Hindi – Chapter 12 Bhagavad Gita And Decision Making Bhagavad Gita Overview – Chaitanya Charan
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Disclaimer: This transcript was generated using AI and may contain occasional errors or inaccuracies. यह अध्याय श्रीमद्गीता के बारहवें अध्याय पर आधारित है, जिसका मुख्य विषय भक्ति योग और पर्सनलज्म (Personalism – व्यक्तिगत संबंध) है। इस पूरे अध्याय को मुख्य रूप से तीन भागों में समझा गया है: तो आज हम बारवा अध्याय देख रहे हैं। और जो बारवा अध्याय का जो थीम है एक तरह से, वो है ‘बी पर्सनल’ (Be Personal)। इस अध्याय का नाम क्या है? भक्ति योग बताया गया है। तो इसमें तीन सेक्शन्स हैं। तो पहला सेक्शन है, कि भगवान एक व्यक्ति हैं। दूसरा सेक्शन है, कैसे भगवान हमें एक व्यक्ति के रूप में देखते हैं और व्यक्तिगत रूप से आदान-प्रदान कर रहे हैं। ये आठ से बारह हैं। और तीसरा है, ‘ट्रीट अदर्स एज पर्सन्स’ (Treat others as persons)। अभी ये जो है, किसी पर्सन के रूप में ट्रीट करना, या भगवान को पर्सन के रूप में ट्रीट करना, इसका मतलब क्या है, उसका हम स्पष्टीकरण करेंगे। पर जो भाव है ये, कि गीता का जो भक्ति योग का सेक्शन है, वो यहाँ पे अंत हो रहा है। उसमें पर्सनलज्म पे जोर दिया जा रहा है। तो इसको भगवान को हम डिविनिटी बोलते हैं। जो हम हैं, वो इंडिविजुअल हैं, और जो लोग हैं, वो पीपल हैं। कुंभ में, महाकुंभ में बहुत से लोग जा रहे हैं स्नान करने के लिए। तो हमें यहाँ पे बताया क्या जा रहा है, कि हमें वास्तव में, एक व्यक्तिगत रूप से बर्ताव करना है। और अभी एक तरह से देखेंगे, तो यह थीम क्यों आ रहा है? यह थीम, जैसे मैं बता रहा था पहले, कि कैसे जो गीता लगभग दसवें अध्याय में खत्म हो गई है, उसके बाद में जो सवाल आ रहे हैं, वो सवाल एक तरह से ‘सप्लीमेंट्री क्वेश्चन्स आफ्टर द क्लास’ (Supplementary questions after the class) हैं। तो उसमें क्या है, मेन फर्क यह है कि अभी क्लास के बाद वो क्वेश्चंस होते हैं, तो फिर अलग-अलग लोग क्वेश्चंस पूछते हैं। यहाँ पे, एक ही व्यक्ति सवाल पूछ रहा है। तो अभी यहाँ पे, अब कह सकते हैं, कि यह 10.11 पे एंड हो गया। फिर उसके बाद में, 10.16 से 10.42 तक एक क्वेश्चन था अर्जुन का। अर्जुन पूछते हैं कि किस तरह से, ‘कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्त्यन’ (मैं कैसे आपको इस जगत में देख सकता हूँ)। फिर 11.1 से 11.55 यह दूसरा क्वेश्चन है। 11.1 से 4 का क्वेश्चन था वास्तव में, वो दूसरे क्वेश्चन का आंसर है – विराट रूप दिखाना। अभी 12.1 से 20 का एक सवाल है। फिर उसके बाद में, तेरहवें अध्याय जो है, उसमें भी 13.1 से 35 जो है, वो अगला सवाल है। उसका जवाब एक तरह से हम कह सकते हैं, तेरहवें अध्याय का सवाल का जवाब है, वो आगे बढ़ते जाता है। वो वहीं पर खत्म नहीं होता है, वो लगभग सोलहवें अध्याय तक जाता है। वो कल चैप्टर में देखते हैं। पर अभी, यह 10 नहीं 12 है, यह 20 है। यहाँ पर 20 श्लोक हैं इस अध्याय में। तो अभी कुछ सम्बन्ध हम देख सकते हैं, कि इस सवाल के बाद यह सवाल क्यों पूछा है? तो अभी अलग-अलग अर्थ बताए गए हैं इसमें। एक है, कि अभी जो भगवान जो है, वो सर्वव्यापी है। वो ऑल-परवेडिंग (All-pervading) हैं। अभी कैसे हैं भगवान सर्वव्यापी? एक भौतिक दृष्टि से भी देख सकते हैं, और एक आध्यात्मिक दृष्टि से भी देख सकते हैं। भौतिक दृष्टि से मतलब क्या है? विराट रूप है उनका। अभी क्या यह विराट रूप भौतिक है? अभी क्या हो गया है कि कभी हम ऐसे तत्वज्ञान का इस्तेमाल करते हैं, किसी चीज़ को भौतिक बोलना, मतलब उसका अपमान करना जैसे हो जाता है। और क्या यह विश्व भौतिक है? हाँ, क्योंकि यह विश्व भौतिक है। तो क्योंकि यह भगवान से संबंधित है, इसलिए उसको दिव्य कह सकते हैं। जैसे हम भगवान की सेवा के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, इसको दिव्य कह सकते हैं हम। पर यह बनाया हुआ है, यह भौतिक तत्वों से बनाया हुआ है। तो एक तरह से विराट रूप जो है, वो भौतिक जगत का दर्शन है, तो वो भौतिक है। पर भगवान जो अभी स्पिरिचुअल में जो ऑल-परवेडिंग है, वो ब्रह्मज्योति के रूप में है। तो अभी जो ब्रह्मज्योति है, उसका वर्णन जो हो रहा है, वो अभी तक उसका थोड़ा उल्लेख हुआ है, पर अभी अर्जुन पूछ रहे हैं कि मैं समझा कि कैसे आप एक भौतिक, इस विराट रूप में सर्वव्यापी हो। पर वो गीता के ग्यारहवें अध्याय के अंत में बताया है कैसे कि, भगवान का जो सौम्य द्विभुज रूप है, वो इस विराट रूप से भी और महान है। ‘सुदर्शं इदं रूपम्’ बता रहे थे, वो बताते हैं कि ‘देवाप्यस्य लोकस्य रूपस्य नित्यम् दर्शन कांक्षिणः’। पिछले अध्याय में बताया था कि, कि जो यूनिवर्सल फॉर्म है, उससे बड़ा क्या है? उससे बड़ा है कृष्णा फॉर्म, कृष्णा रूप है। पिछले अध्याय में बताया था कि कृष्ण रूप है। अभी, मतलब क्या है कि यह अलग सवाल है, पर वो जो सवाल है, वो एक स्तर पे पूछा, एक विचारधारा में पूछा गया है। यह विचारधारा क्या है? सर्वव्यापकता, भगवान का एक जगह पर रूप है और भगवान का लोकलाइज्ड है, भगवान का सर्वव्यापी रूप है, तो कौन सा श्रेष्ठ है? अभी अगर इस लिंक से हम देखते हैं, तो अभी अर्जुन जो सवाल पूछ रहे हैं, देखते हैं क्या सवाल है वो। अर्जुन बता रहे हैं, ‘एवं सततयुक्ता ये…’ और अभी सततयुक्त, ऐसा शब्द कहाँ आता है? पहले किसका उल्लेख कर रहे हैं यह समझना है। तो इससे कुछ उल्लेख आए हैं, ‘सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः। नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते।’ तो वही ‘सतत’ शब्द भी आता है, ‘युक्त’ भी आता है, एक साथ नहीं आ रहा है, ‘सततं कीर्तयन्तो’ आ रहा है, ‘नित्ययुक्ता उपासते’ पर एवं सततयुक्ता ये, तो वह भक्तों का ही उल्लेख हो रहा है। और उसके बाद में अगला शब्द आ रहा है, ‘भक्तास्त्वां पर्युपासते’ जो भक्त आपकी पूजा करते हैं, ‘ये चाप्यक्षरमव्यक्तम्’ और जो अक्षर है, जो अव्यक्त है, ‘तेषां के योगवित्तमाः’ और जो अक्षर-अव्यक्त का चिंतन करते हैं, उनमें से कौन अच्छा है? योगवित्तमाः। योग में योग मतलब जिनका संबंध जुड़ा हुआ है। वित्तमाः मतलब उत्तमाः। वित्तमाः यह जब दिखाए की और अच्छा किसका संबंध है। तो अर्जुन यह नहीं पूछ रहे कि यह बुरा है और वो अच्छा है। वो ले रहे हैं दोनों अच्छा ही है। उनमें से और अच्छा कौन सा है? तो अभी यह श्लोक है, यह एक तरह से अक्षर-अव्यक्त क्या है? इसके भी आचार्यों ने अलग-अलग अर्थ बताए हैं। रामानुजाचार्य बोलते हैं एक तरह से, कि यह अक्षर-अव्यक्त जो है, वो आत्मा है। अभी जो आत्मा का उल्लेख आता है, देखें, दूसरे अध्याय में, तभी ऐसे ही शब्द आते हैं, ‘अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते’। ‘अक्षरं ब्रह्म परमम्’ जो पहले आया है, वहाँ पर भी आत्मा का उल्लेख आ रहा है, वो आठवें अध्याय में है। तो वो इस अध्याय को बेसिकली, क्योंकि वो जो मायावाद जो है या अद्वैतवाद है, उसका संदर्भ लेते ही नहीं हैं। वो बोलते हैं क्योंकि उनका विचारधारा ऐसे है कि वास्तव में कृष्ण ने वो इम्परसनल पर ज्यादा जोर दिया ही नहीं है अब तक। तो इसलिए अर्जुन को वो सवाल पूछने की जरूरत नहीं है। अर्जुन सवाल क्या पूछ रहे हैं कि भक्ति योग और कर्म योग इनमें कौन सा बेहतर है? क्योंकि क्या है, आत्मा पर चिंतन करके व्यक्ति क्या करता है, जो समझता है कि मैं आत्मा हूँ, तो वो कर्म योग करेगा तो भी आत्मा पर चिंतन करके ज्ञान योग भी कर सकते थे। इसलिए जो रामानुजाचार्य बता रहे हैं, वो कांट्रडिक्ट्री नहीं है। तो यह कहने का उल्लेख क्या है? अर्जुन को सवाल पूछ रहे हैं, अर्जुन का जो सवाल है, तो उसमें एक साइड में भक्त हैं और दूसरे साइड में भी क्या है, उसका समझना थोड़ा मुश्किल है। अक्षरम् जो अक्षर अव्यक्त है, वो इंपर्सनलिस्ट हो सकते हैं, वो निर्विशेषवादी हो सकते हैं, शायद या जो आत्मा पर चिंतन कर रहे हैं। जो आत्मा पर चिंतन करने वाले हैं, तो मैं आत्मा हूँ, तो उसकी तो उपासना नहीं होती है, इसलिए उपासना वाला एक और अर्थ है। उपासना अव्यक्त को न हो के… चर्चा यह है कि भगवान ने अभी तक गीता में क्या किया है? एक तरह से हम देख सकते हैं, गीता का लीनियर फ्लो देखेंगे हम, तो क्या है कि अभी तक उन्होंने पहले, दूसरे अध्याय से पांचवें अध्याय तक कर्म योग बताया है, फिर छठे अध्याय में ध्यान योग बताया है, फिर उसके बाद में सात से ग्यारह तक भक्ति योग बताया है, और वहाँ पर आठवें अध्याय में भगवान ने बताए हैं कैसे भक्ति योग, ध्यान योग से बेहतर थे। पर अभी तक भक्ति योग और कर्म योग की तुलना नहीं हुई है। जो भगवान बता रहे हैं, तो अभी तक कर्म योग बताया है उन्होंने, और अर्जुन ने बताया था कि जो ध्यान योग बड़ा मुश्किल लगता है मुझे, ‘चञ्चलं हि मनः कृष्ण’। अर्जुन ने कभी कर्म योग की प्रतिविक्ति नहीं किया है, और भगवान ने भी कर्म योग का खंडन नहीं किया है। तो एक तरह से जो बारहवाँ अध्याय है, इसके पहले पार्ट में ऐसा हो सकता है कि भक्ति-योग और कर्म-योग की तुलना हो रही है। यह भी संभव है। पर प्रस्ताव यह है यहाँ पर कि, जब हम कर्म-योग की तुलना करते हैं, तो उसमें क्या लॉजिकल सेंस है? जैसे वो वाल्सीयेव वाले हैं कि हम एक कर्म-योग की तुलना करते हैं, तो उसमें क्या लॉजिकल है? कर्म-योग में व्यक्ति का कर्म पे जोर है। जैसे मैं बता रहा था, कोई जेल में है और जेल से बाहर निकलना मुख्य उद्देश्य है, तो जेल से बाहर निकलने के लिए बाहर जाना है? आपको जेल में, पूरा जेल के रूल्स को फॉलो करना है। पर जेल के रूल्स को फॉलो करते हुए, जेल से अटैच नहीं हो जाना है। अरे, मेरा जेल में यह कमरा है, जेल में मुझे सबसे बड़ा गंगस्टर बनना है। आप ऐसे ही हो जाओगे, आप उस से आसक्त हो जाओगे, तो आप जेल से बाहर नहीं निकलोगे। पर जेल के नियम पालन नहीं करोगे, तो भी जेल से बाहर नहीं निकलोगे। तो जो कर्म-योग का भाव है ना, कि आप कर्म करो पर फलों से आसक्त नहीं हो। वो बेस्ट हम समझते हैं, अगर हम समझेंगे कि यह जगत जेल है। तो उसमें सारे नियमों का पालन करना है, बहुत जिम्मेदारी से जेल में जो कैदी है उसको रहना है। किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं करना है। पर कर्म योग में क्या है? उसके बाहर क्या है? कौन है? जेल के बाहर वह महत्वपूर्ण है। जेल से अभी बाहर निकलना है, वही महत्वपूर्ण है। तो कर्म योग जो है, वैसे कि प्रिजनर कमिंग आउट, जो शांते हैं, वो उसका भाव है। तो एक है कि कर्म करो। कर्म बड़ी जिम्मेदारी से करना है। पर दूसरा है, आसक्ति भी रखनी है? आसक्ति नहीं हमें करना है? क्या करना है हमें? विरक्ति रखनी है। अभी जेल उसके बाहर आके क्या करना है? जेल के बाहर आके राजा कौन है? उसकी ज्यादा परवाह नहीं हो, वो बाद में देखेगा। पर भक्ति योग में क्या है? कि हाँ, जेल में हूँ मैं, पर जो राजा बाहर है, उसका राजा यहाँ पे भी है। उस राजा से मैं संबंध जोड़ता हूँ, तो अगर मैं राजा को पसंद करता हूँ, तो राजा मुझे जेल से बाहर निकालने में मदद कर देगा। तो वह भाव आगे आता है, जो श्लोक में आएगा ‘तेषामहं समुद्धर्ता’, जो श्लोक बताते हैं। तो क्या है कि अभी इसमें भी जो ‘बी पर्सनल’, हाँ कोई भी राजा होगा, मुझे नियम पालन करना है, नियम करके बाहर निकलना है। तो कभी क्या होता है कि कोई ट्रैफिक के रूल्स फॉलो कर रहा है और ट्रैफिक का पुलिसमैन कौन है, इसको देखता भी नहीं है, सिर्फ यह ग्रीन है, रेड है, चलो निकलो। पुलिस में कुछ इंटरेस्ट नहीं है उनको। पुलिस में कोई इंटरेस्ट नहीं है। तो वैसा भाव वो नहीं रखना है, भगवान बोलते हैं। आप समझो कि आपको केवल जगत के जेल से बाहर नहीं निकलना है, आपको केवल आत्मा को बंधन से मुक्ति नहीं लानी है, आपको मुझसे प्रेम करना है। तो आप मेरी पूजा करो। तो मुझसे आप एक संबंध जोड़ने का प्रयास करो। तो कर्म योग और भक्ति योग, वो तुलना यहाँ पर हो रही है। तो कर्म योग क्या है? वो सिर्फ भाव है। अब भक्तियों में क्या है? ‘फ्री फॉर लव’ (Free for love)। क्या है? मुझे फ्री होना है, पर फ्री क्यों होना है? ताकि मैं भगवान से प्रेम करूँ। भगवान से प्रेम करूँ, और भक्त को भौतिक जगत से आध्यात्मिक जगत में क्यों जाना है? एक कारण कह सकते हैं कि जगत में बहुत दुख है, इससे निकलना है बाहर। पर वास्तव में भक्त का भाव होता है कि मुझे भगवान की सेवा करनी है। और ये जगत में इतनी सीमाएं हैं। हमारा शरीर कभी साथ नहीं देता है, जगत में विरोध होता है। हमें भगवान की एक भक्ति करना है, जो सारे जगत की सीमाएँ होती हैं, उन्हीं सीमाओं से मुक्त होकर मुझे भगवान की सेवा करनी है। मुझे भौतिक जगतों की सेवा करनी है। यह भक्त का भाव है। तो ये एक तुलना होती है। अगर यह तुलना होगी, तो हम देख सकते हैं, उस श्लोक पर हम जाते हैं अभी, हम देखेंगे, जो निर्विशेष बाद से देख रहे हैं, तो उसको देखेंगे हम जल्दी से। पर यह श्लोक देखते हैं, यहाँ पर भगवान क्या बता रहे हैं, ‘तेषामहं समुद्धर्ता’, मैं, जो मुझसे प्रेम में संबंध जोड़ने का प्रयास करता है, उसका मैं उद्धार करूँगा। किसी को राजा से कोई संबंध नहीं है, तो ठीक है, जब भी एक प्रेसिडेंट जाता है, दूसरा प्रेसिडेंट आता है, तो एक प्रेसिडेंट जाने के पहले लोगों को पार्डन कर सकता है, उसको प्रेसिडेंशियल पार्डन कहते हैं, मतलब, किसी ने कुछ गलती की है, किसी ने कुछ गुनाह किया है, जो प्रेसिडेंशियल पार्डन के लिए होता है, तो जिसको चाहिए वो माफ कर देता है। तो अभी क्या होता है इसका, कि अभी जिसको, जिस पर कोई चार्ज आया है, जिस पर कोई गुनाह के चार्ज आया है, या कोई जेल में ऑलरेडी है, तो उसके जेल का सेंटेंस छोटा कर दो इसको, उसको छोड़ दो ऐसे। तो अभी क्या, कई बार उसका दुरुपयोग होता है। तो अगर एक प्रेसिडेंट को लगता है कि अगला प्रेसिडेंट जो आएगा, वो मेरे सपोर्टर्स को कुछ फॉल्स केस में डाल देगा, तो अभी क्या हो गया है वो, किसी पे जेल में नहीं है, किसी पे कोर्ट केस नहीं है, कुछ भी उसके और गुनाह नहीं है, पहले उसको पार… मतलब क्या है? अभी अगला प्रेसिडेंट उसके खिलाफ कोर्ट केस करेगा यह नहीं है, पर यह क्या है? यह दुरुपयोग है, बड़े पॉइंट है कि कैसे है, कि राजा, जो अभी डेमोक्रेसी है, फिर भी उसमें प्रेसिडेंट जो नॉर्मल लीगल प्रोसेस है, उसमें इंटरफेयर करके, वो एक्सीलरेट कर सकता है कुछ को और तेजी से कर सकता है। तो ऐसे ही भगवान बता रहे हैं, कर्म योग मतलब क्या है? नॉर्मल लीगल प्रोसेस से आप कर्म बंधन से मुक्त हो जाओ। भक्ति योग मतलब क्या है? अगर आप मेरे प्रिय बन जाते हो, मैं उनका उद्धार करता हूँ, इस जगत से, इस भवसागर से, और कैसा कब करूँगा, तो जल्दी करूँगा, जल्दी हो जाएगा, किसके लिए? जो मुझमें अपना मन लगा रहे हैं। तो साथ में दोहराते हैं, साथ में कर सकते हैं। तो यह एक तरह से, भगवान बता रहे हैं, यहाँ पर इसका विश्लेषण, यह लॉजिकल एक तरह से क्यों है? क्योंकि क्या है कि भगवान ने कर्म योग से तुलना अभी तक नहीं की, एक्सप्लिसिट्ली। और दूसरा है, कि भगवान यहाँ पर, जो दूसरा अल्टरनेटिव है, उसको बुरा नहीं बोलते हैं, मुश्किल बोलते हैं, पर बुरा नहीं बोलते हैं उसको। तो यह भक्ति योग, कर्म योग से अच्छा है, यह एक तरह से होता है। अभी प्रभुपाद जी और हमारे संप्रदाय के जो आचार्य हैं, खासकर प्रभुपाद जी, वो इसको निर्विशेष ब्रह्म के बारे में लेते हैं, तो वो हम थोड़ा समझने का प्रयास करेंगे अभी। अभी जो अद्वैतवाद है, इम्परसनलिज्म जिसे हम कहते हैं, उसके दो कैटेगरीज हैं। इम्परसनलिज्म जो है, इसके दो विभाग क्या हैं? किसी को पता है? ब्रह्मवाद और मायावाद। तो अभी ब्रह्मवाद और मायावाद, इसमें फर्क क्या है? अब स्तर पर थोड़ा नहीं है, पर एक तरह से हम संदर्भ से समझ सकते हैं। एक है, यहाँ पे साधक है कोई, और इधर पर्सनल है, इधर इम्परसनल है। अब यह पर्सनललिज्म जो है, मतलब भगवान एक व्यक्ति है और परम सत्य जो है वो व्यक्ति नहीं है, वो अव्यक्त रूप में हैं। तो अगर ये दोनों में चुनाव करना है और कोई कहता है कि ठीक है, मैं इसको प्रेफर करता हूँ, मेरा मन इसकी ओर जाता है, तो क्या है? वो कह रहे हैं कि यहाँ जो व्यक्ति भी सत्य है, अव्यक्त भी सत्य है। पर मैं अव्यक्त को प्रेफर करता हूँ। तो यह कोई प्रेफर करता है, तो यह है ब्रह्मवादी। यह ब्रह्मवादी क्या है? वो अभी इनमें से क्या इम्परसनली ऊंचा है? मेरे लिए ऊंचा है यह, मेरा आकर्षण इसकी ओर है, मुझे यहाँ जाना है। मुझे जाकर लीन होना है एक तरह से। तो अभी यह कई कारणों से हो सकता है, कोई-कोई लोगों को रिश्तों में बहुत परेशानी हो जाती है, रिश्तों से बड़ा डर हो जाता है, उसके कोई भी रूप है, उससे आकर्षण हो जाते हैं, तो मोह में पड़ जाते हैं। इसलिए मुझे रूप के जंजाल में पड़ना ही नहीं है कुछ। इस ब्रह्मवादी भी है, अधिकांश रूप से क्या होते हैं, यह मोक्षकामी होते हैं। उनको भौतिक जगत का जो दुख है, वो बहुत स्पष्ट रूप से दिख गया है, और उससे मुक्त होना है। तो ऐसे लोग भी काफी महान लोग हैं, ऐसे नहीं कि साधारण लोग हैं। इनका वर्णन जो भगवान करेंगे, वो वर्णन काफी, उनके काफी गुणों के साथ वर्णन करते हैं भगवान। ‘सर्वभूतहिते रताः’, वो किसी से ईर्ष्या नहीं करते हैं। ऐसे ब्रह्मवादियों का जो वर्णन आता है, भगवान क्या कहते हैं? इसके पहले काफ़ी लोग देख सकते हैं, कि ‘क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम्’। कि ये तेषाम् जो लोग हैं, जिनका पीछे श्लोक में वर्णन होता है, उनके लिए क्लेश काफी होता है। भगवान क्या करते हैं, कि जिनकी चेतना को कवर करते हैं, क्लेश काफ़ी हैं क्योंकि ‘अव्यक्ता हि गतिर्दुःखम्’, ऐसे मार्ग में प्रगति करना, उसके ओर जाना, दुःखम्। मुश्किल है, ‘देहवद्भिर्वाप्यते कूटः’, जेब कोई भी देहधारी व्यक्ति है हम, आम हमारा शरीर है, हमारा व्यक्तित्व है, हम संबंध रखते हैं, हमें कार्य देना है, हम कार्यशील होते हैं। तो अगर किसी को बोला, किसी से संबंध मत रखो, किसी चीज़ से आकर्षित मत हो, कोई कार्य मत करो, तो फिर क्या करेंगे? क्या बड़ा मुश्किल होता है यह। अभी कुछ समय के लिए अगर हम बहुत परेशान हो गए हैं लोगों से, तो कोई हमसे मिलने आता है, तो हम मुझे अकेला छोड़ो, मुझे अकेला छोड़ो। अभी ठीक है, हम चाहते थे मुझे अकेला छोड़ो, पर लोग हमें परमानेंटली अकेला छोड़ेंगे? मुझे अभी अकेला छोड़ो, परमानेंटली नहीं। कैसे अभी वो एक दो घंटे के लिए, एक दिन के लिए अकेला छोड़ो, परमानेंटली हम अकेला नहीं छोड़ना चाहते हैं। तो क्या है कि जो सब रिलेशनशिप्स को रिजेक्ट करना, वो एक रिएक्शनरी आइडिया होता है। रिएक्शनरी मतलब क्या है? कोई परिस्थिति का रिएक्शन होता है सब कुछ छोड़ दो, पर वो एक कोई परमानेंट सॉल्यूशन नहीं है। जो परमानेंटली ऐसे करना चाहता है, उसके लिए वह बड़ा मुश्किल होता है। तो यह भगवान कहते हैं, अच्छा है क्योंकि यह भी मोक्ष चाह रहे हैं, और भगवान कहते हैं, ‘ते प्राप्नुवन्ति मामेव’, वो मुझे प्राप्त करेंगे। पर कैसे प्राप्त करेंगे? वो जिस रूप में चाहते हैं, ‘यथा मां प्रपद्यन्ते’, जिस तरह से, जिस भाव में लोग मुझे शरण करते हैं, उस भाव में मुझे प्रकट होता हूँ। तो ये लोग निर्विशेष ब्रह्म हैं, उसको प्राप्त कर लेंगे। पर इसके विपरीत है मायावादी। तो अभी मायावादी जो है, मायावाद समझना, हम मायावाद का खंडन करना काफी आसान है, उसको समझना एक्चुअली मुश्किल है। तो कई बार मायावादी कहते हैं कि हमें भगवान में एक होना है। तो एक गुरु अमेरिका में गए थे, वो बोले कि इसके पहले बहुत से गुरु यहाँ पे आए हैं, वो कहते हैं कि मैं भगवान हूँ। मैं वैसा सत्य आपको बोलने के लिए नहीं आया हूँ। मैं तुम्हें यह सत्य बताने के लिए आया हूँ, कि तुम भगवान हो। मैं भगवान हूँ, तुम भगवान हो। तो अभी ये हम बोलते हैं मायावाद क्या है कि हम सब भगवान हैं, और फिर मायावाद का हम जोक करते हैं, क्या आप कभी…? क्या आप भगवान हो? तो अगर आप किसी सही में, जो मायावादी तत्वज्ञान जानता है, उसके पास जाओगे, वो कहेंगे कि ये आर्ग्यूमेंट करेंगे, तुमको मायावाद का एबीसीडी भी पता नहीं है। कोई मायावादी नहीं कहता है कि हम भगवान हैं, हम भगवान बनने वाले हैं। तो ये क्या है? जैसे क्या हर फिलासफी में डेविएशन होता है, तो जो शंकराचार्य का मायावाद है, उसका भी डेविएशन हुआ है, तो जो नियो-मायावाद है, नियो-मायावाद कहें बहुत, नियो मतलब नया, तो नियो-मायावाद जो है, वो बहुत सिंपलीफाई हो गया है, वो कहता है कि हम सब भगवान हैं, हम सब एक हैं, हम सब परम सत्य हैं। पर जो मायावाद और यहाँ से जो नियो-मायावाद आया है, मायावाद भोग शब्दों का ख्याल करता है, पर जो नियो-मायावाद है क्या है, वे जद हैं जी, और हम जब हो गए… और प्रभुपाद जी अधिकांश रूप से, जो बंगाल में थे, तभी ये मायावाद ही प्रचलित था। तो इसी का प्रभुपाद जी खंडन करते हैं। पर जो, जो मायावाद था, ये ओरिजिनल मायावाद शंकराचार्य ने बताया था, और फिर उसको एक तरह से ओवर-सिंपलीफाई कर दिया बहुत। इतना सिंपल कर दिया कि वो डिस्टॉर्ट हो गया। तो अभी ओरिजिनल मायावाद क्या है? वो अगर समझते हैं, तो वो क्या कहते हैं, कि ब्रह्मन् ही इकलौता सत्य है। ब्रह्म यह परम सत्य है। तो जगदीश, जो भगवान है, उनका प्रकटीकरण होता है। जब ब्रह्मन् है, वो रजस से मिलता है, तो क्या प्रकट होता है? जीव प्रकट होता है। और जब ब्रह्मन् तमस से मिलता है, तो क्या प्रकट होता है? जगत प्रकट होता है। तो व्हॉट डू वी से कि अभी, अभी परिस्थिति क्या है, जो जीव है, वो जगत देश से आसक्त है। तो ये आसक्ति बहुत बुरी है। तो इस आसक्ति को तोड़ने के लिए जीव को क्या करना चाहिए? जीव को क्या कर… यहाँ पे जगदीश से आसक्ति जोड़नी चाहिए। तो वो भी अधिकांश रूप से वो जनसाधारण लोगों को बोलते हैं कि तुम्हें भक्ति करना अच्छा है। पर जब आप भगवान से आसक्ति करोगे, जगदीश से आसक्ति करोगे, उससे तुम समझोगे कि ये जगत मोह है और ये जगत के बंधन से तुम मुक्त होगे। पर उसके बाद में तुम यह समझोगे कि जीव भी मोह है और जगदीश भी… थे, वी हेल्पफुल मोड कि जीव भी मोह है और जगदीश भी मोह है… तो वो कहते हैं… कि फिर प्रभुपाद जी वे उनको बोलते थे, ये एथिस्ट हैं। वो कहते हैं… पूरे बारूद एथिस्ट हैं, और कुछ सभी जन लोग बोलते हैं, हम हरी बिर्रा… कैथिस्ट हैं। हम भगवान के परे जाते हैं, जो भगवान की संकल्पना है, वो कहते हैं, कम बुद्धि वालों को भगवान की जरूरत होती है, जो सही में बुद्धिमान हैं, वो भगवान क्या है? उनका भाव होता है कि गॉड श्लोक लिखे हुए हैं और जैसे हम उनका कोट करते हैं, उनका भाव क्या था कि ये सारे अनेक रूप है, पंचोपास्ति उनसे शुरू होती है कुछ अंत तक, तो ये सारी भक्ति करके फिर तुम्हें एक होना है। अभी यह ट्रेडिशनल अद्वैतवाद है। अभी इसमें क्या है, रूप माया है और भगवान के रूप के परे जाना है, यह जो है वो मायावाद है। और ऐसे मायावाद का भगवान खंडन करते हैं। तो अभी यहाँ पे जो ब्रह्मवाद का उल्लेख है, तो यहाँ पे जो भगवान बोलते हैं, यह भी आ गए मेरे पास, वो कहाँ है? छठे-सातवें श्लोक तक। तो यह जो है, यहाँ पर भगवान बोलते हैं, यह भी आ गए मेरे पास। जो मायावादियों का उल्लेख है, वो नौवें अध्याय के ग्यारहवें और बारहवें श्लोक में आता है। तो वो कहते हैं, क्या है वो श्लोक? ‘अवजानanti मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्’, यह श्लोक है, वो मायावादियों का उल्लेख है। तो यहाँ पर मायावादियों का बिल्कुल उल्लेख नहीं हो रहा है। पर भगवान बोल रहे हैं, कि आप मुझे एक व्यक्ति के रूप में मेरे पास आओ आप। और अगर आप मेरे व्यक्ति के रूप में मेरे पास आओगे, तो मैं भी एक व्यक्तिगत रूप से तुम्हारे जीवन में मदद करूँगा, मैं इंटरवीन करूँगा तुम्हें मदद करने के लिए। अद्वैतवाद का क्या भाव है? अद्वैतवाद को कैसे खंडन करना है, उसका बड़ा विषय है, पर हम नहीं करना चाहते हैं, हम बारहवें अध्याय में जो चर्चा हो रही है, उसके बारे में चर्चा कर रहे हैं अभी। तो पहला क्या था, डिविनिटी इज अपर्सन। हमें भगवान को एक व्यक्ति के रूप में पूजना है। तो उसके आगे भगवान बोलते हैं कि, जो नाइन, जो एट टू ट्वेल्थ श्लोक हैं, उसमें भगवान बोलते हैं कि, ‘आई विल ट्रीट यू, आई ट्रीट यू एस अपर्सन’। भगवान, मतलब हम कह सकते हैं कि हम यहाँ पर हैं, भगवान यहाँ पर हैं, तो आई हम ट्रीटिंग गॉड एस एम, नाई अपर्सन है, एक सर्कल करा हुए यहाँ पे, आपके अपने हैं? कि हम भगवान को एक पर्सनालिटीज के रूप में ट्रीट करते हैं, वह एक टू घर केवर है, और भगवान हमें पर्सन के रूप में ट्रीट करते हैं, यह अभी आठ से बारह में आता है। तो अभी किसीको पर्सन बोलना, किसीको व्यक्तिगत रूप से बातचीत करना या व्यक्तिगत रूप से ट्रीट करना, उसका मतलब क्या है? उसका मतलब समझना कि हर एक व्यक्ति अलग है। अभी कोई व्यक्ति बिल्कुल, अभी हमसे बड़े मधुरता से बात करता है। हमको लगता है यह इतना मधुर व्यक्ति है। फिर बाद में उनका एक पालतू कुत्ता होता है, उससे मिलकर इससे मधुर बातें भी करता है। तो सबसे अच्छे होके एक मधुर स्वभाव हो सकता है। पर क्या है? कि अगर सबसे बिल्कुल वैसा ही बर्ताव कर रहे हैं, तो अभी एक क्लास के बाद कोई आता है, कोई क्लास के कुछ पोर्शन अच्छा लगता है, तो मैं से आदान बर्ताव हूँ, मैं बिल्कुल बिना इमोशंस के वैसे ही खड़ा रहता हूँ। कोई निंदा करता है, वैसे बिना इमोशंस के, वो लेगा अच्छा, कोई इमोशन नहीं है, थोड़ा इंप्रेसिव लगेगा। वो इंप्रेसिव होगा पर अट्रैक्टिव नहीं होगा। आपको क्या है कि जो अनइमोशनल होता है, कभी-कभी वो इतना शांत कैसे रह सकता है, वो किसी को इंप्रेस कर देता है। आपने इसका अपनी भावनाओं पर बहुत नियंत्रण है। पर वैसे व्यक्ति से, क्या हम एक प्रेम में संबंध जोड़ना चाहते हैं? क्योंकि किसी को कोई भावना ही नहीं दिखता है, नहीं है। तो ऊपर क्या होता है? तुम्हारा क्या है? वो अट्रैक्टिव नहीं होता है। हमें हमें भगवान से संबंध जोड़ना है। इम्परसनल का एक अर्थ हो सकता है कि हम अनइमोशनल होता है, कुछ पियर्स भावना नहीं है, वैसे के वैसे बात कर रहे हैं सबके साथ। पर एक और होता है, कि इम्परसनल का अर्थ है कि एक फॉर्मूला एक है, मतलब एक ही फॉर्मूला के अनुसार सब के साथ बात कर रहे हैं, फॉर्मूला एक या मैकेनिकल। जब अभी हम किसी फोन करते हैं और कभी-कभी क्या है? अभी फोन पर कोई मैकेनिकल वॉइस होता है, वो जवाब देता है। तो क्या है? ठीक है, मैकेनिकल वॉइस हम सुन सकते हैं, पर क्या है? कि मैं किसी से बात करना चाहता हूँ। अभी सिलिकॉन वैली में रिसर्च हो रहा है अभी, वो बता रहे हैं कि क्या है? जब अभी कहीं आप बड़े वेबसाइट पर जाते हो, कुछ जगह वहाँ पर चैट बॉट होता है। अगर आप एप्पल के वेबसाइट पर जाओगे, डेल के वेबसाइट पर जाओगे, तो क्या है? वो चैट बॉट से चैट करने में, लोग चैट कर रहे थे। पर अगर कोई फोन करता है, और फोन पर उनको एक मैकेनिकल वॉइस आता है, तो लोग गुस्सा हो जाते हैं। कि जब कोई बात कर रहा हूँ, चैट कर रहा हूँ, तो कोई वहाँ पर एक मशीन वॉइस चल जाएगा। पर मैं बात कर रहा हूँ, तो ‘आई वांट ए पर्सन। आई वांट टू टॉक विद ए पर्सन।’ ऐसे भाव होता है। तो हमें क्या है कि पर्सनली ट्रीट करना मतलब सब के साथ एक फॉर्मूला नहीं है। हर एक व्यक्ति इंडिविजुअल है। तो यहाँ पे क्या है कि भगवान यहाँ पे बताते हैं, भगवान हमारी इंडिविजुअलिटी जो है, वो एक तरह से दर्शा रहे हैं, कि आप एक स्तर पे कार्य नहीं कर सकते, तो दूसरे स्तर पे कार्य कर सकते हो। कि सबके लिए एक ‘वन साइज़ फिट्स ऑल’ फॉर्मूला नहीं है। सबके लिए एक फॉर्मूला नहीं है। भगवान यहाँ पे आठ, नौ, दस, ग्यारा, और फिर बारह। यह चार श्लोक हैं, पाँच श्लोक हैं इसमें, पाँच अलग-अलग स्तर पे हम भक्ति कर सकते हैं। कि अभी भक्ति करो बोलते हैं, तो भक्ति में क्या है? ऐसे नहीं है कि सबको बिल्कुल एक दूसरे का शुद्ध भक्त बनना है, कि ऐसे भक्त होते हैं। नहीं, हर व्यक्ति इंडिविजुअल है, हर कोई अपने स्तर पे है। तो यहाँ पे क्या है? सबसे पहले बताता है, ‘मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धि निवेशय’। कि भगवान बोलते हैं, कि आप ऐसे कर रहे होंगे, कि आप मुझमें एकाग्र हो गए होगे, तो ऐसे नहीं कि तुम मुझे बाद में प्राप्त करोगे, तुमने अभी ही मुझे प्राप्त कर लिया है। ‘यू आर ऑलरेडी लिविंग इन मी।’ तो इस श्लोक हम देखते हैं। ‘मय्येव मन आधत्स्व’, तो मुझमें आप मन लगा रहे हैं। तो आधत्स्व मतलब पूर्ण तरह से समर्पित कर रहे हैं। ‘मयि बुद्धि निवेशय’। तो अपनी बुद्धि भी आपने मुझमें इन्वेस्ट की है, मुझमें लगाई है। ऐसे करोगे तो क्या होगा? ‘निवेसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः’। तो इसमें कोई संशय नहीं है। ऐसा जब करोगे उस समय से ही, उस समय से ही आप आगे चलकर, हमेशा मुझमें ही जी रहे होगे। तो यह टॉपमोस्ट लेवल है। अगर आप यह नहीं कर सकते हो, हमेशा भगवान में मन लगा के एकाग्र होना, यह संभव नहीं है। तो फिर भगवान बोलते हैं, ठीक है, वो नहीं कर सकते हैं, तो आप क्या करो? ‘अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोसि मयि स्थिरम्।’ समाधातुं समाधि में समाधान के साथ जो रहना है, को आपको शक्नोसि, नहीं कर सकते। इसके लिए आपको संभव नहीं है, स्थिर नहीं रह सकते हैं, तो क्या करो? ‘अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय।’ तो आप अभ्यास योग करके आप मेरी इच्छा, मुझे प्राप्त करने की इच्छा आप जागरूक करो। तो यह क्या है? ‘एब्जॉर्ब इन कृष्णा’ मतलब क्या है? यह एब्जॉर्प्शन नेचुरल होता है। यह इसको कहते थे ‘कॉन्संट्रेटिंग ऑन कृष्णा’। कॉन्संट्रेटिंग ऑन कृष्णा। अभी कोई बोलता है कि आप क्या कर रहे हैं? मैं मूवी देख रहा हूँ, मुझे मूवी पर कॉन्संट्रेट करना है। मूवी पर आपको कॉन्संट्रेट करना पड़ रहा है, तो वो डायरेक्टर ने बुरा काम किया है। मूवी में ऐसा हो जाएगा कि आप एब्जॉर्प्शन हो जाएगा। क्लास सुन रहे थे, उसको कॉन्संट्रेट करना चाहिए। क्लास सुन रहे थे, उसको कॉन्संट्रेट करना चाहिए। जितना हम ध्यान देते हैं, उसमें रुचि आ जाती है। और फिर क्या होगा? फिर हम वहाँ से एब्जॉर्ब हो जाएंगे। तो ऐसे ही भगवान बोल देगा, आप मुझे एकाग्र करो अपना चित्त, फिर ‘मामिच्छाप्तुं धनञ्जया’। तो यह क्या है एक तरह से? यह जो है, यह सिद्ध भक्त है। सिद्ध भक्त मतलब, हम सिद्ध भक्त इस्तेमाल नहीं करते हैं, हम शुद्ध भक्त इस्तेमाल करते हैं। पर एक ही बात है, ये जो है, साधक भक्त हैं। हम जब जो है, यह नहीं कर सकता मैं। यह क्या है, मैं भगवान पर मन लगाऊँ? नहीं जमता है मुझे। तो फिर भगवान अगले श्लोक बोलते हैं, ‘वर्क फॉर कृष्णा’ (Work for Krishna)। कि अगर आप साधना नहीं कर सकते हैं, तो आप सेवा तो कर सकते हो। साधना मतलब, आप एक जप करो। जप करना बड़ा मुश्किल है, भगवान की पूजा करना बड़ा मुश्किल है, पर सेवा तो कर सकते हो। भगवान बोलते हैं, अगले श्लोक में, जो कि ‘मत्कर्म’, आप मेरा कर्म करो। तो अभी आचार्य मतलब, हमारा कोई नौकरी है, हमारे घर का जिम्मेदारी है। वो सब भी हम भगवान की सेवा के भाव में करते हैं। तो यह ‘वर्क फॉर मी’। तो भगवान बता रहे हैं कि आप समाधि में नहीं दे सकते तो साधना करो। साधना नहीं कर सकते तो आप सेवा करो। और यहीं तक नहीं, भगवान क्या बोलते हैं? कि अगर आप यह भी नहीं कर सकते, तो क्या करो आप? ‘वर्क फॉर सम हायर कॉज’ (Work for some higher cause)। किसी ऊपर के स्तर के लिए कार्य करो। मतलब स्वार्थी रूप से कार्य मत करो आप। आप सोचो कोई राष्ट्र सेवा करना चाहता है। अब जो बारहवाँ श्लोक है, वो काफी कॉम्प्लिकेटेड है। उसमें जाऊँगा नहीं मैं अभी। पर वहाँ पे भगवान क्या बताते हैं? कि किसी भी तरह से, यह जो मेन पॉइंट है कि भगवान अलग-अलग स्तर बता रहे हैं। कि अगर आप यह नहीं कर सकते, तो यह करो। और इससे भी क्या? भगवान का हमसे, कैसे प्रेम में संबंध करने का जो इच्छा है, वो प्रखर होता है। भगवान हमें एक व्यक्ति के रूप में देख रहे हैं। यह करने की क्षमता नहीं है, तो दफा हो जाओ। ऐसे नहीं बोल रहे हैं भगवान। यह नहीं कर सकते तो यह करो। यह नहीं कर सकते तो यह करो। भगवान का हमें एक प्रोग्रामेबल मशीन की प्रोग्राम है। यह प्रोग्राम है, यह इनपुट दिया, यह करो। ऐसे नहीं। यह नहीं है, यह ऑप्शन है। तो हमें भी, हम देखते हैं, प्रभुपाद जी ने यह प्रचार किया, तो अमेरिका में जो थे, जो लोग, वो सब कुछ समर्पण करके प्रभुपाद जी की सेवा में आ गए। अमेरिकन लोगों को प्रभुपाद जी भारत में लेकर आए, तो बहुत लोग भारत इंप्रेस हो गए उनसे, प्रभुपाद जी से, पर फिर भी वैसा समर्पण नहीं आया। तो क्या हुआ? बहुत से लोग जो लाइफ मेंबर बने, उन्होंने क्या किया? सेवा किया प्रभुपाद जी का। साधना के स्तर पे नहीं आए थे वो। तो अभी महत्वपूर्ण क्या है कि ये सारे जो भगवान बता रहे हैं, खास करके पहले जो तीन जो लेवल्स हैं, ये जो तीन हैं, ये भक्ति के ही लेवल्स हैं। तो भक्त होना और साधक होना यह अलग है। बहुत लोग में भक्ति हो सकती है, मंदिर में आते हैं, जन्माष्टमी में कुछ पूजा करते हैं, कृष्ण की कथा में रुचि रखते हैं, वो भक्त हैं, पर वो साधक नहीं है, वो रोज साधना नहीं कर रहे हैं। तो अभी ये भक्ति हैं और इसके नीचे जो है, वो भक्त बहुत घोर है, एक कलयुग के प्रवास है, तो नरक में जाने वाले हों। तो अभी ये जो है, ऐसा भाव नहीं रखना है प्रचार के लिए। आप यह नहीं कर सकते, तो यह करो, यह नहीं कर सकते, तो यह करो, मल्टीपल ऑप्शंस देने हैं, किसी न किसी तरह से हम लोगों को कनेक्ट करते हैं। यह ट्रांजिशन होता है, यह भगवान बोलता है कि मैं तुमको भी यह ऑप्शन दे रहा हूँ। यह नहीं कर सकते, तो यह करो, यह नहीं कर सकते, तो यह करो, यह नहीं कर सकते, यह करो। तो अभी एक तरह से अर्जुन जो है, वो इस तरफ कर चुके हैं, पर क्योंकि यह जगत में सेवा करनी है, तो देखते, ये लोग भक्त हैं, ये लोग भक्त नहीं हैं, इनको सेवा में लगाना है, इनको भक्ति का समझाना है, ताकि वो भक्ति कर सके। तो इस तरह से अर्जुन प्रैक्टिकली, इतना आठ के लेवल पर हो सकता है, जो ‘मय्येव मन आधत्स्व’, पर व्यावहारिक रूप से वो भगवान का कर्म कर रहे हैं। तो भी यह हो जाने के बाद आखिरी आता है, कि जैसे कि जैसे वो भगवान का कर्म कर रहे हैं, अभी लोगों को व्यक्ति के रूप में उनसे बर्ताव करना है, मतलब क्या है? अगर ये श्लोक देखते हैं, इनका वर्णन क्या आता है? इन सब में एक कोरस आता है, हम देखेंगे, आखिरी आता क्या है? ‘यो मद्भक्तः स मे प्रियः’, ये ऐसे भक्त मुझे प्रिय है, अगर लास्ट के लिए देखते हैं, ‘स मे प्रियः’, फिर क्या है? ‘यो मद्भक्तः स मे प्रियः’, फिर ‘भक्तिमान्यः स मे प्रियः’। भाव क्या है? ऐसे भक्त मुझे प्रिय है। यह यहाँ पर क्या भगवान बोल रहे हैं कि ऐसे भक्त मुझे प्रिय है, पर यहाँ पर दिलचस्पी की बात यह है कि कौन से भक्त प्रिय है? जो, जो डिवोटी, इसकी क्या बोल रहे हैं? इसके बारे में नहीं बता रहे हैं भगवान। भगवान यह नहीं बोलते कि जो एकादशी को निर्जला उपवास करता है, वो मुझे प्रिय है। वो नहीं बता रहे हैं। वहाँ पर भगवान क्या बता रहे हैं? उनका व्यवहार कैसे है? ‘बिहेवियरल वर्चुज’ (Behavioral Virtues)। तो यहाँ पर क्या है? भगवान, यहाँ पर साधन, कैसे भक्त प्रिय है? यह बता, साधना पे जोर नहीं दे रहे हैं। हम देखिए, सदाचार पे जोर दे रहे हैं। साधन पे नहीं, भगवान सदाचार पे जोर दे रहे हैं। ऐसा भक्त, जो दूसरों के साथ बर्ताव करता है, तो वो उनके प्रति ईर्ष्या नहीं करता है। उनसे वो काइंड, ‘अद्वेषः सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च’। जो सबके प्रति शांत रहता है, जो सबके मदद करने का प्रयास करता है, जो अभी ‘यस्मानोद्विजते लोको’ जो दूसरों के साथ बर्ताव करता है, जो जिसके द्वारा लोग विचलित नहीं होते हैं, और ‘लोकान्नोद्विजते च यः’, जो लोगों के द्वारा विचलित नहीं होता है। तो हम ये दोहरा सकते हैं, ‘यस्मानोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः’। तो जो अलग-अलग का असर उद्वेग हो जाता है, उसका हर्ष-अमर्ष-भय-उद्वेग कि अलग-अलग पंसे कोई हमारी बात सुनता है, हमारी बात नहीं सुनता है, बड़े उदास हो जाते हैं, यह सुनेगा कि नहीं, उससे भय रहता है उनको, और फिर ओवरऑल, समझते हैं, हम अजिटेटेड रहते हैं। तो मुक्तो, इन सबसे जो मुक्त है, यह सच में प्रियः। ‘हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः’। तो अभी यहाँ पर क्या बता रहे हैं भगवान? अभी मुझे एक भक्त बता रहा था कि यह श्लोक मुझे समझ भी नहीं आता है। अगर मैं प्रचारक हूँ, तो प्रचार का मतलब है कि दूसरों को अजिटेट करना है। तुम मोह में हो, तुम अज्ञान में हो, तुम नरक में जा रहे हो, उठो, जागो। और बोलता है कि, और प्रचारक होने का मतलब है कि लोग जब मूर्खतापूर्ण कार्य कर रहे हैं, तुमने अजिटेट करना है, क्योंकि प्रचार करेंगे। तो उनका डेफिनेशन है, प्रचारक मतलब बी अजिटेटेड, बी अजिटेटेड और सबसे अजिटेट करेंगे। बोलता है तो प्रचार क्यों करोगे? और आप शांत हैं, लोग शांत हैं, ठीक है, मैं भगवतधाम जा रहा हूँ, तुम नरक जा रहे हो, बाई-बाई। तो अभी क्या है? कंपैशन और अजिटेशन में फर्क है। क्या कंपैशन भी अजिटेशन हो सकता है, इतने से? हाँ, लोग परेशानी में है, लोगों को मुझे मदद करनी है, ठीक है, कंपैशन से थोड़ा अजिटेशन हो सकता है। मतलब क्या है? इसमें कंपैशन है, अजिटेशन ही शब्द का अर्थ क्या है? कि आराम से बैठना नहीं है, मुझे कुछ करना है। पर उसके पार की एक अजिटेशन नहीं है। क्या है? एक अजिटेशन भी होता है, कभी कुछ लोग होते हैं, कॉंट्रोवर्सी करते हैं कुछ जानबूझकर, इसने कुछ ऐसे कर दिया, उसने कुछ ऐसे कर दिया, तो उसे अजिटेशन मिलता है, पर क्या वो अटेंशन से अट्रैक्शन आएगा, अप्रिसिएशन आएगा, पता नहीं है मुझे। कभी घृणा भी आती है, क्या कहते हैं इसमें, कभी-कभी ये मीडिया में, एडवरटाइजिंग कहते हैं कि, अप्रिसिएशन आएगा, पता नहीं है। जब कोई भी, अभी यहाँ पर हम बैठे हैं, पीछे कोई चिल्लाने लग जाएगा, तो अभी वो चिल्लाएगा, तो कोई चिल्ला रहा है, और मैं यहाँ पर कुछ बोल रहा हूँ, तो अटेंशन उसके पहले जाएगा, पर वो अटेंशन के बाद क्या अप्रिसिएशन आने वाला है? अच्छा काम कर रहा है। अगर आप बहुत बोर हो गए उस लेक्चर से, तो शायद कहें अच्छा काम कर रहे हैं, पर नॉर्मली अप्रिसिएशन नहीं आने वाला है, जो अट्रैक्शन है, वो भी नहीं आने वाला है। तो वो जो स्ट्रेटजी है प्रचार करने की, वो ज्यादा समय तक चलती नहीं है, अजिटेट कर रहे हैं लोगों को। तो भगवान कहता है कि हमें दूसरों को अजिटेट नहीं करना है। प्रभुपाद जी जब अमेरिका में रह रहे थे, तो तभी पहले उनको गोपाल अग्रवाल नाम के व्यक्ति ने स्पॉंसर किया था। तो वो एक भारतीय था, उसने एक अमेरिकन स्त्री से शादी की थी, वो सैली अग्रवाल नाम को। तो वो अभी भी उनके पिताजी ने बोला था भारत से, इसलिए उन्होंने स्पॉंसर किया था प्रभुपाद जी का। तो उनको अपेक्षा नहीं थी कि स्वामी जी सही में आ जाएंगे। उनको लगा था, इससे लोगों की इच्छा होती है, पर कोई आता नहीं है, कि उस समय अमेरिका में जाना आसान नहीं था, 30-40 दिन जहाज में रहना, बहुत से लोगों के लिए जाना है, पर कोई हिम्मत नहीं करता था। तो उन्होंने पहले से चार-पाँच लोगों के लिए स्पॉंसर किया था लेटर, कोई आया ही नहीं था। और फिर वो सैली अग्रवाल बोलती है कि, जब मैंने लेटर पढ़ा और स्वामी जी आ रहे हैं, क्या करना है, कैसे रखेंगे उनको, क्या करेंगे, तो विचलित तो फिर क्या हो गया? तभी जब प्रभुपाद जी उनके घर में रह रहे थे, तो एक तरह से प्रभुपाद जी ने तुरंत देख लिया कि इनको भक्ति में रुचि नहीं है, वो ठीक है, एक ऑब्लिगेशन के रूप में उन्होंने मुझे यहाँ पे लाया है, उनके घर में रह रहे हैं। और उसको थोड़ी समझ थी, कि वो बोले कि, स्वामी जी, सॉरी, पर मेरे पास एक ही फ्रिज है, हम क्या कर सकते हैं? और प्रभुपाद जी ने क्या बोला, ‘थिंक नथिंग अबाउट इट’ (Think nothing about it), इसके विचार मत करो तुम, चिंता मत करो। तो वो लिखती है वहाँ पे, कि मेरे घर में, बहुत से गेस्ट आए थे, पर स्वामी जी बहुत अलग गेस्ट आए थे, ऐसे उनका कोई डिमांड था ही नहीं। वो बोलते थे कि वो खुद अपना खाना पकाते थे, और फिर कहते थे कि अगर मुझे उनके साथ, क्योंकि हमारे घर में कोई गेस्ट आए है, तो उनके साथ थोड़ा समय बिता जाना चाहिए, तो फिर क्या होता है, उनको निगलेक्ट होता है, स्वामी जी को अगर मैं उनको एंटरटेन नहीं कर सकती हूँ, तो स्वामी जी… स्वामी जी सिर्फ अपना चैंटिंग करते थे, वो अपने ग्रंथ लिखते थे। तो ही वो सेल्फ-सैटिस्फाइड हैं। तो अगर मान रहे हैं, हम भक्त किसी के घर में जाते हैं, तो हम जब उनके घर से वापस जाएंगे, तो क्या वो बोलेंगे? वो अपने लिए अपने अच्छे गेस्ट हैं, मेरे घर में आए थे, वो लगे कि ऐसे गेस्ट हैं, वो टफेस्ट गेस्ट थे कि ये डिमांड थी, ऐसे कुक करो, ये मत करो, यहाँ पर आवाज मत करो, वो मत करो। अब कुछ-कुछ हमारे भक्ति के लिए जरूरी है, पर पॉइंट यह है कि भक्त जो है, दूसरों को अजिटेट नहीं करना है आपको। ‘यस्मानोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।’ तो यह जो है, सदाचार की बात हो रही है। तो खास करके पाश्चात्य देशों में, और भारत में भी अच्छा धारा है यह, कि धर्म के प्रति थोड़ा नकारात्मक भाव आता है, कई लोग बोलते हैं, ‘आई ऍम स्पिरिचुअल बट नॉट रिलीजियस’ (I am spiritual but not religious), मैं आध्यात्मिक हूँ पर मैं धार्मिक नहीं हूँ। लोग बोलते हैं तो क्यों बोलते हैं? उनको लगता है धर्म बहुत संकीर्णवादी है, वो इंटॉलरेंट है, हिंसक है। तो ऐसे लोगों को आकर्षित करना है, तो क्या है? तो जो यहाँ पे प्रिंसिपल है, प्रिंसिपल नहीं करते हैं, क्या तत्वज्ञान क्या है, उसमें मुझे ज्यादा महत्व नहीं है, अलग-अलग लोग का अलग-अलग तत्वज्ञान हो सकता है, पर मैं क्या देखूँगा, क्या तत्वज्ञान क्या है, तुम बर्ताव कैसे कर रहे हो? वह जो है, बिहेवियर, जो व्यक्तिगत रूप है, जो तभी व्यावहारिक अधिकांश विधि जो है, वो बहुत ज्यादा लोग तत्व नहीं है, जो लोग ज्यादा हैं भी, ये थोड़े श्रद्धालु लोग ज्यादा हैं। पर हम एक प्रचार की संस्था है, तो कोई पहली बार आया है और उनको अगर बोलते हैं, कहते हैं तुम ऐसे ड्रेस पहन के नहीं आ सकते हैं, तो क्या होगा? वो चले जाएंगे वापस, कभी आएंगे नहीं। अभी हम… अभी राधानाथ महाराज को चौपाटी में पूछा गया था कि अच्छा नहीं है, पर अगर आप उनको रोकोगे, तो आप बोले एक नोटिस बना के रख दो, पर जाकर उनको बोलोगे, आप रोको उनको, तो क्या है? कौन कैसे बोलेगा उनको रोको कि वो उसमें कभी-कभी उनका अपमान हो सकता है। कुछ लोग होते हैं, उनको ‘दे गेट ग्रेट जॉय इन मेकिंग अदर्स फॉलो रूल्स’ (They get great joy in making others follow rules)। दूसरों को रूल्स फॉलो कराने में उनको बड़ा आनंद मिलता है। तो उसमें क्या है? कई बार जो लोग आते हैं, अभी क्या है, कोई सेल्फी ले रहा है, वो हंस रहा है, फोटो पोज कर रहा है, यह क्या कर रहे हो तुम? तुम अपराध कर रहे हो, नरक में जाओगे, भगवान के लिए मूट-पीट रहा होगी तुम, कई बार होता है ना, तुम नरक में जाओगे, यह भक्तों का बहुत फेवरेट डायलॉग हो जाता है। तो महाराज बोले कि हमें बताने की जरूरत नहीं कौन कैसे बताएगा, हमें पता नहीं है। तो इसलिए अभी ऐसे नहीं कि हम सेल्फी नहीं लेना, हम अच्छा बोल रहे हैं, पर हमें बताने की जरूरत नहीं है, वो लोग देखेंगे। तो यह महत्वपूर्ण है। तो यहाँ भी भगवान क्या बोल रहे हैं? कौन से भक्त उनको प्रिय है? जो सदाचारी भक्त है। इसका मतलब नहीं है कि मंगला आरती करना, जप करना ही महत्वपूर्ण नहीं है, वो जरूर महत्वपूर्ण है, पर यहाँ पर इस अध्याय में भगवान किस चीज़ में जोर दे रहे हैं? कि आपका सदाचार हो। एक तरह से हम कह सकते हैं कि जो सदाचार जो है, वो बिहेवियर है, गुड बिहेवियर, इसको इंग्लिश में कहते हैं वर्च्यू (Virtue)। इसका मराठी में, संस्कृत में शब्द आता है धर्म। हम कभी धर्म और भक्ति एक लेते हैं, पर धर्म मतलब क्या है? सदाचार होता है। तो आइडियल क्या है? भगवान यहाँ पर बोल रहे हैं धर्म और भक्ति दोनों साथ में हो। तो यह जो वर्णन है, बारह-तेरह अध्याय से बीसवें श्लोक तक है और इसका ही स्पष्टीकरण आता है आखिरी श्लोक में जो हमें आगे दोहराएंगे। पर अगर किसी में मन लगा तो स्पेलिंग रॉन्ग है यहाँ पर, तो भक्ति और धर्म जो है, अगर भक्ति है पर धर्म नहीं है, तो क्या होता है उसमें? वास्तव में वो व्यक्ति ऐसा है जो 9.30 और 30 उन्होंने बताया है, ‘अपि चेत्सुदुराचारो’ भगवान उसको भी स्वीकार करते हैं, अच्छा मानते हैं भगवान उनको भी। पर क्या है? ऐसे व्यक्ति लोगों को भगवान की ओर आकर्षित नहीं करेंगे। भगवान उनपर कृपा कर सकते हैं, पर कोई गुस्सैल है, कोई क्रोधी है, अच्छी सेवा कर रहा है, पर क्या है? वो भगवान उनपर कृपा करेंगे, पर क्या है? वैसे भक्त हम लोगों को आकर्षित नहीं कर पाएँगे। अभी किसी में धर्म है पर भक्ति नहीं है, तो क्या है? इसका सवाल का जवाब जो है, सत्रहवें अध्याय में अर्जुन पूछते हैं, सेवेंटीन चैप्टर में आता है कि अगर कोई भक्ति नहीं कर रहा है पर उसका कार्य कैसे हो रहा है? उसको तीन गुणों के साथ देखना है। अगर कोई धर्म भी नहीं कर रहा है, भक्ति भी नहीं कर रहा है, उसका वर्णन सोलहवें अध्याय में आता है, खास करके 3.16 वर्णन… ‘इन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति’ वहाँ पे भी आता है, ‘एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः’ सोलहवें अध्याय के खास करके चौथे श्लोक से लगभग बीसवें श्लोक तक आता है वर्णन, चौबीसवें श्लोक तक। अच्छा, तो क्या है कि हमें यहाँ पर रहना है, भक्ति करनी है, अच्छा व्यवहार भी करना है। तो प्रभुपाद जी को एक बार पूछा गया था, एक रिपोर्टर ने पूछा, हम तुम्हारे शिष्यों को कैसे जान सकते हैं? प्रभुपाद जी क्या बोले? वो अच्छा व्यवहार करते हैं, परफेक्ट जेंटलमैन-लेडीज, यह बताया है। जो वो सोलह माला जप करते हैं, वो चार नियमों का पालन करते हैं। तो रिपोर्टर को उससे क्या लेना-न देना है? अगर वो हमारे श्रद्धा के बारे में जानना चाहता है, तो वो ठीक है। अभी आखिरी श्लोक जो है, इसलिए हम देखते हैं, इस अध्याय में क्या है? आखिरी श्लोक? ‘ये तु धर्ममृतमिदम्’ इदम् मतलब यह। यह धर्म अमृत कौन सा धर्मामृत है? यह सदाचार का वर्णन है। उसके बारे में है यह वर्णन, ‘यथोक्तं पर्युपासते’। तो ऐसे सदाचार का व्यवहार करते हुए अगर कोई मेरी उपासना करता है, पर्युपासते। ‘श्रद्दधाना मत्परमा’, तो केवल सदाचार करना महत्वपूर्ण नहीं है, सदाचार है, पर उसके लिए श्रद्धा है मुझे, और मैं उनके जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य हूँ। पर्युपासते। श्रद्दधाना मत्परमा। ‘भक्तास्तेऽतीतमे प्रियाः’। तो जो श्लोक है इस तरह से, भगवान बोलते हैं, ऐसा भक्त, जो धर्म के साथ भक्ति कर रहा है, वो मुझे बहुत प्रिय है। जो सदाचार करता है, धर्म, जो नैतिक है, जो गुणवान है, और भक्ति कर रहा है। बारहवें अध्याय का देखा है, हमने ‘बी पर्सनल’ यह थीम था। किस तरह से, हम तीन स्तरों से देखा है, कैसे कि इसके तीन सेक्शन्स हैं, वो तीनों सेक्शन्स में, कि कैसे हम डिविनिटी… जो भगवान हैं, किसे को एक सवाल है, क्विकली? करने के लिए… आत्मा विष्णु को बात करते हैं और विष्णु को कोई चार्ज है। यह भगवान और सारे एक्जिस्टेंसेस का संबंध है। आत्मा चेंज नहीं होती है, पर शरीर बदलते रहता है। वैसे भगवान बदलते नहीं है, पर जगत बदलते रहता है। तो वो डिफाइनिंग मेटाफर है। वो ऐसे नहीं कि आत्मा विष्णु है। अद्वैत है, पर अद्वैत में भी कुछ भेद है। मतलब क्या है कि जीव और भगवान एक है, कैसे है? एक है। पर वो एक, जैसे प्रभुपाद जी बोला करते हैं कि वो प्रेम के संबंध में एक है। कोई पुरुष अपनी पत्नी को लड़का लगते हैं, उससे प्रेम करते हैं, तो वो बोले कि ‘वी टू आर वन’ (We to are one)। तो इसका मतलब नहीं कि दोनों एक बन गया है शरीर में। वो क्या है? वो एक हमारा भाव भी समान है। तो जो क्वालीफाई करते हैं, यह वननेस है क्योंकि एकत्व का बहुत उल्लेख आता है उपनिषदों में। पर क्या है? एकत्व का ही उल्लेख नहीं आ रहा है, और भी चीज़ों का उल्लेख आ रहा है। तो बोलते हैं कि एकत्व सत्य है। पर क्या एकत्व ही परम सत्य है? उसके एब्सोल्यूट वननेस है वो? नहीं। और भी है कुछ। और उसका वर्णन करते हैं। बहुत धन्यवाद श्रीमद् भगवत गीता की!Lecture Summary
1. भगवान एक व्यक्ति हैं (Divinity is a Person)
2. भगवान हमें व्यक्तिगत रूप से ट्रीट करते हैं (God Treats Us as Persons)
3. दूसरों को व्यक्ति के रूप में ट्रीट करें (Treat Others as Persons – सदाचार और व्यवहार)
Full Transcription
बारवा अध्याय: भक्ति योग और पर्सनलज्मसर्वव्यापकता और भगवान का व्यक्तिगत रूप
कर्म योग और भक्ति योग की तुलना
ब्रह्मवाद और मायावाद
भगवान हमें व्यक्तिगत रूप से ट्रीट करते हैं
सदाचार और भक्त के गुण