Hindi – Bhagavad Gita Overview Chapter 6 || Chaitanya Charan
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Disclaimer: This transcript was generated using AI and may contain occasional errors or inaccuracies. प्रस्तुत व्याख्यान में भगवद्गीता के छठे अध्यायों के मुख्य विषयों—विशेष रूप से कर्मयोग, ध्यानयोग, भक्तियोग और मन के नियंत्रण—पर विस्तार से चर्चा की गई है। इसका मुख्य सारांश निम्नलिखित बिन्दुओं में समझा जा सकता है: हरे कृष्णा हरे कृष्णा में आपका स्वागत है। और, अभी अर्जुन ऐसे समाज में रह रहे हैं, यहाँ पर सन्यास का काफ़ी आदर है, जो रुष्विगन सन्यासी होते हैं, जिन्होंने विश्ववेराग्य स्वीकार किया है, उनका बहुत आदर होता है। तो एक तरह से जैसे भगवान बता रहे है, यह बता रहे है कि कर्मयोग ही अच्छा है, कर्म सन्यास अच्छा नहीं है, तो क्या यह universal है, सब के लिए है, क्या भगवत गीता ही सन्यास के ख़िलाफ़ है, ऐसी बात नहीं है। जो भगवत गीता का मेसेज है, एक तरह से हम कह सकते हैं कि उसके दो पहलू हैं। एक है जब मैं पहला पढ़ता था, contextual, जो उस व्यक्ति के लिए, जिसको directly अर्जुन के लिए बोला गया है। और दूसरा है universal, कि सब के लिए है। तो अभी गीता के contextual, जो संदर्भ में उपदेश गीताया है, उसमें भगवान क्या बोलते है, कि उसमें अर्जुन के लिए जो, खास करके अर्जुन के लिए दो चीज़े हैं, उनकी position हैं, उनकी समाज में जो स्थिती है, और उनकी जो disposition है, मतलब, उनकी जो मानसिक, उनका स्वभाव जो है, उनकी जो वृत्ती है, तो उसके अनुसार भगवान कह रहे है, कर्मयोग ही अच्छा है। पाथ, आधार, let’s put it here, another word for this, path of action, जो कर्म का मारग ही अच्छा है, तो अभी कर्म का मारग, अभी तक यहाँ पर भगवान ने कर्मयोग बताया है, बाद में वो भक्तियोग के बारे में ही बताएगे, पर जो सब के लिए जो उचित है, universal जो है, उसमें यह सत्य है कि वैरागी के मारग को भी महत्व दिया गया है। तो वो अभी क्या है? भगवद गीता उस पे ज़्यादा ज़ोर नहीं दे रही है। पर इसका मतलब नहीं है, उसका महत्व नहीं है, भगवद्गीता के संदर्भ में उस पे ज़ोर नहीं दिया जा रहा है। अभी यूनिवर्सली एक तरह से ये सत्य है कि जो वैरागी हैं, एक तरह से उनको ज़्यादा आदर दिया जाता है। जो व्यक्ति जगत में कर रहा है, उससे ज़्यादा कम से कम सांस्कृतिक दृष्टि से देखें तो जो वैरागी हैं, जो सन्यासी हैं, उनको आदर देते हैं। और यह उचित है क्योंकि उन्होंने जो विश्व में कर्म कर रहे हैं, विश्व का त्याग कर रहे हैं। दोनों एक तरह से विश्व के पार जा सकते हैं। पर जिन्होंने विश्व का त्याग इसी जगत में किया है, उनको उनकी जो विश्व के पार जाने की आकांक्षा है, वो साधारणतया और सुदृढ़ होती है। तो अभी एक तरह से क्या है? अगर यह आध्यात्मिक स्तर है और यह भौतिक स्तर है, तो अभी भगवद्गीता की शिक्षाएं हैं, वो दो अलग तरह से आती हैं। यह मैं केवल लेकर कर रहा हूँ, पाथ चौथी और छठे अध्याय का संबंध है, उस पर मैं चर्चा करने आया हूँ। एक तरह से हम कह सकते हैं कि अलग-अलग योगों के द्वारा, भले ही वो कर्म योग हो, वो ज्ञान योग हो, वो ध्यान योग हो, या वो भक्ति योग हो, हर योग के द्वारा व्यक्ति भौतिक स्तर से आध्यात्मिक स्तर पर पहुँच सकता है। तो अभी यहाँ पर भगवान क्या बता रहे हैं? पाँचवें अध्याय के अंत में जो बताया है, वो छठे अध्याय के अंत में बताएगे वो, छठे अध्याय के शुरुआत में वो उसको दोहराएंगे एक और बार। वो बताते हैं कि एक तरह से हर मार्ग जो है, वह मुक्ति के लिए पर्याप्त है। मुक्ति के लिए वह पर्याप्त है। पर क्या करना है, उसकी विशेषता जो है, आगे बताएगे। जब भगवान कहते हैं कर्मयोग और कर्मसन्यास, दोनों ही अच्छे हैं, पर यह तुम्हारी इच्छा है। छठे अध्याय के शुरुआत में बताते हैं कि यम सन्यासमिति प्राहुर योगम तमिद्धि पांडव। सन्यास और योग एक ही हैं। मतलब, यहाँ पर क्या बता रहे हैं? यह सन्यास का मारग है और जो योग, योग मतलब यहाँ पर जब भगवान योग इस्तेमाल करते हैं तो संदर्भ से हमें समझना है कौन से योग के बारे में बात कर रहे हैं। तो यहाँ पर कर्म योग के बारे में बात कर रहे हैं। मतलब, सन्यास और योग दोनों एक ही हैं क्योंकि दोनों में क्या है? न्यसन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन। अगर व्यक्ति भौतिक चेतना को त्याग नहीं रहा है, उसके ऊपर नहीं उठ रहा है, तो न तो योगी हो सकता है, न सन्यासी हो सकता है। तो एक तरह से, हर योग से परिपूर्णता प्राप्त कर सकते हैं। पर ऐसे ज़रूरी नहीं है कि ये सब योग अलग-अलग ही, पूरी तरह से अलग ही हों। ऐसे भी हो सकता है, यह भी यहाँ पे पाँचवें अध्याय के अंत में बता रहे हैं भगवान, जो व्यक्ति है, कुछ हद तक कर्मयोग का प्रैक्टिस का अभ्यास करता है वो, और उसके बाद में वो ध्यान योग ले सकता है या फिर वो भक्तियोग ले सकता है। अभी इसका जो उल्लेख है, कर्मयोग से प्रैक्टिस करना, यह भगवान ने पाँचवें अध्याय में बताया था, कल जो हमने चर्चा की, लगभग पाँच से, पाँच एक से छब्बीस, इसमें यह बताते हैं, और फिर, पाँच एक से छब्बीस, इसमें यह बता रहा है, और पाँच एक से छब्बीस, इसमें यह बता रहा है, पर एक तरह से, अभी क्या होता है, जो दृष्टि है, वो एक तरह से और, और, और स्पष्ट हो जाती है, तो मान लीजिए जैसे है समझने के लिए, मान लीजिए बड़ा पर्वत है, और उसके ऊपर जाना है और सही एक ही मार्ग है। तो फिर कैसे होता है? ये इस मार्ग से यहाँ तक आयेगे। इस मार्ग से यहाँ तक आयेगे। इस मार्ग से भी यहाँ तक आयेगे। इस मार्ग से यहाँ तक आयेगे। तो ये कैसे है? एक तरह से ये भगवद्गीता में आगे बताएगे भगवान। कि जो ब्रह्मण स्तर की प्राप्ती है, जो कुछ समझना कि मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ, ये अलग-अलग मार्गों से हो सकता है। पर इसको कह सकते हैं, यहाँ पर यह जो है, यह स्तर जो है, यह है ब्रह्मण की प्राप्ती। और यह स्तर जो है, यह है भगवान की प्राप्ती। ब्रह्मत्व मतलब यह समझना कि मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ, पर भगवान कौन है, और भगवान से प्रेम में पूरी तरह से एकाग्र हो जाना, वह जो है, वह केवल भक्ति मारग से होता है। मतलब अगर, मान लेकिन यहाँ पर थोड़ा स्पष्टता करना है तो, कि यह एक मारग है, यह एक मारग ऐसा है, सीधा यहाँ से ऊपर जाता है। वह है, अभी बाकी सब मारग हैं, उनसे भी व्यक्ति प्रगती कर सकता है, उनसे वह ब्रह्मण तक जा सकता है। पर ब्रह्मण से परे भगवान की प्राप्ति करनी है, तो फिर केवल भक्ति योग ही है। तो अभी यह जो बता रहे हैं, यह अभी यहाँ तक भगवान ने बताया नहीं है, पर धीरे-धीरे हमको बड़ा पिक्चर पता चल जाता है, तो फिर जो अभी बता रहे हैं, वो समझ में आता है यहाँ सरै से। तो भगवद्गीता के अंत में, पाँचवें अध्याय के अंत में भगवान ने बताया, कि कर्मयोग से व्यक्ति मुक्ति लभन्ते ब्रह्म निर्वाणम् कि व्यक्ति ब्रह्म निर्वाण प्राप्त कर सकता है तो भी जो भगवान बता रहे हैं वहाँ पे, एक तरह से वही perfection कह सकते हैं। अभी तो ब्रह्म निर्वाणम् पाँचवाँ, कामक्रोधविमुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् अभीत उन लेख वो अभी छठे अध्याय में करेंगे। अभी छठे अध्याय में किसी को पता है? सैंतालीस, right. तो अभी एक तरह से इसका जो structure है, थोड़ा interesting structure है। तो इसमें क्या है? आखरी जो विभाग है, वो एक तरह से प्रश्न-उत्तर है। तैंतीस से लेकर छ्त्तीस तक कैसे question 1 उसका जवाब है? question 2 का जवाब छत्तीस से पैंतालीस तक है और आख़िर में जो है summary है। एक तरह से कह सकते हैं। summary पर उसके पहले क्या है? अभी उसके पहले पहले दस श्लोकों तक भगव क्योंकि इसके सिस्टम इसका है? नौवें श्लोक तक है ये। क्योंकि इसके सिस्टम तक बताता है कैसे? कि एक दिहाँ पर भगवान बताता है क्या qualification क्या पात्रता होनी चाहिए वैराग लेने के लिए? qualification for कर्म सन्यास or for you can say here ध्यान योगा और इसमें जो ये पात्रता है वो प्रधान रूप से बता रहे हैं भगवान कि किस तरह से व्यक्ति को मन पे काबू करना बहुत ज़रूरी है वही जोड़ते हैं हर सेक्शन को हम देखेंगे देखें तो फिर इसके बाद में अभी गीता का जो इस अध्याय का जो structure है थोड़ा सा विलक्षण structure में जहाँ पे पिछता सेक्शन एंड हो रहा है वो वर्स का number लेता हूँ यहाँ पे फिर यहाँ से अगर हम अभी दस से तेईस तक भगवान क्या बोल रहे हैं कि ध्यान योगा practice to perfection कैसे व्यक्ति को ध्यान योग का अनुशीलन करते हुए वह परिपूर्णता तक जा सकता है पर यहाँ पे परिपूर्णता तक क्या बता रहे हैं किस तरह परिपूर्णता तक बता रहे है state of consciousness मतलब वो व्यक्ति की चेतना क्या है अभी कैसे है कि इसको थोड़ा टेक्निकल है पर मैं समझाने का प्रयास करूँगा कि अभी हम किसी व्यक्ति को देख रहे हैं और उनके चेहरे के expressions को देखते हैं भय लग रहा है गुस्सा लग रहा है आनंद लग रहा है विस्मय लग रहा है तो एक है व्यक्ति की चेहरे की भावना है और दूसरा है व्यक्ति क्या देख रहा है अजनबी व्यक्ति को देखता है तो विस्मय हो सकता है शत्रु को देखता है तो गुस्सा हो सकता है कोई बड़े स्नेह का व्यक्ति होता है तो प्रेम आता है उसके चेहरे पे तो क्या है दो चीज़ें हैं यहाँ पे कि there is experience अभी किस चीज़ के बात कर रहे हैं spiritual perfection आध्यात्मिक परिपूर्णता के जब हम बात कर रहे हैं तो उसमें एक चीज़ के बात सकते हैं कि व्यक्ति को क्या अनुभव कर रहे हैं उनका अनुभव क्या है मतलब experience मतलब खासतौर से this is यह एक subject की दृष्टि से subject मतलब वो व्यक्ति के क्या भावनाएँ हैं और दूसरा है object of perception मतलब वो व्यक्ति क्या देख रहा है मतलब क्या है कि जैसे मैंने बता रहा था कि एक व्यक्ति है यहाँ पे और वो यहाँ पे कुछ देख रहा है तो यह जो व्यक्ति है वो subject है यह subject मतलब इंग्लिश में विषय नहीं है, यह subject का अर्थ है पात्र, जो व्यक्ति अनुभव कर रहा है, और यह object, object मतलब वो जो देख रहा है। तो अभी व्यक्ति क्या अनुभव कर रहा है, अगर आप कोई मूवी, कोई मूवी, कोई टी-वी सीरीज़ देखते हैं तो कोई हास्यास्पद या भयानक या क्रोध में चीज़ होती हैं तो क्या होता है? पहले वो कार्य किया है दिखाता है वो। मान लीजिए कोई परिवार में है उसके परिवार का कोई सदस्य है उसको मार डाला गया है और उसकी लाश को ले किया है तो पहले वो लाश को दिखाते हैं और बाद में दिखाते हैं सब की प्रतिक्रिया दिखाते हैं व्यक्ति का चेहरा दिखाते हैं इसका चेहरा क्या है, इसका चेहरा क्या है मतलब क्या है कि जब ही हमारा अनुभव होता है तो बाहर की चीज़ है जिसके बाद में अनुभव हो रहा है और उसके बाद में व्यक्ति का क्या अनुभव हो रहा है तो उसी तरह से अभी जो योगा पर्फेक्शन है जो आध्यात्मिक परिपूर्णता है वह बहुत ही एक तरह से कठिन चीज़ है समझना क्योंकि वो साधारण अनुभवों के बहुत परे है तो भगवान पहले क्या करते हैं ध्यान योगा का परिपूर्णता बता रहे हैं वो वो सबसे पहले ध्यान योग practice to perfection वो जो योगी है उसके अनुभव के रूप में बता रहे है और फिर उसके बाद में ध्यान योगा का practice to perfection ही है उन्हें बताते हैं वो पर यहाँ पे जो perfection है जो परिपूर्णता है उसका उल्लेख जब भगवान करते हैं तो किस आरसे कर रहे हैं यहाँ पे object of realization कि क्या कौन सी चीज़ को अनुभव किया है उसने तो यहाँ पे भगवान क्या करते हैं इस जगह पे भगवान ब्रह्मण, परमात्मा और भगवान इन शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते हैं पर इन संकल्पनाओं की का उल्लेख परमात्मा और भगवान। तो एक तरह से अट्ठाईस श्लोकों में भगवान के बारे बोलते हैं, उन्तीस श्लोकों में परमात्मा के बारे बोलते हैं, तीस, इकतीस के श्लोकों में वो भगवान के बारे में उल्लेख कर रहे हैं। और यहाँ पे जो है अभी, यहाँ पे जो state of consciousness में है, अभी योग शास्त्र में बताया गया कि अलग-अलग, जब व्यक्ति की चेतना आगे बढ़ती है, तो अलग-अलग स्टेजेस होते हैं उसके। अलग-अलग स्तर होते हैं, स्टेजेस स्तर, स्तर is levels actually, ठीक है, स्टेजेस, स्टेजेस में कुछ है, श्रेणियाँ, नहीं, श्रेणियाँ भी नहीं है, सर्ग कैटेगरी, सर्ग, ठीक है, मैं level और stages में फ़र्क क्यों बोल रहा हूँ, क्योंकि level मतलब क्या होता है, जैसे सीढ़ी होती है, ये एक step है, वो step है, पर stage मतलब जैसे आप सीधे रस्ते पर चल रहे हैं, तो क्या वो continuous होता है, वो stage है, ठीक है, no problem, स्टेज़ में क्या है, अलग-अलग स्टेज़ होते हैं, तो ये भी सब स्टेज़ का भगवान यहाँ पर उल्लेख नहीं कर रहे है, पर यह योग शास्त्र, पतंजलि की योग शास्त्र थोड़ा गया है, तो अलग-अलग स्टेज़ हैं उसमें, तो उसमें सबसे अच्छा स्तर निरोधः उसको कहते हैं, तो भगवान यह निरोधः शब्द है, योग निरोधः चेतः, निरोधः बोलते हैं उसको, इसका उल्लेख करते हैं, तो यह जो स्तर है उसमें, अलग-अलग है, तो सबसे नीचे का स्टेज़ है, मूढः, मूढः मतलब व्यक्ति बिल्कुल तमोगुण में, विक्षिप्त, अभी विक्षिप्त मतलब क्या, मूढः मतलब बिल्कुल तमोगुण में, विक्षिप्त मतलब, इधर आकर्षक कुछ है, उधर आकर्षक चीज़ है। मूढ मतलब क्या है? जो सोया है, उठने की भी इच्छा नहीं है। तो क्षिप्त मतलब क्या है? अरे मैं भी टीवी देखूँ, या वीडियो गेम खेलूँ, या यहाँ पर गार्डन जाऊँ, यहाँ पर होटल जाऊँ, खाना खाऊँ, क्या करूँ। सब भौतिक चीज़ों में उसका मन इधर-उधर घूम रहा है। विक्षिप्त मतलब क्या है? वो एक चीज़ पर ध्यान देना चाहता है, पर मन भटक रहा है। वो चाहता है, विक्षिप्त में पता भी नहीं कि इस पर ध्यान देना है। सब चीज़ों के ओर घूम रहा है उसका। विक्षिप्त मतलब वो चाहता है एक चीज़ के ओर ध्यान दे, पर ध्यान नहीं दे पा रहा है। इसके बाद में है एकाग्रता, और एकाग्रता का उल्लेख भगवान आख़िरी श्लोक में करते हैं, अठारह बहत्तर में भगवान करते हैं, पर निरोध, मतलब क्या है? एकाग्रता मतलब व्यक्ति पूरा एक चीज़ पर ध्यान दे रहा है। इससे हम साधारणतया भी एकाग्र हो गया है व्यक्ति। निरोध मतलब क्या है? सारे भौतिक प्रलोभन हैं, भौतिक उपद्रव हैं, उससे बिल्कुल वो अप्रभावित हो जाता है। जो मन है, एक तरह से materially inert हो जाता है। जो भौतिक चीज़ में, किसी से भी न तो आकर्षित होता है, न तो उससे घृणा करता है। तो बिल्कुल वो undisturbed हो जाता है। तो क्या है, दो बार भगवान यहाँ पर practice to perfection बताते हैं, पर अलग-अलग दृष्टियों से बता रहे हैं। तो इसके थोड़ा हम चर्चा करते हैं और। पहला जो भगवान बहुत ज़ोर देते है, कि जब किसी को वैराग्य लेना है, तो सबसे पहले उसको मन पर नियंत्रण करना बहुत ज़रूरी है। और अभी यह क्यों बताते है, अभी जो मैं बताया था, यह स्टेज़ बताया ना यहाँ पर, जो भगवान बोलते हैं, आप परिपूर्णता प्राप्त करनी है, तो दो मारग ले सकते हैं आप। तो उसका उल्लेख भगवान यहाँ पर करते हैं, कि आरुरुक्ष जो परिस्थिति है, आरुरुक्ष, योगा आरुरुक्ष, और आरूढ़, तो कहते हैं, जो आरुरुक्ष है, मान लीजिए एक सीढ़ी है, तो उसके पहले के कुछ भाग हैं वो आरुरुक्ष हैं, तो यहाँ पर यह व्यक्ति को कर्म करना ज़रूरी है, और जो आरूढ़ स्तर है, उसमें वो कहते हैं, अकर्म नहीं कहते हैं, और अंतरंग काम करने के प्रगती करता है वो। तो अभी इसमें, बार-बार भगवान कहते हैं कि, कब व्यक्ति यह आरुरुक्ष के तैयार हो सकता है? जब उसका मन उसके नियंत्रण में आ जाए। अभी यह ज़रूरी क्यों है मन का नियंत्रण होना? तो क्यों है कि जो आत्मा है, यहाँ पे और अभी आत्मा के बाजू में अपना मन है, और फिर उसके बाजू में पूरा समाज है, शरीर भी है पर यहाँ पहुँच कि हमारा मन हज़ारों आइडिया ला सकता है। हमको शायद गुस्सा आता है, तो किसी को गाली देने की इच्छा होती है। पर तुरंत हम देखते हैं, आजू-बाजू के लोग मेरे पास बैठे हैं, वो क्या बोलेंगे? मैं ऐसे नहीं बोलेंगे। हमारे मन में क्या होता है कि हमारे मन के इतने सारे प्रस्ताव आते हैं, अधिकांश प्रस्तावों का, अगर हर प्रस्ताव को हम विचार भी करने लगेंगे, तो हम अंदर ही गुम जाएँगे, कितने सारे प्रस्ताव आते हैं मन में। पर कैसे है कि समाज में जब होते हैं, समाज में होने से ही, क्या होता है कि अभी हम, अभी हम सब प्रवचन सुन रहे हैं यहाँ पे, तो अगर हम अपने घर में बैठ के यहाँ, ज़ूम से सुन रहे होंगे, तो थोड़ी नींद आ जाएगी तो आराम से लेट जाएँगे, कभी कोई लेट नहीं आएगा, ज़मीन पर भी लेट सकते हैं, बिस्तर पर लेट के सुन सकते हैं। कौन सुन रहा है, कौन सो रहा है, कौन पता करने वाला है? तो क्या है, अगर थक गया है तो ठीक है व्यक्ति, पर अगर आप वास्तव मंदिर में आके या सत्संग में आके प्रवचन सुन रहे हैं, तो क्या है, अगर मन इच्छा है जागृत हो जाते हो। झाँनी चीजें भागते हैं- बाद में आज में कुछ यहने तो सुन chance के प्रभाव बैठे लेंगे financial अब यह हमेशा ऐसे नहीं है। कभी-कभी समाज का प्रभाव ऐसे होता है कि मन के प्रभाव को और बढ़ा देता है। मन में इच्छा है कि शराब पीना है। और आपके दफ़्तर में, आपके कॉलेज में सब लोग शराब पीते हैं तो क्या होता है। तो उससे हम पी लेते हैं शराब। पर अधिकांश रूप में समाज के प्रभाव के कारण क्या होता है कि हमारे मन के जो बहुत ही बुरे इधर देखें be sinful और be senseless। मूर्ख या पापी जो विचार आते हैं उनको हम नियंत्रण कर लेते हैं। तो अगर व्यक्ति क्या है कि अगर व्यक्ति समाज का त्याग करने वाला है मतलब इसको अगर समाज को त्याग करने वाला है मतलब क्या है अभी जो व्यक्ति है वो केवल आत्मा है और उसके बाजू में उसका मन है तो अगर वो मन उसका शत्रु अभी तक बना हुआ है और मन के शत्रुओं से उसे बचाने के लिए उसके पास समाज नहीं है तो पूर्णता से मन के प्रभाव में वो हावी हो जाएगा तो इसलिए समाज का त्याग कब करना है जब मन को उसके बिना अगर समाज का त्याग कर देगे तो वो मन व्यक्ति को पागल बना देगा तो अभी क्या है भक्ति में एक तरह से हम सन्यास लेते हैं कोई ब्रह्मचारी होते हैं, सन्यासी होते हैं पर हम एक तरह से समाज का त्याग नहीं कर रहे हैं यहाँ पर भक्ति के सन्यास का उल्लेख नहीं हो रहा है क्योंकि साधारणतया दो प्रकार के सन्यास होते हैं जो ज्ञानी और ध्यानी लोग सन्यास करते हैं वो क्या होते हैं वो उनका सन्यास हमेशा उसको इंग्लिश में शब्द का बोलते हैं एनीवेज अकेला सन्यास होते हैं मतलब साधारणतया आप देखेंगे जो योगी होते हैं वो गुफा में जाके ध्यान करते हैं तो हर योगी की अपनी गुफा होती है वो गुफा भी शेयर नहीं करते हैं क्या होते हैं हर एक व्यक्ति अलग-अलग रहता है यहाँ पे पाँड़ो लेने में जाएँगे बुद्धिस्ट लोग रहते थे बुद्धिस्ट साधु रहा करते थे हर एक का अपना-अपना एक गुफा है तो कैसे है वो अकेले में रहते हैं तो उस मार्ग में जो ध्यान और अष्टांग योगी मार्ग क्या है कि जो सम्बन्ध है वह मोह का कारण है और परिपूर्णता क्या है सारे सम्बन्धों से परे जाना है पर भक्ति मार्ग में अलग है इसलिए जब सन्यास भी लेते हैं तो हम भक्तों के संग में रहते हैं यह ज़रूरी है पर यह कैसे है यहाँ पे समाज के जो समाज के स्टैंडर्ड जो होते हैं समाज की अपेक्षाएँ होते हैं स्तर होते हैं… सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेषबन्धुषु साधुष्वापि च पापेसु समबुद्धिर्विशिष्यते। परम सत्य को देखते हैं और उससे इतना आनंद मिलता है कि और किसी भी चीज़ की अभिलाषा नहीं रहती है। और तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्। तो यहाँ पर भगवान बताते हैं योग का अर्थ क्या है? योग की भगवान ने कई परिभाषाएँ भगवद्गीता में दी हैं। दूसरे अध्याय में बताते हैं योगः कर्मसु कौशलम्। कि ऐसा कर्म करें जिससे व्यक्ति बंधन में न फसे उसको योग कहते हैं। पर यहाँ पर जो परिभाषा देते हैं भगवान योग की वो कहते हैं योग की परिभाषा क्या है? कहते हैं तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगम् मतलब क्या है यहाँ पे? दुःख, दुःख से हम सबका संयोग हो गया है और इस संयोग से जब वियोग होता है तो उसको भगवान कहते हैं ये योग है वियोग प्रैक्टिस नहीं है ये एक तरह से योग perfection है योग की परिभाषा में ही भगवान योग शब्द का इस्तेमाल दो बार कर रहे हैं वियोग और संयोग मतलब क्या है इसको समझना कैसे हमें? दुःखसंयोग यह मतलब क्या है? material pleasure जो भौतिक सुख हैं एक तरह से दुःख का कारण है ordinary pleasure is the cause of endearment भौतिक चीज़ों से आसक्ति जो है वो दुःख का कारण में आता है पूरी तरह से हो जाना और इसके लिए एक detachment जब हो जाता है तो इसको भगवान कहते हैं कि ये योग का perfection है। अभी यह भक्ति योग की परिपूर्णता नहीं है। भक्ति योग का विभाग भगवान हमें उल्लेख नहीं कर रहे हैं। तो यह बहुत सुन्दर श्लोक है। आपका अनुभव क्या होगा। तो पहले वो अंदर की भावनाओं को बाद बोलते हैं। फिर उसके बाद में चौबीस से बत्तीस वो अभी अंदर व्यक्ति किस चीज़ का साक्षात्कार हो रहे हैं वो। उसका वर्णन करते हैं। तो भगवान कहते हैं कि सुनिश्चितं योगो यो वेदितव्यः। आपको दृढ़ता से आध्यात्मिक योग में लगना है। मन इधर भटकेगा तो मन को पुनः-पुनः आपको किधर मिलाना है। The mind may stray away, don’t let it stay away. मन जाएगा इधर भटकेगा पर आपको वापस लेके आओ उसको। धीरे-धीरे ऐसे करने से क्या होगा। धीरे-धीरे मन शांत हो जाएगा। शांत हो जाएगा पर मन जो अंदर चिंतन कर रहा है उसमें वो संतुष्ट हो जाएगा। पहले आपको सर्वभूतस्थमात्मानम्। अप्सु दोषेषु जाता है ब्रह्मभूत स्तर करें आपको मनःसरकार का जाते हो। कि आप खुद की ब्रह्मप्रिया को समझ पाएँगे। किसे हम जो कहते हैं ब्रह्मभूतः अकल्मषः। फिर इसके बाद में कहते हैं वो उन्नीसवें श्लोक में सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः। कि सब जगह पर व्यक्ति जो है वो देखता है कि वही जो परम सत्य मेरे अंदर है वह सबके अंदर है। Everything is in Him. यह दोनों विरोध कैसे संभव है इसमें आस्त में? क्या है यहाँ पे? जो भगवान, क्षीरोदशायी परमात्मा जो है, हर आत्मा में है, हर अणु में है, पर जो महाविष्णु है, उनकी अंदर सबकुछ है, दोनों परमात्मा ही है। सर्वभूतस्थमात्मानं सब भूतों में वही है वो। पर इसके बाद में जो श्लोक भगवान बताते हैं वो शायद वो भक्ति के बारे में सबसे अधिक स्पष्ट श्लोक यह है तो यह हम दोहराते हैं छठे अध्याय का तीसवाँ श्लोक है यह यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति तो पहले भगवान ने बताया कि आप उस परम सत्य को सब जगह पर देखोगे, अध्याय में बताया कि जो व्यक्ति मुझे सब जगह पर देखता है और सब मुझे सब चीज़ों में देखता है सब चीज़ों को मुझ में देखता है। अब यहाँ पे, पूरे भगवद्गीता के छठे अध्याय में, यहीं भी एक श्लोक है, जहाँ पे भगवान एक assurance दे रहे हैं। वो ब्रह्मण का स्तर हो, परमात्मा का स्तर हो, प्रमहन या परमात्मा साक्षात्कार का स्तर हो वहाँ पे भगवान ऐसे आश्वासन नहीं देते हैं कि वहाँ से आपका पतन नहीं होगा। पर यहाँ पे वो बताते हैं, तस्याहं न प्रणश्यामि। अगर ऐसी ये प्राप्ति कर लोगे तो वह कभी उसका पतन नहीं होगा। He is never lost to me nor am I ever lost to him. तो यह यहाँ पे आश्वासन दे रहे है। It is not just a realization, realization with assurance. तो यह जो है तीसवें श्लोक में भगवान, जो हैं यहाँ पे ब्रम्हन, परमात्मा और फिर भगवान, इनका वो वर्णन कर रहे हैं। और फिर भगवान अंत करते हैं, यह बता के कैसे? आपको समता रखनी है। समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् इससे से आप देखोगे, नहूँ, कौन सा है? आत्मौपम्येन नहीं है उसके पहले का श्लोक। सर्वत्र स्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते। कि आप जब देखोगे कि, जो मैं हूँ और जो सब जीवों में, जो परमात्मा हूँ मैं एक ही है, तो वह व्यक्ति, वो परमसिद्धि में है। आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुनः। जो देखता है कि सब लोग एक समान ही हैं। सब लोग अगर भगवत प्राप्ति कर लोगे सुखी हो जाएँगे, अगर प्राप्ति नहीं होगी तो वो दुखी हो जाएँगे। यह समझता है वह स्वयोगी परमो मतः। तो यह सर्वश्रेष्ठ योगी है। सर्वश्रेष्ठ योगी… परमो मतलब? देह toolkit जो व्यक्ति… ऐसे नहीं मता ले कि जो भगवान को देखता है, परम सत्य को देखता है, उसमें आनंद लेता है, वो सर्वोचित योगी है। सही है वो भी, पर जो देखता है कि सारे जीवों का भगवान से सम्बन्ध है और उनका सम्बन्ध अगर वो जोड़ते नहीं है तो दुखी होंगे, सम्बन्ध जोड़ेंगे तो सुखी हो जाएंगे। यह इस तरह से, जो करुणा रखता है, वह वास्तव में सर्वश्रेष्ठ योगी है। तो उसके बाद में भी, अर्जुन जब सुनते हैं, तो अर्जुन के मन में दो सवाल आते हैं। और ये दो सवाल हैं, ये गीता के आखरी दो सेक्शंस हैं इस अध्याय के। तो तैंतीस-चौंतीस में, अर्जुन सवाल पूछते हैं। और उनका पहला सवाल है, मन के बारे में। अभी अर्जुन हम जानते हैं, दूसरा श्लोक हम जानते हैं हमसे, चंचलं हि मनः कृष्ण, हम सब ने सुना है वो श्लोक। पर अभी हम देखते हैं कि जो अर्जुन सवाल पूछ रहे हैं, हम साधारणतया करते हैं कि देखो अर्जुन को भी योग की पद्धति करना बड़ा मुश्किल था। हाँ मुश्किल था, पर क्या मुश्किल था अर्जुन के लिए? अभी अर्जुन ने पहले ही, और अर्जुन के लिए क्या था? कि उनकी चिंता थी कि अर्जुन ने बोल रहे थे कि ये बड़ा मुश्किल है, जब वो बता रहे हैं, तो उनका concern क्या है वास्तव में? वो concern ये नहीं है, ये नहीं अर्जुन के लिए physical challenge है। अभी हमारे लिए अगर योग करना है, तो हिमालय में जाकर रहना है, सारा वनवास करना है, कंदमूल खाना है, वहाँ काफ़ी मुश्किल होगा। पर अर्जुन ने ये पहले से कर चुके हैं, जो कुरुक्षेत्र युद्ध के पहले, गीता के पहले, जब वनवास में थे, तो अर्जुन हिमालय में गए थे, उनने यौगिक तपस्या की थी, और अलग देवताओं को उनने प्रसन्न किया था, और उनके द्वारा उनने अस्त्र के लिए चुनौती नहीं है, पिछले श्लोक में बताते हैं वो, कि योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदना, कि समान दृष्टि से सबको देखना, ये उनके लिए चैलेंज है, अभी आचार्यगण बताते हैं, कि अर्जुन कहते हैं, कि कुछ भी हो जाये, मैं युधिष्ठिर और दुर्योधन को एक समान से नहीं देख सकता हूँ, अगर हम ये चंचलं हि मनः कृष्ण, प्रमाथि बलवद् दृढम्, तो वो श्लोक में जो लक्षण बताया है, ऐसे लगता है कि व्यक्ति का, ये कैसा व्यक्ति है, शायद इसका मन बिल्कुल अनियंत्रित है, ये पागल खाने में जाएगा, ऐसे लगता है, अर्जुन काफ़ी नियंत्रित था उनका मन में, पर अर्जुन खासकर कह रहे हैं कि अगर आप मुझे कहोगे कि मैं दुर्योधन और युधिष्ठिर को समान रूप से देखो, तो मेरा मन बिलकुल मानने वाला नहीं है, मन में ऐसा तूफ़ान आ जाएगा, कैसे मैं दुर्योधन और युधिष्ठिर को समान देख सकता हूँ? नहीं देख सकता, ऐसा तूफ़ान आ जाएगा, उसको नियंत्रण करना क्या है? वायोरिव सुदुष्करम्, तो अर्जुन को यह समस्या है, अभी मन यह समस्या सब के लिए है, पर मन सबको परेशान करता है, पर जब अर्जुन बोल रहे हैं कि मैं यह जो ध्यान योग नहीं कर सकता हूँ, क्यों बता रहे हैं, कि समान दृष्टि प्राप्त करनी है, वो समान दृष्टि मेरे लिए मुमकिन नहीं है, और यह समान दृष्टि, mental challenge जो है, साम्येन मधुसूदना, जो बता रहे हैं, और यह प्राप्त करता है, जो छह नौ प्राप्त करता है, अभी यह समान दृष्टि है, जो अभी अर्जुन-कृष्ण भगवान बता रहे हैं, बत्तीस श्लोक में तो perfection है, अर्जुन perfection पर नहीं है, पर भगवान ने बताया है कि आपको अगर सन्यास भी लेना है तो सब जीवों को एक समान रूप में देखना चाहिए। तो अर्जुन बोलता है कि ये मेरे लिए संभव नहीं है। तो अभी भगवान जो है कि अगर भगवान कहा है बड़े अच्छे टीचर हैं अगर हमारे कोई बच्चा है बोलता है कि मैं आर्मी भर्ती हो जाता हूँ। हमको लगता है कि आर्मी में इतना खतरा होगा ये होगा। तो तुम मत हो बोले तो क्या बोले? मत जाओ तुम बोले तो क्या बोले? क्यों नहीं जाओ मैं जाऊंगा। तो हमने को बोला ठीक है जा सकते हो पर आर्मी में जाना है तुमको क्या करना पड़ेगा? तुमको ऐसा ट्रेनिंग करना पड़ेगा ये सारा ट्रेनिंग है ये करना है तुमको वो करना है कई बार जंगल में रहना पड़ता है तुमको कुछ खाने को नहीं मिलता है तुमको जहाँ पर जंगल में जो भी मिलेगा वो खाना पड़ेगा और फिर ये करना पड़ेगा, ये करना पड़ेगा, अभी वो सारा सुनेगा है तुमको मैं आर्मी में नहीं जाना चाहता तो उनको कैसे है कि Don’t give instructions give vision इस साधारण क्या होता है कि जब कोई व्यक्ति कोई कार्य करना चाहता है अभी कैसे है तब बेस्ट टीचर जो होते हैं हम क्या करते हैं व्यक्ति को साधारण instruction दे देते हैं कि ऐसे करो वैसे मत करो और ये कभी-कभी ज़रूरी है पर अगर instruction मतलब क्या है इसे आपको action के लिए है ये करो ये मत करो पर vision मतलब क्या है ठीक है तुम ये करना चाहते हो उसका मतलब तो है तुमको ये करना पड़ेगा ये नहीं कर सकते तुम सच धर्म uses vision मतलब क्या है कि एक तरह से हम नक़्शे से तन्तु को इसे पद्ध करते हैं जानकारी दे रहे हैं, ये करने का इसका अर्थ क्या-क्या है? और शायद वो ही समझ जाता है कि ये मेरे बस की बात नहीं है वो। तो भगवान अर्जुन को यह नहीं कहते हैं कि तुम आप यह ध्यान योग का मारग मत लो। वो ध्यान योग का वर्णन इस तरह से करते हैं कि आप भी बोलते हैं कि ये मेरे बस की बात नहीं है। तो वो खुद ही बता देते हैं कि ये मेरे बस की बात नहीं है। तो अभी भगवान जब जवाब देते हैं, तो कृष्णा’s answer is non-committal about any path. भगवान क्या कहते हैं? भगवान ये नहीं ध्यान योग को ठुकराते नहीं हैं, ध्यान योग का समर्थन भी नहीं करते हैं। भगवान क्या कहते हैं कि आप, हाँ मन को नियंत्रण करना मुश्किल है, पर अभ्यास और वैराग्ये से संभव होई। अभी जो भगवान बोलते हैं अभ्यास और वैराग्ये, ये हर मारग में एक तरह से लगता है। भगवान ये नहीं करते हैं, आपको ध्यान योग करना है, अगर आप अभ्यास और वैराग्ये करोगे, तो ये ज़रूरी है, उससे मन को नियंत्रण हो सकता है। अगर आपको अच्छा उपाय मिल जाता है, सही मारग आपको मिल जाता है, तो ज़रूर मन को आप नियंत्रण कर सकते हैं, उससे परिपूर्णता प्राप्त कर सकते हैं। तो भगवान का जवाब क्या है? पैंतीस-छत्तीस में इसमें principles over paths ऐसे भगवान कहती है, एक वैराग्य और अभ्यास है, ये principles हैं हर मारग को लगने वाले, उस पर भगवान ज़ोर देते हैं, कोई एक मारग पर ज़ोर नहीं देते हैं। तो ये पहला सवाल का जवाब हो जाता है। फिर अर्जुन को दूसरा सवाल है, वही कहते हैं ठीक है, रावण बोलते कि ये आध्यात्मिक प्राप्ति हो जाएगी, मन को नियंत्रण हो जाएगा, पर कितना समय लगेगा उसके लिए, शायद अगर मैं समय कम पड़ जाएगा, तो क अभी समय कम पड़ जाएगा, मतलब क्या हो सकता है, दो चीज़ें हो सकती हैं, जो व्यक्ति, साधारण लोग कि या बेलिया पता था कि साधारण लोग थे, वो कर्मकांड कर देते हैं, कर्मकांड करके स्वर्ग की प्राप्ति होती थी उनको और जो व्यक्ति अगर योग की साधना करता है तो योग से उसको क्या होता है मुक्ति मिलती है योग करना मतलब मुक्ति की ओर जाना है तो अभी अर्जुन पूछते हैं कि ठीक है मैं योग का मारग कर लेता हूँ पर अभी अगर व्यक्ति यहाँ इस मारग में चलने लगता है यहाँ तक चलता है और उसको लगता है कि अभी मुश्किल है यह तब यह छूट जाता है यहाँ से तो अभी वो कहाँ जाएगा तो कहते हैं कि अभी यह क्यों छूट जाएगा दो पर्याय हो सकते हैं एक है कि व्यक्ति यह जनम में उसका दृढ़ संकल्प और कम हो जाता है कर नहीं पाता है, दूसरा है कि उसकी जनम की आयु है ख़तम हो जाती है, मृत्यु हो जाती है तो पूरा अगर पहुँचा नहीं है वो तो फिर उसका क्या होगा वो पूछते हैं। तो अभी भगवान जवाब देते हैं दो चीज़ों में अच्छी वास्तव में यहाँ पर दो पर्याय हैं भगवान बताते हैं कि अभी कैसे है जो व्यक्ति इसी उद्यान से देख सकते हैं यह यह जो है एक तरह से कर्मकांड का मारग है कर्मकांड का मारग मतलब हृदय स्वर्ग में जाए और यह योग का मारग है जिससे व्यक्ति आध्यात्मिक प्राप्ति करता है तो अभी जो व्यक्ति साधारणतया वैदिक संस्कृति में सब लोग इस मारग पर चला करते थे साधे लोग पुण्यवान जीवन जी रहे थे और कुछ लोग पुण्यवान जब जीवन जी रहे हैं तभी वो कभी ऐसा जीवन जी रहे हैं पर यहाँ से वो क्या करते हैं यहाँ से इस मारग पर चल जाते हैं और फिर इस मारग से वो इधर जाके वो मुक्ति प्राप्त करने के यहाँ उद्देश्य है इसका पर वो कहते हैं कि अगर व्यक्ति ऐसे निकलता है तो इस है आइडियल आइडियल है कि इस मारग से निकलते उस मारग तभी वो पहुँच जाता है पर इसमें भी दो संभावनाएँ हैं एक है वो यहाँ तक थोड़ा सा इस मारग से आगे चलता है और फिर यहाँ से वो पतभ्रष्ट हो जाता है और दूसरा है कि वो यहाँ से निकलता है और यहाँ तक आता है और फिर वो पतभ्रष्ट हो जाता है मतलब क्या है अभी तक कर्मकांड के मारग की अभिलाषाएँ हैं वो अभी तक काफ़ी प्रबल है मतलब कर्मकांड के मारग से निकला है पर ज़्यादा दूर आगे नहीं पहुँचा है तो अभी कर्मकांड की अभिलाषाएँ अभी तक हैं मतलब भौतिक भूख की अभिलाषाएँ काफ़ी हैं और दूसरा है कि वो भौतिक अभिलाषाओं से काफ़ी दूर चला गया है पर पूरी आध्यात्मिक प्राप्ति अभी तक नहीं हुई है तो भगवान कहते हैं कि दोनों मारगों में क्या होगा तो अगर पहला जो मारग है उसमें कहते हैं कि ये मोक्षिय का मारग है ये कर्मकांड का मारग है तो अगर कोई व्यक्ति इस तरह से निकलता है वो यहाँ से यहाँ तक आ गया है मतलब क्या यहाँ से यहाँ तक आ गया है मतलब क्या है कि उसने ये मारग को छोड़ के वो इस तरह से इस मारग में यहाँ तक यहाँ तक आ गया है तो फिर क्या होता है तो फिर क्या होता है थोड़ा सा मारग मिल गया है वो यहाँ पे तो फिर वो कहते हैं कि वो व्यक्ति को इस मारग का यश मिल जाएगा उसको स्वर्ग की प्राप्ति हो जाएगी और फिर अभी वो उस पतभ्रष्ट क्यों हुआ है वो पतभ्रष्ट इसलिए हुआ है कि उसको अभी तक भौतिक इच्छा है तो भगवान कहते हैं कि आपको जो भौतिक इच्छाओं की पूर्ति है वो पूर्ति हो जाएगी अब स्वर्ग में जाओगे और उषित्वा शाश्वती समाः काफ़ी समय तक आप स्वर्ग में रहोगे, भोग करोगे और फिर उसके बाद में वो व्यक्ति पुनः यहाँ पे आ जाएगा और मतलब यहीं से आगे प्रगती कर पाएगा दूसरे-दूसरे तरीके से देख सकते हैं शायद यह थोड़ा सरल होगा यह पृथ्वी है और यह हैवन है और यह बहुत ऊपर है स्पिरिचुअल वर्ल्ड है तो अभी कहते हैं कि यह मारग कैसे होगा कि यह व्यक्ति यहाँ से स्वर्ग में जाएगा और स्वर्ग में काफ़ी समय तक रहेगा तो यहाँ से वो नीचे आएगा पृथ्वी पर आएगा और यह से धीरे-धीरे प्रगति करते-करते यहाँ का चल जाएगा और यहाँ पर जन्म होता है शुचीनां श्रीमत्तां यह है शुचि कुछ जगत समान रूप से दुखाले नहीं होता है। कुछ लोगों को हमेशा मान लीजिए किसी लोगों को हमेशा बीमारियाँ होती हैं। तो बचपन से उसके बहुत से बीमारियाँ हैं, वो अपना साधारण जीवन भी नहीं जीता है। कुछ लोग ऐसे जगत में जीते हैं कि वहाँ पे हमेशा दंगा, फ़साद हो रहा है, लड़ाई हो रही है, हिंसा हो रहा है। तो ऐसे जगत में जीना भौतिक दृष्टि से भी बहुत मुश्किल है। तो भगवान कहते हैं कि वहाँ पे जो व्यक्ति जन्म होगा उसका शुचीनां श्रीमत्तां मतलब among the better parts of human society. मतलब क्या है कि वो व्यक्ति को भौतिक संघर्ष ज़्यादा नहीं करना पड़ेगा। अगर वो सुसंस्कृत परिवार में है तो क्या होता है? जो अधिकांश वासनाएँ हैं वो ज़्यादा बढ़ती नहीं है सुसंस्कृत परिवार में उनको कम रखते हैं ऐसा परवरिश होती है कि वो व्यक्ति ऐसा उसको वासनाएँ नहीं है और एक धनवान परिवार में है तो उसको ज़्यादा चिंता नहीं है पैसे की तो मतलब भगवान बता रहे हैं कि जो आध्यात्मिक प्रगति के लिए अनुकूल है तो यह प्रगति के लिए अनुकूल है भौतिक दृष्टि से जो अनुकूल है वो उस व्यक्ति को मिलता है और उससे वो आगे प्रगति कर सकता है और दूसरा मार्ग जो भगवान बताते हैं अगर जो यहाँ से, दूसरा है कि जो निकल चुका है यहाँ से यहाँ से इसके काफ़ी करीब जा चुका है वो व्यक्ति को तो यह दूसरा है, यह एक है, यह दूसरा है तो यह जो है, हमने पहला बताया पहले व्यक्ति की जो प्रगति है, जो गति है वो बता रहे हैं और दूसरा कहते हैं कि अगर व्यक्ति ने बहुत प्रगति कर चुका है वो तो फिर क्या होगा उस व्यक्ति के लिए वह इस भौतिक जगत, वह यहाँ से एक तरह से वह अगले जनम उसका कहाँ होगा वो पृथ्वी में ही जनम होगा, मतलब यहाँ पे दोनों पृथ्वी ही है अर्थ में ही, पृथ्वी में ही अलग-अलग स्तर हो सकते हैं तो अभी इस दिशा में क्या होता है, व्यक्ति का पृथ्वी में ही जनम हो रहा है पर वो ऐसे होता है धीमतां, धीमतां मतलब जो परिवार जहाँ पे न केवल एक अच्छे संस्कार हैं, अच्छे संस्कार मतलब भौतिक रूप से भी अच्छे संस्कार होते हैं पर जहाँ पे आध्यात्मिक प्रवृत्ति बहुत है, तो अभी यह जनम मतलब यहाँ पे उसने जीवन जिया, उसकी मृत्यु हो गई पर इसके बाद में उसका अगला जनम ऐसे परिवार में होगा, यह क्या है, यह जो है, जो आध्यात्मिक प्रगति मार्ग में लगता है, उसका कभी विनाश नहीं होता है, पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते, न इस जगत में न अगला जगत में उसका कभी विनाश होगा, और इस तरह से यह दूसरा जो सवाल है उसका जवाब पैंतीस से पैंतालीस श्लोक तो देते हैं और बाद में भगवान बताते हैं कि जो छियालीस और सैंतालीस हैं दो श्लोक हैं उसमें एक तरह से दोनों में एक hierarchy बता रहे हैं भगवान कि अभी तक जो उन्होंने बताया है उसको एक स्तर में बता रहे हैं कैसे होता है कि ये ऐसा है ये ऐसा है ये ऐसा है ठीक है अभी हम कोई सेलफ़ोन खरीदना है ठीक है ये सेलफ़ोन ऐसा है ये सेलफ़ोन के ये फ़ीचर्स हैं ये सेलफ़ोन के ये फ़ीचर्स हैं ये सेलफ़ोन के ऐसे फ़ीचर्स हैं सब अच्छा है पर अभी क्या आप तुलनात्मक रूप से भी बता सकते हैं मुझे तो फिर कौन सा अच्छा चाहते हैं ये नंबर एक है ये नंबर टू ये नंबर थ्री तो हम आसानी से खरीद सकते हैं कौन सा लेना है हमको ऐसे तो अभी अभी तक भगवान ने विश्लेषण किया है एक तरह से यहाँ पर भगवान क्या कर रहे हैं एक तरह से सबसे पहले कहते हैं वो कि सब जो अलग-अलग मारग है तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः। कर्मभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन। तपस्विभ्योऽधिको योगी भवार्जुन। तो इन सब से बेहतर कौन है योगी है और फिर बताते हैं सैंतालीस श्लोक में कि अलग-अलग प्रकार के योगी हो सकते हैं इन सब में सर्वश्रेष्ठ योगी कौन है जो व्यक्ति हमेशा मेरा चिंतन करता है योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः। सब से सर्वश्रेष्ठ योगी है भक्ति योगी है इस तरह से भगवान इस विस्तृत विश्लेषण से यह बताते हैं कैसे भक्तियोग यह सर्वोच्च स्तर है चेतना का, सर्वोच्च प्राप्ती है और अर्जुन को अभी तो उन्होंने इंस्ट्रक्टिव रूप से नहीं बताया है तो अगले अध्याय में बताएंगे तो सारांश में यह जो अध्याय है इसके एक तरह से पाँच विभाग हैं तो एक से दस जो है वह mind control for renunciation कैसे मन को नियंत्रण करना ज़रूरी है वैराग्य प्राप्त करने के लिए जब तक हमारा मन हमारा शत्रु है तब तक हमें समाज संरक्षण के रूप में ज़रूरी है तो अगर समाज का संरक्षण हम छोड़ रहे हैं तो मन को नियंत्रण करना बहुत ज़रूरी है फिर उसके बाद में दस से बत्तीस तक कैसे हैं पहले है एक है योगा जो दोनों में yoga practice to perfection है शुरुआत से वो व्यक्ति perfection तो कैसे जाता है पर पहला जो है वो बता रहे हैं किस तरह से यह state of consciousness है व्यक्ति अंदरंग क्या अनुभव कर रहा है वो बता रहे हैं और यहाँ पे भी वही है पर यहाँ पे object of realization किस चीज़ का वो अनुभव कर रहा है यहाँ पे ब्रह्मण परमात्मा भगवान के बारे में बताते हैं और इस तरह से और बाद में पहले सवाल के जवाब में भगवान बोलते हैं कि किस तरह से process to mind control और process ज़्यादा actually it’s more like principles for mind control क्या principles को हमें follow करना है जिस से कि मन को नियंत्रण कर सकें और फिर आख़िरी है trajectory of the deviated yogi कि यहाँ से जो योगी आध्यात्मिक मार्ग से निकल जाता है तो उसका trajectory, trajectory मतलब वो किस मार्ग से जा रहा है trajectory of deviated yogi जो योग भ्रष्ट हो गया है वो कैसे परिपूर्णता प्राप्त करता है उसका वर्णन भगवान करते हैं इस तरह से ध्यान क्या कर रहे हैं भगवान कर्म योग तू ध्यान योग तू भक्ति योग यह इस अध्याय में बता रहे हैं और overall पहले अध्याय से, दूसरे अध्याय से, छठे अध्याय से क्या किया है? कर्म योग से भक्ति योग व्यक्ति कैसे आता है? उसका विश्लेषण करते हैं। महाप्रभु की जय, हरे कृष्णा, इससे कोई सवाल है? नहीं, ऐसे नहीं है कि हर परिस्थिति में समाज हमारा प्रोटेक्टर है, पर साधारणतया, मान लीजिए हमें किसी व्यक्ति पर बहुत गुस्सा आ गया है, तो उसको हम पूरा झाड़ने वाले हैं, पर शायद उस समय हमारे कोई रिश्तेदार वहाँ पे है, या हमारा बॉस वहाँ पे है, हमारा बच्चा वहाँ पे है, तो यह लोगों को इनके सामने ऐसे बर्ताव नहीं कर सकता है, तो क्या होता है कि ऐसे नहीं है कि समाज प्रोटेक्टर है, उसका मतलब क्या है, हर समाज का अंग संरक्षण करता है, ऐसे नहीं है, पर समाज में ऐसे प्रक्रिया है, ऐसे सिस्टम्स हैं, कि जो लोग हैं ज़्यादा सीमाओं के परे नहीं जाएँगे, कुछ-कुछ समाज संस्कृति ऐसे हो सकते हैं कि कुछ-कुछ सीमाओं का बड़े आसानी से उल्लंघन करते हैं, पर वह साधारणतया है, कि अगर थोड़ा भी सिविलाइज संस्कृत समाज है, तो उसमें कोई-ना-कोई सीमाएँ होती हैं, जो सीमाएँ होती हैं तो क्या है, वह व्यक्ति उन सीमाओं के परे नहीं जाता है, तो अभी साधारणतया होता है कि कुछ लोग होते हैं, हमारे बर्तावों पे, जो मन में प्रस्ताव भले ही आएँगे, से बोलने की इच्छा होगी, पर नहीं बोलेंगे, अभी क्या इससे पूरा मन पे नियंत्रण हो रहा है, नहीं, इससे कुछ हद तक मन में जो आ रहा है, वह बाहर नहीं आ रहा है, पर क्या मन में जो है उसका शुद्धीकरण हो रहा है, इससे केवल उसका शुद्धीकरण नहीं हो रहा है, निष्काम कर्मयोग और भक्तियोग का डिफरेंस, एक तरह से, मेनली उसमें, कि अभी, अभी टेक्निकली जहाँ तक मैंने देखा है, भगवत गीता के ऐसे डायरेक्ट कोई श्लोक नहीं है, जिसमें वह सकाम कर्मयोग और निष्काम कर्मयोग का डिफरेंस करते हैं, निष्काम कर्मयोग के बारे में, छठे अध्याय में भगवद्गीता के चर्चा करते हैं, आत्म-sustained yoga के बारे में ज़्यादा चर्चा करते हैं, मुख्यतः वो आत्मसंयम की बात करते हैं। और उसमें कोई बात है, एक तरफ क्या है? कि इन टर्म्स प्रैक्टिस कि साधारणतया कर्मयोग और भक्तियोग में क्या रखने का है? दोनों में एक तरह से एक्शन दोनों में व्यक्ति इस जगत में कार्य कर रहा है यह एक तरह से एक ही है अभी कर्मयोग में जो साधना होती है, वो साधना भगवान ज़्यादा उसका वर्णन नहीं करते हैं, पर इन जनरल यह मेडिटेशन के लिए है, मतलब वो व्यक्ति ध्यान रखे कैसे मैं एक तरह से आध्यात्मिक हूँ, मैं अपनी आध्यात्मिक भगवान हूँ, उस पर चिंतन करना है, पाँचवें अध्याय में बोलते हैं भगवान कैसे इंद्रियाणि इंद्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्, यहाँ पर meditation मतलब यह नहीं है कि ध्यान में जाकर बैठना है, पर चिंतन करना है कि मैं शरीर नहीं हूँ, मैं भौतिक नहीं हूँ, पर यहाँ पर भक्ति योग में यह है, meditation ही है, पर meditation on God, तो meditation on, यहाँ पर जो है, ध्यान होता है meditation on spirituality, general spirituality meditation है, तो यही में फ़र्क है इसमें कि, यहाँ पर जो कह सकते हैं, perfection से ज़्यादा बहुत है तो object, जो object, जिसकी हम, object क्या है यहाँ पर, it is general spiritual realization, और यह जहाँ पर है क्या है, realization of Krishna, of भगवान, तो एक तरह से, इसको, एक दूसरे तरह से हम समझ सकते हैं, फ़र्क है, कि मान लीजिए, कोई व्यक्ति है, उसने कोई गुनाह किया है, शायद उसने परिवारवालों से झगड़ा कर लिया है, और बहुत बुरा झगड़ा हो गया है, बाद में कोई गुनाह कर लिया, उसको जेल में डाल दिया। अभी वो व्यक्ति, जेल में बहुत ही बुरी परिस्थितियाँ हैं, तो वो जेल से बाहर निकलना चाहता है, अभी जेल से बाहर निकल के क्या करना है, वो बाद में देखेंगे, जेल इतना ख़राब है कि मुझे बाहर निकलना है सबसे पहले पर दूसरा आज तो सोचता है कि जेल से बाहर निकलना है मुझे पर मेरे परिवार है उससे संबंध भी सुधारना है तो पहले से जेल से ही वो अपने परिवारवालों को ख़त लिखता है तो जब वो जेल से बाहर जाता है न केवल जेल से बाहर आ रहा है पर जेल से बाहर आके वो अपने घर भी जा सकता है तो उस तरह से कर्मयोग मतलब क्या है कर्मयोग का मतलब है just get out of the jail वो समझ जाते हैं कि ये भौतिक जगत बंधन का जगत है यहाँ पर जो भोग करेंगे वो हमारे बंधन का कारण होगा तो किसी ने कुछ तरह से मुझे इस जेल से बाहर निकलना है तो इसलिए कर्मयोग में जेल से बाहर निकल के क्या करना है वो बाद में देखते हैं उसकी चिंता नहीं है मुझे नहीं कुछ ना कुछ करते हैं मुझे यहाँ से बाहर निकलना है तो भक्तियोग में क्या है एक तरह से कहते है Reunite with Family वो इस तरह से जेल में है व्यक्ति पर उसका उद्देश्य क्या है केवल जेल से बाहर नहीं निकलना है मुझे मेरे परिवार से वापस पुनः मिलन कराना है तो उसके लिए जेल से बाहर निकलना ज़रूरी है पर क्या है वो उद्देश्य एक तरह से अलग है और स्पष्ट उद्देश्य है तो उसी तरह से क्या है कर्म योग में उद्देश्य है Liberation केवल मुझे क्या करना है मुक्ति प्राप्त करना है इस भवबंधन से बाहर निकलना है पर भक्ति में क्या है Loving Union with Krishna कि जो भगवान है भगवान परम प्रेम परमानंद के स्त्रोत हैं और नहीं किया मुझे इस भौतिक जगत से निकलना है पर मुझे भगवान की प्राप्ति करनी है तो इस तरह से बाहर रूप से जो कर्मयोग और भक्तियोग है दोनों, both are parts of action कर्म करना यह दोनों में आता है ध्यान योग और अष्टांग योग में they are parts of renunciation पर एक तरह से कर्मयोग और तो कर्मयोग और भक्तियोग में काफ़ी समानता है पर जो विषमता है जो अलग भेद है, वो क्या है कि उद्देश्य क्या है केवल purpose पर the conception of the goal कि जो क्या प्राप्त करना है, उसकी संकल्पना क्या है उसमें काफ़ी फ़र्क है। Thank you very much हम बात कर लेते हैं हम किसी विधि में बाँध नहीं सकते है यह स्थूल सत्य है भक्ति जो है जैसे भगवान स्वतंत्र है भगवान के पहले श्लोक में बताते हैं ऐसे भक्ति भी स्वतंत्र है तो जब हम कोई विधि कर रहे है उसका उद्देश्य महत्वपूर्ण है कैसे है कि जब हम किसी से प्रेम करते हैं हमारा प्रेम में संबंध है किसी से तो हर संबंध में कुछ अपेक्षाएँ होती हैं कुछ जिम्मेदारियाँ होती हैं अभी वो जिम्मेदारियाँ पूरा करना महत्वपूर्ण है पर वो जिम्मेदारियों किस भाव से पूरा कर रहे हैं वो महत्वपूर्ण भी है माँ अपने बच्चे का ख्याल करती है कोई केयर कोई डे-केयर में बच्चा जाता है डे-केयर में जो है पालना घरी जो वहाँ पे जाता है वहाँ पे कोई ख्याल कर रहे हैं दोनों एक तरह से ख्याल कर रहे हैं पर दोनों की भावना काफ़ी अलग है तो जो भक्ति में जो कार्य है वह एक तरह से हमारे भगवान की भक्ति प्राप्त करने के लिए हम हमारी इच्छा व्यक्त कर रहे हैं हमारी जो आकांक्षा है वहाँ हम व्यक्त कर रहे हैं तो क्या उन कार्यों से ही भक्ति जागृत होगी ऐसे नहीं है वो कार्य the practices of devotion are expressions of our desire for devotion तो जब हम जब करते हैं मंगला आरती करते हैं, कथा करते हैं, तपस्या fasting करते हैं उससे क्या कर रहे हैं उससे हम हमारी भगवान के लिए इच्छा व्यक्त कर रहे हैं और जितना हम कार्य करते हैं उतना ही व्यावहारिक रूप से मैं आपके लिए कितना उत्सुक हूँ कितना उतावला हूँ। तो ये देख के भगवान प्रसन्न होते हैं। तो actions are important हैं क्योंकि actions are expressions of our intentions। जो हमारी अपेक्षा है, हमारी अभिलाषा है, उसको वो प्रकट करते हैं कार्यों से। तो भक्ति ऐसे नहीं है कि हम कोई कह सकता है कि हे भगवान, मैं पिछले पाँच सालों से जप कर रहा हूँ, वो भी रोज़ उठ के जप कर रहा हूँ सुबह, तो भी आपको मुझे शुद्ध भक्ति देनी चाहिए। ऐसे नहीं है, ऐसे हम किसे भगवान, भक्ति को बाँध नहीं सकते। पर इसका मतलब ये नहीं है कि भक्ति के जो नियम हैं, उनका कुछ वैल्यू नहीं है। वो जो भक्ति की जो विधि-विधान है, उससे हम एक concrete, उससे स्पष्ट पद्धति से हम भगवान को दर्शा सकते हैं, कि वो व्यक्ति, हम कितनी तीव्रता से भगवान की भक्ति चाहते हैं। कोई कहता है कि मैं राष्ट्रप्रेमी हूँ। ठीक है, पर राष्ट्रप्रेमी है, उसके घर में कहीं राष्ट्र का झंडा नहीं दिखता है, वो स्वतंत्रता दिन के लिए कहीं कुछ सेलिब्रेट नहीं करता है, उसको जो राष्ट्रगीत है, वो भी स्पेलिंग भी उसको पता है, उसको गीत भी याद नहीं है उसको, वो भारत का झंडा भी रिकॉग्नाइज़ नहीं कर पाता है। तो कैसा राष्ट्रप्रेम है? जो अंदर है, वो बाहर दिखना भी चाहिए, और वो स्पष्ट रूप से दिखना चाहिए। तो कैसा है? इसलिए भक्ति में दो चीज़ें बताई हैं, नियमाग्रह, नियमाग्रह का दो अर्थ हो सकता है, कोई नियमों पे ही आग्रह कर रहा है, मैं नियम कर रहा हूँ, इसलिए भक्ति मुझ में है, और वो दूसरा भी होता है कि नियम आग्रह, नियमों का कुछ ज़रूरत ही नहीं है, तो ये दोनों जो हैं, ये अनहेल्दी है भगवान, कि नियमों पे आग्रह करना और भक्ति को उसके द्वारा, मैं ये नियम कर रहा हूँ, इसलिए भक्ति है, पर कैसे हैं, कैसे कहते हैं, कैसे कहते हैं, devotion और rules, अगर हम इसकी तुलना करें, devotion और rules, अगर हम इसकी तुलना करें, एक है, कि उनका आग्रह, उन पे ही ज़ोर देना, दूसरा है आग्रह, उनको ठुकरा देना, पर दूसरा क्या है, बीच में क्या है, जो नियमों को ग्रहण करते हैं, पर उसको ग्रहण करने का उद्देश्य क्या है, rules as ways to express our devotion, तो यहाँ पे क्या है, express, हमारी जो भक्ति है, अभी नियम जो है एक तरह से रस्ते के समान है, अभी हमको यहाँ से अभी, शायद आज मैं यहाँ से बॉम्बे जाने वाला हूँ, तो अभी बॉम्बे का रास्ता अगर मुझे पता है, तो जाना आसान है, रास्ता नहीं पता है, तो शायद मैं क्रॉस कंट्री भी जा सकता हूँ, पर वो काफ़ी मुश्किल है, खेतों से जाना, पर बॉम्बे की ओर जाना है, तो कोई नियमों से आशक्त हो जाता है, मतलब क्यों है, यह रास्ता ही सर्वश्रेष्ठ है, नहीं, रस्ते से कहाँ जाना है वो प्रभुपाद जी की…Lecture Summary
1. प्रसंग और सार्वभौमिकता (Contextual vs. Universal)
2. विभिन्न योग मार्ग और उनका गंतव्य
3. मन का नियंत्रण और ध्यान योग
4. अर्जुन के प्रश्न और योगभ्रष्ट की गति
5. भक्तियोग की सर्वोच्चता
6. कर्मयोग, ध्यानयोग और भक्तियोग में अंतर
Full Transcription
भूमिका और गीता का संदेश: प्रसंग और सार्वभौमिकताविभिन्न योग मार्ग और उनका गंतव्य
ध्यान योग का ढांचा और मन का नियंत्रण
समाज का प्रभाव और मन की शुद्धि
योग का वास्तविक अर्थ और भक्ति योग की श्रेष्ठता
अर्जुन के प्रश्न और मन के नियंत्रण पर मार्गदर्शन
योगभ्रष्ट की गति और निष्कर्ष
भक्तों के संग और भक्ति योग की प्रकृति
भक्ति में विधि-विधान और समर्पण का भाव