? ये उनके नम्रता का लक्षण था कि मैंने गलतियाँ की हैं, महाप्रभु ने एक क्षमा कर दिया है, पर दूसरों से भी एक क्षमा चाहिए मुझे। तो वो कहा, खुद उनको पुल हो गया था, पर फिर भी वो पुश दर्श हो रहे थे।
तो भक्ति में पुल और पुश दोनों होता है। हमें देखना है कि जो हम पुश कर रहे हैं, वहाँ हमें हमेशा करते रहना है। तो पुश से कभी-कभी आधा पुश होगा, नहीं चलेगा, नो परिवर्तन। परिवर्तन नहीं हो रहा है, पर फिर भी हम प्रयास करते रहते हैं।
बुद्धि की संकल्पनाएँ और मायावादी संन्यासी
तो अभी यह है हमारी मन की जो भावनाएँ हैं, वासनाएँ हैं, उसके कारण हम बन जाते हैं। अभी दूसरा है कि हमारी बुद्धि की संकल्पनाएँ हैं, जिससे हम बच जाते हैं, तो उसके बारे में हम चर्चा करेंगे अभी।
अभी महाप्रभु जो है, वो उन्होंने सन्यास लिया था, उसके बाद में कहाँ गए वो? साउथ इंडिया और नॉर्थ इंडिया। अभी नॉर्थ इंडिया में महाप्रभु वाराणसी में गए। अभी प्रभुपाद जी बोलते हैं, वाराणसी इज़ द वृंदावन ऑफ़ द मायावादीज़। वाराणसी जाइए, ये मायावादियों का वृंदावन है। जैसे कृष्ण भक्त स्वाभाविक रूप से वृंदावन जाते हैं, वैसे मायावादी वाराणसी जाते हैं। तो अभी महाप्रभु जो वाराणसी में गए, कैसे हुआ? वो पहले वाराणसी गए, फिर वाराणसी से वृंदावन गए। मैं थोड़ा सिंपल दिखा रहा हूँ, यह वृंदावन से पुनः वाराणसी आ गए। तो दो बार वाराणसी आए थे।
तो जब वहाँ पे आए तो क्या हुआ? यह जो लीला है, वो बहुत सुंदर लीला है, उसमें कई में लीला है, पर उसमें कई साइड लेसर भी हैं। तो यहाँ पर अनेक मायावादी थे और वो मायावादियों का एक लीडर था, तो नाम क्या था? प्रकाशानंद सरस्वती।
अभी उस समय, अभी कोई भी उस समय काफ़ी सन्यासी हो जाते थे, पर फिर भी महाप्रभु एक एक्स्ट्राऑर्डिनरी सन्यासी थे, बहुत, बहुत युवक थे, बहुत वो उनका एक एफ़्लुएंस था, कांति थी उनकी। तो जब महाप्रभु मायावादी वाराणसी में आए, तो सब लोग बात करने लगे, यह कौन आए? तो भी साधारण अंत्य कोई वृंदावन में आता है, कोई वाराणसी में आता है, तो कोई सन्यासी होगा तो उनकी अपेक्षा थी कि सन्यासी हमारे पास आए, हम यहाँ पर लीडर हैं। तो अगर कोई मंदिर में कोई भक्त आता है, अगर मंदिर में आता है, उस मंदिर में कोई वरिष्ठ भक्त है, कोई वरिष्ठ सन्यासी है तो कोई भक्त वहाँ पर आएगा तो तुम बोलोगे मैं उनका दर्शन करना है, उनकी आशीर्वाद देना है, उनसे कुछ संग लेना है। पर कोई मंदिर में आता है, मंदिर के कोई गेस्ट हाउस में रहता है, पर उतनी शांति पर, जो सन्यासी गुरु पर, जो सन्यासी गुरु पर… यह एक तरह से विचित्र चीज़ देख लेते हैं।
अभी जब अमेरिका में प्रभुपाद जी ने रथयात्रा चालू की तो क्या था कि वो जो अधिकांश लोग जो पहले आए थे, वो सब हिप्पी लोग थे। जो अभी हिप्पी लोग, वो काउंटर कल्चर थे, मतलब क्या? जो भी समाज में हो रहा है, उसका उल्टा करना है। पर उन्होंने भी ऐसी कल्पना है क्योंकि हम रास्ते पर नाचेंगे। अमेरिका पार्टी वगैरह होते हैं, पर क्या है? वो पार्टी पर नाचते हैं। अभी रास्ते पर जाके नाचेंगे। अगर कोई रास्ते पर जाके नाचेगा तो क्या है? तुम शराब ज़्यादा पी लिया है क्या? तो पुलिस उनको अरेस्ट कर लेगा। पर यहाँ पर प्रभुपाद जी रथयात्रा बनाए, ये रास्ते पर नाच रहे हैं और पुलिस उनको एस्कॉर्ट कर रहे हैं भी। तो यह बहुत एक्स्ट्राऑर्डिनरी हो गया हो तो वो लोग कई बार रथयात्रा में आते थे, उनको जगन्नाथ में कोई रुचि नहीं थी, उनको रास्ते में नाचने में रुचि थी तो इसलिए लोग आ जाते थे।
पर यह पॉइंट ही है यहाँ पर कि कुछ लोग ऐसे काउंटर कल्चर के लोग होते थे, उनको राचने में बड़ा आनंद आ जाता था, बाक़ी लोग होते थे, क्या कर रहे हैं तुम, तुम हमारा ट्रैफ़िक डिस्टर्ब कर रहे हो, तुम हमारा यह अपना इतना आवाज़ कर रहे हो, तो वो लोग जो देते थे, नाराज हो जाते थे। एक भक्त बता रहे थे मुझे कि मैंने पहली बार किसी को एक भक्त को धोती में देखा, एक व्यक्ति को धोती में देखा, यह क्या पहना है इसने, कुछ समझ भी नहीं आया कि अलग-अलग प्रकार के मुझे लगा, यह तो एक बड़ा ओवरसाइज डाइपर है, यह लगा। तो वो कुछ समझ भी नहीं आया तो कैसे?
उसी तरह से क्या हो गया? अभी जब महाप्रभु कीर्तन कर रहे थे रास्ते थे तो सारे माया में देखे, क्या कर रहा है यह? अभी वो थोड़ा अलग भाव था यहाँ पर, यह पाश्चात्य देशों को लोगों को यह कीर्तन क्या है पता ही नहीं था उसमें। अभी तो ऐसे हो गया है कि कीर्तन इतना पॉपुलर हो गया है कि अमेरिका में वो क्रिश्चियन कीर्तन होता है, क्रिश्चियन योगा होता है। क्रिश्चियन योगा तो बहुत बड़ा चीज़ है, वहाँ पर वो क्या होता है कि जैसे हम ओम वगैरह बोलते हैं, वो जीसस का नाम लेते हैं और फिर योग करते हैं तो वो सारे उन्होंने तो अभी काफ़ी पॉपुलर हो गया है, पर उस समय क्या था कि लोगों को पता ही नहीं है कीर्तन क्या है।
पर जब अभी जब मायावादी थे, अभी मायावादी को क्या भाव होता था? उस समय को भक्ति पता थी और महाप्रभु के पहले लोग संकीर्तन किया करते थे, पर वो महाप्रभु ने उसको बहुत जनरलाइज किया, बहुत प्रॉमिनेंस दिया, महत्व दिया और उसका प्रसार किया। पर जब भी महाप्रभु रास्ते पर नृत्य कर रहे हैं, तो अभी वो क्या निंदा करने लगे? लोग के लिए भक्ति एक मार्ग है, तो कोई सन्यासी है तो वो तो कम बुद्धि वाला नहीं होना चाहिए। अगर उसका उतनी बुद्धि है, उसने सन्यास ले लिया है तो वो ये कम बुद्धि वाले लोगों की विधि जो है, रास्ते पर नाच ना, ये क्यों कर रहे हैं?
तो इसलिए एक तो पहले वो नाराज़ थे कि ये चैतन्य महाप्रभु हमसे मिलने नहीं आए, हमारे संग नहीं आए और हमारे संग नहीं आए हैं, ऊपर से क्या कर रहे हैं? रास्ते पर नाच रहे हैं, क्या भावुकता के समाज कर रहे हैं, समाज क्या उपद्रव कर रहे हैं? तो जो अज्ञानी लोग हैं, वो कर रहे हैं तो ठीक है, पर जो सन्यासी है, जिसको बुद्धिमान होना चाहिए, वो अगर ऐसे करेगा तो इसके सन्यास का कुछ अर्थ ही नहीं है। सन्यास लेके जो कम बुद्धि वाले लोगों के साथ कार्य कर रहे हैं।
तो अभी यह सुनके जो महाप्रभु के जो अनुयायी थे, महाप्रभु के दो अनुयायी थे वहाँ पर, किसी को पता है? चंद्रशेखर आचार्य और तपन मिश्रा, दोनों बहुत नाराज़ हो गए, बहुत विचलित हो गए। पर महाप्रभु को चिंता मत करो तुम, महाप्रभु उनको पैसिफ़ाई किया, पर महाप्रभु वहाँ से चले गए। तो महाप्रभु वहाँ पर वृंदावन में गए, वृंदावन में दो महीने रहे वो। महाप्रभु को चिंता मत करो तुम, महाप्रभु वहाँ से चले गए।
क्या होता है? दो लोगों के द्वारा समस्या होती है। क्या होता है? कुछ लोग होते हैं, वो वाइज़ होते हैं, उनके पास बुद्धि है, ज्ञान है, कुछ लोग फूलिश होते हैं। तो प्रॉब्लम्स, वर्ल्डस प्रॉब्लम्स आर बिकॉज़ ऑफ़ टू रीज़न्स। दुनिया की समस्या है, क्या है? जो वाइज़ है, वो हमेशा डाउटफुल रहते हैं, बुद्धि है, अरे, पर हम भक्ति कर रहे हैं, पर भक्ति से शुद्धि करने होगा क्या, मेरा मैं भगवान के धाम जाऊँगा या नहीं? जो वाइज़ लोग डाउटफुल रहते हैं और जो फूलिश लोग होते हैं, वो कॉन्फिडेंट रहते हैं। जो मूर्ख हैं, जिनको कुछ ज्ञान नहीं है, उनको पूरा विश्वास है, अरे, अगर मुझे नया आईफ़ोन का वर्जन आ गया मिल जाएगा मुझे तो मेरा जीवन यशस्वी हो जाएगा, मुझे यही मिलना है और कुछ यही जाएगा। तो क्या है? कॉन्फिडेंट मतलब क्या है? उनको यह कुछ भी बहुत एक इच्छा होती है, उसके प्राप्त करने के लिए इतनी मेहनत करते हैं, तो क्या है? वो दोनों प्रॉब्लम है।
जो बुद्धिमान है, अगर उनमें साथ है, वो कॉन्फिडेंट नहीं है, वो प्रॉब्लम है। जो बुद्धिहीन है, वो कॉन्फिडेंट है, वो और प्रॉब्लम है। किसी को ब्रिज बनाना है, किसी सेतु बनाना है, किसी बुद्धिमान है अगर वो बना सकते हैं तो क्या होगा? तो वो नहीं बना पाएगा। जो बुद्धिहीन है, उसको पता नहीं है और वो ब्रिज बना देते हैं, क्या होगा? हम स्थायी-स्थाय्ये-स्थाय्ये-स्थाय्ये मेथड, मैं तो बहुत छोटा हूँ आपके सामने।
तो अभी क्या हो गया? यहाँ पर कभी क्या होता है? कि जनरली अगर इसके लिए नहीं कॉन्टैक्ट है, कई बार उससे क्या होता है? डिफ़ॉल्ट होता है नेगेटिव पर्सेप्शन। नेगेटिव पर्सेप्शन हो जाता है, अगर हम मंदिर में ही रह रहे हैं और किसी भक्त से बात नहीं करते हैं, शायद हम बिजी हैं, इसलिए हम बात नहीं कर रहे हैं, पर क्या होता है? किसी से हम बात नहीं करते हैं, तो सोचे शायद यह व्यक्ति मुझसे नाराज़ है, शायद यह व्यक्ति मुझसे ईर्ष्यालु है, शायद यह मेरे ख़िलाफ कुछ प्लॉट कर रहा है। तो नो कम्युनिकेशन, बैड कम्युनिकेशन है, ऐसे हो जाता है कि कई बार अगर कम-से-कम हम भक्तों से मिलते हैं तो उनको ग्रीट तो करना चाहिए। हम किसी को टालते हैं तो क्या होता है? साधारणतया एक नकारात्मक भाव हो जाता है।
तो अभी क्या, महाप्रभु बड़े गर्विष्ट थे? नहीं, उनमें कोई गर्व नहीं था, पर यह मायावादी संन्यासी क्या सोच रहे थे कि यह महाप्रभु हम यहाँ के प्रधान संत हैं, हमसे मिलने नहीं आया, इसका मतलब यह बहुत गर्विष्ट है। तो महाप्रभु ने पहले ही क्या किया? उन्होंने उनका हृदय खोल दिया, कैसे खोला? अपनी नम्रता से।
अभी यहाँ पर कैसे यद्यपि वो मायावादी हैं, उनकी जो सारी धारणा है, उनकी संकल्पना है, वो सब ग़लत है, पर फिर भी एक है, यह एक महत्वपूर्ण पॉइंट है यह कि यह फ़िलॉसोफ़िकल है और यह कल्चरल है, कि अपने फ़िलॉसोफ़िकल लेवल, अपने फ़िलॉसोफ़िकल लेवल जो है, तत्वज्ञान के स्तर पे फ़र्क हो सकता है, किसी हाथ पर कल्चरली, हमें किसी को डिसरेस्पेक्ट नहीं करना है।
फ़िलॉसोफ़िकल डिफरेंसेस, कभी-कभी ये अनअवॉइडेबल होते हैं, तो कभी-कभी जो तत्वज्ञान के स्तर पे, वो व्यक्ति की कोई धारणा है, हमारी कोई धारणा है, डिफरेंसेस हो गए, पर इसका मतलब ये नहीं है कि हमें व्यक्ति का आदर करना है। प्रभुपाद जी क्या करते हैं? मायावाद संन्यासी को गए और आप देखेंगे, तो हम उनके मायावाद का आदर नहीं करते, पर वो संन्यासी हैं, इसका हम आदर करते हैं, इसलिए हम उनको भी प्रणाम करते हैं, अच्छी तरह से।
कोई व्यक्ति होगा, उसमें कोई सद्गुण होगा, कोई दुर्गुण भी होगा, तो सद्गुण है, उसका आदर करते हैं। कोई मायावाद संस्था में, कोई बहुत दान दे रहा है, कोई अच्छा समाज कल्याण का कार्य कर रहा है, पर मायावाद संस्था से जुड़ा हुआ है तो उनके मायावाद देख के हम बोलते हैं, तुम तो अज्ञान में हो जाते हैं, पर अगर वो समाज सेवा के लिए कुछ अच्छा कार्य कर रहे हैं, अन्नदान कर रहे हैं, कुछ दान कर रहे हैं, ठीक है, तुम्हें दान देने की प्रवृत्ति है, वो अच्छी है, उसका हम आदर कर सकते हैं। तो हर एक व्यक्ति में होता है, कुछ चीज़ें अच्छा कर रहे हैं, कुछ चीज़ें होंगी जो अच्छा कर रहे हैं।