Hindi – Bhagavad Gita Overview Chapter 3 || Chaitanya Charan
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Lecture Summary
1. ज्ञान और कर्म की दुविधा (अर्जुन का संशय)
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दूसरे अध्याय के अंत में भगवान कृष्ण द्वारा ज्ञान और कर्म का उपदेश सुनने के बाद अर्जुन भ्रमित हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि यदि ज्ञान श्रेष्ठ है, तो भगवान उन्हें युद्ध (कर्म) करने के लिए क्यों कह रहे हैं।
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वे स्पष्ट रूप से पूछते हैं कि उनके लिए वास्तव में क्या श्रेयस्कर है—कर्म करना या संन्यास लेना।
2. कर्मयोग और समाज की अनिवार्यता (लोकसंग्रह)
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भगवान कृष्ण समझाते हैं कि बिना आंतरिक शुद्धि और परिपक्वता के केवल ऊपरी तौर पर कर्म छोड़ देना पाखंड (मिथ्याचार) है। शरीर के निर्वाह और जीवन यात्रा के लिए भी कर्म करना आवश्यक है।
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लोकसंग्रह: समाज में आदर्श स्थापित करने के लिए ज्ञानी और प्रतिष्ठित व्यक्तियों को भी अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, क्योंकि सामान्य लोग उन्हीं का अनुसरण करते हैं।
3. स्वधर्म और स्वभाव का महत्व
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प्रत्येक मनुष्य का अपना एक प्राकृतिक स्वभाव (प्रकृति) होता है। व्यक्ति को अपनी प्रवृत्ति के अनुसार ही अपना कर्तव्य (स्वधर्म) निभाना चाहिए।
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दूसरों के धर्म या भूमिका का अनुकरण करना कठिन और हानिकारक हो सकता है (“श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात्”)। अपने स्वभाव के अनुकूल कार्य करने से ही अंतःकरण की वास्तविक संतुष्टि मिलती है।
4. कर्म में सबसे बड़ा शत्रु: काम और क्रोध
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अर्जुन पूछते हैं कि न चाहते हुए भी मनुष्य को गलत कर्मों की ओर कौन धकेलता है? भगवान उत्तर देते हैं कि यह मनुष्य की अज्ञानता से उत्पन्न काम (वासना) और क्रोध हैं, जो ज्ञान को धुएं की तरह ढँक लेते हैं।
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इस पर विजय पाने का एकमात्र उपाय यही है कि मनुष्य अपनी इंद्रियों, मन और बुद्धि को नियंत्रित करे और फलों की आसक्ति से मुक्त होकर अपने नियत कर्तव्यों का पालन करे।
Full Transcription
तो अभी कल हमने देखा एक सवाल था, उसका जवाब जो है 2.54 से 2.72 यहाँ पर एक जवाब था। तो इसके बाद में अभी अगला सवाल जो है 3.1 और 3.2 में आता है, और भगवान इसका जवाब देते हैं। मतलब कैसे है? एक तरह से, भगवान गीता एक लेक्चर नहीं है, वो एक प्रश्न-उत्तर सत्र है। और जब गीता का आपको फ्लो देखना है, उसका प्रवाह देखना है, तो हमें देखना है कि किस प्रकार का प्रश्न पूछा गया है, और उस प्रश्न का कैसे उत्तर दिया है?
तो जब भी कोई सवाल आता है, तो सवाल के बारे में हम तीन सवाल कर सकते हैं कि सबसे पहले क्वेश्चन है—What is the question? कि एक्जेक्टली कभी कोई कुछ लोग ऐसा सवाल पूछते हैं कि क्या पूछ रहे हो तो? और दूसरा आता है कि Why the question? कि ये सवाल क्यों पूछ रहे हैं?
अगर मान लीजिए कि प्रवचन के बारे में है और फिर कोई अगले सवाल पूछ रहे हैं। भगवान ने धर्म का सवाल पूछा है, तो उस पर भगवान ने क्या बोला है? अर्जुन को वास्तव में अपना क्षत्रिय धर्म करना चाहिए, इस पर जोर दिया है और यह करने के लिए उनको दो चीजें बताई हैं। एक है पहले वो कर्मकांड के स्तर पर कर सकते हैं और दूसरा कर्मयोग के स्तर पर कर सकते हैं, पर उनको युद्ध करने को बोला गया है।
अभी जब ऐसे बोला है, तो अर्जुन सवाल पूछते हैं तीसरे अध्याय की शुरुआत में—ज्यायसे चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन, तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव। और फिर व्यामिश्रेण वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे, तदेकम् वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमप्नुयाम्। कि आपने जो वाक्य बताए हैं, मुझे मोहित कर रहे हैं, आपके वाक्य मुझे मिश्र लग रहे हैं, इसलिए आप एक चीज़ जो स्पष्ट तरह से है, आप मुझे बताओ।
तो अभी अर्जुन को कौन से वाक्य मिश्र लग रहे थे? और क्यों ऐसे लग रहा था कि उनको भगवान ने स्पष्ट नहीं बताया है? तो क्या होता है कि जब हम कोई सवाल पूछते हैं, तो अगर वो अपूर्ण है या गलत है, तो फिर कुछ भी जवाब देंगे, तो वो जवाब समझ में नहीं आएगा। तो अर्जुन की क्या थी? दो धारणाएं थीं।
अर्जुन की दुविधा: युद्ध और शांति
क्या है अर्जुन के सामने? एक है फाइट, दूसरा है डोंट फाइट। युद्ध करें या युद्ध न करें, मतलब कर्म करें या संन्यास लें, ये दो पर्याय थे। और अभी अर्जुन जब सोच रहे थे कि अगर उनको शांति चाहिए, युद्ध नहीं चाहिए, तो क्या करना पड़ेगा उनको? युद्ध नहीं करना है, तो भी शांति मिलेगी।
तो अर्जुन क्या कर रहे थे? शांति जो है, पीस जो है, वो इस पर्याय के साथ एसोसिएट कर रहे थे। स्वाभाविक है कि इस पर्याय, मतलब शांति कब मिलेगी, जब युद्ध नहीं करेंगे।
अभी भगवान ने क्या किया है? स्पष्ट रूप से भगवान ने बोला है कि आपको युद्ध करना चाहिए। ये पहले उन्होंने 2.37 में बोला है, फिर 38 में बोला है, 47 में बोला है। युद्धाय स्वधर्मेण, स्वर्ग प्राप्त करने के लिए युद्ध करो, या पृथ्वी प्राप्त करने के लिए युद्ध करो। और बिना किसी याचना-कामना के लिए युद्ध करो, पर युद्ध करो। फिर 2.48 में वो बोला है आपको क्या? कि उनको बोला है आपको कर्म करना चाहिए, फल की अपेक्षा के बिना।
मतलब इन दोनों में क्या है? युद्ध करो बोल रहे हैं। पर इसके बाद में, खास करके दूसरे अध्याय के अंत में, दो श्लोकों में सत्तर और इकहत्तर (2.70 और 2.71), दोनों में भगवान शांति का उल्लेख करते हैं। वो कहते हैं, उसको शांति मिलेगी, और तो पुनः, बाद में क्या बोलते हैं? तो अभी क्या हो गया है? भगवान ने अर्जुन को युद्ध करने को बोला है, एक तरह से कह सकते हैं, इसको थोड़ा एक तरह से दिखा सकते हैं, कि अर्जुन की धारणा क्या है? कोई शांति चाहिए है? अर्जुन की ये धारणा है कि युद्ध नहीं करें, तो शांति मिलेगी।
पर कृष्ण ने क्या बताया है? कृष्ण ने नहीं बताया है उनको कि युद्ध न करो, बल्कि युद्ध करो बताया है और आपको शांति मिलेगी, यह भी बताया है।
तो इससे अर्जुन कन्फ्यूज हो गए। तो आप मुझे युद्ध करना चाहने को बोल रहे हैं या युद्ध न करने को बोल रहे हैं? ये सब अर्जुन सोच रहे हैं। और फिर यहाँ पे 70, 71 में शांति की बात है। तो अर्जुन को लगता है, इससे शांति कैसे मिलेगी? युद्ध करने से शांति कैसे मिलेगी? तो आप क्या चाहते हैं, युद्ध करूँ या न करूँ?
तो वास्तव में यहाँ पे क्या है? अर्जुन बाह्य शांति के बारे में बात कर रहे हैं, जबकि भगवान अंतरंग शांति के बारे में बात कर रहे हैं। तो क्या है? शब्द जो होते हैं, इंग्लिश में इसको कहते हैं कि जो शब्द (words) होते हैं, उनके दो चीजें होती हैं—denotations और connotations।
शब्दों के अर्थ: literal meaning और contextual meaning
Denotations मतलब शब्दशः अर्थ, यानी literal meaning; और दूसरा है contextual meaning, कि संदर्भ के अनुसार अर्थ। तो मान लीजिए अभी शब्द का जो अर्थ होता है, कल मैं बता रहा था कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते हैं। अभी लातों के भूत, अगर हम बोलते हैं, लातों के भूत मतलब क्या है? क्या वो भूत लात मारते हैं? उसका शब्दशः अर्थ अलग है और उसका गर्मी का अर्थ (संदर्भगत अर्थ) अलग है।
तो जब भी क्या होता है, शांति का अर्थ है, शांति होना पड़ता है। युद्ध भूमि में एक बात कर रहा है, समाधान व्यक्ति को लोग शांति, आप युद्ध न होना इस बात कर रहे हैं। पर वो जो दूसरा अध्याय है पूरा, उसका सवाल जो है, भगवान अंतरंग चेतना के बारे में बात कर रहे हैं।
तो क्या हो रहा है? इसलिए अर्जुन को लग रहा है, हे भगवान, एक तरह से आप मुझे युद्ध करने को बोल रहे हो। फिर भगवान ने कहा है कि आप अवरम कर्म जो है, यहाँ दूर रखो। ऐसा कर्म है जिससे आपको वर नहीं मिलेगा। तो अभी अर्जुन के दृष्टि से क्या है? युद्ध करना, अपने ही रिश्तेदारों को मारना, यह अवरम कर्म है। पर भगवान क्या कर रहे हैं? अवरम कर्म क्या है?
अर्जुन क्या सोचते हैं इसके बारे में? अर्जुन का संसेप्शन (conception) हम कह सकते हैं इसके बारे में। अर्जुन क्या विचार कर रहे हैं? युद्ध करना, फाइटिंग, खास करके किलिंग एल्डर्स, यह अर्जुन की कल्पना है। पर भगवान का उद्देश्य क्या था? यह बता रहे हैं अवरम कर्म।
शिक्षा के दो पहलू: सरलीकरण और जटलता
कल मैं बता रहा था, यहाँ भगवान क्या कर रहे हैं? मतलब क्या है? अगर अभी तक आप कन्फ्यूज नहीं होगे, तो और थोड़ा कन्फ्यूज करता हूँ मैं आपको। पर कैसे है? कि एजुकेशन, शिक्षण होता है न, शिक्षण के दो पहलू होते हैं। एक है जो कठिन चीज़ है, उसको सरल करना; और दूसरा है जो सरल चीज़ है, उसको जटिल करना।
मतलब क्या है? ऐसे है हम गणित सिखा रहे हैं, तो छोटा बच्चा जानता है, दूसरे सिस्टम जानता है कि छोटा नंबर आप बड़े नंबर से सबट्रैक्ट नहीं कर सकते हैं। तीन माइनस पाँच नहीं कर सकते हैं, वो सिंपल चीज़ है। अपने टीचर को पूछेगा, टीचर बताएगा तीन माइनस पाँच क्या है? नहीं हो सकता। तो सरल चीज़ को कॉम्प्लिकेट करना है।
तो कभी-कभी क्या होता है, एजुकेशन में दोनों चीजें होती हैं। एजुकेशन में क्या है? सरलीकरण (Simplify)। जो कठिन है, उसको सरल करो—यह एक पहलू है, जरूर यह पहलू है। पर दूसरा यह भी है कि कभी-कभी सत्य इतना सरल नहीं होता है, कभी-कभी सत्य जटिल होता है। तो व्यक्ति को सरल लग रहा है, तो उसको जटिलता क्या है, वो बतानी है।
छोटे बच्चे को अगर आप सिखा रहे हैं, इसको समझाना है, तो कैसे है? छोटे बच्चे को बताते हैं कि यह ब्लैक है, यह व्हाइट है। तो एक तरह से कह सकते हैं, सिंपल क्या है? ब्लैक और व्हाइट। यह ब्लैक है, यह व्हाइट है। पर दुनिया में सिर्फ ब्लैक और व्हाइट बहुत कम चीजें हैं, काले और सफेद बहुत-बहुत कम चीजें हैं। अधिकांश चीज़ें जगत में क्या हैं? वो है ग्रे, जिसको क्या बोलते हैं? भूरा। भूरा नहीं तो भूरे के अलग-अलग रंग हैं बीच में, अनेक से रंग हैं। तो फिर बच्चे को समझाना पड़ता है।
तुलना करते हुए, अर्जुन के मन में दो ही पर्याय हैं—कर्म करना या कर्म नहीं करना। पर भगवान ने बताया कि यहाँ निष्ठा सर्वभूतानाम्… कर्म के ही अनेक स्तर होते हैं। एक है जो कर्म है, सबसे नीचे है विकर्म, और भगवान कहते हैं अगर आप युद्ध नहीं करोगे, तो विकर्म हो जाएगा। फिर उसके बाद में भगवान कहते हैं कर्मकांड। फिर यहाँ पे है कर्मकांड। फिर उसके ऊपर है कर्मयोग।
तो अभी तक भगवान ने तीन स्तर बताए और तीनों में कार्य है। अर्जुन के पास अर्जुन के मन में दो ही पर्याय हैं—कार्य करना या कार्य नहीं करना। पर भगवान ने बताया कि… वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः। कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्। क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति। भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्। व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते। त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
तो यह सब क्या है? यह सब फ्लावरी वर्ड्स हैं, यह पुष्पिता वाचं… इसलिए यह भी नहीं करना है। कई जगहों पर बताया है, 2.47, कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। कर्मयोग इस टू बी फॉलोड।
तो भगवान ने क्या किया? कर्म के एक स्तर हैं और कर्म के कई स्तर हैं।
युद्ध के सकारात्मक और नकारात्मक पहलू
अर्जुन सोच जो है, एक तरह से क्या है? इसको और सिंपलीफाई करते हैं। अभी कर्मकांड जो है, उसको जटिल है, थोड़ा उसको भी नीचे रख देते हैं हम। एक है कर्म है, वैराग्य है। पर अभी क्या है, अर्जुन को खुद लग रहा है, कर्म करेंगे तो क्या है? इसका एक पॉजिटिव है, इसका एक नेगेटिव है।
कर्म करेंगे तो क्या होगा? अभी अर्जुन की दृष्टि से क्या करना है? अर्जुन को अपने ही परिवार वालों से युद्ध करना पड़ने वाला है। इसलिए अंग्रेजी में Fratricide कहते हैं। फ्रैट्रीसाइड मतलब अपने ही परिवार वालों से युद्ध करके अपने ही परिवार वालों को मारना। तो यह फ्रैट्रीसाइड है।
अगर करेंगे तो क्या होगा? उसका सकारात्मक क्या है? कि अर्जुन अपनी जिम्मेदारी कर रहा है (सोशल ड्यूटी), जो अर्जुन कर रहा है, और युद्ध हो जाएगा। तो मतलब क्या उसका नकारात्मक? हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
और अगर वैराग्य लेंगे तो क्या होगा? उसका सकारात्मक क्या है? कि नो बैड कर्मा। कोई बुरा कर्म नहीं है। पर उसका नकारात्मक क्या है? सोशल इरेस्पॉन्सिबिलिटी। अर्जुन को जानता है? अर्जुन समझ रहा है कि मैं अपना कर्तव्य छोड़ दूंगा। कर्तव्य छोड़ना अच्छी बात नहीं है।
तो अभी अर्जुन क्या करें? यही करना है। तो भगवान क्या बोलते हैं? इन दोनों के बीच में एक मार्ग है और वह है कर्मयोग। इसमें क्या है? इसमें सोशल ड्यूटी भी है, अपना सामाजिक कर्तव्य भी अर्जुन कर रहा है, पर उसके साथ-साथ नो बैड कर्मा, क्योंकि अनासक्त भाव से कर्तव्य के रूप में कर रहा है वो, इसलिए कोई बुरा कर्म नहीं है। वह एक मार्ग में बताए, कर्मयोग के मार्ग में।
पर जो ज्ञान और वैराग्य जो है, अर्जुन दो अलग-अलग स्तर समझ रहा है, इसलिए भगवान कह रहा है—लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ, ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्।
इसलिए भगवान क्या करते हैं? जब शुरू करते हैं, हाँ, अर्जुन, तुम्हारी यह संकल्पना है, यहीं से चालू करते हैं। कोई क्या होता है, कोई सवाल पूछता है और जवाब देता है। जब कोई प्रवचन करता है, जवाब देता है, तो आदर्श सोचता है कि प्रवचनकर्ता है कि मैं जो बोल रहा हूँ, वो ऑडियंस समझ में आ जाएगा। तुम्हारी संकल्पनाएं, हम वहीं से शुरू करते हैं।
तो इसलिए भगवान क्या बोलते हैं? 3.3 में शुरू करते हैं वो, यह दो संकल्पनाओं के बारे में बात करते हैं। दो प्रकार के स्तर हैं—द्विविधा निष्ठा। एक है कर्मयोग और दूसरा है ज्ञानयोग। तो कर्मयोग में तीसरे अध्याय का जो प्रवाह है, उसकी हम चर्चा करेंगे। पर सबसे पहले यहाँ से शुरू हो रहा है। 3.3 में कहते हैं, भगवान कहते हैं, दो स्तर हैं। एक है कर्मयोग और एक है ज्ञानयोगेन सांख्यानाम्, कर्मयोगेन योगिनाम्।
और फिर भगवान कहते हैं, ये दोनों अच्छे हैं, क्योंकि दोनों से वास्तव में आध्यात्मिक प्रगति हो सकती है। तो एक तरह से भगवद्गीता का उद्देश्य क्या है? अगर हम, अभी यह जो मैंने दो मार्ग इस तरह से दिखाए हैं, दो स्तर हैं। पर वास्तव में, दूसरे पर्दे से देखें, तो क्या हैं? अगर ये स्पिरिचुअल लेवल है और ये मैटेरियल लेवल है (यह भौतिक स्तर है)। तो अभी भगवान कह रहे हैं कि दोनों मार्गों से आप कर्मयोग लो या ज्ञानयोग लो, तुम्हारे लिए कौन सा अच्छा है?
ज्ञानयोग की व्यक्तिगत पात्रता (Individual Qualification)
अभी ध्यान योग के लिए क्या है? अभी अर्जुन का सवाल क्या है? मुझे क्या करना चाहिए? युद्ध करना है या युद्ध नहीं करना है? वो सवाल है अर्जुन के लिए। अब इसके जवाब में भगवान बोलते हैं कि दोनों अच्छे हैं, पर दोनों के लिए जो पात्रता है, वो अलग-अलग है।
और अभी पूरे इस अध्याय में जो भगवान बताए गए, अभी अर्जुन का सवाल था कि तुम अच्छा बोल रहे हैं, यह बुरा बोल रहे हैं, तुम ज्ञान अच्छा है बोल रहे हैं, कर्म बोल रहे हैं, कर्म से दुष्कर्म हो जाएगा बोल रहे हैं। पर भगवान बोलते हैं कि ठीक है, क्या स्तर की बात कर रहे हैं, वो हम चर्चा कर रहे हैं इस पूरे अध्याय में, कि किसकी चर्चा होने वाली है बेसिकली? यह ज्ञानयोग है और हम कहते हैं पाथ अच्छा कर रहे हैं। और बहुत स्पेसिफिकली हम कहते करते हैं—Action versus Path of Action (कर्मकांड हो सकता है, कर्मयोग हो सकता है)।
अभी इन दोनों की तुलना इस पूरे अध्याय में होने वाली है, क्योंकि अर्जुन को लग रहा है कि भगवान, आप क्या करना चाहते हैं? तो भगवान क्या करते हैं इसका जो विश्लेषण है, अलग-अलग स्तर पर करते हैं।
अभी अगर ज्ञानयोग करवाना है, तो भगवान कहते हैं कि इसके लिए सबसे पहले इंडिविजुअल क्वालिफिकेशन (व्यक्तिगत पात्रता) क्या है? भगवान कहते हैं सबसे पहले कि अगर आप में वैराग्य नहीं है, तो क्या होगा? आप जो है, मिथ्याचारी बन जाओगे। मिथ्याचारः स उच्यते। तो हिपोक्रेट, एक स्ट्रॉन्ग वर्ड, प्रिटेंडर विदाउट रियल रिननशिएशन। तो यदि बिना असली वैराग्य के, असली रिननशिएशन के, आप वैराग्य लोगे, तो क्या हो जाएगा? यह जीवन बहुत परेशानी का है।
तो भगवान बोलते हैं कि ऐसा हो जाएगा, तो समाज कैसे चलेगा? आपका शरीर का व्यवहार कैसे होगा? शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येद्कर्मणः। शरीर को भी आप संभाल नहीं पाओगे, यह 3.8 में बता रहे हैं। और फिर इसके बाद में भगवान आगे कुछ बताएंगे, वो मैं अभी बताता हूँ, फिर हम इस अध्याय का फ्लो देखते हैं। पहले फ्लो देख लेते हैं, फिर थोड़ा सा एक… यह कॉम्प्लिकेट हो रहा है, मैं जानता हूँ, मैं सिंपलीफाई करने का प्रयास करूंगा इसको। अब तक मैंने पहला पार्ट किया है, कॉम्प्लिकेट किया है सब कुछ।
तीसरे अध्याय का संरचनात्मक प्रवाह (Chapter Flow)
तो इस अध्याय में कितने श्लोक हैं किसे बताएं? 43।
तो अभी इसमें कैसे है? लगभग नौवें श्लोक तक भगवान बता रहे हैं कि कर्मयोग यह प्रिमैच्योर ज्ञानयोग से बेहतर है। कर्मयोग यह ज्ञानयोग से बेहतर है, खास करके योग परिपक्व नहीं है ज्ञानयोग के लिए, उससे वो बेहतर है।
फिर उसके बाद में, यहाँ तक बेसिलकली क्या है? भगवान बता रहे हैं कि आपको… मैंने कल बताया, अलग-अलग जगह से भगवान तीर मार रहे हैं, मतलब हर जगह से अर्जुन को कर्तव्य कर्म करने के लिए बताना चाहते हैं।
तो यहाँ पर बताते हैं कि इसके बाद में वो कहते हैं कर्मकांड। कर्मकांड भी वैदिक कर्तव्य है। कर्मकांड या कर्मयोग, कुछ भी करता है व्यक्ति, उससे क्या होता है? उससे समाज चलता है—Social Maintenance। मतलब यहाँ पर भगवान यज्ञ के बारे में बोल रहे हैं कि यहाँ 16, 9 से 16 श्लोक में बोलते हैं—अगर आप, आपका कर्म करोगे, तो आप यज्ञ करोगे, आप धर्म का पालन करोगे, इससे समाज की ज़रूरतें पूरी होगी।
तो यह जो है, एक तरह से, एक कॉस्मिक दृष्टि से बोल रहे हैं, एक विश्व की दृष्टि से बोल रहे हैं—Cosmic Perspective।
फिर उसके बाद में, 16 से लगभग 25 तक, भगवान बोलते हैं कि आपको मानवीय दृष्टि से भी देखना चाहिए। मानवीय दृष्टि से मतलब क्या? कि मान लीजिए कोई कहेगा कि अभी संसार तो, अभी विश्व तो चलने ही वाला है, मैं कर्तव्य करूँ न करूँ, क्या फ़र्क पड़ने वाला है? हाँ, कह सकते हैं, पर कहते हैं कि तुम समाज में एक नेता के रूप में हो, तो तुम्हें, तुम जो आदर्श रखोगे, तुम जो कार्य करोगे, वो दूसरों के लिए आदर्श बन जाएगा।
तो इसलिए भगवान कहते हैं कि शायद… मतलब अभी तक भगवान क्या बता रहे हैं कि पहले उन्होंने बताया कि आप परिपक्व नहीं हैं, आप वैराग्य लेने तैयार नहीं, तो क्या होगा? आप मिथ्याचारी बन जाओगे।
पर कोई कहेगा कि मैं वैराग्य लेने तैयार हूँ। ठीक है, फिर भगवान कहते हैं कि वैराग्य लेने तैयार हो, पर तुम जो हैं समाज के लिए उदाहरण रखना चाहिए। और अभी लोग क्या सोचेंगे? अभी सबको एक तरह से वैराग्य लेना है। क्षत्रिय भी बाद में वैराग्य लेते हैं, जब उनका उम्र हो जाता है, वो गृहस्थ के बाद वैराग्य लेते हैं। पर जब कोई व्यक्ति बड़ी मुश्किल में आता है, और समस्या के कारण वो वैराग्य लेने के लिए जाता है, और दूसरे लोग वैसे ही करेंगे।
तुम्हारे वैराग्य से तुम्हारा उद्धार हो सकता है, पर तुम्हारा अनुकरण करके दूसरे लोग वैराग्य लेंगे, उनसे उनका उद्धार नहीं होगा। क्या होगा? अगर वो वैराग्य लेंगे, तो उनका पतन हो जाएगा और उससे समाज का पतन हो जाएगा। तो यह भी भगवान बताते हैं यहाँ पे।
कैसे है कि एक तरह से यह है लीडर और यह है फॉलोअर्स। तो जो फॉलोअर्स हैं, अनुयायी हैं, और नेता हैं। तो अभी जो नेता है, क्वालीफाइड फॉर रिननशिएशन (मान लीजिए वो वैराग्य के लिए परिपक्व हैं), तो फिर उसके बाद में क्या होगा उनका? उनका वैराग्य लेते हैं, उनसे उनका उद्धार हो जाएगा। पर उनका कार्य देख कर, उनको देख के क्या करेंगे? जो अनुयायी हैं, वो अनक्वालीफाइड हैं रिननशिएशन के लिए। और अगर वो वैराग्य के लिए लेंगे, तो क्या होगा? उनका डिग्रेडेशन हो जाएगा, उनका पतन हो जाएगा।
तो क्या करेंगे? तुम्हारे कार्य से दूसरों का क्या होने वाला है, यह भी तुम्हें देखना है। तुम परिपक्व हो, पर बाकी परिपक्व नहीं हैं। तो मतलब क्या है कि जब हम कहते हैं, इसको एक और तरह से देखते हैं। वैराग्य कोई ले रहा है, तो क्यों ले रहा है वैराग्य? तो एक तरह से इसके दो संभावना हो सकती हैं इसके लिए—एक है मैच्योर और दूसरा है इमैच्योर।
मच्योर मतलब क्या? परिपक्व मतलब क्या? वो आध्यात्म के लिए तैयार है। तो दोनों एक परिपक्व हैं, दूसरा… पर अगर कोई व्यक्ति, तो रिननशिएशन मेड, जब समस्या आती है किसी जीवन में, किसी के जीवन में बड़ी समस्या आ गई है, और उसने वैराग्य ले लिया है। तो अभी एक हो सकता है अट्रैक्शन टू स्पिरिचुअल। क्यों लिया है उसने? क्योंकि उसको अध्यात्म के बारे में रुचि है और उसने फैसला कर लिया कि ये करने की ज़रूरत नहीं है।
पर दूसरा है इरेस्पॉन्सिबिलिटी अबाउट मैटेरियल। अर्जुन, तुम्हें एक कठिन कर्तव्य है। क्या है तुम्हारा कर्तव्य? तुम्हें अपने रिश्तेदारों से युद्ध करना है। तुम नहीं करना नहीं चाहते हैं। शायद तुम्हें सही में परिपक्वता है। कभी-कभी ऐसे हो सकता है कि व्यक्ति के जीवन में कोई समस्या आती है और तभी उसमें आध्यात्मिक जागृति हो जाती है। हो सकता है ऐसे। व्यक्ति अपना साधारण जीवन जी रहा है, उसमें आध्यात्मिक परिपक्वता शायद पूर्व जन्म से भी है या पूर्व्यों से है, पर वो अपने व्यावहारिक जीवन में जी रहा है और कुछ हादसा हो जाता है उसके जीवन में, तो तुम्हें भी अपना कर्तव्य करना ज़रूरी है।
तो इस तरह से यहाँ पे भगवान क्या बता रहे हैं अर्जुन को कि तुम्हें अपना कर्तव्य करना चाहिए।
स्वभाव और स्वधर्म (Nature and Duty)
और यहाँ पे जो हम जा रहे हैं, मैं इसको थोड़ा और विस्तार करता हूँ। एक विश्व की दृष्टि से देखते हैं, एक मानव समाज की दृष्टि से देखते हैं, यहाँ पे कर्मयोग करना चाहिए। विश्व की दृष्टि से देखते हैं, क्योंकि आपको समाज के लिए एक उदाहरण देना है, नहीं तो फिर यह चलेगा नहीं आपके लिए। तो यह बाद में बताते हैं भगवान। मैं जो है, इसको एक चैप्टर कंप्लीट करके थोड़ा और सिंपलीफाई करता हूँ इसको जहाँ तक हो सके।
उसके बाद में भगवान बोलते हैं कि 35 तक, अच्छा यह 35, 36 से अगला सेक्शन शुरू होता है। तो हर एक व्यक्ति को, यहाँ पर वापस कर्मयोग करने को बोलते हैं भगवान—Action is better than renunciation। ज्ञानयोग के बारे में भगवान स्पेसिफिकली नहीं कर रहे हैं, Action is better than renunciation, क्योंकि वैराग्य में ज्ञानयोग हो सकता है, ध्यानयोग भी हो सकता है, पर वो action करते हुए यह वैराग्य से बेहतर है।
क्यों? क्योंकि भगवान यहाँ पर बताते हैं, स्वभाव परस्पेक्टिव। कि हर एक व्यक्ति का अपना स्वभाव है, और हर एक को अपने स्वभाव के अनुसार कार्य करना चाहिए।
तो वो कहते हैं कि अभी तुम, हे अर्जुन, तुम्हारा स्वभाव एक क्षत्रिय का है। तुम अभी कहें कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, पर क्या होगा? अभी तुम कह रहे हैं कि तुम युद्ध नहीं करोगे, पर कुछ समय के बाद, कहीं और तुम कोई अत्याचार देखेगा, कहीं और कोई बुरा कार्य कर रहा होगा, तुम में एक क्षत्रिय जो आएगा, वो तुरंत जागृत हो जाएगा, और युद्ध करने की इच्छा करेगा।
अभी तुम, इसे मान लीजिए, कोई व्यक्ति पुलिस में भर्ती हो गया, या कहीं आर्मी में भर्ती हो गया, क्योंकि उसमें सही में दूसरों के संरक्षण करने की इच्छा है, और वहाँ पर कुछ समस्या आ जाती है, कुछ यह होता है, वो होता है, वो होता है—नहीं-नहीं, नौकरी छोड़ता हूँ। अभी जो पुलिस में है व्यक्ति, और कोई गुनाह कर रहा है, तो वो गुनाहगार पर आक्रमण कर सकता है। अभी उसको वो पोस्ट नहीं है, तो वो क्या होगा? उसको तुम गुंडागर्दी कर रहे थे, वो गुंडा था, तुम भी गुंडा बन गए।
तुम जो है, तुम्हारे प्रवृत्ति के अनुसार कार्य कर रहे हो, पर क्या है? तुम्हारे प्रवृत्ति के अनुसार कार्य कर रहे हो, कि अगर तुमने जो बाहर की भूमिका है, बाहर का जो कर्तव्य है, वो छोड़ दिया, तुम्हारा अंदर का स्वभाव तो नहीं चलने वाला है, पर तभी तुम हिंसा करोगे।
अभी तुम कह रहे हैं, मैं हिंसा नहीं करना चाहता, क्योंकि ये सब कर्मबंधन होता है इससे, ये नहीं करना है। ये तुम बड़ी-बड़ी फिलॉसफियां बता रहे हो, पर जब तुम्हारा स्वभाव जागृत होगा, तो ये नहीं चलने वाला है तुमको। तो बेहतर है कि तुम अपने स्वभाव के अनुसार जो भूमिका है, वो भूमिका रखो।
तो क्या हो रहा है अभी? एक तरह से देख सकते हैं इस तरह से कि ये जो है, अभी… अभी ये आत्मा है, और फिर आत्मा के बाहर उसका एक स्वभाव है, ये स्वभाव कहाँ आता है? वो मन और शरीर में होता है, और उसके बाहर, एक उसका जो है, ये एक पर्सन है—आत्मा है, स्वभाव है, और उसका जो है, सोशल रोल, सामाजिक भूमिका है, वो है।
तो अभी क्या है? अर्जुन बोल रहा है कि सामाजिक भूमिका है, मैं छोडूंगा। उन, मैं ये… अभी अर्जुन का अंदर का यह मतलब है कि ही प्लेज्ज् द रोल ऑफ अर्जुन, ही सेज दैट आई विल लीव द वैराग्य, मतलब क्या है? अर्जुन विल… या जब वैल्यू नॉलेज है, यहाँ कर रहे जाएंगे, लीव द रोल हियर, एंड आई टू से दैट आई यहाँ कर आ जाऊंगा, विल लीव एट द लेटर प्लेस।
भूमिका है यहाँ रह जाएगी और मैं यहाँ चला जाऊंगा। तो यह क्षत्रिय का राज्य है, क्षत्रिय का पोस्ट है, वो छोड़ दूंगा मैं उन्हें। तो अर्जुन कह रहे हैं कि यह वैराग्य मतलब क्या है? तो यह सोशल रोल रीनाउन्स कर दिया, वो छोड़ दिया। पर क्या है? क्षत्रिय की प्रवृत्ति अभी तक है उसके पास। तो अभी क्या होगा? यहाँ पे क्योंकि व्यक्ति को अपना कर्तव्य तो करना ही पड़ेगा।
तो यहाँ पर भगवान बताते हैं—श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।
परधर्मो भयावहः मतलब क्या है? ये भय वाह क्यों होता है? क्योंकि क्या होता है? हर व्यक्ति जब अपना कर्तव्य यह कर रहा होता है, जब अपने स्वभाव के अनुसार वो कर्तव्य यह करता है, तो उसमें, एक तरह से उस व्यक्ति को एक अंतरंग संतुष्टि मिलती है।
अभी मान लीजिए कोई डॉक्टर है, तो अभी अगर उसमें सही में लोगों के देखभाल करने की प्रवृत्ति है, तो अभी हर डॉक्टर को पैसा चाहिए, हर डॉक्टर को एक पोजीशन चाहिए, हर डॉक्टर को थोड़ा सोशल सोसाइटी में आदर चाहिए। वो सब तो चाहिए, पर वो अंदर-अंदर भी सेवा भाव है। तो क्या है? दूसरों की मदद करना है, दूसरों की तबीयत ठीक करना है। तो वो जो एक्सटर्नल रिजल्ट जो है, एक तरह से कुछ अलग है… हम देख रहे हैं क्या?
क्या होता है? जब अगर आप दूसरों के कर्म करोगे, तो दो चीजें होती हैं। एक है कि एक Internal Satisfaction होता है कि जो मुझे अच्छा लगता है, जो मैं अच्छा कर सकता हूँ, वो मुझे मिल रहा है। और जो मैं कर रहा हूँ, कोई लेखक है, उसको लिखने में अच्छा लगता है, कोई संगीतकार है, उसको अच्छा है।
तो जिन कुछ लोग होते हैं, जिन कुछ लोग भी ऐसे धून सकते हैं, वो हजार लोग के साथ हैं, वो ऐसे करेंगे, ऐसे दिखा तो… तो जब उनका कोई मन विचलित हो गया होगा, किसी ने कुछ वैसे बोल दिया होगा, ये हो गया, वो कोई मृदंग ले, करताल ले, हारमोनियम ले, और खुद अकेले कीर्तन करेंगे। कोई सुन नहीं रहा है, पर वो कीर्तन करेंगे। क्यों? क्योंकि उसमें उनको अंतरंग संतुष्टि मिल रही है। उनको अंतर से ही भगवान का अनुभव हो रहा है।
तो जब हम हमारे स्वभाव के अनुसार, हम ये कह सकते हैं ये आध्यात्मिक हैं, सही आध्यात्मिक हैं, पर इसमें भी क्या है? क्योंकि वो व्यक्ति क्यों है? उसमें वो प्रतिभा है, उसमें प्रवृत्ति है, तो उसको अंतरंग संतुष्टि मिलती है। और फिर क्या हम कह सकते हैं? External Remuneration। रेम्यूनरेशन मतलब पैसा हो सकता है, बाह्य उसको कुछ मिल सकता है, और वो ज़रूरी है, एक तरह से हर व्यक्ति को दोनों ज़रूरी हैं।
स्वभाव के विपरीत कार्य और उसके परिणाम
पर अगर ऐसा नहीं है, अगर action contrary to nature (कंट्ररी मतलब व्यक्ति अगर अपने स्वभाव के विपरीत कार्य करता है), तो क्या होता है? एक तरह से no internal satisfaction। व्यक्ति को एक अंतरंग सुख है ही नहीं।
कोई व्यक्ति को, मान लीजिए उसकी ब्राह्मण प्रवृत्ति है, उसे सिखाना चाहता है, पढ़ाना चाहता है, और उसको कंपनी में, उसको कंपनी में, say, मार्केटिंग में, एडवरटाइजिंग में रोल मिल जाता है, तो केवल वो बाह्य फल के लिए कार्य कर रहा है। और जब बाह्य फल के लिए कार्य करता है वो, तो फिर वो व्यक्ति समाज में उपद्रव करने लगता है।
क्या होता है? मान लीजिए कोई डॉक्टर है, उसको लोगों की देखभाल करने में कोई उसमें रुचि मिलती नहीं, उसको। तो फिर क्या करेगा वो? वो इस तरह से कार्य करेगा कि कोई बीमार व्यक्ति है, उसकी बीमारी को और बढ़ा दो। उसको एक टेस्ट काफी है, तो उसको दस टेस्ट करा दो। यह करा दो, वो करा दो।
तो भी दो-तीन दिन पहले, यह अभी अमेरिका में फाइजर नाम का एक बड़ा कंपनी है, तो उसका एक एग्जीक्यूटिव है, उसका इंटरव्यू हो रहा था, और वो बता रहा था किस तरह से, अभी आप जानते हैं यह कोरोना वायरस था, उसको वो अपने आप थोड़ा बदल जाता है, इसके अपने पहले की दवाई काम नहीं करती है, तो वो बता रहा था कि वो फाइजर कंपनी में ऐसा रिसर्च कर रहे हैं कि वो वायरस म्यूटेट होने के पहले ही हम म्यूटेट कर रहे हैं उसको।
तो अब क्यों करें उसको? कि अगर वो उससे म्यूटेट हो गया है, तो हमारी दवाई पहले से हो जाएगी, पर इसमें ख़तरा है, आप वायरस को परिवर्तित कर दोगे और वो कहीं से छूट गया और समाज में चला गया, तो उससे कितना उपद्रव हो सकता है! तो वो अभी इस तरह से क्या है? जो लोग, उनको तो बहुत बड़ा एक तरह से स्कैंडल हो गया है। मतलब जो कंपनियां हैं, अमेरिका में कैसे होता है, उसमें एक पब्लिक हेल्थ है। पब्लिक हेल्थ मतलब क्या है कि लोग डायरेक्टली डॉक्टर को बिल नहीं देते, गवर्नमेंट दवाइयां खरीदती है और लोग गवर्नमेंट को टैक्स देते हैं, और गवर्नमेंट को टैक्स देते हैं लोग, और फिर जो दवाई देती है, गवर्नमेंट देती है, और गवर्नमेंट कंपनी को पैसा देता है। मतलब क्या है? पैसे का आदान-प्रदान वो गवर्नमेंट में और कंपनी में होता है।
तो अभी जो कोविड का वैक्सीन आया, तभी इस कंपनी ने गवर्नमेंट से लॉ पास करवाया कि अगर ये वायरस से कुछ भी किसी को प्रॉब्लम होगा, हमारे खिलाफ कोई भी कोर्ट केस नहीं कर पाएगा। पहले तो उन्होंने से गारंटी ले लिया उसका।
तो अभी एक तरह से वो कंपनी की तरह से सही है, बोलते हैं कि वैक्सीन बनाने के बारह साल लगते हैं, हमको अपनी दो साल में वैक्सीन लगाने को लगाया, तो हम जिम्मेदार नहीं हैं एक तरह से।
पर यहाँ पर कहने का मतलब क्या है कि जो व्यक्ति को अगर अंतरंग सुख नहीं मिल रहा है किसी चीज़ में, कोई राजा है, और राजा को लोगों के कल्याण में सुख नहीं मिलता है, तो क्या होगा? राजा को लोगों की दादागिरी करने में सुख मिलेगा, सबको नियंत्रण करना, सबका शोषण करना, मैं कितना शक्तिशाली हूँ, वो देखो!
तो भगवान यह बता रहा है कि अर्जुन, तुम स्वभावनुसार कार्य नहीं करोगे, तो जो व्यक्ति स्वभावनुसार कार्य नहीं करता है, वो समाज में उपद्रव बन जाता है, क्योंकि क्या है? सबको एक तरह से, जो अपने कर्म के अनुसार कार्य करेंगे, अपने वर्ण के अनुसार, अपने स्वभाव के अनुसार कार्य करेंगे, तो सबको एक तरह से अंतरंग सुख मिल सकता है। पर जो बाह्य यश है, वो सबको मिलेगा, ऐसा ज़रूरी नहीं है। वो जो है, ये एक बहुत इंपॉर्टेंट पॉइंट है।
दो व्यक्ति उतना ही मेहनत कर सकते हैं, पर एक व्यक्ति को है न, शायद वो बहुत अमीर बन जाएगा, वो बहुत ख्याति मिल जाएगी, एक व्यक्ति को बहुत नाम मिल जाएगा। दूसरे व्यक्ति वैसे ही मेहनत कर रही है, पर उसको वो नहीं मिलता है, क्या है? वो जो है, व्यक्ति के पूर्व कर्म साथ भी बदलता है। हमारा प्रेजेंट कर्मा जो है, पर पूर्व कर्म भी है।
तो our inner satisfaction (अंतरंग जो सुख है), वो हमारे प्रेजेंट कर्मा से आता है। अगर मान लीजिए कि उसको संगीत अच्छा लगता है, किसी को डेकोरेशन अच्छा लगता है, अगर वो ध्यान पूर्वक करता है, तो उसमें ही वो तल्लीन हो जाता है, उसमें उसको सुख मिलता है, वो सही है।
पर बाह्य जो recognition है, जो बाह्य पहचान, बाह्य गुणगान, बाह्य नाम जो है, वो कैसे है? वो प्रेजेंट प्लस पास्ट कर्मा, उसमें पूर्व कर्म भी निर्धारित है।
तो मान लीजिए अगर कोई बहुत अच्छे से कीर्तन करता है, व्यक्ति के वातावरण में देख सकते हैं सभी, कोई व्यक्ति बहुत अच्छा कीर्तन करता है, पर वो व्यक्ति ऐसे जगह में है जहाँ पर कोई भक्त है ही नहीं, तो फिर वो कीर्तन में करता है, कितने लोग आने वाले हैं? पर कोई व्यक्ति ऐसे अच्छा कीर्तन करता है, वो ऐसे मंदिर में जहाँ पर हजारों लोग आते हैं, यहाँ पर वो कीर्तन करता है, हजार लोग उसकी स्तुति करते हैं। तो वो एक परिस्थिति में, एक दूसरा दूसरी परिस्थिति में, क्यों? क्योंकि वो कर्म है।
तो क्या है? हर व्यक्ति अगर अपने स्वभाव के अनुसार कार्य कर रहा है, तो उसको कुछ अंतरंग सुख मिलता है, इसलिए अगर बाह्य नाम नहीं भी मिला, तो इतना विचलित नहीं होता है, थोड़ा संतुष्ट सब होते हैं, पर इतना विचलित नहीं होता है। पर अगर किसी को अंतरंग सुख मिल ही नहीं रहा है, केवल बाह्य सुख के लिए, बाह्य नाम के लिए ही, बाह्य ख्याति के लिए ही, बाह्य फल के लिए ही वो कार्य कर रहा है, और अगर वो नहीं मिल रहा है, तो क्या हो जाएगा? व्यक्ति कुछ भी करेगा। अगर यह नहीं मिल रहा है, तो मैं क्यों करूँ यह? क्यों करूँ मैं यह? ऐसा होता है।
तो इसलिए भगवान कह रहा है कि हर एक व्यक्ति को अपने स्वभाव के अनुसार कार्य करना चाहिए।
काम और क्रोध: कर्मयोग में बाधा
और फिर अगर यह समझते हैं, तो फिर जब अर्जुन कहते हैं कि ठीक है, हर व्यक्ति को अपना कर्तव्य तो करना चाहिए, पर व्यक्ति कर्तव्य छोड़ के कुछ और क्यों करता है?
मतलब, जो यह बता रहा था अभी, जब व्यक्ति आउटर रिकग्निशन के कार्य करता है, तो मतलब क्या होता है? जब डॉक्टर है, लोगों को ठीक करने की जगह लोगों की बीमारी को और बढ़ा देता है, कोई गवर्नमेंट में काम कर रहा है, वो जो लोगों की सेवा करना, इसकी जगह लोगों से बहुत सारा पैसा खींचता है। तो जो अपना कर्तव्य छोड़ के जो गलत है, ऐसे जानता है, ऐसे व्यक्ति क्यों करता है?
और यहाँ आखिरी सवाल है इस दूसरे अध्याय में। यहाँ पे क्या है? 3.36 से 3.43 यह सवाल है। अभी कैसे है कि इसमें व्यक्ति को कर्मयोग करना है, उसमें थोड़ा सा कम से कम निस्वार्थ भाव तो होना चाहिए।
पर स्वार्थी भाव क्यों होता है? यहाँ पे यह सवाल अभी अर्जुन का सवाल है कि क्या कर्मयोग करता है? कि हम कर्मयोग क्यों नहीं कर पाते हैं? और यह व्यक्ति अपने कर्तव्य के खिलाफ क्यों जाता है?
यहाँ पर सवाल पूछ रहे हैं अर्जुन। भगवान ने बार-बार बताया कि आपको आपका कर्तव्य करना चाहिए। पर कोई कर्तव्य को छोड़ के क्यों जाता है? अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः। कमजोरी के बारे में पूछ रहे हैं। वो बोल रहे हैं कि अनिच्छन्नपि वारणेय। वो व्यक्ति ऐसे कार्य नहीं करना चाहता है, उसकी इच्छा नहीं है, फिर भी व्यक्ति ऐसे हो जाता है। बलादिव नियोजितः।
अभी अर्जुन के लिए यहाँ पे काम वासना कहाँ से आती है? अर्जुन किस संदर्भ में बात कर रहा था? केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।
अर्जुन के लिए जो काम मतलब क्या है? यहाँ पे काम मतलब निष्काम कर्म से क्या है? वो शक्ति जो निष्काम कर्म से सकाम कर्म की ओर अर्जुन को खींच रही है—Marks of Selflessness, जो व्यक्ति अपने स्वधर्म के प्रभाव से कार्य करता है, उसके स्वभाव को खींचने के लिए इसे क्या वह शक्ति है जो खींचती है?
अर्जुन तो रणभूमि में युद्ध करने के लिए आ गए थे, पर ये क्या हो गया? ये सारा अर्जुन का युद्ध करने की सारी जो शक्ति थी, जो बुद्धि थी, जो स्पष्टता थी, सब चली गई।
तो अभी जब यहाँ पे काम, ऐष, क्रोध जो बता रहे हैं यहाँ पे भगवान, यह जो है, यह नहीं अर्जुन के लिए है। अर्जुन तो इतने एक तरह से आत्म-नियंत्रित है कि उर्वशी ने खुद उनको प्रपोज किया था, अर्जुन बोलते हैं कि नहीं, आप मेरी माँ के समान हो। तो अर्जुन ऐसे कामुक व्यक्ति के समान बिल्कुल नहीं हैं। पर अर्जुन के लिए क्या है? युद्ध करना सही है, पर वो उसके विपरीत जा रहे हैं। तो यहाँ पे क्या है? Selfish or short-sighted desire।
इसलिए भगवान पूरा जो बताते हैं, किस तरह से बताते हैं—आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा। हे अर्जुन, तुम जानते हो कि तुम आत्मा हो, तुम जानते हो कि भीष्म द्रोण भी आत्मा है, पर वो जो है, वो ज्ञान आवृत हो गया है, और यह आवृत हो गया है, उसके वो आवरण के तुम्हें परे जाना है। और फिर जो आवरण के परे कैसे जाना है? ज्ञान के द्वारा जाना है। और वो ज्ञान कहाँ से आएगा? वही ज्ञान भगवान भगवद्गीता में दे रहे हैं।
बौद्धिक और मानसिक भ्रम (Intellectual vs Mental Confusion)
इस तरह से, कैसे है कि There are, I will conclude with this point, कि जब व्यक्ति को कन्फ्यूजन हो जाता है, मोह हो जाता है, तो दो कारण से कन्फ्यूजन हो जाता है।
एक है कि because of there is an intellectual confusion (इंटेलिजुअल मतलब कि बुद्धि से व्यक्ति को समझ भी नहीं आ रहा है, यह सही है, यह गलत है, तो क्या सही है, क्या गलत है, वो एक प्रकार का मोह है)।
और दूसरा है, हम कह सकते हैं mental confusion (मेंटल मतलब, एक डिजायर्स किस स्तर पर है—मैं जानता हूँ यह सही है, यह गलत है, पर फिर भी गलत करने की इच्छा बहुत रह रहा है, वो जो है, इच्छा नहीं आ रही है)।
मतलब, एक है, just to make it clear, पहला है कि क्या सही है, क्या गलत है, वो ही समझ भी नहीं आ रहा है—न चैतद् विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः। अभी यहाँ पे 3.36 में जब आया है, भगवान ने जो बताया है, एक तरह से अर्जुन को समझ में आ गया है, पर फिर भी क्या है? मैं भीष्म के तीर कैसे मारूँ?
मैं जानता हूँ अभी-अभी जो बताया है, कर्तव्य के लिए, मेरे स्वयं के कल्याण के लिए, समाज के कल्याण के लिए ये सब जरूरी हैं, पर कैसे कर सकता हूँ मैं? तो ये क्या है? भगवान कहते हैं एक है कि हमारे बौद्धिक स्तर पे भी हमारे इच्छाओं के द्वारा, हमारे वासनाओं के द्वारा आवरण हो सकता है।
तो जब हमें सही कार्य करना है, तो first, we need clear intelligence, and then we need clear mind। बुद्धि के स्तर पे तो पता होना चाहिए सही क्या है, गलत क्या है। उसके बाद में मन के स्तर पे, ठीक है, ये मैं करना चाहता हूँ, नहीं करना चाहता हूँ। तो दोनों स्तर पे हम देख सकते हैं—एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
तो जो काम है, वो नियंत्रण में रहेगा। अगर जो काम है, अगर आप कर्मयोग नहीं करोगे, तो काम-वासना के द्वारा आप पतभ्रष्ट हो जाओगे। पर कर्मयोग करते रहोगे, तो फिर क्या होगा? आप काम-वासना के परे रह सकते हो धीरे-धीरे।
तो इस तरह से अलग-अलग दृष्टियों से भगवान वही चीज़ अर्जुन को बता रहे हैं कि आपको आपका कर्तव्य करना चाहिए।
अभी यहाँ पे भगवान ने भक्तियों का भी तक उल्लेख भी किया है। एक उल्लेख किया है, पर उस पर जोर नहीं दिया है। वो सातवें अध्याय से भगवान देंगे, पर भक्ति का थोड़ा उल्लेख अगले अध्याय में आएगा।
तो इस तरह से तीसरे अध्याय के अंत तक भगवान जो थोड़ा अर्थ स्पष्टीकरण करते हैं, कर्मयोग और ज्ञानयोग में, और कहते हैं कि अर्जुन, आपके लिए कर्मयोग ही उचित है, आपको अपने कर्तव्य करना चाहिए, कि आपको path of action, कर्म का मार्ग है, वही आप चुनो।
किसी को कोई सवाल है?
अर्जुन के लिए क्या हो सकता है? अभी कैसे है कि जो आसक्ति होती है—ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तोपजायते। यह अर्जुन के लिए क्या है? जब वो भीष्म पितामह पर चिंतन करते हैं, तो उनका जो युद्ध करने का दृढ़ संकल्प चला जाता है। तो अभी अर्जुन को बौद्धिक स्तर पर यह देखना है कि वास्तव में भीष्म पितामह भी एक आत्मा है, और बौद्धिक स्तर पर मुझे जो मेरा कर्तव्य है, युद्ध करने से उनका भी कल्याण होने वाला है।
तो जो इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते जो बताते हैं, उसके आगे बताते हैं कि कैसे हमारी जो बुद्धि है, एक तरह से भगवान दो उल्लेख करते हैं।
एक है जो आपने श्लोक बताया 3.40 में है, यदि 3.40, 3.41—इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते। 3.40 में क्या है? बुद्धि is… बुद्धि को कामवासना ने जकड़ लिया है, बुद्धि में भी कामवासना है, यह एक चीज़ बताते हैं भगवान।
पर इसके बाद में 3.43 में क्या बताते हैं? एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना। इस तरह बताते हैं, tool for… जो बुद्धि क्या है हमारे लिए एक चीज़ है, जिससे हम खुद को आध्यात्मिक स्तर पर बिठा सकते हैं।
तो बुद्धि की दोनों भूमिका हो सकती है। कभी-कभी क्या होता है हम हमारी बुद्धि से कोई गलत कार्य को सही बताते हैं, कर सकते हैं। अंदर ही हम कोई… सब लोग ऐसे कभी-कभी क्रोध हो जाते हैं, हम उसको रैशनेलाइज करते हैं। तो वैसे भी हो सकता है।
और एक तरह से जो अर्जुन ने तर्क-वितर्क पहले अध्याय में किया है, उसमें भी उन्होंने अगले जन्म के बाद बात किया है, धर्म की बात किया है, और पाप और पुण्य की बात किया है। पर वो क्या है? वो दूर देख रहे हैं, पर फिर भी एक आवरण है जिससे वो दूर नहीं देख रहे हैं।
तो अर्जुन की दृष्टि से वहाँ पे क्या है कि जो उनकी भीष्म-पितामह और कौरवों के पक्ष में आसक्ति है, वो उनके लिए… और वो आसक्ति को अर्जुन अपनी बुद्धि से भी जस्टिफाई कर सकते हैं। पर उससे, अपने बुद्धि से अगर वो जस्टिफाई करेंगे, तो वो भौतिक स्तर पर रहेंगे। इसलिए भगवान कहते हैं उस बुद्धि का जो भाग है, जो बुद्धि हमको भौतिक भोग की ओर प्रवर्त करती है, वो बुद्धि को हमें ठुकराना है, और जो बुद्धि हमें आध्यात्मिक मार्ग की ओर ले जाने को बोलती है, वो उस बुद्धि को स्वीकार करना है।
भक्ति के बाद में—मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा। हम एक तरह से दो चीज़ देख रहे हैं—अगर हमारा स्वभाव समझना है हमें, तो उसके दो लक्ष्य हैं कि जो कार्य हम करते हैं, उसमें हम कमफर्ट—गुणकर्मविभागशः। अगर मुझे कुछ कार्य करने का गुण है उसमें, तो मतलब क्या होगा? वो करना मुझे अच्छा लगेगा। और अगर वो मुझे कर्म है, तो मुझे इसमें कॉम्पिटेंस रहेगा, मैं अच्छी तरह से कार्य करता हूँ।
तो हम अलग-अलग कार्य कर सकते हैं, हमारे जॉब हो सकते हैं, कोई हॉबीज हो सकते हैं, कोई सेवाएं हो सकती हैं, और उसमें हम देखते हैं कि कौन सा कार्य करना मुझे अच्छा लगता है और कौन से कार्य करने में मैं अच्छा हूँ। और अगर ये दोनों का किसी एक जगह पर मिलन होता है, तो मतलब… कॉम्पिट और कॉम्पिटेंस। तो कॉम्पिट मतलब… कॉम्पिट नहीं होता है, और कॉम्पिट नहीं होता है।
आज तीन चीज़ें हैं—एक है चार वर्ण। चार वर्ण है, ये है टूडेज जॉब्स। ऐसे है कि मान लीजिए कोई ब्राह्मण है, उसको बोलता है कि आप कोई प्रोफेसर बन जाओ। पर मेरे कई मित्र हैं, प्रोफेसर बोलते हैं कि आजकल के जो प्रोफेसर होते हैं, उनको ब्राह्मण का जॉब ज्यादा नहीं होता है, खास करके अगर आपको रिसर्च करना है, तो आपको ग्रांट्स लेने होते हैं, और ग्रांट्स के लिए आपको प्रपोजल लिखने होते हैं, तो वो एक तरह से पूरा मार्केटिंग का जॉब होता है।
तो कैसे है कि मान लीजिए कोई कहेगा कि मैं ब्राह्मण प्रवृत्ति हूँ, मेरी, इसलिए मैं एक टीचिंग का जॉब ले लूंगा। पर आजकल के टीचिंग के जॉब में कितना ब्राह्मण की प्रवृत्ति का उपयोग होता है, वो ज़रूरी नहीं है।
वैसा तो क्या है? ये तीन चीज़ें हैं। और तीसरा है आवर नेचर। तो अभी क्या है? अगर हम सोचेंगे मेरा स्वभाव मतलब क्या है? ये चार के टीचिंग के ज़रूरी नहीं है। अभी वैसे सोचेंगे तो बहुत समझ आ जाएगा और पता करना बड़ा मुश्किल हो जाएगा।
पर उससे बेहतर है, और वैसे पता भी चल गया, अगर मैं एक क्षत्रिय हूँ, तो क्या करने वाले हैं आप? पॉलिटिक्स में जाने वाले हैं अभी? क्षत्रिय मतलब क्या करने वाला है आप? कौन सा जवाब आज लेने वाले हैं? इतना आसान नहीं है। तो बेहतर है कि हमारे पास जो भी ऑप्शंस हैं, हमारे परिस्थिति में, उसमें कौन से भूमिका में हमारा स्वभाव हम कम्फर्टेबल हैं और हम कॉम्पिटेंट हैं, अच्छा कर सकते हैं, अच्छा लगता है, नहीं, उसकी ओर जा सकते हैं। तो उतना हम हमारे स्वभाव के अनुसार कार्य हो जाएगा।