Hindi Spiritual Growth-What? Why? How? | Indore | Chaitanya Charan
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Disclaimer: This transcript was generated using AI and may contain occasional errors or inaccuracies. इस प्रवचन में चैतन्य चरण दास जी ने अध्यात्मिक प्रगति के महत्व, उसके कारणों और इसे प्राप्त करने की व्यावहारिक विधियों पर विस्तार से चर्चा की है। एक भक्त का बाहरी आचरण और व्यवहार बहुत महत्वपूर्ण है; प्रचार के साथ-साथ हमारा उत्तम चरित्र ही समाज पर सही प्रभाव डालता है। लोगों की वास्तविक जरूरतों (Felt Needs) को समझकर उन्हें आध्यात्मिकता से जोड़ना आसान होता है। अध्यात्मिक प्रगति तो अभी किसी के लिए क्रिकेटी इतना महत्तपूर नहीं है, ठीक है, इंडिया जीती अच्छी बात है, नहीं जीती, ये ओके, ठीक है, जो हुआ वो हुआ। तो अभी ये द्वन्दों का प्रभाज इतना हम पर जादा होता है, कोई हमारी बात मानता है, तो हम बड़े सुखी होते हैं, कोई बात नहीं मानता है, तो कुछ-कुछ लोग ऐसे होते हैं, उनकी बात नहीं मानेंगे, तो वो न केवल चिलाते हैं, मारने पर आते हैं, वो ज दुनिया में होता क्या है, कोई भी दो व्यक्ती है, तो क्या होता है, एक व्यक्ती है, मैं ऐसे कारे करता हूँ, जिससे मैं आपको डिस्टर्ब करता हूँ, मेरे ज़्यान में कुछ हो जाता है, उससे मैं आपको डिस्टर्ब करता हूँ, और फिर आप कुछ ऐसे कारे करते जिससे मैं डिस्टर्ब हो जाता हूँ, और ऐसे तरह से हम सारेदुनिया को डिस्टर्ब कर जाते हैं तो हम एक डिस्टर्ब दुनिया बना देते हैं। तो क्या होता है कि जब, जब तक ये द्वन्दों के प्रभाव में हम रहते हैं, जब तक दुनिया हमारे लिए बड़ी है, तो मतलब क्या है, अगर इस चित्र पर जाएगे, तो जब तक हमारे दुनिया बड़ी है, तो क्या होगा है, ये दुनियों के द्वन्दों भी बहुत बड़े होते रहे हैं। हम कभी स्थिर नहीं रह पाएंगे, अस्थिर रहेंगे। और इसलिए, एक दिस्से हम देखते हैं, कि जब भौतिक प्रगति हो रही थी, तंतर ग्यान बढ़ रहा था, आर्थिक प्रगति बढ़ रही थी, तो ऐसी अपेक्शा थी, कि लोग और सुखी हो जाएगे। और हां, भौतिक स्थर पे काफी सुभिदा है अभी। जितनी प्रगति हो रही है, भौतिक स्थर पे सुभिदा आ रही है। मैं अभी चार दिन पहले ही, मैं ओस्ट्रेलिया से आया, ओस्ट्रेल यूजिलेन से आया, तो पास चार दिशों में हम देखते हैं, जो कमफर्ट्स काफी है, पर क्या है, वो जितना भौतिकवाद बढ़ता है, उतना मन के स्थर पे बहुत तना होता है। तो क्या होता है, कि लोग जितने भौतिकवादी हो रहे हैं, उतने वो कमफर्टेबल है, पर वो क्या है, कमफर्टेबल है, पर केवल कमफर्टेबल नहीं है, वो कमफर्टेबली मिजरेबल है। मतलब क्या है, आराम में है, पर आराम से दुखी है। इसका मतलब क्या है, अभी आराम से दुखी कैसे कोई हो सकता है। मतलब क्या है, वो अपने घर में बहुत अच्छा सोफा है, एसी है, बड़ा मकान है, तो शारीक स्थर पर बहुत सुविदा है, पर मन के स्थर पर बहुत उत्तिजित है। क्योंकि क्या है, जब दुनिया बहुत बड़ी बन जाती है, तो दुनिया में छोटी छोटी चीजे भी बहुत बड़ी हो जाती है, छोटी भी गलती होती है, तो बहुत बड़ी हो जाती है। अभी यह कोड़से मित्या के जीवन में रह रहे हैं। तो मैं कहने का मतलब क्या है कि जब दुनिया भोत बड़ी बन जाती है तो दुनिया की चोटी-चोटी सुविदाय भाइ बहुत बड़ी बन जाती है। चोटी चोटी संवस्यायन भाई बहुत बड़ी हो जाती था तो इसके विपरीद जब दुनिया चोटी बदजाती है अमारे लिए तो की होता है? दुनिया के द्वन्दु भी चोटे हो जाते है। दुनिया में जो होता है उससे हम इतने विचलित नहीं होते हैं। तो आध्यात्मिक प्रगति करने से फायदा क्या होता है कि हम पीस फुल हो जाते हैं। जो दुनिया में द्वन्दो आते हैं उससे हम इतना विचलित नहीं होते हैं। हाँ, ऐसे नहीं है कि हम परवान ही करते हैं पर हाँ, दुनिया में होता है, कभी पैसा आता है, कभी कैसा जाता है कभी लोगा आदर करते हैं, कभी लोगा नादर करते हैं यह होते रहता हैं इससे इतना ज़्यादा विचलित होना नहीं है जब दुनिया छोटी हो जाती है तो दुनिया के द्वन्दों से हम उतना विचित नहीं होते हैं तो हम material या externally, बाहर के दुश्चे से हम बाहर से जो होता है, उसमें हम शान्त हो जाते हैं परशान्तमनसम् येनम् योगिनम् सुखमुप्तमम् उपैति शान्त रजसम् ब्रह्मभूतमकल्मशम् बगविदा के चट चटे अध्याय के 27 सुश्टों पर बगवान बोलते है कि जब ये आसक्तिया कम हो जाती है, दुनिया चोटी हो जाती है तो उससे क्या होता है परशान्तमनसम् येनम् अभी हम सब शान्ती तो चाहते हैं सब लोग मन की शान्ती चाहते हैं पर क्या है हम केवल शान्ती नहीं चाहते हैं हम शान्ती के साथ सुख भी चाहते हैं तो अभी ठीक शान्ती तो आ जाएगी पर फिर सुख कहां से आएगा अगर दुनिया में हम बोलेगे अरे पैसा आएगे, पैसा जाएगे, मान आएगे सुखी मत हो, दुखी मत हो, दुखी मत हो जाओ तो फिर सुख कहां से आएगा तो क्या है, वो जो हम एक्स्टरनली, बाहर की दुश्टी से हम शान्त हो जाते हैं पर जब भगवान बड़े हो जाते है तो हमारा भगवान के सम्मन से हम जोय फुल हो जाते हैं एक अंतरंग सुखाता है भगवान के स्मर्ण में भगवान की कथा सुनने में भगवान की पूजा करने में भगवान के मंदिर में जाने में इसी में और आनंद मिल लगता है तो हमारे आध्यात्मिक प्रगति का लक्षन क्या है कि हमारे प्रगति कर रहे हैं तो शायद पाँच साल पहले कोई समस्य आती है हम उससे बहुत विच्चित हो जाते थे अभी हम प्रगति कर रहे हैं तो वो ही समस्य आती है उतना हम विच्चित नहीं होते हैं और पाँच साल पहले हम मंदिर आते थे प्रगति क्यों करनी है? उससे मन शानती मिलेगी और आत्मा के स्थर पे हमें सन्तुष्टी मिलेगी तो अभी यह है क्यों हम प्रगति करें? अभी आख्री पॉंट में देखूंगा कि कैसे हम प्रगति करें? प्रगति करनी का मतलब क्या है? कि भगवान हमेले बड़ा बनते बनते हैं और जो जगत है वो छोटा बनता है तो भी यह कैसे होता है? मैं बता था कि एक तरह से फिलोसोफी के स्थर पे भगवान जो है कृष्ण जो है वो पहले से ही सबसे ग्रेटेस्ट है वो भगवान को हम बड़े बनाते नहीं है भगवान बड़े है यह हम समझते है पर क्या है? जो परम सत्य है वो वैसे हमको नहीं दिखता है एक है फिलोसोफीकल है और दूसरा है साइकलोजिकल साइकलोजिकल मन के दुश्टे भी तो हमारा मन क्या करता है? दो चीज़े करता है हमारा मन एक तरह से मैंग्निफाइंग ग्लास है मैंग्निफाइंग ग्लास पता है आपको? क्या करता है वो? चोटी चीज़ को बड़ा बना देता है तो हमारा मन है एक तरह से वो मैंग्निफाइंग ग्लास है और दूसरा है कि वो मिनिमाइजिंग ग्लास भी है कि बड़ी चीज़ को वो चोटी बना देता है कि अगर चस्मा गंदा हो जाता है तो क्या होगा? थोड़ा धुनला दिखेगा आपको, कुछ सपश्ट दिखेगा नहीं जब मन गंदा हो जाता है तो उससे असपश्ट नहीं दिखता है उससे क्या होता है? कि जब मन अशुद्ध हो जाता है तो आमेने दुरिश्टी असपष्ट नहीं हो जाता है हमारेंमन में क्या होता है ? छोड़ी चीज़े बड़ी बन जाती है बड़ी चीज़े बहुत छोड़ी बन जाती है मतलप क्या किसे को पैसे में बढ़ी आ सकती है? तो अबीं पैसा महतूपूर्ण है, सबके लिए महतूपूर्ण है पर क्या है किसे के लिए पैसा सबसे ज़्यादा महतूपूर्ण विन्जाता है फिर पैसे के लिए क्या है वो शायद ना केवल अपने आफिस में सबको दगा देगा तो क्या है वो अगर वैसे हो जाएगा तो पैसा उसके लिए सबसे बड़ा बन गया है तो मन में जब आसकती होती है तो क्या होता जिस चीज़ से हम आसकते है वो चीज़ बहुत बड़ी बन जाती है तो मन एक magnifying glass है और उसी तरह से जब एक चीज़ को मन बड़ा बहुत बड़ा बना जाता है तो बाकी चीज़ों को मन छोटा बना जाता है तो अभी जैसे अगर मेरा ग्लास अगर खराब हो गया है ग्लास गंदी हो गया है तो ग्लास को साफ करना चाहिए तो उसी तरह से हमारा मन जो है वो अभी मन में मैल आ गया है मन में जो मैल आता है माईंड जब डर्टी होता है उसको कहते है अनर्थ मन का जो डर्ट होता है उसको अनर्थ कहते है जो अनर्थ होते है वो अनर्थ को हमें साफ करना है अभी अनर्थ को हम साफ कैसे करते है इसे हमें बोला कि अभी चस्मे को तो बाहर निकाल के साफ कर सकते हैं पर मन में जो अनर्थ है उसको साफ करना चीतो दर्पण मार जिनम तो उसके लिए क्या करना है दो चीज़े करनी होती है एक है कि जिस चीज़ को हमें बड़ा बनान है अब हमको मालतें मैंरああपेडांस बड़े है पर हमारे मन में हमको समझना है कि बड़ा बड़े है तो जो चीज़को बड़े बनान हैं उसके लिए बगादर कहते अभ्या आसिने तु कौंते हिया, और जो जो चोटा बनाना है उसके लिए वैरागेन चगोईयती। तो जो चीज़ को हमें बड़ा बनाना है उसको बार बार देखो। उसको बार बार सुनो। उसका बार बार स्पनन करो। जो भी चीज़ को हम बार बार करते हैं वो हमारे मन में बड़ी हो जाती है। तो अब्भ्यास, अब्भ्यास मतलब क्या है? कि रेपीटेशन, रेपीटेशन, बार बार करो। जो, अगर हम बगवान का जप बार बार करते हैं, बगवान का कता बार बार सुनते हैं, जो भी चीज़ बार बार हम सुनते हैं, वो हमारे मन में बड़ी हो जाती है। और ये एक, एक साइकोलोजिकल प्रिंसिपल है यह। भी जो अद्विटाइज्मेंट होते हैं, कभी-कभी हम रस्ते में जाते हैं, तो वही अद्विटाइज्मेंट हर खंबे पर दिखती है। यह आप सोप ले लो, यह खरीद लो। तो अभी क्या है, वही बार बार बार बार दिखते तो क्या होता है? हाँ, यह अच्छा होना चाहिए। तो यह मुझे लेना है, तो मैं यहीं ले लूगा। तो जब हम कोई बार बार चीज करते हैं, तो जो बार बार करते हैं, वहाँ चीज हमारे लिए बड़ी बन जाती है। तो इसलिए, एक है कि, repetition of remembrance. जो हमें याद करना है, जो भगवान को याद करना है, बार बार याद करना है। तो जो है, भगवान को बड़ा बना है, तो भगवान को बार बार याद करो, भगवान बड़ी बन जाएगा। और जो हमारी आसक्ती है, उसको गर छोटा बना ना है, तो उसको याद मत करो। उसको याद मत करो। अगर मान लीजी किसी के लिए कोई क्रिकेट में बहुत रुची हो उसको, पर मान लीजी वो अमेरिका में जाता है वो, अभी तो सब जगह टीवी बगेर आ गया है, पर 10-15 साल टीवी है, इंटरनेट आ गया है, पर 15-20 साल पहले, कोई अमेरिका में जाता था, तो अमेरिक का में जगह था, तो मैं एक organiser थे कारक्रम के, वो बहुले कि आप यहाँ क्रिकेट के वो एक उधारन मत दो, वो बहुले कियों, क्रिकेट एक खीड़ा है। आपको पतंग की खीड़ा होता है। उनको क्रिकेट नाम को कोई गेम में पता ही नहीं है। तो क्या है, कि भारत के लिए क्रिकेट इतना बड़ा है, पर अमेरिका में क्रिकेट पता भी नहीं है उनको। पर मान लेगे कोई भारती विद्यारती है, वो क्रिकेट का बड़ा फैन है। पर अमेरिका में जाता है, अमेरिका में पढ़ाई करता है, मान लेगे वहाँ पे 20 साल पहले गया है, वहाँ पे टीवी नहीं है, वहाँ पे कुछ ज़्यादा निउस नहीं है। तो क्या है, अगर क्रिकेट का कुछ निउस नहीं आ रहा है, छे मेना, एक साल हो जाएगा, वो क्रिकेट को भूँजाएगा। तो क्या होता है, जो हमें चोटा करना है, उसको हमें टालना है। हम फूरित से टाल नहीं सकते हैं, पर उसको इतना बार बार नहीं देखना है। जब कोई पॉलिटिकल न्यूज है, तो अगर वही न्यूज हम, अरे यह होने वाला है, यह होने वाला है, यह होने वाला है, तो उसको हम देखते हैं, टस बार देखते हैं न्यूज में, तो फिर वह बहुत बड़ा बन जाता है हमें। तो हमें चोटा करना है, जिससे हमें, दुनिया में, हम दुनिया से, जैसे मता रहा था कि हम इस चित्र में जाते हैं, तो ऐसे नहीं कि हम दुनिया को जीरो, दुनिया है नहीं बोलते हैं, दुनिया महतूपूर्ण है, पर वह इतनी महतूपूर्ण नहीं है। यह क्या है कि लोग इतना सारा प्रजल्प करते हैं, बॉलिबूर्ड में क्या गॉसिफ हो रहा है, इसका किसा स्यासंबन्द है, इसने क्या किया, उसने क्या किया। वो इतना बड़ा बन जाता है। अभी अमेरिका में खास करके, पॉलिटिक्स जो है, अभी पॉलिटिक्स जो हाँपे रिपब्लिकन है, और जो हाँपे वो डेमोकरैट है। वो अभी इतना, उन दोनों में इतना घुरुणा है, नफरत है। जो युवक होते हैं, लगों 70% जो डेमोकरैट है, वो बोलते है कि हम कभी कोई, वो लड़की डेमोकरैट हैं, बोलते हैं, मैं कभी कोई रिपब्लिकन से विभाँ नहीं करूँगी, और ऐसे रिपब्लिकन बोलते हैं, मैं कभी डेमोकरैट से विभाँ नहीं करूँगी, अभी क्या विक्ति का पलिटिक्स है, वो तुम किसको वोट करें, वो वोट करो, वो इतना महतरपुर्ण क्यों बनाना है, वो इतना महतरपुर्ण क्यों बन जाता है, वही नीज बार बार सुनते हैं, पढ़ते हैं, तो आजकल हमारे पास फोन्स होते हैं, फोन में हमें से अपडेट आते हैं, breaking news आते हैं, तो उससे क्या है, कि दुनिया जो है बहुत बड़ी बन जाती है, अरे यहां पे यह हो गया, वहां पे वह हो गया, वहां पे वह हो गया, वहां पे हो गया, और उससे जितनी दुनिया बड़ी बन जाती हैं, तो उतने फिर भगवान चोटे बन जाते हैं, इसलिए अभी कल से कार्थिक शुरू हो रहा है, तो अगर हमें अध्याप्योगति करनी हैं, तो हम फैसला कर सकते हैं, मैं सोड़ा जादा जब करूंगा, या जादा कुछ मैं रोज भागवत कता सुनुंगा, कुछ भगवान को बड़ा बनाने के लिए हम भगवान की बक् हम फैसला कर सकते हैं कि मैं रोज इस समय तक मैं फोन को नहीं देखूंगा, या फोन को देखूंगा तो भी, क्या है कि सिर्फ मुझे अगर वाटसाब देखना है तो वाटसाब देखो, क्या मैं सोशल मेडिया पर नहीं जाओंगा, वेबसाइट पर नहीं जाओंगा, कु एर एक पित्र है वो कहते है कि मैं हर एकादशी को फोन से फास्टिंग करता हूँ, कि फोन से उपवास करता हूँ मैं, तो मैं एक बार ट्राय किया बड़ा मुश्किल है वो करना, तो अगर मैं ट्रावल कर रहा था, अगर ट्रावल करना है तो क्या, पुरा कौड़िशन होता है, अगर हम घर में हैं और तो फिर वो कर सकते हैं, पर क्या है, फोन प्राब्लेम नहीं है, पर फोन से क्या होता है, सारा दुनिया वर करते हैं, यहाँ पर यह हो गया, वहाँ पर वह हो गया, इसने इसने किया, उसने वैसे किया, वो सब आ जाता है, खार कर खास करके यूखों में यह हो रहा है, कि आजकल जो यूख हैं, उनमें डिपरेशन बहुत बढ़ गया है, खार कर खास करके यह लड़कियों में बहुत बढ़ गया है, और इसका कारण क्या है, हमेशा तुलना करते हैं, क्या है कि, अरे मैंने यह फोटो डाला मेरा सोचल मीडिया, इस्टाग्राम में, और मुझे इतने लाइक्स मिले, और उसने उसका फोटो डाला, उसको इतने साथा लाइक्स क्यों मिले, तो क्या होता है, तो इसलिए, यह जो अभ्यासेने तो कौन थे, यह वैरागेन चक्रोरियते हैं। तो अगर आध्यात्मी क्रोरियति करनी हैं, तो बेस्ट है, कि हम भगवान, जो चीज़े हमारे लिए भगवान को बड़ा बनाती हैं, वो ज़ादा करें। और जो चीज़े दुनिया को बड़ा बनाती हैं, उसको थोड़ा कम करें। तो अगर यह दोनों हम करेंगे, तो मान लिए, क्या है, एक है, हम अभ्यास कर रहे हैं। अभ्यास मतलब क्या है, जो चीज़ हमें करनी है, भगवान को बड़ाने के लिए, वो हम करते हैं। और वैराज्य मतलब, जो दुनिया को बड़ा बनाती हैं, उसको हम कम करते हैं। तो चार परया है, कि हम अभ्यास कर रहे हैं, पर वैराज्य नहीं कर रहे हैं। मतलब क्या है, कि हम जब कर रहे हैं, जब कर रहे हैं, और हमारे सामने मारा टीवी चालू है। जब कर रहे हैं, टीवी भी देख रहे हैं। तो क्या होगा, वो जब से भगवान बड़े नहीं बनने वाले हैं हमारे लिए। तो अभ्यास है, पर वैराज्य नहीं है। तो मतलब क्या है, कि हम अगनी को जला रहे हैं, पर साथ-साथ पानी भी डाल रहे हैं। तो ज़्यादा जलने वाला नहीं है। तो क्या है, ये अभ्यास है, पर वैराज्य नहीं है, तो क्या है, ये ज़्यादा एफेक्टिव नहीं होगा, ये अंडर एफेक्टिव है। थोड़ा सा एफेक्ट होगा वो। अगनी आ रही है, अभ्यास भी नहीं है, वैराज्य भी नहीं है। तो फिर क्या है, अगर वो भगवान के भक्ति भी नहीं कर रहे है, और दुनिया के सारी इदर जो हो गया, वो उदर वो हो गया, उदर वो हो गया, तो ये तो क्या है, डिस्ट्रक्टिव हो जाएगा। विनाज का कारण बन जाएगा। अभी AI आ गया है, तो मैं अभी 15 दिन पहले मैंने सेल्स फोर्स में एक लेक्शर दिया था, कि AI and Spirituality, Artificial Intelligence and Spirituality, तो उसमें क्या था, कि अभी AI का इतना घातक परिणा, AI बुरा नहीं है, काफ़ी अच्छा टूल है वो, इसकरना है तो बर, अगर विक्ति को क्या बड़ा है, व इसको बहुत अकिला पन parenc碧ोगा, उसको बहुत अकिला पन था. तो अभी AI से ख्या है, कि लोगों को अकिलापन होता है तो जिसे से क्या से बात करना है मैतरी में ना, संबनखा बनाना ही, उसका पता नहीं है उसके तो क्या है वो AI से कालपनिक पित्र बना लेते हैं। तो ये लड़का था उसने एक टीवी शो है गेम ओफ थ्रोन्ज नाम का उसकी जो हिरोयन थी उसको अपना गल्फरिन बना लिया। और उसने वो AI से कहा कि तुम वो भुमिका बनाओ तुम वो हिरोयन है उसके लिए तुम उससे बात करो वो कैसे dialogue बोलती है मैं उसको बोलूंगा और फिर उसको बोला उसने की मैं तुम्हारे साथ रहना चाहता हूँ तो वो AI बोले कि मैं I am not a physical being मैं शारीक जीवन नहीं है मैं तुम्हारे साथ रहना चाहता हूँ तो अगर मैंने मेरे शरीर का नाच कर दे तो क्या मैं तुम्हारे पास आ जाओंगा तो AI ने हाँ बोल दिया और वो उसका आखरी चैट था उसने क्या किया उसने कोई sleeping pill ले लिया और आत्माध्या कर दि तो अभी उसके माता है उसके मा जो है वो अभी जो जिस जो जो जिस जो AI की जाता है क्या रेक्टर AI नाम का वो क्या है क्या रेक्टर AI था वो वो उसके मेकर को सू कर रहे है कोड़ में कि तुम्हारे कारण मेरे बेटे की मुत्ति होगी पर यह क्या है कि अगर भगवान बड़े बनाने के लिए कुछ चीज नहीं है और दुनिया को बड़ा बनाने देते थे कि कालपनी करेट को इतना बड़ा बनाने देते थे कि खुदके जीवन को अंध कर देते वो विनाश कारक हो जाता है अगर वैराज्य है पर अभ्यास नहीं है मतलब क्या है? मैं फोन नहीं देखोंगा, टीवी नहीं देखोंगा, ये नहीं करूंगा, वो नहीं करूंगा पर करोगे क्या? तो यह क्या है? यह हम जादा समय तक कर नहीं पाएगे यह अंसस्टेनीबल होगा कुछ समय तक करेगे और फिर छोड़ दो भी ये मैं कर नहीं सकता पर क्या है? अगर हम अभ्यास और वैराज्य दोनों रखते हैं अगर हम भगवान की बक्ती कर रहे हैं भगवान को बड़ा बना रहे हैं और जो चीजे हम पढ़ते हैं अगर आत्मा की संतुष्टी है तो कितनी बढ़ जाएगी जो भगवत गिता का संदेश है बक्ती का मारग है यही है कि हम सब सांत हो जाए और संतुष्ट हो जाए तो सारांश में मैं आज तीन पॉंट के चर्चा की कि हमें आध्यात्मिक प्रगती क्या है? क्या है आध्यात्मिक प्रगती? कि पहले हमारे लिए तो हमें आध्यात्मिक प्रगती क्यों करनी है? क्योंकि अगर नहीं करते हैं तो दुनिया के द्वन्द्व जो होते है उससे हम बहुत विच्चित हो जाते हैं तो अगर दुनिया ही चोटी हो जाती है दुनिया के द्वन्द्व ही चोटे हो जाते है हमको क्या है? हमारे मैंड को क्लीन करना है मैंड को क्लीन करना है मतलब क्या है? मन में आसक्ती के कारण चोटी चीजे बड़ी बन जाती है तो कैसे वो मैंड को क्लीन करना है? कि अभ्यास है और वैराज्य है कि जो परसिस्टन्स है कि जो हमें भक्ति करनी है भक्ति को और करो और जो वैराज्य है उसको और थोड़ा आपस्टिनन्स जो है वैराज्य उसको और बड़ाओ तो अगर दोनों हम करेगे परसिस्टन्स अभ्यास और वैराज्य तो कोई भी वेक्ति है वो अपनी शानती और अपनी जो संतुष्टी है उसको और महसूस कर सकता है तो हमें यह देखना है कैसे कि मैं मेरे जीवन में कैसे भगवान को बड़ा बना सकता हूँ और कैसे यह दुनिया को चोटा बढ़ा सकता हूँ तो हम शर्वन कीर्तन बढ़ा सकते है और जो फोन है उसको थोड़ा कम कर सकते है इससे हम सब अध्यात्मी प्रगती कर सकते है बहुत बहुत धन्यवाद हरे कृष्णा कोई सवाल है? वैराज्या वैराज्या के लिए पहने के लिए कुछ कार्य ऐसे होते है बौतिक स्थर पे कि इस जगत के परे भी और कुछ है, ये हम उनको समझा सकते हैं। अब जैसे मैं बता था कि लोग भौतिक वादी बन रहे हैं, पर अगर हम देखेंगे, बहुत से लोग ऐसे भी हैं, वो कुछ अत्तक समझते हैं कि भौतिक वाद से संतुष्टी नहीं मिलती हैं। आजकल के अनेग जो युवख है, वो हम कह सकते हैं, उनको बड़ी या आदत है, वो आदत है, ऐसे करते हैं, ऐसे करते हैं, संतुष्टी हैं वो, पर बहुत से युवख हैं, वो केवल पैसा कमाने में नहीं हैं वो देखें। आजकल के अनेग जो युवख है, उनको बड़ी या आदत है, उनको बड़ी या आदत है, उनको बड़ी या आदत है, उनको बड़ी या आदत है, उनको बड़ी या आदत है, उनको बड़ी या आदत है, उनको बड़ी या आदत है, उनको बड़ी या आदत है, उनको ब उनके लिए अर्थ क्या है, कि युवख है, तो मुझे अभी विवा करना है, कोई थोड़ा, कोई क अर्था मतलब क्या है, कि जो उनके लिए महतुपूर्ण है, जो भी हो वो, पैसा हो, मार्क्स हो, रिस्पेक्ट हो, दुनिया में जो भी है, और उसके ऊपर क्या है, परमार्थ है, तो अभी भक्ति का जो महत्व है, वो दो पद्दे समझना है, एक है, कि आपको ये अर्थ चाहिए, ये अर्थ को छोड़ो, और परमार्थ है मतलब क्या है, इस जगत में जो भी है, वो अस्थाई है, इस जगत में जो भी है, वह, उससे कोई संतुष्टी मिलने लेगा नहीं, तो इससे, इससे आप मुड़ो, और परमार्थ के ओर जाओ, तो ये, ये समझने व तो परमार्थ से आपको आर्था और अच्छे से मिल सकता है, मतलब क्या है, कि अभी, मैं जैसे बता रहा था, मैं एंटेल, गूगल, ऐसे कंपनी में मैं लेक्शर देता हूँ, अभी उन लोगों को कृष्णे बक्त नहीं बनना है, पर उन लोगों क्या है, कि वो बड़े बड़े कंपनी में क्या देखा है, कि ऐसे स्पिरिज़ूल सेमिनार्स अगर वो करवाते है, तो उनको उनके लोग एम्प्लॉयी स्पिरिज़ूल बने या नहीं बने, फ़रक नहीं बढ़ता है, पर उनको क्या है, कि हमारे एम्प्लॉयी अच्छा काम करना जीए, उनका ज तो वो क्या देखते है, कि अगर हम स्पिरिज़ूल सेमिनार्स करवाते है, तो उससे लोगों का मनाव शान्त होता है, मैं सेल्सपोर्स बता रहता हूँ, सेल्सपोर्स एसी कंपनी है, उसके हर ऊफिस में वो एक मेडिटेशिन कॉर्न रखते हैं, तो बाखे कंपनीज भी तो क्या है कि उस वेक्ति का अर्थ क्या है, वो अगर हम समझते हैं, और अगर वो परमार्थ से जुड़ जाएगे, तो उनको वो अर्थ भी और अच्छी तर से मिल पाएगा, अगर ये हम समझाएगे उनको, तो फिर वो भक्ती के ओर आकरशित होते हैं, अगर उनको बोले जाएगा, तो अगर उनको बोले जाएगा, तो उनको थोड़ा आईश करना है, पैसा कमाना है, पर जब बच्चे हो जाते होने को, तो अभी क्या है, उनको अपने बच्चों को पूरे अमेरिकन संस्वुति में फस्ते वो नहीं देखना है, तब भी उनको बताना है, तो तो फिर अभी कैसे बताएगे वो? उसके लिए उनको खुद सुईकार करना होता है। तो क्या है भी उनके लिए उनको भगवान में रुची नहीं है पर हमारे बच्चों के देखवाल करने में रुची है। तो वो अर्था के लिए परमार्थ के ओर जा रहे हैं। विक्ति की जुरुत क्या है वो समझेगे। तो उनकी क्या है इसको कहे सकते है ये उनकी felt need है। felt need बतलब क्या है? जो उनको लगता है ये उनकी जुरुत है। भगवान उनकी you कहे सकते है actual need है। ultimate जुरुत उनकी भगवान है। पर वो वे भगवान के जुरुत महसूस नहीं कर रहे है। तो भगवान से समझ जोर के जो उनकी अभी जुरुत है। वो कैसे पुरी हो सकते है अगर वो समझाएगे तो फिर वो भगवान के ओर आ सकते है। तो दूसरा चीज़ है कि कुछ भक्त होते हैं पर वास्तो में पास्चात्य देशों में अमेरिका सबसे आदा धार्मिक देश है। तो वहाँ पर मैं एक कारकर्म पर जा रहा था और वहाँ पर मेरे आगे एक साइकल थी कार पर एक बंपर स्टिकर था उस पर लिखा था ओ गौड प्लीज सेव मी फ्रॉम यूर प्रीचर्स हे भगवान आपके प्रचारकों से मुझे बचाओ आप तो क्रिश्ट्यारिडी में क्या भाव है कि भगवान उनके प्रचारकों से हमको बचाते हैं तो पर क्या है यह प्रचारकों से आप मुझे बचाओ मतलब क्या होता है कि अगर प्रचारक बहुत बहुत स्ट्रॉंग हो जाते हैं उनका बरताव अच्छा नहीं होता है तो क्या होता है उनसे बाती नहीं करने वो होता है तो इसलिए क्या है कि एक तरह से जो भक्त है उनको अपना बरताव भी अच्छा रखना ज़रूरी है पर दूसरी चीज़ है हम जब हम भक्ती कर रहे हैं तो केवल भक्ती महतूपूर्ण नहीं है मारा बरताव भी महतूपूर्ण है प्रहुपाजी को एक बार रिपोर्टर नहीं पुछाता है कि आपके भक्तों को मैं कैसे पिछान सकता हूँ प्रहुपाजी बोले देया पर्फेक्ट जेंटल मिन और लेडीस प्रहुपाजी यह नहीं बोले कि वो सुबह उठ के चार बजे मंगल आर्थी आते है वो सोला माला जब करते है चार नीमों का पालंग करते है वो सब महतूपूर्ण है पर अभी वो रिपोर्टर है वो क्या देखने वाला है कि आपका बरताव कैसे है तो एक तरह से हमारी दुश्चिस हमें क्या देखना है कि हमारा बरताव अच्छा रखना है एतो क्या है हम कितना भी प्रचार करेगा हमारे बरताव से आंटी प्रिचिंग हो जाएगा पर दूसरी चीज़ है कि जो अलग-अलग भक्त है तो अलग-अलग भक्त जो है अपने-अपने बैक्कराउंड से आते है तो कि कि भक्त को गुस्सा आता है बहुत क्रोध करते हैं बहुत कैसे भक्त है यह पर क्या है कि अगर हम अगर हम उनकी हिस्ट्री देखेंगे तो शायद अभी उनका क्रोध टेन के स्टर पे है पहले हजार के स्टर पे था वो तो हजार से टेन पे आना उनका काफी कम हो गया है पर क्या है कि हमारा शायद टेन पे कोई था यह नहीं तो हमारा क्या है टेन बहुत ज़्यादा क्रोध है बोलते है पर क्या है कि तो अभी हर एक बख्त के अपने अनर्थ होते हैं और हम सब शुद्ध नहीं है तो हमारे जो अनर्थ है उसको हमें समझना है और उसके अनुसर हमें सेवा कर रही है अगर किसी बख्त को बहुत कुछ सा आ जाता है तो क्या इसका मतलब प्रामाणी भक्त नहीं है हो सकता है भक्ती नहीं कर रहे हैं से दिखावा कर रहे हैं पर ये भी हो सकता है कि भक्ती कर रहे हैं पर वो अनर्थ हमें पहुँझ ज़्यादा था तो फिर उनको क्या करना चाहिए उनको संभाल के रहना चाहिए कि अगर कोई किसे को घुसा आता है तो उनको ऐसी सेवा करनी चाहिए कि जिससे उनके घुसे से दुसरे लोग नहीं चल जाए मान लिए किसे को बहुत घुसा आता है वो बोलता है मैं गेस्ट रेसप्शन में रहूंगा तो क्या होगा? सारे गेस्प चिला देगा तो जो कमजोरी उसको मैनेज करना चाहिए ताकि उनकी कमजोरी के कारण उनको हमें भकती से निकालना नहीं है बार भकती से दूर नहीं भेजना है इसलिए कि तुम पुरे भकत हो पर उनकी कमजोरी के कारण दूसरों को समस्या नहीं होने चाहिए तो ये थोड़ा मैनेज करना इतना आसान नहीं है पर वो मैनेज कर लेगे तो फिर ये संभव हो सकता है कि वो भी भकती करके आगे बढ़ते हैं दूसरे भी लोग भकती करने से सदाचार बढ़ता है पर वो एकति कहां से शुरू हो रहा है वो हमें पता नहीं है मैंने कैसे करते हैं दोनों तरह से मेडिडेशन होता है मैंने कैसा है कि मेडिडेशन का में भाव क्या है कि इस दुनिया में बहुत से चेंजिस होते थे तो जो बदल रहा है जो नहीं बदलता है उसकी ओर हमारा मन को हमें लेके जाना है तो एक है कि हम सारी दुनिया से डिस्कनिक कर लें आखें बंद कर लें, मौन रत कर लें तो फिर क्या दुनिया में जो बदल हो रही है उससे हम दूर जाते हैं तो इससे भी मन शांत होता है पर इसमें समस्या क्या है कि हम बाहर से मन को शांत, बाहर से हम शांत वरतर में जाते हैं पर मन फिर भी उच्चित रहता है तो अगर मान लिए कि ये कोई सागर है सागर में लहरे आ रहे हैं और वो लहरे से हम उप निची, उप निची फेके जा रहे हैं तो अभी उस ठक गया है, उससे फेके जा रहे हैं तो क्या है अगर हमको सागर से रहत चाहिए तो दो चीज़े हैं एक है कि आप जमीन पे आ जाओ अगर जमीन पे आ जाते हैं तो सागर से आपको, लहरों से आपको राहत मिल जाएगी तो पर अगर आप जमीन से बहुत दूर हो तो जमीन तक पहुँच ते पहुच ते तक जाओगे तो अगर मैं सागर में ही बहुत दूर हूं यहां से तो फिर क्या है, मुझे सागर में ही कुछ ऐसी चीज है हम लंगर कहे सकते हो, अंकर होता है उसको अगर मैं पकड़ लेता हूं तो फिर क्या है, उससे सागर के लहरों से मैं इतना विशीत नहीं होगा तो अभी क्या है कि ये एक बिल्कुल बाहर से शान्त होकर, मन को शान्त करके ध्यान करना वो भी संबव है, पर कई बार हम इस भोती जगत में इतने फसे होते है कि वो करना बड़ा मुश्किल जाता है पर जब हम जब करते हैं तो क्या है भगवान का जो नाम है हमें बोलने की तो हमें शादत है, सुनने की तो आदत ही है तो कुछ ना बोलना, कुछ ना सुनना, शान्त बैठे थे, इसको ज्यादा आदत भी नहीं है हमको जब जब करते हैं, जब कुछ सुनते हैं तो क्या है वो एक तरह से हम ये एंकर को पकड़ रहे है तो जितना हम उस एंकर को पकड़ लेगे उतना हमारा, हमें एक तरह से धियान में और विखसित हो जाएगे तो दोनों अच्छे है पर जो जब करके ध्यान में जाना है हम जहाबे वहाँ से चुणू कर सकते हैं और अच्छे हम करते है कि इसने के लिए बहुत करते हैं उससे हम अनुभव तेज़े कर सकते हैंLecture Summary
1. दुनिया की विशालता और द्वंद्व
2. आध्यात्मिक प्रगति का लाभ
3. मन का स्वभाव और अनर्थों की शुद्धि
4. अभ्यास और वैराग्य का संतुलन
5. आधुनिक तकनीक और डिजिटल उपवास
6. व्यावहारिक जीवन और सदाचार
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अध्यात्मिक प्रगति और द्वन्द्वों का प्रभावछोटी और बड़ी दुनिया का प्रभाव
मन का प्रभाव और अनर्थों की शुद्धि
अभ्यास और वैराग्य से मन को नियंत्रित करना
repetition of remembrance और वैराग्य का महत्व
सोशल मीडिया और मानसिक स्वास्थ्य
अभ्यास और वैराग्य का संतुलन
आधुनिक तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के खतरे
प्रश्नोत्तर और व्यावहारिक चर्चा
भक्तों का व्यवहार और प्रचार
ध्यान और साधना के विभिन्न मार्ग